Thursday, April 2, 2026
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भारतीय भाषा परिषद का संस्थापक दिवस कार्यक्रम संपन्न

कोलकाता :  भारतीय भाषा परिषद का संस्थापक दिवस गत 1 मई को ऑन-लाइन जूम पर मनाया गया| भारतीय भाषा परिषद के संस्थापक सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोड़िया के भाषा और शिक्षा प्रेम और उसके लिए उनके सद्प्रयासों की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया| परिषद के प्रांगण में सचिव डॉ. केयूर मजमुदार एवं वित्तीय सचिव घनश्याम सुगला ने माल्यार्पण किया| परिषद की अध्यक्ष डॉ कुसुम खेमानी ने कहा कि सीताराम जी यदि कल्पना थे तो भागीरथ जी उनके मूर्त रूप थे, एक दूसरे के पूरक थे| चौबीस साल की अवस्था से ही सीताराम जी सामाजिक कार्यों से जुड गए थे और दोनों ने मिलकर समाज की उन्नति के लिए शिक्षा संबंधित बहुत से ऐतिहासिक कार्य जैसे मारवाड़ी बालिका विद्यालय की स्थापना और कई संस्थाओं से जुड़े हुए थे| ८८ वर्ष की आयु में भारतीय भाषाओं की समृध्दि के लिए भारतीय भाषा परिषद की स्थापना की| उन्होंने केवल हिंदी ही नहीं सभी भाषाओं के उन्नयन पर ध्यान दिया | इस कार्यक्रम के तहत पहले सत्र में ‘परिषद की वार्ता और यात्रा’ एवं ‘कल आज और कल’ पर विशेष रूप से प्रतिभा अग्रवाल, डॉ. कुसुम खेमानी, डॉ. शंभुनाथ, ईश्‍वरी प्रसाद टांटिया, बिमला पोद्दार एवं रतनलाल शाह ने अपना विचार प्रकट किया|
परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने बताया कि परिषद का अतीत गौरवशाली रहा है और यहां से बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं| कोरोना काल के दौरान यहां से निकलने वाली पत्रिका वागर्थ अब ई – पत्रिका के रूप में निकल रही है| विश्वंभर दयाल सुरेका जी की सेवाओं के कारण ज्ञान कोष के आठ खंडों का प्रकाशन हुआ जो पचास वर्षों में किसी भी गैर सरकारी संस्था के लिए उल्लेखनीय है| भारतीय भाषा परिषद संस्था भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम और उत्कृष्ट योगदान का प्रतीक है| वहीं राजस्थानी भाषा के पक्षधर रतन लाल शाह ने कहा कि सीताराम सेकसरिया और भागीरथ कानोडिया  जैसे महापुरुषों पर अधिक से अधिक शोधपरक अध्ययन होना चाहिए जिससे युवा पीढ़ी भी प्रेरित हो सके| लंबे समय से जुड़ी डॉ प्रतिभा अग्रवाल ने अस्वस्थता के बावज़ूद ऑडियो द्वारा परिषद को अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं| ईश्वर बाबू जी और काको जी के संरक्षण में बचपन से ही देखती आ रही विमला पोद्दार परिषद से शुरू से जुड़ी रहीं| परिषद के वरिष्ठ ट्रस्टी सदस्य ईश्वरी प्रसाद टांटिया ने शुभकामनाएँ प्रेषित की| कार्यक्रम के प्रथम भाग ‘परिषद की यात्रा और वार्ता कल आज और कल’ के अंतर्गत वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अपने वक्तव्य रखे|
दूसरे सत्र के प्रारंभ में ‘वर्तमान संदर्भ में संस्कृति और साहित्य’ पर सचिव डॉ. केयूर मजमुदार ने जानकारी दी कि भविष्य में डिजिटल पटल पर भी एक साहित्यकार की खोज शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थान के साझा तत्वावधान में विद्यार्थियों के बीच में युवा प्रतिभाओं को कविता, कृति नाट्‌य, कला व्यंग्य और कहानियॉं की विधा पर विश्‍वव्यापी प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी|
द्वितीय भाग ‘वर्तमान संदर्भ में संस्कृति और साहित्य’ विषय पर वागर्थ वेब की निदेशक डॉ वसुंधरा मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि कोरोना महामारी काल में किस तरह का साहित्य जन्म लेगा यह आने वाला भविष्य तय करेगा| यह मृत्यु से युद्ध का समय है| साहित्य और संस्कृति मनुष्य की भावना से अन्तर्संबंधित है| इस विषय पर इस समय भी लिखा जा रहा है और आगे आने वाले समय में भी लिखा जाएगा क्योंकि यह इस युग की एक महान घटना है| डॉ संजय जायसवाल,  परिषद के स्थापना दिवस पर विचार रखे। मधु सिंह ने कोरोना महामारी के दौरान उम्मीद लिख रही हूँ कविता सुनायी। कोलकाता रंगमंच के लोकप्रिय अभिनेता अजहर आलम के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| पूजा सिंह ने कुंवर बैचेन जी कविता पाठ द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की और अपनी कविता की प्रस्तुति दी| वहीं आनंद गुप्ता ने समसामयिक भयावह महामारी में ‘उम्मीद’ कविता सुनाई| रावेल पुष्प ने अजहर आलम की स्मृति में बहुत ही मार्मिक कविता सुनाई| व्यंगकार नुपूर अशोक ने दो कविताएँ सुनाई| कविता ‘गेम का प्लान’ में किए व्यंग को बहुत पसंद किया गया| डॉ राजश्री शुक्ला ने परिषद को बधाई दी| विनोद कुमार ने रमेश उपाध्याय के व्यक्तित्व और कृतित्व की चर्चा करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की|कोरोना काल में असमय मृत्यु प्राप्त रमेश उपाध्याय, अजहर आलम, मंजूर एहतेशाम, अरविंद कुमार, अमिता शाह, विमल लाठ और कुंवर बैचेन जैसे साहित्य और रंगमंच की प्रमुख हस्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई| इस अवसर पर परिषद की ओर से आने वाले कार्यक्रम ‘एक साहित्यकार की खोज’ के विषय में डॉ केयुर मजमूदार और डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी दी जिसमें युवा पीढ़ी की विविध साहित्यिक- सांस्कृतिक प्रतिभाओं को स्थान दिया जाएगा और परिषद के मंच पर उनको चयनित कर विभिन्न कॉर्पोरेट जगत के सहयोग से उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा| यह प्रतियोगिता स्कूल – कॉलेज और राष्ट्रीय स्तर पर फाइनल आकार लेगी| वागर्थ वेब युवाओं और प्रबुद्ध प्रतिभाओं का डिजिटल पटल है जो भारतीय भाषा परिषद की ही इकाई है| समग्र कार्यक्रम का सुचारू संचालन परिषद के भारतीय भाषा परिषद के सचिव डॉ. केयूर मजमुदार ने किया| इस कार्यक्रम के आयोजन में कार्यकारिणी सदस्य अमित मूंधड़ा का डिजीटल पटल पर विशेष सहयोग रहा।

यह समय भी निकल जाएगा, बस साहस रखने की जरूरत है

प्रो. गीता दूबे

सखियों, बेहद मुश्किल समय है। मिल जुलकर रहना है और एक साथ मिलकर इस महामारी का सामना करना है। फिलहाल तमाम तरह की आशंकाओं से आम आदमी त्रस्त है। महामारी से संक्रमित होने की आशंका के साथ चिकित्सा व्यवस्था की अव्यवस्था ने आम और खास सभी को हिलाकर रख दिया है। इसी के साथ जिस सबसे बड़ी आशंका से आज मानव जाति त्रस्त है, वह है मृत्यु का भय। हालांकि जीवन के यथार्थ के साथ ही मृत्यु की सच्चाई भी जुड़ी हुई है। इस नश्वर संसार में सब कुछ मरणशील है, एक न एक दिन हर जीव को मृत्यु को स्वीकार करना है, वह चाहे या न चाहे। हमारे दार्शनिकों और साहित्यकारों ने इस शाश्र्वत सत्य की ओर‌ बार-बार संकेत किया है। बाबा तुलसी तो बड़ी तटस्थता के साथ कहते ही हैं –

“धरा को प्रमाण यही तुलसी जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना।”

लेकिन इसके बावजूद मनुष्य को अगर लगता है कि वह सर्वशक्तिमान है और येन केन प्रकारेण मृत्यु को परास्त कर सकता है तो‌ यह उसका अहंकार ही है और शायद इसी कारण कबीर जैसे सजग और विद्रोही कवि मानव मात्र को चेतावनी देते हुए कहते हैं –

“मालिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार ।

फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार ।”

अर्थात मनुष्य को याद रखना चाहिए कि मृत्यु तो अवश्यंभावी है और यह कभी टल नहीं सकती। इसीलिए मनुष्य को हमेशा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अपने मानवीय धर्म का पालन करना चाहिए। लेकिन इसकी अनिवार्यता को जानते हुए भी हम अमरत्व की आकांक्षा करते हैं और इसके लिए तरह तरह की कोशिश भी करते हैं। इसके पीछे हमारा वही मृत्यु भय काम करता है और हम इससे प्रतिक्षण त्रस्त रहते हैं। इसी की ओर संकेत करते हुए गालिब ने लिखा है-

“मौत का एक दिन मुअय्यन है 

नींद क्यूँ रात भर नहीं आती।।”

यह स्थिति हर‌ आदमी की है। बिरला ही कोई होगा जो इस मृत्यु भय से पीड़ित न हो। बड़े -बड़े संत महात्मा भी इस मृत्यु भय पर विजय हासिल करने के लिए कठिन साधना और तपस्या करते हैं। और साधारण व्यक्ति कभी दर्शन तो कभी आध्यात्मिकता में डूबकर इससे निजात पाने की कोशिश करता है।

यह बात भी काबिले गौर है कि कुछ लोगों के लिए जिंदगी मौत से ज्यादा मुश्किल और चुनौतीपूर्ण हैती है, तभी तो फ़िराक़ गोरखपुरी लिखते हैं-

“मौत का भी इलाज हो शायद 

ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं ।”

कुछ इसी तरह का फलसफा  नज़ीर सिद्दिकी साहब भी बयान करते हैं-

“जो लोग मौत को ज़ालिम क़रार देते हैं 

ख़ुदा मिलाए उन्हें ज़िंदगी के मारों से ।।”

कुछ लोग मौत से घबराते हैं तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जो मौत को गले लगाने के लिए बेताब रहते हैं। ये दोनों ही स्थितियां और प्रवृत्तियां घातक मानी जाती हैं। मृत्यु भय जहाँ मनुष्य को बेचैनी से भर कर कई बार मृत्यु के पहले मृत्यु के दरवाजे की ओर ढकेल देता है वहीं आत्महत्या की प्रवृत्ति समाज के लिए घातक तो है ही और एक संक्रामक रोग की तरह फैलती है। अतः सखियों, जीवन को सहज रूप में स्वीकार करना चाहिए और मौत को एक हव्वे की तरह न‌ देखकर उसे भी स्वाभाविक रूप से ग्रहण चाहिए क्योंकि मौत तो अपने तय समय पर आएगी ही। मौत से पहले मौत के डर से मर जाना तो किसी तरह भी सही नहीं है। दोनों सत्य जिंदगी के दो सिरे हैं और उन्हें आपस में जुड़ना ही है। या फिर यह भी कह सकते हैं कि जीवन के साथ जो यात्रा शुरू होती है वह मृत्यु के साथ पूरी तो होती ही है और वहीं से एक नयी यात्रा की शुरुआत भी होती है जिसे गीता में बहुत सहजता के साथ व्याख्यायित किया गया है और कवियों ने भी अपने तरीके से उसी तथ्य को स्पष्ट किया है। चकबस्त ब्रिज नारायण जिंदगी और मौत के फलसफे को अपने अंदाज में बड़ी खूबसूरती से बयां करते हुए कहते हैं-

ज़िंदगी क्या है अनासिर में ज़ुहूर-ए-तरतीब 

मौत क्या है इन्हीं अज्ज़ा का परेशाँ होना ।।”

और अहमद नदीम क़ासमी बड़े साहस से मौत की हकीकत को स्वीकार करते हुए कहते हैं-

“कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा 

मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा ।।”

इसी तरह रामनरेश त्रिपाठी भी मृत्यु को जीवन का अंत नहीं बल्कि एक नयी शुरुआत मानते हुए  निर्भय होकर मृत्यु का स्वागत करने की बात कहते हैं-

“मृत्यु एक सरिता है जिसमें,

श्रम से कातर जीव नहाकर।

फिर नूतन धारण करता है,

कायारूपी वस्त्र बहाकर।”

सखियों, इन तमाम फलसफों के बावजूद मृत्यु से पीड़ा तो होती ही है और मृत व्यक्ति से हमारा संबंध जितना गहरा होता है, पीड़ा की गहराई भी उतनी ही ज्यादा होती है। कई बार लोग लंबी उम्र पाकर दिवंगत होते हैं और तब शोक के बावजूद इसे मोक्षप्राप्ति या मुक्ति की तरह देखते हुए मृत्यु संस्कारों का पालन उत्सव की तरह धूमधाम से किया जाता है। लेकिन असामयिक मृत्यु तो तकलीफदेह होती ही है, वह किसी अपने की हो या पराये की। वर्तमान परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु की विभीषिका किसी सुनामी की तरह हर उम्र के लोगों को निगल रही है जो निसंदेह दुखदाई है। कुछ मौतों का कारण बीमारी है तो कुछ का गरीबी या फिर चिकित्सा व्यवस्था का धराशाई होना। कारण जो भी हो, दुख और तकलीफ का शिकार हर‌ दूसरा व्यक्ति हो रहा है। 

सखियों, इतना ही कहूंगी कि इस समय हमें धैर्य नहीं खोना है। यह समय भी निकल जाएगा और एक बार फिर से हम सामान्य स्थितियों की ओर लौटेंगे। ज़रूरत है, साहस के साथ इस आपदा का सामना करने की। स्त्रियों में जो जन्मजात जुझारूपन और संघर्ष शक्ति होती है, उसकी आज पूरे समाज को बहुत जरूरत है। बस हिम्मत बनाए रखें। कवि शैलेन्द्र के एक गीत की पंक्तियां बरबस याद आ रही हैं, जिन्हें आप के साथ साझा करना चाहती हूं-

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,

ये दिन भी जाएंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन।”

 

सृजन के सामने यह प्रलय भी पराजित होगा

यह ऐसा समय है जिसे आधुनिक समाज ने देखा न था..कल्पना नहीं की थी…हर ओर त्रासदी है…कोरोना की दूसरी लहर के कारण पूरी दुनिया में हाहाकार मचा है…। परम्परागत मीडिया से लेकर सोशल मीडिया…हर जगह स्थिति यही है…हालात कठिन हैं…ऑक्सीजन और दवाओं की कमी से परेशान हैं सब…हम मानते हैं कि यह समय कठिन है…कालाबाजारी हो रही है पर क्या आपने ध्यान दिया कि इस समय आलोचनाओं के बीच लोग एक दूसरे की मदद कर रहे हैं,….जिसकी जितनी क्षमता है…वह मदद को आगे आ रहा है….दुनिया में अच्छे और बुरे लोग थे, हैं और रहेंगे….मगर इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अच्छे लोग और अच्छाई है….क्या यह हमारे लिए सुकून वाली बात नहीं है….?
बड़े कहते हैं कि जीवन में तूफान आए तो उसे गुजर जाने देना चाहिए….क्योंकि तूफान कैसा भी हो…स्थायी नहीं होता…..कोरोना संकट भी स्थायी नहीं है, भले ही यह तूफान हो या सुनामी ही क्यों न हो,…खुद ईश्वर को भी यह सृष्टि चलानी है क्योंकि यह सृष्टि हमारे ही नहीं बल्कि उनके अस्तित्व की परिचायक है….विश्वास रखिए…..कोरोना संक्रमित होने पर भी पर भी सकारात्मक सोच, किताबें, संगीत, सांस से जुड़े व्यायाम, गर्म पानी, भाप…दोस्तों से गप… और सबसे अधिक उस ईश्वर पर विश्वास…..आपकी रक्षा करेगा…..कोरोना से अधिक कोरोना का भय लोगों को परेशान कर रहा है…कोरोना तो है ही….महामारी और संकट के बीच है….फिर भी कहती हूँ प्रलय के महाजाल पर सृजन का बीज भारी है…।
अपनी कमान उसके हाथ में दीजिए …..अपने जीवन के रथ का सारथी उसे बनाइए…फिर वही आपकी रक्षा का भार लेगा और सही कर्म का रास्ता दिखाएगा….जीवन में एक अच्छी रुचि का होना बहुत आवश्यक है…कुछ न हो तो यू ट्यूब पर डीआईवी देखकर चीजें बनाइए…आपको पता ही नहीं चलेगा कि समय कितनी जल्दी समय बीत रहा है….हर सुबह नयी उम्मीद लेकर आती है…और हर रात के बाद सुबह होती है…यह सुबह भी जरूर होगी और सृजन के सामने यह प्रलय भी पराजित होगा।

 

मजदूर का श्रम…

-प्रीति साव

मजदूर अपना श्रम बेचता है,
मजदूर किसी भी क्षेत्र में
परिश्रम करता है,

मजदूर अपने घर परिवार का
दो वक्त रोटी के लिए ईंटें ढोता है,
वह सड़कों, पुलों, भवनों के निर्माण में
अपना भरपूर योगदान देता है ।

वह मजदूर जो कड़कती धूप में भी
नंगे पाँव कुछ दो पैसे लाने के लिए
निकल पड़ता ,
तालाब, कुओं, नहरों और
झीलों के निर्माण में भी
वह कठिन परिश्रम करता।

रिक्शाचालक, कर्मचारी,
बढ़ई, लोहार,हस्तशिल्पी,
दर्जी और पशुपालन
वास्तव में ये सब
मजदूर ही है,
जो हर क्षेत्र में योगदान दें रहें है।

तब भी एक वह वर्ग
जो पूंजीपति है,
वह मजदूरों पर कितना अत्याचार और
शोषण करता है,
फिर भी वह सह लेते है ।

एक वह मजदूर जो
एक छोटे से घर में भी अपना
जीवन यापन सुख से कर लेते हैं ,
केवल छोटे घरों में ही नहीं,
वह फुटपाथों पर भी रह लेते है ।

फिर भी इनके दर्द को समझने वाला
कोई नहीं होता,

कौन समझे इस मजदूर के दर्द को
कौन जाने इस मजदूर के श्रम को ।।

भवानीपुर कॉलेज के स्नातक सम्मान समारोह 2020 में एक हजार विद्यार्थी सम्मानित

कोलकाता :  भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में ग्रेजुएट के प्रथम श्रेणी प्राप्त एक हजार विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया जिसने सभी पिछले रिकार्ड तोड़ दिए। गत सात वर्षों से यह कार्यक्रम कला मंदिर और जी डी बिरला अॉडिटोरियम जैसे बड़े सभागारों में होता था और विद्यार्थियों के अभिभावकों को भी आमंत्रित किया जाता था। गत वर्ष 300 विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया था। इस वर्ष 1000 विद्यार्थियों को कॉलेज के नवनिर्मित कॉन्सेप्ट हॉल में दस सत्रों पमें विभाजित कर डिग्री और प्रमाणपत्र दिए गए जो एक रिकार्ड है। कोविड काल में पूरी तरह से सावधानी के साथ कॉलेज मैनेजमेंट ने सीटों की व्यवस्था एवं मास्क सेनेटाइजैशन आदि पर पूरी तरह ध्यान देते हुए किया ।
कॉमर्स विभाग के सर्वोच्च अंक प्राप्त क्रमशः शिवम दीक्षित, काशीनाथ महापात्र, प्राची बजाज, मैत्री चटर्जी और कौशल सिंह, आर्ट्स विभाग के सर्वोच्च अंक प्राप्त क्रमशः स्वरूप सरकार, दृष्टि साहा, नीना घोष, सुतीर्थ राय, रीथिका चक्रवर्ती,
साइंस विभाग से सौमाल्य प्रकाश, अभिषेक अधिकारी, निशिता रहमानी, मृगांक अग्रवाल, मौप्रिया मुखर्जी, नफीसा सिद्दीकी, बीबीए से युनिवर्सिटी रैंक होल्डर्स मुदित डागा, विनीता अध्यालका, कुनाल डागा, रिथिका लुनिया, तुषार वेणुगोपाल रहे। इस अवसर पर कॉमर्स विभाग के 690,मैनेजमेंट विभाग के 108,साइंस विभाग के 108,बीबीए के 92 विद्यार्थियों को ग्रेजुएट की डिग्री और प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।
रेणुका भट्ट, जोगेश साहा, टीआईसी डॉ. शुभब्रत गंगोपाध्याय और कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम के प्रथम सत्र ग्रेजुएशन सम्मान समारोह 2020 का उद्घाटन किया। प्रो दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कॉलेज से उनके रिश्ते सदैव रहेंगे, यह विदाई नहीं है बल्कि अब आपको समाज के एक बड़े वर्ग से जुड़ने का समय है। प्रो शाह ने गुजराती शब्द “आऊजू” द्वारा उन्हें शुभकामनाएं दीं जिसका अर्थ है फिर आना।
दूसरे सत्र में कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. सुमन मुखर्जी, अमिता पटेल आदि विशिष्ट व्यक्तित्व उपस्थित रहे जिन्होंने सभी विद्यार्थियों को सम्मानित किया। इस सत्र में शुभलक्ष्मी की टीम ने रवींद्र संगीत की सुमधुर प्रस्तुति दी। डॉ सुमन ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस संसार में सभी पूर्ण नहीं होते जो कठिन परिश्रम करते हैं वे अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं।
तीसरे सत्र में प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, नलिनी पारेख और दी इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट के चैयरमैन सुनील गोयल बतौर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
चौथे सत्र में प्रमुख अतिथि विंग कमांडर विष्णु शर्मा ने अपने प्रेरक अपने पायलट बनने के सपने को पूरा करने के लिए किन किन संघर्षों का सामना करना पड़ा और फिर सपना साकार हुआ, अपने विचारों को विद्यार्थियों से साझा किया।
पांचवें सत्र में प्रमुख अतिथि इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरी ईस्टर्न रीजन के प्रमुख सुधीर भरतिया ने अपने विद्यार्थी काल के अनुभवों को साझा किया। उन्होंने वेबसीरीज स्कैम 1992 का भी जिक्र किया। छठें सत्र में एबीपी ग्रुप के डायरेक्टर शास्वत चक्रवर्ती और लोकप्रिय रेडियो जॉकी जिम्मी टेंगरी प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के कॉमर्स विभाग के डीन प्रो सिद्धार्थ शंकर साहा ने अपने वक्तव्य में वर्तमान समय में मैनेजमेंट का महत्व और उसके व्यापक आयामों की चर्चा की और हार्दिक शुभकामनाएं दीं। प्रथम पांच उच्चतम अंक प्राप्त विद्यार्थियों को सम्मानित किया। सुचैता मुंशी साहा, सुपर्णा मुखर्जी, सोमी चटर्जी की टीम ने लोक नृत्य एवं ओडिसी आदि नृत्य प्रदर्शन प्रस्तुति दी।  खुशाली गांधी ने अंग्रेजी में कार्यक्रम की रिपोर्ट लिखी और संचालन दीप्ति पंचारिया और हर्ष दवे ने किया। कार्यक्रम में गांधी जी के प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए जी पीर पराई जाने रे की धुन से सभागार गूंजता रहा। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

हमें हर हाल में इस खूबसूरत दुनिया को बंजर बनने से रोकना है

प्रो. गीता दूबे

चारों ओर लाशों के ढेर हैं, कब्रिस्तानों और‌ श्मसान  घाटों के आगे कतारों में लोग खड़े हैं। हमारे आदरणीय नेता गण चुनावों की रैलियों में व्यस्त हैं। शेरों की तरह दहाड़ रहे हैं और‌ आम जनता के कलेजे खौफ से काँप रहे हैं। ऐसे भयावह वातावरण में कैसे आपका हाल पूछूं, सखियों। कैसे आपको राम -राम और प्रणाम कहूँ। आप भी जानती हैं कि शोक के समय प्रणाम पाती बंद हो जाती है। लोग आपस में दुआ -सलाम नहीं करते। आज तो घर- घर में शोक का गहरा साया छाया हुआ है। लोग डरते -डरते एक दूसरे का हाल पूछते हैं। कई बार हाल पूछते भी डर लगता है कि न जाने कहाँ से कौन सा दुसंवाद सुनने को मिल जाए। 

सखियों, इस समय पूरा देश हैरान परेशान है। हर घड़ी सीने में धुकधुकी लगी रहती है। नींद नहीं आती है और नींद आ भी जाए तो खौफनाक सपनों से सामना होता है। हर ओर हाय- हाय करते, रोते चीखते लोग दिखाई देते हैं। किसी हाल नींद आ जाए तो आंखें खोलते डर लगता है कि न जाने कौन सा बुरा समाचार हमारे जागने की प्रतीक्षा में हो। 

ऐसा नहीं सखियों कि हमारा देश और पूरी दुनिया पहली बार किसी महामारी का सामना कर रही है। इसके पहले भी महामारियों के खौफनाक आक्रमणों को हम झेल चुके हैं और विध्वंस के गवाह भी रहे हैं। लेकिन फर्क सिर्फ इतना ही है कि वह मंजर हमने इतिहास की किताबों में पढ़ा है और आज हम इस महामारी के घावों को अपने सीने पर झेल रहे हैं। अपनी आँखों के सामने अपने लोगों को दवा, इंजेक्शन, ऑक्सीजन और अस्पतालों के अभाव में दम तोड़ते देख रहे हैं। और ठीक इस भयावह समय में जब लोगों को लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए कुछ अवसरवादी बेहया लोग हर चीज का व्यापार करने में लगे हुए हैं। दवाइयों की जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है, वह भी खुलेआम। लगता है, सरकारी अमले और कानून के रक्षक एक लंबी छुट्टी पर हैं और उनके कानों तक जनता की चीख-पुकार नहीं पहुँचती और अगर पहुँच भी जाती है तो वे उसे बड़ी बेहयाई से नजरंदाज कर देते हैं। कहीं तोहमतों का बाजार गर्म है। सियासतदानों के बीच एक दूसरे पर कीचड़ उछालकर जनता को भरमाने और अपना स्वार्थ साधने का घृणित खेल चल रहा है। कभी- कभी लगता है कि जनता की जान क्या इतनी सस्ती हो गई है कि उसकी याद नेताओं को सिर्फ चुनावों के समय आती है, बाकी वह मरे या जीए इससे किसी को कोई मतलब नहीं। देश के मौजूदा हालात को देखते हुए ‌शायर दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां अनायास दिमाग में कौंध जाती हैं-

“इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ ।”

यह स्थिति किसी शहर की नहीं पूरे देश की है। इंसानियत की खिड़कियों के दरवाजे मजबूती से बंद हैं और सियासतदानों को सिर्फ अपनी -अपनी पड़ी है। ऐसे में आम जनता का हैरान परेशान होना लाजमी है।

सखियों, रोम के बारे में एक कहानी कही जाती है कि “जब रोम जल रहा था तो वहाँ का सम्राट नीरो बाँसुरी बजा रहा था।” लेकिन हमने इस कहानी से कुछ नहीं सीखा। हम तो इतिहास इसलिए पढ़ते हैं ताकि परीक्षा पास कर सकें। उससे सीख लेने की जहमत हम नहीं उठाते इसीलिए आज तकरीबन वही स्थिति हमारे देश की भी है। सारे देश में तबाही का आलम है। कुछ लोग करोना के कारण दम तोड़ रहे रहे हैं तो कुछ दवाओं की कमी से तो कुछ दहशत के कारण लेकिन हमारे देश में लोकतंत्र का महापर्व मनाया जा रहा है अर्थात चुनाव हो रहे हैं। चूंकि कहावत ही है कि “इश्क और जंग में सब कुछ जायज है” तो हमारे देश में चुनाव और जंग एक ही समझे जाते हैं और उसमें विजय हासिल करने के‌ लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है। यह जंग तो कोई न कोई जीत ही लेगा लेकिन मानवता के इतिहास में कितनों के नाम नीरो की शक्ल में दर्ज होंगे, यह तो थोड़ी भी समझदारी रखनेवाला आसानी से समझ सकता है। 

सखियों, आज के हालात को देखते हुए इतना ही कह सकती हूँ-

“हर ओर तबाही का मंजर तो देखिए

अवसरवादियों के हाथ में खंजर तो देखिए

लहूलुहान हो रही है इंसानियत भरे बाजार

नेताओं का हर हाल में कायम रहे बस राज 

लाशों के कारोबारियों की सूरत तो देखिए

इन नकली रहनुमाओं की गैरत तो देखिए।

 शर्मोहया सब बेचकर आए हैं नामुराद

 सुनेंगे भला कैसे मजलूमों की आवाज़,

आहों औ कराहों पर धरते नहीं हैं कान

उजले दिलों में फैलता बंजर तो देखिए।।”

सखियों, आज बस इतना ही कहूंगी कि अपना, अपने परिवार वालों का ध्यान तो रखिए ही, अपने और पराये का फर्क भुलाकर जितना भी हो पाए हर किसी की मदद करने की कोशिश कीजिए। मानवता को जीवित रखने की जिम्मेदारी अब आम लोगों के हाथ में है और हमें हर हाल में इस खूबसूरत दुनिया को बंजर बनने से रोकना है। हिम्मत बनाए रखिए और इस आपदा से लड़ने और इससे जीतने का हौसला कायम रखिए। हमने बहुत सी आपदाओं पर विजय हासिल की है। आज नहीं तो कल, यह जंग हम जीत ही लेंगे। बस इंसानियत पर भरोसा कायम रखिए। आज नहीं तो कल इन लाशों के कारोबारियों के तख्तोताज छिन जाएंगे या छीन लिए जाएंगे। उम्मीद है कि अगले हफ्ते तक हालात में कुछ बदलाव जरूर आएगा। तब तक अपना और बाकी सब का ध्यान रखिए।

 

युवाओं के हनुमान

शुभांगी उपाध्याय

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के सर्वोत्तम सेवक, सखा, सचिव और भक्त श्री हनुमान थे। प्रभु राम की भारतीय जनमानस में जिस प्रकार पूजा की जाती है, ठीक उसी प्रकार उनके प्रिय सेवक हनुमान जी की भी पूजा की जाती है। राम परिवार में ऐसा कोई नहीं है जिसका स्वयं का मंदिर हो। श्री हनुमान जी को रुद्रावतार भी मन जाता है। इनकी पूजा पूरे भारत और दुनिया के अनेक देशों में इतने अलग-अलग तरीकों से की जाती है कि इन्हें ‘जन देवता’ की संज्ञा दी जा सकती है।

गोस्वामी तुलसीदास जी तो श्री हनुमान के लिए कहते हैं :

“अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं, अनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। 

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।”

अर्थात अतुल बल के धाम, सोने के पर्वत के समान कांतियुक्त शरीर वाले, दैत्यरूपी वन के लिए अग्नि रूप, ज्ञानियों में अग्रगण्य, संपूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी, श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्री हनुमान अतुल बल के स्वामी थे। उनके अंग वज्र के समान शक्तिशाली थे। अत: उन्हें ‘वज्रांग’ नाम दिया गया, जो बोलचाल में बजरंग बन गया। यह बजरंग केवल गदाधारी महाबली ही नहीं हैं, बल्कि विलक्षण और बहुआयामी मानसिक और प्रखर बौद्धिक गुणों के अद्भुत धनी भी हैं। यदि कोई उनसे विश्राम की बात करता तो उनका उत्तर होता था- मैंने श्रम ही कहाँ किया, जो मैं विश्राम करूं? उनके चित्र व्यायामशालाओं में जिस भक्तिभाव के साथ लगाए जाते हैं, उतनी ही श्रद्धा के साथ प्रत्येक शिक्षा और सेवा संस्थान में भी लगाए जाने चाहिए।

छत्रपति शिवाजी महाराज के स्वराज्य निर्माण की विस्तृत लेकिन गहरी नींव रखने के लिए उनके गुरु समर्थ श्री रामदास द्वारा गाँवगाँव में अनगढ़े पत्थरों को सिन्दूर लगाकर श्री हनुमान के रूप में उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की गई। आज से 300 से ज्यादा वर्षों पहले यह महान राष्ट्रीय उपक्रम हुआ।

केवल भारत ही नहीं, सारे संसार के लिए किसी आदर्श व्यक्तित्व के चयन की समस्या आ जाए तो श्री हनुमान का जीवन निश्चित रूप से सर्वाधिक प्रेरक सिद्ध हो सकता है। वे राम-सेवा अर्थात सात्विक सेवा के शिखर पुरुष ही नहीं थे बल्कि अनंतआयामी व्यक्तित्व विकास के महाआकाश थे।

अखंड ब्रह्मचर्य और संयम की साधना से जो तेजस् और ओजस् उन्होंने अर्जित किया था, वह अवर्णनीय है। बालपन से ही वे सूर्य साधक बन गए थे। सूर्य को उन्होंने अपना गुरु स्वीकार किया था। उनकी दिनचर्या सूर्य की गति के साथ संचालित होती थी। आगे जाकर सौर-अध्ययन के कारण वे एक अच्छे खगोलविद् और ज्योतिषी भी बने।

 एक शिशु के रूप में वे ज्यादा ही चंचल तथा उधमी थे। किसी शिलाखंड पर गिरने से उनकी ठुड्डी (हनु) कट गई गई थी, जिससे उनका हनुमान नाम पड़ गया। एक जैन मान्यता के अनुसार वे एक ऐसी जाति और वंश में पैदा हुए थे जिसके ध्वज में वानर की आकृति बनी रहती थी। धर्मशास्त्रों में आत्मज्ञान की साधना के लिए तीन गुणों की अनिवार्यता बताई गई है- बल, बुद्धि और विद्या। यदि इनमें से किसी एक गुण की भी कमी हो, तो साधना का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। सबसे पहले तो साधना के लिए बल जरूरी है। निर्बल व कायर व्यक्ति साधना का अधिकारी नहीं हो सकता है। दूसरा, साधक में बुद्धि और विचार शक्ति होनी चाहिए। इसके बिना साधक पात्रता विकसित नहीं कर पाता है। तीसरा अनिवार्य गुण विद्या है। विद्यावान व्यक्ति ही आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है। 

हनुमान जी के जीवन में इन तीनों गुणों का अद्भुत समन्वय मिलता है। इन्हीं गुणों के बल पर वे जीवन की प्रत्येक कसौटी पर खरे उतरते हैं । रामकथा में हनुमानजी का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली है। प्रभु श्रीराम के आदर्शो को मूर्त रूप देने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

रामायण में सुंदरकांड की कथा सबसे अलग है। संपूर्ण रामायण कथा श्रीराम के गुणों और उनके पुरुषार्थ को दर्शाती है किन्तु सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है, जो सिर्फ हनुमानजी की शक्ति और विजय का कांड है। यह अतिसुंदर है इसलिए सुंदरकांड नाम पड़ा। इस कांड में श्रीहनुमान का लंका प्रस्थान, लंका दहन और लंका से वापसी तक के घटनाक्रम आते हैं। इस सोपान के मुख्य घटनाक्रम है – 

श्री हनुमान का लंका की ओर प्रस्थान, विभीषण से भेंट, सीता से भेंट करके उन्हें श्री राम की मुद्रिका देना, अक्षय कुमार का वध, लंका दहन और लंका से वापसी।

हनुमान जी का संवाद कौशल विलक्षण है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण अशोक वाटिका में जब वे पहली बार माता सीता से मिलते हैं तब दिखाई देता है। वे अपनी बातचीत से न सिर्फ उन्हें भयमुक्त करते हैं, बल्कि उन्हें यह भी भरोसा दिलाते हैं कि वे श्रीराम के ही दूत हैं- “कपि के वचन सप्रेम सुनि, उपजा मन बिस्वास। जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिंधु कर दास ।।” यह कौशल आज के युवा उनसे सीख सकते हैं।

इसी तरह समुद्र लांघते वक्त देवताओं के कहने पर जब सुरसा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही, तो उन्होंने अतिशय विनम्रता का परिचय देते हुए उस राक्षसी का भी दिल जीत लिया। वह श्री हनुमान का बुद्धि कौशल व विनम्रता देख दंग रह गई और उसने उन्हें कार्य में सफल होने का आशीर्वाद देकर विदा कर दिया। यह प्रसंग सीख देता है कि केवल साम‌र्थ्य से ही जीत नहीं मिलती है, विनम्रता से समस्त कार्य सुगमतापूर्वक पूर्ण किए जा सकते हैं।

महावीर हनुमान ने अपने जीवन में आदर्शों से कोई समझौता नहीं किया। लंका में रावण के उपवन में हनुमान जी और मेघनाथ के मध्य हुए युद्ध में मेघनाथ ने ‘ब्रह्मास्त्र’ का प्रयोग किया। हनुमान जी चाहते तो वे इसका तोड़ निकाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वे उसका महत्व कम नहीं करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का तीव्र आघात सह लिया।

श्री हनुमान के जीवन से हम शक्ति व साम‌र्थ्य के अवसर के अनुकूल उचित प्रदर्शन का गुण सीख सकते हैं। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा में लिखते हैं- ‘सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा, विकट रूप धरि लंक जरावा।’

सीता माता के सामने उन्होंने स्वयं को लघु रूप में रखा, क्योंकि यहां वह पुत्र की भूमिका में थे, लेकिन संहारक के रूप में वे राक्षसों के लिए काल बन गए। अवसर के अनुसार स्वयं को ढाल लेने की हनुमानजी की प्रवृत्ति अद्भुत है। जिस वक्त लक्ष्मण रणभूमि में मूर्छित हो गए, उनके प्राणों की रक्षा के लिए वे पूरा पर्वत ही उठा लाए, क्योंकि वे संजीवनी बूटी नहीं पहचानते थे। अपने इस गुण के माध्यम से वे हमें तात्कालिक विषम स्थिति में विवेकानुसार निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं।

हनुमान जी हमें भावनाओं का संतुलन भी सिखाते हैं। उनका व्यक्तित्व आत्ममुग्धता से कोसों दूर है। सीता माँ का समाचार लेकर सकुशल वापस पहुंचे श्री हनुमान की हर तरफ प्रशंसा हुई, लेकिन उन्होंने अपने पराक्रम का कोई किस्सा प्रभु राम को नहीं सुनाया। जब श्रीराम ने उनसे पूछा- ‘हनुमान ! त्रिभुवनविजयी रावण की लंका को तुमने कैसे जला दिया? तब प्रत्युत्तर में हनुमानजी ने जो कहा उससे भगवान राम भी हनुमानजी के आत्ममुग्धताविहीन व्यक्तित्व के कायल हो गए– “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।”

भारतीय-दर्शन में सेवाभाव को अत्यधिक महत्व दिया गया है। यह सेवाभाव ही हमें निष्काम कर्म के लिए प्रेरित करता है। अष्ट चिरंजीवियों में से एक महाबली हनुमान अपने इन्हीं सद्गुणों के कारण देवरूप में पूजे जाते हैं और उनके ऊपर ‘राम से अधिक राम के दास’ की उक्ति चरितार्थ होती है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम स्वयं कहते हैं- जब लोक पर कोई विपत्ति आती है तब वह त्राण पाने के लिए मेरी अभ्यर्थना करता है, लेकिन जब मुझ पर कोई संकट आता है तब मैं उसके निवारण के लिए पवनपुत्र का स्मरण करता हूं। हनुमान जी के जीवन का एक ही मंत्र था – ‘राम काज किन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम…’

जिस प्रकार हनुमान जी श्रीराम के भक्त हैं उसी प्रकार हम सभी को भारत माता का सेवक बनना होगा। आज हमारा देश ही नहीं अपितु यह सारा संसार ही महामारी से ग्रसित है, पीड़ित है। ऐसे में भारत जैसे युवा देश में युवाओं की ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। संकट की इस घड़ी में समाज की रक्षा हेतु श्री हनुमान जी की भांति ही हमें भी अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना चाहिए। युवा शक्ति को हनुमान जी की पूजा से अधिक उनके चरित्र को आत्मसात करने की आवश्यकता है, जिससे भारत को उच्चतम नैतिक मूल्यों वाले देश के साथ-साथ ‘कौशल युक्त’ भी बनाया जा सके। 

(शुभांगी उपाध्याय कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं और विवेकानंद केंद्र के पश्चिम बंग प्रान्त में विभाग युवा प्रमुख भी।)

श्रीराम को समर्पित आचार्य विष्णुकांत शास्त्री की कुछ कविताएं

आचार्य विष्णुकांत शास्त्री

मैं न दहलूँगा भयानक रूप लखकर
भले उसको देख सबका मन दहल ले।
दृष्टि दी गुरु ने तुझे पहचानने की,
प्रभु – कृपा तू रूप चाहे जो बदल ले।।
——
साँस साँस में रटूँ राम मैं नाम तुम्हारा
साँस साँस में बुनूँ रूप मैं राम तुम्हारा
साँस साँस में झलकाओ तुम अपनी लीला
साँस साँस में रमो बने यह धाम तुम्हारा
—–
औरों के हैं जगत् में स्वजन, बन्धु, धन, धाम।
मेरे तो हैं एक ही सीतापति श्रीराम।।
—-

जीवन का पथ कितना दुर्गम, रह रह कर सिहरूँ,
हर ऊँची – नीची घाटी में, तुमको याद करूँ!
चूर – चूर तन, साँस धौंकनी, बढ़ता हूँ फिर भी
तुम मेरे रक्षक हो स्वामी, तब क्यों कहीं डरूँ!!
—-
राम प्राण की गहराई से तुम्हें नमन है
कृपा पा सकूँ नाथ तुम्हारी, इतना मन है
यह जग -ज्वाला क्या बिगाड़ सकती है मेरा
नाम तुम्हारा, सब तापों का सहज शमन है।।
—–
छोड़ दो, सब राम पर ही छोड़ दो
जिन्दगी का रुख उधर ही मोड़ दो।
तुम जगत् के साथ भटके हो बहुत
अब स्वयं को जगत्पति से जोड़ दो।।
—-
राम राम में रमो, रटो तुम राम – राम ही
राम राम ही जपो एक अवलम्ब नाम ही।
रूप चरित, गुण धाम उसी में सभी समाये
निहित बीज में ज्यों तरु, पत्ते फल ललाम भी।।
—–
मैं निस्साधन, दीन -हीन प्रभु, और न कोई मेरा
एक गाँठ सौ फेरे वैसे मुझे भरोसा तेरा।
काल – ब्याल मुँह बाये, जाने अगले पल क्या होगा,
अतः इसी पल अपने चरणों में दे मुझे बसेरा।।
——

तरी अहल्या जिनके पावन मृदुल स्पर्श से
प्रेम – हठीले केवट से जो गये पखारे!
जो जग का दुःख हरने काँटों से क्षत -विक्षत
राम! तुम्हारे चरण प्रेरणा स्त्रोत हमारे!!
———

मुझे शक्ति दो नाथ! कर सकूँ निज पर संयम,
काम, क्रोध को जीत सकूँ धारण कर शम-दम।
जनजीवन के मायामय आकर्षण से बच,
तुम्हें समर्पित हो पाऊँ बन निरहं, निर्मम।।
——
थोड़े सुख से सुखी, दुःख से दुखी हुआ करता है यह मन,
कैसी खोटी आदत इसकी विषयातुर रहता यह प्रतिक्षण
ठगा जा चुका बार अनेकों फिर भी सम्हल न पाता है यह
केवल कृपा तुम्हारी राघव! कर सकती है इसका शोधन।।
——
अब तक का जीवन तो बीता स्वार्थपूर्ण व्यवहार में
जिनका मुख देखे दुख उपजे उनकी ही मनुहार में
कहता कुछ था, करता कुछ था, रखना अपने मन कुछ और
राम तुम्हें अब याद कर रहा पड़ा हुआ मँझधार में।।

(सौजन्य – डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी)

जम्मू -कश्मीर में 400 कंपनियां 23 हजार करोड़ निवेश के लिए तैयार

महामारी के कारण जम्मू-कश्मीर नहीं कर पाया था इनवेस्टमेंट समिट

श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर में पिछले साल से अब तक करीब 400 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से एमओयू साइन किए गए, ये कंपनियां राज्य में 18 सेक्टर्स में 23,000 करोड़ का निवेश करने वाली हैं। (सिंबॉलिक फोटो)
कोविड के दौर में जम्मू-कश्मीर से सुकून भरी खबर आ रही है। यहां अब निवेश की बाढ़ सी आ रही है। राज्य सरकार ने पिछले साल से अब तक करीब 400 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से एमओयू साइन किए हैं। ये कंपनियां राज्य में 18 सेक्टर्स में 23,000 करोड़ का निवेश करने वाली हैं। ये कंपनियां शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पर्यटन, आईटी, हैंडीक्राफ्ट्स, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स, फार्मा, कौशल विकास, दुग्ध-पोल्ट्री-ऊन, इंफ्रास्ट्रक्चर, औषधीय पौधों, फिल्म व रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में निवेश में रुचि दिखा रही हैं।
राज्य के उद्योग व वाणिज्य विभाग के अधिकारी के मुताबिक यह कंपनियां राज्य में यूनिट्स शुरू करती हैं तो यहां के युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल जाएंगे। अधिकारी के मुताबिक कुछ कंपनियों ने तो जमीन पर काम शुरू किया है, मगर ज्यादातर अभी कोरोना की परिस्थितियां ठीक होने का इंतजार कर रही हैं। राज्य सरकार का लक्ष्य अगले 15 साल में राज्य में 1 लाख करोड़ रुपए का निवेश आमंत्रित करने का है।
यहां निवेश के लिए इच्छुक बड़ी कंपनियों में आत्मीय फील्डकॉन और एचपी कैपिटल भी शामिल हैं। आत्मीय फील्डकॉन यहां 650 करोड़ के निवेश से और एचपी कैपिटल 2000 करोड़ के निवेश से हेल्थकेयर फेसिलिटी बनाना चाहते हैं। आरके एसोसिएट्स यहां 500 करोड़ के निवेश से होटल खोलना चाहते हैं, जबकि नेशनल एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया यहां 1700 करोड़ के निवेश से सघन प्लांटेशन और कोल्ड स्टोरेज क्लस्टर विकसित करेगा।
फ्लिपकार्ट ने स्थानीय कारीगरों के हुनर को बाजार देने में रुचि दिखाई है। अबूधाबी की कंपनी लूलू यहां फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाना चाहती है। निवेश की इच्छुक कंपनियों में रिलायंस एम्युनिशन लि., जैक्सन ग्रुप, इंडो-अमेरिकन सिनर्जी, कृष्णा हाइड्रो प्रोजेक्ट्स, यूनिवर्सल सक्सेस एंटरप्राइजेस, सर्वोटेल और श्री सीमेंट भी शामिल हैं। राज्य सरकार ने पिछले साल पहली बार जेएंडके ग्लोबल इनवेस्टर समिट के आयोजन की तैयारी की थी। हालांकि कोरोना के चलते इसे स्थगित करना पड़ा। अब केंद्र ने भी यहां औद्योगिक विकास के लिए नई योजना के साथ 28,400 करोड़ का बजट रखा है।
शिक्षा में निवेश से राज्य के बच्चे बाहर जाने के लिए मजबूर नहीं होंगे
शिक्षा के क्षेत्र में भी कई कंपनियों ने रुचि दिखाई है। राज्य के हजारों बच्चे अलग-अलग कोर्स में प्रवेश के लिए रूस, तुर्की, ईरान, बांग्लादेश, यूके ही नहीं, देश के दूसरे शहरों में विभिन्न संस्थानों में जाते हैं। अगर यह कंपनियां राज्य में शिक्षण संस्थान खोलें तो यहां के बच्चों को बाहर नहीं जाना पड़ेगा। स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश से राज्य के लोगों को इलाज के बाहर भी नहीं जाना पड़ेगा।

कश्मीर में सेना ने बदला काफिले के झंडे का रंग

वाहनों पर घाटी में मनाए जाने वाले त्योहारों के बधाई संदेश लिखे
कश्मीर में सेना ने अपने काफिले के झंडे का रंग बदल दिया है। अब इसे लाल से बदलकर नीला कर दिया गया है। सेना का काफिला जब भी गुजरता है, तो सबसे आगे वाले वाहन पर एक झंडा लगा रहता है। यह पहले लाल रंग का हुआ करता था। सेना का मानना है कि लाल रंग हिंसा का प्रतीक है, लिहाजा इसे बदलने का फैसला लिया गया।
सेना के काफिले में शामिल वाहनों पर घाटी में मनाए जाने वाले त्योहारों के बधाई संदेश भी लिखे गए हैं। साथ ही घाटी की खूबसूरती दिखाने वाले पोस्टर लगाए गए हैं। ऐसा करके सेना ने खुद को स्थानीय लोगों से जुड़ाव का संदेश दिया है।
लाठी की जगह सीटी दी गयी
पहले सैनिक काफिले के साथ लाठी लेकर चलते थे। इसे पटककर ठक-ठक की आवाज निकालते और लोगों को काफिले से दूर रहने के लिए कहते थे। अब इसे भी बदल दिया गया है। जवानों को लाठी की जगह सीटी दी गई है। इसे बजाकर भीड़ को काफिले से दूर किया जाता है।
छावनी इलाके की तस्वीर बदली
सेना ने इस मुहिम के तहत छावनी इलाके की दीवारों पर कश्मीर में ऊंचा मुकाम हासिल करने वाले लोगों की तस्वीरें बनाई जा रही हैं। काफिले में शामिल वाहनों पर भी कश्मीर के सुंदर स्थलों की चित्रकारी की गई है। बताया जा रहा है कि ऐसा करके सेना कश्मीरियों के दिल में जगह बनाना चाहती है।
धारा -370 हटाए जाने के बाद सेना की पहल
जम्मू- कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने के बाद सेना ने स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की है। इसके तहत स्थानीय लोगों की जरूरत पड़ने पर मदद करने के साथ- साथ सामाजिक कामों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शामिल है। हाल ही में पुंछ में सेना ने एक दरगाह की मरम्मत के लिए आर्थिक मदद की थी। यहां जायरीनों के लिए एक शेड भी बनवाया है।