सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है, आप सब सपरिवार सकुशल होंगी और जिंदगी की हर परेशानी का सामना हँसते हुए कर रही होंगी। सखियों, एक शब्द है “वहम” और यह एक शब्द कभी -कभी हमारे जेहन और जिंदगी पर इतना गहरा असर छोड़ता है कि इस से निकलकर स्वाभाविक जिंदगी जीना हमारे लिए संभव नहीं हो पाता। हालांकि कई वहम बेहद खूबसूरत भी होते हैं जिनके साए में इंसान की जिंदगी बड़ी खुशी के साथ कट जाया करती है। शायद इसीलिए बहुत बार लोग -बाग, यार- दोस्त यह राय देते भी नजर आते हैं कि जिंदगी अगर बेमजा और बेमक़सद हो जाए तो उसे खुशनुमा और आसान बनाने के लिए एक खूबसूरत वहम पाल लेना चाहिए। लेकिन दुनिया तो दुनिया है। वह भला एक सी बात कब कहती है और अगर कह भी दे तो ज्यादा देर तक उस पर कायम भी नहीं रहती इसीलिए कभी- कभार यही कठोर दुनिया वाले यह कहते भी नजर आते हैं कि “चाहो तो कुत्ता पाल लो, बिल्ली पाल लो लेकिन वहम बिल्कुल ना पालना”। इसके पीछे यह कारण हो सकता है कि यह वहम कभी -कभी आप की जिंदगी को इतना नकली या बनावटी बना देता है कि उस से निकलना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाता है।
सखियों, आज मैं उसी “वहम” की बात कर रही हूं जो कभी- कभार हमारी जिंदगी दूभर या मुश्किल बना देता है। मनोविज्ञान की भाषा में कहें तो बहुत मर्तबा वहम हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा मर्ज बन जाता है और उस मर्ज का इलाज किसी डॉक्टर के पास नहीं होता। वहमी आदमी को तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को वहम होता है कि उसकी तबियत सही नहीं है और वह जिस किसी भी बीमारी या उसके लक्षणों के बारे में सुनता है, उन पर गहराई से विचार करने के बाद उन्हें खुद में मौजूद पाता है। ऐसे वहमी आदमी को लगता है कि दुनिया की हर बीमारी उसे है और वह यकीनी और बेयकीनी के बीच डूबता -उतराता रहता है। इसी विषय पर 1979 में एक हास्य फिल्म भी बनी थी, “मेरी बीवी की शादी”। इसके मुख्य किरदार, जिसकी भूमिका अमोल पालेकर ने निभाई थी, को भी बीमारी का वहम है और उसे लगता है कि वह जल्दी ही मरने वाला है। इसी कारण वह न केवल मरणोपरांत अपनी समाधि पर लगवाने के लिए पत्थर पर अपना नाम खुदवा लेता है बल्कि अपनी पत्नी के लिए दूसरे पति की तलाश भी शुरू कर देता है। फिल्म का तो अंत सुखद होता है लेकिन इस तरह का वहम कई बार जिंदगी को जहन्नुम भी बना देता है। अब कोई रोग हो तो उसका इलाज़ मुमकिन भी है लेकिन वहम का इलाज भला कैसे हो। तभी तो किसी समझदार आदमी ने कहा है कि “वहम का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है।”
सखियों, इस दुनिया में सेहतमंद दिखाई देने वाला आदमी भी बहुत बार ऐसे घातक वहम रूपी मानसिक बीमारी का शिकार हो जाता है जो उसकी ही नहीं उसके आस- पास के लोगों की जिंदगी भी दूभर कर देता है। लोगों को तरह- तरह के वहम होते हैं। किसी को लगता है कि सारी दुनिया ही उसकी दुश्मन है और वह लोगों की भीड़ से भागता फिरता है। कोई अपने आप को दुनिया का सबसे खूबसूरत और दानिशमंद आदमी समझने का वहम पाल लेता है और सारी दुनिया को खुद से कमतर समझता हुआ क्रमशः लोगों से दूर हो जाता है। किसी को वहम होता है कि उस पर लगातार नजर रखी जा रही है या उसके खिलाफ साज़िश रची जा रही है और वह हर घड़ी चौकन्ना रहता है। यह अतिरिक्त सतर्कता एक तरह के रोग में बदल जाती है जिसका परिणाम बहुधा घातक होता है। इसी तरह किसी -किसी को वहम हो जाता है कि दुनिया भर के लोग उसका मजाक उड़ाया करते हैं और इस कारण वह तमाम लोगों को अपना दुश्मन समझता हुआ, अकेलेपन में रहने का आदी हो जाता है। किसी को यह वहम हो जाता है कि फलां आदमी और औरत उस पर जान छिड़कता या छिड़कती हैं और यह वहम उसकी जान का अजाब बन जाता है। जब वहम टूटता है तो इसके कई घातक परिणाम भी दिखाई देते हैं। लब्बो लुआब यह है कि जब तक वहम एक खूबसूरत अहसास की तरह रहता है, वह कई बार पुरसुकून भी होता है। जैसे शायर अपने वहम की दुनिया में पड़ा हुआ अजीब से ख्यालात में डूबा हुआ फ़ानी बदायुनी की तरह कह बैठता है-
“न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम ।”
इसका मतलब यह हुआ कि कुछ वहम ऐसे भी होते हैं जो इस मुश्किल जिंदगी को थोड़ा आसान जरूर बना देते हैं और आदमी इस बेआराम, बेरहम दुनिया में इस खूबसूरत वहम के सहारे खुद को बहलाते हुए किसी ना किसी तरह जीने का बहाना जरूर ढूंढ लेता है, ठीक उसी तरह जैसे अदा जाफ़री ढूंढ लेते हैं-
“लोग बे-मेहर न होते होंगे
वहम सा दिल को हुआ था शायद ।”
यह बात मानने में हमें गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि कुछ ऐसे तसल्ली बख्श वहम न हो तो इंसान की जिंदगी दूभर हो जाए। कुछ ऐसे ही वहम समर्पित प्रेमी भी पाल लेते हैं और अपने महबूब की यादों से ही अपना दिल बहला लेते हैं और उसके ना मिलने पर भी झूठे वहम का बहाना बना कर खुद को तसल्ली दे देते हैं। इसी तरह के ख्यालात शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ पेश करते हुए कहते हैं-
“क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से
जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता ।।”
लेकिन जो वहम आप को बीमार बना दें, उनसे तो भरसक बचने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अगर आप इसमें सुध -बुध खोकर डूब गए तो आपके लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी, तब न दवा से काम बनेगा, ना दुआ ही काम आएगी, शायर यगाना चंगेज़ी की जुबां में कहें तो-
“दर्द हो तो दवा भी मुमकिन है
वहम की क्या दवा करे कोई ।।”
और यह वहम आदमी को कभी- कभार आदमी नहीं रहने देता, उसे गुनाह की दुनिया में भी ढकेल देता है, अब वह गुनाह उसे किस राह पर कितनी दूर तक ले जाएगा, यह तो हालात पर निर्भर करता है। हम इस वहम की गिरफ्त में आकर बीमार और गुनहगार न बन जाएं इसीलिए हसरत मोहानी साहब की तजवीज पर भी गौर फरमाने की जरूरत है-
“हम जौर-परस्तों पे गुमाँ तर्क-ए-वफ़ा का
ये वहम कहीं तुम को गुनहगार न कर दे ।”
इसी कारण सबा अकबराबादी इस वहम नामक बीमारी से मुक्त होने की कोशिश करते हुए कुछ बेबसी के साथ कहते नजर आते हैं-
“कब तक नजात पाएँगे वहम ओ यक़ीं से हम
उलझे हुए हैं आज भी दुनिया ओ दीं से हम ।”
सखियों, वहम के सवाल पर इतनी बात करने का कारण यही है कि आप इस बीमारी से भी अपने आप को बचा कर रखें। शरीर के रोग का इलाज हम जितनी तत्परता से करते हैं, उतना ध्यान अगर मन के रोग पर भी दें और समय रहते उसका इलाज कर लें तो हमारी जिंदगी आसान भी हो जाएगी और खुशहाल भी। इसीलिए वहम के रोग को कल्पना की दुनिया से निकलकर जिंदगी की हकीकत में तब्दील मत होने दीजिए नहीं तो जिंदगी की दुश्वारियां बेइंतहा बढ़ जाएंगी। इन्हीं दुश्वारियों से दामन बचाने की खातिर सूफी और शायर इस दुनिया और इसकी बहुत सी बातों और रवायतों को भी वहम ही मानते हुए कह बैठते हैं-
“ये तमाशा-ए-इल्म-ओ-हुनर दोस्तो
कुछ नहीं है फ़क़त काग़ज़ी वहम है।” (नईम रज़ा भट्टी)
विनायक सावरकर का जन्म महाराष्ट्र (उस समय, ‘बॉम्बे प्रेसिडेन्सी’) में नासिक के निकट भागुर गाँव मेंचितपावन ब्राह्मण परिवारमेंहुआ था। उनकी माता का नाम राधाबाई तथा पिता का नाम दामोदर पन्त सावरकर था। इनके दो भाई गणेश (बाबाराव) व नारायण दामोदर सावरकर तथा एक बहन नैनाबाई थीं। विनायककापरिवारएकआदर्शराष्ट्रवादीपरिवारथा।तीनोंभाईस्वत्रंतासेनानीथेतथाइनकीपत्नीऔरभाभीकाभीइससंग्राममेंबहुतबड़ायोगदानरहाहै।
बालगंगाधरतिलककेलेखपढ़करप्रेरितनवयुवकविनायकने “अभिनवभारत” जैसेक्रांतिकारीसंगठनकीस्थापनाकी।इससंगठनकाउद्देश्यसमयपड़नेपरसशस्त्रक्रांतिकेजरिएस्वतंत्रताहासिलकरनाथा।इसीकेसाथउन्होंने ‘मित्र मेला’नामकीएकगुप्तसंस्थाभीबनाई।अंग्रेजोंनेअपनीकुत्सिकमानसिकताकापरिचयदेतेहुए 1905 मेंबंगालकाविभाजनकरदिया।सावरकरनेलोगोंकोजागरूककर ‘स्वदेशी‘ केनारेकोप्रबलताप्रदानकी।इसआंदोलनमेंपुणेमेंजनतानेविदेशीकपड़ोंकीहोलीजलायीगयी, अंग्रेजोंद्वारानिर्मितप्रत्येकवस्तुओंकाबहिष्कारकरदियागया।सावरकरकेनेतृत्वमेंहीभारतवर्षमेंऐसापहलीबारहुआ।तिलकजी के अनुमोदन पर १९०६ में उन्हें श्यामजी कृष्ण वर्माकेमाध्यमसे छात्रवृत्ति मिलीऔरवेकानूनकीपढ़ाईकरनेगोरोंकेगढ़लंदनजापहुंचे।वकालत की पढ़ाई लंदन में पूरी करने वाले वीर सावरकर पहले भारतीय थे।
मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रिटिश म्यूजियम लाइब्रेरी की 1500 से अधिक किताबों को पढ़ लिया था। क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनपर लाइब्रेरी में जाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। वकालत की पढ़ाई के बाद डिग्री के लिए जब उन्हें लंदन के विश्वविद्यालय में ब्रिटिश राज भक्ति की शपथ लेने को कहा गया तब उन्होंने इससे साफ इंकार कर दिया जिसके चलते उन्हें वकालत की डिग्री नहीं दी गई।सावरकर इटली के स्वतन्त्रता सेनानी ‘जोजेफ मैजिनी और गैरीबाल्डी’ के विचारों से बहुत प्रभावित थे और देश के लिए उनके आदर्शों के प्रशंसक थे। इसलिए इंग्लैंड में लिखी उनकी पहली पुस्तक ‘मैजिनी की आत्मकथा’ का ही मराठी रूपान्तर था जिसने देशवासियों में तहलका मचा दिया था। इस पुस्तक के कुछ अंश इस प्रकार थे – ‘‘कोई भी राष्ट्र कदापि नहीं मरता। परमात्मा ने मानव को स्वतन्त्र रहने के लिए उत्पन्न किया है। जब दृढ़ संकल्प लोगे तभी तुम्हारा देश भी स्वतन्त्र हो जायेगा।’’
भारतमेंइसकेप्रकाशनकेलिएपर्याप्तधनराशिजुटानेमेंबाबारावअसफलहोगएतबक्रांतिकीदेवियोंने, उनकीपत्नीऔरसावरकरकीपत्नीनेअपनेगहनेबेचकरधनइकट्ठाकरनेमेंसहायताकी।अंग्रेजोंकोजबइसपुस्तककापताचलातोउन्होंनेइसकेप्रकाशनकोबीचमेंहीबंदकरवाकरपुस्तकभीजब्तकरली।इसकलमकेसिपाहीसेअंग्रेज़ीहुकूमतइतनीआक्रान्तितथीकिइनकेद्वारालिखित 1857 कीक्रांतिपर आधारितपुस्तक ‘1857 का सम्पूर्ण सत्य’ को प्रकाशित होने से पूर्व ही प्रतिबन्धित कर दिया।विश्वइतिहासमेंकिसीलेखककेसाथऐसापहलीबारहुआथा।इस ग्रंथ का अंग्रेजी अनुवाद श्री वी0 वी0एस0 अय्यर एवं बैरिस्टर फड़के द्वारा किया गया और अथक प्रयास के बाद हालैंड में इस पुस्तक का प्रथम अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हो पाया। तदुपरान्त 1909 में इस पुस्तक का प्रकाशन फ्रांस से हुआ। सारे विश्व में स्वतन्त्रता-प्रेमियों ने इस पुस्तक की सराहना की और भारत के क्रांतिकारियों के लिए तो यह भगवद्गीता की तरह पवित्र धरोहर बन गई। इसी पुस्तक का तृतीय संस्करण अमर शहीद सरदार भगत सिंह ने 1929 में गुप्त रूप से कराया। विदित हो कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के मलाया पहुँचने पर उनके हाथ में भी इस पुस्तक की एक पांडुलिपि थी। मगर इस ग्रंथ का मूल मराठी संस्करण 1936 में वीर सावरकर के साहित्य से प्रतिबन्ध उठा लेने के बाद ही प्रकाशित हो सका।
लंदनमेंउनकानिवास ‘इंडियाहाउस‘ मेंहुआ।वेयहाँरहकर इंग्लैंड और भारत में रह रहे क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया करते थे।उन्होंने लंदन पहुंचते ही हिन्दुस्तानी छात्रों से सम्पर्क साधना शुरू कर दियाथा।लाला हरदयाल और मदन लाल ढ़ींगरा के अलावा वी.वी.एस. अय्यर, डब्लू.बी.फड़के, सुखसागर दत्त, पाण्डुरंग बापट, निरंजन पाल, आशिफ अली, एम.पी.टी. आचार्य, नहुक चतुर्भुज, सिकन्दर हयात, ज्ञानचन्द वर्मा, विरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, हेमचन्द दास आदि युवा उनकेसाथीबनगए। इन युवा हिन्दुस्तानियों को अपने जोशिले भाषणों औरप्रखरराष्ट्रवादीचिंतनसेप्रेरितकरउन्हें क्रांतिकारी पथ पर अग्रसर करने के प्रयास में सावरकर कामयाब रहे।
इसी बीच सावरकर ने अपने एक साथी बापट को रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने की विधि सीखने के लिए प्रेरित किया। काफी प्रयासों के बाद बापट अपने जानकार रूसी क्रांतिकारी से बम बनाने का मैनुअल हासिल करने में कामयाब हो गए। सावरकर ने इस मैनुअल को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाकर भारत के क्रांतिकारियों तक पहुंचावाई, ताकि देशभर में एक साथ बम विस्फोट करके अंग्रेजी शासन का तख्ता पलट किया जा सके।बड़ीहीसावधानीसेउन्होंनेपिस्तौलभीभेजवायी।
22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट नगर में ’अन्तर्राष्ट्रीय समाज संघ’ की बैठक आयोजित हुई जिसने सावरकर के परामर्श से ‘मादाम कामा’ एवं ‘सरदार सिंह राणा’ को वहाँ भेजा गया। ‘मादाम कामा’ ने वहाँ जाकर भारतीय ध्वज हाथों में उठाते हुए गरज कर कहा – ‘‘यह भारतीय स्वतन्त्रता का ध्वज है। शहीदों के रक्त से सिंचित हो यह और भी पावन हो गया है। मैं आप सभी स्वतन्त्रता-प्रेमियों को आह्वान करती हूँ कि आप सब उठ कर इस भारतीय ध्वज को सम्मान दें।’’ इस ध्वज में सभी आठ प्रान्तों के प्रतीक कमल पुष्प, सूर्य, चांद और बीच में ‘वन्देमातरम’ अंकित थाऔरसावरकरनेस्वयंइसेबनायाथा।
सावरकर सचमुच ऐसी धातु से बने हुए थे जो तपाने पर और भी निखरने लगता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में और भी अधिक उत्साह से जूझने के लिए तत्पर होता है।जब वेलन्दन में थे तो भारत में उनके परिवार पर जुल्मों का दौर जारी हो चुका था। उनके 8 वर्षीय पुत्र प्रभाकर की मौत हो गई थी। देशभक्ति की कविताएं प्रकाशित करवाने और अंग्रेजी सरकार के विरूद्ध जन-विद्रोह भड़काने के आरोप में उनके बड़ेभाई को गिरफ्तार कर अण्डमान जेल भेज दिया गया था। नासिक जैक्सन हत्या केस में सावरकर के साथियों को पकड़ लिया गया था और उन्हें फांसी पर लटकाने कीतैयारी की जा रही थी। सावरकर की भाभी व पत्नी को अंग्रेजी सरकार ने बेघर कर दिया था। अंग्रेजी सरकार ने लन्दन और हिन्दुस्तान में दोनों जगह सावरकर की गिरफ्तारी के वारन्ट भी जारी कर दिए। इसके बावजूद सावरकर ने स्वदेश लौटने का संकल्प लिया।
श्रीमदनलालढ़ींगरानेसावरकरसेपूछाथा, “व्यक्तिबलिदानकेलिएकबतैयारहोताहै?” सावरकरनेउत्तरदिया, “जबवोअपनेविवेकसेप्रेरितहोकरदृढ़निश्चयकरलेताहैतभी !” उनकेइन्हींवचनोंसेप्रेरितहोकर 1 जुलाई 1909 को लन्दन के इम्पीरियल-इंस्टिच्यूट के जहाँगीर हाॅल में मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली नामक एक अंग्रेज अधिकारी की गोली मार कर हत्या कर दी। अंग्रेजीसरकारबौखलाउठी। 17 अगस्त 1909 को मदनलाल ढींगरा को फाँसी पर लटका दिया गया। उनके अन्तिम शब्द थे, ‘‘ईश्वर से मेरी अन्तिम प्रार्थना है कि मैं तब तक उसी भारत माता के लिए जन्मता और पुनः मरता रहूँ जब तक यह स्वतन्त्र न हो जाये।’’ उधर कुछ भारतीय नेताओं नेकैकस्टन हॉल में बैठक बुलाकर ढ़ींगरा के खिलाफ सर्वसम्मति से निन्दा प्रस्ताव पास करने की घोषणा की। इस बैठक में पहुंचकर वीर सावरकर ने ढ़ींगरा के पक्ष की जबरदस्त पैरवी की और उनके खिलाफ निन्दा प्रस्ताव पास नहीं होने दिया।इधरभारतमेंसावरकर के छोटे भाई श्री नारायण कोभी गिरफ्तार कर लिया गया। सावरकर ने इस समाचार को सुनकर गर्व से कहा-“इससे ज्यादा गौरव की बात और क्या होगी कि हम तीनों भाई ही स्वातन्त्रय लक्ष्मी की आराधना में लीन हैं।“
जब वीर सावरकर 13 मई, 1910 की रात्रि को पैरिस से लन्दन पहुंचे तो स्टेशन परही पुलिस ने उन्हें तुरन्त गिरफ्तार कर लिया। अदालत ने उनके मुकदमे को भारत में शिफ्ट कर दिया। जब सावरकर को 8 जुलाई, 1910 को एस.एस. मोरिया नामक समुद्री जहाज से भारत लाया जा रहा था तो वे रास्ते में जहाज के सीवर के रास्ते से समुद्र में कूद पड़े और गोरे अधिकारियों की गोलियों की बौछार के बीच वे फ्रांस के दक्षिणीसागरतट पर पहुँच ही गये, मगर फ्रांस के सिपाहियों ने उन्हें अंग्रेजों को सौंप दिया।
उन्हें बम्बई लाया गया। यहाँ पर तीन जजों की विशेष अदालत गठित की गई। इसमें अपराधी की पक्ष जानने का कोई प्रावधान नहीं था।इस अदालत में सावरकर को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध शस्त्र बनाने की विधि की पुस्तक प्रकाशित करवाने का दोषी ठहराकर 24 दिसम्बर1910 को 25 साल कठोर काला पानी की सजा सुनाई। इसके साथ ही दूसरे मुकदमें में नासिक के कलक्टर मिस्टर जैक्सन की हत्या के लिए साथियों को भड़काने का आरोपी ठहराकर अलग से 25 साल के काला पानी की सजा सुनाई गई। इस तरह सावरकर को दो अलग-अलग मुकदमों में दोषी ठहराकर दो-दो आजन्मों के कारावासों की सजा के रूप में कुल 50 साल काले पानी की सजा सुनाई गई। ऐसा अनूठा मामला विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ, जब किसी को इस तरह की सजा दी गई।
7 अप्रैल 1911 को उन्हें अण्डमान भेज दिया गया। उन्होंनेदसवर्ष अंडमान की सेल्युलर जेल में बिताए। इस दौरान उन्हें जेलर डेविड बेरी के कहर का सामना करना पड़ा क्योंकिसरकारनेउन्हेंखतरनाककैदीकाबिल्लापहनायाथा। इस जेल के हर सेल का आकार 4.5 m×2.7m था।यहाँसे कोईभागनहींसकताथाक्योंकि इस जेल के चारों तरफ पानी हीपानीहै।
यहाँ भयंकर अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं जैसे – कोल्हूमेंबैलकीतरहजुतकररोज़ाना 30 पौंडतेलनिकलवाना, घड़ीकीभांतिघंटोंदीवारमेंटांगदेना, कईसप्ताह तक हथकड़ी पहनकर खड़े रहकर बागवानी, गरी सुखाने, रस्सी बनाने, नारियल की जटा तैयार करने, कालीन बनाने, तौलिया बुनने का काम,एकांत काल कोठरी में कैद करना, पीनेकोस्वच्छजलउपलब्धनाकरना, सड़े–गलेभोजनपरोसनाआदि।ये यातनाएंइतनी भयावह थी किकैदी को मानसिक और शारीरिक रूपसेअपाहिज बनानेमेंसक्षमथी। इन सबके विरूद्ध कैदियों के साथ मिलकर सावरकर ने भूख हड़ताल की और किसी प्रकार पत्र के जरिए कमिश्नर को अण्डमान जेल में कैदियों पर हो रहे अत्याचारों से अवगत करवाया। परिणामस्वरूप कार्यवाही हुई और जेलर डेविड को वहां से हटा दिया गया। इसके साथ ही कैदियों की सभी शर्तों को भी मान लिया गया। परंतुअसहनीयप्रताड़नाओंकोसहतेहुएक्रांतिकारीइंदुभूषणनेआत्महत्याकरलीऔरमहीनेभरभूखहड़तालकेकारण 16 वर्षीयनानीगोपालनेभीदमतोड़दिया।
इस अण्डमान जेल में सावरकर की काव्य-प्रतिभा और निखर उठी। उन्होंने करीब दस हजार काव्य पंक्तियों की यहाँ रचना की।देशभर में सावरकर की रिहाई के लिए भारी आन्दोलन चला और उनकी रिहाई के मांग पत्र पर 75000 लोगों ने हस्ताक्षर किए। वर्ष 1921 में देशभर में भारी जन-आक्रोश के चलते उन्हें अण्डमान से वापस भारत भेजा गया और रत्नागिरी सैन्ट्रल जेल में रखा गया। इस जेल में वे तीन वर्ष तक रहे। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘हिन्दुत्व’ पर शोध ग्रन्थ तैयार किया। उनकेविचारमेंहिंदुत्वकीपरिभाषाकुछइसप्रकारहै, “हिन्दूहमारानामहैऔरहिंदुस्तानहमारीमातृभूमिहै, सभीहिन्दूएकहैं, हमाराराष्ट्रएकहै।एकराष्ट्र, एकजातिऔरएकसंस्कृतिकेआधारपरहीहमहिंदुओंकीएकताआधारितहै।वेसभीव्यक्तिहिन्दूहैंजोहिमालयसेसमुद्रतकइससमग्रदेशकोअपनीपितृभूमिकेरूपमेंमान्यतादेकरवंदनाकरतेहैं।जिसकीधमनियोंमेंउसमहानजातिकारक्तप्रवाहितहोरहाहैजिसकामूलसर्वप्रथमसप्तसिन्धुओंमेंपरिलक्षितहोतारहाहैऔरजोविश्वमेंहिन्दूनामसेसुविख्यातहै।हमाराकर्त्तव्यहैकिहमदेशमेंरहनेवालेहिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयोंऔरयहूदियोंमेंयहपवित्रभावजागृतकरसकेंकिहमसबसबसेपहलेहिंदुस्तानीहैंऔरउसकेबादकुछऔर।“
देशभर में सावरकर की रिहाई को लेकर चलेआंदोलनों के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें इन शर्तों के साथरिहा कर दिया कि वे न तो रत्नागिरी से बाहर जाएंगे और न ही किसी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेंगे। जेल से रिहा होने के बाद देश के बड़े-बड़े नेता और यहाँतककिमहात्मा गांधी भीउनसे मिलने आएऔरउनकी देश-भक्ति की मुक्त-कंठों से प्रशंसा की।किन्तु दोनों के विचारों में जीवन-पर्यन्त अन्तर बना रहा।मार्च, 1925 में उनसे मिलनेडॉ. केशवबलिरामहेडगेवारपहुंचे और 22 जून, 1940 को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस उनसे मिलनेआए।
देश की आजादी के सम्बन्ध में दोनों महान् नेताओं में विशद चर्चा हुई। सावरकरनेजापानसेआयेक्रन्तिकारीरासबिहारीबोसकेपत्रकीभीचर्चाकी।सावरकरहिन्दूनवयुवकोंसेअंग्रेज़ीसेनामेंभर्तीहोनेकोइसलिएकहतेथे, ताकिअवसरआनेपरजबहाथमेंबंदूकेंहोंगीतबउसकीनोककिसदिशामेंमोड़नीहैवोयहभीसोचलेंगे।वेसभीविद्यालयों/महाविद्यालयोंमेंसैनिकशिक्षाकेप्रबलसमर्थकथे।सावरकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सशक्त क्रान्ति का प्रयास किये बिना अब भारत को स्वतन्त्र नहीं कराया जा सकता। इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर नेताजी जर्मनी होते हुए सिंगापुर पहुँच गये और वहीं पर ‘आजाद हिन्द सेना’ की स्थापना की।सिंगापुररेडियोपरनेताजीनेकहाथाकि, “भारतकेसभीनेताओंमेंकेवलसावरकरहीदूरद्रष्टाहैं।“
अन्त में श्री जमुनादास मेहता के प्रयास से 10 मई 1937 को रत्नागिरी की नजरबन्दी से वीर सावरकर को मुक्ति मिलीतथा 27 वर्षोंकावनवासकाटकरअबवेपूर्णतःस्वतंत्रथे।वेछुआछूत, जातपातकेसख़्तविरोधीथे।फरवरी, 1931 में वीर सावरकर के प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई। यह मन्दिर हर जाति, धर्म व वर्ग के लोगों के लिए खुला रहता था। सावरकर ने देश से जातिपाति, धर्म-मजहब के भेदभाव मिटाने के लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता आन्दोलन चलाए।देशभक्तों के अटूट स्वतंत्रता संघर्ष की बदौलत 15 अगस्त, 1947 को देश को आजादी नसीब हुई। लेकिन, देश का विभाजन हो गया। सावरकर इस विनाशकारीविभाजन के बिल्कुल विरूद्ध थे। वे लाख प्रयास करने के बावजूद भी इस विभाजन की त्रासदी को रोक नहीं पाए।
वीर सावरकर एक महान क्रांतिकारी के साथ-साथ प्रखर वक्ता, दूरदृष्टा, भाषाविद, कवि, लेखक, कूटनीतिक, राजनेता, इतिहासकार और समाज सुधारक भी थे। वीर सावरकर ने अपने जीवनकाल में ‘भारतीय स्वातांत्रय युद्ध’, ‘मेरा आजीवन कारावास’, ‘अण्डमान की प्रतिध्वनियां’, ‘हिन्दुत्व’, ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेस-1857’ जैसी कालजयी पुस्तकों की रचनाएं कीं। वीर सावरकर हिन्दू संगठनों के कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मुख्य वक्ता भी बने। 8 अक्तूबर, 1959 को उन्हें पुणे विश्वविद्यालय ने डी.लिट. की उपाधि से नवाजा।भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीयश्री अटल बिहारी वाजपेई वीर सावरकर के संदर्भ में लिखते हैं – “सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तप, सावरकर माने तत्व, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तारुण्य, सावरकर माने तीर, सावरकर माने तलवार।“
26 फरवरी, 1966 के दिन मुम्बई में प्रातः दस बजे, क्रांतिकारियोंकेसिरमौरवीरसावरकरने नश्वर संसार को हमेशा के लिएत्यागदिया।इन्होंनेजीवन भर देश की आजादी और उसके उत्थान के लिए अटूट संघर्ष किया और अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। इस वीर अमर होतात्मा का यहराष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।
(लेखिका विवेकानंद केंद्र के पश्चिम बंग प्रान्त में विभाग युवा प्रमुख हैं और कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोधार्थी भी।)
राशन और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर से लेकर कोविड सेंटर की व्यवस्था की
रायबरेली के कवि पंकज प्रसून ने अपने पैतृक गांव सहजौरा समेत 8 ग्राम पंचायतों में ‘आओ गांव बचाएं’ मुहिम की शुरुआत की है और इस मुहिम से बड़ी हस्तियाँ जुड़ गयी हैं। उत्तर प्रदेश के 33 गांवों की कमान अब मशहूर कवि कुमार विश्वास, फिल्म स्टार सोनू सूद और लोक गायिका मालिनी अवस्थी
पिछले एक महीने के अंदर इन तीनों हस्तियों ने रायबरेली और सुल्तानपुर के 33 गाँवों तक लोगों को मदद पहुंचाई है। लोगों को मुफ्त में दवाइयां और जांच की सुविधा दी जा रही है। कुमार विश्वास ने 8 गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर भी खोले हैं। इन सेंटर्स में हल्के लक्षण वाले कोरोना मरीजों का इलाज किया जा रहा है। रायबरेली की 8 ग्राम पंचायतों में कवियों की फौज जुटी
रायबरेली के कवि पंकज प्रसून ने अपने पैतृक गांव सहजौरा समेत 8 ग्राम पंचायतों में ‘आओ गांव बचाएं’ मुहिम की शुरुआत की है। इसी के तहत कवि कुमार विश्वास भी जुड़े और उन्होंने 8 गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर की स्थापना करवाई। पंकज प्रसून ने बताया कि इस अभियान में अभिनेता सोनू सूद और लोक गायिका मालिनी अवस्थी भी जुड़े गए हैं। इन लोगों की मदद से 4 ग्राम पंचायतों के 30 गांवों को कोरोना की मुफ्त दवाइयां, राशन किट और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर पहुंचाया गया। डॉक्टरों से परामर्श दिला रहे
कवि पंकज प्रसून ने बताया कि विश्वास कोविड केयर सेंटर्स पर पहुंचने वाले मरीजों को डॉक्टर पद्मश्री ज्ञान चतुर्वेदी, पीजीआई के डॉक्टर ज्ञान चन्द्र, राजीव दीक्षित अस्पताल के डॉ. दीना नाथ पटेल, एनबीआरआई के डॉ. संजीव ओझा हमेशा मॉनिटर करते हैं। वीडियो कॉल और फोन कॉल के जरिए मरीजों को परामर्श दिया जाता है। उन्हीं के प्रिस्किप्शन के अनुसार मरीजों को दवा दी जाती है। सुल्तानपुर के 3 गाँवों में खुले केंद्र
कुमार विश्वास की टीम ने सुल्तानपुर के कई गांवों में भी कोविड किट पहुंचाई है। यहां तीन गांवों में विश्वास कोविड केयर सेंटर बनाया गया है। इन सेंटर्स पर हल्के लक्षण वाले मरीजों को दवा दी जा रही है। इसके अलावा ग्रामीणों को कोविड केयर किट भी दी जा रही है। इस किट में दवा, मेडिकल उपकरण होते हैं।
शहीद सआदत खां इन्दौर रियासत के महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) के फौजी थे। 10 मई 1857 का वह संकल्प भरा दिन जब पूरा देश भारत के अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हो गया था। मेरठ में क्रांति की चिंगारी सुलग पड़ी जिसमें दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश, बंगाल आदि सभी को अपनी आगोश में जकड़ लिया।
दिल्ली में बहादुर शाह ज़फर, बेगम ज़ीनत महल, बख्त खान, झांसी में महारानी लक्ष्मीबाई, बैरकपुर में मंगल पांडे, मेरठ में धनसिह गुर्जर, जगदीशपुर में बाबू कुंवर सिंह, रेवाड़ी में राव तुलाराम सिंह, बल्लभगढ़ में राजा नाहर सिंह, बड़कागढ़ में राजा विश्वनाथ शाहदेव कानपुर में नाना साहब – अज़ीमुल्ला खान, लखनऊ में बेगम हज़रत महल, बांदा स्टेट में नवाब अली बहादुर, फैज़बाद में मौलवी अहमदुल्लाह, इलाहाबाद में मौलवी लियाकत अली, बरेली में खान बहादुर, तो इन्दौर में महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) के फौजी एवं मालवा के पठान सआदत खां ने फिरंगियों के खिलाफ हल्ला बोल दिया।
जब फिरंगियों के खिलाफ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर द्वारा क्रांति की तारीख तय कर दी गई तो पूरे देश में फिरंगियों के खिलाफ जंग शुरू हो गई। छावनियों और रेजीडेंसियो पर हमले हुए अंग्रेज़ इधर उधर भागते नज़र आ रहे थे और मारे जा रहे थे ।
इन्दौर रियासत की सुरक्षा हेतु सआदत खां ने महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) से अर्ज़ किया : हमने आपका नमक खाया है, ये एक अच्छा मौका आया है आप हमारे सर पर हाथ रखें, हम आपको महेश्वर, महू रेजीडेंसी का इलाका वापस दिलाकर रहेंगे और आपको अंग्रेज़ी शिकंजे से आज़ाद करा देंगे। अगर आप 1818 में हुए महाराजा मल्हार राव (तृतीय) के सुलहनामे के कारण ऐसा नहीं कर सकते तो आप अंग्रेज़ो को बता दीजिए कि मेरे सारे फौजी बागी हो गये हैं। बगावत की खबरें सुनकर इन्दौर खामोश ना रहसका और 1 जुलाई 1857 को सआदत खां ने क्रांति का बिगुल बजा डाला।
1 जुलाई 1857 को सआदत खां के नेतृत्व में क्रांति कि तोपें गड़गड़ा उठीं और सआदत खां, भागिरथ सिलावट, वंश गोपाल, भाई सरदार खां और अन्य साथी रेजीडेंसी जा पहुंचे। उस समय कर्नल एच• एम• डुरान्डु रेजीडेंसी कोठी में अपनी टेबल पर काम कर रहे थे।
सआदत खां रेजीडेंसी पहुंच कर्नल डुरान्डु से बात करना चाहा पर वह अनाप-शनाप बकने लगा जिसका उन्होंने विरोध किया। इस पर डुरान्डु ने तमंचे से उन पर वार किया जो उनके कान को छूता हुआ निकल गया। सआदत खां बचते हुए सीधे अपने घोड़े पर बैठना चाहा तो इसी बीच कर्नल ट्रेवर्स आ पहुंचा और धमकाते हुए तलवार से मुकाबला करना चाहा जिसमें एक गहरा घाव सआदत खां के गाल पर लगा जिससे वह लहुलुहान हो गये ।
अपने सरदार को लहुलुहान देख क्रांतिकारी भड़क गए। उधर सआदत खां ने यलगार भरी : ” तैयार हो जाओ फिरंगियों को मारने के लिए महाराज साहिब का हुक्म है ! कुछ घंटों की मुठभेड़ के बाद इन्दौर को अंग्रेजों से आज़ाद करा लिया गया। कुछ ही देर में पूरे शहर में खबर फैल गई और इसी जगह रेजीडेंसी में देखते देखते हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गयी। सआदत खां ने सभी को संबोधित किया और क्रांति को आगे बढ़ाते हुए अपने कदम दिल्ली की ओर मोड़ दिये। यहां से मिली सफलता के बाद वह अपने साथियों के साथ दिल्ली की ओर कूच कर गए। दिल्ली में शहज़ादा फिरोज़शाह अपनी सेना के साथ सआदत खां की फौज में शामिल हो गए और सआदत खां की फौज अंग्रेजों को परास्त करती रही।
20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया और मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को बंदी बना लिया गया। इस प्रकार क्रांति असफल हो जाती है और क्रांतिकारी समूह बिखर जाते हैं। इसके बाद अंग्रेज़ो द्वारा क्रांतिकारी नेताओं को ढूंढ ढूंढकर कालापानी, फांसी और तोपें से उड़ाने का काम करने लगे।
इसी बीच सआदत खां फरार हो जाते हैं और छुपते छुपाते बांसवाड़ा पहुंचे जातें हैं और वहां अपना नाम बदलकर अकबर खां के नाम से रहने लगते हैं। उनकी तलाश में 5,000 का इनाम घोषित किया जाता है, पर उनका पता नहीं चल पाता है।
17 साल बाद अर्थात 1874 में सआदत खां को उनके चेहरे के ज़ख्म के निशान की वजह से पहचान लिया जाता है और बांसवाड़ा में गिरफ्तार कर इन्दौर लाया जाता है और 1 अक्टूबर 1874 को सआदत खां को फांसी पर लटका दिया जाता है। सआदत खां की याद में इन्दौर लोकसेवा आयोग की कोठी के सामने ” स्मारक ” है जो हमेशा उनके योगदान को याद दिलाता रहेगा।
भवानीपुर पुलिस स्टेशन के साथ मिलकर कोरोना को लेकर जागरूक किया
कोलकाता : ए बिट मोर फाउंडेशन के संस्थापक युवा क्षितिज मिराज शाह ने छोटी सी उम्र में ही समाज के प्रति अपने सामाजिक दायित्व को समझा है। कोरोना काल के इस दुष्कर समय में भवानीपुर पुलिस स्टेशन के साथ मिलकर ए बिट मोर फाउंडेशन और मानव ज्योत एनजीओ ने फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के लिए और अखबार बेचकर अपना गुजारा करने वाले योद्धाओं को जो सुबह-सुबह हर घर में अखबार पहुंचाने का दायित्व निभाने का कार्य करते हैं, ऐसे लोगों के लिए कोरोना से संबंधित सुरक्षा और सावधानीपूर्वक रहने के लिए जागरूकता का संदेश दिया और कुछ आवश्यक सामग्री का वितरण भी किया। भवानीपुर पीएस के सार्जेंट पल्लव कुलाचार्य ने पुलिस स्टेशन के परिसर में दोपहर 12 बजे से दोनों संस्था के साथ मिलकर सभी जरूरतमंदों की सहायता के लिए अपने हाथ बढ़ाए। युवा क्षितिज ने इस अवसर पर लगभग 5000 मास्क 2500 सेनेटाइजर और सूखे नाश्ते जिसमें मूडी़, चिडंवा, बिस्किट, चनाचूर, सत्तू, केक आदि के पैकेट वितरित किए गए। इसके पूर्व क्षितिज मिराज शाह ने तिलजला अग्नि कांड में असहाय लोगों की मदद की थी। भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने भी इस कार्यक्रम में योगदान दिया जिसमें सोहिला भाटिया की सक्रिय भूमिका रही। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।
कोलकाता : केन्द्र सरकार क्वान्टम तकनीक और इसकी सम्भावनाओं को लेकर गम्भीर है। इस तकनीक को लेकर काम करने वाले लोगों, समूहों, संसाधनों की खोज भी शुरू हो गयी है। ऐसोचेम द्वारा क्वान्टम तकनीक को लेकर आयोजित एक वेबिनार को सम्बोधित करते हुए विज्ञान एवं तकनीक विभाग के सचिव आशुतोष शर्मा ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए अगले तीन सालों में 200 करोड़ रुपये की लागत से परियोजना पर काम चल रहा है। केन्द्रीय बजट में भी अगले 5 साल में 800 करोड़ रुपये का आवंटन इस क्षेत्र के लिए किया गया है। वेबिनार को सम्बोधित करते हुए इसरो के वैज्ञानिक सचिव आर. उमामहेश्वरन ने इस तकनीक के महत्व को समझाया। माइक्रोसॉफ्ट इंडिया की राष्ट्रीय तकनीक अधिकारी डॉ. रोहिणी श्रीवत्स ने कहा कि इस क्षेत्र में डेवलपरों, विद्यार्थियों और कम्पनिय़ों के लिए बहुत सम्भावनाएं हैं। ऐसोचेम के महासचिव दीपक सूद ने कहा कि देश में और अधिक क्वान्टम कम्प्यूटिंग एप्लिकेशन लैब की जरूरत है। विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, अकादमिक क्षेत्र के लोगों की जरूरत है। क्वान्टम तकनीक का उपयोग स्वास्थ्य, निर्माण, एयरोस्पेस और इंजीनियरिग जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस वेबिनार में ऐसोचेम के अन्य गण्यमान्य अधिकारी भी उपस्थित थे।
कोलकाता : एमएसएन लेबोरेटरीज प्रा। लिमिटेड (एमएसएन) ने मोलनुपिरावीर कैप्सूल के लिए तीसरे चरण का परीक्षण आरम्भ कर दिया है। गत 19 मई को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया से मोलनुपिरवीर कैप्सूल की प्रभावकारिता और हल्के से मध्यम कोवि़ड -19 के रोगियों पर सुरक्षा अध्ययन करने के लिए नैदानिक परीक्षण की मंजूरी मिली है। एमएसएन भारत भर में 40 से अधिक साइटों में अपना नैदानिक परीक्षण शुरू करेगा और पहली खुराक जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है। हल्के से मध्यम COVID-19 से पीड़ित 2400 से अधिक विषयों पर नैदानिक परीक्षण किए जाएंगे।
मोलनुपिरवीर एंटीवायरल गुणों वाली एक प्रायोगिक दवा है और वर्तमान में कोविड -19 उपचार के लिए नैदानिक चरण के अध्ययन के अधीन है। एमएसएन आर एंड डी टीम ने एपीआई और फॉर्मूलेशन दोनों विकसित किए हैं, नैदानिक अध्ययन के सफल समापन के बाद नियामक अनुमोदन के बाद जल्द ही लॉन्च होने की उम्मीद है। कोविड उपचार रेंज के हिस्से के रूप में कम्पनी पहले ही 200mg, 400mg और 800mg की क्षमता वाले फैविलो (फैविपीराविर ), 75 mg कैप्सूल के रूप में ओसेलो (ओसेल्टामीविर ) और बेरीडोज (Baricitinib) उतारा है। एमएसएन से सभी कोविड दवाओं की उपलब्धता के लिए, मरीज एमएसएन कोविड हेल्पलाइन @ 91005 91030 पर संपर्क कर सकते हैं या अधिक सहायता के लिए [email protected] पर ईमेल कर सकते हैं।
कोलकाता : कोरोना आपदा के समय एक दूसरे की मदद करना जरूरी है। बिड़ला हाई स्कूल अल्मनी ने कोलकाता पुलिस के साथ कोरोना आपदा में फँसे जरूरतमंदों की मदद की। बीएचएस हाई स्कूल अल्मनी और कोलकाता पुलिस की इस पहल को सिंघी बागान के सन्तोष चौटाला का सहयोग मिला। इसके तहत 1500 लोगों को भोजन मुहैया करवाया गया। लक्ष्य कम से कम 3 हजार लोगों की मदद करना है। यास तूफान के खतरे को देखते हुए ओम नमकीन की ओर से सूखे मेवे और चॉकीवॉकी की ओर से केक भी वितरित किये गये। इसके लिए बिड़ला हाई स्कूल अल्मनी ने कोलकाता पुलिस के साथ बालीगंज, चेतला, पर्णश्री, मैदान और कस्बा पुलिस स्टेशन की भी मदद ली।
बंगाल में बहुत से समाज सुधारक रहे हैं जो नवजागरण काल की आधारशिला हैं और आज तक हम उनको याद करते हैं तो कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनके योगदान को इतिहास समुचित सम्मान नहीं दे सका। वे समाज सुधारक नहीं थे…उद्योगपति थे…व्यवसाय के क्षेत्र में पूरा नाम कमाया…धन कमाया लेकिन वह सब जनता को अर्पण कर दिया। आज बात करेंगे ऐसी ही विभूति की…
बंगाल में बहुत से समाज सुधारक रहे हैं जो नवजागरण काल की आधारशिला हैं और आज तक हम उनको याद करते हैं तो कुछ नाम ऐसे भी हैं जिनके योगदान को इतिहास समुचित सम्मान नहीं दे सका। वे समाज सुधारक नहीं थे…उद्योगपति थे…व्यवसाय के क्षेत्र में पूरा नाम कमाया…धन कमाया लेकिन वह सब जनता को अर्पण कर दिया। आज बात करेंगे ऐसी ही विभूति की…मतिलाल सील…उदार विचारधारा के धनी व्यवसायी, जिन्होंने धन तो खूब कमाया मगर सामाजिक एवं शैक्षणिक सुधारों के लिए दान भी उतना ही दिया।
शिक्षाविद्, सामाजिक सुधारक और ब्रह्म समाज के संस्थापकों में से एक थे। शिवनाथ शास्त्री ने मतिलाल सील की प्रशंसा करते हुए उनको ईमानदार, विनम्र और दयालु परोपकारी बताते हुए कहा है कि मतिलाल सील की समृद्धि द्वारकानाथ टैगोर और रुस्तमजी चौसी जैसी थी। सील का जन्म 20 मई 1792 को कोलकाता में सुवर्ण वणिक (स्वर्ण व्यवसाय से जुड़ा वर्ग) परिवार में हुआ था। उनके पिता चैतन्य चरण सील वस्त्र व्यवसायी थे और सील जब 5 वर्ष के थे तो उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी व्यावसायिक बुद्धि काफी तीक्ष्ण थी….कुछ समय के लिए मतिलाल सील ने एक ब्रिटिश फर्म में काम किया। इस बीच 1809 में 17 साल की उम्र में मतिलाल सील का विवाह सुरती बागान के मोहन चांद दे की बेटी नागरी दासी से हुआ।
1815 में सील ने फोर्ट विलियम में काम करना आरम्भ किया…काम करते हुए मतिलाल सील के श्वसुर ने उनको ब्रिटिश सेना को आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति करने की सलाह दी जिससे सील की आय में वृद्धि हुई। बाद में उन्होंने इस नौकरी से इस्तीफा दे दिया मगर व्यवसाय उनकी रगों में था। 1819 में सील ने अपना व्यवसाय शुरू किया। वे शराब के कारोबारी मिस्टर हडसन को बोतल और कॉर्क बेचा करते थे। ब्रिटिश कारोबारियों ने सील को नील, रेशम, चीनी, चावल, सॉल्टपीटर औऱ अन्य सामानों की आपूर्ति का जिम्मा भी दिया। वे प्रथम श्रेणी की एजेंसियों के 20 घरों के बनिया नियुक्त किये गये जिसमें से 50 से 60 ऐसे घर कलकत्ता में थे। मतिलाल सील ने खुद नील, रेशम, चीनी का निर्यात यूरोप को करना शुरू किया और इंग्लैंड से लोहा, सूती कपड़े के टुकड़ों का आयात करने लगे। अपनी समृद्धि से उन्होंने यूरोपियन लोगों को कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी। उन्होंने कार्गो नावें हासिल कीं जो उन दिनों नयी चीज थीं। सील ने पुरानी आटे की मिल में काम किया…ऑस्ट्रेलिया को बिस्कुटों से लदा पूरा जहाज भेजा। बाद में इनके पास व्यवसाय के लिए 13 जहाज थे और इसमें से एक स्टीम टग था जिसका नाम बनिया था।
मतिलाल सील जितने बड़े व्यवसायी थे, उतने ही उदारवादी भी थे। कई सामाजिक कार्य़ों के लिए उन्होंने दान किया। 1841 में बेलघरिया में एक भिक्षुकावास बनवाया जिसमें 500 लोगों को रोज खिलाया जाता था। उन्होंने मतिलाल घाट बनवाया। उन्होंने साहूकारी, बिल की गिनती जैसे कामों में हाथ लगाया और अपनी पद्धति तथा व्यावहारिक बुद्धि से काम करते है। मतिलाल सील बैंक ऑफ इंडिया के संस्थापकों में से एक थे। वे भारत में पहली जीवन बीमा कम्पनी न्यू ओरिएंटल इन्श्योरेंस की स्थापना में भी सक्रिय थे। वे एग्री हॉर्टिकल्चरल सोसायटी के महत्वपूर्ण सदस्य थे और असम टी कम्पनी के संस्थापक निदेशक भी थे।
मतिलाल सील घाट
मतिलाल सील्स फ्री कॉलेज (बाद में मतिलाल सील्स फ्री स्कूल एंड कॉलेज) औपचारिक तौर पर मार्च 1842 में उनके घर पर ही खोला गया था। यह संस्थान आरम्भ में सेंट एफ. जेवियर्स, चौरंगी के निदेशकों द्नारा प्रबंधित किया जाता था। जेसुएट पादरियों के लिए यह अनिवार्य था कि हिन्दू विद्यार्थियों पर इसाईयत न थोपें। इसके बावजूद जब पादरियों के विरुद्ध बहुत अधिक शिकायतें मिलने लगीं तो सील रेवरेंड कृष्णमोहन बनर्जी को संस्थान का संचालन करने के लिए कहा। उन दिनों इस कॉलेज का सालाना खर्च 12 हजार रुपये था जो मतिलाल सील ट्रस्ट से आता था। विद्यार्थियों से मात्र 1 रुपये लिये जाते थे। यहाँ पर अंग्रेजी साहित्य, इतिहास, भूगोल, आवृत्ति, लेखन, गणित, बीजगणित, दर्शन विज्ञान, उच्च गणित और गणित का व्यावहारिक प्रयोग सिखाया जाता था। एक समय तक यहाँ 500 विद्यार्थी पढ़ते थे। कॉलेज के विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और सरकारी, मिशनरी और विश्वविद्यालय की परीक्षा में सफल हुए।
वे अपने व्यावसायिक जीवन के अंतिम दिनों में भी कलकत्ता के सबसे समृद्ध नागरिक थे। मतिलाल सील के दोनों बेटों हीरालाल सील और चुनीलाल सील ने भी अपने धन का एक हिस्सा जनहित से जुड़े कार्य़ों के लिए दिया। मतिलाल सील के समय में कलकत्ता का नागरिक समाज दो भागों में बँटा था। एक तरफ राजा राममोहन राय थे तो दूसरी तरफ रूढ़िवादी सोच वाले राधाकांत देव थे और अधिकतर धनी लोग ऐसे ही थे। राधाकांत देव ने सती प्रथा और विधवा विवाह को लेकर बने कानून का जमकर विरोध किया था। सील पारम्परिक विचारों के होते हुए भी राजा राममोहन राय के पक्षधर थे। स्त्रियों की शिक्षा को उन्होंने समर्थन दिया। इतना ही नहीं उन्होंने जाति की बाधाओं को तोड़कर विधवा से विवाह का साहस रखने वाले व्यक्ति को 1 हजार रुपये दहेज देने की सार्वजनिक घोषणा की थी। सील का निधन 20 मई 1854 को हुआ। उनके नाम पर कोलकाता में एक सड़क भी है।
कोलकाता : कोरोना मरीजों की मदद के लिए वेस्ट बंगाल मोशन फिल्म आर्टिस्ट फोरम की ओर से कोलकाता में 25 बेड वाला चिकित्सा केंद्र खोला गया है। वहां उन मरीजों को रखा जाएगा, जिन्हें अस्पताल में भर्ती नहीं किया जा रहा लेकिन अविलंब ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत है। आर्टिस्ट फोरम की तरफ से यह चिकित्सा केंद्र दक्षिण कोलकाता के लेक गार्डन इलाके में खोला गया है। चिकित्सा केंद्र का नाम बांग्ला फिल्मों के महान अभिनेता दिवंगत सौमित्र चटर्जी के नाम पर ‘सौमित्र’ रखा गया है। इसे स्थानीय एक क्लब की मदद से बैडमिंटन कोर्ट में खोला गया है। दूसरी तरफ बांग्ला फिल्मों के चर्चित अभिनेता जीशु सेनगुप्ता और संगीतकार इंद्रदीप दासगुप्ता ने लेक मार्केट इलाके में स्थानीय विधायक देवाशीष कुमार के सहयोग से कोरोना मरीजों के लिए सेफ होम खोला है। इंद्रदीप ने बताया कि यहां हल्के लक्षण वाले कोरोना के मरीजों को रखा जाएगा। ऑक्सीजन की भी व्यवस्था की गयी है।