विषय – पत्रकारिता
पाठ – पत्रकारिता के विभाग – पहला भाग।
पत्रकारिता एक वृहद क्षेत्र है…जिसके कई क्षेत्र हैं..इन पर लम्बी चर्चा होगी, आज बात स्थानीय मुद्दों, खेल और शिक्षा क्षेत्र पर…जो कि बुनियादी क्षेत्र हैं।
चैनल – सुषमा कनुप्रिया
विषय – पत्रकारिता
पाठ – पत्रकारिता के विभाग – पहला भाग।
पत्रकारिता एक वृहद क्षेत्र है…जिसके कई क्षेत्र हैं..इन पर लम्बी चर्चा होगी, आज बात स्थानीय मुद्दों, खेल और शिक्षा क्षेत्र पर…जो कि बुनियादी क्षेत्र हैं।
चैनल – सुषमा कनुप्रिया
विषय – हिन्दी व्याकरण
पाठ – संज्ञा
शिक्षिका – नीलम सिंह
यू ट्यूब चैनल – हिन्दी का आंगन
कहानी – दुःख का अधिकार
लेखक – यशपाल
शिक्षिका – नीलम सिंह
यू ट्यूब चैनल – हिन्दी का आँगन
सूजी के दही बड़े
सामग्री: 2 कप सूजी, 1 कप दही, नमक स्वादानुसार, अदरक स्वादानुसार, चुटकी भर बेकिंग सोडा, तलने के लिए तेल, 1/2 चम्मच काली मिर्च, भुना हुआ काला नमक स्वादानुसार, जीरा पाउडर- स्वादानुसार, 2 चम्मच मीठी चटनी, 2 चम्मच इमली की चटनी, 2 बड़े चम्मच बारीक कटा हरा धनिया

विधि: सबसे पहले आप एक कटोरी में सूजी और दही डालकर मिला लें। अब इस मिश्रण में नमक, अदरक का पेस्ट, काली मिर्च पावडर और हरा धनिया डालकर अच्छे से मिला लें। इस मिश्रण को आधे घंटे के लिए रख दें ताकि सूजी फूल कर तैयार हो जाए। मिश्रण के फूल जाने के बाद इसमें बेकिंग सोडा डाल कर मिक्स करें और एक कटोरी में थोड़ा सा पानी डाल कर अलग रखें। अब आप एक मध्यम आकार की चम्मच लेकर पहले पानी वाली कटोरी में गिला करें और फिर उसमें मिश्रण लेकर कढ़ाई में डालें और धीमी आंच पर सारे बड़े ऐसे ही ताल ले।
बड़ो को दोनों तरफ से हल्के भूरे होने तक तले और फिर सारे बड़ों को तलकर बाहर निकाल ले। अब इन्हें साथ के साथ पानी में अच्छी तरह से डुबो दें ताकि ये नरम होकर फूल जाए। एक घंटे बाद बड़ों को पानी में से बाहर निकाल दे। पानी से बाहर निकालते समय इन्हें हाथों के बीच में रखकर अच्छे से निचोड़ ले और फिर सारे बड़े एक तरफ रख दे। दही बड़ा परोसने के लिए आप एक प्लेट में इन्हें रखकर उसमें फेंटी हुई दही डालें और ऊपर से इमली की चटनी, मीठी चटनी, काला नमक, भुना हुआ जीरा पावडर, काली मिर्च पाउडर डालें। आप चाहे तो बड़े के साथ पपड़ी भी डाल सकती है। ये खट्टे मीठे स्वाद से भरे सूजी के दही बड़े अपने बच्चे को सर्व करें।
बच्चों के लिए ठंडाई
सामग्री : 5 कप चीनी, 1/2 कप से थोड़े ज्यादा (100 ग्राम) बादाम, 1/2 कप ( 50 ग्राम) सौंफ, 2 छोटी चम्मच काली मिर्च, 1/2 कप (50 ग्राम) खसखस, 1/2 कप (50 ग्राम) खरबूजे के बीज, 30-35 छोटी इलायची (छिलका उतार लें), 2 टेबल स्पून गुलाब जल या गुलाब की पंखुड़ियां

विधि : सबसे पहले बादाम, खसखस, खरबूजे के बीज, गुलाब की पत्तियां, सौंफ, काली मिर्च इलायची तथा मुनक्का को पानी में भिगो दें। सभी सामग्री को रात भर पानी में भीगने दें। सुबह इसका पानी छान लीजिएं और बादाम को छिल लीजिए। सभी चीजों को बारीक पीस लीजिए। इन चीजों को पीसने के लिये पानी की जगह चीनी के घोल का प्रयोग कर सकते हैं। चीनी का घोल अगर गर्म पानी में बनाएंगे तो जल्दी बन जाएगा।
अब इस पीसे हुए घोल को छान लीजिएं। छनने के बाद जो पेस्ट बचेगा उसे फिर से पानी डालकर पीसना है। अगर आप पेस्ट थोड़ा टाइट है तो आप साफ कपड़े में लेकर इसका पानी निकाल लीजिए। अब आपको पीसे हुए घोल को अच्छी तरह से मुलायम सूती के कपड़े में लेकर छानना है।
अब दो कप ठंडा दूध लें उसमें एक चम्मच पेस्ट डालें और ठंडा-ठंडा सर्व करें। आप चाहें तो इसमें केसर की पत्तियां भी मिला सकते हैं। बचे हुए पेस्ट को आप एयर टाइट बॉक्स में बंद करके फ्रीज में रख सकती हैं।
याद रहे कि ठंडाई की तासीर ठंडी होती है इसलिए अगर होली के समय मौसम ठंडा है तो बच्चों को केवल थोड़ी मात्रा में ही दें। साथ ही ठंडाई का असली फायदा तभी मिलेगा जब आप ड्राई फ्रूट्स और बाकि साम्रगियों को कम से कम छ्ह घंटे तक पानी में भिगोकर रखेंगी। इसके पीछे यह वजह है कि बादाम और अन्य तीजों की तासीर गर्म होती है लेकिन पानी में भिगो कर रखने से उनकी गर्माहट खत्म हो जाती है।
(साभार – हिन्दी बेबी डेस्टिनेशन डॉट कॉम)
बाजारों में होली की धूम शुरू हो गई है। हालांकि कोरोना के कारण अलग-अलग ग्रुप बनाकर होली का त्योहार मना रहे हैं। लेकिन बदलते वक्त में हर्बल रंग की डिमांड अधिक बढ़ गई है। अधिकतर युवा वर्ग अपनी त्वचा को लेकर ज्यादा चिंतित रहते हैं, ऐसे में हर्बल कलर पहली पसंद बन रही है। आपको बता दें कि हर्बल कलर आप कई आसान तरीकों से घर पर भी बना सकते हैं और मजा ले सकते हैं | तो चलिए जानते हैं घर पर हर्बल कलर / नैचरल कलर / ऑर्गेनिक कलर बनाने की आसान विधि –
1. जासवंती के फूलों से आप कलर बना सकते हैं। फूलों को सूखाकर उसका पाउडर बना लें और उसकी मात्रा बढ़ाने के लिए आटा मिला लीजिए। सिंदूरिया के बीज लाल रंग के होते हैं, इनसे आप सूखा व गीला लाल रंग बना सकते हैं।
2. लाल रंग बनाने के लिए सूखे लाल चंदन को आप गुलाल की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। यह सुर्ख लाल रंग का पावडर होता है, इससे त्वचा संबंधी कोई बीमारी नहीं होती है।
3.लाल रंग को बनाने का एक और दूसरा तरीका भी है। दो छोटे चम्मच लाल चन्दन पाउडर को पांच लीटर पानी में डालकर उबालें। इसमें बीस लीटर पानी और डालें। अनार के छिलकों को पानी में उबालकर भी लाल रंग बनाया जा सकता है।
4. बुरांश के फूलों की सहायता से भी लाल रंग बनाया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाने वाले इन फूलों को रातभर पानी में भिगो कर रख दें। सुबह तक आपका लाल रंग तैयार हो जाएगा।
5. तटीय क्षेत्रों में पलिता, मदार और पांग्री के फूल पाए जाते हैं। इन फूलों को रातभर पानी में भिगो कर रख दें, सुबह तक आपका लाल रंग तैयार हो जाएगा।
6. मेहंदी आपने अब तक गीली करके हाथों पर लगायी है। इसके सूखे पाउडर को आप हरे रंग की तरह इस्तेमाल भी कर सकते हैं। बेहतर होगा इस रंग को गीला नहीं करें..अन्यथा आपकी ड्रेस या अन्य जगह पर मेहंदी का कलर चढ़ जाएगा।
7.हरा रंग बनाने के लिए गुलमोहर की पत्तियों को सुखाकर, महीन पाउडर कर बना लें। आपका हरा रंग तैयार है।
8. चुकंदर से नेचरल गहरा पिंक कलर यानी प्राकृतिक गहरा गुलाबी बनाया जा सकता है। चुकंदर को कस लें और एक लीटर पानी में भिगों कर रख दें। सुबह तक आपका गुलाबी रंग तैयार हो जाएगा।
9. टेसू के फूलों की मदद से आप सुंदर-सा नारंगी रंग तैयार कर सकते हैं। टेसू के फूलों को रातभर पानी में भिगोकर रख दें, सुबह तक आपका नारंगी रंग तैयार हो जाएगा। कहते हैं कि कान्हा जी भी टेसू के फलों से ही होली खेलते थे।
10. हरसिंगार के फूलों से आप सुंदर सा नारंगी कलर बना सकते हैं। इसे भी आप को पानी में कुछ घंटों के लिए भिगोकर रखना होगा।
11. नारंगी रंग बनाने के लिए आप चंदन के पावडर का इस्तेमाल कर सकते हैं। एक चुटकी चंदन के पावडर में एक लीटर पानी मिला दें।
12.अमलतास, गेंदा और पीले सेवंती के फूलों से भी नैचरल पीला रंग तैयार किया जा सकता है। फूलों की पत्तियों को सूखा कर उन्हें बारीक पीस लें।
13. एक चम्मच हल्दी को दो लीटर पानी में मिला लें, रंग गाढ़ा करने के लिए आप इसे उबाल भी सकते हैं। वहीं गेंदे के फूलों से ताजा पीला रंग तैयार किया जा सकता है। करीब 50 गेंदे के फूलों को 2 लीटर पानी में उबालकर रातभर भीगने दें। सुबह तक आपका कलर तैयार हो जाएगा।
14. जकरंदा के फूलों की पंखुडियों से आप नीला रंग तैयार कर सकते हैं। फूलों को सुखाकर बारीक पीस लें। यह फूल वैसे तो केरल में मिलता है लेकिन ऑनलाइन भी आपको मिल जाएगा।
15. जामुन को अभी तक खाया था, लेकिन उससे आप होली भी सकते हैं। जामुन को बारीक पीस लें और पानी मिला लें।
(साभार – वेबदुनिया)
पंचांग के अनुसार वर्ष के अंतिम माह फाल्गुन की पूर्णिमा को होली हिन्दू का त्योहार मनाया जाता है। कहते हैं कि यह सबसे प्राचीन उत्सव में से एक है। हर काल में इस उत्सव की परंपरा और रंग बदलते रहे हैं। आओ जानते हैं इसका इतिहास।
1. प्रहलाद कथा : होली के पर्व से अनेक कहानियां जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप में अपनी बहन होलिका की गोद में प्रहलाद को बैठाकर उसे अग्नि में जलाकर मारने का प्रयास किया था। होलिका को ब्रह्मा द्वार यह वरदान था कि वह अग्नि से नहीं जलेगी परंतु वह जल गई और प्रहलाद श्रीहरि विष्णु की कृपा से बच गया। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है। कहते हैं कि भक्त प्रहलाद सतयुग में हुए थे।
2. कामदेव कथा : सतयुग में ही इसी दिन शिव ने कामदेव को भस्म करने के बाद रति तो श्रीकृष्ण के यहां कामदेव के जन्म होने का वरदान दिया था। इसीलिए होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं।
3. राजा पृथु कथा : यह भी कहते हैं कि इसी दिन राजा पृथु ने राज्य के बच्चों को बचाने के लिए राक्षसी ढुंढी को लकड़ी जलाकर आग से मार दिया था।
4. श्रीकृष्ण के प्रारंभ किया फाग उत्सव : त्रैतायुग के प्रारंभ में विष्णु ने धूलि वंदन किया था। इसकी याद में धुलेंडी मनाई जाती है। होलिका दहन के बाद ‘रंग उत्सव’ मनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया, क्योंकि यह फागुन माह में आती है। कृष्ण ने राधा पर रंग डाला था। इसी की याद में रंग पंचमी मनाई जाती है। श्रीकृष्ण ने ही होली के त्योहार में रंग को जोड़ा था।
5. आर्यों का होलाका : प्राचीनकाल में होली को होलाका के नाम से जाना जाता था और इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ करते थे। इस पर्व में होलका नामक अन्य से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की परंपरा रही है। होलका अर्थात खेत में पड़ा हुआ वह अन्य जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। संभवत: इसलिए इसका नाम होलिका उत्सव रखा गया होगा। प्राचीन काल से ही नई फसल का कुछ भाग पहले देवताओं को अर्पित किया जाता रहा है। इस तथ्य से यह पता चलता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है।
फागुन शुक्ल पूर्णिमा को आर्य लोग जौ की बालियों की आहुति यज्ञ में देकर अग्निहोत्र का आरंभ करते हैं, कर्मकांड में इसे ‘यवग्रयण’यज्ञ का नाम दिया गया है। बसंत में सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में आ जाता है इसलिए होली के पर्व को ‘गवंतरांभ’भी कहा गया है। होली का आगमन इस बात का सूचक है कि अब चारों तरफ वसंत ऋतु की सुवास फैलने वाली है।
जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र (लगभग 400-200 ईसा पूर्व) के अनुसार होली का प्रारंभिक शब्द रूप ‘होलाका’ था। जैमिनी का कथन है कि इसे सभी आर्यों द्वारा संपादित किया जाना चाहिए। ज्ञात रूप से यह त्योहार 600 ईसा पूर्व से मनाया जाता रहा है।
5. रामगढ़ के अभिलेख : विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। इससे यह सिद्ध होता हैं कि यह त्योहार ईसा से 300 वर्ष पूर्व भी मनाया जाता था।
6. अन्य ग्रंथों में उल्लेख : काठक गृह्य सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र में भी होली का वर्णन मिलता है। नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है।
काठक गृह्य सूत्र के एक सूत्र की टीकाकार देवपाल ने इस प्रकार व्याख्या की है-
होला कर्मविशेष: सौभाग्याय स्त्रीणां प्रातरनुष्ठीयते। तत्र होलाके राका देवता।
अर्थात होला एक कर्म विशेष है, जो स्त्रियों के सौभाग्य के लिए संपादित होता है। इसमें राका (पूर्णचंद्र) देवता हैं।
7. 20 क्रीड़ाओं में एक होलका : होलाका संपूर्ण भारत में प्रचलित 20 क्रीड़ाओं में एक है। वात्स्यायन के अनुसार लोग श्रृंग (गाय की सिंग) से एक-दूसरे पर रंग डालते हैं और सुगंधित चूर्ण (अबीर-गुलाल) डालते हैं। लिंगपुराण में उल्लेख है कि फाल्गुन-पूर्णिमा को फाल्गुनिका कहा जाता है, यह बाल क्रीड़ाओं से पूर्ण है और लोगों को विभूति (ऐश्वर्य) देने वाली है। वराह पुराण में इसे पटवास-विलासिनी (चूर्ण से युक्त क्रीड़ाओं वाली) कहा है।
8. मंदिरों में अंकित होली : प्राचीन भारतीय मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव से संबंधित विभिन्न मूर्ति या चित्र अंकित पाए जाते हैं। ऐसा ही 16वीं सदी का एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है। 16वीं शताब्दी के अहमदनगर के चित्रों और मेवाड़ के चित्रों में भी होली उत्सव का चित्रण मिलता है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली और दिवाली मनाए जाने के सबूत मिलते हैं।
(साभार – वेबदुनिया)
कोलकाता : कमला गोइन्का फाउण्डेशन के प्रबंध न्यासी श्यामसुन्दर गोइन्का ने एक प्रेस विज्ञप्ति द्वारा बताया है कि संपूर्ण भारत के हिन्दी व राजस्थानी साहित्यकारों को वर्ष 2020-2021 के तहत मिलने वाले पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। ये पुरस्कार हिन्दी व राजस्थानी भाषा में लिखित व प्रकाशित पुस्तकों तथा साहित्यकारों के साहित्य के प्रति किए गए समग्र-योगदान के आधार पर दिए जाते हैं। सभी घोषित पुरस्कार व पुरस्कार प्राप्ता की सूची इस प्रकार है:
एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “मातुश्री कमला गोइन्का राजस्थानी पुरस्कार” जोधपुर के मिठेस निर्मोही को उनके काव्य-संग्रह “मुगती” के लिए।
एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “स्नेहलता गोइन्का व्यंग्यभूषण पुरस्कार” दिल्ली के डॉ. हरीश नवल को उनके व्यंग्य-संग्रह “अमरीकी प्याले में भारतीय चाय” के लिए। एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “यशस्वी सत्यनारायण गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार” पुणे के डॉ. दामोदर खडसे को उनकी पुस्तक “बादल राग” के लिए। इक्यावन हजार रुपये का “रत्नीदेवी गोइन्का वाग्देवी पुरस्कार” मुंबई की डॉ. बीना बुदकी को उनकी पुस्तक “केसर की क्यारी में आग में लपटें कब तक” के लिए।
इक्यावन हजार रुपये का “रमादेवी गोइन्का महिला राजस्थानी साहित्य पुरस्कार” जोधपुर की डॉ. चांदकौर जोशी को उनकी कहानी संग्रह “उपहार” के लिए। श्यामसुन्दर गोइन्का ने यह भी बताया कि कोरोना के प्रकोप को ध्यान में रखते हुए पुरस्कार समारोह का आयोजन नहीं किया जायेगा और उक्त पुरस्कारों की राशि व स्मृति चिन्ह पुरस्कार प्राप्ताओं को उनके पते पर भिजवा दी जाएगी।
कोलकाता : मेरी टेक्निमॉन्ट समूह ने कर्नाटक स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कर्नाटक (एनआईटीके) में बायो वेस्ट रिसाइक्लिंग पायलट प्लांट का उद्धघाटन किया। इस परियोजना के लिए फंडिंग समूह की भारतीय सहायक कम्पनी टेक्निमॉन्ट प्राइवेट लिमिटेड (टीसीएमपीएल) ने की है। इस अवसर पर प्रधान अतिथि के रूप में केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने वीडियो सन्देश के जरिए शुभकामनाएं दीं। उद्घाटन समारोह में कर्नाटक के केएएस, ज्वॉएंट कमिश्नर (प्रशासन) डॉ. जी. सन्तोष कुमार उपस्थित थे। टीसीएमपीएल ने उर्जा रूपांतरण के क्षेत्र में काम कर रहे 16 विद्यार्थियों को 2021-22 के लिए छात्रवृति देने की घोषणा की। कम्पनी ने 2020-21 में इसके पहले 2 छात्रवृत्तियाँ दी हैं। यह बायो गैस पायलट प्लांट एनआईटीके को फलों और सब्जियों के वर्ज्य पदार्थों से उर्जा उत्पन्न करने के साथ ही इस क्षेत्र में शोध को प्रोत्साहन भी देगा।
मार्च 2020 में, मेरी टेक्निमॉन्ट ने एनआईटीके में बायोगैस परियोजना को विकसित करने के लिए अपने समर्थन की घोषणा की। इस प्रायोगिक परियोजना संयंत्र के निर्माण की दिशा में एनआईटीके द्वारा विशेष रूप से प्रतिबद्ध निधियों का उपयोग किया गया था। यह अनुमान लगाया गया है कि 500 किलोग्राम के जीपीएस रिन्यूएबल्स (अपशिष्ट प्रबंधन समाधान प्रदान करने वाली ऊर्जा-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकी कंपनी) बायोगैस डाइजेस्टर से एक वर्ष में 35,400 यूनिट बिजली का उत्पादन होने की उम्मीद है। यदि बायोगैस खाना पकाने के प्रयोजनों के लिए वाणिज्यिक सिलेंडर की जगह लेता है, तो परियोजना सालाना 2.42 लाख रुपये बचाएगी। उच्च गुणवत्ता वाले पाचन, पूरी तरह से प्राकृतिक और हानिकारक सिंथेटिक रसायनों से मुक्त, एक जैविक उर्वरक के रूप में, पूरक के रूप में या रासायनिक उर्वरकों के प्रतिस्थापन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जीपीएस रिन्यूएबल्स तीन साल के लिए प्लांट मेंटेनेंस भी करेगा। मैरी टेक्निमॉन्ट के चेयरमैन फैब्रीजिओ डी एमेटो ने इस साझेदारी पर खुशी जतायी। परियोजना की जानकारी देते हुए एनआईटीके के निदेशक प्रोफेसर कर्णम उमामाहेश्वर राव ने कहा कहा कि इस प्लांट से विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलेगी और वे शोध को आगे ले जा सकेंगे।
कोलकाता : होली को सुरक्षित तरीके से खेलने के महत्व को समझाने और जागरुक बनाने के लिए कामधेनु पेंट्स ने डिजिटल अभियान चलाया है। होली के हुड़दंग में अक्सर महिलाओं पर कोई भी राह चलता पानी के गुब्बारे फेंक देता है जो त्योहार को उत्पीड़न बना देता है। ऐसे में इसके खिलाफ ‘कलरविदकेयर’ नामक यह अभियान आवाज उठाता है। कामधेनु पेंट्स के निदेशक सौरभ अग्रवाल ने कहा कि त्योहार को इसके मूल स्वरूप में मनाया जाना चाहिए और यह अभियान उसी दिशा में एक कदम है।