Thursday, April 30, 2026
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स्वाद में भरा हो विजयदशमी व दशहरा का आनंद

गुड़ का मालपुआ – बरतन में आटा, गुड़, इलायची पाउडर और सौंफ एक साथ मिलाएं। फिर धीरे-धीरे दूध डालते हुए बैटर के स्मूद होने तक फेंटें। कड़ाही में तेल या घी गरम करें। इसके बाद एक गहरे चम्मच से बैटर को इस गर्म तेल में डालते जाएं। मालपुआ को दोनों तरफ से सुनहरा भूरा होने तक पकाएं। ध्यान रहे अच्छे मालपुए की पहचान है कि वो बाहर से कुरकुरा और अंदर से नरम होता है। आप इसे ऐसे भी सर्व कर सकते हैं या फिर चाशनी में डालकर भी थोड़ा और टेस्टी बना सकते हैं। सर्व करने से पहले ऊपर से कटे हुए मेवे डालें।

 सेब की खीर-  सेब को छीलकर कद्दूकस कर लें। पैन में घी गरम करें। इसमें कसा हुआ सेब डालकर भून लें। दूसरे पैन में दूध उबलने के लिए रख दें। इसमें कंडेंस्ड मिल्क मिलाएं फिर इसमें फ्राई किया हुआ सेब मिलाएं। थोड़ी देर और पकाएं। आंच से उतार कर इलायची पाउडर और बादाम की कतरन मिलाएं। इसे चाहें, तो हल्का ठंडा करके परोसें या कुछ देर फ्रिज में रखने के बाद परोसें।

 मूंग व उड़द दाल की कचौड़ी – पैन में एक बड़ा चम्मच घी गरम करें। इसमें सौंफ, जीरा, हींग डालकर चटकाएं। इसमें हल्दी, मिर्च, धनिया, गरम मसाला, अमचूर, सौंठ और नमक मिलाएं। बेसन डालकर कुछ देर भूनें। अब इसमें पहले से भिगोई हुई उड्द-मूंग को पीसकर उसका पेस्ट बनाकर डालना है। दाल को अच्छी तरह भूनें जिससे इसका कच्चापन चला जाए। कचौड़ियों का आटा तैयार कर लें। इसके लिए आटे में नमक डालें और घी से मोयन लगाएं। पानी की मदद से नरम आटा गूंथ लें। अब भूनी दाल को आटे की लोइयां बनाकर इसमें भरें। हाथों से हल्का दबाएं और कड़ाही में तेल गरम करके तलते जाएं।

 

जानिए विजयदशमी व दशहरा में अन्तर

प्रत्येक वर्ष शारदीय नवरात्रि के खत्म होते ही दशहरे का पर्व मनाया जाता है। तो वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म के ग्रंथों व शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस दिन श्री राम ने रावण का वध कर उस पर विजय प्राप्त की थी। जिस कारण देश के कोने-कोने में लोग रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का झंडा लहराते हैं। इसके अलावा बता दें चूंकि इस शारदीय नवरात्रि का पर्व समाप्त होता है, इसलिए दशहरे के दिन देवी दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। कुछ लोग इसे दशहरे के नाम से जानते हैं तो कुछ लोग दशहरा कहते हैं। मगर इस दिन को 2 नामों से क्यो जाना जाता है। और क्या इनमें कोई फर्क है, क्या इन नामों से कोई अन्य मान्यता जुड़ी है। अगर आपके मन में भी ये सवाल आ रहे हैं, तो चलिए हम आपको बताते हैं कि दशहरा और विजयदशमी में क्या कोई अंतर है या नहीं।प्राचीन काल की मान्यताओं की मानें तो प्राचीन काल से अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयदशमी का उत्सव मनाया जा रहा है। तो वहीं जब श्री राम ने इसी दिन लंकापति रावण का वध कर दिया तो इस दिन को दशहरा के नाम से जाना जाने लगा। यानि इससे ये बात स्वष्ट होती है कि विजयदशमी का पर्व रावण के वध से पहले से मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इससे जुड़ी मान्यताएं-
धार्मिक मान्याताएं कि देवी दुर्गा ने इस दिन यानि विजयदशमी को माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। कथाओं के अनुसार महिषासुर रंभासुर का पुत्र था, जो अत्यंत शक्तिशाली था। जिसने कठोर तक करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उसे कहा- ‘हे वत्स! एक मृत्यु को छोड़कर, सबकुछ मांगों। जिसके बाद महिषासुर ने बहुत सोच विचार कर कहा- ‘ठीक है प्रभो। आप मुझे ये वरदान दें कि किसी देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। केवल स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित हो। ब्रह्माजी ‘एवमस्तु’ कहकर अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्मा जी से ये वर प्राप्त करने के बाद महिषासुर ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया और त्रिलोकाधिपति बन गया। उसके अत्याचारों से परेशान होकर तब सभी देवताओं ने देवी भगवती महाशक्ति की आराधना की।कहा जाता है तब समस्त देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर परम सुंदरी स्त्री प्रकट हुई थी।जिसके बाद हिमवान ने देवी भगवती को सवारी के लिए सिंह दिया, तथा अन्य सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र महामाया की सेवा में प्रस्तुत किए। भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करवाने का आश्वासन दिया। कथाओं के अनुसार देवी मां ने पूरे 9 दिन तक लगातार महिषासुर से युद्ध करने के बाद 10वें दिन उसका वध कर दिया। मान्यता है कि इसी उपलक्ष्य में विजयादशमी का उत्सव मनाया जाता है। बता दें कथाओं में वर्णन मिलता है ति महिषासुर एक असुर अर्थात दैत्य था, राक्षस नहीं। इसके अलावा विजयदशमी के दिन ही प्रभु श्रीराम और रावण का युद्ध कई दिनों तक चलने के बाद समाप्त हुआ था। श्री राम ने रावण का वध करके देवी सीता को उसके चंगुल से छुड़ाया था। जिसके उपलक्ष्य में दशहरे का पर्व मनाया जाता है। बता दें रावण का वध दशमी के दिन किया गया था, रावण एक राक्षस था, असुर नहीं था। तो वहीं कुछ मान्यताएं ये भी हैं कि इसी दिन अर्जुन ने कौरव सेना के लाखों सैनिकों को मारकर कौरवों को पराजित किया था, जिसे अधर्म पर धर्म की जीत माना गया था।

(साभार – पंजाब केसरी)

बंगाल की आत्मा है दुर्गापूजा, इसके साथ खिलवाड़ स्वीकार नहीं

दुर्गापूजा ऐसा अवसर है जो हमें रिचार्ज करता है। बचपन से ही भव्य मंडप, रंग-बिरंगी रोशनी को देखकर मुग्ध होते रहे हैं हम। तब इतनी तामझाम नहीं थी। हालांकि तुष्टीकरण तब भी था मगर आज के बंगाल में जिस बेशर्मी के साथ यह चरम सीमा पर पहुंच गया है, तब ऐसा नहीं था। वामपंथी पार्टियों के स्टॉल देखे मगर किसी को काबा और मदीना को याद करते नहीं देखा। दुर्भाग्यवश सत्ता पक्ष एक वर्ग को संतुष्ट करने के चक्कर न सिर्फ डेमोग्राफी बदलने के चक्कर में है बल्कि रह -रहकर अपनी वफादारी को जिंदा रखते हुए तथाकथित वंचित व अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी वफादारी तक पहुंचाता रहता है। बंगाल ऐसे भीषण समय से गुजर रहा है जिसकी कल्पना भी हममें से किसी ने नहीं की थी। सत्ता में आते ही तृणमूल सरकार ने जिस तरह प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष तरीके से दबाया, उसने भाजपा को एक जमीन दे दी और आज न चाहते हुए भी बंगाल के लोग भाजपा की शरण में जाते दिख रहे हैं। पहले तो पितृपक्ष में माता दुर्गा के मंडप का उद्घाटन करना और जिलों में उत्सव में बाधा पहुंचाना खलता था। इसके बाद कार्निवल के नाम पर पर्यटकों को लुभाने के लिए मां दुर्गा की प्रतिमाओं का रैम्प शो सजाना हम सबकी श्रद्धा का सरासर अपमान रहा। इस राज्य में महिलाएं असुरक्षित महसूस करती रही हैं और लक्खी भंडार के लालच में लक्ष्मी जैसी कन्याओं के अपमान को लेकर भी मौन है..क्या यही सिखाती हैं मां दुर्गा ? बारिश में हिजाब पहनकर मंडप में जाना क्या साबित करता है? उस पर पंडाल में खड़े होकर तृणमूल नेत्री के विधायक मदन मित्रा का मेरे दिल में काबा और मदीना करना क्या हिन्दुओं का अपमान करनी नहीं है? मोहम्मद अली पार्क कोलकाता की प्रतिष्ठित पूजा है मगर श्रद्धालुओं को मां से दूर करने के लिए पुलिस की सहायता लेकर मार्ग ऐसा बदल दिया गया कि लोग चाहें तो भी मंडप में चलकर जाने की हिम्मत नहीं होती। पंडाल को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया गया और उस पर काला कपड़ा लगाकर ढक दिया गया। यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस पूजा का उद्घाटन खुद तृणमूल विधायक ने किया था, तब पुलिस को अव्यवस्था नहीं दिखायी दी, हद है। क्या हम यह समझें कि पूजा और जय बांग्ला के बहाने हिन्दीभाषिय़ों को टारगेट किया जा रहा है क्योंकि आसपास के इलाके मुस्लिम बहुल इलाके हैं तो क्या कोलकाता को मुर्शिदाबाद बनाने का प्रयास है यह ? याद रहे कि लोग परिवार के साथ चलते हैं जिनमें छोटे बच्चे होते हैं। अभी ऑपरेशन सिंदूर को लेकर गजब की ईर्ष्या है जबकि लोग संतोष मित्रा स्क्वायर में उमड़ रहे हैं और इस पूजा को कई बार नोटिस भेजी जा चुकी है। यहां तक कि लाइट और साउंड वेंडर को भी नोटिस थमा दी गयी। इसके पहले सागर में इसी थीम पर बने पंडाल को खोलने पर मजबूर किया गया तो सरकार साबित क्या करना चाहती है, उसे तय करना चाहिए। प्रतिष्ठित संतोष मित्रा स्क्वायर दुर्गा पूजा पंडाल को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। इस पंडाल के आयोजक और कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के भाजपा पार्षद सजल घोष ने कोलकाता पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि जानबूझकर यहां आने वाले दर्शकों को रोका जा रहा है। उन्होंने इसे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का “राजनीतिक प्रतिशोध” करार दिया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को इस पंडाल का उद्घाटन किया था। घोष का दावा है कि पुलिस ने सियालदह स्टेशन परिसर और उसके चारों ओर बैरिकेडिंग कर दी है, इस वजह से श्रद्धालु और आगंतुक पंडाल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। उन्होंने कहा, “पूरे इलाके को घेर लिया गया है। न लोग आसानी से पंडाल तक आ सकते हैं और न ही गाड़ियां अंदर प्रवेश कर पा रही हैं। केवल वही लोग पंडाल तक पहुंच रहे हैं जो किसी तरह बैरिकेड तोड़कर आ रहे हैं।

संतोष मित्रा स्क्वायर पूजा समिति उन शुरुआती समितियों में रही है जिसने राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली दुर्गा पूजा ग्रांट को ठुकरा दिया था। इस बार समिति ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को थीम बनाया है। इस थीम में केंद्र सरकार की आतंकवाद-रोधी उपलब्धियों और पाकिस्तान को करारा जवाब देने वाले अभियानों को प्रदर्शित किया गया है। आयोजकों का कहना है कि जनता से इस थीम को व्यापक समर्थन और सराहना मिल रही है। सजल घोष ने आरोप लगाया कि यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस इस पूजा को टारगेट कर रही है। उन्होंने कहा, “पंडाल में जो थीम लगाई गई है, वह केंद्र सरकार की उपलब्धियों और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख को दर्शाती है। इसे जनता की भारी सराहना मिल रही है। संतोष मित्रा स्क्वायर का इतिहास भी उल्लेखनीय है। पिछले वर्ष 2023 में इस पंडाल को राम मंदिर थीम पर सजाया गया था, जिसे उद्घाटन करने स्वयं गृह मंत्री अमित शाह पहुंचे थे। उस समय भी इस पंडाल ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं और भाजपा नेताओं ने इसे सांस्कृतिक व राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण करार दिया था। इस बार भी अमित शाह ने पंडाल का उद्घाटन करते हुए आयोजकों की सराहना की थी, लेकिन उद्घाटन के तुरंत बाद अब राजनीतिक टकराव ने इसे फिर से केंद्र बिंदु बना दिया है। आयोजकों का कहना है कि दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन पुलिस की बैरिकेडिंग और प्रतिबंधों के चलते लोग पंडाल तक पहुंच नहीं पा रहे। इससे माहौल तनावपूर्ण हो गया है और विवाद और गहराता जा रहा है। मजे की बात यह है कि इसी थीम पर मध्य कोलकाता में एक और पंडाल बनाया गया है मगर उसे लेकर कोई दिक्कत नहीं है। यंग बॉयज क्लब दुर्गा पूजा कमेटी ने अपने 56वें ​​वर्ष में “ऑपरेशन सिंदूर” थीम पर बनाए गए भव्य मंडप का अनावरण कर भारत के सशस्त्र बलों के साहस और बलिदान को नमन करते हुए भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। इस वर्ष दुर्गोत्सव के आयोजन में भक्ति और राष्ट्रीय गौरव की गहरी भावना का अद्भुत मिश्रण किया गया है, जो हज़ारों लोगों को तारा चंद दत्ता स्ट्रीट पर जीवंत पंडाल की ओर आकर्षित कर रहा है, यह आकर्षक मंडप सेंट्रल एवेन्यू को रवींद्र सरणी से जोड़ने वाला एक ऐतिहासिक स्थल पर बनाया गया है। कलाकार देबशंकर महेश द्वारा डिज़ाइन किए गए इस मनमोहक पंडाल में कई आकर्षक कलाकृतियाँ हैं, जो थीम को जीवंत बनाती हैं। इस मंडप में दर्शकों को भारतीय सेना के टैंकों और मिसाइलों की जीवंत प्रतिकृतियाँ देखने को मिलेंगी। इस थीम का मुख्य आकर्षण भारतीय सेना का सिर गौरव से ऊंचा करनेवाली देश की वो दो वीर बेटियां, महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह का सम्मान हैं। उनकी प्रतिकृतियाँ सेना में महिलाओं की शक्ति और नेतृत्व के सशक्त प्रतीक के रूप में खड़ी हैं।
सरकार कोई भी हो, उसे समझना होगा कि नवरात्रि हो या दुर्गा पूजा वह सिर्फ उत्सव नहीं, बंगाल की आत्मा है। श्रद्धालु मां के लिए बच्चों के समान होते हैं। सरकारें आती -जाती रहेंगी मगर जो शाश्वत है, वह माता आदिशक्ति हैं और जब भी अति होगी, उसका अंत होकर रहता है। भविष्य का पता नहीं मगर लग रहा है कि अति अपने अंत को खुद ही निमंत्रण दे रही है।

नवरात्रि पर बनाएं विशेष व्यंजन

सामग्री – 1 लीटर गाढ़ा दूध, 1-2 कप सीताफल की प्यूरी, 1 छोटा चम्मच इलायची पाउडर, बादाम और सूखे मेवे इच्छानुसार (कटे हुए), 1 कप शक्कर

विधि -सबसे पहले सीताफल लें। फिर इसे काटकर बीज निकालें और साफ कर लें। इसके बाद आप इससे सारा गूदा निकालकर अच्छी तरह से धो लें। फिर आप एक पैन में दूध डालकर तेज आंच पर उबाल लें।  इसके बाद जब दूध में एक उबाल आ जाए तो गैस की आंच कम कर दें।  फिर इसमें शक्कर, केसर और सीताफल डालें।  इसके बाद इसे लगातार चलाते हुए करीब 15 से 20 मिनट तक पकाएं।  फिर गैस बंद करके दूध पूरी तरह से ठंडा होने के लिए फ्रिज में रख दें। सीताफल रबड़ी बनकर तैयार है। फिर कटे हुए ड्राई फ्रूट्स से गार्निश करके ठंडी-ठंडी सर्व करें।

 

मखाना टिक्की

सामग्री – 2 कप मखाना, 2 मध्यम आकार के उबले हुए आलू , 2 टेबल स्पून सिंघाड़ा आटा या बेसन (नॉर्मल टिक्की के लिए),  2 हरी मिर्च (बारीक कटी हुई), 1 टी स्पून अदरक पेस्ट, 2 टेबल स्पून (बारीक कटी हुई) धनिया पत्ती , सेंधा नमक  स्वादानुसार (व्रत के लिए), सादा नमक – स्वादानुसार (नॉर्मल टिक्की के लिए), ½ टी स्पून काली मिर्च पाउडर, ½ टी स्पून भुना हुआ जीरा पाउडर,  1 टी स्पून नींबू का रस   टिक्की सेंकने के लिए घी या तेल

विधि – सबसे पहले एक पैन में मखाना हल्का भूनें और ठंडा होने पर मिक्सी में दरदरा पीस लें। फिर एक बड़े बर्तन में उबले आलू मैश करें। इसमें पिसा हुआ मखाना, सिंघाड़ा आटा, हरी मिर्च, अदरक पेस्ट, धनिया पत्ती, भुना जीरा पाउडर, नमक, काली मिर्च और नींबू का रस डालकर अच्छी तरह मिलाएं। तैयार मिश्रण से छोटे-छोटे गोल टिक्की आकार की लोइयां बना लें और हल्का चपटा करें।  एक तवे पर थोड़ा सा घी या तेल डालें और टिक्कियों को धीमी आंच पर सुनहरा और कुरकुरा होने तक सेकें।  मखाना टिक्की को धनिया पुदीना चटनी या दही के साथ गरमा-गरम परोसें।

भारत की वो 5 वीर हिंदू रानियां, जिनके नाम से कांपते थे मुगल और अंग्रेज

भारत की मिट्टी में ऐसी कई वीरांगनाओं ने जन्म लिया, जिन्होंने मुगल शासकों से लेकर ब्रिटिश हुकुमत तक की नींद हराम कर दी थी। जिन्हें गुलामी में जीने के बजाय मौत मंजूर थी। आज हम भारत की उन रानियों के बारे में बता रहे हैं जिन्होंने पुर्तगालियों, मुगलों, ब्रिटिश शासन और फिर सामाजिक कुरीतियों का न सिर्फ डटकर सामना किया, बल्कि समय आने पर उन्हें खत्म करने का काम भी किया।

1. रानी अब्बक्का चौटा (1525–1570) –16वीं शताब्दी में रानी अब्बक्का चौटा उल्लाल (वर्तमान में कर्नाटक) की वो वीरांगना थीं, जिन्होंने पुर्तगालियों का काल कहा जाता था। तुलु नाडु की चौटा वंश की रानी अब्बक्का ने अपने छोटे से राज्य को एकजुट कर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति बनाई थी। उस वक्त व्यापार पर पुर्तगालियों का कंट्रोल था। मनमाना कर वसूला जाता था जिसका रानी अब्बक्काटा चौटा ने जमकर विरोध किया। उन्होंने कई बार पुर्तगालियों के खिलाफ अपनी बहादुरी दिखाई। वीरता और स्वतंत्रता की भावना की वजह से उनका नाम भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है।

2. रानी ताराबाई भोंसले (1675-1761)-रानी ताराबाई भोंसले मराठा साम्राज्य की एक साहसी और रणनीतिक शासिका थीं। छत्रपति शिवाजी की पुत्रवधू रानी ताराबाई भोंसले को अक्सर ‘रैन्हा दोस मराठा’ या ‘मराठों की रानी’ के नाम से भी जाना जाता था। अपने पति राजाराम भोंसले की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपने नाबालिग बेटे शिवाजी द्वितीय के नाम पर मराठा साम्राज्य का नेतृत्व किया। अपनी बुद्धिमानी और साहस से उन्होंने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शासक को भी परेशान कर दिया था। ताराबाई को मराठा इतिहास में एक नायिका के रूप में सम्मान दिया जाता है। उन्होंने 1700 में परिस्थितियों के कारण मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली थी, फिर भी अपने लोगों के लिए लड़ने में उन्होंने कभी ढिलाई नहीं बरती। अपने शासनकाल के दौरान, उन्होंने मुगलों की मानसिकता को गलत साबित कर दिया। एक महिला कुछ भी कर सकती थी। वह अपने दुश्मनों से लगातार सीखती रहती थी और उसकी चतुर रणनीतियों ने मराठा सेना को दक्षिणी कर्नाटक पर अपना शासन स्थापित करने में मदद की।

3. रानी अहिल्याबाई होल्कर (1725-1795)- अहिल्याबाई होल्कर का जन्म अहमदनगर के जामखेड के चोंडी गांव में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें घर पर ही पढ़ाया था, फिर भी वह हमेशा दूसरों के कल्याण की कामना करती थीं। एक राजघराने में विवाह और एक राजकुमार को जन्म देने के बावजूद, उन्होंने कुछ ही दशकों में अपने पति, ससुर और पुत्र को खो दिया था। इसलिए वे 11 दिसंबर 1767 को मराठा साम्राज्य की मालवा रियासत की रानी बनीं। अपने शासनकाल के दौरान, उन्होंने राजवंश की जमकर रक्षा की, आक्रमणों का खंडन किया और अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार किया। अहिल्याबाई ने मंदिरों, धर्मशालाओं, कुओं और सड़कों का निर्माण करवाया, विशेष रूप से काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार। इसलिए उन्हें ‘देवी अहिल्या’ भी कहा गया।

4. रानी चेन्नम्मा (1778-1829)-कित्तूर (वर्तमान कर्नाटक) की वो वीर रानी थीं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था। उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। अपने पति और पुत्र के निधन के बाद, चेन्नम्मा ने वंश को आगे बढ़ाने के लिए एक उत्तराधिकारी गोद लेना था, या फिर उसे अंग्रेजों के हाथों खो देना था। उन्होंने पहला विकल्प चुना। 1824 में, उन्होंने शिवलिंगप्पा नाम के एक लड़के को गोद लिया, लेकिन इससे ईस्ट इंडिया कंपनी नाराज हो गई। ब्रिटिश हुकुमत को अस्वीकार करने पर रानी चेन्नम्मा और अंग्रेजों के बीच 1824 में युद्ध छिड़ गया। रानी चेन्नम्मा ने अपने राज्य कित्तूर का रियासत का दर्जा खोना नहीं चाहती थीं, इसलिए उन्होंने 1824 में अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठा लिए। अंग्रेजों ने 21 अक्टूबर 1824 को 20,000 सैनिकों और 400 तोपों से लैस होकर हमला कर दिया। हालांकि वह एक बार तो उनसे निपटने में कामयाब रहीं, लेकिन दूसरे प्रयास में असफल रहीं। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर बैलहोंगल किले में आजीवन कारावास की सजा दी।

5. सेतु लक्ष्मी बाई (1895-1985)- सेतु लक्ष्मी बाई त्रावणकोर रियासत (वर्तमान केरल) की रानी थीं, जिन्होंने 1924 से 1931 तक नाबालिग महाराजा चिथिरा थिरुनाल के लिए रीजेंट के रूप में शासन किया। लोग उन्हें महिला अधिकारों की पैरवी करने वाली रानी मानते थे। वह महिलाओं के काम करने और आगे पढ़ाई करने को लेकर इतनी उत्साहित थीं कि उन्होंने एक प्रोत्साहन योजना बनाई थी। कॉलेज जाने वाली लड़कियां उनके महल में चाय के लिए उनके साथ शामिल हो सकती थीं। उनके शासन में खासतौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार हुए। उन्होंने दलितों को मंदिरों में प्रवेश का समर्थन किया, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था। उन्होंने महिलाओं को आगे की शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया, उन्हें स्थानीय पदों से सरकारी पदों पर पदोन्नत किया, इस प्रकार यह सुनिश्चित किया कि सरकारी निर्णयों में उनकी समान भागीदारी हो। 1927 में, उन्होंने छात्राओं के लिए कानून की पढ़ाई खोल दी और त्रिवेंद्रम के महिला महाविद्यालय को इतिहास, प्राकृतिक विज्ञान, भाषा और गणित की कक्षाएं शुरू करने का आदेश भी दिया।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

अगस्त्य संहिता में मिलता है विद्युत बैटरी का सूत्र

महर्षि अगस्त्य ने बिजली उत्पादन के साथ-साथ बिजली, बिजली के तार और बैटरी सेल का भी आविष्कार किया था। महर्षि अगस्त्य इतिहास में अपनी अपार क्षमताओं और मानव जाति के लिए योगदान के लिए जाने जाते हैं।  उनका सार 3,000 साल पुराने ग्रंथ ‘अगस्त्य संहिता’ में दर्ज है, जिसमें पतंग, गुब्बारे और हवाई जहाज, आयुर्वेद, ज्योतिष, मार्शल आर्ट और बिजली के कामकाज भी शामिल हैं। महर्षि अगस्त्य इतिहास में इलेक्ट्रिक सेल बनाने वाले पहले व्यक्ति हैं।अगस्त्य संहिता में बताया गया है कि विद्युत बैटरी या सेल का निर्माण कैसे किया जाता है, साथ ही बैटरी का उपयोग करके पानी को उसके घटक गैसों में कैसे ‘विभाजित’ किया जाता है। आज हम जिन आधुनिक बैटरियों का उपयोग करते हैं, वे वास्तव में अगस्त्य के विद्युत सिद्धांत का अनुसरण करती हैं।

आमतौर पर हम मानते हैं कि बिजली का आविष्कार थॉमस एडिसन ने किया था, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे ऋषियों ने दुनिया को सबसे पहले बिजली के बारे में बताया था।

बिजली का उदय सबसे पहले भारत में हुआ। बिजली पैदा करने की विधि महर्षि अगस्त्य ने दी है, और इसे आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकार किया है। महर्षि अगस्त्य ने ही सबसे पहले बिजली की उत्पत्ति की शुरुआत की थी, इसका विस्तृत विवरण ‘अगस्त्य संहिता’ में दिया गया है। उन्होंने बिजली पैदा करने की पूरी विधि या तकनीक बताई है, और कई लोगों ने विद्वानों के सामने इस विधि का उपयोग करके दिखाया है।

सप्त ऋषियों में से एक माने जाने वाले महर्षि अगस्त्य ऋषि एक वैदिक ऋषि थे। महर्षि अगस्त्य अयोध्या के राजा दशरथ के कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ ऋषि के बड़े भाई थे।

उन्होंने ‘अगस्त्य संहिता’ की रचना की थी जिसकी चर्चा वेद, पुराण, वाल्मीकि रामायण, भगवद गीता आदि में की गई है। महर्षि अगस्त्य ने इस संहिता में प्रत्येक रहस्य का ज्ञान संग्रहित किया है।

रामायण में त्रेता युग में भगवान श्री राम के वनवास काल के दौरान महर्षि अगस्त्य ऋषि के आश्रम में श्री राम से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण में विस्तार से किया गया है।

महर्षि अगस्त्य द्वारा रचित ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है। इस संहिता की प्राचीनता पर शोध किया गया है और इसे सही पाया गया है। आश्चर्यजनक रूप से महर्षि अगस्त्य ने अगस्त्य संहिता में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्रों में लिखा है:

बिजली पैदा करने की विधि:

संस्थाप्य मृण्मये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्।

छादयेच्छिखिग्रीवेन् चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥

दस्तालोष्टो निधात्वयः परदाच्छादितस्तत:।

संयोगाज्जयते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्॥

अर्थ:

एक साफ मिट्टी का बर्तन लें, उसमें तांबे का पत्र रखें और शिखिग्रीव यानी मोर की गर्दन जैसा पदार्थ (कॉपर सल्फेट) डालें। फिर उस बर्तन को गीले लकड़ी के चम्मच से भरें। उसके बाद ऊपर से पारा और जस्ता डालें, इस तरह तारों के माध्यम से जोड़ने पर बिजली उत्पन्न होगी।

अगस्त्य संहिता में आधुनिक बैटरी सेल महर्षि अगस्त्य की बिजली बनाने की विधि से मिलती जुलती है। उन्होंने निम्नलिखित सामग्रियों का उपयोग किया:

1. मिट्टी का बर्तन

2. गीला चूरा

3. जिंक पाउडर

4. तांबे की प्लेट

5. CuSO4

उल्लेखनीय है कि इस प्रयोग के फलस्वरूप 1.138 वोल्ट की विद्युत तथा 23 mA धारा उत्पन्न होती है। यह प्रयोग 7 अगस्त 1990 को स्वदेशी विज्ञान समन्वय संस्थान (नागपुर) में अनेक विद्वानों की उपस्थिति में किया गया था।

अगस्त्य संहिता में ऋषि अगस्त्य द्वारा विद्युत का विद्युत लेपन के लिए उपयोग करने का भी वर्णन किया गया है। महर्षि अगस्त्य ने तांबे, सोने और चांदी को बैटरी से चमकाने की विधि बताई है। इसीलिए महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (बैटरी अस्थि) भी कहा जाता है।

बिजली का उपयोग:

अन्ने जलभंगोस्ति प्राणोदनेषु वायुषु।

एवं शतानां कुंभानांससंयोगकार्यकृत्स्मृत:॥

अन्ने जलभंगौस्ति प्राणोदनेषु वायुषु।

तथा शतनाम कुम्भानां संयोगं कार्यकृत्स्मृता:॥

अर्थ:

जब सौ कुंभों की शक्ति का उपयोग जल पर विद्युत लेपन के लिए किया जाता है, तो जल अपना रूप बदलकर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन में बदल लेता है।

कृत्रिमस्वर्णराजतलेप: सत्कृतिरुच्यते।

यवक्षारमयोधानौ सुशक्तजलसन्निधो॥

आच्छादयति तत्ताम्रंस्वर्णेन रजतेन वा।

सुवर्णलिप्तं तत्ताम्रं शतकुंभमिति स्मृतम्‌॥

कृत्रिम स्वर्ण लेपनः सत्कृतिरुच्यते।

यवक्षारमयोधनौ सुषटजलसन्निधो॥

अच्छादयति तत्तम्रमस्वर्णेन राजतेन वा।

सुवर्णलिप्तं तत्तमं शतकुम्भमिति स्मृतम् ॥

अर्थ:

सोने या चांदी जैसी धातु के लेप को सत्कृति कहा जाता है। जैसे ही तेज पानी (अम्लीय घोल) लोहे के बर्तन के संपर्क में आता है, क्षार (सोना या चांदी नाइट्रेट) तांबे को सोने या चांदी से ढक देता है। सोने से लेपित उस तांबे को शतकुम्भ या सोना कहा जाता है।

विद्युत तार:

इस आधुनिक युग में बिजली, संदेश आदि ले जाने के लिए विद्युत तारों की केबल बनाई जाती है, इसी प्रकार प्राचीन काल में भी केबल बनाई जाती थी जिसे रस्सी कहा जाता था।

नवभिस्तस्न्नुभिः सूत्रं सूत्रैस्तु नवभिर्गुणः।

गुर्णैस्तु नवभिपाशो रश्मिस्तैर्नवभिर्भवेत्।

नवष्टसप्तषद् संख्ये रश्मिभिर्राज्जवः स्मृताः।।

नवभिष्टसंनुभि सूत्रं सूत्रैस्तु नवभिर्गुणः।

गुर्णैस्तु नवभिपाशो रश्मिस्तरनवभिर्भवेत्।

नवष्टसप्तशाद् संख्या रश्मिभिर्राजजवः स्मृतः।

अर्थः

9 तारों का सूत्र बनता है। 9 धागों का एक गुण, 9 गुणों का एक फंदा, 9 फंदों से एक किरण और 9, 8, 7 या 6 रस्सी किरणें, ये सब मिलकर रस्सी (बिजली का तार) बनती हैं।

इस प्रकार हमारे हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में अनेक वैज्ञानिक प्रयोग दिए गए हैं, जो सिद्ध हो चुके हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि कोई उन पर शोध करे। लेकिन हमारे शिक्षा ने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में हमारी आस्था को नष्ट कर दिया है।

(साभार – प्रशासक समिति)

* श्री सरस्वती षोड़श नाम स्तोत्र *

सरस्वत्यां प्रसादेन, काव्यं कुर्वन्ति मानवाः।
तस्मान्निश्चल-भावेन, पूजनीया सरस्वती ।।

श्री सर्वज्ञ मुखोत्पन्ना, भारती बहुभाषिणी।
अज्ञानतिमिरं हन्ति, विद्या-बहुविकासिनी ।।

सरस्वती मया दृष्टा, दिव्या कमललोचना।
हंसस्कन्ध-समारूढ़ा, वीणा-पुस्तक-धारिणी ।।

प्रथमं भारतीय नाम, द्वितीयं च सरस्वती।
तृतीयं शारदादेवी, चतुर्थ हंसगामिनी ।।

पंचमं विदुषां माता, षष्ठं वागीश्वरी तथा।
कुमारी सप्तमं प्रोक्ता, अष्टमं ब्रह्मचारिणी ।।

नवमं च जगन्माता, दशमं ब्राह्मिणी तथा।
एकादशं तु ब्रह्माणी, द्वादशं वरदा भवेत् ।।

वाणी त्रयोदशं नाम, भाषा चैव चतुर्दशं।
पंचदंश श्रुतदेवी च, षोडशं गौर्निगद्यते ।।

एतानि श्रुतनामानि, प्रातरूत्थाय यः पठेत्।
तस्य संतुष्यदि माता, शारदा वरदा भवेत् ।।

सरस्वती नमस्तुभ्यं, वरदे कामरूपिणि।
विद्यारंभं करिष्यामि, सिद्धिर्भवतु में सदा ।।

लोकप्रिय जासूसी किरदारों की धमक, ब्योमकेश से फेलूदा तक दिखे

कोलकाता में दुर्गा पूजा की धूम शुरू हो चुकी है। महानगर के पंडालों में ऐतिहासिक धरोहरों, सामाजिक सरोकारों और धार्मिक प्रतिकों के साथ-साथ मनोरंजन से जुड़े विषयों को भी उभारा गया है। इसी क्रम में कुछ पंडाल बंगाल के लोकप्रिय जासूसी साहित्य और फिल्मों की झलक भी प्रस्तुत कर रहे हैं। शर्दिन्दु बंद्योपाध्याय के सत्यान्वेषी ब्योमकेश बक्शी से लेकर सत्यजीत रे के फेलूदा और अन्य कालजयी किरदारों के माध्यम से श्रद्धालुओं और दर्शकों को रहस्य, रोमांच की दुनिया की सैर कराने की पूरी तैयारी की गई है। दमदम पार्क तरुण संघ ने इस वर्ष प्रसिद्ध जासूस ब्योमकेश बक्शी को केंद्र में रखा है। डिजाइनर अनिर्बाण दास द्वारा सजाए गए इस पंडाल में 1950 और 60 के दशक की पॉप आर्ट शैली को जीवंत किया गया है। विशाल कॉमिक स्ट्रिप जैसे माहौल में आगंतुकों को ‘श्रीश्री दुर्गा मंदिर कंठहार रहस्य’ की काल्पनिक कहानी दिखाई देती है, जिसमें पूजा के दौरान देवी का हार चोरी हो जाता है। पंडाल में “ब्योमकेशेर डायरी” का मंचन भी हो रहा है, जिसमें ‘पथेर कांटा’ की कहानी पर नाट्य रूपांतरण दिखाया गया है। ब्योमकेश के साथी अजीत और पत्नी सत्यवती के प्रसंग पंडाल को और नाटकीयता प्रदान करते हैं। बालीगंज 71 पल्लि ने सत्यजीत रे की फिल्म ‘सोनार केल्ला’ के 50 वर्ष पूरे होने पर उसे थीम बनाया है। डिजाइनर राजू सरकार ने जैसलमेर किले की भव्य प्रतिकृति खड़ी की है। पंडाल और आसपास की सजावट में फेलूदा, तोपसे और जटायु के रोमांचक सफर को दर्शाया गया है। युवा मुकुल की कल्पनाशीलता को दर्शाते हुए मां दुर्गा की मूर्ति को गुड़िया जैसे रूप में गढ़ा गया है। फिल्म के प्रसिद्ध संगीत और संवाद पंडाल में गूंजते हैं, जिससे आगंतुकों को मानो आधी सदी पुरानी सिनेमाई यात्रा दोबारा जीने का अवसर मिलता है। कांकुड़गाछी चालंतिका क्लब ने ‘टिक-टिकी’ थीम के अंतर्गत बंगाल के दिग्गज जासूसों को समर्पित पंडाल बनाया है। ‘हीरेर हाथ बदल’ शीर्षक कहानी पर आधारित यह सजावट एक काल्पनिक हीरे की चोरी को दर्शाती है। यहां फेलूदा, पांडव गोयेंदा, मितिन मासी और किरीटी जैसे लोकप्रिय जासूसों के साथ-साथ कई कुख्यात अपराधियों की झलक भी है। पुराने कोलकाता के घरों की प्रतिकृतियां, दुर्घटनाओं के दृश्य और चमकदार रोशनी दर्शकों को रहस्य और अपराध की दुनिया में खींच ले जाती हैं। मां दुर्गा की मूर्ति के ऊपर एक छिपकली को जाल काटते हुए दिखाया गया है, जो अपराध का पर्दाफाश करने वाले जासूसों का प्रतीक है। लाल और नीले रंगों का संयोजन अच्छाई और बुराई के संघर्ष को उजागर करता है। इन कलात्मक प्रस्तुतियों, प्रतीकों और नाटकीय सजावटों के माध्यम से इस बार कोलकाता के पंडाल न केवल पूजा का माहौल बना रहे हैं, बल्कि बंगाल की लोकप्रिय जासूसी किरदारों को भी जीवंत कर रहे हैं।

 

आध्यात्मिक उर्जा व माता के प्रति कृतज्ञता बोध है गरबा व डांडिया

आज के समय में गरबा और डांडिया सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं है। यह नृत्य अब भारत के हर कोने में और यहां तक कि विदेशों में भी धूमधाम से खेले जाते हैं। हर साल नवरात्रि के नौ दिनों में जगह-जगह पंडाल सजते हैं, लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर ग्रुप बनाकर नृत्य करते हैं और देर रात तक उत्सव का माहौल बना रहता है। कॉलेजों से लेकर सोसाइटीज़, बड़े क्लबों से लेकर पांच सितारा होटलों तक हर जगह गरबा और डांडिया का आयोजन देखने को मिलता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह नृत्य क्यों खेले जाते हैं और इनका असली महत्व क्या है? गरबा और डांडिया में सबसे पहले बात करते हैं गरबा की। “गरबा” शब्द संस्कृत के गर्भ से निकला है, जिसका अर्थ है गर्भ या जीवन। इसी से “गरबो” शब्द बना, जिसका मतलब है मिट्टी का घड़ा जिसमें अंदर दीया जलाया जाता है। नवरात्रि के दौरान यह दीया ईश्वर की अनंत शक्ति और देवी के प्रकाश का प्रतीक होता है। जब लोग इस घड़े या दीपक के चारों ओर गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं तो उसका अर्थ केवल नाचना-गाना नहीं होता। इस गोल घेरे का मतलब है जीवन का चक्र, जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म। यानी सब कुछ बदलता रहता है, लेकिन बीच में रखा दीपक या देवी शक्ति हमेशा स्थायी रहती है। इसीलिए गरबा केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह नृत्य एक पूजा है, जिसमें ताली, कदम और ताल के माध्यम से देवी को समर्पित किया जाता है। गरबा और डांडिया में दूसरा नृत्य है डांडिया। इसे डांडिया रास भी कहा जाता है।

इसमें लकड़ी की डंडियों का इस्तेमाल होता है और आज कल तो लोग रंग बिरंगी सजी हुई डंडियों का इस्तेमाल करते है। उन डंडीयो को देवी दुर्गा की तलवार का प्रतीक माना जाता है। जब लोग डंडियों को आपस में टकराते हैं तो यह मां दुर्गा और राक्षस महिषासुर के बीच हुए युद्ध की याद दिलाता है। यह केवल खेल नहीं, बल्कि अच्छाई और बुराई की लड़ाई का भी प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, गरबा आमतौर पर आरती से पहले खेला जाता है, जबकि डांडिया आरती के बाद। इसका मतलब है पहले शांति और भक्ति का माहौल, फिर जोश और उत्सव का आनंद। गरबा और डांडिया भले ही अपने तरीके से अलग हो, लेकिन दोनों का मकसद एक ही है, देवी की शक्ति को सम्मान देना। गरबा जीवन चक्र और स्त्री शक्ति का प्रतीक है, जबकि डांडिया मां की तलवार और उनके बुराई के ऊपर विजय का प्रतीक है। इस उत्सव के लिए अलग अलग जगह और कल्चर्स के लोग एक जगह इकट्ठे होते है और गरबा और डांडिया खेलते है। यह त्यौहार बताता है कि भक्ति और उत्सव सबको जोड़ने की ताकत रखते हैं।

 

समय के साथ गरबा और डांडिया ने आधुनिक रूप भी ले लिया है। पहले जहां केवल ढोल और पारंपरिक गीतों पर नाच होता था, वहीं अब बॉलीवुड गाने और रिमिक्स बीट्स भी शामिल हो चुके हैं। पहले सिर्फ पारंपरिक घाघरा-चोली और कढ़ाईदार कपड़े पहने जाते थे, अब डिज़ाइनर आउटफिट्स और नए फैशन ट्रेंड्स भी दिखते हैं। गरबा और डांडिया अब सिर्फ नृत्य नहीं बल्कि आज की युवा पीढ़ी के लिए एक ट्रेंड बन चुका है। गुजरात या मंदिरों तक सीमित रहने के बजाय अब बड़े स्टेडियम, क्लब होटल और सोसाइटीज़ में इसके विशाल कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यह नृत्य अब केवल धार्मिक परंपरा नहीं रहे। विदेशों में बसे भारतीय भी बड़े पैमाने पर गरबा और डांडिया का आयोजन करते हैं और अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं।
(साभार – न्यूजग्राम)

प्रेरणादायक है रानी भवानी का जीवन

रानी भवानी, आठवीं शताब्दी की नाटौर (अब बांग्लादेश का एक भाग) की ज़मींदार, जिन्होंने खुद को एक उदार ज़मींदार के साथ-साथ एक सामाजिक प्रभावक और सुधारक भी साबित किया। वह उन चंद ज़मींदारों में से एक थीं जिन्होंने सिराजुद्दौला को पदच्युत करने के लिए ब्रिटिश सेना की सहायता करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने यह तब किया जब सिराज ने उनकी विधवा बेटी का अपमान करने की कोशिश की थी। उन्हें लगा कि सिराज और ब्रिटिश शासकों के बीच, देश के कल्याण के लिए सिराज ही बेहतर था।रानी भवानी (1716-1795) ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान वर्तमान राजशाही बांग्लादेश में एक ज़मींदार थीं। उन दिनों एक महिला का ज़मींदार होना अत्यंत दुर्लभ था। लेकिन रानी भवानी ने चार दशकों से भी अधिक समय तक विशाल राजशाही ज़मींदारी को अत्यंत प्रभावी और कुशलतापूर्वक प्रबंधित किया। उनका जीवन और समाज में उनका योगदान किसी भी महिला के लिए एक सबक हो सकता है। प्लासी के युद्ध से पहले, रानी भवानी ने राजा कृष्ण चंद्र और बंगाल के सभी अन्य ज़मींदारों से क्लाइव की मदद न करने का आग्रह किया। रानी भवानी को सबसे पहले यह एहसास हुआ कि अगर सिराज हार गया तो यह बंगाल के लोगों के लिए असीमित मुसीबतें लाएगा। उसने पहले ही सोच लिया था कि सत्ता का जाल और बंगाल के लोग उनके गुलाम बन जाएंगे। रानी भवानी ने प्लासी के युद्ध में नवाब की मदद के लिए सेना भेजी।
जन्म – रानी भवानी का जन्म 1716 को चटिमग्राम गांव, एडमदिघी, उपजिला, बोगुरा जिले में एक ब्रामह्ण परिवार में हुआ था। माता-पिता: भवानी के पिता का नाम आत्माराम चौधरी था, जो एक ज़मींदार थे। भवानी की माँ का नाम भी आत्माराम चौधरी था, जो एक कुलीन परिवार से थीं। जय दुर्गा के पिता हरिदेव ठाकुर, पाकुड़िया के राघव ठाकुर के दूसरे पुत्र थे।
पति -रानी भवानी के पति, राजा रामकांत राय, राजा रामजीबन के दत्तक पुत्र थे क्योंकि उनकी कोई पुत्र संतान नहीं थी। उन्होंने रास्की राय, जो कुलश्रेष्ठ ब्राह्मण माने जाते थे और सिंगरा थाना अंतर्गत चौग्राम गाँव के निवासी थे, के सबसे छोटे पुत्र रामकांत राय को गोद ले लिया। उन्होंने रसिक राय को रंगपुर जिले के अंतर्गत चौग्राम परगना और इस्लामाबाद दे दिया ताकि वह रामकांत राय को दत्तक पुत्र के रूप में अपना सकें। रामजीबन ने दत्तक पुत्र रामकांत राय को पूरी संपत्ति विरासत में दे दी।
शादी – रामकांत राय को अपनी परिपक्वता का एहसास हुआ और उन्होंने तुरंत रानी भवानी से विवाह का प्रस्ताव रखा। विवाह के समय भवानी केवल 15 वर्ष की थीं और रामकांत 18 वर्ष के। इस अवसर पर रामजीबन चटियांग्राम नामक गाँव में उपस्थित थे। भवानी के पिता आत्माराम चौधरी ने विवाह के दहेज के रूप में गाँव का एक हिस्सा दान में दे दिया। विवाह के समापन पर एक शुभ दिन, नवदंपति के साथ सभी लोग नाटोरे स्थित मुख्यालय लौट आए। तब से भवानी देवी रानी रबानी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। राजा रामकांत एक सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। दूसरी ओर, रानी भवानी असाधारण प्रतिभा की धनी थीं। 1748 में राजा रामकांत राय की मृत्यु के बाद रानी भबानी जमींदारी की एकमात्र मालिक बन गईं। अलीवर्दी खान ने रानी भवानी को जमींदारी के प्रशासन का कार्यभार सौंपा। रानी भवानी ने भी जमींदारी प्रशासन को अपनी योग्यता और योग्यता का परिचय दिया।
रानी भवानी का निजी जीवन – महारानी भवानी निजी जीवन में अत्यंत धर्मपरायण थीं। उन्होंने अपना जीवन अत्यंत कठोर और अनुशासित तरीके से बिताया। हर रात, रात होने से 1 घंटा 36 मिनट पहले, वह बिस्तर से उठकर अपनी प्रार्थना पूरी करती थीं। उसके बाद, रात होने से 12 मिनट पहले, वह अपने पुष्प उद्यान में जातीं और अपने हाथों से फूल तोड़तीं। इसके बाद, वह गंगा में स्नान करतीं, नदी तट पर बैठकर पुनः प्रार्थना करतीं और सूर्योदय के 48 मिनट बाद तक शिव को अर्घ्य अर्पित करतीं। इसके बाद, वह मंदिर के देवी-देवताओं को पुष्प अर्पित करतीं और घर लौटकर शिव और “इष्ट” (इच्छा) की पूजा करते हुए, पुन्नों की कथाएँ सुनतीं। फिर वह स्वयं भोजन बनातीं और सबसे पहले अपने परिवार के 10 ब्राह्मणों को भोजन कराया और हबीस हन्ना (चावल और मक्खन को एक साथ उबालकर बनाया गया) खाया। वह अपने स्वभाव को त्यागने से पहले हर चीज़ की अच्छी तरह जाँच करतीं। अपने पति के प्रति उनके मन में गहरा प्रेम और सम्मान था। एक महिला होने के बावजूद, उन्होंने ज़मींदारी का प्रशासन चलाने में अपनी योग्यता सिद्ध की।
राजनीतिक जीवन – एक बड़ी ज़मींदारी की मालकिन होने के बावजूद, उन्हें अपने जीवन के उत्तरार्ध में सरकारी वजीफे पर निर्भर रहना पड़ा। इस वजीफे की राशि धीरे-धीरे कम होती गई और अंत में केवल 1000 रुपये रह गई। उन्होंने नाटोरे के गौरवशाली दिन भी देखे और अपने पतन का दिन भी। नाटोरे का पतन ही नहीं हुआ, बल्कि 1802 में अधिकांश प्रतिष्ठित राज परिवार (ज़मींदार परिवार) भी बर्बाद हो गए। इस प्रतिष्ठित महिला ने 79 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनकी उदारता ने उन्हें समाज में सम्माननीय बना दिया। संपत्ति के प्रशासन में उनकी बुद्धिमत्ता और कुशलता ने उन्हें और भी गौरवान्वित कर दिया। रानी भवानी की मृत्यु के साथ ही नाटोरे राज परिवार का गौरव भी समाप्त हो गया।
एक प्रशासक के रूप में जीवन -1748 में अपने पति की मृत्यु के बाद, रानी भवानी नटौर की जागीर की कानूनी मालिक बन गईं और जागीर का प्रशासन बखूबी चला रही थीं। उनके प्रशासनिक कर्तव्यों के निर्वहन में उनकी पुत्री तारासुंदरी और दीवान दयाराम राय ने उनकी हर संभव मदद की। यह कहा जा सकता है कि रानी भवानी ने अपनी जागीर का प्रशासन सफलतापूर्वक चलाया। इस दौरान, तीन प्रकार के लगान वसूले जाते थे: कब्जे वाली ज़मीन के लिए वैध राजस्व, अपराध सिद्ध होने पर दंड के रूप में जुर्माना या अतिरिक्त शुल्क और अन्य।
धार्मिक योगदान
बारानगर में भवानी मंदिर – रानी भवानी न केवल एक सफल प्रशासक थीं, बल्कि अपनी प्रजा के धार्मिक उत्थान के लिए भी उतनी ही चिंतित थीं। उन्होंने संस्थागत धर्म के प्रसार पर विशेष ध्यान दिया और ज़मींदारी के विभिन्न हिस्सों और उसके बाहर मंदिरों की स्थापना को प्रोत्साहित किया। उन्होंने अपने जन्मस्थान की स्मृति में एक सुंदर मंदिर भी बनवाया। मंदिर का नाम “जय दुर्गा मंदिर” था। मंदिर “जय दुर्गा मंदिर” रानी भवानी के गृहनगर की याद में बनाया गया है। मंदिर के अंदर एक मूर्ति भी स्थापित की गई थी।
उन्होंने दसुरिया के पास मामी कालिकापुर, नौगांव जिले के मंडपुकुर में रघुनाथ मंदिर में और अधिक मंदिरों का निर्माण कराया। नटोर का तारकेश्वर शिव मंदिर। बारानगर में भवानीश्वर मंदिर, रानी भवानी की एक बड़ी उपलब्धि है
विधवा विवाह – रानी भवानी एक दूरदर्शी महिला थीं। उन्होंने सबसे पहले यह महसूस किया कि हिंदू विधवाओं का पुनर्विवाह होना चाहिए। रानी भवानी की पुत्री तारासुंदरी कम उम्र में ही विधवा हो गई थीं। शायद इसीलिए उन्होंने विधुरों के विवाह की पहल की, क्योंकि उनकी पुत्री भी विधवा हो गई थी। रानी भवानी और राज बल्लभ ने अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव पंडितों के समक्ष रखा। रानी भवानी विधवाओं के प्रति काफी दयालु थीं। उन्होंने कई विधुरों को मासिक वजीफा देने की पेशकश की। रानी भवानी ने गंगा नदी के किनारे विधवाओं के लिए एक आश्रय स्थल बनवाया और उनके भरण-पोषण की व्यवस्था की।
(साभार – हिस्ट्री विला)