Wednesday, April 8, 2026
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12 सप्ताह के बाद लें कोविड -19 वैक्सीन की दूसरी खुराक : डॉ. रणदीप गुलेरिया

एमसीसीआई ने कोविड -ौ19 को लेकर आयोजित किया वेबिनार

गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित है कोविड -19 वैक्सीन

कोलकाता : मर्चेन्ट चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एमसीसीआई) ने कोविड -19 को लेकर जूम वेबिनार आयोजित किया। इस वेबिनार में एम्स, नयी दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कोविड -19 से बचाव.उपचार और कोविड के पश्चात होने वाले प्रभावों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस बेहद खतरनाक है जि,के कारण सर्दी से लेकर गम्भीर बीमारी तक हो सकती है। यह नया टॉपिकल वायरस चीन के वुहान में मिला था औऱ मनुष्यों में इसके विरुद्ध लड़ने के लिए एन्टीबॉडिज नहीं होने के कारण उनसे संक्रमण फैलता है। बीमारी पर चर्चा करते हुए डॉ. गुलेरिया ने बताया कि भारत में 27.5 मिलियन कोविड -19 के मामले हैं। दूसरी लहर का कारण सावधानी को हल्के में लेने औऱ भीड़ के कारण हुआ, मास्क पहनकर इससे बचना सम्भव है। इसके अतिरिक्त हाथ साफ रखना, शारीरिक दूरी रखना, वैक्सीन और सीमित लॉकडाउन कोविड -19 से लड़ने में मदद कर सकते हैं। वैक्सीन बेहद प्रभावी है, पूरी दुनिया में 1 बिलियन लोग वैक्सीन ले चुके हैं। अब तक देश की 12 प्रतिशत जनता वैक्सीन की एक डोज ले चुकी है और 3.1 प्रतिशत लोग वैक्सीन प्रक्रिया को पूरा कर चुके हैं। डॉ. गुलेरिया के मुताबिक 80 प्रतिशत लोगों को कोविड के हल्के लक्षण थे और वे घर में ही उपचार से ठीक हो गये. 15 प्रतिशत लोगों को थोड़ा अधिक संक्रमण था तो उनको अस्पताल ले जाना पड़ा जबकि 5 प्रतिशत मामलों में मरीज को गम्भीर हालत में आईसीयू ले जाना पड़ा। स्वस्थ होने के बाद थकान, सीने में परेशानी, कफ, तनाव औऱ मानसिक परेशानी हुई। कोविड के बाद की स्थिति को लेकर किये गये एक अध्यनन में पता चला है कि 60 दिनों तक स्वस्थ होने वाले मरीजों में कम से कम एक लक्षण दिखे जबकि एक अन्य अध्ययन के अनुसार 43 दिन के बाद 32 प्रतिशत लोगों में ऐसे कम से कम एक लक्षण दिखे।
एक सवाल के जवाब में डॉ. गुलेरिया ने कहा कि 12 सप्ताह के बाद वैक्सीन की दूसरी खुराक लेना अधिक उपयोगी होगा। कोविड -19 की दूसरी लहर अब कमजोर पड़ रही है। यह वायरस लहर के रूप में आएगा।। मधुमेह पर अनियन्त्रण के कारण ब्लैक फंगस की समस्या बढ़ रही है। कोविड वैक्सीन के साइड इफेक्ट कुछ समय के लिए ही रहते हैं औऱ यह गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं। स्वागत भाषण में एमसीसीआई के अध्यक्ष आकाश शाह ने कहा कि कोविड -19 के कारण देश के सामने एक चुनौती खड़ी हो गयी है। इसके साथ ही ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस औऱ यलो फंगस को लेकर भी उन्होंने चिन्ता जाहिर की। एमसीसीआई के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट ऋषभ कोठारी ने धन्यवाद दिया।

इफको लाया विश्व का पहला नैनो यूरिया

कोलकाता :  इंडियन फारमर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड(इफको) ऑनलाइन-ऑफलाइन मोड में हुई अपनी 50वीं वार्षिक आम बैठक में अपनी प्रतिनिधि महासभा के सदस्यों की उपस्थिति में पूरी दुनिया के किसानों के लिए विश्व का पहला नैनो यूरिया तरल लेकर आया है । मिट्टी में यूरिया के प्रयोग में कमी लाने की भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी की अपील से प्रेरित होकर इसे तैयार किया गया है ।‌ इफको के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने सच्चे और समर्पित अनुसंधान के बाद नैनो यूरिया तरल को स्वदेशी और प्रोपाइटरी तकनीक के माध्यम से कलोल स्थित नैनो जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र में तैयार किया है । यह नवीन उत्पाद ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘आत्मनिर्भर कृषि’ की दिशा में एक सार्थक कदम है । इफको नैनो यूरिया तरल को पौधों के पोषण के लिए प्रभावी व असरदार पाया गया है । इसके प्रयोग से फसलों की पैदावार बढ़ती है तथा पोषक तत्वों की गुणवत्ता में सुधार होता है । नैनो यूरिया भूमिगत जल की गुणवत्ता सुधारने तथा जलवायु परिवर्तन व टिकाऊ उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव डालते हुए ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा । किसानों द्वारा नैनो यूरिया तरल के प्रयोग से पौधों को संतुलित मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त होंगे और मिट्टी में यूरिया के अधिक प्रयोग में कमी आएगी। यूरिया के अधिक प्रयोग से पर्यावरण प्रदूषित होता है, मृदा स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है, पौधों में बीमारी और कीट का खतरा अधिक बढ़ जाता है, फसल देर से पकती है और उत्पादन कम होता है । साथ ही फसल की गुणवत्ता में भी कमी आती है । नैनो यूरिया तरल फसलों को मजबूत और स्वस्थ बनाता है तथा फसलों को गिरने से बचाता है ।

इफको नैनो यूरिया किसानों के लिए सस्ता है और यह किसानों की आय बढ़ाने में प्रभावकारी होगा । इफको नैनो यूरिया तरल की 500 मि.ली. की एक बोतल सामान्य यूरिया के कम से कम एक बैग के बराबर होगी । इसके प्रयोग से किसानों की लागत कम होगी ।‌ नैनो यूरिया तरल का आकार छोटा होने के कारण इसे पॉकेट में भी रखा जा सकता है जिससे परिवहन और भंडारण लागत में भी काफी कमी आएगी ।

राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली(एनएआरएस) के तहत 20 आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केन्द्रों में 43 फसलों पर किये गये बहु-स्थानीय और बहु-फसली परीक्षणों के आधार पर इफको नैनो यूरिया तरल को उर्वरक नियंत्रण आदेश(एफसीओ, 1985) में शामिल कर लिया गया है । इसकी प्रभावशीलता का परीक्षण करने के लिए पूरे भारत में 94 से अधिक फसलों पर लगभग 11,000 कृषि क्षेत्र परीक्षण(एफएफटी) किये गये थे । हाल ही में पूरे देश में 94 फसलों पर हुए परीक्षणों में फसलों की उपज में औसतन 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है ।

इफको नैनो यूरिया तरल को सामान्य यूरिया के प्रयोग में कम से कम 50 प्रतिशत कमी लाने के प्रयोजन से तैयार किया गया है । इसके 500 मि.ली. की एक बोतल में 40,000 पीपीएम नाइट्रोजन होता है जो सामान्य यूरिया के एक बैग के बराबर नाइट्रोजन पोषक तत्व प्रदान करेगा । इफको नैनो यूरिया का उत्पादन जून 2021 तक आरंभ होगा और शीघ्र ही इसका व्यावसायिक विपणन भी शुरू हो जाएगा । इफको ने किसानों के लिए 500 मि.ली. नैनो यूरिया की एक बोतल की कीमत
₨ 240/- निर्धारित की है जो सामान्य यूरिया के एक बैग के मूल्य से 10 प्रतिशत कम है । समिति ने इस उत्पाद के बारे में किसानों को पूरी जानकारी देने के लिए एक व्यापक देशव्यापी प्रशिक्षण अभियान चलाने की योजना बनायी है । ये उत्पाद इफको के ई-कॉमर्स प्लेटफार्म www.iffcobazar.in.के अतिरिक्त मुख्य रूप से सहकारी बिक्री केन्द्रों और अन्य विपणन माध्यमों से किसानों को उपलब्ध कराये जाएंगे ।

ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारी पर कार्यशाला

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने ऑनलाइन इवेंट “सीवी कैसे बनाएं और ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारी कैसे करें” विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया। दो दिन तक जूम पर चलने वाली इस कार्यशाला में प्रथम दिन 370 और दूसरे दिन 281 विद्यार्थियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए डीन प्रो दिलीप शाह ने कोरोना काल में हो रहे ऑनलाइन साक्षात्कार को साक्षात्कारकर्ता के लिए भी चुनौती बताई क्योंकि इसमें वर्चुअल दृष्टि से चुनाव करना होता है जो मुश्किल होता है। सामने रहने पर उम्मीदवार के हावभाव और काम करने की उत्सुकता को महसूस किया जा सकता है। वर्तमान युग की मांग होने की वजह से इस प्रकार के वर्कशॉप का आयोजन किया गया।
प्रथम दिन प्रो. मोहित साव ने सीवी बनाने की प्रक्रिया पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि साधारण रूप से हम लोगों की धारणा है कि सीवी में डिग्री और प्रतिशत देखकर ही हमें कोई कंपनी या कॉर्पोरेट नौकरी दे देगी। वर्तमान में इस धारणा में बदलाव आया है। डिग्री के साथ-साथ स्मार्ट विद्यार्थी, कम्युनिकेशन क्षमता, व्यक्तित्व और तकनीकी कुशलता पर कंपनियां अधिक ध्यान दे रही हैं। भवानीपुर कॉलेज में बहुत ही प्रसिद्ध कंपनियां जैसे टीसीएस, इन्डिगो, जिंदल ग्रुप, स्पाइसजेट, ओबराय ग्रैंड आदि प्लेसमेंट के लिए आती हैं। विद्यार्थियों को इन्टरव्यू देने के लिए तैयार किया जाता है। सीवी में दो प्रकार की योग्यता एक प्रोफेशनल और दूसरी एकेडमी योग्यता लिखी जाती है। प्रो. मोहित साव ने स्क्रीन शेयर कर सीवी बनाने के लिए व्यक्तिगत सभी जानकारियां सही देने का सुझाव दिया और कहा कि वे जिस कंपनी के इंटरव्यू की तैयारी करें उसके विषय में पूरी जानकारी रखें।
दूसरे दिन प्रो ऊर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों को ऑनलाइन इंटरव्यू के दौरान अपने व्यवहार को किस प्रकार रखें इस विषय पर अपने बहुमूल्य सुझाव दिए। विद्यार्थी को प्रोफेशनल रूप से लेबटॉप पर अपना इंटरव्यू देते समय तकनीकी रूप से चुस्त रखना , प्रश्नों को ठीक से सुनना,वेशभूषा, शारिरिक और मानसिक रूप से पूर्ण रूप से ध्यान देना और चेहरे पर मुस्कान रखना आदि बहुत सी बातों का ध्यान रखना चाहिए। जो कंपनी साक्षात्कार ले रही है उसका का शोधपरक अध्ययन करें। अपने व्यवहार में नम्रता रखें। ऐसे बहुत से बिंदुओं पर स्क्रीन शेयर कर प्रो ऊर्वी ने प्रकाश डाला।दोनों ही दिनों विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपनी जिज्ञासाओं का निराकरण भी किया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने धन्यवाद दिया। प्रो दिव्या ऊडीसी, श्रद्धा अग्रवाल की उपस्थिति रही। तकनीकी सहयोग गौरव किल्ला और संयोजन जलक शाह और कशिश बर्मन का रहा। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

सलोनी प्रिया ने भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को बताया रचनात्मकता का महत्व

कोलकाता :  कोरोना महामारी के इस संकटकालीन स्थितियों में उम्मीद एनजीओ की प्रमुख सलोनी प्रिया ने एंगजाइटी और डिप्रेशन के विषय पर हुए वेबिनार में भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों को सकारात्मक सोच और रचनात्मक कार्यों के प्रति जागरूक किया। दो घंटे तक चले वेबिनार में डिप्रेशन और एंग्जाइटी के अंतर को विस्तार से समझाते हुए दोनों के अंतर को स्पष्ट किया। रोज की भागदौड़ की जिंदगी से परेशान होना, छोटी-छोटी बातों को लेकर बहुत अधिक क्रोध करना, फ्रस्ट्रेशन,आशा छोड़ देना, आत्मविश्वास में कमी आना आदि बहुत से ऐसे लक्षण हैं जो व्यक्ति को निराश कर देते हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन और याश तूफ़ान ने हमारी सभी की नियमित होनेवाली रूटीन में परिवर्तन कर दिया है जिसके कारण हम चिंता करने लगे हैं कि अब क्या होगा। यह जानते हुए भी कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है।हम चिंता में पड़े रहते हैं। इसलिए हमें घर में रहते हुए अपनी रचनात्मक ऊर्जा को काम में लगाना चाहिए और बेकार की चिंता से दूर रहना चाहिए।
सलोनी ने अपनी विभिन्न स्लाइड्स द्वारा स्क्रीन शेयर करके ध्यान, व्यायाम, योग, अच्छा संगीत सुनने, बागवानी, किचन खाद बनाना, स्क्रब बुक बनाना, कविता कहानी लिखना, अच्छी फिल्में और अच्छी किताबें पढ़ना आदि के साथ अपनी रचनात्मक और सकारात्मक ऊर्जा के बारे में समझाया। रंगों का मन के भावों के सामंजस्य को बताया। जैसे गुलाबी रंग खुशी का प्रतीक है वहीं दूसरा उदाहरण काले कुत्ते का दिया जो हमारे जीवन में अदृश्य रूप हावी रहता है।
वेबिनार के आरंभ में कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने स्वागत वक्तव्य में कहा कि गत चार वर्षों से उम्मीद एनजीओ के काउंसिलर कॉलेज के साथ मिलकर लाइफ स्कील डेवलपमेंट के अंतर्गत विद्यार्थियों की काउंसिलिंग कर रही है जो संतोषजनक है। अभी तक 250 विद्यार्थियों ने इसका लाभ उठाया है। इस अवसर पर काउंसिलर पिंकी बनर्जी ने अपने अनुभवों को साझा किया और तृणा गुहा ठाकुर ने उम्मीद एनजीओ के विषय में जानकारी दी। निकिता जालान नियमित रूप से कॉलेज के विद्यार्थियों के काउनसिंलिग में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। इस वेबिनार में जिज्ञासु विद्यार्थियों के बहुत से प्रश्नों का उत्तर दिया सलोनी प्रिया ने। इस कार्यक्रम का जूम तकनीकी सहयोग किया गौरव किल्ला ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

कोरोना वैरिएंट का नया नाम : डेल्टा कहा जाएगा भारत में पहली बार मिला स्ट्रेन

नयी दिल्ली : विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना के नए वेरिएंट ऑफ कंसर्न वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट (वीओआई का नाम ग्रीक अल्फाबेट्स का इस्तेमाल करते हुए रखने की घोषणा की है। इसके तहत सबसे पहले जो कोरोना वेरिएंट भारत में मिला, उसे डेल्टा कहा जाएगा। जबकि, इससे पहले मिले वर्जन को कप्पा कहा जाएगा।
डब्ल्यूएचओ की कोविड-19 टैक्निकल हेड डॉ. मारिया वेन करखोवे ने कहा कि इन लेवल से मौजूदा वैज्ञानिक नामों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनसे अहम वैज्ञानिक जानकारियां मिलती हैं और रिसर्च में इनका इस्तेमाल जारी रहेगा। किसी भी देश को कोरोना के वेरिएंट खोजने या उसकी जानकारी देने की सजा नहीं मिलनी चाहिए।
वायरस को इंडियन वैरिएंट कहने पर सरकार ने जताई थी आपत्ति
कोरोना के नए स्ट्रेन को भारतीय बताने पर सरकार ने आपत्ति जताई थी। सरकार की तरफ से कहा गया था कि B.1.617 वैरिएंट को दुनिया के लिए चिंताजनक बताने वाले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ ) के बयान को कई मीडिया रिपोर्ट्स में कवर किया गया। इनमें से कुछ रिपोर्ट्स में इस वैरिएंट को भारतीय कहा गया, लेकिन ये रिपोर्ट्स बेबुनियाद हैं। सरकार का दावा है कि WHO ने अपने 32 पेज के डॉक्यूमेंट्स में B.1.617 वैरिएंट के साथ कहीं भी इंडियन नहीं जोड़ा है।
डब्ल्यूएचओ के साउथ-ईस्ट एशिया ऑफिस की तरफ से कहा गया है कि वह वायरस या वैरिएंट्स को किसी देश के नाम से नहीं जोड़ता है। बल्कि उनके साइंटिफिक नाम से ही पहचानता है और सभी को ऐसा ही करना चाहिए। इससे पहले डब्ल्यूएचओ ने कोरोना की दूसरी लहर में भारत में फैल रहे B-1617 स्ट्रेन को वैश्विक स्तर पर चिंताजनक (वैरिएंट ऑफ कंसर्न) घोषित किया था। उसका कहना था कि यह वैरिएंट ज्यादा संक्रामक लग रहा है और यह आसानी से फैल सकता है।
कोरोना पर डब्ल्यूएचओ की प्रमुख मारिया वैन केरखोव के मुताबिक एक छोटे सैंपल साइज पर की गई लैब स्टडी में सामने आया है कि इस वैरिएंट पर एंटीबॉडीज का कम असर हो रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस वैरिएंट में वैक्सीन के प्रति ज्यादा प्रतिरोधक क्षमता है।
B.1.617 वैरिएंट, जिसे डबल म्यूटेंट स्ट्रेन भी कहा जाता है, महाराष्ट्र और दिल्ली में बड़े पैमाने पर मिला है। इसकी वजह से यहां आई महामारी की दूसरी लहर ने बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य महाराष्ट्र के कई शहरों में जीनोम सिक्वेसिंग किए गए आधे से ज्यादा सैंपल में B.1.617 वैरिएंट मिला है।

महाकाल परिसर में मिले 1 हजार साल पुराने मंदिर के अवशेष

उज्जैन : उज्जैन में महाकाल मंदिर के विस्तारीकरण के दौरान खुदाई में एक प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं। माना जा रहा है कि प्राचीन मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है, जिसके बाद महाकाल मंदिर की खुदाई रोक दी गई। ऐसे में केंद्रीय पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल के निर्देश पर तीन सदस्यीय पुरातत्व विभाग की टीम ने खुदाई स्थल का निरीक्षण किया। जांच के बाद टीम ने महाकाल मंदिर में खुदाई जारी रखने की इजाजत दे दी। हालांकि, खुदाई कर रहे लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। पुरातत्व विभाग की टीम का मानना है कि प्राचीन मंदिर से नए इतिहास का पता लगेगा।

25 फीट गहरे गड्ढे में उतर किया निरीक्षण
जानकारी के मुताबिक, केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री प्रहलाद पटेल ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भोपाल शाखा के पुरातत्वविद पीयूष दीक्षित, खजुराहो संग्रहालय के सहायक अधीक्षक केके वर्मा और मांडू में तैनात इंजीनियर प्रशांत पाटनकर को भेजा। तीनों विशेषज्ञों ने कलेक्टर द्वारा गठित कमेटी के विशेषज्ञ डॉ. रमण सोलंकी और डॉ. आरके अहिरवार के साथ महाकाल मंदिर जाकर खुदाई स्थल का अवलोकन किया। उन्होंने 25 फीट गहरे गड्ढे में उतरकर मंदिर के अवशेषों का निरीक्षण किया।

एएसआई की टीम ने दिए निर्देश
एएसआई की टीम का मानना है कि कलेक्टर ने विक्रम विश्वविद्यालय और शासकीय अधिकारियों की जो कमेटी बनाई है, उसकी निगरानी में खुदाई में निकले मंदिर को सुरक्षित तरीके से निकालकर संरक्षित किया जाएगा। यह कमेटी खुदाई की निगरानी करेगी। यदि कोई पुरातत्व सामग्री मिलती है तो उसका संरक्षण किया जाएगा। विक्रम विश्वविद्यालय के पुरातत्वविदों ने इन अवशेषों को एक हजार साल पुराना बताया।

परमार काल का मंदिर होने का अनुमान
बताया जा रहा है कि खुदाई के बाद मिले इस प्राचीन मंदिर के फिलहाल कुछ जानकारी नहीं मिली हैं। अभी सिर्फ अवशेष दिख रहे हैं। ऐसे में मंदिर कहां तक है, यह कहना मुश्किल होगा। ऐसे में विशेषज्ञों की टीम हर चीज की बारीकी से मुआयना कर रही है। इसके बाद ही मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी मिल पाएगी। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अवशेषों पर नक्काशी परमार काल की लग रही है। यह एक हजार साल पुरानी हो सकती है।

 

शिवभक्तिनी ममतामयी राजमाता महारानी अहिल्या बाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर इंदौर घराने की महारानी थी। अहिल्याबाई होल्कर अपने देश की सेवा, सादगी एवं मातृभूमि के लिए बहुत ही अच्छी साबित हुई। अहिल्याबाई एक स्त्री होने के कारण भी उन्होंने न केवल नारी जाति के विकास के लिए कार्य किए बल्कि समस्त पीड़ित जनता के लिए कार्य किया। अहिल्याबाई होल्कर की इसी कार्यप्रणाली को देख कर के वहां के लोग अहिल्याबाई होल्कर को अपना भगवान मानते थे। अहिल्याबाई होल्कर ने पीड़ित लोगों के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। अहिल्याबाई होल्कर एक प्रखर चरित्र वाली पतिव्रता स्त्री, उदय विचारों वाली महिला और ममतामयी विभूति थीं। अहिल्याबाई होल्कर का जन्म वर्ष 1735 ईस्वी में महाराष्ट्र राज्य के चौंढी नामक गांव में हुआ था। वह एक सामान्य से किसान की पुत्री थी। उनके पिता मान्कोजी शिन्दे के एक सामान्य किसान थे। सादगी और घनिष्ठता के साथ जीवन व्यतीत करने वाले मनकोजी की अहिल्याबाई एकमात्र अर्थात इकलौती पुत्री थी। अहिल्याबाई बचपन के समय में सीधी साधी और सरल ग्रामीण कन्या थी। अहिल्याबाई होल्कर भगवान में विश्वास रखने वाली औरत थी और वह प्रतिदिन शिवजी के मंदिर पूजन आदि करने आती थी।
आपको बता दें कि एक किसान की पुत्री अहिल्याबाई होल्कर किस प्रकार से इंदौर राज्य की महारानी बनी। इंदौर के महाराजा मल्हार राव होल्कर का वहां आना जाना लगा रहता था। एक बार मल्हार राव होल्कर पुणे जा रहे थे, वह विश्राम करने के लिए पादरी गांव के एक शिव मंदिर पर विश्राम करने के लिए रुके। उसी मंदिर पर अहिल्याबाई होल्कर प्रतिदिन पूजा अर्चना करनी आती थी।
अहिल्याबाई बहुत ही सुंदर उनके मुख मंडल पर देवी जैसा तेज और सादगी एवं सुलक्ष्णता थी। अहिल्याबाई होल्कर को देखकर मल्हार राव ने उन्हें अपनी पुत्रवधू बनाने का निश्चय किया। इस कारण उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पिता से निवेदन किया। अहिल्याबाई होल्कर के लिए मल्हार राव होल्कर के पुत्र के विवाह प्रस्ताव को सुनकर के अहिल्या की पिता ने हां कर दिया। कुछ ही दिनों बाद अहिल्याबाई होल्कर का विवाह मल्हार राव होल्कर के पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ हो गया। इस विवाह के संपन्न होने के बाद अहिल्याबाई अब एक ग्रामीण कन्या से इंदौर राज्य की महारानी बन गई। अहिल्याबाई होल्कर राजमहल पहुंचने के बाद भी उन्होंने अपनी पुराने जीवन की सादगी एवं सरलता को नहीं त्यागा। वह बहुत ही अच्छे विचारों वाली महिला थी। उनकी निष्ठा को देख कर के मल्हार राव होल्कर ने उन्हें शिक्षित बनाने के लिए उनके शिक्षा का प्रबंध उन्होंने घर पर ही कर दिया। अब अहिल्याबाई अशिक्षित अहिल्याबाई होल्कर से शिक्षित अहिल्याबाई हो गई। जब अहिल्याबाई ने अपने शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर ली, तब मल्हार राव होल्कर के द्वारा उन्हें राजकीय शिक्षा भी प्रदान कराया गया। मल्हार राव होल्कर अपने पुत्र की अपेक्षा अपनी पुत्रवधू पर अत्यधिक भरोसा करते थे। विवाह के कुछ वर्षों बाद अहिल्याबाई ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नामकरण मल्हार राव होल्कर के द्वारा किया गया उन्होंने अहिल्याबाई होल्कर के पुत्र का नाम मालेराव तथा उनकी पुत्री का नाम मुक्ताबाई रखा। जब अहिल्याबाई ने अपने पुत्रों को जन्म दिया था, उस समय मराठी हिंदू राज्य की विस्तार में लगे हुए थे।  मराठा साम्राज्य के शासक अन्य राजाओं से चौथ वसूला करते थे किंतु भरतपुर के लोगों ने चौथ देने से मना कर दिया। इस बात से गुस्सा हो करके मल्हार राव ने अपने पुत्र खंडेराव होल्कर के साथ भरतपुर राज्य पर आक्रमण कर दिया। मल्हार राव होल्कर ने इस युद्ध में विजय तो प्राप्त कर ली परंतु उनके पुत्र खंडेराव होल्कर की मृत्यु हो गई। खंडेराव होल्कर की मृत्यु के बाद अहिल्याबाई होल्कर लगभग 29 वर्ष की उम्र में ही विधवा हो गयीं।


वह पति की मृत्यु के बाद स्वयं को समाप्त करना चाहती थी परंतु उनके ससुर ने उन्हें ऐसा करने से रोका। अहिल्याबाई होल्कर को व्यस्त रखने के लिए मल्हार राव होल्कर ने सारा राजपाट अहिल्याबाई होल्कर को सौंप दिया परंतु अहिल्याबाई होल्कर ने अपने 17 वर्ष के पुत्र मल्हार राव को सिंहासन पर बैठा दिया और स्वयं उनकी संरक्षिका बन कर उनका ध्यान रखती थी। इसी बीच उत्तर भारत में हो रहे एक अभियान में मल्हार राव ने सहभागिता की और इसी अभियान में कानवी पीड़ा के कारण महाराज मल्हार राव होल्कर की मृत्यु हो गयी।
अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा किये गये कार्य
अहिल्याबाई होल्कर ने अपने पति और ससुर की मृत्यु हो जाने पर उनकी स्मृति में इंदौर राज्य तथा अन्य राज्यों में विधवाओं, अनाथो, अपंग लोगों के लिए आश्रम बनवाएं। अहिल्याबाई होल्कर ने ही कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक अनेक मंदिर, घाट, तालाब, दान संस्थाएं, भोजनालय, धर्मशालाएं, बावरिया इत्यादि का निर्माण करवाया। अहिल्याबाई होल्कर ने ही काशी के प्रसिद्ध मंदिर काशी विश्वनाथ और महेश्वर मंदिर तथा वहां पर स्थित घाटों को बनवाया।
इसके अतिरिक्त उन्होंने साहित्यकार कलाकार और गायकों को भी बढ़ावा दिया। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने राज्य की रक्षा करने के लिए महिला सैन्य टुकड़ीया बनवायी तथा अनुशासित सैनिकों को भी रखा। इनके इन टुकड़ियों में ऐसे प्रशिक्षित सैनिक थे जिन्हें यूरोप और फ्रांसीसी शैली में प्रशिक्षण प्राप्त करवाया गया था। राव ने अपने पुत्र के लिए अहिल्याबाई को वधू चुन लिया।
इंदौर को एक छोटे से गाँव से बढ़ा कर आज जैसा स्वरुप देना हो या करीब तीस साल के शांतिपूर्ण शासन की व्यवस्था, राजमाता अहिल्याबाई होल्कर को कई चीजों के लिए याद किया जा सकता है। मल्हार राव होल्कर को उनपर जैसा भरोसा था, वो भी आश्चर्यजनक लग सकता है। उनकी एक चिट्ठी के हिस्से कई जगह उद्धृत होते रहते हैं, इसमें वो अहिल्याबाई को चम्बल पार कर के ग्वालियर की तरफ बढऩे के आदेश दे रहे होते हैं। चिट्ठी में बड़ी तोपों और उनका पर्याप्त गोला-बारूद रखने के आदेश हैं। कितनी देर रास्ते में रुका जा सकता है, वो तो बताया ही गया है, साथ ही रास्ते की निगरानी चौकियों की व्यवस्था भी दुरुस्त करने के आदेश हैं। उनकी तारीफ में एनी बेसेंट ने काफी लिखा है तो जवाहरलाल नेहरु भी अपनी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में उनकी प्रशंसा करते मिलते हैं। उनके दरबार में मराठी कवि मोरोपंत, संस्कृत के जानकार कौशली राम प्रश्रय पाते थे तो आनंदफंडी भी थे। अपने राज्य को शांतिपूर्ण शासन देने में उन्हें भले ही कामयाबी मिली हो, लेकिन ये दौर ऐसा था जब लगातार इस्लामिक आक्रमणों में मंदिर तोड़े गए थे। हिन्दुओं की स्थिति भारत में बहुत अच्छी नहीं थी। ऐसे दौर में राजमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिरों का पुन: निर्माण कराना शुरू करवाया। ये उनका राजकीय खर्च भी नहीं था, यानि प्रजा पर कर बढ़ा कर मंदिर नहीं बनवाए जा रहे थे। राजमाता की अपनी जमीनों से होने वाली आय से इन मंदिरों को बनवाया जाता था।
भारतीय संस्कृति कोश के मुताबिक उनके करवाए निर्माण काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवन्ती, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथपुरी में हैं। महाराष्ट्र और मालवा के क्षेत्र में उनके बनवाये सैंकड़ो तालाब और धर्मशालाएं भी हैं। शेरशाह सूरी की ही तरह कलकत्ता को काशी से जोडऩे वाली सड़क की मरम्मत भी उन्होंने करवाई थी। आज के तथाकथित इतिहासकार ग्रैंड ट्रंक रोड बनवाने का मुफ्त का श्रेय शेरशाह को दे देते हैं, जिसे उसने बनवाया भी नहीं था और महिला होने के कारण विदेशी परंपरा के निर्वाह के लिए राजमाता अहिल्याबाई होल्कर का नाम लेते समय हकलाने लगते हैं। भारत में तीन-चार सौ वर्ष पुराने जो भी मंदिर इस्लामिक आक्रमणों के बाद आज बचे दिखते हैं, करीब करीब हरेक के निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर का योगदान है।
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु
अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु 13 अगस्त सन 1795 इस्वी को इंदौर राज्य में ही हुई था। अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु कब हुई थी, उस दिन की तिथि भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी थी।

(साभार – द सिम्पल हेल्प डॉट कॉम)

(भारतीय धरोहर डॉट कॉम)

दुनिया के सबसे अमीर शख्स बने फ्रांस के बर्नार्ड अरनॉल्ट

मुम्बई : दुनिया के सबसे अमीर शख्स की तगमा जेफ बेजोस से छिन गया है। अब फ्रांस के बिजनेसमैन बर्नार्ड अरनॉल्ट के पास सबसे ज्यादा संपत्ति है। फोर्ब्स के रियल टाइम बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक 30 मई को बर्नार्ड के पास 192.2 अरब डॉलर की संपत्ति है। वहीं, ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन के मालिक जेफ बेजोस का टोटल नेटवर्थ 487 अरब डॉलर है।
सूची में एलन मस्क और बिल गेट्स भी काबिज
बर्नार्ड अरनॉल्ट लग्जरी सामान बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी एलवीएमएच के चेयरमैन हैं। साथ ही उनके पास लुई विट्टन और सैफोरा जैसे 70 ब्रांड और भी हैं। बिलियनेयर्स इंडेक्स में सबसे अमीरों की लिस्ट में बर्नार्ड और जेफ बेजोस के बाद टेस्ला के सीईओ एलन मस्क और माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स का नंबर आता है। जो समय-समय पर नंबर वन के पायदान पर काबिज रह चुके हैं।
नेटवर्थ में बढ़त की सबसे बड़ी वजह कंपनी के शेयरों में उछाल होती है। क्योंकि कंपनी में उनकी बड़ी हिस्सेदारी होती है। ऐसे में जब शेयर बाजार में कंपनी के शेयरों की वैल्यू बढ़ती है तो इसके साथ ही नेटवर्थ भी तेजी से बढ़ती है। अब अगर एलवीएमएच के शेयरों को देखें तो एक शेयर की वैल्यू मार्च 2020 में 340 यूरो के आसपास थी, जो मई 2021 में 648 यूरो के आसपास पहुँच गयी है। यानी एक साल में की पीरियड में शेयर की कीमत 90% से ज्यादा बढ़ी।
शेयरों में उछाल का फायदा यह हुआ कि अप्रैल 2020 में उनकी नेटवर्थ जो 76 अरब डॉलर थी वह अब बढ़कर 192 अरब डॉलर हो चुकी है। यानी 13 महीने में नेटवर्थ 150% से ज्यादा बढ़ा।
देश से भी निकाला गया
फ्रांस के बिजनेसमैन को देश निकाला भी दिया गया था। यह घटना 1981 की है जब सत्ता में फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी आई। ऐसे में बर्नार्ड ने देश से बाहर अमेरिका में समय बिताया और ठीक 3 साल बाद जब हालात सही हुए तो अपने देश लौटे।
बर्नार्ड अरनॉल्ट ग्रेजुएशन के बाद 1971 में अपने पिता की सिविल इंजीनियरिंग कंपनी का कामकाज देखने लगे। जिसे 1976 में उन्होंने एक रियल एस्टेट कंपनी में बदल दिया। लेकिन अमेरिका से वापसी के बाद बर्नार्ड ने 1984 में बर्नार्ड ने कीमती सामान और कपड़े के कारोबार में हाथ आजमाया और लग्जरी सामान बनाने वाली फ्रेंच कंपनी फायनेंसियरे अगाचे और बोसेक सेंट फरेरेस का अधिग्रहण किया। अंत में 1987 में नयी कंपनी एलवीएमएच की स्थापना की।

सेना से जुड़ीं शहीद मेजर विभूति ढौंडियाल की पत्नी निकिता कौल

भारत के वीर जवाब दिन-रात सीमाओं पर तैनात रहकर देश की सेवा करते हैं। उन्हें इस बात की चिंता नहीं रहती कि वो अपनी जान हथेली पर लेकर चल रहे हैं। बल्कि, हर जवान केवल एक ही संकल्प के साथ अपना सबकुछ मातृभूमि की सेवा में न्यौछावर कर देता है कि लोग सुरक्षित रहें। लेकिन, कई बार वीर जवान दुश्मन के हमले में शहीद हो जाते हैं। ऐसा ही हुआ साल 2019 में। इस साल पुलवामा में सेना के जवानों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई जिसमें पांच जवान शहीद हो गए। उन्हीं में एक थे शहीद मेजर विभूति ढौंडियाल। शहीद मेजर की पत्नी निकिता भारतीय सेना में शामिल हुईं। पुलवामा में सेना के जवानों और आतंकियों के बीच मुठभेड़ हुई थी बताया जाता है कि हमले से ठीक नौ महीने पहले शहीद विभूति और नितिका की शादी हुई थी। मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल को मरणोपरांत शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था। जब उनका पार्थिव शरीर उनके गांव पहुंचा था तो उस वक्त भी नितिका की तस्वीर वायरल हुई थी। वहीं, अब जब उनके कंधों पर स्टार लगे तो भी उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है और लोग उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं। कई लोग ये भी कह रहे हैं कि उनके लिए यह सबसे अच्छी श्रद्धांजलि है। बता दें कि पति से प्रेरणा लेते हुए नितिका कौल ने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ दी और सेना में शामिल होने का फैसला लिया। उन्होंने शॉर्ट सर्विस कमीशन पास करने के बाद पिछले साल ट्रेनिंग शुरू की थी। वहीं, जब वह सेना में शामिल हुईं तो सोशल मीडिया पर बधाई देने वालों का तांता लग गया है। यूजर्स अपने-अपने अंदाज में उन्हें बधाई दे रहे हैं। कोई उनकी तस्वीर शेयर कर रहा है, तो किसी का कहना है कि यह देश के लिए गर्व का पल है।

पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत घर से..लगाइए हर कमरे में दो पौधे

यह भयावह समय है, कठिन समय है। काल का तांडव, मृत्यु की विभीषिका है, प्रकृति के कोप से पूरा देश और पूरी पृथ्वी आक्रांत है और इस बीच बहस चल रही है, विवाद हो रहे हैं, ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी हो रही है..एक दूसरे को नीचा दिखाने और कमतर साबित करने की होड़ लगी है…मुख पर प्रेम और हृदय में घृणा है..आस – पास के ऐसे लोगों को जाते देख रही हूँ जिनको देखते हुए बड़ी हुई…सीखा…मन क्लान्त हो पड़ा है…हम दिखावे की ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ उदारता से लेकर रोग तक, सब प्रदर्शन की वस्तु बन गये हैं..
जरा सोचिए तो ईश्वर ने ऐसी ही दुनिया दी थी आपको? क्या ऐसा ही संसार दिया था..? यही देश था जहाँ लोग दीर्घायु हुआ करते थे…स्वस्थ रहा करते थे और तब आज की तरह महँगी चिकित्सा प्रणाली भी नहीं थी। यह समय देखिए सब ईश्वर को पुकार रहे हैं..कोई निर्मम बता रहा है तो कोई विश्वास रख रहा है…कोई एक दूसरे को कोस रहा है तो कोई सरकारों को दोष दे रहा है…औऱ यहीं पर कोई खुद से सवाल नहीं कर रहा है….
आज कृत्रिम ऑक्सीजन के लिए दौड़ लगाते मनुष्यों को ईश्वर ने ऑक्सीजन प्रदाता वृक्षों और वनों से लदी धरती ही दी थी तो वृक्ष काटते हाथों ने क्या यह भयावह भविष्य देखा होगा…नहीं देखा होगा..अगर ऐसा भविष्य देखते तो हाथ उठते ही नहीं कुल्हाड़ी उठाने के लिए…तो दोषी कौन?
हम बचपन से ही सुनते आए कि धूम्रपान, मदिरापान हमारे फेफड़ों को नष्ट करते हैं। हमारी प्रतिरोधक क्षमता खत्म होती है मगर आपने इन दोनों को बुरी आदत नहीं माना बल्कि कवियों ने भी महिमामंडन किया। नशे की लत ऐसी कि लॉकडाउन से पहले और लॉकडाउन के बाद पहली कतार यहीं लगती है तो ऐसे में पहले से कमजोर पड़े फेफड़े खराब होते हैं और इन पर कोविड -19 समेत अन्य बीमारियों का प्रहार होता है तो दोषी कौन?
पढ़ा – लिखा शिक्षित मध्यम वर्ग भी मानता है कि उसका काम सिर्फ टैक्स भरना है, इसके आगे कोई जिम्मेदारी नहीं मगर बात जब खुद पर आती है तो उसे लगता है कि वह अकेला ही सब कुछ क्यों करे? क्या आप किसी संस्थान के मालिक होते हैं तो वेतन दे देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है…अगर नहीं तो सिर्फ टैक्स भर देने से आपकी जिम्मेदारी पूरी कैसे हो सकती है? प्रवासी श्रमिकों को काम से निकालने और शहर से निकालने में सुशिक्षित लोगों की बड़ी भूमिका है। इनका काम सोशल मीडिया पर 4 शब्द लिखने से या लम्बी सी कविता लिख देने से पूरा हो जाता है। ऐसे में अगर अपने जीवन की रक्षा करने के लिए हर ओर से सताये गये ये लोग राशन की दुकानों के सामने परहेज के सारे नियम भूल जाएं तो जिम्मेदारी किसकी है? नेताओं की रैलियों में 5 रुपये और भात के लिए अगर भीड़ लगा लें तो दोष किसका है? अगर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक को कोविड से पहले चुनावों की चिन्ता हो तो कोविड और चीन को दोषी कहकर क्या बिगाड़ लेंगे आप? मास्क पहनाने के लिए जहाँ पर पुलिस तैनात करनी पड़ रही हो, कोरोना योद्धाओं को सम्मान जताते हुए उनको घर से बाहर निकालने के लिए लोग खड़े हों तो क्या उस देश के लोगों को कोई अधिकार है कि वह दूसरों पर उंगली उठाए?
उपकरणों पुर निर्भर रहने की ऐसी लत लगी कि आप बात कहने के लिए भी उसे लिखते हैं…चिट्ठी लिखना आपको डाउन मार्केट लगता है। जिस देश में अड्डा. चौपाल, आंगन की परम्परा हो…जहाँ आध्यात्मिक चेतना हो…जहाँ एकान्त में सृजन की परम्परा रही हो…वहाँ के लोग कुछ दिन अलग रह जाने से घबराते हैं…आप खुद सोचिए कि आप कहाँ थे और कहाँ आ गये हैं। आज वीडियो कॉल है, सोशल मीडिया है…मगर कुछ नहीं है तो अपने लिए कुछ समय निकालने की ललक, अपने मित्रों से रूबरू होने की चाहत, हम अनौपचारिकताओं के बीच अनौपचारिक हो रहे हैं…जुड़ रह हैं ऊपर से। हमारी सारी रुचियाँ फेसबुक, सिनेमाहॉल, मल्टीप्लेक्स, मॉल, रेस्तराओं तक सिमट गयी है…छोटी – छोटी बातें पीछे छूटती गयीं। किताबों की जगह भी डिजिटल उपकरणों ने ले ली और कागज की वह सोंधी – सोंधी गन्ध भी हम भूलते जा रहे हैं…बस कितना कुछ तो है सोचने के लिए…। बच्चों को सुविधाओं के मायाजाल में ऐसा बाँधे जा रहे हैं कि एक हल्की सी चोट और हल्की सी तकलीफ भी उन पर भारी पड़ रही है।
हमारे पूर्वजों का जीवन प्रकृति के साहचर्य़ का जीवन था..वह उतना ही लेते थे जितना आवश्यक होता था…जितने की आवश्यकता होती थी, उतने की ही इच्छा रखते थे। आप किसी का भी जीवन उठाकर देखिए..वनों औऱ वनवासियों के साथ प्रकृति का संरक्षण ही किया उन्होंने..हम राम और कृष्ण को पूजते हैं…शिव की आराधना करते हैं पर उनके जीवन से हमने क्या सीखा…कुछ भी तो नहीं..वेदों में प्रकृति की आराधना है…,वेदों से प्रेम है तो प्रकृति से प्रेम करना सीखिए…संस्कृति से प्रेम है तो प्रकृति का संरक्षण करिए..,.आपने प्रकृति से खिलवाड़ किया…ईश्वर अपनी संतानों का क्रन्दन कैसे देख पाता इसलिए यह एक दंड ही समझिए…एक वृक्ष को 10 पुत्रों के बराबर माना गया है। आधुनिक युग में आचार्य़ जगदीश चन्द्र बोस ने भी प्रमाणित किया कि पौधों में जीवन होता है…आप उनको जीवन देते, वृक्ष लगाते तो सम्भवतः ऑक्सीजन प्लांट की जरूरत ही न पड़ती.. जो देता है, वही श्रेष्ठ होता है, छीनने वालों को श्रेष्ठ होने का दम्भ रहता है और वे अपनी श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र दूसरों से चाहते हैं….आप एक नकली जीवन जीते रहे और इसे अपनी उपलब्धि मानकर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं पर हुआ क्या….प्रकृति के प्रतिकार ने आपको आपकी जगह दिखा दी।
हर साल की तरह इस बार भी पर्यावरण दिवस मनाने का मन बना रहे हैं। कोविड के कारण बड़े – बड़े समारोह होना कठिन है तो ऐसे में एक काम करिए न…मानते हैं हम कि सड़क पर पेड़ लगाना हमारे हाथ में नहीं है,,,मगर अपने कमरे में तो 2 पौधे लगाकर उनको पानी दे ही सकते हैं…उनका ख्याल रख ही सकते हैं। पौधे आपको ऑक्सीजन देंगे और आपको एक सन्तुष्टि मिलेगी…तो इस बार एक कमरा, दो पौधे और एक हरी -भरी सृष्टि।