कोलकाता : कोरोना से जूझ रहे असहाय और अकेले पड़ गए लोगों तक पहुंच कर भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की एनसीसी की टीम ने रीच आउट प्रोजेक्ट के तहत मदद देने का कार्य किया। 120 विद्यार्थियों की इस टीम ने कोविड-19 से जूझ रहे मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना, बेड, खून, प्लाजमा, अॉकसीजन सिलिंडर, इंजेक्शन और दवाइयों का इंतजाम किया जो आज की प्रतिकूल और भयावह परिस्थितियों में साहस का कार्य है। कैडट गौरव शशि शर्मा को पता चला कि उनकी स्कूल की अध्यापिका मिर्टल किट अकेली हैं और कोरोना से जूझ रही थी उनका अॉकसीजन लेवल गिर रहा था । उनको देखने वाला कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में जब कोई महामारी कोरोना के भय से कोई जाना नहीं चाहता है रीच आउट प्रोजेक्ट के तहत उनको ऑक्सीजन सिलिंडर मुहैया करवाया गया जो बहुत ही मुश्किल था। कैडट शुभदीप साहा चौधरी ने ऑकसीजन सिलंडर की व्यवस्था की। केडेट स्नेहा सेठिया अप्रैल में कोरोना से ग्रस्त होने के बाद बहुत दुर्बलता का अनुभव कर रहीं थीं लेकिन उस अवस्था में भी मदद करने से पीछे नहीं हटी। कोरोना के मरीजों को बेड, ऑक्सीजन और इंजेक्शन की मदद की। अंकित कुमार सिंह ने अपने स्थानीय मित्र के साथ सिलीगुड़ी में कोरोना के दुष्प्रचार के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित किया और सोशल मीडिया द्वारा जागृत किया।
कैडट बिपुल नारायण ने दिल्ली के ऐसे दो बच्चों को जो क्रमशः तीन दिन और छह महीने के थे जिन्होंने कोरोना में अपने माता-पिता को खो दिया था। इनके लिए प्रचार कार्य किया जिसके परिणामस्वरूप झारखंड के एक परिवार ने सेक्टर 4-बी एस सीटी झारखंड ने उन्हें गोद लिया। रांची के मनीष कुमार से संपर्क किया गया जिनको अपने पिता के लिए कोविड ट्रीटमेंट के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी, सोश्यल मीडिया के द्वारा आर्थिक मदद दी गई।
कैडट आशुतोष कुमार झा, यश बर्मन सिद्धार्थ ठाकुर शशांक शेखर तिवारी, ओजस्विता मुखर्जी और सभी कैडट ने पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों दिल्ली पूणे राजस्थान आदि में भी रीच आउट प्रोजेक्ट द्वारा मदद के लिए जुड़े हुए हैं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी दी।
कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज में बिरला तारामंडल के डायरेक्टर वैज्ञानिक डॉ देबी प्रसाद दुआरी ने अॉन-लाइन विद्यार्थियों को सौरमंडल के रहस्यों के विषय में जानकारी दी। एस्ट्रॉनमी, फिजिक्स और एस्ट्रोलॉजी, जीटीआर आदि विज्ञान के विविध विषयों पर विद्यार्थियों को अपने वक्तव्य से समृद्ध किया। सप्तर्षि मंडल, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी,सूर्य ग्रहण, ज्वार भाटा, अंतरिक्ष और काल आदि की विस्तृत चर्चा की। विभिन्न स्लाइड्स के द्वारा डॉ दुआरी ने बताया कि इस ब्रह्मांड में जीवन भी एक आकस्मिक घटना है। सूर्य ग्रहण ब्रह्मांड की एक घटना है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी की स्थिति बनती है। ग्रहण पूर्ण रूप से खगोलिय प्रक्रिया है। इसे अंधविश्वास का रूप देना ठीक नहीं है। जैसे नदी का जल प्रवाहित होता है हवा चलती है वैसे ही ग्रहण की स्थिति भी है। ज्वारभाटा की वजह से भी जीवन है। सूर्य भी जल को आकर्षित करता है जैसे चंद्रमा। गैस आदि विविध पदार्थों से सूर्य बना है। ऐसे ही सौरमंडल में नौ ग्रहों की स्थिति की डॉ दुआरी ने विस्तार से जानकारी दी। मंगल ग्रह पर भी जीवन होने की संभावना पर शोध चल रहा है।शनि ग्रह से पृथ्वी एक बिंदु की तरह दिखाई देती है। रंगों से भरपूर सौरमंडल के विभिन्न रंगों से भरे नासा से लिए प्राकृतिक चित्रों को डॉ देबी प्रसाद ने स्लाइड्स पर दिखाए। सबसे बड़ा 30 मीटर व्यास का टेलीस्कोप का निर्माण भी भारतीयों ने किया जिसमें यूएस ए, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत आदि देशों का सहयोग रहा। भारतीयों ने मंगल ग्रह की 200 फोटो ली है जो इस क्षेत्र में शुभ संकेत है।सूर्य जीवन को क्रियाशील और ऊर्जावान बनाए रखता है।डॉ. दुआरी ने बताया कि आने वाले पचास वर्षों में किसी अन्य ग्रह पर भी जीवन जन्म ले सकता है, शोध हो रहे हैं।
भवानीपुर कॉलेज के” मीट टू साइंटिस्ट ” में वरिष्ठ वैज्ञानिक तारामंडल के डायरेक्टर डॉ देबी प्रसाद दुआरी के इस कार्यक्रम में 75 विद्यार्थियों ने भाग लिया। अंत में, विद्यार्थियों के बहुत सी जिज्ञासाओं से भरे प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर दिया। प्रो. दिलीप शाह ने धन्यवाद दिया। इस कार्यक्रम में शिक्षक गणों की भी उपस्थिति रही। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी ।
हवा शुद्ध है
लेकिन मास्क आवश्यक है
सड़कें खाली हैं
लेकिन लंबे सफर पर कोई नहीं है
लोगों ने हाथ साफ किए हैं
लेकिन कोई हाथ मिल नहीं रहे हैं
मित्रों के पास बैठने का समय ही समय है
लेकिन एक साथ नहीं मिल- बैठ सकते
खाना बन रहा है भीतर
लेकिन किसी को खाने पर नहीं बुलाया जा सकता
जिनके पास पैसे हैं
लेकिन खर्च करने का कोई रास्ता नहीं
जिनके पास पैसे नहीं है
उनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है
आज हाथों में बहुत समय है
लेकिन अपने सपनों को पूरा करने का कोई रास्ता नहीं है
संसार अपनी संपूर्णता में कुछ भी नहीं है
अपराधी हमारे चारों ओर है
लेकिन उसे देख नहीं पाते
है भी और नहीं भी
प्रश्न बस यही है
– – – या क्या इसका यही उत्तर है
सकारात्मक रहें लेकिन रिपोर्ट नकारात्मक रहें
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, उम्मीद है कि महामारी के कारण उत्पन्न भय और संत्रास के माहौल में बिना घबड़ाए या डरे आप परिस्थितियों का सामना पूरी सकारात्मकता के साथ कर रही होंगी। सखियों, वर्तमान समय में जिस तरह का माहौल है, उसमें डर सबको लगता है। अगर कोई कहे कि वह निर्लिप्त और भयमुक्त है तो यह पूरी तरह से सच नहीं होगा। मनुष्य अपने और अपने अपनों के लिए निरंतर आशंकित, भयभीत और चिंतित रहता है और किसी ना किसी अदृश्य शक्ति से उनकी कुशलता की कामना या प्रार्थना भी करता रहता है।
सखियों, माना जाता है कि मनुष्य जन्म के बाद मुख्यत: चार मनोभावों से घिरा होता है, वे हैं- क्रोध, दुख, आश्चर्य और भय। लेकिन कभी -कभी यह भय तमाम मनोभावों पर हावी हो जाता है। भय के कई कारण होते हैं। बहुत से सामान्य कारणों के अलावा हर आदमी के लिए भय का अपना निजी कारण भी होता है जो उसके अवचेतन में छिपकर बैठा रहता है और आजीवन दुस्वप्न की तरह उसका पीछा करता रहता है। कभी -कभी यही भय या डर फोबिया में भी बदल जाता है, मसलन किसी को ऊँचाई का फोबिया होता है तो किसी को बंद लिफ्ट में फंस जाने का तो किसी को नदी या समुद्र का और उसका कोई ना कोई कारण अवश्य होता है। संक्षेप में कहें तो भय से कोई नहीं बचा है। संसार के अधिकांश कार्यों या घटनाओं के पीछे कोई ना कोई भय काम करता है। और बहुत बार आदमी किसी और से नहीं अपने अंदर बैठे इस डर रूपी राक्षस से डरता है, तभी तो आबिद सिद्दीक कहते हैं-
“उस के डर ही से मैं मोहज़्ज़ब हूँ
मेरे अंदर जो एक वहशी है।”
भय का मनोविज्ञान कहता है कि बहुधा किसी भी खतरनाक या खौफनाक स्थिति, वस्तु या जानवर से उसका भय अधिक डरावना होता है, जैसे मौत से ज्यादा मौत का भय खौफनाक होता है। मौत तो जब आनी होगी तब आएगी ही लेकिन उस मौत के खौफ या भय से आदमी बहुत बार मौत के पहले ही दम तोड़ देता है। ऐसे ही हमारे बहुत से वहम या मानसिक भय ही हमारी जान के दुश्मन बन जाते हैं, वह चाहे साँप- बिच्छू का डर हो या भूत और जिन का। जैसे हम सब जानते हैं कि हमारे देश के ज्यादातर साँप जहरीले नहीं होते लेकिन आदमी साँप के जहर से नहीं मरता बल्कि उसके भय से जान से जाता है। इस विषय में बहुत सी कहानियां कहीं -सुनी जाती हैं। एक छोटी सी कहानी मैं भी सुनाऊंगी।
“एक गांव में एक आदमी बरसात के पहले अपनी झोपड़ी के छप्पर की मरम्मत कर रहा था। शाम होनेवाली थी और आसमान बादलों से घिरा हुआ था इसीलिए ऊपर थोड़ा अंधेरा सा था। वह जल्दी -जल्दी फूस और बाँस की खप्पचियों को रस्सी से बाँध कर छप्पर को दुरुस्त कर रहा था ताकि रात होने से पहले अपना काम समाप्त कर ले। इसी क्रम में एक बार उसने जैसे ही पास ही छप्पर में खोंसी हुई रस्सी अपने हाथ में ली तो उसे लगा कि उसके हाथ में किसी कीड़े ने काटा है। काम समाप्त करने की हड़बड़ी में उसने ध्यान नहीं दिया और अपना काम पूरा करके ही नीचे उतरा। एक साल बीत गया और एक बार फिर वह उसी छप्पर की मरम्मत के लिए ऊपर चढ़ा। संयोग से उस दिन दोपहर का समय था और चटख धूप खिली हुई थी। काम करते- करते उसने एक स्थान पर पुरानी बंधी रस्सी को जांचने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया तो देखा कि खपची से एक साँप का सूखा पंजर बंधा हुआ है। उसके दिमाग में तड़ाक से पिछले वर्ष की घटना कौंध गई कि उसके हाथ में रस्सी बांधते हुए एक कीड़े ने काटा था। उसे एकदम से समझ में आ गया कि उसने रस्सी की जगह साँप से खप्पचियों को बाँधा था और उसी ने उसे डंसा था। इस स्मृति ने उसे इतना भयभीत कर दिया कि वह गश खाकर ऊपर से नीचे गिर पड़ा और तत्काल हदस के कारण उसकी मृत्यु हो गई। सखियों, कल्पना कीजिए कि साँप ने उसे साल भर पहले काटा था लेकिन उसके भय ने साल भर बाद उसकी जान ले ली। इसीलिए साँप से ज्यादा जहरीला या खतरनाक है, उसका भय।
सखियों, भयभीत होने और उस भय से मर -मर कर जीने के बजाय उस पर काबू करना जरूरी होता है और जो आदमी इस भय को काबू में कर लेता है, वही बहादुर कहा जाता है। अरस्तू भी कुछ ऐसा ही कहते हैं
“मुझे लगता है कि वह बहादुर है जो अपने दुश्मनों से हारने वाले की तुलना में अपने डर पर काबू पाता है, क्योंकि सबसे बड़ी जीत खुद पर है।”
सखियों, हर हाल में हमें अपने इस भय पर काबू पाने की जरूरत है। बहुत बार ऐसा होता है का माँएं अपने बच्चों को भूत, चुड़ैल, शेर आदि का डर दिखाकर अपने काबू में करने की जुगत निकालती है ताकि बच्चा उनकी बात मान लें। खाना खा ले, दूध पी ले या समय पर सो जाए लेकिन बहुत बार बचपन के ये डर ताउम्र बच्चों का जीना हराम किए रहते हैं इसीलिए बच्चों की परवरिश डराकर करने की बजाय उन्हें निर्भय होकर जीना सिखाने की आवश्यकता है। जब वे निर्भय होंगे तो विषम से विषम परिस्थिति में डर कर बैठने की जगह साहस के साथ उसका मुकाबला करते नजर आएंगे। जलील मानकपुरी जैसे शायर इसी डर को चुनौती देते हुए कहते हैं-
“क़यामत का मुझे डर क्या जो कल आनी है आज आए
तुम्हारे साथ की खेली है मेरी देखी-भाली है।।”
पहली बात यह है कि इस भय से भागना नहीं है। इसका डट कर मुकाबला करने की आवश्यकता है। और मुकाबले से भी पहले जरूरत है, इसे स्वीकारने की। शत्रु के अस्तित्व को हम स्वीकार करेंगे तभी उससे लड़ेंगे भी और जीत भी हासिल करेंगे। सलमान अख्तर बहुत खूब फरमाते हैं-
“जब ये माना कि दिल में डर है बहुत
तब कहीं जा के दिल से डर निकला।”
तो सखियों, इस डर पर काबू पाना भले ही मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं है। डर तूफान का हो या मौत का या फिर इम्तिहान का, बिना काबू किए वह हमें ताउम्र दौड़ाता रहेगा। इसीलिए इसका सामना करके, इसे हराकर ही हम खुशी हासिल कर सकते हैं। सरदार अंजुम की बातों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए आइए हम हर किस्म के डर से मुकाबले की हिम्मत जुटा लें और कह उठें-
“ज़िंदगी इक इम्तिहाँ है इम्तिहाँ का डर नहीं
हम अँधेरों से गुज़र कर रौशनी कहलाएँगे।।”
इसी संदर्भ में सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियों को भी फिर से पढ़ने और उससे शिक्षा ग्रहण करने की जरूरत है जिनमें वे डर को जीत कर फिर फिर कोशिश करने की प्रेरणा देते हैं-
“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”
मौजूदा हालात की बात करें तो बीमारी के कारण भय का जो माहौल बना है वह हमें बीमारी से ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है इसीलिए हमें सावधान होने की आवश्यकता है। भय की इस संक्रामक बीमारी से मुक्त होकर ही हम इस बीमारी या महा
चार्वाक, लोकायत, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध, माध्यमिक तथा अन्य बहुत से सम्प्रदाय और शाखाएं बन गई थी। इस प्रकार के सम्प्रदायों की संख्या लगभग 72 हो गई थी। सब आपस में एक दूसरे के विरोधी थे। कहीं कोई शान्ति नहीं। अनाचार, अन्धविश्वास, द्वन्द और संघर्ष का बोलबाला था। लगता था हर तीसरे व्यक्ति का अपना दर्शन, अपना सिद्धान्त और अपना अनुगामी दल है। आध्यात्मिक क्षेत्र में हुए ऐसे पतन के समय आचार्यशंकरका अवतरण हुआ।आध्यात्मकीनींवदर्शनशास्त्रहै।आचार्यशंकरनेअद्वैतसिद्धांतकोस्थापितकिया, अपनेअकाट्यप्रमाण, धारदारतर्कसेनास्तिकोंकोपरास्तकिया।भाष्यलिखकरसमाजकोज्ञानकेभंडारसेभरदिया।
वर्तमानकेदक्षिण भारत के केरल राज्यमें अवस्थित निम्बूदरीपाद ब्राह्मणों के ‘कालडी़ ग्राम’मेंसन् 788ईसापूर्वश्रीशिवगुरुतथाभगवतीआर्यम्बाकेघरइसमहानबालककाजन्महुआ।यद्यपिभगवानकृष्णइनकेकुलदेवताथेतथापिइनकेमाता – पितापरमशिवभक्तथे।धार्मिकमान्यतानुसारआचार्यशंकरकोभगवानशिवकाहीअवतारमानाजाताहै।केवल 3 वर्षकीअल्पायुमेंहीपरमप्रतापीबालकनेअपनीमातृभाषामलयालमकेअनेकोंग्रंथकंठस्थकरलिएथे।दुर्भाग्यसेइतनीकमआयुमेंहीशंकरकेसरसेपिताकासायाउठगया।मातानेकर्त्तव्यपालनकरतेहुएपुत्रकोज्ञानअर्जितकरनेगुरुकुलभेजा।कुशाग्रबुद्धिवालेशंकरमात्र 8 वर्षकीआयुमेंचारोंवेदोंकेज्ञाताहोगए।
सद्गुरुकीखोजमेंनिकलेशंकराचार्यमध्यप्रदेशकेनर्मदातटपरस्थितपरमपूज्य स्वामी श्रीगोविंदपादजीमहाराजकीशरणमेंजापहुंचतेहैं।उन्हेंसाक्षातमहर्षिपतंजलिकाअवतारमानाजाताहै, जिन्होंनेविश्वकोयोगसूत्ररूपीअमूल्यनिधिप्रदानकियाथा।गुरुकेसान्निध्यमेंआचार्यशंकरऔरअधिकतेजस्वीहोगए।गुरुकृपासेहीउन्हेंअद्वैतवेदांतकाज्ञानप्राप्तहुआ, योगमेंभीनिपुणहोगए।उन्होंनेअनेकोंग्रंथोंपरभाष्यलिखे, किताबेंलिखी।
तत्पश्चातगुरुकीआज्ञासेउन्होंनेज्ञानकीनगरीकाशीकीओरप्रस्थानकिया।भारतवर्षमेंसदासेहीवैचारिकस्वतंत्रतारहीहै।जगह – जगहशास्त्रार्थहुआकरतेथे, हरतरफज्ञानकीगंगाबहतीथी।अन्यान्यमतावलंबियों, कट्टरपंथियोंकोशास्त्रार्थमेंपरास्तकरकिशोरसन्यासीनेधीरे–धीरेप्रसिद्धिप्राप्तकरली।बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ किए और उन सबको अपने दृष्टिकोण की ओर मोड़ा। उन्होंने भास्कर भट्ट, दण्डी, मयूरा हर्ष, अभिनव गुप्ता, मुरारी मिश्रा, उदयनाचार्य, धर्मगुप्त, कुमारिल, प्रभाकर आदि मूर्धन्य विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।सभीनेउन्हेंअपनागुरुस्वीकारा।
भगवान विश्वनाथ ने इन्हें आशीर्वाद दिया और आज्ञा दी कि वेदान्त शास्त्रों पर भाष्य की रचनाकर सनातन धर्म की रक्षा करो।प्रभुकी इस आज्ञा को शिरोधार्य कर शंकर ने“प्रस्थानत्रयी“ भाष्यों की रचनाहेतुहिमालयकीओरप्रस्थानकिया।मार्गमेंहरिद्वारप्रवासभीहुआ।वहाँउन्होंनेदेखाकिमंदिरतोहैकिंतुवहाँमूर्तिनहींहै।आश्चर्यचकितहोकरउन्होंनेस्थानिकनिवासियोंसेपूछातोपताचलाकिचीनकेडकैतोंकेभयसेश्रीहरिविष्णुजीकीमूर्तिकोगंगामेंछुपायागयाथा, जोअबनहींमिलरही।आचार्यशंकरनेपूरीआस्थासेगंगामेंडुबकीलगाईऔरस्वयंमूर्तिउनकेसामनेप्रकटहोगयी, जिसेमंदिरमेंप्रस्थापितकियागया।
आचार्यने ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषदों की व्याख्याएं लिखी। अनेक स्त्रोतों की रचना की जिनमें शिवभुजयं, शिवानन्द लहरी, शिवपादादिके शान्तस्तोत्र, वेदसार शिवस्तोत्र, शिवपराधक्षमापनस्तोत्र, दक्षिणामूर्ति अष्टक, मृत्युंजयमानसिकपूजा, शिव पंचाक्षरस्तोत्र, द्वादशलिंगस्तोत्र, दशशलोकी स्तुति आदि उल्लेखनीय हैं।उन्होंनेविष्णुसहस्रनामपरभीभाष्यलिखा, जोअपनेआपमेंअलौकिकहै।
महिष्मति (वर्तमानबिहार) केएकप्रकाण्डपंडितश्रीमण्डन मिश्र कर्म मीमांसा के विद्वान थे और सन्यासियों के प्रति उनके मन मेंकोईआदरनहींथा।उनकेयहांकातोताभीसंस्कृतश्लोकबोलताथा।आचार्यशंकरनेउन्हेंशास्त्रार्थकेलिएचुनौतीदी।इसमेंनिर्णायककीभूमिकाकानिर्वहनप्रकाण्डविदुषीउदयाभारती (मण्डनमिश्रकीअर्धांगिनी) नेकिया।निश्चित हुआ कि यदि शंकर हार गए तो वे गृहस्थ हो जाएंगे और यदि मण्डन मिश्र हार गए तो वे सन्यासी हो जाएंगे। शास्त्रार्थ 17 दिन तक चला। मण्डन मिश्र की पत्नी ने निर्णायक की भूमिका में दोनों विद्वानों के गले में एक-एक माला डाल दी और कहा, ‘‘जिस किसी की माला के फूल पहले मुरझाने लगे तो वह स्वयं को पराजित मान लें।’’ सत्रहवें दिन मण्डन मिश्र की माला के फूल मुरझाने लगे। उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली। लेकिन, ‘‘नहीं – अभी नहीं।’’ उदया भारती ने यह पराजय स्वीकार नहीं की। उन्होंने शंकर से कहा, ‘‘मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी हूँ। आपने अभी मण्डन के अर्धभाग को पराजित किया है, अभी आपको मुझसे शास्त्रार्थ करना है।’’ शंकर अनिच्छा से भारती से शास्त्रार्थ के लिए सहमत हुए। इस बार फिर शास्त्रार्थ की प्रक्रिया 17 दिन तक चली। अन्त में जब भारती को लगा कि शंकर को पराजित करना कठिन है, तब उन्होंने कामशास्त्र का सहारा लिया। उन्होंने शंकर से कामशास्त्र सम्बंधी प्रश्न पूछने शुरू किये।अन्ततः शंकर ने एक महीने का समय मांगा क्योंकि वे इस ज्ञान से अनभिज्ञ थे।
आचार्य शंकर काशी गए। वहाँ योग विद्या से अपने शरीर को छोड़ा। अपने शिष्यों से अपने शरीर की रक्षा करने कोकहा और स्वयं एक सद्यमृत राजा अमरूक के शरीर में प्रवेश कर गए। राजा जीवित हो गया। यद्यपि राजा के रूप में जीवित व्यक्ति के कर्म, गुण, व्यवहार वास्तविक राजा से भिन्न थे। फिर भी वे राजा के रूप में राजगृह में रहे। गृहस्थ जीवन, पारिवारिक व्यवहार और दाम्पत्य रहस्यों को समझा। वे एक महीने बाद पुनः अपने चोले में आ गए और लौटकर उन्होंने मण्डन मिश्र की पत्नी से फिर शास्त्रार्थ करने के लिए कहा। अब वे उनके कामशास्त्र सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तैयार हो गए, मण्डन मिश्र और भारती ने पराजय मान कर शंकर को नमन किया। शंकर ने मण्डन मिश्र का नामकरण सुरेश्वराचार्य किया और बादमेंउन्हेंश्रृंगेरी मठ का कार्यभार सौंप दिया।
शंकराचार्य को हिन्दू, बौद्ध तथा जैन मत के लगभग 80 प्रधान सम्प्रदायों के साथ शास्त्रार्थ में प्रवृत्त होना पड़ा था। हिन्दू धर्मावलम्बी लोग यथार्थ वैदिक धर्म से विच्युत होकर अनेक संकीर्ण मतवादों में विभक्त हो गए थे। आचार्य शंकर ने वेद की प्रामाणिकता की प्रतिष्ठा की और हिन्दु धर्म के ‘‘सभी मतवादों का संस्कार कर जनसाधारण को वेदानुगामी बनाया। वेद का प्रचार उनका अन्यत्र प्रधान अवदान है। शंकर को वेदान्त के अद्वैतवाद सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने अनेक शास्त्रों का भाष्य लिखा। इनके अद्वैतवाद के अनुसार संसार का अन्तिम सत्य ‘दो नहीं’ एक होता है। इसी का नाम ब्रह्म है। ‘एकमेव हि परमार्थसत्यं ब्रह्म।’ अर्थात् ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य है। यही एक सत्य है शेष सभी असत्य है। शंकर ने हिन्दुत्व को पौराणिक धर्म से मोड़कर उपनिषदों की ओर उन्मुख कर दिया।
इनका एक अत्यंत महत्वपूर्ण परन्तु सबसे छोटा ग्रंथ है ‘भज गोविन्दम्’। इसमें वेदान्त के मूल आधार की शिक्षा अत्यंत सरल शब्दों में दी गई है। इसके श्लोकों की लय अत्यधिक मधुर है और इन्हें सरलता से याद किया जा सकता है। इसमें मात्र 31 श्लोक हैं। इसकी गणना भक्तिगीतों में की जाती है। इनमें पहले बारह श्लोक ‘‘द्वादष मंजरिका स्तोत्रम’’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसका अर्थ है बारह श्लोक रूपी फूलों का गुच्छा। चौदह श्लोक ‘‘चतुर्दश मंजरिका स्तोत्रम्’ के नाम से विख्यात हैं। आचार्य के प्रत्येक शिष्य ने एक-एक श्लोक को गुरु प्रेरणा के रूप में कहा। इसके बाद आचार्य शंकर ने पुनः चार श्लोकों के माध्यम से सभी सच्चे साधकों को आशीर्वाद दिया। पहला श्लोक टेक रूप में है –
“भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्गोविन्दम भज मूढ़मते।
सम्प्राप्ते सान्निहिते कालेन हि न हि रक्षति डुकृकरणें।“
सभी ग्रंथों की रचना के पीछे उनका एक ही भाव था कि मनुष्य को ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त करने का मार्ग स्पष्ट दिखायी देना चाहिए। अद्वैत को प्रमुखता देते हुए भी शंकर ने शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य पर स्तोत्र लिखे। इनका आग्रह समाज में समन्वय लाने का था। इन्हें आध्यात्मिक सुधारक भी माना जाता है क्योंकि शाक्त मन्दिरों में बलि देने की प्रथा का इन्होंने विरोध किया।
बद्रिकाश्रम, द्वारका, जगन्नाथपुरी और श्रृंगेरी देश की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना का कार्यसर्वाधिकमहत्वपूर्ण था। इस तरह से देश की भौगोलिक एकता को प्रत्यक्ष करने का गम्भीर कार्य शंकराचार्य ही कर सकते थे। इन मठों के अध्यक्ष आचार्य श्री शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। उन्होंने देश के साधु – सन्तों को एकत्र कर दस प्रमुख समूहों में एकत्रित किया। प्रत्येक मठ को इन्होंने एक-एक वेद का उत्तरदायित्व सौंपा – बदरिकाश्रम के ज्योतिर्मठ को अथर्ववेद दिया, श्रृंगेरी के शारदापीठ को यजुर्वेद, जगन्नाथपुरी के गोवर्धनमठ को ऋग्वेद और द्वारका के कलिका मठ को सामवेद सौंपा।ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्य के मुताबिक, कांची कामकोटि मठ की स्थापना भी आदिगुरू शंकराचार्य ने हीकी थी।स्वामीशंकराचार्यजीकाजन्मभलेहीदक्षिणभारतमेंहुआथाकिंतुउनकाकार्यक्षेत्रसमस्तभारतवर्षरहाहै।उन्होंनेपूरेभारतकाभ्रमणकरवेदकाप्रचार – प्रसारकियाऔरदिग्विजयीहुए।आजयहपूराविश्ववेदांतकीओरउन्मुखहोरहाहै, इसकापूराश्रेयजगद्गुरुशंकराचार्यकोहीजाताहै।उन्होंनेमठोंकीस्थापनाकरसमूचेराष्ट्रकोएकताकेसूत्रमेंपिरोदिया, समाजमेंसमन्वयस्थापितकिया।जीवन भर वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने जो प्रयत्न किए, उसेभविष्य में क्रियाशील रखने का प्रबन्ध करके मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में महाप्रस्थान करने का निश्चय किया।शिष्योंकेसाथकेदारनाथपहुंचेऔरवहींउन्होंनेनिर्विकल्पसमाधिलगाली।ऐसे अपूर्व विचारक, ब्रह्मज्योति से देदीप्यमान, दर्शनाचार्य, दैवीय प्रतिभा युक्त, युगद्रष्टाविरलेहीपैदाहोतेहैं।
मॉस्को ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हॉकी खिलाड़ी रविंदर पाल सिंह का कोरोना से निधन नयी दिल्ली, आठ मई (भाषा) भारतीय हॉकी टीम के पूर्व सदस्य और मॉस्को ओलंपिक 1980 के स्वर्ण पदक विजेता रविंदर पाल सिंह ने करीब दो सप्ताह कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद गत शनिवार की सुबह लखनऊ में अंतिम सांस ली । वह 60 वर्ष के थे ।
सिंह को 24 अप्रैल को विवेकानंद अस्पताल में भर्ती कराया गया था । पारिवारिक सूत्रों के अनुसार वह कोरोना संक्रमण से उबर चुके थे और टेस्ट नेगेटिव आने के बाद कोरोना वॉर्ड से बाहर थे । शुक्रवार को उनकी हालत अचानक बिगड़ी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा । लॉस एंजिलिस ओलंपिक 1984 खेल चुके सिंह ने विवाह नहीं किया था । उनकी एक भतीजी प्रज्ञा यादव है । वह 1979 जूनियर विश्व कप भी खेले थे और हॉकी छोड़ने के बाद स्टेट बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी । सीतापुर में जन्में सेंटर हाफ सिंह ने 1979 से 1984 के बीच शानदार प्रदर्शन किया । दो ओलंपिक के अलावा वह 1980 और 1983 में चैम्पियंस ट्रॉफी , 1982 विश्व कप और 1982 एशिया कप भी खेले ।
मुम्बई : भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने निजी बैंकों द्वारा सरकारी व्यवसाय को शुरू करने संबंधी संशोधित दिशानिर्देश जारी किए। इसमें राज्य और केंद्रीय दोनों के काम शामिल है। संशोधित दिशानिर्देश के अनुसार अनुसूचित निजी बैंक आरबीआई के साथ समझौते के बाद सरकारी कारोबार कर सकते हैं। आरबीआई के प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के तहत चल रहे बैंकों को यह छूट नहीं होगी। आरबीआई ने एक बयान में कहा, ‘‘आरबीआई के साथ एजेंसी बैंकिंग समझौता में नहीं शामिल और सरकारी एजेंसी के कारोबार को संभालने का इरादा रखने वाले बैंक उसके साथ यह समझौता कर सकते है।’’
आरबीआई ने कहा, ‘‘समझौते के समय आवेदन करने वाला कोई भी निजी बैंक पीसीए में शामिल नहीं होना चाहिए। तभी यह समझौता हो सकेगा।’’ उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्रालय ने निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकारी व्यवसाय के आवंटन पर सितंबर 2012 में लगाए गए प्रतिबंध को फरवरी 2021 में हटा दिया था। इसके बाद आरबीआई ने सरकारी व्यवसाय के संचालन के लिए अनुसूचित निजी क्षेत्र के बैंकों को आरबीआई के एजेंसी बैंकों के रूप में अधिकृत करने के लिए रूपरेखा को संशोधित करने का निर्णय लिया था।
गुवाहाटी : भाजपा नेता और पूर्वोत्तर प्रजातांत्रिक गठबंधन के संयोजक हिमंत बिस्वा सरमा ने असम के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल जगदीश मुखी ने उन्हें यहां श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई । सरमा ने पारंपरिक ‘पट रेशम’ की धोती और कुर्ता धारण किया हुआ था तथा अपने गले में मुगा ‘गमोसा’ डाला हुआ था। उन्होंने असमिया भाषा में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। कोविड-19 के सख्त प्रोटोकॉल के बीच उनके साथ 13 और विधायकों ने शपथ ली। शपथ लेने वाले विधायकों में से, 10 भाजपा के हैं जिनमें पार्टी के प्रदेश प्रमुख रंजीत कुमार दास, पिछली सरकार के मंत्री चंद्र मोहन पटोवारी, परिमल सुक्लाबैद्य, जोगेश मोहन और संजय किशन शामिल हैं। मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों में रनोज पेगू, बिमल बोहरा और एकमात्र महिला अंजता नेओग शामिल हैं। गठबंधन साझेदार एजीपी से अतुल बोरा और केशब महंत और यूपीपीएल से पूर्व राज्यसभा सदस्य यूजी ब्रह्मा ने शपथ ली है। बोरा और महंत भूतपूर्व सरकार में मंत्री थे। असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन को 75 सीटें मिली हैं। भाजपा को 60 सीटें मिली हैं जबकि उसके गठबंधन साझेदार असम गण परिषद (एजीपी) व यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) को क्रमश: नौ और छह सीटें मिली हैं। भाजपा नीत गठबंधन राज्य में पहली गैर कांग्रेसी सरकार है जिसने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता है।
‘ठुमरी की रानी’ के नाम से प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी का जन्म आज ही के दिन वर्ष 1929 में वाराणसी (तत्कालीन बनारस) के निकट एक गांव में हुआ था। यह वह दौर था, जब समाज महिलाओं को गायन व मंच पर प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं देता था। यही कारण था कि गिरिजा देवी की मां और दादी को कभी भी उनका संगीत पर समय गंवाना पसंद नहीं था। लेकिन उनके संगीत प्रेमी पिता रामदेव राय ने समाज की परवाह किए बगैर हमेशा गिरिजा देवी का साथ दिया। अप्पा जी के नाम से मशहूर, गिरिजा देवी ने पांच वर्ष की आयु में ही संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने ठुमरी, टप्पा, ख्याल सहित बनारस के आस-पास के क्षेत्रीय गायन जैसे चैती, होरी, बारामासा आदि का अभ्यास करने के बाद उन्हें अलग रंग दिया। 15 साल की उम्र में हुई शादी
वर्ष 1944 में गिरिजा की शादी व्यवसायी मधुसूदन जैन से होई। मधुसूदन की पहले भी एक बार शादी हो चुकी थी और वे गिरिजा से उम्र में बड़े भी थे। किंतु उन्होंने गिरिजा के पिता से वादा किया था कि वे शादी के बाद भी गिरिजा को गायन से नहीं रोकेंगे। सिर्फ इस शर्त की वजह से पिता ने गिरिजा के लिए मधुसूदन को चुना। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने (मधुसूदन जैन) ने मुझे किसी भी बड़े घर या निजी महफिल में गाने नहीं दिया। हालांकि अपने वादे के मुताबिक घर पर ही मुझे संगीत सीखने और गाने की अनुमति दे दी। मेरे पहले गुरु का निधन हो गया था इसलिए उन्होंने एक दुसरे गुरु श्रीचंद मिश्रा से मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाई। 1951 में पहली बार मंच पर गाया गाना
शादी के पांच साल बाद, वर्ष 1949 में गिरिजा देवी ने रेडियो पर गाना शुरू किया। 1951 में गिरिजा, बिहार राज्य में आयोजित आरा कॉन्फ्रेंस में मशहूर गायक पंडित ओंकारनाथ का गायन सुनने गई। किंतु कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही यह खबर आई की पंडित ओंकारनाथ की गाड़ी खराब होने की वजह से वह तय समय पर कार्यक्रम स्थल पर नहीं पहुंच पाएंगे। जब आयोजकों ने गिरिजा देवी को उनके स्थान पर गाने के लिए मंच पर आमंत्रित किया। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के सामने पेश किया ठुमरी गायन
इसके बाद गिरिजा देवी ने बनारस कांफ्रेंस में भी अपने गायन की प्रस्तुति दी। यहां उन्हें रविशंकर, अली अकबर भैया और विलायत खान साहब जैसे गायक ने सुना। रविशंकर को गिरिजा देवी का गायन इस कदर पसंद आया कि उन्होंने गिरिजा देवी को गाने के लिए दिल्ली बुला लिया। 1952 में गिरिजा देवी ने दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के सामने ठुमरी गायन पेश किया। पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की मिली उपाधि
इसके बाद गिरिजा ने रेडियाे कार्यक्रम, स्टेज शो आदि किए। संगीत में गिरिजा के योगदान के लिए उन्हें 1972 में पद्मश्री और 1989 में पद्म भूषण की उपाधि मिली। गिरिजा अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अपना ज्यादातर समय कोलकाता में स्थित संगीत रिसर्च अकादमी में बिताती थी। वर्ष 2016 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। दिल का दौरा पड़ने से 24 अक्टूबर, 2017 को उनका निधन हो गया।
नयी दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षकों और छात्रों की मदद के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को कोविड टास्क फोर्स को गठित करने और हेल्पलाइन शुरू करने की सलाह दी है। आयोग ने इस संबंध में आधिकारिक वेबसाइट पर अधिसूचना भी जारी की है।
अधिसूचना के मुताबिक आयोग ने कहा है कि, “हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि बढ़ते कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों की नीजि और प्रोफेशनल कामों पर असर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों से उभरने के लिए छात्रों, शिक्षकों, अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों सहित अन्य लोगों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और समग्र कल्याण के मामले में आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए साथ मिलकर काम करना होगा।
काउंसलर और मैंटर्स की भी व्यवस्था करने का आग्रह किया
यूजीसी ने अधिसूचना के जरिए अभी उच्च शिक्षा संस्थानों से मानसिक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक समर्थन और सभी हितधारकों की भलाई के लिए काउंसलर और मैंटर्स की व्यवस्था करने का आग्रह किया है। सभी को शारीरिक और मानसिक फिटनेस के लिए विभिन्न तरह की गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कहा है। खुदको, दोस्तों को और परिवार को सुरक्षित करने के लिए सभी हितधारकों को टीका लगवाने की सलाह दी है। इसके साथ ही एनसीसी और एनएसएस सहित जीवन कौशल में सूचित प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक टीम गठित करने को कहा है। अधिक जानकारी के लिए अभ्यर्थी यूजीसी की आधिकारिक वेबसाइट www.ugc.ac.in पर जाकर अधिसूचना पढ़ सकते हैं।