Tuesday, April 7, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 358

गूगल ने भारत में पेश किया न्यूज शोकेस , 50 हजार पत्रकारों, छात्रों को मिलेगा प्रशिक्षण

नयी दिल्ली : गूगल ने भारत में 30 समाचार संगठनों के साथ अपने न्यूज शोकेस की पेशकश की, जिसका मकसद गूगल के समाचार और खोज मंचों पर गुणवत्तापूर्ण सामग्री प्रदर्शित करने के लिए प्रकाशकों को प्रोत्साहित करना और समर्थन देना है। इसके साथ ही गूगल भारत में अगले तीन वर्षों के दौरान समाचार संगठनों और पत्रकारिता विद्यालयों के 50,000 पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों को डिजिटल हुनर सिखाएगा। गूगल के उपाध्यक्ष (उत्पाद प्रबंधन) ब्रैड बेंडर ने कहा, ‘‘हम अब प्रकाशकों की मदद के लिए न्यूज शोकेस पेश कर रहे हैं, ताकि लोगों को भरोसेमंद खबर मिल सके, विशेष रूप से इस महत्वपूर्ण समय में जब कोविड संकट जारी है। समाचार शोकेस दल प्रकाशकों की पसंद के अनुसार लेखों को बढ़ावा देता है, और उन्हें खबर के साथ अतिरिक्त संदर्भ देने की अनुमति भी देता है, ताकी पाठकों में इस बात की बेहतर समझ बन सके कि उनके आसपास क्या हो रहा है।’’
उन्होंने कहा कि ये समाचार दल ब्रांडिंग सुनिश्चित करते हैं, और उपयोगकर्ताओं को प्रकाशकों की वेबसाइट पर ले जाते हैं। गूगल न्यूज शोकेस भारत में 30 राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय समाचार संगठनों के साथ शुरू किया गया है और आने वाले दिनों में इस संख्या में बढ़ोतरी की जाएगी। गूगल की यह सेवा जर्मनी, ब्राजील, कनाडा, फ्रांस, जापान, यूके, ऑस्ट्रेलिया, चेकिया, इटली और अर्जेंटीना सहित एक दर्जन से अधिक देशों में उपलब्ध है।
भारत में गूगल के कंट्री हेड और उपाध्यक्ष संजय गुप्ता ने कहा कि प्रिंट, टेलीविजन और डिजिटल में समाचारों की खपत बढ़ रही है, वहीं उपभोक्ता आदतों में बदलाव भी आ रहा है, जिसमें अधिक युवा उपभोक्ता समाचार के लिए डिजिटल पहुंच का इस्तेमाल कर रहे हैं। गुप्ता ने कहा कि कंपनी अगले तीन वर्षों में 50,000 से अधिक पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों को प्रशिक्षित करेगी और इसके तहत खबरों के सत्यापन, फेक न्यूज से निपटने के उपायों और डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल पर खासतौर से ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

वीडियो कॉल से सीखकर शुरू किये 4 साल से बंद पड़े आईसीयू के 4 वेंटिलेटर

7 मरीजों की जान बचाई, बिहार सरकार ने भी मॉडल को सराहा
औरंगाबाद : मेडिकल स्टाफ ने कम संसाधनों के बावजूद वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीखी और चार साल से बंद पड़े के आईसीयू चार वेंटिलेटर को फिर से शुरू कर दिया। बिहार में औरंगाबाद प्रशासन और सदर अस्पताल के कर्मचारियों ने अपनी सूझबूझ से कबाड़ बन चुके वेंटिलेटर को फिर से चालू कर दिया। इससे अब तक 7 मरीजों की जान भी बचाई जा चुकी है। बताया जाता है कि एक डॉक्टर और कुछ नर्सों ने कम संसाधनों के बावजूद वीडियो कॉल पर दिल्ली एम्स से तकनीक सीखी और चार साल से बंद पड़े एम्स के चार वेंटिलेटर को फिर से शुरू कर दिया। अब इस मॉडल को राज्य सरकार ने भी बेहतर बताया है। साथ ही औरंगाबाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से इससे जुड़ी हर जानकारी दो दिनों के अंदर मांगी है।
वेंटिलेटर पर रखे गए सभी मरीज सुरक्षित
सौरभ जोरवाल ने बताया कि आईसीयू को किन हालत में और कैसे शुरू किया गया? इसके लिए कौन-कौन से उपाय किए गए? इस संबंध में हर एक जानकारी सरकार ने मांगी है। इसे तैयार कर भेजा जा रहा है। आईसीयू के वेंटिलेटर पर रखे गए 7 मरीज पूरी तरह सुरक्षित हैं। इनमें से कई मरीजों का ऑक्सीजन लेवल काफी कम था। पावर ग्रिड कंपनी के सहयोग से सदर अस्पताल में करीब चार साल पहले पौने तीन करोड़ की लागत से आईसीयू का निर्माण हुआ था। बाद में इसके चार वेंटिलेटर कबाड़ बन गए। अधिकांश सामान भी खराब हो गए थे। तारों को चूहों ने कुतर दिया। 2 साल पहले हीट स्ट्रोक से 70 लोगों की जानें गई थीं। तब स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने अपने दौरे में आईसीयू शुरू कराने की बात कही थी, लेकिन डॉक्टरों और तकनीशियन की कमी के कारण यह हो न सका।
इधर, कोरोना की दूसरी लहर का पीक जिले में 20 अप्रैल से पांच मई तक रहा। इस दौरान सिस्टम के भी कई लोगों की जानें गई। हर रोज कोविड सेंटर से लाशें निकल रही थी। फिर जान बचाने के हर एक बिंदु पर विचार किया गया। तत्काल बंद पड़े आईसीयू का वेंटिलेटर शुरू कराने का विचार आया। इसके एसपी सुधीर कुमार पोरिका, डीडीसी अंशुल कुमार, सिविल सर्जन डॉ. मो. अकरम अली, डीपीएम व कुछ अन्य अधिकारियों के साथ आपात बैठक हुई। इसमें सदर अस्पताल के डॉ. जन्मेजय का नाम सामने आया। तुरंत उन्हें तलब किया गया। अचानक बताया गया कि आपको आईसीयू का इंचार्ज बनाया जाता है। डॉक्टर नौकरी छोड़ने वाले थे, लेकिन डीएम के कहने पर मान गए। इसके बाद सिविल सर्जन, डीपीएम को सहयोग करने की जिम्मेदारी दी गई। डीडीसी को स्पेशल देखरेख के लिए नियुक्त किया गया। इस संबंध में 20 मीटिंग हुई। फिर डीएम ने डब्ल्यूएचओ और दिल्ली एम्स के डॉक्टरों से संपर्क किया। वीडियो कॉल और वर्चुअल तरीके से आईसीयू इंचार्ज डॉक्टर और नर्स को ट्रेनिंग दिलाई। ट्रेनिंग के बाद पांच मॉक ड्रिल हुआ। इसके बाद 10 मई से आईसीयू शुरू कर दिया गया। अभी भी चार कोविड मरीजों को भर्ती किया गया है, जिनकी हालत खतरे से बाहर है।

दिल्ली तक के अधिकारियों ने मीटिंग कर मॉडल समझा
इस मॉडल को समझने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य विभाग के नेशनल कोऑर्डिनेटर अजीत सिंह, दिल्ली एम्स और एशिया लेवल के ट्रॉमा एक्सपर्ट डॉ. संजीव कुमार घई, दिल्ली एम्स में कोविड को लीड कर रहे डॉ. तेज प्रकाश ने तीन दिन पहले औरंगाबाद डीएम, डीडीसी, सिविल सर्जन, आईसीयू इंचार्ज समेत करीब 30 डॉक्टरों की वर्चुअल मीटिंग की। अधिकारियों ने पूरे मॉडल को समझा। उन्होंने इस मॉडल को बिहार के साथ देश के अन्य जिलों में लागू कराने की बात कही।

जहां डॉक्टर्स की कमी, वहां इसका इस्तेमाल करेंगे
जानकारी के मुताबिक, यह तकनीक वहां लागू होगी, जहां वेंटिलेंटर तो हैं, लेकिन डॉक्टर्स और टेक्निशियन की कमी है। ऐसे में राज्य और केंद्र सरकार इस मॉडल को लागू कराकर खराब पड़े वेंटिलेटर्स को शुरू कराएगी, जिससे मरीजों की जान बचाई जा सके।

महामारी के बीच आँखों की सेहत का रखें ध्यान

कोरोना काल में घर में रहकर काम करने से जहां स्क्रीन टाइम बढ़ा है, वहीं ज़ाहिर है, आंखों पर ज़ोर भी ज़्यादा बढ़ा है। आंखों की सुरक्षा व सेहत के लिए किन बुनियादी बातों का ध्यान रखना है।
आँखों को आराम दें
घर में ही रहने से सब हर समय किसी ना किसी स्क्रीन के सामन डटे रहते हैं, जैसे टीवी देख रहे हैं, कम्प्यूटर पर काम कर रहे हैं, या मोबाइल पर आंखें गड़ाए हैं। आँखों को बीच-बीच में थोड़ा आराम दें। लगातार स्क्रीन पर नज़र रहेगी, तो आँखें प्रभावित होंगी। 20 मिनट के स्क्रीन टाइम के बाद 5 मिनट आँखों को बंद करके आराम दें। आंखों को ठंडक देने के लिए खीरे का टुकड़ा या टिश्यू पेपर को गुलाब जल से गीला करके आँखों पर रखें। इससे ये हाइड्रेटेड रहेंगी, थकान उतरेगी और ताज़गी महसूस होगी।
आँखों के लिए व्यायाम
शरीर की तरह आँखों को भी व्यायाम कराएं। आंखों को चारों तरफ़ गोल-गोल घुमाएं। ऊपर और नीचे घुमाएं। कम से कम तीन से चार सेकेंड तक अपनी पलकों को लगातार झपकाएं और फिर आँखें तेज़ी से बंद कर लें। कुछ सेकंड बाद आंखें खोलें। इसके अलावा नज़रें तेज़ करने वाली पहेलियां जैसे दो तस्वीरों में अंतर ढूंढना या अलग वस्तु पहचानें आदि भी आंखों के लिए व्यायाम का काम करेंगी।
तरीक़े बदलिए
रोशनी बंद करके और लेटकर टीवी देखने से आँखों पर तनाव बढ़ता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि हमेशा बैठकर, समुचित दूर से और थोड़ी रोशनी में टीवी देखना चाहिए। टीवी न दाईं ओर और न बाईं ओर बैठकर देखें, हमेशा सामने ही बैठकर देखें। इसके लिए कमरे की व्यवस्था भी उसी प्रकार करें। किताब या मोबाइल देखते वक़्त आंखों को छोटी करके और ज़ोर देकर न देखें, न पढ़ें। आइड्रॉप ज़रूर डालें, लेकिन चिकित्सक के निर्देशानुसार।
रोशनी का ध्यान रखें
केवल स्क्रीन पर काम करते वक़्त ही नहीं बल्कि आँखों का कोई भी काम करते वक़्त रोशनी की अच्छी उपलब्धता ज़रूर रखें, चाहे पढ़ाई कर रहे हों, या मोबाइल का इस्तेमाल या सिलाई-कढ़ाई। भरपूर रोशनी नहीं होगी तो आंखों पर ज़ोर पड़ेगा। अपनी वर्क डेस्क खिड़की के पास बनाएं। यह भी ध्यान रखें कि बाहर की रोशनी सीधे कम्प्यूटर या लेपटॉप पर न पड़े क्योंकि इससे स्क्रीन साफ़ नज़र नहीं आएगी और आंखों पर ज़ोर देकर देखना पड़ेगा। बैठक ऐसे व्यवस्थित करें कि रोशनी हो लेकिन स्क्रीन पर निगाह टिकाते समय आपको आंखों पर अतिरिक्त ज़ोर न देना पड़े।

(साभार – दैनिक भास्कर)

डीआरडीओ ने बनायी किफायती और त्वरित कोरोना एंटीबॉडी टेस्टिंग किट

75 रुपये कीमत, 75 मिनट में मिलेगी जाँच रिपोर्ट

नयी दिल्ली : रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन ( डीआरडीओ) ने एंटीबॉडी की जांच के लिए डिप्कोवैन (Dipcovan) किट बनाई है। डीआरडीओ के मुताबिक, यह किट शरीर में SARS-CoV-2 के वायरस और इससे लड़ने वाले प्रोटीन न्यूक्लियो कैप्सिड (S&N) दोनों की मौजूदगी का पता लगा सकती है। यह 97% की हाई सेंसिटिविटी और 99% स्पेसिफिसिटी के साथ मात्र 75 रुपए की कीमत पर 75 मिनट में आपको रिपोर्ट भी दे देगी।
दिल्ली के अस्पतालों में करीब 1000 मरीजों पर परीक्षण के बाद इसे बाजार में उतारने की अनुमति दी गयी है। पिछले एक साल के दौरान इस किट के तीन बैच का अस्पतालों में अलग-अलग परीक्षण किया गया है। डीआरडीओ के लैब डिफेंस इंस्टीट्यूट ऑफ फिजियोलॉजी एंड एलायड साइंसेस लेबोरेटरी ने दिल्ली की एक निजी कंपनी वैनगार्ड डायगनोस्टिक के सहयोग से इस किट को तैयार किया है। यानि यह पूर्ण रूप से स्वदेशी किट है।
जून के पहले हफ्ते से बाजार में मिलेगी किट
आईसीएमआर ने इसी अप्रैल में डिप्कोवैन किट को अनुमति दी और इसी महीने ड्रग्स कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया ( डीसीजीआई) ने इसके निर्माण और बाजार में बेचे जाने की मंजूरी दी है। वैनगार्ड लिमिटेड व्यावसायिक तौर पर जून के पहले हफ्ते में इस किट को बाजार में उतारेगा।

‘हार्वर्ड कॉलेज विजन’ में बीएचएस का देवांशु सम्मानित

इस ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस में सारी दुनिया से भाग लेते हैं विद्यार्थी

कोलकाता :  महानगर के बिड़ला हाई स्कूल के विद्यार्थी देवांशु चौधरी ने ग्लोबल हेल्थ सोसाइटी द्वारा ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस’ ‘हार्वर्ड कॉलेज विजन में भाग लिया और उसे सम्मानित किया। आइए देवांशु से जानते हैं उसका अनुभव –

‘हार्वर्ड कॉलेज विजन’ ग्लोबल हेल्थ सोसाइटी द्वारा ग्लोबल हेल्थ एंड लीडरशिप कॉन्फ्रेंस’ द्वारा आयोजित किया जाता है।  यह हार्वर्ड कॉलेज में आधिकारिक तौर पर मान्यता प्राप्त संगठन है और हर यह हार्वर्ड विश्वविद्यालय में आयोजित होता है। हाई स्कूल के विद्यार्थियों को वैश्विक स्वास्थ्य के प्रति सजग बनाने और जागरुक बनाने के उद्देश्य से साथ लाया जाता है। मूल वक्ता के भाषणों की श्रृंखला. परिचर्चा और कार्यशालाओं के जरिए विद्यार्थी वैश्विक स्वास्थ्य को लेकर पेशेवरों तथा अकादमिक जगत के लोगों से काफी कुछ सीखते हैं। वे कम्यूनिटी प्रोजेक्ट पिच कम्पटिशन और केस स्टडी कम्पटिशन से काफी कुछ सीखते हैं। कोरोना महामारी के कारण यह आयोजन इस बार जूम ऑनलाइन माध्यम से गत 22 और 23 मई को आयोजित हुआ। सम्मेलन 22 और 23 मई को आयोजित किया गया था। एक अत्यंत विचारोत्तेजक सत्र, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य के कई पहलुओं पर हार्वर्ड के प्रोफेसरों के व्याख्यान और वैश्विक स्वास्थ्य के लिए अपनी परियोजनाओं पर हार्वर्ड के स्नातक छात्रों द्वारा आयोजित कार्यशालाएं भी शामिल थीं। पुरस्कार समारोह से पहले सभी विजेताओं को अंतिम बार अपनी पिच प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था, इसके बाद दर्शकों द्वारा एक प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया था।
वैश्विक स्वास्थ्य और नेतृत्व सम्मेलन का मिशन लोगों की भलाई और गरिमा को बढ़ावा देने वाले प्रमाणित, प्रभावी, किफायती और टिकाऊ आयोजनों के जरिए युवाओं को सजग करना है। युवाओं को नागरिक विचारधारा वाले नेताओं के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित करना है। व्यक्तिगत परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने वाले वास्तविक जीवन के मुद्दों के बारे में शोध करना और गंभीर रूप से सोचना शामिल है।
मेरा प्रस्ताव “समाज के आर्थिक रूप से अक्षम वर्गों के लिए मासिक धर्म स्वास्थ्य जागरूकता पैदा करना और सैनिटरी पैड बैंकों की स्थापना” पर आधारित था। हमारे देश में मासिक धर्म स्वास्थ्य स्वच्छता प्रबंधन की भयानक स्थिति ने मुझे इस तरह के मंच पर इसके बारे में विचार रखने को प्रेरित किया। मेरी पिच 5 मिनट लंबी वीडियो थी और इसके साथ ही मैंने अपने प्रस्ताव से संबंधित तकनीकी को समझाते हुए एक लिखित “अनुदान प्रस्ताव” प्रस्तुत किया था। मेरे दृष्टिकोण में मूल रूप से तीन महत्वपूर्ण कदम शामिल थे- जागरूकता पैदा करना, बैंकों की स्थापना करना और दक्षता में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना। इसके लिए मुझे विजेताओं में से एक के रूप में चुना गया था, अंत में तीसरा स्थान हासिल किया।

रुपहली दुनिया में अपने काम से अपनी छाप छोड़ रही है अस्मिता

कोलकाता : यह कहानी है एक अभिनेत्री की जो…अब अभिनय की दुनिया से आगे बढ़ रही है। 6 साल पहले कैमरे के सामने अपनी अभिनय प्रतिभा की छाप छोड़ी और अब कैमरे के पीछे कमान सम्भाल रही है। हम बात कर रहे हैं अस्मिता की। ढेर सारे सपने और उम्मीदें लेकर आयी थी अस्मिता। उसने अभिनय सीखा और कुछ भूमिकाएं भी मिलीं। वह ‘माँ दुर्गा’ जैसे मेगा धारावाहिकों में कुछ भूमिकाएँ निभाने में कामयाब रहीं, जो स्टार जलसा, मोन नी कचकाची, गौरीदान पर प्रसारित होती थीं। उन्होंने अनिकेत चट्टोपाध्याय की फिल्म “तुस्की” में एक छोटी सी भूमिका भी निभाई। इन वर्षों के दौरान, वह अपने भावी सहयोगियों से मिलीं और काफी अच्छे रिश्ते बनाए। लेकिन हालात तब मुश्किल हो गए जब उन्हें अपने परिवार की जिम्मेदारियां उठानी पड़ीं। खुद को बनाए रखने के लिए, उसने कैमरे के पीछे काम करने का फैसला किया। कई बार रिजेक्शन, भद्दे ऑफर और बहुत कुछ झेलने के बाद मि. टेंट प्रोडक्शंस के सुशांत दास उनकी सहायता के लिए आए और आखिरकार वह एक सहायक पोशाक डिजाइनर के रूप में उनके साथ जुड़ गईं। यहां से, उन्होंने ‘जय काली’, ‘आमलोकी’ और ‘गोपाल वार’ जैसी कई परियोजनाओं में डिजाइनर ऋतुरूपा भट्टाचार्य की सहायता की, जिन्हें श्री वेंकटेश फिल्म्स, कृष्णकली और अन्य बैनरों द्वारा निर्मित किया गया था।
वह अपने काम से प्यार करती थी और उसे कपड़े खरीदने, लुक्स डिजाइन करने और पोशाक तैयार करने में बहुत खुशी मिलती थी। हालाँकि, वह बीमार पड़ गयी और उसकी त्वचा की स्थिति ने उसे लंबे समय तक धूप में काम करने की अनुमति नहीं दी। अस्मिता के जीवन ने यहां से एक नया मोड़ लिया, जब उनके एक पुरानी दोस्त, संचारी मंडल ने उन्हें मेगा धारावाहिकों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया और शुभंकर चट्टोपाध्याय से संपर्क करने के लिए कहा। वह जल्द ही एक सहायक निर्देशक के रूप में उनके साथ जुड़ गयीय़, ‘दादागिरी’, और ‘मिरक्कल 10’ जैसे शो पर काम कर रही थीं। उन्होंने ‘सुपर सिंगर जूनियर’, ‘डांस डांस जूनियर 1, ‘सुपर सिंगर जूनियर’ जैसे शो में काम करते हुए उसी प्रोडक्शन के लिए एक सहायक निर्देशक (पोशाक) के रूप में काम करना शुरू किया। ‘डांस डांस जूनियर 2’ और अक्सर डिजाइनर की अनुपस्थिति में पूरी पोशाक डिजाइनिंग प्रक्रिया को संभालती थी। उनके काम को सभी क्रू और कास्ट मेंबर्स ने समान रूप से सराहा। इस पर निर्देशक शुभंकर और निर्माता ब्राटिन अतार्थी ने ध्यान दिया और उन्हें मिथुन चक्रवर्ती के लिए पोशाक डिजाइन करने का अवसर मिला। हालांकि शुरू में घबराई हुई थी, उसने नयी चुनौती स्वीकार की और उसके काम को एक बार फिर सभी ने सराहा। वह उस समय को याद करती हैं जब इन लोगों ने उनका मार्गदर्शन किया है और मुश्किल वक्त में उसका साथ दिया है। आज, वह मिथुन चक्रवर्ती के लिए एक सहायक निर्देशक (पोशाक) और डिजाइनर के रूप में उसी प्रोडक्शन हाउस के लिए काम कर रही हैं। अस्मिता खुद को फिल्म और टेलीविजन उद्योग में एक डिजाइनर के रूप में स्थापित करना चाहती है। उसका मानना है कि काम उसके लिए बोलता है और बहुत जल्द अपनी निजी परियोजनाओं को शूट करने की तैयारी में है।

कठिनाइयों में साहस ही हमारा संबल और पाथेय होना चाहिए

प्रो, गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आप सब से यह प्रार्थना है कि आप स्वयं भी स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और अपना और अपने परिवार वालों का ख्याल रखें। साथ ही शारीरिक स्वास्थ्य का ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान भी रखें। भारत वर्ष को‌ वैसे तो आध्यात्म का केन्द्र स्थल माना जाता है और मन को साधने पर बहुत बल दिया जाता है लेकिन यहाँ मानसिक स्वास्थ्य पर‌ कम से कम बात की जाती है और अगर कोई व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रस्त है तो उसक बारे में चर्चा करने से लोग बचते हैं। अगर किसी को थोड़ी बहुत मानसिक समस्या हो तो उसे पागल करार देकर हम अपने कर्त्तव्य का पालन कर लेते हैं। और समाज उन पागल करार दिए गए लोगों के साथ क्या सलूक करता है, यह सभी को‌ मालूम है। इसीलिए जरूरी है कि मन के स्वास्थ्य पर‌ भी हम उतना ही ध्यान दें जितना शरीर के स्वास्थ्य की परवाह करते हैं। किसी बड़ी मुश्किल, परेशानी या बीमारी के कारण बहुत बार हमारा मन इतना प्रभावित हो जाता है कि वह निराशा से हताशा की सीढियाँ उतरते हुए कब अवसाद के गर्त में डूब जाता है, हमें बहुधा इसका पता ही नहीं चलता। लेकिन हमारा समाज शरीर के बुखार आदि को तो बीमारी समझकर उसका इलाज करवाता है लेकिन मन के बुखार को टालता ही जाता है। जरूरत इस बात की है कि मन के रोग और विचलन का भी इलाज समय रहते  किया जाए तभी समाज का सर्वांगीण विकास संभव हो पाएगा। एक शोध के अनुसार भविष्य में मानसिक अवसाद सबसे बड़े रोग के रूप में उभर कर सामने आएगा। एक आंकड़े के अनुसार पिछले दस वर्ष वर्षों में मानसिक अवसाद के कारण आत्महत्या करने वालों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है, इसीलिए जरूरी है कि समय रहते हम सचेत हो जाएं और इस रोग के लक्षणों पर अपनी कड़ी नजर रखें ताकि स्थिति के हाथ से बाहर निकलने के पहले ही उसका निदान किया जा सके। कहने को तो हम कह देते हैं कि “मन के सारे हार है मन के जीते जीत” लेकिन इस मन के विचलन और बिखराव को समझने या स्वीकारने से हम बचते हैं। एक समय में अगर ‌किसी में मानसिक विचलन के‌ लक्षण दिखाई देते थे तो लोग डॉक्टर की सलाह लेने की जगह सोखा- ओझा या पंडित -औलिया की शरण में जाते थे और झाड़ -फूंक के माध्यम से इसका इलाज ढूंढने की कोशिश करते थे। समय बदला और अब शहरों आदि में तो बच्चे, किशोर , युवा आदि की मदद के लिए मानसिक रोग विशेषज्ञ या काउन्सिलर की मदद लेने को गलत नहीं माना जाता लेकिन इसके बावजूद अभी भी लोग मानसिक रोगों और रोगियों के प्रति सहज नहीं हो पाएं हैं। इसी कारण मानसिक रोगी की स्थिति जब तक इतनी नहीं बिगड़ जाती कि लोगों को खुद ब खुद किसी रोगग्रस्त व्यक्ति को देखकर उसके रोग की गंभीरता का अंदाजा लग जाए या रोगी कुछ ऐसा कदम उठा ले कि उसके वापस लौटने की कोई गुंजाइश ही ना बचे, अक्सर लोग इसे छिपाने की कोशिश ही करते हैं।

सखियों, इस छिपाने- दबाने के फेर में ही मन का यह रोग गंभीर रूप धारण कर लेता है और तब हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते इसीलिए पुनः अपनी बात दोहरा रही हूँ कि इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। फिलहाल दुनिया के और देशों की देखा देखी भारत में भी मानसिक रोगों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और‌ इन रोगियों का मजाक उड़ाने की जगह उनके प्रति संवेदनशीलता प्रकट की जाने लगी है। लेकिन इसके प्रति समाज की हर परत के लोगों को सचेत करने की आवश्यकता है क्योंकि जब रोग की निशानदेही होगी तभी उसका इलाज भी संभव हो पाएगा। विशेषज्ञों की मानें तो दुनिया का हर चौथा व्यक्ति अपने जीवन -काल में कभी ना कभी मानसिक अवसाद के घेरे में अवश्य आता है। कुछ लोग अपनी हिम्मत और दोस्तों तथा परिवार वालों की मदद से इस चक्रव्यूह से बाहर निकल आते हैं तो कुछ को डॉक्टरी सहायता की आवश्यकता पड़ती है। अगर यह सहायता समय पर नहीं मिलती है तो स्थिति गंभीर हो जाती है। इसीलिए आम लोगों को इसके प्रति सचेत करने के लिए हर साल 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे (World Mental Health day) मनाया जाता है। इस दिन मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए विभिन्न कार्यशालाओं, गोष्ठियों एवं कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही एक और तथ्य की जानकारी आप के लिए आवश्यक है कि कुछ वर्षों पहले ही लोकसभा में “मेंटल हेल्थकेयर बिल-2016” पास हुआ, जो मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों को सुरक्षा और इलाज का अधिकार देता है। यह कानून अपने आप में काफी प्रगतिशील और लाभप्रद है जो समाज में मानसिक रोगियों के अधिकारों को सुनिश्चित तो करता ही है। साथ ही इलाज के लिए करवाए जाने वाले बीमे में भी इसकी वजह से नयी धाराएं जुड़ीं जिससे मानसिक रोगियों को राहत मिलेगी। बिल के प्रावधानों के मुताबिक, अब मानसिक बीमारियों को भी चिकित्सा  बीमे में शामिल  किया जाएगा। कोई भी स्वस्थ व्यक्ति अपना नॉमिनी चुन सकता है, जो मानसिक तकलीफ़ की हालत में उसकी देखभाल करेगा।

सखियों, मनोविज्ञान भी शारीरिक रोगों के कारण मन की चोटों में ढूंढता है। मनोवैज्ञानिकों की राय में यह के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी रोग विशेष से पीड़ित हैं तो उसका कारण उसकी मन की गहराई में ही छिपा हुआ रहता है और उस रोग का इलाज तभी संभव हो पाएगा जब मन में कोने में छिपे उस विषाणु की निशानदेही कर ली जाएगी। सुधा अरोड़ा की कहानी “उधड़ा हुआ स्वेटर” का एक पात्र रशियन लेखक चेखव जो कि पेशे से डॉक्टर थे, की बात को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुए इसी ओर संकेत करता है – “डॉक्टर (चेखव) थे ना! डायरिया के लिए कहते थे- योर स्टमक वीप्स फार यू…मन उदास और बेचैन होता है तो पेट सिम्पथी में रोने लगता है। ….अगर बहुत नेगेटिव फीलिंग्स एक दूसरे को ओवरटेक कर रही हों और आप उन्हें हैण्डल न कर पाएं तो एक्जीमा हो जाता है। आपका स्किन बता देता है कि रुको, इतना काम- क्रोध जरूरी नहीं।…और अंदर ही अंदर गुस्सा, नफ़रत दबाए चलो पाइल्स, अल्सर, ब्रेन स्ट्रोक न जाने क्या-क्या हो जाता है। सप्रेशन इज़ द रूट क़ाज़ आफ आल सिकनेस। एंग्री पाइल्स, एग्रेसिव अल्सर ! तो इलाज की जरूरत तो इसको है, इसको…”बूढ़े ने चलते -चलते दिमाग को दो उंगलियों से ठकठकाया।”

तो सखियों, इस बात को गंभीरता से लीजिए और अपने मन को स्वस्थ, प्रसन्न और अवसाद मुक्त रखने की कोशिश कीजिए। साथ ही अगर आपके घर -परिवार, पास- पड़ोस या परिचय के दायरे में कोई मानसिक रोगी हो तो कोशिश कीजिए कि उसे सही समय पर सही सलाह और उपचार मिल पाए। निराशा और हताशा के क्षण तो जीवन में आते ही हैं लेकिन उन्हें मन में घर न बनाने दीजिए। सकारात्मक संगीत, साहित्य और विचारों से अपने ओर अपने आस -पास के लोगों के मन को प्रकाशमान करने की कोशिश कीजिए। साथ ही नैराश्य की घड़ी में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करने की आवश्यकता है-

“करके विधि वाद न खेद करो

निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो

बनता बस उद्‌यम ही विधि है

मिलती जिससे सुख की निधि है

समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो।”

इसके साथ ही, मुश्किलों को चुनौती देने की कला को सीखना भी आवश्यक है। मुश्किलें तो आएंगी ही लेकिन ह्रदय को साहस से भर कर उनका सामना करना जरूरी है। कठिन से कठिन परिस्थितियों के आगे समर्पण ना करनेवाला ही साहसी होता है और यह साहस ही हमारा संबल और पाथेय होना चाहिए। तभी तो हम शायर अमीर कज़लब़ाश की तरह सोच और कह पाएंगे-

“लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं 

मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है ।”

आज के लिए विदा सखियों। अपना और अपने अपनों का ध्यान रखिए। 

‌फंगस‌ ‌के‌ ‌इलाज‌ ‌के‌ ‌लिए‌ ‌ एमएसएन‌ ‌लैब्स‌ ‌ने‌ ‌लांच‌ ‌की‌ ‌पोसाकोनाज़ोल‌

कोलकाता :‌ ‌एमएसएन‌ ‌लैबोरेट्रीज़‌ ‌प्रा.लि.‌ ‌(एमएसएन)‌ ‌ने‌ ‌आज‌ ‌भारत‌ ‌में‌ ‌पोसाकोनाज़ोल‌ ‌लांच‌ ‌करने‌ ‌की‌ ‌घोषणा‌ ‌की।‌ ‌एमएसएन‌ ‌ने‌ ‌ब्रांड‌ ‌नाम‌ ‌पोसा‌ ‌वन‌ ‌के‌ ‌तहत‌ ‌100‌ ‌एमजी‌ ‌डिलेड‌ ‌रिलीज़‌ ‌टैबलेट‌ ‌और‌ ‌300‌ ‌एमजी‌ ‌एंजेक्शन‌ ‌के‌ ‌रूप‌ ‌में‌ ‌यह‌ ‌दवा‌ ‌प्रस्तुत‌ ‌की‌ ‌है।‌ ‌पोसाकोनाज़ोल‌ ‌एक‌ ‌ट्रियाज़ोल‌ ‌एंटीफंगल‌ ‌एजेंट‌ ‌है‌ ‌जो‌ ‌म्यूकोरमायकोसिस‌ ‌के‌ ‌मरीजों‌ ‌का‌ ‌इलाज‌ ‌करने‌ ‌के‌ ‌लिए‌ ‌जाना‌ ‌जाता‌ ‌है।‌ ‌
‌कोविड-19‌ ‌से‌ ‌ठीक‌ ‌हो‌ ‌रहे‌ ‌कई‌ ‌मरीजों‌ ‌में‌ ‌म्यूकोरमायकोसिस‌ ‌नामक‌ ‌दुर्लभ‌ ‌और‌ ‌मारक‌ ‌फंगल‌ ‌संक्रमण‌ ‌पाया‌ ‌गया‌ ‌है,‌ ‌जो‌ ‌ब्लैक‌ ‌फंगस‌ ‌के‌ ‌नाम‌ ‌से‌ ‌मशहूर‌ ‌है।‌ ‌मृत्यु‌ ‌दर‌ ‌बढ़‌ ‌रही‌ ‌है‌ ‌और‌ ‌इस‌ ‌कठिन‌ ‌वक्त‌ ‌में‌ ‌ऐंटी-फंगल‌ ‌दवा‌ ‌की‌ ‌कमी‌ ‌बनी‌ ‌हुई‌ ‌है।‌ ‌ ‌‌ऐंटी-फंगल‌ ‌दवाओं‌ ‌के‌ ‌अनुसंधान‌ ‌एवं‌ ‌विनिर्माण‌ ‌में‌ ‌सक्षम‌ ‌एमएसएन‌ ‌अपने‌ ‌मजबूत‌ ‌वितरण‌ ‌नेटवर्क‌ ‌एवं‌ ‌अपनी‌ ‌फील्ड‌ ‌फोर्स‌ ‌के‌ ‌जरिए,‌ ‌सक्रियता‌ ‌से‌ ‌पूरे‌ ‌भारत‌ ‌में‌ ‌मरीजों‌ ‌तक‌ ‌पहुंच‌ ‌रही‌ ‌है‌ ‌और‌ ‌पोसा‌ ‌वन‌ ‌तक‌ ‌पहुंच‌ ‌सुनिश्चित‌ ‌कर‌ ‌रही‌ ‌है।‌ ‌ ‌एमएसएन‌ ‌ने‌ ‌अपनी‌ ‌इनहाउस‌ ‌आर‌ ‌एंड‌ ‌डी‌ ‌एवं‌ ‌विनिर्माण‌ ‌इकाईयों‌ ‌में‌ ‌ऐक्टिव‌ ‌फार्मास्यूटिकल‌ ‌इनग्रिडियेंट‌ ‌और‌ ‌पोसा‌ ‌वन‌ ‌के‌ ‌फॉर्मुलेशन‌ ‌को‌ ‌विकसित‌ ‌किया‌ ‌है।‌ ‌इस‌ ‌दवा‌ ‌को‌ ‌भारतीय‌ ‌औषध‌ ‌महानियंत्रक‌ ‌ने‌ ‌मंजूरी‌ ‌दी‌ ‌है‌ ‌और‌ ‌यह‌ ‌अंतर्राष्ट्रीय‌ ‌गुणवत्ता‌ ‌मानकों‌ ‌पर‌ ‌खरी‌ ‌उतरती‌ ‌है।‌ ‌कोविड‌ ‌ट्रीटमेंट‌ ‌रेंज‌ ‌के‌ ‌हिस्से‌ ‌के‌ ‌तौर‌ ‌पर‌ ‌एमएसएन‌ ‌पहले‌ ‌ही‌ ‌फाविलो‌ ‌(फाविपिराविर)‌ ‌को‌ ‌200एमजी,‌ ‌400एमजी‌ ‌व‌ ‌800एमजी‌ ‌के‌ ‌माप‌ ‌में‌ ‌तथा‌ ओसलो‌ ‌(ओसेल्टामिविर)‌ ‌75एमजी‌ ‌कैप्सूल‌ ‌में‌ ‌और‌ ‌ऐलाई‌ ‌लिली‌ ‌के‌ ‌साथ‌ ‌लाइसेंस्ड‌ ‌बारिडोज़‌ ‌(बारिसिटिनिब)‌ ‌को‌ ‌लांच‌ ‌कर‌ ‌चुकी‌ ‌है।‌ ‌एमएसएन‌ ‌की‌ ‌सभी‌ ‌कोविड‌ ‌दवाओं‌ ‌की‌ ‌उपलब्धता‌ ‌व‌ ‌अन्य‌ ‌सहायता‌ ‌के‌ ‌लिए‌ ‌मरीज़‌ एमएसएन‌ ‌कोविड‌ ‌हैल्पलाइन‌ ‌नंबर‌ ‌91005‌ ‌91030‌ ‌पर‌ ‌कॉल‌ ‌या‌ ‌‌[email protected]‌ ‌‌पर‌ ‌ईमेल‌ ‌कर‌ ‌सकते‌ ‌हैं।‌ ‌

लव जिहाद को लेकर सतर्क करती शार्ट फिल्म

कोलकाताः प्यार करना कोई गुनाह नहीं है। यह तो ईश्वर का वरदान है। धर्म निरपेक्ष देश भारत में अपनी धार्मिक मान्यताओं के साथ जीना सबका मौलिक अधिकार है। लेकिन जब धर्म की आड़ में साजिश के तहत प्रेम और विवाह के सम्बंध स्थापित होने लगें तो यह सामाजिक विद्वेष को जन्म देता है। युवाओं को को लव जिहाद की साजिशों के प्रति जागरुक करती शार्ट फिल्म ‘लव या जिहाद’ बनायी है सुपरिचित फिल्मकार शिव जायसवाल ने। फिल्म में कई जाने पहचाने कलाकारों ने अपने अभिनय की पुख्ता छाप छोड़ी है। प्रतिभा सिंह, ए पी आकाश , अलकरिया हाशमी, डॉ.अभिज्ञात, स्मित सिंह, संजीव राय, राकेश सिंह, सुनील यादव, निशांत सिंह, चंदन यादव, रणधीर साव और शिव जायसवाल ने 25 मिनट की इस फिल्म के चरित्रों में जान फूंकी है। फिल्म के सिनेमेट्रोग्राफर हैं गौरव दास। चुस्त एडिटिंग ए पी आकाश की है। यह फिल्म शिव जायसवाल फिल्म प्रोडक्शन के यूट्यूब चैनल पर शुक्रवार को रिलीज हुई।

आयातित नहीं, मिथक नहीं, बंगाल की परम्परा और इतिहास हैं राम

शुभजिता फीचर डेस्क

राम और कृष्ण भारत की आत्मा हैं और एक ऐसा इतिहास भी, जिसे तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग ने दबाने और छुपाने का भरपूर प्रयास किया। प्राचीन इतिहास को साहित्य से लेकर शिक्षण संस्थानों से बाहर किया गया और राम को लेकर तो राजनीति ही हो रही है। प्रबुद्ध वर्ग को सम्भवतः यह स्मरण नहीं कि बंगाल इसी भारत भूमि का अंग है…आप इतिहास और संस्कृति को जितना दबायेंगे, वह उतनी ही शक्ति और वेग के साथ आपके सामने होंगे। हद तो तब हो गयी जब राम को ही आयातित बताने वाले खड़े हो गये…कहा गया कि राम नहीं बल्कि दुर्गा बंगाल की देवी हैं…और वे याद रखना भूल गये कि इस बंगाल में वैष्णव परम्परा ही आदि परम्परा रही है और शक्ति की आराधना इसके बाद आरम्भ हुई। 13वीं शताब्दी में द्वैत वैष्णव आराधना की माधव शाखा विद्यमान थी जो विजय नगर के उडूपी से फैले और नीलांचल (पुरी, ओडिशा) से होती हुई बंगाल पहुँची। माधवेन्द्र पुरी, ईश्वर तीर्थ और श्री चैतन्य इसके केन्द्र में थे। माधवाचार्य के पूर्व 9 वीं शताब्दी में मल्ल शासकों के अन्तर्गत आने वाले गंगा के दक्षिणी भाग और रहर बंगाल में भी वैष्णव परम्परा थी। कृतिवास की रामायण है और खुद राम ने भी शक्ति की आराधना की थी। ऐसे में जरूरी था कि यह सत्य सामने आये कि बंगाल न तृण का है…न वाम का है…इसके लोकमानस में राम ही हैं….और सनातन ही हैं और आज से नहीं हैं…तब से हैं जब प्रबुद्ध वर्ग का जन्म भी नहीं हुआ था। इस बार यात्रा बंग भूमि के उन स्थलों और परम्पराओं की ओर….जहाँ राम भी हैं और रामायण भी…
पुरुलिया का अयोध्या सर्किट और सीता कुंड

सीता कुंड, पुरुलिया

सीता कुंड पुरुलिया की अयोध्या ग्राम पंचायत के बाघमुंडी गाँव में है। यहाँ छोटे जलाशयों में कमल दिखते हैं। सीता कुंड का सम्बन्ध रामायण से है। हिन्दु मिथकों के अनुसार राम और सीता अयोध्या की पहाड़ियों में आये थे और वनवास के दौरान रहे भी। सीता को प्यास लगी थी और राम उनकी प्यास बुझाने के लिए अपने वाणों से धरती से जल प्रवाहित किया और सीता की प्यास बुझी। अतएव इस स्थान को सीता कुंड कहते हैं। टुंड्रा समुदाय के लोग शिकार पर जाने से पहले सीता कुंड का पानी पीते हैं। स्थानीय लोगों ने सीता कुंड से 500 मीटर की दूरी पर राम मंदिर भी बनवाया है। लोग यहाँ आराधना भी करते हैं।
मालदा का रामकेलि गाँव

रामकेलि मंदिर, मालदा

रामकेलि गाँव। यहाँ है 500 साल पुराना मदन मोहन मंदिर। मान्यता है कि यहाँ श्रीराम 4 दिन ठहरे थे और सीता ने पिंडदान यहीं किया था। आज भी महिलायें यहाँ बिहार से पिंडदान करने आती हैं। सीता का कुंड और रामायण का वटवृक्ष होने की मान्यता भी है। रामकेलि गाँव की प्रसिद्धि यहाँ स्थित मदन मोहन जिउ मंदिर के लिए है। जिस स्थान पर यह मंदिर है, वहाँ वृन्दावन की तरफ जा रहे श्री चैतन्य देव ने विश्राम किया था। आज भी एक पत्थर पर उनके चरण चिह्न हैं। इसके साथ ही कदम्ब और तमाल के वृक्ष हैं जिसके पास यह मंदिर बनाया गया है मगर रामकेलि की ख्याति का एक और कारण है जिसके बारे में बात कम होती है। सनातन धर्म में महिलाओं को पिंडदान की अनुमति नहीं है मगर इस स्थान पर आज भी बिहार से महिलाएँ पिंडदान करने आती हैं। इस दौरान एक मेला लगता है और आम तौर पर यह ज्येष्ठ, श्रावण और आषाढ़ में लगता है। यहाँ फिरोज मीनार के पास जहाँ यह कुंड है, वहीं पर एक बरगद का वृक्ष भी है। दावा किया जाता है कि यह वृक्ष भी काफी पुराना है। पंडित पाणिग्रही के मुताबिक महाप्रभु चैतन्य देव 15 जून 1515 को रामकेलि आये थे और रूप सनातन से उनकी भेंट भी इसी स्थान पर हुई थी। इस स्थान का उल्लेख रामकेलि पंजिका में भी किया गया है। राम से इसका सम्बन्ध शोध का वि। हो सकता है परन्तु यह स्थान वैष्णव परम्परा की धारा का साक्षी तो है ही।

बाँकुड़ा का रामनवमी मेला और बाउल मिलन

राममंदिर, विष्णुपुर, बांकुड़ा,

बाँकुड़ा में है सोनामुखी और यहीं पर होता है रामनवमी मेला। मेले में बाउल एकत्रित होते है। इस मेले को जयदेवी केन्दुली मेला का लघु रूप भी माना जाता है। सोनामुखी के सदियों पुराने रामनवमी मेले में वैष्णव धारा की अविच्छिन परम्परा के साथा संथाली तथा राजवाड़ी संस्कृति की झलक भी मिलती है।
हुगली के गुप्तीपाड़ा का रामचन्द्र मंदिर

गुप्तीपाड़ा का रामचन्द्र मंदिर

हुगली में 18वीं सदी में चारचाला मंदिर है जहाँ ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने से श्रीराम की आराधना होती आ रही है औऱ यह कोलकाता से अधिक दूर भी नहीं है। इस टेराकोटा मंजिर में कृष्णचन्द्र. वृन्दावन चन्द्र और चैतन्य भी हैं। हालाँकि ये चार मंदिर अलग – अलग काल में निर्मित किये गये हैं पर रामचन्द्र मंदिर शेवड़ाफुली के राजा हरीश चन्द्र राय ने बनवाया था। टेराकोटा शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है यह मंदिर और इसकी दीवारों पर रामायण की गाथा भी उत्कीर्ण है। गुप्तीपारा के मंदिर परिसर में चार भव्य वैष्णव मंदिर हैं: चैतन्य, वृंदावनचंद्र, रामचंद्र और कृष्णचंद्र। रामचंद्र मंदिरों में कई टेराकोटा कलाकृतियाँ हैं, और सभी संरचनाएं बंगाल की स्थापत्य कला की भव्यता दर्शाती हैं जिसमें महाकाव्यों और पुराणों के दृश्यों को चित्रित करने वाली नक्काशी है। मुख्य मंदिर वृंदावन चंद्रजी का मंदिर है। इसके बाईं ओर कृष्ण चंद्रजी का मंदिर है और दाईं ओर एक रामचंद्र मंदिर है। वृंदावन चंद्र मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियां हैं। रथ यात्रा यहां का सबसे मनाया जाने वाला त्योहार है।
मिदनापुर के चन्द्रकोना का रघुनाथ मंदिर

चन्द्रकोना रघुनाथ मंदिर के भग्नावशेष

राजा चन्द्रकेतु द्वारा स्थापित चन्द्रकोना में कई मंदिर हैं जो रघुनाथ जी को समर्पित हैं। रघुनाथ अर्थात श्रीराम और मल्यनाथ और लाल (दोनों ही श्रीकृष्ण से सम्बन्धित) बताया जाता है कि 17वीं शताब्दी में यह मंदिर बर्दवान के कृतचन्द ने बनवाया था। रघुनाथ जी का मंदिर ओडिशा की स्थापत्य शैली से प्रेरित है और 52 फीट ऊँचा है मगर संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है।
हावड़ा के रामराजातला का राम मंदिर और रामनवमी मेला

हावड़ा के रामराजातला का राम मंदिर

अयोध्याराम चौधरी, जमींदार ने इस क्षेत्र में पहली बार राम पूजा शुरू की। उनके अनुसार, उन्हें भगवान राम की पूजा करने के लिए कुछ दिव्य निर्देश मिले थे। उसके बाद उन्होंने भगवान राम की एक विशाल बारोवारी पूजा शुरू की। समय के साथ यह पूजा लोकप्रिय होती गयी और इस इलाके का नाम ही रामराजातला रखा गया। लेकिन उस समय उस क्षेत्र में सरस्वती पूजा बहुत प्रसिद्ध थी और ग्रामीण पिछले 300 वर्षों से इसका आयोजन करते आ रहे थे। तो सरस्वती पूजा करने वाले कुछ ग्रामीणों ने राम पूजा का विरोध किया। दोनों समूह कई चर्चाओं के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि राम पूजा की जाएगी और ज्ञान की देवी सरस्वती को भगवान राम और सीता के शीर्ष पर रखा जाएगा। उस दिन से प्रथा ने सरस्वती पूजा के दिन चौधरी पारा शिव मंदिर में षष्ठितला के बांस के खांचे से बांस काटना शुरू कर दिया और उन बांसों की पहली पूजा की। शुरूआती दिनों में मेले में पहले तीन दिन पूजा होती थी। उसके बाद यह एक पखवाड़े तक और फिर एक महीने तक चलता रहा। अब राम पूजा चैत्र-बैसाख मास की रामनवमी से शुरू होकर श्रावण मास के अंतिम रविवार तक चलती है। यह पश्चिम बंगाल में सबसे लंबे समय तक चलने वाला मेला है। 18वीं सदी में वामन अवतार और सावित्री सत्यवान मंदिर भी बने। मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत की गाथा उकेरी गयी है।
नदिया के कृष्णगंज का राम सीता मंदिर

नदिया शिवनिवास मंदिर परिसर में भी श्रीराम हैं

नदिया के कृष्णगंज में लाल ईंटों से बना यह मंदिर 1762 में स्थापित किया गया था और शिवनिवास मंदिर परिसर में है। इनमें राम सीता मंदिर, राजराजेश्वर शिव मंदिर और रागिनीश्वर शिव मंदिर है और इसका एक शिखर है। यह चार चाला स्थापत्य शैली में बना मंदिर है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम की आराधना की दैनिक आराधना का केन्द्र भी है। कृष्णगंज की स्थापना राजा कृष्ण चन्द्र द्वारा एक अस्थायी नगर के रूप में की गयी थी और बर्गीजों के आक्रमण से बचने के लिए राजधानी को कृष्णनगर से कृष्णगंज में स्थानांतरित किया गया था। यहाँ पत्थरों का इस्तेमाल मंदिर के लिए किया गया है और श्रीराम और सीता देवी की अष्टधातु से बनी प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं।
मिदनापुर के तमलुक का रामजिओ देओल और सीता -राम मंदिर

मिदनापुर के तमलुक में स्थित राम जिउ मंदिर

मिदनापुर के तमलुक के हरीर बाजार इलाके में ओडिशा स्थापत्य शैली में निर्मित रामजिउ मंदिर है जो 18वीं सदी में बना था। यह चार चाला शैली में निर्मित मंदिर है। घाटाल के खारार में सीता राम देओल टेराकोटा स्थापत्य शैली का एक और मंदिर है और इसकी विशेषता इसके 13 शिखर हैं। यह मंदिर 1865 में माजी जमीन्दारों द्वारा बनवाया गया था।
मिदनापुर के चिरुलिया का रामचन्द्र मंदिर

मंदिर की भव्यता दिखती है यहाँ

यह मंदिर बड़ो चाला मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है और यह बंगाल का एकमात्र 12 चाला मंदिर है जो टेराकोटा स्थापत्य शैली में निर्मित है। इसकी स्थापना 1843 में हुई थी।
मुर्शिदाबाद के नाशीपुर का रघुनाथजी मंदिर

मुर्शिदाबाद के नाशीपुर में राजबाड़ी व मंदिर

मुर्शिदाबाद जिले के भगवानगोला महकमे में नाशीपुर एक गाँव है। नाशीपुर की राजबाड़ी एक पर्यटनस्थल भी है। इसे मूल रूप से नाशीपुर राज परिवार के राजा देवी सिंह ने स्थापित किया था और बाद में 1865 में राजा कीर्ति सिंह बहादुर ने इसे फिर से बनवाया। रघुनाथ जी मंदिर यहाँ का प्रमुख आकर्षण है।
मिदनापुर के राउतारा का सीता रामजू मंदिर

घोषपाड़ा में स्थित राउतारा में है सीताराम जिउ मंदिर दो 1700 में बना था। यह पारम्परिक 8 चाला टेराकोटा शैली में ईंटों से बना मंदिर है। इस मंदिर को घोष जमींदार परिवार ने बनवाया था। इसमें 13 शिखर हैं।

नदिया का मटियारी राम सीता मंदिर और ग्रामीण राम नवमी उत्सव

नदिया के मटियारी में स्थित प्रतिमा

मटियारी गंगा से दूर दैनहाटा बाजार में एक छोटा सा गांव है। मतिरारी जमींदारी प्रशासनिक परिसर में स्थित मटियारी राम सीता मंदिर की कटवा-दैनहाटा-माझेरग्राम क्षेत्र के लोगों के लिए अपनी श्रद्धा है ।ऐतिहासिक रामनवमी उत्सव और मेला इस इलाके के गांवों और छोटे शहरों से हजारों लोगों को आकर्षित करते हैं। मंदिर में भगवान राम, सीता देवी और लक्ष्मण जी की मूर्तियां हैं।
पुरुलिया का गढ़ पंचकोट – राम मंदिर के भग्नावशेष

उपेक्षित है पुरुलिया का गढ़ पंचकोट मंदिर

राजपूत वंश के दामोदर शेखर ने लगभग 90 सीई में पुरुलिया में सिंह देव वंश की स्थापना की। उन्होंने इस इलाके के पांच सामंती प्रमुखों को मिला दिया और इसलिए, इस स्थान को अंततः पंचकोट के रूप में जाना जाने लगा। यह पंचकोट से है, स्थानीय पंचेत बांध का नाम इसके नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि पंचकोट साम्राज्य एक बार दामोदर नदी के पानी में डूबा हुआ था। पंचकोट साम्राज्य लगभग १६वीं शताब्दी में बिष्णुपुर के मल्ल राजाओं के हाथों समाप्त हुआ और बाद में बरगी हमलों का सामना करना पड़ा। मल्ल के कब्जे के दौरान, पंचकोट राजा ने कई मंदिरों का निर्माण किया, जिनमें से पंचरत्न मंदिर, एक कृष्ण मंदिर और एक पत्थर की नक्काशीदार राम मंदिर उल्लेख के योग्य हैं। हालांकि अधिकांश मंदिर, महल और किला अब भग्नावशेष के रूप में है।
मिदनापुर में नाराजोल राजमहल का रामचंद्र मंदिर और रामनवमी

नाराजोल राजबाड़ी में होती है राम की आराधना

पुरातन बंगाल के क्षत्रियों. राजपरिवारों और सामंतों में राजा राम की पूजा की परम्परा रही। मिदनापुर और नदिया में सम्भवतः सबसे अधिक राम मंदिर हैां घाटाल से लगभग 25 किमी दूर नाराजोल राजमहल 600 साल पुराना है और यहाँ के राजमहल में रामचन्द्र और सीता देवी के मंदिर हैं। बंगाल की पारम्परि कविता का रूप राम मंच पर रामधुन और पाल नाटकों में दिखता है। 1819 में नाराजोल के राजा मोहनलाल खान ने अयोध्या की रामजन्मभूमि से 1 लाख रुपये खर्च करके पत्थर मँगवाये थे। कहा जाता है कि इस निःसंतान राजा को इसके बाद पुत्र प्राप्ति हुई थी। उन्होमने रामनवमी पर राम रथ यात्रा निकालनी भी शुरू की जो आज भी कई परिसरों में निकाली जाती है।
कोलकाता में मिली 6ठीं शताब्दी की रामायण

मालदा में भी हैं श्रीराम

एशियाटिक सोसाइटी कोलकाता के विद्वानों को उस समय खुशी हुई जब उन्हें कोलकाता में एक अल्पज्ञात संस्कृत पुस्तकालय में छिपी छठी शताब्दी की रामायण की एक नई पांडुलिपि मिली। 2015 में मिली रामायण का सबसे प्रसिद्ध संस्करण वाल्मीकि का है, सबसे पुराना संस्करण जिसमें सात खंड थे। नई पांडुलिपि में केवल पांच खंड हैं और तमिल कवि कम्बा द्वारा 12 वीं शताब्दी के गायन को प्रतिस्थापित करने की संभावना है, जिसे दूसरा सबसे पुराना संस्करण माना जाता है। विद्वानों ने नई पांडुलिपि में पाठ का विश्लेषण करते हुए कहानी की पंक्ति में कुछ स्पष्ट मोड़ देखे, हालांकि मुख्य पात्र राम, सीता और रावण एक ही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पांडुलिपि राम और सीता को मनुष्यों के रूप में अधिक चित्रित करती है और दोनों के अलगाव पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है। यह संस्करण उस शाप से शुरू नहीं होता है जिसने दशरथ को अपने बेटे को वनवास भेजने के लिए मजबूर किया, इसके बजाय, यह एक श्राप से शुरू होता है जो देवी लक्ष्मी पर पड़ा था।

इसमें बालकांड को शामिल नहीं किया गया है जो राम के बचपन और उत्तरकांड पर केंद्रित है। नयी पांडुलिपि राम के वनवास से लौटने और उनके सिंहासन पर चढ़ने के साथ समाप्त होती है। संस्कृत के विद्वानों के अनुसार “यहां राम भगवान से ज्यादा मानवीय हैं, क्रोध और असफलता जैसी मूर्खताओं के साथ। विवाह के समय सीता और राम की उम्र और रावण द्वारा सीता का अपहरण किए जाने की तारीख जैसे कुछ दिलचस्प विवरण इस संस्करण में हैं।” , परिषद के अध्यक्ष और एशियाटिक सोसाइटी के महासचिव ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया।
बंगाल के अधिकतर हिन्दू मंदिर आक्रमण और संरक्षण के अभाव में नष्ट हो गये हैं। मुस्लिम शासकों निमर्मता के साक्षी रहे हैं ये मंदिर और 17वीं शताब्दी के पहले के निर्मित मंदिरों को खोज निकालना कठिन है। हिन्दू धर्म से धर्मांतरित होने वाले मुसलमानों ने भी मंदिरों को निशाना बनाकर ही इस्लाम के प्रति वफादारी साबित करने की कोशिश की। आजादी के बाद भी बंगाल में कई राममंदिर बने हैं।
स्त्रोत साभारऑर्गनाइजर
विकिपीडिया
पुरुलिया जिले की वेबसाइट
टाइम्स ऑफ इंडिया
तस्वीरें – श्रीनारायणम.होम.ब्लॉग तथा गूगल