Thursday, April 2, 2026
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तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं ममता बनर्जी

कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हैट्रिक जीत दर्ज करने वालीं टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी एक बार फिर से राज्य की मुख्यमंत्री बन गई हैं। ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के तौर पर आज यानी बुधवार को लगातार तीसरी बार राजभवन में शपथ ग्रहण किया। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता बनर्जी को राज्यभवन में मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। बताया जा रहा है कि शपथ ग्रहण समारोह के लिए पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, निवर्तमान सदन के नेता प्रतिपक्ष अब्दुल मन्नान और माकपा के वरिष्ठ नेता बिमान बोस को कार्यक्रम का निमंत्रण भेजा गया था। ममता बनर्जी ने एक दशक से अधिक पहले सिंगुर और नंदीग्राम में सड़कों पर हजारों किसानों का नेतृत्व करने से लेकर आठ साल तक राज्य में बिना किसी चुनौती के शासन किया। आठ साल के बाद उनके शासन को 2019 में तब चुनौती मिली जब भाजपा ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में 18 सीटों पर अपना परचम फहरा दिया। ममता बनर्जी (66) ने अपनी राजनीतिक यात्रा को तब तीव्र धार प्रदान की जब उन्होंने 2007-08 में नंदीग्राम और सिंगूर में नाराज लोगों का नेतृत्व करते हुए वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ राजनीतिक युद्ध का शंखनाद कर दिया और सत्ता में आईं। 292 सीटों (2 सीटों पर चुनाव नहीं हुए) में से तृणमूल  के खाते में 213 सीटें गईं, जबकि भाजपा को 77 सीटें मिली हैं।

रिक्शा चालक मनोरंजन व्यापारी बने विधायक

बचपन शरणार्थी शिविर में बीता, बहन भूख से मरी

लेखिका महाश्वेता देवी से मुलाकात ने बदली जिंदगी

प्रभाकर मणि तिवारी

कोलकाता :  देश के विभाजन के बाद छह साल की उम्र में एक बच्चा बंगाल के शरणार्थी शिविर में पहुंचता है। बचपन इतना मुश्किल कि चाय की दुकानों में काम करना पड़ा, मजदूरी करनी पड़ी। यह बच्चा थोड़ा बड़ा होता है तो बंगाल के तत्कालीन नक्सलबाड़ी आंदोलन का हिस्सा बन जाता है। लंबे समय तक जेल में रहता है, लेकिन वहां से भी मोहभंग होता है। फिर जादवपुर विश्वविद्यालय के सामने हाथ रिक्शा चलाने लगता है।

यह सब तो हुईं पुरानी बातें। ताजा जानकारी यह है कि मनोरंजन व्यापारी नाम का हाथ रिक्शा खींचने वाला वह व्यक्ति तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतकर विधायक बन चुका है। बहुत उम्मीद है कि ममता की आने वाली सरकार में उसे मंत्री भी बनाया जाए। रिक्शा वाले से लेकर माननीय विधायक हो चुके मनोरंजन व्यापारी की उतार-चढ़ाव भरी जिंदगी को अब जरा तफसील से जानते हैं। हुगली की बालागढ़ सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान मनोरंजन व्यापारी। मनोरंजन देश के बंटवारे के बाद छह साल की उम्र में पश्चिम बंगाल आए और बांकुड़ा के शरणार्थी शिविर से अपनी जिंदगी शुरू की। फोटो- संजय

बहन को अपनी आंखों के सामने भूख से दम तोड़ते देखा था
देश के विभाजन के करीब छह साल बाद 1953 में मनोरंजन अपने परिवार के साथ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के बरीशाल (अब बांग्लादेश में) से पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा स्थित शरणार्थी शिविर में पहुंचे थे। कुछ दिनों बाद ही उन लोगों को दंडकारण्य जाने निर्देश दिया गया, लेकिन मनोरंजन के पिता ने वहां जाने से मना कर दिया। उसके बाद शुरू हुआ संघर्ष का अंतहीन सिलसिला। मनोरंजन छोटी उम्र में ही चाय की दुकान पर काम करने लगे।

मनोरंजन बताते हैं कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने भूख से बड़ी बहन को दम तोड़ते देखा। उसके बाद दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी, लखनऊ और बनारस जैसे शहरों में जाकर बेगारी की, लेकिन कहीं मन नहीं रमा तो कोलकाता लौट आए। साठ के दशक में पश्चिम बंगाल में जब नक्सली आंदोलन चरम पर था, तो वह भी इससे जुड़े थे। 26 महीने जेल में बिताने पड़े, लेकिन नक्सल नेताओं की कार्यशैली को देखकर उनका मोहभंग हो गया। जेल से बाहर आने के बाद वे कोलकाता के जादवपुर रेलवे स्टेशन के सामने रिक्शा चलाने लगे।

मनोरंजन बांग्ला साहित्य लेखन में जाना-पहचाना नाम हैं। वे बताते हैं कि कोलकाता में रिक्शा चलाते हुए उनकी मुलाकात बांग्ला की महान लेखिका महाश्वेता देवी से हुई। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। फोटो- संजय
मनोरंजन बांग्ला साहित्य लेखन में जाना-पहचाना नाम हैं। वे बताते हैं कि कोलकाता में रिक्शा चलाते हुए उनकी मुलाकात बांग्ला की महान लेखिका महाश्वेता देवी से हुई। उन्होंने ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया। फोटो- संजय

प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी से मुलाकात के बाद बन गए लेखक
यहीं रिक्शा चलाते समय एक दिन अचानक एक महिला सवारी से मुलाकात हुई और उनके जीवन की दिशा ही बदल गई। वह महिला थी आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने वाली जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी। मनोरंजन ने हिम्मत जुटाते हुए उस महिला यात्री से जिजीविषा शब्द का अर्थ पूछा। इससे वह महिला हैरत में पड़ गई। उसने शब्द का अर्थ तो बताया ही, रिक्शेवाले के अतीत के पन्ने भी पलटे।
महाश्वेता ने उस रिक्शा वाले से अपनी पत्रिका बार्तिका में अब तक के जीवन और संघर्ष की कहानी लिखने को कहा और उसे अपना पता भी बताया। वह वर्ष था 1981। मनोरंजन बताते हैं, ‘महाश्वेता देवी से उस मुलाकात ने मेरी जीवन की दशा-दिशा ही बदल दी। अगर उनसे मुलाकात और बात नहीं हुई होती तो मैं शायद अब तक रिक्शा ही चला रहा होता।’

दर्जनों पुस्तकें प्रकाशिक हो चुकी हैं
महाश्वेता देवी की पत्रिका में छपने के बाद धीरे-धीरे उनके लेख कई बांग्ला पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और पूरा बंगाल उनको पहचानने लगा। नक्सल आंदोलन के दौरान जेल में रहने के दौरान एक कैदी और जेलर ने भी पढ़ने-लिखने की प्रेरणा दी। मनोरंजन का लिखना अलीपुर जेल से ही शुरू हो चुका था, लेकिन महाश्वेता से मुलाकात के बाद मनोरंजन बाकायदा साहित्यकार बन गए।

आखिर महाश्वेता देवी से जिजीविषा का अर्थ पूछने का ख्याल कैसे आया था? इस सवाल पर मनोरंजन कहते हैं, ‘मुझे लगा कि वे कोई प्रोफेसर होंगी। इसलिए हिम्मत जुटा कर पूछ लिया।’ महाश्वेता देवी का मनोरंजन के जीवन पर इतना गहर असर है कि उन्होंने अपनी पुत्री का नाम भी महाश्वेता ही रखा है।

वर्ष 1981 में लेखक-साहित्यकार के तौर पर शुरू हुआ उनका सफर अब कई ऊंचाइयां हासिल कर चुका है। इस दौरान उनकी आत्मकथा समेत दर्जनों पुस्तकें तो प्रकाशित हुई ही हैं, दर्जनों पुरस्कार भी मिल चुके हैं। उनकी कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी हो चुका है। मनोरंजन की पुस्तकों में दलित वर्ग के संघर्ष नक्सल आंदोलन का विस्तार से जिक्र मिलता है। मनोरंजन पिछले साल तक बंगाल के एक सरकारी स्कूल में बच्चों के लिए खाना पकाने का काम करते थे। उनके अनुरोध पर ममता ने उनका ट्रांसफर लाइब्रेरी में कर दिया था और फिर उन्हें दलित अकादमी का अध्यक्ष भी बनाया गया। फोटो- संजय

ममता के टिकट देने के फैसले पर किसी को हैरत नहीं हुई थी
मनोरंजन कहते हैं, ‘मेरा बचपन जिन हालात में बीता है, उसमें मैंने यहां तक पहुंचने की कल्पना तक नहीं की थी। खासकर बीते एक साल के दौरान मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया है। किताबें लिखते हुए एक सरकारी स्कूल में बच्चों के लिए खाना पकाना और उसमें से समय निकाल कर पुस्तकें लिखना मेरी दिनचर्या हो गई थी। अब मुझे इस बात का संतोष है कि विधायक बन कर मैं उस समाज को कुछ लौटाने के काबिल रहूंगा जिसने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मैं खासकर दलितों और पिछड़े तबके के लोगों के लिए कुछ कर सकूंगा ताकि किसी और को वह सब नहीं झेलना पड़े जो मुझे झेलना पड़ा था।’

ममता बनर्जी ने जब तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची जारी की तो उसमें मनोरंजन का नाम देख कर किसी को खास हैरत नहीं हुई थी। इसकी वजह भी थी। ममता बनर्जी ने बीते साल ही उनको खाना पकाने के काम से हटा कर लाइब्रेरी में नियुक्त कर दिया था। उसके बाद सरकार ने जिस नई दलित अकादमी का गठन किया, उसका अध्यक्ष भी उनको ही बनाया गया।

रिक्शे पर जाकर पर्चा भरा, रिक्शे पर ही प्रचार
सड़क से सत्ता का सफर तय करने के बावजूद मनोरंजन अपना अतीत नहीं भूले हैं। उन्होंने रिक्शे पर जाकर ही अपना नामांकन पत्र दाखिल किया और ज्यादातर चुनाव अभियान भी रिक्शे पर ही किया। चुनाव अभियान के दौरान उनके समर्थकों का नारा था-एक रिक्शावाला अब विधानसभा पहुंचेगा। वे अपने हाथों में हमेशा एक अंगूठी पहने रहते हैं, जिस पर जिजीविषा शब्द लिखा है। इस बारे में वे बताते हैं, ‘एक बार मैंने बांग्ला की महान साहित्यकार महाश्वेता देवी से इसका अर्थ पूछा था। उन्होंने जिस अद्भुत तरीके से इसका अर्थ समझाया था, उसने एक लेखक के तौर पर मेरा पुनर्जन्म किया।’

आप आखिर चुनाव प्रचार या नामांकन पत्र दायर करते समय रिक्शा क्यों चला रहे थे? इस सवाल पर मनोरंजन कहते हैं, ‘देश में डीजल और पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसके प्रति विरोध जताने के लिए ही मैंने रिक्शा को चुना। रिक्शा मेरे जीवन का अभिन्न अंग रहा है। मैं इसे कैसे भूल सकता हूं?’

पश्चिम बंगाल में दलितों का चेहरा और आवाज बन चुके मनोरंजन अपने चुनाव प्रचार के दौरान लगातार कहते रहे थे, ‘मैं भी आपकी तरह ही एक सामान्य व्यक्ति हूं। सिर पर छत नहीं होने की वजह से मैंने अनगिनत रातें रेलवे प्लेटफार्म पर सोकर काटी हैं।’ मनोरंजन नामशूद्र समुदाय से आते हैं। भाजपा इस चुनाव में नामशूद्र वोटरों को सीएए के जरिए लुभाने की कोशिश कर रही थी क्योंकि बड़ी नामशूद्र आबादी को अभी स्थायी नागरिकता नहीं मिली है। ममता ने भाजपा की काट के लिए इस वर्ग में लोकप्रिय मनोरंजन को टिकट दिया था।

नामशू्द्र जाति के हैं मनोरंजन, भाजपा इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही थी
दरअसल, मनोरंजन नामशूद्र जाति के हैं, जिसे दलित माना जाता है। इस समुदाय के ज्यादातर लोग बांग्लादेश से आए हैं और उनको अभी स्थायी नागरिकता नहीं मिली है। भाजपा ने ध्रुवीकरण और जातिगत पहचान की राजनीति के साथ इस समुदाय को लुभाने के लिए कहा था कि उसे सीएए के जरिए नागरिकता दी जाएगी। इसकी काट के तौर पर ही ममता ने मनोरंजन को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया था। बालागढ़ विधानसभा क्षेत्र में दलित तबके के अच्छे-खासे वोटर हैं। उन सबका समर्थन मनोरंजन को मिला और वे विधानसभा पहुंच गए।

वर्ष 1997 से दक्षिण कोलकाता के एक मूक बधिर स्कूल में छात्रों के लिए खाना पकाने वाले मनोरंजन बताते हैं, ‘बढ़ती उम्र, घुटनों में दर्द रहने और ऑपरेशन होने की वजह से खड़े होकर खाना पकाना मुश्किल हो गया था। इसलिए मैंने बीते साल ममता दीदी को अपने तबादले का अनुरोध करते हुए एक पत्र भेजा था। ममता ने तुरंत उसका संज्ञान लेते हुए लाइब्रेरी में ट्रांसफर कर दिया।’ उसके बाद बीते साल के आखिर में ममता ने जब दलित अकादमी के गठन का ऐलान किया तो मनोरंजन को ही उसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

मनोरंजन फिलहाल ममता दीदी के शपथ कार्यक्रम के लिए व्यस्त हैं। अपनी प्राथमिकता के बारे में वे कहते हैं कि कमजोर तबके के लिए काम करता रहा हूं, आगे भी करूंगा। इसके अलावा राज्य में एनआरसी और सीएए जैसे कानूनों का बड़े पैमाने पर विरोध जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो सरकार असम की तर्ज पर यहां भी दशकों पहले सीमा पार से आने वाले तमाम लोगों को डिटेंशन सेंटर भेजेगी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

राज्य आपदा राहत कोष के लिए राज्यों को केंद्र से 8,873.6 करोड़ रुपये जारी

नयी दिल्ली : वित्त मंत्रालय ने राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के लिए 8,873.6 करोड़ रुपये की पहली किश्त अग्रिम तौर पर जारी की है। मंत्रालय के अनुसार एसडीआरएफ राशि के 50 प्रतिशत तक का उपयोग राज्यों द्वारा कोविड-19 की रोकथाम संबंधी उपायों के लिए किया जा सकता है। सामान्य तौर पर एसडीआरएफ की पहली किश्त जून में जारी की जाती है। वित्त आयोग की इस बारे में ऐसी ही सिफारिश है।
मंत्रालय ने एक बयान में कहा, ‘व्यय विभाग ने गृह मंत्रालय की सिफारिश पर एक विशेष व्यवस्था के तहत सभी राज्यों को वर्ष 2021 के लिए राज्य आपदा राहत कोष (एसडीआरएफ) के केंद्रीय हिस्से की पहली किस्त को निर्धारित समय से पहले अग्रिम तौर पर जारी किए हैं। राज्यों को 8,873.6 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।’’
बयान में कहा गया है , ‘ सामान्य तौर पर एसडीआरएफ की पहली किस्त वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार जून में जारी की जाती है। सामान्य प्रक्रिया की छूट देते हुए न केवल एसडीआरएफ की पहली किश्त को अग्रिम तौर पर जारी किया गया है बल्कि पिछले वित्त वर्ष में राज्यों को प्रदान की गई राशि के लिए उपयोग प्रमाण पत्र की प्रतीक्षा किए बिना यह रकम जारी की गई है। ’’ मंत्रालय ने कहा है कि जारी की गई रकम के 50 प्रतिशत यानी 4,436.8 करोड़ रुपये तक का उपयोग राज्यों द्वारा कोविड-19 की रोकथाम संबंधी उपायों के लिए किया जा सकता है। इसमें अस्पतालों में ऑक्सीजन उत्पादन एवं भंडारण संयंत्रों की लागत, वेंटिलेटर, एयर प्यूरिफायर, एम्बुलेंस सेवाओं, कोविड-19 अस्पताल, कोविड केयर सेंटर, उपभोग सामग्री, थर्मल स्कैनर, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, जांच प्रयोगशाला, जांच किट, कंटेनमेंट जोन आदि की व्यवस्था शामिल हैं।

टी रविशंकर बनाए गए आरबीआई के डिप्टी गवर्नर

मुम्बई : टी रविशंकर को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का डिप्टी गवर्नर बनाया गया है। वह केंद्रीय बैंक की अनुषंगी कंपनी इंडियन फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी एंड एलाइड सर्विसेज के चेयरमैन थे।
रविशंकर आरबीआई के चार डिप्टी गवर्न स्तर के अधिकारियों में एक होंगे। बीपी कानूनगो के दो अपैल को सेवानिवृत्त होने के बाद से डिप्टी गवर्नर का चौथा पद खाली था। कानूनगो एक साल सेवा विस्तार के बार सेवानिवृत्त हुए। केंद्रीय मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने शनिवार को रविशंकर की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी। वह कानूनगो के विभाग की जिम्मेदारी संभाल सकते हैं जो फिनटेक, सूचना प्रौद्योगिकी, भुगतान प्रणाली और लोखिम निगरानी के प्रभागों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे।
उनकी नियुक्ति तीन वर्ष या उनकी सेवानिवृत्ति की तिथि में जो भी पहले होगा, तब तक के लिए की गयी है। आरबीआई के अन्य तीन डिप्टी गवर्नर में माइकल डी पात्रा, मुकेश जैन और राजेश्चर राव शामिल हैं। रविशंकर सितंबर 1990 में आरबीआई में अनुसंधान अधिकारी के रूप में नियुक्त किए गए थे। उन्होंने बीएचयू से विज्ञान एवं सांख्यिकी में स्नात्कोत्तर स्तर की पढ़ाई की। वह इंस्टिट्यूट आफ इकोनामिक ग्रोथ से विकास योजना का डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी किए हुए हैं।
वह पिछले साल इंडियन फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी एंड एलाइड सर्विसेज के चेयरमैन बनाए गए थे। इससे पहले वह अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और बांग्लादेश के केंद्रीय बैंक के साथ भी भारत सरकार की ओर से काम कर चुके हैं।

राहुल बजाज ने छोड़ा बजाज ऑटो का चेयरमैन पद

नीरज बजाज होंगे नये चेयरमैन
नयी दिल्ली : देश के सफलतम उद्योगपतियों में शामिल राहुल बजाज ने आखिरकार बजाज ऑटो के चेयरमैन का पद छोड़ने का फैसला कर लिया है। राहुल बजाज ने दुपहिया और तिपहिया वाहनों के क्षेत्र में बजाज ऑटो को खड़ा किया और उसे अग्रणी स्थान तक पहुंचाया।
पुणे स्थित दुपहिया और तिपहिया वाहन बनाने वाली कंपनी बजाज ऑटो ने शेयर बाजारों को भेजी नियामकीय सूचना में कहा है कि उसके गैर- कार्यकारी चेयरमैन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनका इस्तीफा 30 अप्रैल 2021 को कामकाज समाप्त होने के समय से प्रभावी हो जायेगा।
कंपनी ने राहुल बजाज के स्थान पर नीरज बजाज को नया चेयरमैन नियुक्त किया है। राहुल बजाज कंपनी के चेयरमैन एमरीटस बने रहेंगे। उन्हें एक मई 2021 से पांच साल के लिये कंपनी का चेयरमैन एमरीटस बनाया गया है। राहुल बजाज वर्ष 1972 से ही कंपनी के गैर- कार्यकारी चेयरमैन का कार्यभार संभाले हुये हैं। वह बजाज आटो समूह से पिछले पांच दशकों से जुड़े हुये हैं।
कंपनी ने नियामकीय सूचना में कहा है कि राहुल बजाज की आयु 83 साल हो गई है। अपनी बढ़ी उम्र को देखते हुये उनहोंने कंपनी के गैर- कार्यकारी निदेशक और चेयरमैन के पद से इस्तीफा दे दिया। कंपनी ने कहा है कि बजाज ऑटो समूह की सफलता में राहुल बजाज का बहुत अधिक योगदान रहा है। उनके पिछले पांच दशकों के लंबे अनुभव और कंपनी के हित में उनके अनुभव, ज्ञान और बुद्धि का एक सलाहकार के तौर पर समय समय पर लाभ उठाते हुये कंपनी के निदेशक मंडल ने उन्हें कंपनी का चेयरमैन एमेरीटस नियुक्त करने को मंजूरी दे दी।
राहुल बजाज ने 1965 में बजाज समूह की कमान संभाली थी। उस समय भारत एक बंद अर्थव्यवस्था थी। उन्होंने कंपनी का नेतृत्व करते हुये बजाज चेतक नाम का स्कूटर बनाया। इस स्कूटर को काफी नाम मिला और इसे भारत के मध्यम वर्गीय परिवार की आकांक्षा का सूचक माना गया। इसके बाद कंपनी लगातार आगे बढ़ती चली गई।
नब्बे के दशक में जब भारत में उदारीकरण की शुरुआत हुई और भारत एक खुली अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ गया और जापानी मोटर साइकिल कंपनियों से भारतीय दुपहिया वाहनों को कड़ी टक्कर मिलने लगी, उस समय भी राहुल बजाज ने कंपनी को आगे बढ़ाया। बजाज समूह की अग्रणी कंपनी बजाज ऑटो का कारोबार एक समय 7.2 करोड़ रुपये था जो कि आज 12,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और उसके उत्पादों का पोर्टफोलियो भी बढ़ा है। राहुल बजाज के नेतृत्व में ही उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार में स्थान मिला।
देश के सबसे सफलतम उद्योगपतियों में से एक राहुल बजाज को उनके खुलकर बोलने के लिये जाना जाता है और वह 2006 से लेकर 2010 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे। नवंबर 2019 को मुंबई में इकोनोमिक टाइम्स के एक कार्यक्रम में गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और वाणिजय मंत्री पीयूष गोयल की उपस्थिति में इस जाने माने उद्योगपति ने सरकार की आलोचना को लेकर उद्योगपतियों के डर के बारे में चुटकी लेते हुये कहा, ‘‘डर का यह माहौल, पक्के तौर पर हमारे दिमाग में है। आप (केन्द्र सरकार) अच्छा काम कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद हमारे भीतर यह विश्वास नहीं है कि आप आलोचना को सराहेंगे।’’

पूर्व अटार्नी जनरल और वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी का निधन

नयी दिल्ली :   देश के पूर्व अटार्नी जनरल और वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी (91) का गत शुक्रवार को कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया है। करीब सात दशक तक कानूनी पेशे से जुड़े रहे सोराबजी की पहचान देश के बड़े मानवाधिकार वकील के तौर पर होती है।
वे गरीबों और दलितों की मदद में हमेशा आगे रहे। 70 और 80 के दशक में सोराबजी के जूनियर वकील रह चुके कपिल सिब्बल और अशोक पांडा उनकी पहचान देश के बड़े मानवाधिकार वकील के तौर पर थी
1970 से 80 के दशक में सोराबजी देश के सबसे व्यस्त और नामचीन वकीलों में शुमार थे। उन्हें कई बार सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए अप्रोच किया गया, मगर उन्होंने ऑफर ठुकरा दिया। वे हर बार कहते-मैं जज कभी भी बन सकता हूं। मगर मैं ऐसा चाहता नहीं हूं क्योंकि जितना अधिक गरीब व दलितों के लिए बाहर रहकर कर सकता हूं, उतना न्यायपालिका का अंग बनकर नहीं कर सकता।
बड़े से बड़े वकील को अपनी दलीलों से पसीने छुड़ा देने वाले सोराबजी अपने जीवन में केवल एक बार आपातकाल में भावुक हुए थे। अक्सर काम का तनाव दूर करने के लिए संगीत का सहारा लेते थे। उन्हें जैज म्यूजिक काफी पसंद था। उन्होंने भारत में इस जॉनर को काफी प्राेत्साहन भी दिया। जब भी खुश होते तो क्लेरीनेट, सैक्सोफोन और पियानो बजाने लगते थे। सिब्बल बताते हैं- वे जूनियर वकील को केस की तैयारी करने के लिए कहते, फिर जांचने के लिए खुद उससे चर्चा भी करते। अगर उन्हें जूनियर की तैयारी पसंद आती तो अपनी जगह उसे ही भेजते और पसंद न आने पर खुद जिरह करते थे।

लॉकडाउन में शुरू किया ऑनलाइन एम्बुलेंस और दवाइयों का स्टार्टअप

हर महीने 10 लाख का व्यवसाय, रोज 200 मरीजों की मदद
इंद्रभूषण मिश्र

पटना : बिहार के पटना जिले के रहने वाले नीरज झा पेशे से डॉक्टर हैं। कई अस्पतालों में हेल्थकेयर को लेकर काम कर चुके हैं। कुछ अस्पतालों में हॉस्पिटल मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में भी उन्होंने काम किया है। पिछले साल जब कोरोना फैला तो स्वास्थ्य सुविधा सबसे अधिक प्रभावित हुई। किसी को दवाइयां नहीं मिलती तो किसी को एम्बुलेंस नहीं मिल रही थी। ऐसे में नीरज को लगा कि इन सरोकारों को लेकर कुछ काम करना चाहिए। इसके बाद जुलाई 2020 में उन्होंने हनुमान नाम से एक स्टार्टअप लॉन्च किया। जिसके जरिये वे लोगों को एम्बुलेंस, दवाइयां, ऑक्सीजन और होम नर्सिंग की सुविधा मुहैया करा रहे हैं। अभी वे बिहार के 22 जिलों में एम्बुलेंस सर्विस चला रहे हैं। इससे हर महीने 10 से 12 लाख उनका रेवेन्यू हो रहा है।
नीरज कहते हैं कि इस काम को शुरू करने का आइडिया दो साल पहले आया था। तब मैं एक अस्पताल में मैनेजमेंट कंसल्टेंट के रूप में काम कर रहा था। उसी दौरान आईटी एक्सपर्ट दीपक से मेरी मुलाकात हुई जो अपने पिता के इलाज के लिए इधर-उधर भटक रहे थे। दीपक बेंगलुरु में जॉब कर रहे थे। अपने पिता के लिए उन्होंने ऑनलाइन मेडिकल हेल्प की कोशिश की, लेकिन कहीं से मदद नहीं मिली तो उन्हें खुद दरभंगा आना पड़ा। उस मुलाकात के बाद हम दोनों दूर के परिचित निकले। उसी दौरान हमारे दिमाग ये आइडिया आया कि इस तरह की कोई पहल की जाए ताकि लोगों को ऑनलाइन मेडिकल सहायता मिल जाए।
इसके बाद दीपक वापस अपने काम पर लौट गए और मैं भी अपने काम में लग गया, लेकिन हमने अपने आइडिया पर बात करना जारी रखा। फिर नवंबर 2019 में हमने एक और मीटिंग की और इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू कर दिया। दीपक ने अपनी नौकरी छोड़ दी और मैंने भी इस्तीफा दे दिया। दीपक को आईटी का अच्छा खासा अनुभव था तो हमें टेक्नोलॉजी डेवलप करने और ऐप तैयार करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। बाकी मैं मेडिकल सेक्टर से जुड़ा था तो नेटवर्क डेवलप करने में आसानी हो गई।

कैसे करते हैं काम?
नीरज बताते हैं कि हमने ऑनलाइन ऐप, वेबसाइट और एक सॉफ्टवेयर डेवलप किया है। इसके जरिए कोई भी सर्विस रिक्वेस्ट कर सकता है। वे कहते हैं कि जिस तरह ओला से गाड़ियों की बुकिंग होती है। उसी तरह हमारे ऐप से एम्बुलेंस की बुकिंग होती है। इसके साथ ही वेबसाइट से भी हम लोग बुकिंग लेते हैं। अगर कोई ऐप या वेबसाइट पर नहीं जा सकता तो वो हमारी हेल्पलाइन नंबर पर कॉल करके भी मेडिकल सहायता और एम्बुलेंस का अनुरोध कर सकता है। हम जल्द से जल्द उस जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं। नीरज की टीम ने हेल्थ के क्षेत्र में काम करने वाली कई संस्थाओं से हाथ मिलाया है। कोई उनके लिए ऑक्सीजन मुहैया कराता है तो कोई दवाइयों और होम नर्सिंग विकसित करने के इक्विपमेंट्स की व्यवस्था करता है। जिस तरह की माँग आती है उसके हिसाब से उनकी टीम उस संस्था से बात करके ग्राहकों तक मदद पहुंचाती है।

क्या-क्या काम करते हैं?
नीरज कहते हैं कि अभी हमारे पास 350 एम्बुलेंस हैं। हमने कुछ ई रिक्शा एम्बुलेंस भी तैयार किया है जो पटना में चल रही है। इसके साथ ही हम लोग दवाइयों और दूसरे मेडिकल एसेसरीज की भी होम डिलीवरी करते हैं। हम सिर्फ दवाइयों का कॉस्ट लेते हैं, जबकि डिलीवरी चार्ज फ्री रखते हैं। इसके साथ ही ऑक्सीजन मुहैया कराने, मेडिकल टेस्ट कराने, कोरोना का टेस्ट कराने में भी लोगों की मदद करते हैं। हमारी टीम लोगों के घर जाकर यह काम करती है। साथ ही हमने 30 से ज्यादा घरों में नर्सिंग होम भी सेटअप किया है। वे बताते हैं कि एम्बुलेंस सर्विसेज का काम हम बिहार के 22 जिलों में कर रहे हैं। जबकि बाकी मेडिकल हेल्प की सर्विसेज सिर्फ पटना तक सीमित हैं। नीरज बताते हैं कि अभी हमारा स्टार्टअप नया है। साथ हम तब इसे रन कर रहे हैं, जब हेल्थ सिस्टम कोलैप्स कर गया है। इसलिए पूरे बिहार में या उसके बाहर हम अभी नहीं पहुंच सके हैं।
वे कहते हैं कि अभी देश में हालात खराब हैं। लोगों को जरूरत की चीजें नहीं मिल रहीं। इसलिए हमने तय किया है कि हम ऑक्सीजन भराने का पैसे नहीं लेंगे। कोई खाली सिलेंडर लाता है तो हम मुफ्त में उसे रिफिल करा देते हैं। साथ ही हम किसी को मेडिकल एसेसरीज प्रोवाइड करा रहे हैं, तो उसके लिए भी सिर्फ उसकी लागत ही कस्टमर्स से लेते हैं। कोई अतिरिक्त लाभ कमाने की कोशिश नहीं करते हैं।
नीरज की टीम में अभी 16 लोग काम करते हैं, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हैं। वे कहते हैं कि हर रोज अभी हमारे पास 500 से ज्यादा सर्विस रिक्वेस्ट आ रही हैं। जिसमें से 150 से ज्यादा एम्बुलेंस की होती है। इस तरह हर दिन हम 200 से ज्यादा लोगों तक सर्विस पहुंचा रहे हैं। चूंकि अभी रिसोर्सेस की कमी है इसलिए हम सब तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।

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(साभार – दैनिक भास्कर)

चुनाव खत्म, अब कोरोना को लेकर बंगाल में सख्ती, आंशिक लॉकडाउन जारी

कोलकाता : बंगाल में विधानसभा चुनाव की समाप्ति के बाद और दो मई को मतगणना के पहले राज्य सरकार ने कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनजर ने कड़े कदम उठाने शुरू किए हैं। राज्य सरकार ने शुक्रवार को एक आदेश जारी कर एक मई से बंगाल में सभी शॉपिंग कंप्लेक्स, मॉल, ब्यूटी पार्लर, सिनेमा हॉल, रेस्टूरेंट्स, बार, स्पोर्ट्स कंप्लेक्स, जिम, स्पा और स्वीमिंग पुल बंद रखने की घोषणा की है।
वहीं, बाजार और हाट सुबह 7 बजे से 10 बजे तक और शाम को 3 बजे से पांच तक ही ही खुल रहे हैं। हालांकि आपातकालीन व्यवस्था और सेवाएं चालू रहेंगी। राज्य के मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय ने इस बाबत आदेश जारी किया है। राज्य सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार यह कदम उठाया गया है। राज्य सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियों में भीड़ एकत्रित नहीं हो। इन गतिविधियों पर रोक लगा दी गई है। बाजार और हाट निर्धारित उपुयक्त समय पर ही खुलेंगे, लेकिन आपातकालीन सेवाएं मेडिकल दुकानें, मेडिकल उपकरण की दुकानें, किराना दुकानें खुली रह रही हैं।

भारत में पहली तिमाही में सोने की माँग बढ़ी, 37 प्रतिशत बढ़कर 140 टन पर पहुँची: डब्ल्यूजीसी

मुम्बई : भारत में सोने की मांग जनवरी- मार्च 2021 तिमाही के दौरान इससे पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 37 प्रतिशत बढ़कर 140 टन पर पहुंच गयी। इस दौरान कोविड- 19 से जुड़ी कड़ाई में राहत मिलने, सोने के दाम नरम पड़ने और दबी मांग निकलने से इस दौरान मांग में तेजी रही। विश्व स्वर्ण परिषद (डब्ल्यूजीसी) ने यह कहा है। डब्ल्यूजीसी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2020 की पहली तिमाही में कुल मिलाकर सोने की मांग 102 टन रही थी। मूल्य के लिहाज से सोने की माँग पहली तिमाही में 57 प्रतिशत बढ़कर 58,800 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। जो कि एक साल पहले इसी तिमाही में 37,580 करोड़ रुपये रही थी।
जनवरी- मार्च 2020 के दौरान स्वर्णाभूषणों की कुल मांग 39 प्रतिशत बढ़कर 102.5 टन पर पहुंच गई। एक साल पहले यह 73.9 टन रही थी। मूल्य की यदि बात की जाये तो आभूषणों की मांग 58 प्रतिशत बढ़कर 43,100 करोड़ रुपये पर पहुंच गई जो कि इससे पिछले साल 27,230 करोड़ रुपये पर थी।
इस दौरान सोने में निवेश मांग 34 प्रतिशत बढ़कर 37.5 टन हो गई जो कि इससे पिछले साल 28.1 टन थी। वहीं मूल्य के लिहाज से यदि बात की जाये तो एक साल पहले के मुकाबले यह 53 प्रतिशत बढ़कर 15,780 करोड़ रुपये पर पहुंच गई जो कि पिछले साल 10,350 करोड़ रुपये रही थी।

पुरुषवादी सोच को चुनौती देकर चंद्रो दादी ने बनायी अपनी जगह

संध्या द्विवेदी
नयी दिल्ली : दादी तो सबकी होती हैं। मगर चंद्रो और प्रकाशी तोमर जैसी दादियां किस्मत से ही मिलती हैं। उनके निशानेबाजी के किस्से इतने मशहूर हुए कि उनका गांव ही ‘दादी का गांव’ कहलाने लगा। बागपत पहुंचकर अगर आप ‘जोहड़ी’ गांव का रास्ता किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछेंगे तो वह एक बार जरूर कहेगा, अच्छा आपको दादी के गांव जाना है। फिर गांव ही नहीं बल्कि दादी के घर तक का रास्ता आपको वह फौरन बता देगा। 2017 में आखिरी बार चंद्रो तोमर से मुलाकात के वक्त उन्होंने कहा था, ‘यह बात सच है कि औरतों के वोट का फैसला मर्द ही करते हैं। यह तो मर्दों का अपना फैसला है न कि औरतों को वह आगे नहीं बढ़ने देंगे, पर औरतों का भी तो कोई फैसला होगा?’
82 साल की चंद्रो का यह सवाल मर्दों की सोच से ज्यादा उन औरतों पर निशाना साधता है जो बिना कुछ कहे मर्दों के फैसले के पीछे चल पड़ती हैं। इस सवाल के जवाब में कि हर औरत आपके जैसी ताकतवर तो नहीं हो सकती? उनका जवाब था, ‘ताकत लानी पड़ती है, उसकी भी कीमत है। जब हमने बंदूक हाथों में थामी थी, तो घर के मर्दों ने क्या कुछ नहीं किया, पर मैंने भी सोच लिया कि एक बार अगर आगे बढ़ गए तो बढ़ गए। चंद्रो ने हंसते हुए बताया था, ”म्हारे घर के मरद कहवें थे कि बुढापे में तम के कारगिल में जाओगी, वहां बंदूक चलावन जाओगी, हम भी हंसते हुए जवाब देते जांगे कारगिल में भी जांगे, मगर थोड़ा टरेनिंग तो कर लें, तब तो जांगे।”
चंद्रो ने अपने संघर्ष की कहानी कुछ यूं बताई थी, ‘हम यानी मैं और मेरी देवरानी प्रकाशी तोमर ट्रेनिंग में जा सकें इसके लिए पूरी रात घर का काम करते, 2-3 घंटे ही सोने को मिलते थे। ताने अलग से, शुरुआत में तो हम चोरी छिपे जाते लेकिन एक बार अखबार में किस्सा छप गया। हमारी पिटाई भी हुई। हमने भी घर के मर्दों से कह दिया, अब ये बंदूक तो हाथ से तभी छूटेगी जब हमारे प्राण छूटेंगे। अब हमारा निशाना मर्दों की सोच पर भी लगेगा। औरतों के खिलाफ भेदभाव भरी सोच पर भी लगेगा। और वो दिन की आज का दिन हम लगातार बोर्ड पर और मर्दों की सोच दोनों पर निशाना लगा रहे हैं।’
जोहड़ी गांव में जब लड़कियां होतीं तो दादी बधाई लेकर जातीं
चंद्रो और प्रकाशी तोमर ने अपने गांव में लड़कियों को पैदा होने पर बधाई देने की प्रथा शुरू की। यह प्रथा ऐसी स्थापित हुई कि इस गांव में जब भी कोई लड़की पैदा होती है तो मोहल्ले वाले नवजात बच्ची के लिए उपहार और तोहफे लेकर उसके घर पहुंचते हैं। खूब जमकर नाच गाना होता है। गांव वालों इस परंपरा के बारे में कुछ यूं बताया था, ‘पहले लड़कियों के होने पर यहां सबके चेहरे लटक जाते थे। लेकिन दादी ने जब से बधाई देने की परंपरा डाली तो अब लड़कियों के होने पर मुंह नहीं लटकते। लोग उन्हें निशानेबाज बनाने का सपना देखते हैं, दादी की तरह और राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर झंडे गाड़ चुकी उनकी पोतियों सीमा और शेफाली की तरह।’
पुरुषवादी सोच पर करारा तमाचा
चंद्रो तोमर ने लड़के-लड़कियों के भेदभाव वाली बात पर अपना एक किस्सा बताया था। किस्सा कुछ यूं था, ‘बात 2004 की है। चंद्रो ने बताया कि मेरा मुकाबला एक DIG से हुआ। मैंने उनको हरा दिया। जब मीडिया वाले मेरी और उनकी फोटो ले रहे थे तो वह भड़क गए और कहने लगे कि एक औरत से हारने के बाद काहे की फोटो। उन्हें हारने से ज्यादा इस बात का दुख था कि वह एक औरत से हारे। उन्होंने न मेरी तरफ एक भी बार देखा न मीडिया को फोटो लेने दी। तो आप ही बताइये कि जब मैं DIG को हरा सकती हूं तो लड़कियां सब कुछ कर सकती हैं।’
नोट-2015 में निशानेबाज दादियों का किस्सा कवर करते वक्त और फिर 2017 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान चंद्रो तोमर और उनकी देवरानी प्रकाशी तोमर से मुलाकात हुई थी।
(साभार – दैनिक भास्कर)