Friday, April 3, 2026
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स्वाधीनता संग्राम के गुमनाम नायक गंगू मेहतर

गंगू मेहतर विट्ठुर के शासक नाना साहब पेशवा की सेना में नगाड़ा बजाते थे। गंगू मेहतर को कई नामों से पुकारा जाता है। भंगी जाति के होने से गंगू मेहतर तो पहलवानी का शौक़ होने की वजह कर गंगू पहलवान के नाम से पुकारा जाता था।गंगू मेहतर पर अंग्रेजो ने पचास हजार का इनाम रखा था। सती चौरा गांव में इनका पहलवानी का अखाड़ा था, कुश्ती के दांव पेच एक मुस्लिम उस्ताद से सीखने के कारण गंगूदीन नाम से पुकारे जाने लगे और लोग इन्हें श्रद्धा प्रकट करने के लिए गंगू बाबा कहकर भी पुकारते थे। गंगू मेहतर के पुरखे जिले कानपुर के अकबरपुरा गांव के रहने वाले थे। उच्चवर्णों की बेगार, शोषण और अमानवीय व्यवहार से दुखी होकर इनके पुरखे कानपुर शहर के चुन्नी गंज इलाके में आकर रहने लगे थे।

1857 के स्वाधीनता संग्राम में इन्होने नाना साहब की तरफ़ से लड़ते हुए अपने शागिर्दों की मदद से सैंकड़ो अंग्रेज़ों को मौत के घाट उतारा था। और इस क़त्ल ए आम से अंग्रेज़ी सरकार बहुत सहम सी गई थी। जिसके बाद अंग्रेज़ों ने गंगू मेहतर जी को गिरफ़्तार करने का आदेश दे दिया।गंगू मेहतर पर अंग्रेजो ने पचास हजार का इनाम रखा था! गंगू मेहतर अंग्रेज़ों से घोड़े पर सवार होकर वीरता से लड़ते रहे। अंत में गिरफ़्तार कर लिए गए। जब वह पकड़े गए तो अंग्रेज़ों नेउन्हें हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर जेल की काल कोठरी में रख दिया और तरह तरह के ज़ुल्म किये।

गंगू मेहतर पर इलज़ाम था के इन्होने कई महिलाओं और बच्चों का क़त्ल किया था; पर ये बात प्रोपेगंडा का हिस्सा भी थी, क्युं के अंग्रेज़ों ने उस समय मीडिया का भरपूर उपयोग प्रोपेगंडा के लिए किया था! बहरहाल गंगू मेहतर को फांसी की सज़ा सुनाई जाती है। उसके बाद कानपुर में इन्हे बीच चौराहे पर 8 सितम्बर 1859 को फाँसी के फंदे पर लटका दिया जाता है।जब उन्हे फांसी दी गई तो उनकी लाश को घोड़े में बाँधकर पूरे शहर में घुमाया! लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के इतिहास में इनका नामो निशान नही है। यह नाम जातिवाद के कारण इतिहास के पन्नों में कहीं सिमट सा गया है।

शहीद गंगू मेहतर अपनी अंतिम सांस तक अंग्रेजों को ललकारते रहे : “भारत की माटी में हमारे पूर्वजों का ख़ून व क़ुर्बानी कि गंध है, एक दिन यह मुल्क आज़ाद होगा।” एैसा कहकर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को क्रान्ति का संदेश दिया और देश के लिए शहीद हो गए।कानपुर के चुन्नी गंज में इनकी प्रतिमा लगाई गयी है।

(साभार – उत्तर प्रदेश जागरण)

कूड़ेदान

-विक्रम साव

कूड़ेदान
पौ फटने से पहले ही,
गमछी डाले कंधे पर निकले घर से ,
कटे फीते की चप्पल पहनी ,
और पैंट को नीचे से घुटने तक मोड़ लिया,
पहुँचे ऑफिस और लेकर गाड़ी निकल गए काम पर,
घड़घड़ाती हुए गाड़ी के स्वर में
सीटी की भी वर्णमाला जुड़ी रहती है,
मुहल्ला बंधा है केशव का,
उसी तरफ़ गाड़ी लिए चल देता हर रोज़,
वही बूढ़े बरगद के बगल वाली छपरइया गल्ली में,
पर आज सूरज की तपिश थी जानलेवा
गया एक कूड़ेदान के पास
तो वो उलटा पड़ा था,
कूड़ेदान में था
सड़ा-गला-मरा कुत्ते का बच्चा,
उठाते ही गिरा उसका आधा धड़ नीचे
उसने पूँछ की तरफ़ से हाथ से उठाया,
सड़ी पूंछ उसके हाथ में आ गयी,
पास ही पड़ा था एक प्लास्टिक पैकेट
उसे उठाया तो , उसमें भरा था मल,
गाड़ी में फेंकते ही छींटे पड़े उसके चेहरे पर,
वो स्वर्ग की कल्पना भी कभी नहीं करता,
उसे पता है वह जहाँ भी जाय
नरक ही मिलेगा
मेहतर हूँ तो नर्क ही न उठाऊँगा।

उत्तराखंड में विंडलास डेवलपर ने पूरी सबसे बड़ी रियल इस्टेट डील

मुम्बई : देहरादून के विंडलास डेवलपर को एसडब्ल्यूएएमआईएच इन्वेस्टमेंट फंड ने उसकी टाउनशिप परियोजना विंडलास रिवर वैली को पूरा करने के लिए निवेश की अनुमति दे दी है। 171 करोड़ रुपये के इस निवेश से कम्पनी को 35 एकड़ में फैली इस टाउनशिप के विभिन्न चरणों का निर्माण पूरा करने, विकास में तेजी लाने और रियल इस्टेट का पैमाना बढ़ाने में मदद मिलेगी। यह टाउनशिप विश्वस्तरीय आवास उपलब्ध करवाने वाला उत्तराखंड का सबसे बड़ा पूर्ण इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट है। कई परिवारों को उनके मकानों की चाबी सौंप दी गयी है। एसडब्ल्यूएएमआईएच केन्द्र द्वारा किफायती और मध्यम वर्ग परिवारों के लिए स्पेशल विंडो के तहत स्थापित वैकल्पिक निवेश फंड है। आशिका कैपिटल लिमिटेड इस सौदे के लिए प्रमुख सलाहकार थी। एसबीआईकैप वेंचर्स लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुरेश कोझिकोटे ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों में किसी परियोजना का काम जल्द पूरा होना खुशी की बात है। हम देहरादून में डील करने पर ध्यान दे रहे हैं और देश भर में मौजूदगी बढ़ाना हमारा लक्ष्य है। विंडलास के सीईओ प्रणव रस्तोगी ने बताया कि सभी सुविधाओं से युक्त यह इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट चरणबद्ध तरीके से पूरा होगा। आशिका कैपिटल लिमिटेड के प्रेसिडेंट योगेश शेट्ये ने कहा कि उनकी कम्पनी रियल इस्टेट परियोजनाओं की मुश्किलें दूर करने के लिए नये – नये समाधान खोजती है।

बांग्ला फिल्म ‘जोटुगृह’ का पोस्टर जारी

कोलकाता : बांग्ला फिल्म ‘जोटुगृह’ का पोस्टर जारी कर दिया गया है। सप्तस्व बसु द्वारा निर्देशित यह फिल्म नेक्स्ट जेन वेंचर द्वारा प्रस्तुत की जा रही है। फिल्म में बॉनी सेनगुप्ता, अनामिका, सोहिनी, माही, राजदीप गुप्ता, रन्जय विष्णु नजर आएँगे।

 

वह अगर सफर अकेले कर रही है तो उसे सम्मान से देखिए

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, गर्मी कहर बरपा रही है और करोना की दूसरी लहर भी अपना सितम ढा रही है। तकरीबन साल भर से यह महामारी हमारे साथ लुकाछिपी खेल रही है। जैसे ही हम थोड़ा सा आश्वस्त होकर मुक्ति की साँस भरने की सोचते हैं वह बहुरूपिए की तरह हर बार नये रंग- रूप में हमारे सामने आकर अपनी भयंकरता से हमें चौंका देती है। करोना काल में लोगों ने और बहुत सारी बंदिशों के साथ घर में रहने की आदत भी डाल ली। हमारे घूमने फिरने या स्वतंत्रता पूर्वक विचरने पर पूरी तरह से पाबंदी लग गई थी। बाद में हालात थोड़े से सामान्य होने लगे तो लोगों ने सैर की अपनी योजनाओं पर अमल करना आरंभ कर दिया। विभिन्न कारणों से सफर करने की जरूरत के मद्देनजर भी लोग घर से बाहर निकलने लगे। बात जब सफर की चलती है तो महिलाओं के अकेले सफर करने के मुद्दे पर भी अनायास नजर चली जाती है। सोचकर देखा तो समझ में आया कि न जाने किस काल से जाने किस अलिखित नियम के तहत महिलाओं के अकेले सफर करने की मनाही सी रही है। जब लड़कियाँ छोटी होती हैं तब तो यह समझ में आता है कि वह माता- पिता या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ घर से बाहर निकलती हैं या सफर करती हैं लेकिन हमारा समाज लड़कियों को कभी भी, कुछ क्षेत्रों में बड़ा होने का अहसास करने का मौका नहीं देता। सुरक्षा के बहाना हो अथवा कोई और कारण, लड़की हो या स्त्री वह कभी इस लायक नहीं समझी जाती कि अकेले सफर पर निकल सके। समय बदला और उसके साथ ही बहुत कुछ बदला। डोली- पालकी के सुरक्षा घेरे या बैलगाड़ी के पर्दों के बीच यात्रा करनेवाली स्त्रियाँ भी अन्य मनुष्यों की भांति ट्राम, बस, रिक्शे, टैक्सी आदि में यात्रा करने लगीं। अपने- अपने स्कूल‌ या महाविद्यालय जहाँ कभी वह पैदल, तांगे, रिक्शे या गाड़ी में, घर के किसी सदस्य या दाई की निगहबानी में जाती थीं, वहाँ अकेली भी जाने लगी। हालांकि वह अकेले जाना भी बिल्कुल अकेला होना नहीं था क्योंकि बहुधा वे समूह में बाहर निकलती थीं। ठीक जंगल के नियम के अनुसार जिसमें शारीरिक दृष्टि से कमजोर जानवर जैसे हिरण आदि झुंड में ही रहते या विचरते हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि जंगल का नियम अभी भी स्त्रियों पर लागू है। चूंकि वह शारीरिक दृष्टि से कमजोर मानी जाती हैं इसीलिए झुंड में रहना उनकी आदत बन जाती है या दूसरे शब्दों में कहें तो हमारा समाज ठोंक -पीटकर उन्हें उस जीवन शैली में ढाल देता है जहाँ अकेले कहीं भी जाने, विचरने या घूमने आदि में उन्हें असुरक्षा बोध का अहसास होता है। और इसी असुरक्षा बोध के कारण आज की आधुनिक जीवन शैली में भी स्त्रियाँ, जो अपने दफ्तर आदि का काम बड़ी कुशलता से अपने दम पर‌ संभाल लेती हैं, भी अकेली सफर पर निकलने से परहेज़ करती हैं। अगर कुछ स्त्रियाँ इस रवायत को बदलने या तोड़ने की कोशिश करती भी हैं तो हमारा तथाकथित सभ्य या आधुनिक समाज उन्हें कोंच -कोंच कर यह अहसास करा देता है कि उन्हें अकेले सफर पर निकलने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए अन्यथा उनके साथ कोई भी दुर्घटना घट सकती है। वैसे दुर्घटनाएँ तो कभी भी किसी के साथ घट सकती हैं। हालांकि आज के समय में छात्राएँ हों या नौकरीपेशा महिलाएँ, अकेले सफर पर निकल ही पड़ती हैं लेकिन समाज इस नयी रवायत के प्रति अभी भी सहज नहीं हो‌ पाया है इसीलिए सफर के दौरान उनके इस दुस्साहस पर टीका टिप्पणी करने से बाज नहीं आता। वह बेझिझक कभी उस अकेली लड़की ‌या स्त्री के चरित्र पर‌ सवाल‌ उठाता है, खुसफुसाहट में ही सही तो कभी उसके माता-पिता की दायित्वबोध को प्रश्नांकित करता है जिन्होंने अपनी बेटी को अकेले सफर की अनुमति दे‌ दी है। सखियों, आप सबके साथ किसी ना किसी समय इस तरह की घटना अवश्य घटी होगी या न भी घटी हो‌ तो‌ आपने सुना अवश्य होगा। सोचकर आश्चर्य होता है कि दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गयी है और औरतों ने भी विकास की अनगिनत सीढ़ियों को‌ लांघते हुए आसमान में अपनी विजय पताका फहरा दी है लेकिन हमारा समाज अभी भी उनके प्रति इतना उदार नहीं हो पाया है कि उनके अकेले सफर करने को सहज दृष्टि से देखें। 1907 में प्रकाशित बंगमहिला की कहानी “दुलाईवाली” में नवल किशोर की पत्नी रेल के सफर में अचानक अपने साथ चल रहे पति को गायब देख कर और अपने को‌ अकेली पाकर रोने लगती है तो आस -पास की स्त्रियाँ उसके प्रति सहानुभूति जताती हैं और सहयात्री बंशीधर उन्हें सही ठिकाने पर पहुंचाने का दायित्व ओढ़‌ लेते हैं। लेकिन आज समय बदल गया है। आज की स्त्री ने बदलती हुई परिस्थितियों के मद्देनजर अपने- आपको ‌नये वातावरण और चुनौतियों के अनुरूप ढाल‌ लिया है और अकेली सफर पर अकुंठ भाव से निकल पड़ती हैं। यह बात और है कि आज भी स्त्रियों की एक बड़ी जमात अकेली सफर पर निकलने का साहस नहीं करती। निदा फ़ाज़ली ने अपनी ग़ज़ल में सफर की मुश्किलों की ओर संकेत करते हुए भी ‌लोगों को सफर के लिए उत्साहित करते हुए लिखा-
“सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।”
लेकिन उन्हें भी कहाँ अहसास था कि यह धूप औरत के लिए और भी तीखी हो जाती है क्योंकि उसमें लोगों की दृष्टि का कौतूहल या अनकही लेकिन अत्यधिक चुभने वाली आलोचना भी शामिल हो जाती है शायद इसीलिए उसका सफर कर निकलना आम लोगों की तुलना में काफी मुश्किल होता है। लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद आज बहुत सी स्त्रियाँ अकेली सफर पर निकल रही हैं और जिंदगी को नये सिरे से देखने, समझने की कोशिश कर‌ रही हैं। वह अकेली अपने आप के साथ आनंद से समय बिताना भी सीख ही लेती है, तभी तो अनुराधा अनन्या अपनी कविता “एकांत” का सृजन करती हैं जिसमें एक औरत तमाम मुश्किलों के बावजूद अपने अकेलेपन का आनंद उठाती दिखाई देती है । सखियों, आप से भी अनुरोध है कि गाहे बगाहे अकेली सफर पर निकल पड़िए और अगर न भी निकल पाएं तो भी इसका सपना जरूर देखिए। साथ ही किसी भी लड़की या औरत को अकेली सफर करती देखकर उसे स्नेह और सराहना की दृष्टि से देखिए, आलोचना और तिरस्कार से नहीं। फिलहाल अनुराधा अनन्या की इस कविता का आनंद लीजिए –
” मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
ख़ुद के खोल से उधड़ती हुई
मन की गाँठें खोलती
अपने आपसे सुलझती हुई

अपने अकेले जंगल में
अपनी अकेली धरती पर
चलती
रुकती
दम भरती
अपनी धुन पर थिरकती हुई

इस जहाँ से दूर
किसी और जहाँ में
जो सिर्फ़ मेरा है
मैं जिसमें मैं हूँ
और मैं अपने साथ हूँ—अकेली—
अपने ही मन के आँगन में
बेपरवाह
बेलिबास
बेलिहाज़
अपने पूरे बदन के साथ—अकेली—
ख़ुद अपनी रूह में उतरती हुई
मैं अपने साथ हूँ—अकेली।”

नवरात्रि पर भी कुछ चटपटा हो जाये

फलाहारी टिकिया
सामग्री : 2 कटोरी साबूदाने (गले हुए), 4-5 उबले आलू , हरा धनिया, 2 हरी मिर्च, आधा चम्मच लाल मिर्च, थोड़ी-सी सौंफ, सेंधा नमक अपने स्वाद के अनुसार, 1 चम्मच जीरा, हरी चटनी, तेल (तलने के लिए)।


विधि : सर्वप्रथम भीगे हुए साबूदाने को मिक्सर में थोड़े-से पिस लें और आलू को छीलकर हाथ से मसल लें। फिर आलू में पिसे हुए साबूदाने मिलाकर नमक, बारीक कटी हरी मिर्च, लाल मिर्च पावडर, सौंफ, नमक, जीरा, हरा धनिया आदि सभी सामग्री मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। अब तैयार मिश्रण के एक जैसे आकार के गोले बनाकर रख लें। फिर हाथ पर थोड़ा-सा पानी लगाकर उसकी सहायता से गोल-गोल टिक्की बनाकर तेल में तल लें। तैयार चटपटी फलाहारी आलू-साबूदाना टिकिया को हरी चटनी अथवा दही के साथ परोसें।

चटपटा साबूदाना बड़ा
सामग्री : 1/2 कप साबूदाना, 150 ग्राम पनीर, 1 छोटा चम्मच कुट्टू का आटा, 1 बड़ा चम्मच काजू, 2 साबुत लाल मिर्च, 2-3 हरी मिर्च, थोड़ा सा हरा धनिया, सेंधा नमक स्वादानुसार, तलने के लिए तेल।

विधि : सबसे पहले साबूदाने को 2-3 बार धोकर पानी में थोड़ी देर रखें, फिर पानी निथारकर 1-2 घंटे के लिए भिगो कर रख दें। हरा धनिया, हरी मिर्च बारीक काट लें। लाल मिर्च, काजू के टुकड़े करें और पनीर मैश कर लें। भीगे साबूदाने में लाल मिर्च, काजू के टुकड़े, मैश किया हुआ पनीर, सेंधा नमक, हरा धनिया, हरी मिर्च और कुट्टु का आटा, सभी सामग्री अच्छी तरह मिलाएं। अब मिश्रण को मनचाहा आकार अथवा बड़े का आकार दे कर बना लें। एक कड़ाही में तेल गरम करके बड़े को कुरकुरे होने तक तल लें। इसी तरह सभी बड़े बना लें। अब तैयार चटपटा साबूदाना बड़ा हरी चटनी या रायते के साथ गरमा-गरम परोसें।

जानिए नवरात्रि का महत्व

हर नवरात्र के पीछे का एक वैज्ञानिक आधार है। पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा काल में एक साल की चार संधियां होती हैं। जिनमें से मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में साल के दो मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है।
ऋतु संधियों में अक्सर शारीरिक बीमारियां बढ़ती हैं। अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुद्ध रखने के लिए, तन-मन को निर्मल रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम ‘नवरात्र’ है।
अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम के अनुसार चलने से नौ रात यानी ‘नवरात्र’ नाम सार्थक है। चूंकि यहां रात गिनते हैं इसलिए इसे नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।
रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है और, इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है।
मुख्य इन्द्रियों में अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में एवं शरीर तंत्र को पूरे साल के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुद्धि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन, नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।
हालांकि शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, सफाई या शुद्धि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर 6 माह के अंतर से सफाई अभियान चलाया जाता है जिसमें सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुद्धि, साफ-सुथरे शरीर में शुद्ध बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुद्ध होता है, क्योंकि स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।चैत्र और आश्विन नवरात्रि ही मुख्य माने जाते हैं इनमें भी देवी भक्त आश्विन नवरात्रि का बहुत महत्व है। इनको यथाक्रम वासंती और शारदीय नवरात्र कहते हैं। इनका आरंभ चैत्र और आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को होता है। ये प्रतिपदा ‘सम्मुखी’ शुभ होती है।

नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। जिसमे चैत्र और आश्विन की नवरात्रियों का विशेष महत्व है। चैत्र नवरात्रि से हीजाती है विक्रम संवत की शुरुआत होती है। इन दिनों प्रकृति से एक विशेष तरह की शक्ति निकलती है। इस शक्ति को ग्रहण करने के लिए इन दिनों में शक्ति पूजा या नवदुर्गा की पूजा का विधान है। इसमें मां की नौ शक्तियों की पूजा अलग-अलग दिन की । पहले दिन मां के शैलपुत्री स्वरुप की उपासना की जाती है। इस दिन से कई लोग नौ दिनों या दो दिन का उपवास रखते हैं।

(साभार – वेब दुनिया)

हिन्दू नववर्ष पर ‘राष्ट्रीय कवि संगम’ पश्चिम बंगाल का कवि सम्मेलन

कोलकाता : “असली नया वर्ष अपना यही है/ पश्चिम का करना नकल क्या सही है।” राष्ट्रीय कवि संगम, पश्चिम बंगाल इकाई द्वारा हिन्दू नववर्ष के पावन अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया,जिसकी अध्यक्षता प्रांतीय अध्यक्ष डॉ.गिरिधर राय ने की। यह कार्यक्रम गूगल मीट डिजिटल पटल पर आयोजित हुआ। इस गोष्ठी में कोलकाता के गणमान्य डॉ. गिरिधर राय (अध्यक्ष, पश्चिम बंगाल), आर पी सिंह (महामंत्री, पश्चिम बंगाल) तथा बलवंत सिंह (मंत्री,पश्चिम बंगाल) की उपस्थिति में मीना शर्मा (अध्यक्ष, दक्षिण 24 परगना) के स्वागत भाषण से कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ। रीमा पाण्डेय ने सरस्वती वंदना का गायन प्रस्तुत किया। कवि सम्मेलन में गिरिधर राय ने अपनी नयी कविता हिन्दू नववर्ष के कुछ छंद सुनाये- -‘असली नया वर्ष अपना यही है/ पश्चिम का करना नकल क्या सही है’ , रामपुकार सिंह पुकार गाजीपुरी ने कहा- ‘जिये इक दूसरे खातिर सही संस्कार आ जाये/सफल नव वर्ष हो सबका उचित व्यवहार आ जाये’। गोष्ठी में शामिल अन्य कवि थे-रीमा पाण्डेय, जय प्रकाश पाण्डेय, रमाकांत सिन्हा, सुषमा राय पटेल, सीमा सिंह, देवेश मिश्र, निखिता पाण्डेय और अभिषेक पाण्डेय ने अपनी-अपनी स्वरचित कविता से नये वर्ष को नये रंग में ऐसा रंगा कि सभी श्रोतागण काव्य रस में सराबोर होकर झूम उठे।
कार्यक्रम का संचालन युवा रचनाकार निखिता पाण्डेय और अभिषेक पाण्डेय ने किया। पश्चिम बंगाल के प्रांतीय अध्यक्ष श्री गिरिधर राय ने अपनी उपस्थिति के साथ सभी का उत्साहवर्द्धन किया और अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए नए वर्ष की शुभकामनाएं दी तथा प्रांतीय मंत्री बलवंत सिंह ने युवा रचनाकारों से जुड़ी संभावनाओं को प्रोत्साहित किया। पश्चिम बंगाल के महामंत्री राम पुकार सिंह ने अपनी आशावादी कविता के माध्यम से इस विकट परिस्थिति से स्वयं को सुरक्षित रखने की सलाह दी और नववर्ष के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रांतीय मंत्री बलवंत सिंह गौतम ने सभी कवियों, अतिथियों और श्रोताओं को अपना अमूल्य समय देकर कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु हार्दिक धन्यवाद दिया।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में फोटोग्राफी प्रतिस्पर्द्धा

 कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में ऑनलाइन फोटोग्राफी प्रतिस्पर्द्धा में पचास विद्यार्थियों ने रजिस्ट्रेशन करवाया और अपनी फोटोग्राफी के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। फोटोग्राफी के इस प्रतिस्पर्धा की थीम स्प्रिंग यानी वसंत पर आधारित रही।

अलका सिंह (द्वितीय)

रिथिक संथालिया प्रथम, अलका सिंह द्वितीय, आदित्य चटर्जी तृतीय स्थान और विशेष स्थान पर मयंक बिदानी रहे। फोटोग्राफी में कॅरियर बनाने के लिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण जरिया है।

आदित्य चटर्जी (तृतीय)

फोटो खींचने के लिए विशिष्ट दृष्टि के साथ खींचने की कला के विभिन्न क्षेत्रों का ज्ञान होना भी जरूरी है।इस कार्यक्रम में निर्णायक के रूप में राजश्री दास रहे जो एक जाने माने फोटोग्राफर हैं।

 

कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने फोटोग्राफी को बढ़ावा देने के लिए विद्यार्थियों को फोटोग्राफी के लिए प्रोत्साहित किया।इस कार्यक्रम का संयोजन शोभिक दास ने किया। प्रो दिव्या ओडसी, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी और गौरव किल्ला ने कार्यक्रम को आकार दिया। डॉ वसुंधरा मिश्र ने कार्यक्रम की जानकारी दी ।

दि इकोनॉमिक टाइम्स ने भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज को दिया अवार्ड

कोलकाता :  इकोनॉमिक टाइम्स ने भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज को तीसरी बार प्रेस्टिजियस अवार्ड प्रदान किया। यह अवार्ड संपूर्ण देश के शैक्षणिक संस्थानों और गैर शैक्षणिक संस्थानों को दिया जाता है। भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता को यह तीसरी बार प्रेस्टिजियस अवार्ड प्रदान किया गया है जो बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रोत्साहन से पूर्ण है। इस अवसर पर डीन प्रो दिलीप शाह ने इकोनॉमिक टाइम्स को धन्यवाद देते हुए कहा कि भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की छोटे-छोटे महत्वपूर्ण कार्यों को इकोनॉमिक टाइम्स की टीम ने गौर किया है यह अवार्ड उसी का परिणाम है।कॉलेज में होने वाले अट्ठारह से अधिक कलेक्टिव और कॅरियर विषयक विभिन्न विषयों पर वेबिनार, सामाजिक कार्यों के लिए एन एस एस आदि विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग, साथ ही “प्रतिध्वनि “द्वारा नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए ऑडियो  बनाये गये हैं जो समाज के लिए महत्वपूर्ण भूमिका है।
एक अन्य कार्यक्रम में प्रो. दिलीप शाह ने बताया कि प्लेसमेंट ड्राइव के अंतर्गत कॉलेज में हर वर्ष कई प्रसिद्ध कंपनियां आकर विद्यार्थियों का प्लेसमेंट करती हैं। इस वर्ष भी कोरोना के नियमों का पालन करते हुए प्लेसमेंट हुए हैं। तिरसठ विद्यार्थियों ने प्लेसमेंट के लिए पंजीकरण करवाया।  जिसमें एडोर इंडिया, रिवर्स फेक्टर, फ्रुटर्स, यूरोडाइट, सिमको कंसल्टेंसी जैसी पांच कंपनियों ने कुल मिलाकर छब्बीस विद्यार्थियों  को प्लेसमेंट दिया। इस कार्यक्रम का आयोजन प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी ने किया। हमारे विद्यार्थियों को इकोनॉमिक टाइम्स ने प्रेस्टिजियस अवार्ड प्रदान कर कॉलेज को प्रोत्साहित किया है।