Monday, April 6, 2026
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सभी उच्च शिक्षा संस्थान बनाएं कोविड टास्क फोर्स : यूजीसी

नयी दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षकों और छात्रों की मदद के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को कोविड टास्क फोर्स को गठित करने और हेल्पलाइन शुरू करने की सलाह दी है। आयोग ने इस संबंध में आधिकारिक वेबसाइट पर अधिसूचना भी जारी की है।
अधिसूचना के मुताबिक आयोग ने कहा है कि, “हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि बढ़ते कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों की नीजि और प्रोफेशनल कामों पर असर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों से उभरने के लिए छात्रों, शिक्षकों, अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों सहित अन्य लोगों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और समग्र कल्याण के मामले में आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए साथ मिलकर काम करना होगा।
काउंसलर और मैंटर्स की भी व्यवस्था करने का आग्रह किया
यूजीसी ने अधिसूचना के जरिए अभी उच्च शिक्षा संस्थानों से मानसिक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक समर्थन और सभी हितधारकों की भलाई के लिए काउंसलर और मैंटर्स की व्यवस्था करने का आग्रह किया है। सभी को शारीरिक और मानसिक फिटनेस के लिए विभिन्न तरह की गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कहा है। खुदको, दोस्तों को और परिवार को सुरक्षित करने के लिए सभी हितधारकों को टीका लगवाने की सलाह दी है। इसके साथ ही एनसीसी और एनएसएस सहित जीवन कौशल में सूचित प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक टीम गठित करने को कहा है। अधिक जानकारी के लिए अभ्यर्थी यूजीसी की आधिकारिक वेबसाइट www.ugc.ac.in पर जाकर अधिसूचना पढ़ सकते हैं।

गूगल मैप्स में मिलेगी बिस्तरों और ऑक्सीजन की उपलब्धता की जानकारी

दिग्गज टेक कंपनी गूगल ने कहा कि वह चुनिंदा जगहों पर बिस्तरों, और चिकित्सीय ऑक्सीजन की उपलब्धता से जुड़ी जानकारी देने के लिए गूगल मैप्स में एक नई सुविधा का परीक्षण कर रही है। इस सुविधा के माध्यम से लोग इन चीजों से जुड़ी जानकारी मांग सकते हैं और दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं।
गूगल ने कहा, ‘हम मैप्स में सवाल-जवाब का इस्तेमाल कर एक नई सुविधा का परीक्षण कर रहे हैं। यह सुविधा लोगों को चुनिंदा जगहों पर बिस्तरों और चिकित्सीय ऑक्सीजन की उपलब्धता के बारे में पूछने और स्थानीय जानकारी साझा करने में सक्षम बनाएगी। चूंकि इसमें उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री होगी न कि अधिकृत स्रोतों से मिली सामग्री, ऐसे में सूचना का इस्तेमाल करने से पहले उसकी सटीकता और नएपन का सत्यापन करना जरूरी होगा।’
टेक दिग्गज ने कहा कि उसकी टीमें प्राथमिकता के साथ तीन क्षेत्रों में काम कर रही हैं- यह सुनिश्चित करना कि लोग सबसे नई और अधिकृत सूचना पाएं, सुरक्षा एवं टीकाकरण से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश को बढ़ावा मिले और प्रभावित समुदायों, स्वास्थ्य अधिकारियों और दूसरे संगठनों के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध हो सके।

 

53 की उम्र और 103 बार किया इस कोविड योद्धा ने रक्तदान

राजकुमार सिंह
मुम्बई : मुम्बई में कांदिवली निवासी 53 वर्षीय मनमोहन रणजीतसिंह मेहता की कोविड योद्धाओं के बीच एक खास पहचान है। वे आम आदमी और कोरोना योद्धाओं को नाश्ता खाना वगैरह के अलावा कोरोना से लड़ी जा रही लड़ाई में लगने वाले जरूरी सामान तक मुहैया कराते हैं। यहां तक कि किसी को भी ब्लड या प्लाज्मा चाहिए, तो वह भी सहजता से उपलब्ध कराते हैं। मनमोहन ने देश-विदेश में 103 बार रक्तदान किया है। उन्होंने देश में ही नहीं, विदेशों में भी रक्तदान किया है। इनका एक टेंपो पूरे दिन शहर भर में जरूरी व उपयोगी सामान लेकर घूमता रहता है। जहां से भी कॉल आया, टेंपो उस ओर मुड़ जाता है।
हर जगह पहुंचाते हैं मदद
राजस्थान में अजमेर जिले के किशनगढ़ तहसील स्थित फतेहगढ़ गांव के निवासी मनमोहन मेहता रियल इस्टेट कारोबार से जुड़े हैं, लेकिन समाजसेवा इनका नशा है। लायंस क्लब इंटरनैशनल में बांद्रा से तलासरी तक के डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन भी हैं। कोविड काल के कितने पीपीई किट, सैनिटाइजर, ग्लब्स, मास्क इत्यादि बांटे, कितनों को नाश्ता-खाना भेजा उसका आंकड़ा नहीं रखते। वे कहते हैं कि इसका हिसाब क्या रखना, सेवा का हिसाब-किताब को ऊपर वाला रखता है। आम आदमी और कोरोना योद्धाओं के जरूरत का सामान पहुंचाने के लिए उन्होंने एक विशेष टेंपो रखा है, जो पूरे शहर में घूमता रहता है। मनमोहन से शायद ही ऐसा कोई सरकारी या बीएमसी का अस्पताल, दवाखाना, कोविड सेंटर बचा हो, जहां इन्होंने सामान नहीं पहुंचाया हो।
अस्पतालों में प्लाज्मा की काफी माँग
कोविड काल के दौरान 150 से ज्यादा लोगों को मनमोहन ने प्लाज्मा और 30 से ज्यादा लोगों को प्लेटलेट मुहैया कराया है, लेकिन प्लाज्मा का जिक्र करते ही वे दुखी हो जाते हैं। कहते हैं प्लाज्मा की मांग बीएमसी व राज्य सरकार के अस्पताल या फिर बड़े निजी अस्पताल शायद ही करते हो, लेकिन कुछ चुनिंदा अस्पताल बहुत ज्यादा प्लाज्मा की मांग मरीजों के रिश्तेदार से करते हैं। प्लाज्मा मुहैया करने का उनका मन नहीं करता, क्योंकि यह बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए मनमोहन कहते हैं कि प्लाज्मा से ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अस्पताल वाले जब मांगते हैं, तो परिजन को व्यवस्था करनी पड़ती है। वे कहते हैं कि प्लाज्मा के बाबत एसओपी होना चाहिए, ताकि आम आदमी को अस्पतालों की लूट से बचाया जा सके। वे कहते हैं हमारे पास जो लोग प्लाज्मा के लिए आते हैं उनके लिए व्यवस्था करनी पड़ती है।
विदेश में भी किया है रक्तदान
मनमोहन ने देश में ही नहीं, विदेश में भी रक्तदान किया है। खाड़ी देश कुवैत और दुबई में 4 बार रक्तदान किया है। पेरिस में रक्तदान करने लिए गए थे, लेकिन समय के अभाव के कारण नहीं कर सके।
स्विट्जरलैंड में रक्तदान करने गए लेकिन उस देश ने यह कहते हुए रक्तदान स्वीकार नहीं किया कि वे पर्यटकों का रक्तदान स्वीकार नहीं करते। मनमोहन हर 3 महीने में ब्लड डोनेशन करते हैं। हर साल 125 से 150 रक्तदान कैंप का आयोजन भी कराते हैं, जिसमें छात्रों को रक्तदान के लिए प्रोत्साहित
(साभार – नवभारत टाइम्स)

धर्म से ऊपर उठकर अयोध्या के गाँव ने चुना अपना प्रधान

अयोध्या : देश में हिंदू और मुसलमान को लेकर सियासत करने वाले राजनेताओं के सामने अयोध्या के आम मतदाताओं ने लोकतंत्र की अनोखी मिसाल पेश की है। अयोध्या के एक हिंदू बहुल गांव ने अपने क्षेत्र में एक मुस्लिम प्रत्याशी को गांव का प्रधान बनाया है। अयोध्या के राजापुर गांव के लोगों ने अपने गांव के इकलौते मुस्लिम परिवार के हाफिज अजीमुद्दीन को अपना प्रधान बनाया है। हाफिज इस गांव से करीब 200 वोट हासिल कर प्रधान चुने गए हैं और उनके चयन के बाद क्षेत्र के लोगों को उनसे काफी उम्मीदें हैं। 600 वोटों वाले राजापुर गांव में कुल 27 मुस्लिम मतदाता हैं। ये सभी लोग हाफिज के परिवार या रिश्तेदारी के ही लोग हैं। हाफिज कहते हैं कि गांव की प्रधानी जीतना, उनके लिए ईद के तोहफे जैसा है। वो कहते हैं कि गांव के हिंदू मतदाताओं के समर्थन ने ही उन्हें प्रधान बनाया है और अब लोगों की उम्मीद को पूरा करना उनका फर्ज है। पेशे से किसान हाफिज अजीमुद्दीन ने मदरसे से आलिम और हाफिज की डिग्री ली है। वो 10 वर्ष तक एक मदरसे के अध्यापक भी रह चुके हैं और अब अपने परिवार के साथ गांव में ही खेती करते हैं।
600 वोटों वाले राजापुर गांव में हिंदू वोटरों के समर्थन ने ही हाफिज अजीमुद्दीन को यहां का प्रधान बनाया है। अजीमुद्दीन कहते हैं कि गांव के लोगों ने उनपर जो विश्वास जताया है, वो उसके लिए आभारी हैं। गांव के किसान शेखर साहू कहते हैं कि इस बार लोगों ने धर्म को नहीं, इंसान को देखकर अपना वोट डाला है। ये बात सही है कि हम सभी हिंदू धर्म को मानते हैं, लेकिन हमने मुस्लिम प्रधान को चुनकर ये साफ संदेश की कोशिश की है कि हम सभी धर्मों को समान रूप से सम्मान देते हैं।
अयोध्या मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने अजीमुद्दीन को सांप्रदायिक भाईचारे की मिसाल बताया है। हुसैन कहते हैं, अजीमुद्दीन का जीतना ये बताता है कि हिंदुस्तान में तमाम चुनौतियों के बावजूद सभी धर्मों में आपसी प्रेम बरकरार है और यही हमारे देश की असल ताकत है।

60 की उम्र में हुनर को कारोबार बनाने वाली तारा जयप्रकाश

60-65 की उम्र पार करते ही लोगों को लगने लगता है कि अब उनके आराम करने का समय आ चुका है। बहुत से लोग समझने लगते हैं कि अब वह कुछ नहीं कर सकते तथा अपने छोटे से छोटे काम के लिए भी, दूसरों पर निर्भर रहने लगते हैं। लेकिन, आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने 60 की उम्र के बाद अपने हुनर को अपना बिज़नेस बनाया। हम बात कर रहे हैं, तमिल नाडु के कुन्नूर की रहने वाली 68 वर्षीया तारा जयप्रकाश की। तारा पिछले पाँच दशकों से बुनाई और क्रोशिया  का काम कर रही हैं।
द बेटर इंडिया से बात करते हुए तारा ने कहा, “मैं कुन्नूर के बडगा समुदाय से हूँ। इस इलाके में 12 महीने ठंड ही रहती है। इसलिए, लोग सालभर गर्म कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं। यहाँ के लोग घर में ही अपने हाथ से स्वेटर बनाते हैं। मैंने अपनी माँ और दादी से यह हुनर सीखा था। बचपन से ही मैंने उनके साथ, बुनाई और क्रोशिया से स्वेटर आदि बनाना शुरू कर दिया था। हालांकि, पहले यह काम सिर्फ घर-परिवार और दोस्तों तक सीमित था।”तारा के पति वायु सेना में कार्यरत थे, जिस वजह से उन्हें देश के अलग-अलग शहरों में रहने का मौका मिला। पति के रिटायरमेंट के बाद, तारा ने कुन्नूर में ही रहने का फैसला किया। वह कहती हैं कि वह जहां-जहां रहीं, लोगों के लिए कई तरह की चीजें बनाती रहीं। वह अपने घर के लिए बहुत सी चीजें जैसे- बेडशीट, कुशन कवर, तोरण, बच्चों के लिए गर्म कपड़े आदि, सभी कुछ खुद बनाती रही हैं। उनके बनाए कपड़ों और अन्य चीजों को देखकर, उनके जानने वाले भी उनसे अपने लिए ये चीजें बनवाने लगे। लेकिन, उन्होंने कभी भी अपने इस हुनर को बिज़नेस की तरह नहीं लिया।

तारा भले ही इतने सालों से यह काम कर रही थीं, लेकिन उन्हें कभी भी अपने बनाए गर्म कपड़ों और अन्य उत्पादों को बेचने का ख्याल नहीं आया। वह कहती हैं, “लगभग छह साल पहले मेरी बेटी ने मुझसे कहा कि मुझे इस हुनर को बिज़नेस की तरह लेना चाहिए। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो घरेलू कार्यों और अपने बच्चों के लिए हाथ से बनी चीजें तलाशते हैं। मैंने सोचा कि एक कोशिश करने में क्या बुराई है।” लेकिन, फिर भी उन्होंने इसे बड़े स्तर पर शुरू नहीं किया।
इसके बाद, वह लगभग दो-तीन महीने तक अलग-अलग तरह की चीजें बनाकर रखने लगीं। जैसे- कुशन कवर, स्वेटर, जुराब, तोरण, टेबल कवर, शॉल, टिश्यू पेपर बॉक्स, बैग आदि। साथ ही, वह शहर में आयोजित होने वाले मेले और प्रदर्शनियों में स्टॉल भी लगाने लगीं। वह कहती हैं, “कुन्नूर के अलावा, बेंगलुरु में भी हमारा एक फ्लैट है। हम साल में एक बार वहाँ जरूर जाते हैं। मैं जब भी बेंगलुरु जाती हूँ, तो अपने हाथों से बनाए कुछ सामान भी ले जाती हूँ। बेंगलुरु में होने वाले कई आयोजनों में, मैं अपने स्टॉल लगाती हूँ। जहाँ इन चीजों की काफी अच्छी बिक्री हो जाती है और ग्राहकों से सीधा संपर्क करने का मौका मिलता है। अब तक मैं लगभग 150 प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुकी हूँ। इस तरह, अब मुझे बहुत सारे लोग सामान का ऑर्डर देते हैं।”
बेंगलुरु में रहने वाली अमिता श्रीनिवासन ने एक ‘प्रदर्शनी’ में तारा के स्टॉल से अपने बच्चों के लिए गर्म कपडे और घर के लिए कुशन कवर खरीदे थे। वह कहती हैं, “ऐसा हाथ का काम आजकल कहीं आसानी से नहीं मिलता है। बाजार में भी आपको इस तरह की चीजें नहीं मिलेंगी। तारा जी की बनाई हर एक चीज खूबसूरत होने के साथ-साथ सालों-साल चलने वाली है।”
तारा कहती हैं कि उनके हाथ से बने सामानों की आज तक जो भी मार्केटिंग हुई है, वह उनके ग्राहकों ने ही की है। वह सोशल मीडिया या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मार्केटिंग नहीं करती हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनके उत्पादों की कीमत 100 रुपये से शुरू होकर 10-12 हजार रुपये तक है। जैसे कोस्टर की कीमत 100 रुपये से शुरू होती है, तो वहीं उनकी बनाई बेडशीट की कीमत 12 हजार रुपये तक है। तारा कहती हैं कि वह हमेशा नए-नए डिज़ाइन बनाने की कोशिश करती हैं। इसके अलावा, किसी चीज को बनाने में कितनी मेहनत और समय लगा है, इस आधार पर उसकी कीमत तय की जाती है।

उन्होंने कहा, “कुशन कवर को बनाने में दो-तीन दिन लगते हैं, तो स्वेटर बनाने में एक हफ्ते का समय लगता है। वहीं, बेडशीट बनाने में भी काफी समय लगता है।” कमाई के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं कि महीने में उनकी औसतन 10 हजार रुपये की कमाई हो जाती है। वहीं, जब वह किसी प्रदर्शनी में हिस्सा लेती हैं, तो उन्हें 40 हजार रुपये तक की भी कमाई हो जाती है।
(साभार – द बेटर इंडिया)

देश प्रेम की राह से ही गुजरता है कवि गुरु का विश्व प्रेम

सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया

रवीन्द्रनाथ…विश्वकवि…कवि गुरु और बंगाल के प्राण हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर। रवीन्द्रनाथ के एक विचार को लेकर कहा जाता है कि उन्होंने मानवता को देश प्रेम से अधिक महत्व दिया…लेकिन लोग यह बताना भूल जाते हैं कि कवि गुरु की मानवता और विश्व प्रेम देश प्रेम के मार्ग से होकर ही गुजरते हैं। रवीन्द्रनाथ ने कभी देश प्रेम का विरोध नहीं किया…जो लोग यह कहते हैं कि वे उग्र राष्ट्रवाद के विरोधी थे…उनको एक बार महाजाति सदन जरूर देखना चाहिए जिसका शिलान्यास उन्होंने किया था और इस महाजाति सदन की स्थापना के पीछे किसी और का नहीं बल्कि हमारे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की ही परिकल्पना और योगदान था। रवीन्द्रनाथ 12 वेलिंग्टन स्क्वायर पर स्थित राजा सुबोध मलिक बासु के घर आते थे और यहीं आया करते थे अरविंद घोष…जो कि उस समय क्रांतिकारी विचारधारा से ही प्रेरित थे और इसी दिशा में काम भी कर रहे थे। रवींद्रनाथ संभवतः ऐसे अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने दो देशों भारत और बांग्लादेश के लिए राष्ट्रीय गान लिखा। बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रवींद्रनाथ ने देशी और विदेशी साहित्य दर्शन संस्कृति आदि को अपने अंदर समाहित कर लिया था और वह मानवता को विशेष महत्व देते थे। इसकी झलक उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है।
रवीन्द्रनाथ को गाते हुए हम बड़े हुए…काबुलीवाला कहानी हम सबने पढ़ी है…उसमें भी देश प्रेम अप्रत्यक्ष रूप से दिख सकता है…काबुली वाले की तड़प में काले पानी की सजा पाने वाले क्रांतिकारियों की व्यथा सी दिख पड़ती है मुझे। इस बार के बंगाल चुनाव में जिस तरह से ‘खेला होबे’ और ‘खेला शेष होबे’ के नारे उछले…जिस तरह से जय बांग्ला के राग बेसुरा किया गया…उसने मन को विचलित कर दिया है…सोचती हूँ…ऐसे नारों पर कवि गुरु की क्या प्रतिक्रिया होती, वो कवि जिसने अपने सृजन संसार में पूरे विश्व को समाहित कर लिया….वह जिसने पूरे विश्व को अपनाया…जिसने यह तक कह दिया कि “जब तक जिंदा हूं, मानवता के ऊपर राष्ट्रभक्ति की जीत नहीं होने दूंगा।”….उन पर क्षेत्रीयता का बोझ लाद दिया गया,…किसी भी बड़े व्यक्तित्व से प्रेरित होना कोई बड़ी बात नहीं…हम सब होते हैं…तभी तो गाँधी का चरखा देश में चल पाया…मगर आज उसी राज्य में जब इस प्रेरणा में कटाक्ष खोजा जाता है तो मन डूबकर फिर से कवि गुरु को खोजना चाहता है….इसीलिए आज पहली बार मैं लिख भी रही हूँ…रवीन्द्र संगीत को गाने के लिए भी पहले उसे पढ़ना पड़ता है…समझना पड़ता है…स्कूल के दिनों से ही रवीन्द्र संगीत गाती आ रही हूँ और कॉलेज में तो समझा भी…संगीत सीखते हुए भी रवीन्द्र संगीत गाया…’तुमि कैमोन करे गान…करो हे गुनि’…मुझे तो कभी नहीं लगा कि रवीन्द्र सिर्फ बंगाल के हैं और मैं बिहार से हूँ,,’अबांगाली’ हूँ इसलिए मेरा रवीन्द्रनाथ पर कोई अधिकार नहीं,,,,हम सबको सिखाते हुए कभी भी हमारी शिक्षिकाओं ने यह भेद नहीं किया…फिर वह कौन लोग हैं जो हमारे कवि गुरु को अपनी संकीर्णताओं में लपेट लेना चाहते हैं..?


इस देश ने भगवा वस्त्रों में आध्यात्मिकता खोजी है….आप रक्त खोज लेते हैं.. आपको राम से चिढ़ है…ठाकुर के तो नाम में ही राम है…रामकृष्ण परमहंस…भगवा स्वामी विवेकानंद समेत कई विभूतियों का गौरव है…उसे राजनीतिक हथियार बना देने का अधिकार आपको किसने दे दिया….जब लिख रही हूँ तो बादल छाए हैं….और गीत याद आ रहा है….मन मोरो मेघेर संगी….बादल की भी कोई जाति या राज्य होता है भला…कविगुरु समेत अन्य विभूतियाँ भी तो इन बादलों की तरह ही हैं….साहित्य का अमृत बरसाती हैं…समुद्र मंथन से निकला अमृत अगर समुद्र में रह जाता तो क्या होता इस संसार का….इसी तरह रवीन्द्र का गौरव अगर बंगाल तक ही रह जाए..गाँधी गुजरात तक ही रह जायें…दिनकर बिहार तक ही रह जायें तो क्या होगा इस देश का…इस देश की संस्कृति का?
भारत के राष्ट्रगान को लेकर भी कहा जाता रहा है कि यह जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया है…जो भी हो…जो चयनित अंश हमारे संविधान में स्वीकृत है…वह हमारा गौरव है मगर इन पंक्तियों को देखें –
रात्रि प्रभातिल उदिल रविच्छवि
पूरब-उदय-गिरि-भाले,
साहे विहन्गम, पून्नो समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
यहाँ राजेश्वर का सम्बोधन किसके लिए है…यह जानने की प्रबल इच्छा है…इन पंक्तियों को देखिए –
‘আমার সোনার বাংলা, আমি তোমায় ভালোবাসি।
চিরদিন তোমার আকাশ, তোমার বাতাস, আমার প্রাণে বাজায় বাঁশি।

आमार सोनार बांग्ला, आमि तोमाय भालोबासि
चिरदिन तोमार आकाश, तोमार बाताश, आमार प्राणे बाजाय बांशि।
क्या इसमें आपको स्वदेश प्रेम नहीं दिखता….निश्चित रूप से बंगाल की वंदना है इन पंक्तियों में, लेकिन रवीन्द्र देश की बात भी करते हैं…
‘ও আমার দেশের মাটি, তোমার ‘পরে ঠেকাই মাথা।
তোমাতে বিশ্বময়ীর তোমাতে বিশ্বমায়ের আঁচল পাতা।
তুমি মিশেছ মোর দেহের সনে, তুমি মিলেছ মোর প্রাণের সনে,
তোমার ওই শ্যামলবরণ কোমল মূর্তি মর্মে গাঁথা।
ওগো মা, তোমার কোলে জনম আমার, মরণ তোমার বুকে।’

– ओ आमार देशेर माटि, तोमार परे ठेकाई माथा।
तोमाते विश्वमयीर तोमाते, विश्व मायेर आंचल पाता।
तुमि मिशेछो मोर देहेर सने, तुमि मिलेछो मोर प्राणेर सने,
तोमार ओई श्यामल वरण कोमल मूर्ति मर्मे गाँथा।
ओ गो मा, तोमार कोले जनम आमार, मरण तोमार बूके।

मातृ भूमि को माँ कहकर कवि गुरु ने अनेक गीत लिखे हैं और मातृभूमि का गौरव गान किया है…कवि विश्व से प्रेम अवश्य करते हैं मगर उनका यह प्रेम देश और मातृभूमि की वन्दना से होकर गुजरता है। एक उक्ति को लेकर उसका सन्दर्भ बिगाड़ देना भी अपराध ही है जो कि तथाकथित बुद्धिजीवी न जाने कब से करते आ रहे हैं। इन पंक्तियों को देखिए –
‘সার্থক জনম আমার জন্মেছি এই দেশে।
সার্থক জনম, মা গো তোমায় ভালোবেসে।
জানিনে তোর ধনরতন আছে কিনা রাণীর মতন;
শুধু জানি আমার অঙ্গ জুড়ায় তোমার ছায়ায় এসে।
কোন বনেতে জানি নে ফুল গন্ধে এমন করে আকুল,
কোন গগনে ওঠে রে চাঁদ এমন হাসি হেসে।
আঁখি মেলে তোমার আলো প্রথম আমার চোখ জুড়ালো,
ওই আলোতেই নয়ন রেখে মুদব নয়ন শেষে

सार्थक जनम आमार जन्मेछि ऐई देशे
सार्थक जनम, माँ गो तोमा. भालोबेसे
जानिने तोर धनरतन आछे किना रानीर मतन
शूधू जानि आमार अंग जुड़ाय तोमार छाया एशे।
कोन गगने उछे रे चाँद एमन हासि हेंसे।
आँखि मेले तोमार आलो प्रथम आमार चोख जुड़ालो,
ओई आलोतेई नयन रेखे मूदेर नयन शेषे।

रवीन्द्रनाथ जिन्होंने जलियावाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि लौटा दी…जिन्होंने बंग भंग के विरोध में राखी बन्धन किया…उन रवीन्द्रनाथ को बंगाल और गुजरात में बाँटने चले हैं आप…लज्जा नहीं आती…? रवीन्द्रनाथ वह हैं जो असहमतियों को सम्मान देते रहे…महात्मा गाँधी से भी उनकी असहमतियाँ रहीं मगर एक दूसरे को दोनों ने सम्मान दिया…गाँधी उसी गुजरात से आते हैं जिनकी प्रतिमा के नीचे बैठकर आमरण अनशन होते हैं..आज उसी गुजरात की आलोचना करते आप नहीं थकते। यहाँ न्यूज क्लिक वेबसाइट पर मिले प्रदीप सिंह के एक आलेख का उल्लेख करना भी प्रासंगिक है। लेखक कहते हैं, ‘टैगोर और गांधी के विचार, व्यवहार और समझ में जमीन-आसमान का अंतर था। दोनों का यह रिश्ता बराबरी का नहीं एक ‘शिक्षक’ और एक ‘छात्र’ के संदर्भ में है।
टैगोर एक उत्कृष्ट कवि थे जो ‘गुरुदेव’ के नाम से जाने जाते हैं और मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा गांधी’ के रूप में लोकप्रिय हुए। आइए हम यह देखते हैं कि आधुनिक भारत के दो महान शख्सियतों को ‘गुरुदेव’ और ‘महात्मा’ का पदनाम कैसे मिला ?

गांधी जी जब भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहरे रूप से जुड़े तब यह आंदोलन नेतृत्वहीनता का शिकार था। अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रीय आंदोलन से दूर जाने से देश की राजनीति में एक शून्य आ गया था। दरअसल, अलीपुर बम कांड के बाद अरविंदो घोष ने सक्रिय राजनीति से हट कर आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया। लंबे समय से स्वराज का अलख लगाते-लगाते तिलक का निधन हो गया था।

इस परिदृश्य का चित्रण करते हुए काकासाहेब कालेलकर लिखते हैं, “एक अंधकारमय और निराशावादी समय”, “भ्रम की एक गहरी अवधि” ने और “निराशा” को जन्म दिया। इसी समय रबींद्रनाथ टैगोर की नजर गांधी पर आकर टिक गयी। जब टैगोर ने इस आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए गांधी को चुना था, तो वह भी केवल इसलिए की उनके सामने उपलब्ध विकल्पों में शायद वह सबसे बेहतर थे।

यह टैगोर ही हैं जिन्होंने गांधी के लिए ‘महात्मा’ शब्द का प्रयोग किया था। टैगोर ने स्पष्ट किया, “‘महात्मा एक स्वतन्त्र आत्मा को संदर्भित करता है जो स्व अब व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्व है जिसमें सभी शामिल हैं” लेकिन जब टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा, तो वे अभी तक एक मुक्त आत्मा नहीं थे। इसलिए ‘महात्मा’ शब्द की व्याख्या करते हुए गांधी का वर्णन नहीं था क्योंकि वे उस समय तक ‘महात्मा’ होने के बिंदु पर थे, लेकिन अभी महात्मा बनने के लिए उन्हें अपनी क्षमताओं का और अधिक विकास करना था।गांधी ने टैगोर द्वारा दिए गए इस पदनाम पर खरा उतरने की उम्मीद के बीच अपने को असमर्थ महसूस किया और टैगोर की मदद मांगी। उन्होंने टैगोर को ‘गुरुदेव’ के नाम से संबोधित करते हुए कहा कि यदि वे चाहते हैं कि ‘गांधी’ महात्मा’ बने तो उन्हें गांधी का ‘गुरु’ बनना होगा। इस प्रकार गांधी का ‘महात्मा’ बनना गांधी और टैगोर का एक संयुक्त प्रयास था।
जब पूना में आमरण अनशन के दौरान गांधी की तबीयत खराब हो गई, तो टैगोर उनसे मिलने के लिए शांतिनिकेतन से पूना पहुंचे थे। जब गांधी ने उपवास तोड़ा, तो उनके सचिव, महादेव देसाई ने टैगोर से गांधी की पसंद की गीतांजलि की एक कविता सुनाने का अनुरोध किया। बाद में टैगोर ने बताया कि गांधी की उपस्थिति में, वह उस धुन को भूल गए थे जिसमें उन्होंने मूल रूप से कविता की रचना की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे गाया।
गांधी और टैगोर विचार औऱ व्यवहार के दो भावभूमि पर खड़े थे। लेकिन दोनों का सपना एक था। वह सपना देश को पराधीनता की बेड़ी से मुक्त करके भौतिक संसाधनों से युक्त और आद्यात्मिकता से सराबोर देश बनाना था। साझा स्वप्न को साकार करने के लिए दोनों महापुरुष एक दूसरे के करीब आए। यहां विचार कभी आड़े नहीं आया। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखा जाए तो महज चुनाव जीतने के लिए विचार परिवर्तन और भिन्न मत रखने वालों पर तीखे हमले किए जा रहे हैं। जबकि दोनों पक्षों का दावा देशहित होता है।’
आपको जिस हिन्दी से शिकायत है…और जिसे लेकर आप अपनी भाषा के प्रति असुरक्षित हो जाते हैं….कवि गुरु ने उस भाषा के महत्व को समझा और यही कारण है कि विश्व भारती में एक हिन्दी भवन भी स्थापित हुआ। रवीन्द्र नाथ कहा करते थे, “शान्ति निकेतन को समस्त जातिगत तथा भौगोलिक बन्धनों से अलग हटाना होगा, यही मेरे मन में है। समस्त मानव-जाति की विजय-ध्वजा यहीं गड़ेगी। पृथ्वी के स्वादेशिक अभिमान के बंधन को छिन्न-भिन्न करना ही मेरे जीवन का शेष कार्य रहेगा।” यही हिन्दी भवन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का कार्यक्षेत्र रहा…उस हिन्दी को अपमानित करना क्या कविगुरु के विचारों का अपमान करना नहीं है?
अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए टैगोर ने 1921 में शान्तिनिकेतन में ‘यत्र विश्वम भवत्येकनीडम’ (सारा विश्व एक घर है) के नए आदर्श वाक्य के साथ विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की। विश्वकवि गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर (टैगोर) को मान देते हुए 1935 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट उपाधि से अलंकृत किया। इस आयोजन के बाद वह प्रयागराज चले गए थे। तब महामना मदन मोहन मालवीय ने स्वयं पत्र लिखकर गुरुदेव को काशी बुलाया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने 1888 में छह महीने तक प्रवास किया और यहां का छोटा सा इतिहास भी लिखा। यहीं पर मानसी की अधिकांश कविताएं व नौका डूबी के कई अंश लिखे। उनके प्रवास स्थान पर एक पार्क है। रवींद्र नाथ टैगोर अपने दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय के यहां गोराबाजार आवास पर ठहरे थे। यहां रहते गुरुदेव की घनिष्टता एक अंग्रेज सिविल सर्जन से हो गई। रवींद्रनाथ अपनी कविताओं का अनुवाद उन्हें सुनाया करते थे। गुरुदेव यहां लार्ड कार्नवालिस समाधि उद्यान में शाम को घूमने जाया करते थे।
चलिए हमने तो कवि गुरु पर अपनी बात कही….लगे हाथों आप भी बता दीजिए कि आपने प्रसाद, निराला, तुलसी, सूर…कबीर को कितना पढ़ा है…बांग्ला में प्रेमचंद को छोड़कर कितने साहित्यकारों को सम्मान मिलता है,,,,क्या आप भी हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को वैसे ही सेलिब्रेट करते हैं,,,,जैसे हम रवीन्द्रनाथ को कर रहे हैं,,,,और करते रहेंगे….। मुझे लगता है कि किसी देश का होने के लिए उस देश का जन्म लेना ही काफी नहीं है…उस देश को समझना..और अपना बनाना जरूरी है,…तभी तो सिस्टर निवेदिता, मीरा बेन और मदर टेरेसा से लेकर फादर कामिल बुल्के को हम उतना ही सम्मान देते हैं..।
आप बात तो विश्व को गाँव बनाने की करते हैं मगर सत्य यह है कि अपनी कुंठाओं के गाँव को आपने दुनिया समझ लिया है। आप चाहते हैं कि आपकी भाषा, आपकी संस्कृति का जयगान हो और आप श्रेष्ठता का दर्प लिये घूमते रहें,.,,,सम्मान एक हाथ से नहीं मिलता,,,सम्मान पाने के लिए पहले सम्मान देना पड़ता है…हमारे लिए कवि गुरु, नेता जी की पहचान इसलिए नहीं है कि वे बंगाल में जन्मे,,,,वह हमारे मन में इसलिए हैं कि उन्होंने खुद को एक क्षेत्र में सीमित नहीं रखा,,,बल्कि इस भारत देश को ,,,समूचे विश्व को अपना लिया….वह कुंठित लोग नहीं थे…नेता जी ने “कोलकाता चलो’ का नारा नहीं दिया…”दिल्ली चलो’ कहा…इसलिए इस देश के लोकगीतों में वह अब तक बसे हुए हैं….ये लोग आपकी कुंठाओं से बहुत ऊपर हैं…उनको समझना पड़ता है…समझ भाषा, जाति, संस्कृति….क्षेत्र नहीं देखती…देखती तो कार्ल मार्क्स आपके पुरोधा न होते…कवि गुरु बंगाली अस्मिता से अधिक भारतीय वसुधेव कुटुम्बकम के परिचायक हैं,….अब जाते – जाते द्विजेन्द्रलाल राय का एक गीत भी आपके लिए
দ্বিজেন্দ্রলাল রায়
ধনধান্য পুষ্পভরা
ধনধান্য পুষ্পভরা আমাদের এই বসুন্ধরা;
তাহার মাঝে আছে দেশ এক- সকল দেশের সেরা;
সে যে স্বপ্ন দিয়ে তৈরি সে দেশ স্মৃতি দিয়ে ঘেরা;
এমন দেশটি কোথাও খুঁজে পাবে নাকো তুমি,
সকল দেশের রানী সে যে-আমার জন্মভূমি।

धनधान्य पुष्पभरा आमादेर एई वसुन्धरा
ताहार माझे आछे देश एक..सकल देशेर शेरा
शे जे स्वप्न दिये तेरि से देश स्मृति दिये घेरा
एमन देशटि कोथाओ खूँजे पाबे नाको तूमि,
सकल देशेर रानी से जे, आमार जन्मभूमि

स्त्रोत साभार

संस्कृत श्लोकों में अभिव्यक्त करें माँ के प्रति प्रेम

1
. ‘यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरितकी।’
(अर्थात, हरीतकी (हरड़) मनुष्यों की माता के समान हित करने वाली होती है।)

2. ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदपि गरीयसी।’
(अर्थात, जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।)

3. ‘माता गुरुतरा भूमेरू।’
(अर्थात, माता इस भूमि से कहीं अधिक भारी होती हैं।)

4. ‘नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।’
(अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।)

5. ‘मातृ देवो भवः।’
(अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।)

6. ‘अथ शिक्षा प्रवक्ष्यामः
मातृमान् पितृमानाचार्यवान पुरूषो वेदः।’

(भावार्थः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य हो तो तभी मनुष्य ज्ञानवान होगा।)

7. ‘माँ’ के गुणों का उल्लेख करते हुए आगे कहा गया है-
‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्य स मातृमान।’

(अर्थात, धन्य वह माता है जो गर्भावान से लेकर, जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।)

8. ‘रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।’

(अर्थात, जिस प्रकार संसार में पाँच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पाँच प्रकार की माँ होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।)

9. ‘स्त्री ना होती जग म्हं, सृष्टि को रचावै कौण।
ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनों, मन म्हं धारें बैठे मौन।
एक ब्रह्मा नैं शतरूपा रच दी, जबसे लागी सृष्टि हौण।’

(अर्थात, यदि नारी नहीं होती तो सृष्टि की रचना नहीं हो सकती थी। स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक सृष्टि की रचना करने में असमर्थ बैठे थे। जब ब्रह्मा जी ने नारी की रचना की, तभी से सृष्टि की शुरूआत हुई।)

10. आपदामापन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥

(भावार्थ- जब विपत्तियां आने को होती हैं, तो हितकारी भी उनमें कारण बन जाता है । बछड़े को बांधने मे माँ की जांघ ही खम्भे का काम करती है ।)

11. नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥

(भावार्थ-माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥)

(साभार – टाइम्स नाऊ)

माँ

  • निखिता पांडेय

जो अपने गर्भ में नौ माह तक रखती है,वह है मां
जो उंगली पकड़ कर चलना सीखाये,वह है मां
जो पहली बार मुख से बोलना सीखाये,वह है मां
जो गिरने पर डांट लगाये,वह है मां
जो अपनी संतान को सबसे पहले खाना खिलाये,वह है मां
जो घर में सबसे देर से खाये,वह है मां
जो सबकी डांट सुनकर रह जाये,वह है मां
जो सुबह से रात तक काम करे,वह है मां
जो त्याग और समर्पण की देवी है,वह है मां
जो निस्तब्ध रहकर कुछ न बोले,वह है मां
जो अपने बच्चे के घर लौटने का इंतज़ार करे,वह है मां
जो नि:स्वार्थ प्रेम करे,वह है मां
जो बिना बोले मन की बात समझ जाये,वह है मां
मां वह संसार है,जो न हो तो जीवन व्यर्थ है और
जो दर्द सहकर भी मुस्कुराये,वह है मां।

‘ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, उम्मीद है कि आप सब ठीक होंगी या ठीक ठाक रहने की कोशिश जरूर कर रही होंगी।। सखियों इन दिनों हमारे चारों ओर नाउम्मीदी, निराशा और हताशा की ऐसी लहर छाई है कि मन पर हमेशा उदासी सी पसरी रहती है। समाचार चैनल हों या अखबार या फिर सोशल मीडिया हर तरफ गुहार और चीख पुकार सी मची हुई है। लोग रोज दर रोज सैकड़ों की संख्या में बीमार हो रहे हैं और उनमें से बहुत से लोग जिंदगी की लड़ाई में हार भी जा रहे हैं। सखियों, यह स्थिति सच में बेचैन करने वाली है। हम चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते। कई मर्तबा बस सर पटक कर रह जाते हैं। हमारे अपने, हमारी आंखों के सामने से इस तरह से मौत के आगोश में समा जा रहे हैं कि लगता है जैसे किसी ने गाल पर थप्पड़ लगाकर हमारा सब कुछ हम से भरे बाजार लूट लिया हो। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों इतनी लचर हो चुकी है कि जिनकी जेब में पैसा है, वह भी डॉक्टर और दवाई के अभाव में दम तोड़ने को विवश हैं। और गरीब लोग तो दोहरी मार झेल रहे हैं। उन्हें तो हर हाल में पिसना है, या तो रोजी रोजगार के घटते या खत्म होते अवसरों के कारण रोटी के अभाव में या फिर दवाइयों की कालाबाजारी के कारण उनके अभाव में। ऐसा लगता है कि एक लंबी अंधेरी सुरंग से हम गुजर रहे हैं। हाथ को हाथ नहीं सुझाई देता। दिमाग को उपाय नहीं दिखाई देता और यह सुरंग है कि खत्म होने में नहीं आती। बीमारी की लहर पहली हो दूसरी या फिर तीसरी, इस तरह लोगों के प्राणों को अपने साथ समेट कर ली जा रही है जैसे कोई चोर रातों रात घर भर के ही नहीं देश भर के तमाम कीमती सामानों पर हाथ साफ कर दे। ऐसे में आदमी का नाउम्मीद होना स्वाभाविक ही है लेकिन सखियों, उम्मीद का दामन छोड़कर हम कैसे और कब तक जी पाएंगे। उम्मीद के डूबने का मतलब है जीते जी मौत को स्वीकार कर लेना, इसलिए लड़ना तो जरूरी है और लड़ेंगे हम तभी जब हमारे मन में उम्मीद की शिखा रौशन रहेगी। कहते हैं, रात कितनी भी गहरी क्यों ना हो सूर्य की किरणें उसके तमाम अंधकार को सोख लेती हैं इसीलिए हमें भी अपने मन में उस किरण की प्रतीक्षा की उम्मीद को जिलाए रखना है और जितना हो सके प्रेरक साहित्य, सकारात्मक संगीत या सृजनात्मक कलाओं में जीवन की उम्मीद को ढूंढकर, उसे बचाए रखने की कोशिश करनी है। शाम कितनी भी बुझी बुझी या उदास क्यों न हो ढलती जरूर है। इसीलिए तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने उम्मीद की लौ को जलाए रखते हुए कहा-

“दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है 

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है ।।

सकारात्मक ऊर्जा की तलाश में साहित्य की शरण में जाने पर हम पाते हैं कि हमारे साहित्यकार तो अपनी ओज और उत्साह भरी रचनाओं के माध्यम से हमारे मन की निराशा को छांट कर उसमें बड़े‌ यत्न और कौशल से आशा का दीपक जलाकर हमारे मन को मुरझाने से बचा लेते हैं। कवि हरिवंश राय बच्चन की कविता की ये पंक्तियां तो हताशा से बोझिल मन को यकीनन नया जीवन देती हैं-

“उठी ऐसी घटा नभ में

छिपे सब चाँद और तारे,

उठा तूफ़ान वह नभ में

गए बुझ दीप भी सारे,

मगर इस रात में भी लौ लगाये कौन बैठा है?

अँधेरी रात में दीपक जलाये कौन बैठा है?”

इस दीपक की लौ को हमें जलाए रखने की कोशिश जरूर करनी चाहिए क्योंकि गम की शाम को तो ढलना ही है और सूरज की किरण को चमकना ही है। नरेश कुमार “शाद” के शब्दों में कहूं तो-

“इतना भी ना-उमीद दिल-ए-कम-नज़र न हो 

मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो ।।

सखियों, समय कैसा भी हो, बहुत दिनों तक नहीं रहता, वह चाहे सुख का हो या दुख का। तो थोड़ा धीरज तो हमें धरना ही होगा। धैर्य से हम बड़ी से बड़ी मुश्किलों का सामना भी कर‌ लेते हैं लेकिन निराशा और हताशा का शिकार होकर हम जीती हुई बाजी भी हार देते हैं। हताशा, स्वयं एक बड़ा रोग है इसीलिए हमें सावधान रहना है कि कहीं यह हमारे मन को अपनी गिरफ्त में लेकर हमारी आशा की लौ को मंद ना कर दे। यह आपदा का समय है और हमारी कठिन परीक्षा लेने पर तुला हुआ है। उम्मीद और नाउम्मीदी में जंग छिड़ी हुई है। हमें अपने मन को बड़े यत्न से साधना है ताकि उम्मीद हारने ना पाए क्योंकि वही हमारी सांसों की रफ्तार को संभालें रखती है। इसी बात को फ़ानी बदायुनी कुछ यूं बयां करते हैं-

“नाउमीदी मौत से कहती है अपना काम कर 

आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है।। 

सखियों, आज हम सबका यह फर्ज बनता है कि सिर्फ अपने बारे में न सोचें बल्कि पूरे समाज के बारे में सोचें और सब को उम्मीद की डोर में बांधने की कोशिश करें। इस समय सामूहिकता की बहुत जरूरत है। हमें एक दूसरे को हौसला देना है, एक दूसरे की हिम्मत बंधानी है और इस अंधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता साथ मिलकर तलाशना है। अपने -अपने अंधेरे से अकेले लड़ने की जगह एक साथ मिलकर इस नाउम्मीदी के अंधेरे को हराना है। सामूहिकता में बड़ी शक्ति होती है और इस बात को समझने की जरूरत हर इन्सान को है। शहरयार इसी बात पर बल देते हुए कहते हैं-

“अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी 

ये काम मगर मुझ से अकेले नहीं होगा ।।

आइए, हम सब मिलकर इस महामारी की आंधी का सामना करें और यकीन रखें कि आंधी कितनी भी तेज या विध्वंशक क्यों ना हो, इंसान उससे निपटकर जीने और हजारों बार‌ उजड़ने ओर बिखरने के बावजूद फिर से नव सृजन या नयी शुरुआत का हौसला जुटा ही लेता है। भरोसा रखिए, ये दुख और विनाश के दिन भी समाप्त होंगे ही। बस हमें सावधानीपूर्वक, धैर्य और उम्मीद का दामन थामकर इस समय को झेल लेना है। हमारी उम्मीद बची रही तो फिर से सुख के दिन अवश्य आएंगे, यही बात हमारा साहित्य भी कहता है-

“शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे 

ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे।।”

 

दिहाड़ी मजदूर की पत्नी चंदना बाउरी बनीं विधायक

कोलकाता :  बंगाल विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा हो,  लेकिन पार्टी की एक महिला विधायक की जीत खूब चर्चा में है। एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी 30 वर्षीय चंदना बाउरी के विधानसभा पहुंचने की कहानी से हर कोई हैरान है। भाजपा के टिकट पर बांकुड़ा जिले की सालतोड़ सीट से चुनाव लड़ने वाली चंदना बाउरी ने 4,000 वोटों से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार संतोष कुमार मंडल को शिकस्त दी है। एक झोपड़ी में रहकर गुजर करने वालीं चंदना की कहानी इंटरनेट मीडिया पर भी वायरल हो रही है। चंदना बाउरी की जीत इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि वो एक साधारण परिवार से आती हैं और संपत्ति के नाम पर उनके पास एक झोपड़ी और कुछ पैसे हैं। भाजपा नेता सुनील देवधर ने ट्वीट कर जानकारी दी कि चंदना बाउरी की जमापूंजी कुल 31,985 रुपये है। उन्होंने बताया कि चंदना अनुसूचित जाति से आती हैं, झोपड़ी में रहती हैं, वह एक मजदूर की पत्नी हैं और संपत्ति के नाम पर उनके पास तीन गाय और तीन बकरियां हैं। चुनाव आयोग में दिए गए शपथ पत्र में चंदना के बैंक खाते में सिर्फ 6335 रुपये हैं। संपत्ति के नाम पर चंदना के पास तीन गाय, तीन बकरी, एक झोपड़ी और बैंक में जमा नकद मिलाकर कुल 31,985 रुपये हैं। चंदना के घर में शौचालय भी नहीं है। पार्टी के प्रति वह इतनी ज्यादा समर्पित थीं कि प्रचार के लिए रोजाना कमल के प्रिंट वाली भगवा रंग की साड़ी पहनकर निकलती थीं।बताया जा रहा है कि चंदना बाउरी के पति श्रबन मजदूरी करते हैं। वह राजमिस्त्री का काम करते हैं। पति और पत्नी दोनों मनरेगा में पंजीकृत मजदूर हैं। उनके तीन बच्चे भी हैं। चंदना पिछले सात-आठ साल से भाजपा से जुड़ी हुई हैं। चंदना अपने क्षेत्र में लोगों के बीच गईं और भाजपा की खूबियां गिनाते हुए तृणमूल पर हमला बोला। वह गंगाजलघाटी के केलाई गांव स्थित अपने घर से रोजाना सुबह आठ बजे चुनाव प्रचार के लिए निकलती थीं। उन्होंने लोगों से महिला संबंधी अपराधों, गरीबी, शिक्षा और पीने के पानी जैसे मुद्दों पर वोट मांगा।