Sunday, April 5, 2026
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बसंत पंचमी पर हो वासन्ती रंग से सजा स्वाद

वासन्ती लस्सी
सामग्री : 500 ग्राम ताजा दही, एक कप मलाईयुक्त दूध, केसर के लच्छे 10-12, आधा चम्मच इलायची पावडर, शक्कर स्वादा‍नुसार, बादाम-पिस्ता की कतरन पाव कटोरी।
विधि : दही को रवई अथवा मिक्सी में अच्छे से फेंट लें। अब केसर के लच्छों को गुनगुने दूध में कुछ देर तक भिगोकर रखें। पुन: दही में दूध और थोड़ासा पानी और शक्कर मिला कर फिर से फेंट लें। केसर वाला दूध मिलाएं और एक बार फिर मिक्सी में चला लें। अब गिलासों में भर कर ऊपर से बादाम-पिस्ता की कतरन से सजाकर परोसें।
केसरी नारियल चमचम
सामग्री : 1 लीटर दूध, 250 ग्राम चीनी, 1 नारियल पानी वाला, 50 ग्राम नारियल बूरा, केसर के कुछ धागे, 1/2 चम्मच इलायची पाउडर।
विधि : नारियल की गिरी निकाल कर, मिक्सी में बारीक पीस लें। दूध को उबालने रखें व उसमें नारियल मिला लें, उबाल कर मावा जैसा बना लें। इसमें चीनी, केसर व इलायची मिला लें व ठंडा कर लें। अब अपनी पसंद के आकार की चमचम बना लें। नारियल बूरे में लपेटें व केसर का टीका लगाकर केसरी नारियल चमचम सर्व करें।

क्या सरस्वती के नाम से हैं दो देवियाँ?

वसंत पंचमी का पर्व 16 फरवरी 2021 को है। वसंत पंचमी का त्योहार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन मां सरस्वती की पूजा का विधान है। वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की विधि-विधान से पूजा करने वालों को विद्या और बुद्धि का वरदान मिलता है। शास्त्रों के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का जन्म हुआ था।त्रिदेवियों में से एक माता सरस्वती की पूजा वसंत पंचमी के दिन होती है। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। देवी सरस्वती का वर्ण श्‍वेत है। परंतु पुराणों में 2 सरस्वती के होने का उल्लेख मिलता है। आओ जानते हैं इस रहस्य को।

सरस्वती नाम से दो देवियों का उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि एक विद्या की देवी और दूसरी संगीत की देवी। दोनों की ही पूजा करना चाहिए। बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी। एक कमल पर विराजमान है और दूसरी हंस पर।
दो सरस्वती :
1. शास्त्रों के अनुसार जिस तरह ज्ञान या विद्याएं दो हैं उसी तरह सरस्वती भी दो हैं। विद्या में अपरा और परा विद्या है। अपरा विद्या की सृष्टि ब्रह्माजी से हुई लेकिन परा विद्या की सृष्टि ब्रह्म (ईश्वर) से हुई मानी जाती है।
2. अपरा विद्या का ज्ञान जो धारण करती है, वह ब्रह्माजी की पुत्री है जिनका विवाह विष्णुजी से हुआ है। ब्रह्माजी की पत्नी जो सरस्वती है, वे परा विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करने वाली देवी हैं और वे महालक्ष्मी (लक्ष्मी नहीं) की पुत्री हैं।
3. शाक्त परंपरा में तीन रहस्यों का वर्णन है- प्राधानिक, वैकृतिक और मुक्ति। इस प्रश्न का, इस रहस्य का वर्णन प्राधानिक रहस्य में है। इस रहस्य के अनुसार महालक्ष्मी के द्वारा विष्णु और सरस्वती की उत्पत्ति हुई अर्थात विष्णु और सरस्वती बहन और भाई हैं। इन सरस्वती का विवाह ब्रह्माजी से और ब्रह्माजी की जो पुत्री है, उनका विवाह विष्णुजी से हुआ है।
4. सरस्वती नाम से दो देवियों का उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यता है कि एक विद्या की देवी और दूसरी संगीत की देवी। दोनों की ही पूजा करना चाहिए। एक कमल पर विराजमान है और दूसरी हंस पर। कहीं-कहीं ब्रह्मा पुत्री सरस्वती को विष्णु पत्नी सरस्वती से संपूर्णतः अलग माना जाता है इस तरह मतान्तर मे तीन सरस्वती का भी वर्णन आता है। इसके अन्य पर्याय या नाम हैं वाणी, शारदा, वाग्देवी, वागेश्वरी, वेदमाता इत्यादि। देवी भागवत के अनुसार विष्णु पत्नी सरस्वती वैकुण्ठ में निवास करने वाली है एवं पितामह ब्रह्मा की जिह्वा से जन्मी हैं। देवी सरस्वती का वर्णन वेदों के मेधा सूक्त में, उपनिषदों, रामायण, महाभारत के अतिरिक्त कालिका पुराण, वृहत्त नंदीकेश्वर पुराण तथा शिव महापुराण, श्रीमद् देवी भागवत पुराण इत्यादि में मिलता है। इसके अलावा ब्रह्मवैवर्त पुराण में विष्णु पत्नी सरस्वती का विशेष उल्लेख आया है।

शिक्षा को विद्यार्थियों के लिए सुलभ बना रहा है दो दोस्तों का एडुकेशन ऐप ‘फिलो’

इन्सटेंट ट्यूटर ऐप फिलो ने उगाहे 2 लाख 60 हजार प्री सीड राउंड

गुरुग्राम : दो दोस्तों द्वारा शुरू किया गया इन्स्टेंट एडुकेशन ऐप फिलो लोकप्रिय होता जा रहा है। हाल ही में बेटर कैपिटल के प्री सीड राउंड में फिलो ने 2 लाख 60 हजार डॉलर उगाहे हैं। सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों के जरिए विद्यार्थियों की मुश्किलों को आसान करने वाले इस ऐप को 2020 में इम्बस्त अहमद तथा शादमान अनवर ने शुरू किया था। फिलो के सह संस्थापक तथा सीईओ इम्बस्त अहमद के मुताबिक फिलहाल 10 मिलियन से अधिक विद्यार्थी किसी भी समय स्कूल परीक्षा, कॉलेज में प्रवेश या सरकारी नौकरी इत्यादि की परीक्षाओं में बैठते हैं , लेकिन उनमें से कम से कम आधे अपने प्रश्नों के लिए समय पर और विश्वसनीय समर्थन की कमी के कारण प्रेरणा खो देते हैं। फिलो अब इस समस्या का समाधान दे रहा है। ऐसे परीक्षार्थी फिलो पर, वे एक-से-एक वीडियो कॉल के लिए केवल 60 सेकंड के भीतर मांग पर एक ट्यूटर का उपयोग कर सकते हैं। थोड़े समय में, 35,000+ छात्रों ने फिलो पर सत्र के 1.5 मिलियन मिनट पूरे कर लिए हैं – आवश्यकता अनुभव करने के कुछ मिनटों के भीतर अच्छे ट्यूटर से महत्वपूर्ण प्रश्नों के लिए सहायता प्राप्त करना आसान है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए फिलो अपने ट्यूटर्स को तेजी से बढ़ा रहा है। इस ऐप का आविष्कार इम्बस्त और शादमान की अपनी कहानी से प्रेरित है। इम्बस्त आईआईटी में जाना चाहते थे मगर वहाँ जाने के लिए उनको सुपर 30 थर्टी में दाखिला लेना पड़ता। उस समय बिहार पुलिस के तत्कालीन डीजीपी अभयानंद इसके प्रमुख थे। उनकी त्वरित सहायता से इम्बस्त आईआईटी में दाखिला ले सके और इस घटना ने उनको फिलो जैसा समाधान लाने के लिए प्रेरित किया। वे कहते हैं कि फिलो पर विद्यार्थी वही पढ़ सकते हैं, जो वह पढ़ना चाहते हैं। आज भी अनगिनत विद्यार्थियों को समुचित शैक्षणिक सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। कोविड -19 के दौरान स्कूलों और कोचिंग संस्थानों के बंद रहने से उनको बहुत परेशानी हुई। ऐसी स्थिति में फिलो एडुकेशन ऐप इनके लिए समुचित समाधान लेकर आया है। फिलो के शुरुआती निवेशक बेटर कैपिटल के वैभव डोमकुंडवार का कहना है, “फिलो सबसे प्रभावशाली शिक्षा ऐप में से एक है, जो शहरी अच्छी तरह से करने वाले छात्रों से लेकर भारत के दूरदराज के हिस्सों में गरीब छात्रों तक सभी के लिए एक अच्छे शिक्षक पहुँचा रहता है। फिलो के साथ जुड़ना शानदार है। गौरतलब है कि बेटर कैपिटल ने स्किल लिंक, टीचमिंट, विरोहन जैसे अन्य शैक्षणिक स्टार्टअप में निवेश किया है।

महानगर में खुला रेमो रेस्तरां

कोलकाता : कल्टिव हॉस्पिटैलिटी ने अपना रेस्तरां रेमो महानगर में खोला है। इस रेस्तरां का उद्घाटन अभिनेता ऋषभ बसु ने किया है। इस मौके पर देवलीना दत्ता और तथागत मुखर्जी भी मौजूद थे। रेमो का वातावरण बेहद अच्छा है जहाँ परिवार और दोस्तों के साथ पार्टी भी की जा सकती है। यहाँ स्वीगी और जोमेटो या सीधे आर्डर देकर होम डिलिवरी की सुविधा भी उठायी जा सकती है। होटल के मालिक रेमो पोद्दार एक युवा उद्यमी हैं। उन्होंने कहा कि होटल में भारतीय, तन्दूर और मुगलई जायकों का आनन्द उठाया जा सकता है। रेमो के अनुसार वे स्थानीय व क्षेत्रीय बाजारों से चुने हुए उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। कल्टिव हॉस्पिटैलिटी को दो होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले कॉलेज के दो दोस्तों ने रेमो पोद्दार और रोहन विश्वास ने शुरू किया है और यह कोलकाता के अतिरिक्त देश के अन्य भागों में रेस्तरां, क्लाउड किचन, आउटडोर फूड और बेवरेज सर्विस सॉल्यूशन्स खोल रही है।

बिड़ला हाई स्कूल में वर्चुअल माध्यम पर आयोजित हुए खेल

कोलकाता : कोविड -19 की चुनौतियों के बीच बिड़ला हाई स्कूल के सीनियर सेक्शन के विद्यार्थियों ने जूम वर्चुअल माध्यम पर खेल दिवस आयोजित किया । इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व विधायक तथा पूर्व क्रिकेटर लक्ष्मी रतन शुक्ला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। प्रख्यात फुटबॉलर श्याम थापा शारीरिक प्रशिक्षण के महत्व पर जोर दिया। प्रिंसिपल लवलीन सैगल के मार्गदर्शन में फिजिकल एडुकेशन तथा आई टी विभाग के सहयोग से यह खेल आयोजित हुए। इसमें शिक्षकों व गैर शिक्षा कर्मियों ने भी भागीदारी की। समारोह की शुरुआत प्रिंसिपल लवलीन सैगल के स्वागत भाषण से हुई और इसके बाद बिड़ला हाई स्कूल की निदेशक मुक्ता नैन ने ध्वज फहराया। स्कूल के खेल सचिव 11वीं (कॉमर्स विभाग) के विद्यार्थी करन महिपाल मशाल वाहक बने जबकि स्टूडेंट्स काउंसिल के अध्यक्ष अनुज चोपड़ा और हेड बॉय अमन गुप्ता ने शपथ दिलवायी। इन खेलों में 6वीं से 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों ने 14 खेल गतिविधियों में भाग लिया। बच्चों ने घर में रहकर ही बलून ब्लोविंग, गेट रेडी फॉर स्कूल, स्कीपिंग जैसी 14 गतिविधियों में भाग लिया। बच्चों ने इन खेलों का भरपूर आनन्द उठाया और खेलों के महत्व को भी वे समझ सके।

समय की धूल में दब गयीं बुद्ध को अपनी खीर से जीवन देने वाली सुजाता की कविताएं

प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 17

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों इतिहास बड़ा निर्मम होता है, शायद इसीलिए वहाँ किसी का नाम स्वर्णाअक्षरों में अंकित होता है और किसी- किसी का सिर्फ नाम ही दर्ज होता है। किसी को तो इतना भी सौभाग्य नहीं मिलता क्योंकि खुद इतिहास को उसका नाम -पता नहीं पता होता। और कुछ लोगों को समय के साथ भुला दिया जाता है। अब यह गलती इतिहास की है या इतिहासकारों की या फिर जनमानस की स्मृति की, इस पर लोगों की राय भले ही अलग- अलग हो लेकन जब आलोचना का समय आता है तो इतिहास को या फिर इतिहासकारों को अपने पक्षपातपपूर्ण रवैये के लिए प्रायः निंदा का पात्र अवश्य बनना पड़ता है। दरअसल इतिहासकार कई बार सत्तासीन शासक के निर्देश पर या जनरूचि के आधार पर यह तय करता है कि किसके जीवन के पन्ने को अधिक कला कौशल से चित्रित करना है और किसी का उल्लेख मात्र करना है। शायद इसीलिए कई बार महान लोगों की आभा के नीचे कई ऐसे चरित्र दब जाते हैं या फिर समय के साथ भुला दिए जाते हैं जिनका उस महान व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान होता है, जैसे रानी झांसी के शौर्यपूर्ण जीवन की गौरवपूर्ण आभा के पीछे झलकारी बाई का नाम वर्षों तक छिपा रहा। बहुत बाद में लोगों ने उनके बारे में जाना और उनके बलिदान को भी श्रद्धा के साथ याद किया जाने लगा। 

सखियों, आज मैं ऐसी ही एक सखी की कहानी आपके सामने रखने जा रही हूँ जिनकी गौतम बुद्ध के जीवन में उल्लेखनीय भूमिका रही। लेकिन उनके जीवन की कथा को विस्तार से हम नहीं जानते और वह हैं, सुजाता। सुजाता बुद्ध के समय उरुवेला के सैनिक ग्राम में रहती थी। कहा जाता है कि वह अनाथपिण्डिका नामक एक समृद्ध व्यक्ति की पुत्रवधू थी और उनकी दासी का नाम था, पूर्णा। सुजाता ने यह मन्नत मांगी थी कि जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी तो वह अपने गांव के निकट के पीपल के वृक्ष पर रहनेवाले देवता को खीर का प्रसाद चढ़ाएगी। जब उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो अपनी मन्नत पूरी करने के लिए उन्होंने अपनी दासी को उस वृक्ष के आस -पास और नीचे की जगह की सफाई करने के लिए भेजा। संयोग की बात है कि उसी वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ तपस्या में लीन थे। चूंकि वह निराहार रहकर साधनारत थे अतः बिना अन्न जल के उनका शरीर  जर्जर हो गया था‌। दासी जब वहाँ पहुंची तो समाधि में लीन कृशा गौतम को देखकर उसने उन्हें वृक्ष देव समझा और यह शुभ समाचार उसने तत्काल सुजाता को दिया। देव के प्रकट होने की बात जानकर सुजाता तुरंत कटोरे में गाय के दूध की खीर लेकर वहाँ पहुंची और बड़े आदर से सिद्धार्थ को खीर अर्पित की और कहा- ‘जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई, उसी तरह आपकी भी हो।’ शारीरिक रूप से दुर्बल  सिद्धार्थ ने खीर पाकर उसे ग्रहण करने का निर्णय लिया। कहा जाता है कि बुद्ध ने पहले सुप्पतित्थ नदी में स्नान किया। उसके बाद उस खीर का सेवन कर अपने 49 दिनों के उपवास को भंग किया। उसी रात को समाधि में लीन सिद्धार्थ को सच्चे ज्ञान का बोध हुआ और उनकी साधना सफल हुई। उसी समय  से वे ‘बुद्ध’ कहलाए और उस वृक्ष का नाम पड़ा, बोधिवृक्ष। 

वर्तमान में  बोधगया से थोड़ी दूर पर एक गाँव है, ‘बकरूर’ जिसे सुजाता का गाँव माना जाता है। वहाँ भ्रमण करने के लिए जाने वाले पर्यटकों को स्थानीय नागरिक  सुजाता के गाँव में जाने की सलाह अवश्य देते हैं। वहाँ सुजाता और उसके बालक की मूर्ति बनी हुई है। उसका घर और‌ उसके सामने बना एक मंदिर भी है, जिसे सुरक्षित रखा गया है, संभवतः पर्यटकीय महत्व के कारण ही। साधारण व्यक्ति सुजाता के बारे में बस इतना भर जानता है कि वह एक ग्वालिन थी और उसने गौतम को खीर खिलाई थी। लेकिन सुजाता और बुद्ध की कथा यहीं समाप्त नहीं हुई। बुद्ध के साथ सुजाता का संपरा बना रहा और कालांतर में बुद्ध के आभामंडल और बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर सुजाता ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। माना जाता है कि उन्होंने अपने जीवन की सांध्य वेला में साकेत के पास एक बौद्ध मठ में दीक्षा ली थी। उसकी मृत्यु भी बुद्ध की उपस्थिति में ही वैशाली के पास बने किसी मठ में हुई थी। उनका एक परिचय और भी है कि वह कविता लिखती थी। “थेरीगाथा” में जिन बौद्ध भिक्षुणियों की कविताएं संकलित हैं, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम सुजाता का भी है। कवि ध्रुव गुप्त ने मूल पाली से अंग्रेजी में अनूदित उस कविता का हिंदी में भावानुवाद किया है। सुजाता की कविता में उसकी आत्मानुभूतियों की अत्यंत भावप्रवण अभिव्यक्ति  हुई है। वह कविता आपके लिए प्रस्तुत है-

“खूबसूरत, झीने, अनमोल परदों में

चंदन-सी सुगंधित

बहुमूल्य आभूषणों और

पुष्प मालाओं से सजी

घिरी हुई दास-दासियों

दुर्लभ खाद्य और पेय से

मैंने जीवन के सभी सुख

सभी ऐश्वर्य, सभी क्रीड़ाएं देखी

लेकिन जिस दिन मैंने

बुद्ध का अद्भुत प्रकाश देखा

झुक गई उनके चरणों में

और देखते-देखते

मेरा जीवन परिवर्तित हो गया

उनके शब्दों से मैंने जाना

कि क्या होता है धम्म

कैसा होता है वासनारहित होना

इच्छाओं से परे हो जाने में

क्या और कैसा सुख है

और अमरत्व क्या होता है

बस उसी दिन मैंने पा लिया

एक ऐसा जीवन

जो जीवन के दुखों से परे है

और एक ऐसा घर

जिसमें घर है ही नहीं !”

सुजाता जैसी बहुत सी ऐसी स्त्रियाँ हैं जिनके बारे में हम बहुत ज्यादा नहीं जानते लेकिन उनके जीवन की कथा भी हमें जाननी चाहिए और उन पर गर्व भी करना चाहिए। आज के लिए विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।

शुभजिता क्लासरूम – पत्रकारिता – परिचय

आपके सुझावों का स्वागत है। साफ कर दूँ कि मैं पेशेवर शिक्षिका नहीं हूँ और न ही ऐसा दावा है। मैं बिल्कुल अनौपचारिक तरीके से मगर तैयारी और बिल्कुल आसान तरीके से बात कहना चाहूँगी। ये उन युवाओं के लिए है जो पत्रकारिता में अपना कॅरियर बनाना चाहते हैं पर उनको कोई राह दिखाने वाला नहीं होता – 

अपराजिता से शुभजिता तक का सफ़र-मेरी नज़र में

निखिता पांडेय

‘अपराजिता’ के आज पांच वर्ष पूरे हो रहे हैं, जो आज ‘शुभजिता’ का रूप ग्रहण कर चुकी है। आज का यह दिन बहुत यादगार और गौरवपूर्ण है।इसकी सफ़लता के पीछे एक सशक्त, स्वतंत्र और एक सफ़ल स्त्री है-सुषमा दीदी।
इन्होंने कभी भी भीड़ में खुद को शामिल नहीं किया,बल्कि भीड़ से अलग बनकर अपनी करनी से खुद को स्थापित किया और कई लोगों को खड़ा और स्वावलंबी बनाया। आज ‘अपराजिता’ की झलक ‘शुभजिता’ में दिखाई पड़ती है,सुषमा दी ने इसे अपने खून-पसीने की मेहनत से सींचा और इसकी शाखा को वृहत्त कर दिया। कहते हैं न कि जब आप कोई नेक काम करने निकलेंगे,तो आपका साथ देने वाला कोई नहीं होगा और जैसे ही आप सफ़ल हो जाएंगे,तो लोग आपके पीछे-पीछे चलेंगे। सच्चाई की यही शैली है। यही सनातन सत्य भी है। मैं 1 वर्ष से इससे जुड़ी हूं और इस एक वर्ष में इन्होंने मुझमें आत्म-विश्वास भर दिया।

अब किसी भी जगह यदि प्रस्तुति करनी हो,तो अब संकोच नहीं होता और ये आज की युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं और आने वाले दिनों में इसका रूप और विस्तृत होगा। इससे और लोग जुड़ेंगे,आज इसे लगभग 2 लाख लोग देख चुके हैं। इसके पीछे लक्ष्य यही है कि आपको खुद में हुनर की तलाश करनी होगी और जब आप इसे पहचान लेंगे,तो आप एक सक्रिय दिशा की ओर बढ़ने लगेंगे और तब आपके मार्ग में कितनी भी बाधाएं आये,आप उसका डटकर सामना करने के लिए तत्पर रहेंगे और दीदी का यह प्रयास क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। इसकी जितनी प्रशंसा करूँ कम ही है। मेरे अंतर्मन में भावनाओं की तरंगे दौड़ रही है……और अभी मैं शब्दहीन हो चुकी हूं।बस इतना ही कहना चाहूंगी दी कि आप मेरे जीवन में सफ़ल परिवर्तन की कड़ी बनी है,आपको हृदय तल की गहराई से कोटि-कोटि प्रणाम करती हूं और यूंही आगे की राह में आपका साथ और सान्निध्य चाहती हूं………आपके अंदर मैंने एक माँ, बहन, एक दोस्त,एक मददगार के रूप पाये है….आप एक सुदृढ़ महिला है,जो लोगों को जीवन में प्रगति और महत्वाकांक्षी बनाती है। एक बार फिर से इस सुनहरे 5 सालों के वर्षपूर्ति की हार्दिक बधाई!

 

 गेटे-इंस्टीट्यूट  ने आयोजित किया पहला वर्चुअल प्रिंसिपल कॉन्फ्रेंस

नयी  दिल्ली :  गेटे  इंस्टीट्यूट  ने  स्कूलों  के  प्रिंसिपलों  को  छिपे  अवसरों  की  सूझबूझ  देने  और  विद्यार्थियों  को बेहतर  भविष्य  प्रदान  करने  के  मकसद  से  22  से  24 जनवरी  तक  पहला  वर्चुअल  पीएएससीएच  प्रिंसिपल्स  कॉन्फरेंस साउथ  एशिया  नाॅर्थ  2021  ‘द  जर्मन  वेज़  ए ड  द  वेज़  विद  जर्मन’  आयोजित किया।  सम्मेलन  का  उद्देश्य  गेटे-इंस्टीट्यूट समर्थित उत्तर दक्षि ा एशियाई क्षेत्र के पीएससीएच स्कूलों के प्रधानाचार्यों को एकजुट करना है।तीन  दिवसीय  सम्मेलन  में  पीएएससीएच  की  पहल  और  इसके  लक्ष्यों  और  इनके  परिणामस्वरूप  दक्षिण  एशियाई  विद्यार्थियों और उनके स्कूल के प्रिंसिपलों के लिए सही नजरिये पर विस्तृत विमर्श किया गया। इस  अवसर पर  दक्षिण  एशिया की  पीएएससीएच प्रमुख  सुश्री वेरोनिका  तारान्जिन्स्काजा ने कहा, ‘‘सम्मेलन में  शैक्षिक मुद्दों को आपस  में  जोड़ने  पर  विचार  और  विमर्श  किया  गया।  सम्मेलन  के  डिजिटल  होने  से  वास्तविक  सवंाद  नहीं  हुआ  लेकिन  हम भारत,  नेपाल,  बांग्लादेश,  पाकिस्तान  और  ईरान  के  स्कूलों  के  प्रिंसिपलोें  और  उनके  प्रतिनिधियों  के  बीच  अंतरंग  संवाद  का आयोजन कर पाए।’’ सम्मेलन  के  पहले  दिन  अतिथियों  का  स्वागत  क्षेत्रीय  संस्थान  नयी  दिल्ली  के  निदेशक  और  दक्षिण  एशिया  क्षेत्र  के  प्रमुख  डॉ. बर्थोल्ड  फ्रेंक  और  इसके  बाद  गेट-े  इंस्टीट्यूट  म्यूनिख  के  भाषा  विभाग  प्रमखु डॉ.  क्रिस्टोफ  वल्डह्यसू  ने  किया।  नयी  दिल्ली स्थित  जर्मन  दूतावास  के  सांस्कृतिक  और  वीजा  विभाग  ने  सम्मेलन  के  लिए  सहयोग  देने  के  साथ  दक्षिण  एशिया  में पीएएससीएच-नेटवर्क  की  भूमिका  पर  आरंभिक  विचार  रखे  और  साथ  ही,  जर्मनी  के  लिए  वीजा  के  आवेदन  संबंधी  महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

पतंजलि योग समिति ने 180 योगा शिक्षकों को प्रमाणित किया

कोलकाता : योग के प्रसार में जुटी पतंजलि योग समिति, हावड़ा ने 180 कोलकाता के राज्य के शिक्षकों, राज्य के अधिकारी व जिला प्रभारियों को रविवार को प्रमाण पत्र प्रदान किया। कार्यकर्ताओं के लिए पतंजलि योगपीठ में 100 घंटे की योगा शिक्षक प्रशिक्षण वर्कशॉप करवाया गया। पश्चिम बंगाल के संरक्षक पूज्य स्वामी प्रबीर देव और  विजय जायसवाल वर्कशॉप में मौजूद थे। उनके अलावा कोलकाता राज्य अध्यक्ष और अन्य सदस्य भी प्रमाण पत्र समारोह में मौजूद थे। पश्चिम बंगाल के संरक्षक, विजय जायसवाल ने कहा , “180 के करीब प्रमाण पत्र कोलकाता के शिक्षकों, राज्य के अधिकारियों और जिला प्रभारियों, योगा शिक्षकों को दिया गया, वर्कशाप का अंत शांति मंत्र के जाप से हुआ।” वे आगे कहते हैं, “योग सभी उम्र समूह में लोकप्रियता प्राप्त कर रही है। यह पिछले कुछ सालों से देखा गया है कि यह लोगों के लिए एक अच्छे कॅरियर विकल्प के रूप में उभरा है। वे आगे कहते हैं कि पतंजलि योग समिति में अच्छे योग प्रशिक्षकों का एक समूह बनाने की शुरुआत करना, जो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के योगा को सबके जीवन का भाग बनाने की कोशिश से जुड़ा हुआ है।” हजार से भी अधिक योग उत्साहियों ने प्रमाण पत्र वितरण समारोह में भाग लिया। कोविड-19 युग के बाद, हम प्रमाणित योगा गुरु व प्रशिक्षकों की मांग में बढ़ोतरी का अनुमान लगा रहे हैं।