Sunday, April 5, 2026
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प्रख्यात लेखक सागर सरहदी का निधन

मुम्बई : ‘कभी कभी’, ‘सिलसिला’ और ‘बाजार’ जैसी फिल्में लिखने वाले प्रख्यात लेखक-फिल्मकार सागर सरहदी का आयु संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं के चलते रविवार रात निधन हो गया। वह 88 वर्ष के थे।
सरहदी के भतीजे तथा फिल्मकार रमेश तलवार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि उन्होंने यहां सियोन के निकट अपने आवास पर अंतिम सांस ली। तलवार ने कहा, ‘मध्यरात्रि से कुछ देर पहले उनका निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थे और उन्होंने खाना तक छोड़ दिया था।’
उन्होंने कहा कि सरहदी का अंतिम संस्कार आज दोपहर के आसपास सियोन शवदाह गृह में किया जाएगा। पाकिस्तान के ऐबटाबाद शहर के निकट बफ्फा शहर में पैदा हुए सरहदी का नाम गंगा सागर तलवार था। सीमांत प्रांत से संबंध होने के चलते उन्होंने अपने नाम के आगे ‘सरहदी’ जोड़ लिया था। 12 साल की आयु में वह दिल्ली आकर रहने लगे थे।
सरहदी ने उर्दू लघु कथाओं से अपने करियर की शुरुआत की और फिर उर्दू नाट्य लेखक बन गए। फिल्मकार यश चोपड़ा की 1976 में आई अमिताभ बच्चन तथा रेखा अभिनीत फिल्म ‘कभी कभी’ से उन्होंने बॉलीवुड में प्रवेश किया। सरहदी ने चोपड़ा की ‘सिलसिला’ (1981) और श्रीदेवी तथा ऋषि कपूर अभिनीत ‘चांदनी’ जैसी फिल्मों के लिए संवाद लेखन किया।
साल 1982 में सरहदी ने निर्देशन में हाथ आजमाए और सुप्रिया पाठक शाह, फारूक शेख, स्मिता पाटिल तथा नसीरुद्दीन शाह अभिनीत फिल्म ‘बाजार’ का निर्देशन किया। सरहदी ने 1992 में आई अभिनेता शाहरुख खान की पहली फिल्म ‘दीवाना’ और ऋतिक रोशन की पदार्पण फिल्म ‘कहो ना प्यार है’ के संवाद भी लिखे। सरहदी के परिवार में उनके भतीजे-भतीजियां हैं।

एम्स में शुरू हुआ ‘वर्चुअल’ शव परीक्षण

नयी दिल्ली : अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में ‘वर्चुअल’ शव परीक्षण करने की सुविधा की शुरूआत शनिवार को हो गई। पारंपरिक पोस्टमार्टम की तुलना में इस प्रक्रिया में बहुत कम समय लगता है।
‘‘वर्चुअल ऑटोप्सी (शव परीक्षण)’’ स्कैनिंग और इमेजिंग प्रौद्योगिकी के जरिए की जाती है। इसके तहत विभिन्न ऊतकों और अंदरूनी अंगों की सीटी स्कैन मशीन के जरिए जांच की जाती है। शव को सीटी स्कैन मशीन पर रखा जाता है, जहां चंद सेकेंड में ही करीब 25,000 तस्वीरें मिल जाती हैं, जिनकी विशेषज्ञ जांच करते हैं। इस सुविधा केंद्र का उद्घाटन भारतीय आयुविज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव ने किया।
इस नये केंद्र के बारे में एम्स फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख सुधीर गुप्ता ने बताया कि यह शव के गरिमापूर्ण प्रबंधन की दिशा में उठाया गया एक कदम है। उन्होंने कहा, ‘‘आज से, शव के गरिमापूर्ण प्रबंधन के लिए यह सुविधा शुरू हो रही है…अनुसंधान के विभिन्न उद्देश्यों के लिए भी शव की चीरफाड़ करने की जरूरत नहीं होगी। अन्य अंगों की क्या स्थिति है और व्यक्ति की मौत किस कारण हुई, इस बारे में हम कई महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।’’ गुप्ता ने कहा कि शव परीक्षण की इस प्रक्रिया में महज 10 मिनट लगेंगे।

75 वर्ष की अमला रुइया ने सशर्त 451 रोधी बांध बनवाए, बदली 570 गांवों की तस्वीर

एक ही शर्त- दहेज और नशा छोड़ो, तभी बनेगा बांध
एक फसल के लिए भी जहां पानी पूरा नहीं पड़ता था, आज राजस्थान के ऐसे लगभग 13 जिलों की 30 तहसीलों की सूरत बदल गई है। हमने इन जगहों पर रोधी बांध यानी चेक डैम बनाकर यह परेशानी दूर की है। पर हम इसी शर्त पर बांध बनाते हैं, जब गांव वाले दहेज, बाल विवाह, मृत्युभोज जैसी प्रथाओं व तंबाकू और शराब जैसी बुराइयों को हमेशा के लिए छोड़ने की बात मानते हैं।
वर्ष 1998-1999 में जब राजस्थान में सूखा पड़ा था तो राजस्थान मूल के हमारे रुइया उद्योग घराने ने महाराष्ट्र से खाने की सामग्री और पानी के कई टैंक राजस्थान भेजे थे, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं था। पाली के मारवाड़ इलाके में उस साल बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी थी।

वहां की बावड़ी में पानी का स्तर नीचे था, महिलाएं कई सीढ़ियां उतरकर दो-दो घड़ों में पानी भरतीं और 2-4 किमी का फासला तय करतीं। उन्हें देखकर मुझे लगा कि इसका हल बेहद जरूरी है। मैंने पानी के संरक्षण की संरचनाओं पर रिसर्च शुरू की, तभी मैं वाटरमैन राजेंद्र सिंह के संपर्क में आई, जिन्होंने मुझे पानी के संरक्षण और इस्तेमाल के लिए खास संरचनाओं के बारे में बताया। मुझे एक स्थायी समाधान नजर आने लगा। मैं तब 60 साल की उम्र का पड़ाव पार कर चुकी थी। इससे पहली पानी के संरक्षण में कोई तजुर्बा नहीं था। लगभग दो दशक पहले वर्ष 2003 में आकार चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की। वर्ष 2005 तक शेखावाटी में पीने के पानी के कुंड बनवाए। वर्ष 2006 में उदयपुर के मुंडावरा से अपने पहले प्रोजेक्ट के लिए प्रोजेक्ट इंजीनियर से बात की। तब चैक डैम बनाने का आइडिया आया, जो खडीन जैसी संरचनाओं से प्रेरित था, जिन्हें हमारे पूर्वज पानी इकट्ठा करने के लिए बनाते थे। हमने दो फैसले लिए।
पहला, हम राजस्थान के ऐसे इलाकों से शुरुआत करेंगे, जहां समतल जमीन हो और आस-पास पहाड़ियां हों, जिससे पहाड़ियों से होते हुए बारिश का पानी इकट्ठा करना मुमकिन हो सके। दूसरा, हम गांव के लोगों को तन, मन, धन से इस प्रोजेक्ट में शामिल करेंगे। इससे अब तक 570 गांवों की किस्मत बदली है, 7 लाख लोगों की जिंदगी आसान हुई है। अब हमारा लक्ष्य हर साल 150 रोधी बांध यानी चैक डैम बनाने का है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

अदना मुंशी समझते थे, 65 साल की सेवा के सम्मान में पहुँचे 7 जज

राजस्थान में 65 साल तक वकील के सहयोगी के रूप में काम किया मुंशी गुलाबचंद मालू ने। गत शुक्रवार को बार एसोसिएशन ने उनका सम्मान किया तो राजस्थान हाईकोर्ट के सात जज खुद ही समारोह में चले आए। कारण- अब तक उनके साथ ऑफिस में काम करने वाले सात वकील सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट में जज बन चुके हैं, जबकि एक केंद्रीय विधि मंत्री बने और एक वर्तमान में राज्य के महाधिवक्ता हैं। इन सबने उनसे सीखा। सम्मान के दौरान उनकी आंखें छलक आईं। अभिनंदन के वक्त हाई कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस संगीतराज लोढ़ा बोले- ‘जब मैंने वरिष्ठ वकील मरुधर मृदुल का ऑफिस ज्वाइन किया तो मुंशी मालू से खूब काम सीखा, वे एक तरह से मेरे प्रथम गुरु रहे। उनकी खासियत है कि उन्हें ऑफिस की सभी फाइलें व मुकदमों और पेशी की तारीखें मुंहजुबानी याद रहती हैं। किसी भी फाइल का नंबर पूछने पर वे झट बता देते थे।’
जस्टिस लोढा ने मुंशी मालू को सम्मानित करते हुए कहा- ‘उस वक्त मालू साहब कहा करते थे कि मुंशी को फरियादी के पैसों का हिसाब-किताब रखना चाहिए। वे अपने पास हमेशा एक डायरी रखते थे, जिसमें वे फरियादी के पैसों का हिसाब, तारीख पेशी आदि नोट करके रखते थे। एडवोकेट क्लर्क विधिक संस्थान की आत्मा होते हैं। वकालत के शुरुआती दिनों में मुंशी ही वकीलों के प्रथम गुरु होते हैं। उनके साथ काम करते हुए मैंने भी काफी कुछ सीखा।’ 1935 में फलौदी में जन्मे मालू ने 1951 में एडवोकेट मंगलचंद वैद्य के ऑफिस से काम शुरू किया। इसके बाद मोहनलाल जोशी और मरुधर मृदुल जैसे नामी वकीलों के साथ लंबे समय तक काम किया।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीएस सिंघवी, जस्टिस राजेंद्र व्यास, जस्टिस प्रेम आसोपा, जस्टिस विनीत कोठारी, जस्टिस संगीतराज लोढ़ा, जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस विनीत माथुर, पूर्व केंद्रीय मंत्री पीपी चौधरी व महाधिवक्ता एमएस सिंघवी ने कोर्ट का प्रक्रियात्मक ज्ञान मुंशी गुलाबचंद मालू से ही सीखा।

(साभार – दैनिक भास्कर)

शोधार्थियों की मदद के लिए अयोध्या में बनेगा देश का सबसे बड़ा पुस्तकालय

अयोध्या के डॉक्टर राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय का श्रीराम शोध पीठ देश का बड़ा पुस्तकालय स्थापित बनाएगा। शोध पीठ का कहना है कि इससे भगवान श्रीराम और रामायण पर रिसर्च करने वाले छात्रों को मदद मिलेगी। इस लाइब्रेरी में प्रभु राम से जुड़े प्राचीन ग्रंथों, अलग-अलग भाषाओं की रामायण और पांडुलिपियों का कलेक्शन किया जाएगा। अवध यूनिवर्सिटी में 2005 में श्रीराम शोध पीठ की स्थापना की गई थी। शोध पीठ के को-ऑर्डिनेटर डॉ. अजय प्रताप सिंह का कहना है कि अयोध्या में पर्यटकों की संख्या भी कई गुना बढ़ गई है। वहीं भगवान श्रीराम और रामायण पर शोध कर कई छात्र पीएचडी की डिग्री हासिल कर रहे हैं। ऐसे में पर्यटन विकास के साथ-साथ भगवान श्रीराम पर शोध कार्य को भी लेकर कई योजनाएं बनाई जा रही हैं।

शोध छात्रों की मदद के लिए है यह पहल
डॉक्टर सिंह के मुताबिक, श्रीराम शोध पीठ में बनने वाली देश की बड़ी लाइब्रेरी में भगवान श्रीराम से संबंधित सभी भाषाओं की पुस्तकें और अलग-अलग भाषाओं की रामायण का कलेक्शन किया जाएगा। इन्हें रिसर्च करने वाले छात्र-छात्राओं को उपलब्ध कराया जाएगा। जिससे भगवान राम के आदर्शों , जीवन चरित्रों पर सही ढंग से अध्ययन हो सके।

सभी कालों के सिक्कों का म्यूजियम भी बनेगा
डॉक्टर सिंह का कहना है कि यह अवध यूनिवर्सिटी का श्रीराम शोध पीठ भगवान राम पर देश का पहला रिसर्च सेंटर है। अब भगवान राम से जुड़ी लाइब्रेरी के साथ ही उत्तर प्रदेश में जिस भी काल के सिक्के अभी तक मिले हैं उनका म्यूजियम भी बनाया जाएगा।

खुद पर भरोसा कर बना दिए स्वदेशी उत्पाद, अब चीन से नहीं मंगाने पड़ेंगे बैटरी जिग

कोरोना ने भारतीयों को काफी कुछ सिखा दिया। सबसे बड़ी सीख तो उद्यमियों को मिली। जनता ने इन उत्पादों पर भरोसा किया। यही कारण है कि भारतीय कंपनियां आत्मनिर्भर बन रही हैं। भिवाड़ी की दो बड़ी कंपनियां इलेक्ट्रिक टू व्हीकल की ओकीनावा और इलेक्ट्रॉनिक्स की भगवती ऑटोमोबाइल ने पूरी तरह स्वदेशी रूप में ढाल लिया है। इन दोनों ही कंपनियों में कोरोना के बाद काम में बढ़ोतरी हुई है। वहीं दूसरी ओर पथरेड़ी में बने प्रदेश के एकमात्र एमएसएमई सेंटर पर अब बैटरी के जिग बनने लगे हैं। पहले ये जिग चीन से आयात किए जाते थे।

ओकीनावा : 150 स्कूटर बना रही, जरुरत 200 की
खुश्खेड़ा में इलेक्ट्रिक स्कूटर की ओकीनावा कंपनी ने 2016 में काम शुरु किया। बढ़ते डीजल-पेट्रोल की कीमतों के बाद यह स्कूटर कंपनी अहम भूमिका निभा रही है। एचआर हैड जितेंद्र यादव के अनुसार वर्तमान में देशभर में 200 से अधिक इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनी बाजार में उतर गई हैं। कंपनी मालिक जितेंद्र शर्मा ने 6 साल पहले काम शुरू किया। पहले प्रतिदिन 100 स्कूटर बनते थे, जो अब बढ़कर 150 तक हो गए हैं। मार्केट में आवश्यकता प्रतिदिन 200 स्कूटर की है। कंपनी में करीब 200 लोग काम करते हैं। फिलहाल कंपनी के देशभर में 350 डीलर हैं। गत वर्ष शुरु हुए प्रदेश के एकमात्र एमएसएमई सेंटर के शिक्षकों ने वह कर दिया जिस पर आज सभी इन पर नाज कर रहे हैं। एमएसएमई के डीजीएम सुमित जैन ने बताया कि अक्टूबर माह में दिल्ली की इलेक्ट्रिक व्हीकल की बैटरी पैक बनाने वाली कंपनी इन्वर्टेज टेक्नोलॉजी के निदेशक आदित्य गाोल सेंटर पर आए थे। उन्होंने बताया कि बैटरी बनाने के काम आने वाला जिग चीन से खरीदना पड़ रहा है।

कंपनी चाहती है कि यह टूल हम हमारे देश में ही तैयार कराएं। सेंटर के शिक्षकों ने करीब 15 दिन तक इस पर गहन जांच की। इसके बाद सेंटर पर नई तकनीक बदौलत इस जिग को तैयार कर दिया। जैन के अनुसार यह जिग देश में पहली बार पथरेड़ी के एमएसएमई सेंटर पर ही बना है। इसके लिए सेंटर के चार शिक्षकों की टीम ने मेहनत की। अभी तक सेंटर पर इन्वर्टेड कंपनी के लिए 20 जिग बनाकर भेजे जा चुके हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

देश में बढ़ गये करोड़पति, कोलकाता में हैं 10 हजार करोड़पति : रिपोर्ट

नयी दिल्ली :  देश में करोड़पति और मध्यमवर्गीय परिवारों में इजाफा हुआ है। हुरुन इंडिया द्वारा जारी वेल्थ रिपोर्ट 2020 के मुताबिक, महामारी के बावजूद देश में 4.12 लाख नए करोड़पति और 6.33 लाख नए मध्यमवर्गीय परिवार बढ़े हैं। नए करोड़पतियों में 3000 परिवार ऐसे थे, जिनकी नेटवर्थ 1000 करोड़ रुपये से ज्यादा थी और वे ‘सुपर रिच’ की श्रेणी में शामिल हो गए। नए मध्यवर्गीय परिवारों की बात करें तो इन परिवारों में 20 लाख रुपए की सालाना औसत बचत दर्ज हुई है।
इसके साथ ही इनके पास अपने मकान और महंगे वाहन भी थे। हालांकि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों की बात करें तो इनकी संख्या 5.64 करोड़ है। इनकी सालाना कमाई ढाई लाख रुपए है और कुल संपत्ति 7 करोड़ रुपए से कम है। 16,933 करोड़पति के साथ मुंबई सबसे अमीर शहर बन गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक देश के संपन्न परिवार दो भाग में बंटे हैं। पहले वो हैं, जिनकी आय कुछ काम करने से अर्जित होती है। साथ ही उनके पास फिक्स डिपॉजिट (एफडी) हैं और रियल एस्टेट तथा शेयर में निवेश से भी उनकी आमदनी बनती है। दूसरे वो हैं जो खानदानी संपन्न परिवार हैं और संपन्नता उन्हें विरासत में मिली हैं। उनके पास रियल एस्टेट तो है ही, जमा-जमाया कारोबार भी उन्हें मिला है, जिससे उनकी आमदनी लगातार बनी रहती है। और तो और परिवार का पुराना पैसा जो बहुत पहले शेयर बाजार में लगाया गया था, वह भी डिविडेंड के जरिए इन परिवारों की आय को बढ़ा देता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में 16,933 करोड़पति परिवार हैं, जो देश की जीडीपी में करीब 6.16% का योगदान देते हैं। 16 हजार करोड़पतियों के साथ नई दिल्ली दूसरे और कोलकाता 10 हजार करोड़पतियों के साथ तीसरे स्थान पर है।
रियल एस्टेट और शेयर बाजार निवेश के लिए सबसे अच्छा साधन
हुरुन इंडिया की रिपोर्ट के लिए जिन अमीरों के बीच सर्वे किया गया था, उनमें से 72% ने बताया कि वे 2019 की तुलना में अब व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन, दोनों में खुश हैं। इनके लिए हमेशा की तरह रियल एस्टेट और शेयर बाजार निवेश के लिए सबसे अच्छा साधन रहा जबकि विदेश प्रवास के लिए स्विटजरलैंड और अमेरिका के बाद यूके सबसे पसंदीदा रहा। साथ ही निवेश के लिए सिंगापुर और यूएई के बाद अमेरिका ही सबकी पसंद बना। विदेश में पढ़ाई के मामले में भी अमेरिका सभी की पहली पसंद बना हुआ है। रुचि की बात है, तो ज्यादातर लोगों का रुझान कलाकृतियों के संग्रह में रहा।

जरूरत नैतिकता के पहरेदारों को शिक्षित और संस्कारित करने की है

प्रो. गीता दूबे

ऐ सखी सुन 22

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों गर्मियों के दिन आ गये हैं और साथ ही समय आ गया है कि हम भारी -भरकम ऊनी पोशाकों को बक्से में सहेजकर रखा दें और हल्के सूती पोशाकों को अपनी अलमारी में फिर से सजा लें। मौसम का तकाजा है कि कपड़ों के बोझ से मुक्त होकर, खुलेपन का एहसास किया जाए लेकिन सखियों हम औरतों के साथ यह समस्या है कि हमारा खुलापन मर्दवादी सोच के पैरोकारों को कुछ ज्यादा ही चुभता है शायद इसीलिए गर्मियों का आनंद उठाने के लिए जहाँ समाज का आधा या आधे‌ से थोड़ा सा ज्यादा हिस्सा (आंकड़ों की मानें तो स्त्रियों की संख्या पुरुषों से कम हैं) मनमाने ढंग से कपड़े पहन कर‌ सहजता से विचरण कर सकता है, वहीं बाकी की आधी से थोड़ी कम आबादी पर तरह -तरह की बंदिशें लाद‌ दी जाती हैं। एक जमाने में तो औरत को पराये पुरुष की छाया से भी बचाने के लिए, घर की चहारदीवारी में कैद कर दिया जाता था और कपड़ों के‌ ढेर से इस तरह ढँक दिया जाता था कि कभी -कभी उसके लिए साँस लेना ही दूभर हो जाता था। उसका बाहर निकलना तो खैर वर्जित था ही लेकिन अगर कभी किसी कार्यवश निकलना पड़ा तो इस तरह कपड़ों की सात तहों के नीचे अपने को छिपाकर निकलना पड़ता था कि उसकी कानी अंगुली तक किसी को दिखाई नहीं पड़ती थी। अब भी दूर‌ दराज के गाँवों में जब नयी दुल्हन आती है तो हाथ भर‌ लंबा घूंघट निकालकर आती है जिससे उसे न रास्ते का पता चलता है‌ ना गंतव्य का और शायद इसीलिए हमेशा से उसे सहारे की आवश्यकता पड़ती रही। उसे कहीं भी आना- जाना हो, साथ में कोई न कोई जरूर रहना चाहिए।

 इसी के साथ, वह क्या खाएगी, क्या पहनेगी और किससे मिलेगी, यह सभी पुरुष सत्ता तय करती है। और ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ अतीत की कहानी है, आज भी कमोबेश ऐसा ही होता है।  कहने को भले ही आज की औरत ने आज़ादी हासिल कर‌ ली है लेकिन उसकी आजादी का परवाना तो अभी भी गिरवी रखा है, पुरुष सत्तात्मक समाज की तिजोरी में और शायद इसीलिए यह आजादी एक भ्रम या सपने सी ही लगती है जो थोड़ी देर के लिए झूठी ख़ुशी का अहसास कराकर फिर गायब हो जाती है। आज भी अगर कोई मर्द, वह घर का हो या बाहर का, अगर एक जिम्मेदार स्त्री को यह बताता, समझाता है कि उसकी पोशाक कैसी होनी चाहिए और उसकी पोशाक के आधार पर उसके संस्कारों को तोलता है तो समझ लेना चाहिए कि अभी भी स्त्री की स्वतंत्रता की कहानी आधी अधूरी है और उसकी समझदारी पर समाज को जरा भी भरोसा नहीं है। 

हालांकि फैशन की अंधी दौड़ में खुद को कुर्बान करने वाली स्त्रियों की वकालत, मैं नहीं करती लेकिन इतना तय करने का अधिकार तो एक शिक्षित और समझदार स्त्री को है ही कि वह क्या पहने, क्या नहीं। कुछ पोशाकें तो पेशे के‌ आधार पर तय कर‌ ली जाती हैं और अगर उसमें जरा भी फेरबदल करने की कोशिश की गई तो तूफ़ान सा बर्पा हो जाता है। आज भी स्कूल और महाविद्यालय की शिक्षिकाओं के लिए साड़ी का पहनावा ही सर्वसम्मति से स्वीकृत है और बहुत से शिक्षण संस्थानों में सलवार कमीज़ जो साड़ी की तुलना में कहीं ज्यादा सुविधाजनक है, तक को स्वीकार नहीं किया जाता। मुझे बंगाल के एक स्कूल की घटना याद आ रही है, जब एक स्कूल की शिक्षिका के सलवार कमीज़ पहन कर आने के कारण बहुत हंगामा हुआ था।‌ और जब इस देह ढंकनेवाली पोशाक‌ पर इतनी हाय- तौबा मचती है तो महिलाओं का जरा सा ही सही आधुनिक हो जाने को उच्छृंखलता का नाम दे दिया जाना तो हम स्त्रियों को भले नागवार गुजरे, पुरुष सत्ता के लिए तो स्वाभाविक ही है। लेकिन क्या हम इन नियमों को आँख मूंदकर, सिर झुका कर, स्वीकार करते जाएंगे। अगर हाँ, तो फिर हमें तैयार रहना होगा, उस दिन के लिए भी जब हमें दोबारा सात हाथ लंबे घूंघट के पीछे ढकेल दिया जाएगा और हमारी हर आवाज अनसुनी कर‌ दी जाएगी। 

पोशाक का काम है शरीर को ढंकना, कैद करना नहीं। और अगर कोई विशेष पोशाक अशालीन है तो समाज के हर व्यक्ति के लिए होनी चाहिए ना कि कि किसी एक अंश विशेष के‌ लिए।  हमारा नैतिकतावादी समाज तो औरतों के घूंघट में छिपे शरीर को भी भेदने ‌और‌ जानने की ख्वाहिश ही‌ नहीं रखता, मौका मिलने पर‌ ऐसा करता भी है तो फिर आधुनिक वस्त्रों में सजी नारी को देख कर उनकी कामनाओं का बेलगाम हो जाना स्वाभाविक ही है। लेकिन प्रश्न यह है कि दोष पोशाक पहनने वाले का है या उसे देखनेवाली दृष्टि का। अगर देखनेवाली नजर‌ सभ्य नहीं होगी तो फिर पहनने वाला या वाली कुछ भी क्यों ना पहन लें, उसे हर हाल में दोषी साबित करने की कोशिश की जाती रहेगी। इसीलिए समाज के एक अंश विशेष की बेलगाम ख्वाहिशों और कामनाओं पर लगाम लगाने की आवश्यकता है, स्त्रियों के पहनावे पर नहीं। स्त्रियों के लिए ‘ड्रेस कोड’ तय करने वाले तथाकथित समाज सुधारक अगर अपने संकीर्ण विचारों को उदारता की पोशाक पहनाएं और दिमागी अंधेरे को तालीम की रोशनी से चमका लें तो समाज खुद ब खुद संवर जाएगा। 

अपनी कुंठाग्रस्त सोच से स्त्रियों पर निशाना साधने वाले पुरुषों के संस्कारों पर सवाल उठाने का समय आ गया है। बचपन में सुनी एक घटना अनायास याद आ रही है। कोलकाता के सार्वजनिक वाहनों में जब कुछ स्त्रियाँ बिना आस्तीन के ब्लाउज पहन कर सफर करती थीं तो कुछ कुंठित मानसिकता वाले मनचले उनकी खुली बाँहों पर ब्लेड चलाकर उन्हें सबक सिखाने की कोशिश करते थे। समय भले ही बदल गया है लेकिन मानसिकता बहुत कम ही बदली है। मनचले हो या जीभजले अपने हाथों में ब्लेड और जुबान पर अंगारे लेकर अब भी वैसे ही निर्द्वंद्व विचर रहे हैं। स्त्रियों की अस्मत को तार- तार करने और उसके बाद उन्हें संस्कार सिखाने की जीतोड़ कोशिश करते दिखाई देते हैं, ये संस्कारी पुरुष। ये संस्कारी लोग ही बलात्कार के बाद बलात्कारियों को नहीं पीड़ित महिलाओं को कठघरे में खड़ा कर , उनके पहनावे, आचरण और व्यवहार पर सवाल उठाते हैं। ऐसे लोग और उनकी संकीर्ण सोच समाज के लिए बहुत ज्यादा घातक है। सखियों, स्त्रियां तो तालीम हासिल कर नये समाज का सपना देख रही हैं, अब जरूरत है इन तथाकथित नैतिकता के पहरेदारों और संस्कारों के झंडाबरदारों को शिक्षित और संस्कारित करने की। अगर इनकी सोच बदलेगी तो समाज खुद ब खुद बदल जाएगा। अब समाज को बदलने की जिम्मेदारी आधी से ज्यादा आबादी की तो होनी ही चाहिए। आखिर कब तक आधी से कम अर्थात अल्पसंख्यक आबादी को कोसते हुए, उसे संस्कारित करने की कोशिश की जाती रहेगी। तो संस्कारवान पुरुषों, अगर आप सब थोड़ा सा ही सही सभ्य हो जाएंगे तो समाज का भी विकास होगा और देश का भी।

विदा सखियों, अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नये मसले पर बोलेंगे- बतियाएंगे और उदार समाज बनाने की कोशिश करेंगे।

जीएचसीएल के इको फ्रेंडली उत्पादों की नयी रेंज बाजार में

कोलकाता : जीएचसीएल ने अपने उत्पादों की नयी रेंज बाजार में उतार दी है। कम्पनी के के होम टेक्सटाइल डिविजन ने चादर और टी ओ बी यानी टॉप ऑफ द बेड उत्पाद अर्थोलॉजी कलेक्शन के तहत उतारे हैं। अर्थोलॉजी यानी इको कॉटन, इको कॉर्न कॉटन और इडेन डाइ को लेकर बना है। इन चादरों में प्राकृतिक रंगों यानी वेजिटेबल डाई का उपयोग किया गया है और इसमें फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले तत्वों का उपयोग किया गया है। हालांकि इन उत्पादों का पेटेंट लिया जाना अभी बाकी है। जीएससीएल लिमिटेड के एम डी आर. जालान ने कहा कि जीएचसीएल ने वेविस्ट्री, लेजी शीट, इनो – नॉन – आयरन जैसे उत्पाद उतारे हैं। कम्पनी ने इस मार्केट वीक में स्लीप किट भी उतारे हैं जिसे उपहार में दिया जा सकता है।

सख्त प्रोटोकॉल से ही सम्भव है कोविड -19 को रोक पाना : ऐसोचेम

कोलकाता : ऐसोचेम का मानना है कि कोविड -19 से निपटने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है कि प्रोटोकॉल को लेकर सख्ती बरती जाये। इसमें सामाजिक दूरी, मास्क पहनने, पर्याप्त सफाई जैसे नियम शामिल है। लॉकडाउन, रात्रि कर्फ्यू तथा गतिविधियों पर रोक लगाना सही समाधान नहीं है क्योंकि इससे आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं। ऐसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा लोगों की आवाजाही पर रोक लगाये बगैर ही आर्थिक गतिविधियों का संचालन सम्भव है मगर सामाजिक दूरी, मास्क और कार्यस्थलों को सैनेटाइज करके ही यह किया जाना चाहिए। सूद ने आर्थिक गतिविधियों में आयी तेजी पर सन्तोष जताया और कहा कि वित्त वर्ष 2020 -21 की तीसरी तिमाही में प्रगति अच्छी रही और चौथी तिमाही के बेहतर होने की उम्मीद है। घरेलू पर्यटन, उड्डयन. सार्वजनिक परिवहन क्षेत्रों में अच्छी वापसी हुई है। इसके साथ ही उन्होंने कोरोना वायरस के बढ़ते मामले भी चिन्ता का कारण हैं मगर पिछले साल के अनुभव के कारण खुद को नियंत्रण में रखना आसान होगा। अच्छी बात है कि कोविड -19 की वैक्सीन अब है और इससे देश को कोरोना से निपटने में मदद मिल रही है। हम सुरक्षा सम्बन्धी नियमों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, बचाव और टीकाकरण ही सर्वश्रेष्ठ समाधान है।