Wednesday, April 8, 2026
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कन्नड़ साहित्यकार वसंत कुश्तगी का निधन

कलबुर्गी : प्रख्यात कन्नड़ साहित्यकार प्रोफेसर वसंत कुश्तगी का दिल का दौरा पड़ने से यहां एक निजी अस्पताल में शुक्रवार को निधन हो गया। वह 85 वर्ष के थे। पारिवारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि कुश्तगी को निम्न रक्तचाप की शिकायत होने पर गुलबर्गा हार्ट फाउंडेशन ऐंड रिसर्च सेंटर में भर्ती कराया गया था। उन्होंने 60 से अधिक पुस्तकें लिखी थीं। कुश्तगी बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे और साहित्यकार के अलावा वह शिक्षक, पत्रकार और अधिकार कार्यकर्ता भी थे।

अगले कुछ माह में लागू हो सकती है श्रम संहिता

हाथ में आने वाला वेतन घटेगा, पीएफ बढ़ेगा
नयी दिल्ली : आगामी कुछ माह में चारों श्रम संहिताएं लागू हो जाएंगी। केंद्र सरकार इन कानूनों के क्रियान्वयन पर आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। ये कानून लागू होने के बाद कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन (टेक होम) घट जाएगा, वहीं साथ ही कंपनियों की भविष्य निधि (पीएफ) की देनदारी बढ़ जाएगी। वेतन संहिता लागू होने के बाद कर्मचारियों के मूल वेतन और भविष्य निधि की गणना के तरीके में उल्लेखनीय बदलाव आएगा।
श्रम मंत्रालय इन चार संहिताओं….औद्योगिक संबंध, वेतन, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक और स्वास्थ्य सुरक्षा तथा कार्यस्थिति को एक अप्रैल, 2021 से लागू करना चाहता था। इन चार श्रम संहिताओं से 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को सुसंगत किया जा सकेगा। मंत्रालय ने इन चार संहिताओं के तहत नियमों को अंतिम रूप भी दे दिया था। लेकिन इनका क्रियान्वयन नहीं हो सका, क्योंकि कई राज्य अपने यहां संहिताओं के तहत इन नियमों को अधिसूचित करने की स्थिति में नहीं थे।
भारत के संविधान के तहत श्रम समवर्ती विषय है। ऐसे में इन चार संहिताओं के तहत केंद्र और राज्यों दोनों को इन नियमों को अधिसूचित करना होगा, तभी संबंधित राज्यों में ये कानून अस्तित्व में आएंगे। एक सूत्र ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘कई प्रमुख राज्यों ने इन चार संहिताओं के तहत नियमों को अंतिम रूप नहीं दिया है। कुछ राज्य इन कानूनों के क्रियान्वयन के लिए नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में हैं। केंद्र सरकार हमेशा इस बात का इंतजार नहीं कर सकती कि राज्य इन नियमों को अंतिम रूप दें। ऐसे में सरकार की योजना एक-दो माह में इन कानूनों के क्रियान्वयन की है क्योंकि कंपनियों और प्रतिष्ठानों को नए कानूनों से तालमेल बैठाने के लिए कुछ समय देना होगा।
सूत्र ने बताया कि कुछ राज्यों ने नियमों का मसौदा पहले ही जारी कर दिया है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक और उत्तराखंड शामिल हैं। नयी वेतन संहिता के तहत भत्तों को 50 प्रतिशत पर सीमित रखा जाएगा। इसका मतलब है कि कर्मचारियों के कुल वेतन का 50 प्रतिशत मूल वेतन होगा। भविष्य निधि की गणना मूल वेतन के प्रतिशत के आधार पर की जाती है। इसमें मूल वेतन और महंगाई भत्ता शामिल रहता है।

अभी नियोक्ता वेतन को कई तरह के भत्तों में बांट देते हैं। इससे मूल वेतन कम रहता है, जिससे भविष्य निधि तथा आयकर में योगदान भी नीचे रहता है। नई वेतन संहिता में भविष्य निधि योगदान कुल वेतन के 50 प्रतिशत के हिसाब से तय किया जाएगा।

आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ देगा 867 करोड़ रुपये का बोनस

नयी दिल्ली : आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने वित्त वर्ष 2020-21 के लिए पॉलिसीधारकों को 867 करोड़ रुपये का बोनस देने की घोषणा की है। यह कंपनी द्वारा घोषित अबतक का सबसे ऊंचा वार्षिक बोनस है। कम्पनी ने बयान में कहा, ‘‘आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस ने 2020-21 के लिए सभी पात्र पॉलिसीधारकों को 867 करोड़ रुपये के वार्षिक बोनस की घोषणा की है। यह कंपनी द्वारा आज की तारीख तक घोषित सबसे ऊंचा बोनस है। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में यह 10 प्रतिशत अधिक है।’’
बोनस कंपनी के भागीदार पॉलिसीधारक कोषों द्वारा जुटाए गए लाभ का एक हिस्सा होता है। 31 मार्च, 2021 तक सभी भागीदार पॉलिसियां इस बोनस को पाने की पात्र होंगी। इसे पॉलिसीधारकों के लाभ में डाला जाएगा। इससे 9.8 लाख भागीदार पॉलिसीधारकों को लाभ होगा।

पूर्वी कोलकाता दलदली क्षेत्र का होगा संरक्षण

खर्च होंगे 120 करोड़ रुपये
कोलकाता : बंगाल सरकार ने 12,500 हेक्टेयर में फैले पूर्वी कोलकाता दलदल क्षेत्र (ईकेडब्ल्यू) को संरक्षित व पोषित करने के लिए 120 करोड़ रुपये की योजना बनाई है जो पांच साल में लागू की जाएगी। पर्यावरण विभाग के शीर्ष अधिकारी ने यह जानकारी दी। दलदली भूमि वह होती है जहां पर सालभर या किसी मौसम में पानी जमा रहता है और इसकी वजह से वहां एक विशेष पारिस्थितिकी तंत्र बन जाता है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर अतिरिक्त मुख्य सचिव (पर्यावरण) विवेक कुमार ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार ने राज्य के तटीय इलाकों के संरक्षण के लिए भी कार्यक्रम बनाया है जिन्हें पिछले साल आए एम्फन तूफान और पिछले महीने आए यास तूफान से नुकसान पहुंचा हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वी कोलकाता दलदली भूमि को कई तरीकों से संरक्षित किया जाएगा, जैसे अतिक्रमण रोका जाएगा, कृषि में इस्तेमाल कीटनाशकों एवं टेनरियों के पानी से जल को प्रदूषित होने से रोका जाएगा। इसके अलावा रामसर इलाके स्थित दलदली भूमि के महत्व को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा की जाएगी।
वर्ष 1971 के रामसर सम्मेलन के तहत रामसर इलाका अंतरराष्ट्रीय महत्व का दलदली क्षेत्र है। कुमार ने बताया कि राज्य के तटीय इलाकों के सरंक्षण के लिए सरकार ने शंकरपुर-दीघा तटीय क्षेत्र सड़क एवं प्रबंधन योजना बनाई है। सरकार की योजना एम्फन तूफान से तबाह सुंदरवन इलाके में पांच करोड़ मैंग्रोव के पौधे लगाने की है और अगले आठ से 10 साल बाद हम इसके नतीजे देखेंगे।
राज्य की पर्यावरण मंत्री रत्ना दे नाग ने कहा कि झारग्राम जिले में कनकदुर्गा मंदिर से सटे इलाके में कई दुर्लभ पौधे हैं जिन्हें संरक्षित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्लास्टिक के अत्याधिक इस्तेमाल और वन क्षेत्र कम होने से हमारी जैव विविधता को खतरा है, इसकी वजह से उत्पन्न माहौल कोविड-19 के संक्रमण में सहायक रहा।

करें आभूषणों की शुद्धता की पड़ताल

आभूषणों की गलत बिक्री न हो इसलिए सरकार ने 16 जून से सभी ज्वैलर्स को हॉलमार्क वाली ज्वैलरी बेचने को कहा है। कई बार, जौहरी यह कहते हुए आभूषण बेचते हैं कि यह 22 कैरेट का है, लेकिन वास्तविकता में यह कम शुद्धता का हो सकता है। लेकिन, अगर कोई जौहरी चाहे तो हॉलमार्किंग की फर्जी जानकारी भी दे सकता है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि गहनों पर हॉलमार्किंग वास्तविक है, कुछ चीजें हैं जिन्हें आप देख सकते हैं।
हॉलमार्क शुद्धता का प्रमाण है। जौहरी हॉलमार्किंग केंद्रों (एएचसी) से हॉलमार्क का प्रमाणपत्र ले सकता है। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) इन केंद्रों को मान्यता देता है। जौहरी को अपना माल हॉलमार्क करवाने के लिए बीआईएस से लाइसेंस भी लेना होगा। हॉलमार्क वाले गहनों का एक टुकड़ा आपको सोने की शुद्धता बताता है, चाहे वह 18 कैरेट का हो, 20 कैरेट का या 22 कैरेट का। आभूषण खरीदते समय, आपको हॉलमार्क वाले आभूषणों पर तीन निशान दिखाई देंगे- शुद्धता, परख या हॉलमार्किंग केंद्र का पहचान चिह् और जौहरी का पहचान चिह्/संख्या।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि दी गई जानकारी सही है, हमेशा बीआईएस रजिस्टर्ड जौहरी से ही खरीदारी करें। आप जौहरी से बीआईएस लाइसेंस दिखाने के लिए भी कह सकते हैं। अगला काम बिल की जांच करना है। नियमों के अनुसार जौहरी को हॉलमार्किंग शुल्क की जानकारी अलग से देनी होती है। एएचसी ₹35 प्रति पीस का शुल्क लेता है।
नियम के मुताबिक, बिल या चालान में प्रत्येक वस्तु का विवरण, कीमती धातु का शुद्ध वजन, कैरेट में शुद्धता और सुंदरता और हॉलमार्किंग शुल्क अलग-अलग होना चाहिए।
यदि आप अब भी अनिश्चित हैं, तो आप किसी भी बीआईएस-मान्यता प्राप्त एएचसी से अपने आभूषणों की जांच करवा सकते हैं। केंद्र प्रायोरिटी बेसिस पर उपभोक्ताओं के आभूषणों की जांच करते हैं। जांच के बाद एएचसी एक रिपोर्ट जारी करेगा। यदि आभूषण बिल में बताई गई शुद्धता से कम शुद्धता का है, तो एएचसी, जिसने प्रारंभिक प्रमाणीकरण किया था, को उपभोक्ता की फीस वापस करनी होगी। आप रिपोर्ट के साथ अपने जौहरी से भी संपर्क कर सकते हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में वह ग्राहकों को क्षतिपूर्ति करने के लिए भी उत्तरदायी है।

‘मानवीय संकट के प्रश्न और समकालीन हिंदी साहित्य’ विषय पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन’

कोलकाता : हुगली मोहसिन कॉलेज और बंगीय हिंदी परिषद, कोलकाता के संयुक्त तत्वाधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “मानवीय संकट के प्रश्न और समकालीन हिंदी साहित्य” था। इस कार्यक्रम का आरंभ डॉ. रणजीत कुमार के संचालन से हुआ। इसके पश्चात परिषद के मंत्री डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने स्वागत भाषण द्वारा सभी अतिथियों का स्वागत किया। डॉ. त्रिपाठी ने मुख्य वक्ता प्रो.सूरज पालीवाल, मुख्य अतिथि डॉ. बीना जैन, वक्ता डॉ. चक्रधर प्रधान , अध्यक्ष प्रो. अरुण होता, प्राचार्य प्रो. पुरुषोत्तम प्रामाणिक, अध्यक्ष प्रोफेसर राजश्री शुक्ला तथा सभी श्रोताओं का भी स्वागत किया। इसके पश्चात प्रमुख वक्ता प्रो. सूरज पालीवाल ने अपना वक्तव्य आरम्भ करते हुए समाज में फैली अराजकता को दर्शाया और साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली बहार बताया। इन्होंने कोरोना के संकट पर चर्चा करते हुए, इसकी दूसरी लहर की सूचना विद्वानों से प्राप्त होने के बाद भी सरकार और जनता की लापरवाही की ओर ध्यान आकर्षित किया । कोरोना के अतिरिक्त इन्होंने अन्य मानवीय संकटों में बेरोजगारी और ऐसी कठिन परिस्थितियों में लोभी, मानवता के सौदागरों का विषय उठाया और बड़े ही भावनात्मक तरीके से किसानों के मुद्दों पर भी चर्चा की। साथ ही यह भी कहा कि यह रचनाकारों की जिम्मेदारी है कि उन विषयों पर विशेष रूप से लिखें।
इसके पश्चात हुगली मोहसिन कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. चक्रधर प्रधान ने अपना वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए लॉकडाउन को मानव जीवन का एक बड़ा संकट बताया। मूल विषय पर चर्चा करते हुए उन्होंने इसी से सम्बंधित अपने मित्र विश्वजीत के उपन्यास “लॉकडाउन एक काला युग” का उदाहरण दिया। इसके माध्यम से इन्होंने मानवीय संकटों और लॉकडाउन के दौरान की परिस्थितियों का बड़ा ही यथार्थ वर्णन किया। इनके पश्चात दिल्ली के किरोड़ीमल महाविद्यालय की प्राध्यापिका डॉ. बीना जैन ने अपने मन की बातों को बड़े ही सुंदर उदाहरणों और शब्दों में व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है परंतु जिजीविषा भी उतना ही बड़ा सत्य है। आज की इन परिस्थितियों को देखते हुए इन्होंने मानव के अकेलेपन को मानव संकट का एक रूप बताया, जिसे इन्होंने ‘निर्मल वर्मा’ की रचनाओं के माध्यम से वर्णित किया। साथ ही इन्होंने कुछ कहानियों ‘धूप का टुकड़ा’ और विशेष रूप से ‘परिंदे’ पर चर्चा की । इन्होंने अपने वक्तव्य में प्रकृति की सुरक्षा और उसके प्रेम के प्रति बल दिया है।

इसके उपरांत प्रो. अरुण होता ने मानव संकट पर चर्चा करते हुए बड़ा ही सकारात्मक विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने अनेक रचनाकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब भी मानव संकट उत्पन्न होता है, तब रचनाकार साहस के साथ समाज, देश और जन कल्याण की ओर बढ़ता है। उन्होंने कहा कि हर कलाकार चाहे वह कला के किसी भी क्षेत्र में हो वह अपनी कला के माध्यम से भावों को व्यक्त कर स्वयं को मुक्त कर लेता है। आज की परिस्थिति में भी जहां भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है वहीं कुछ अच्छे लोग भी सहायता के लिए अपना कदम बढ़ा रहे हैं। अतः हमें निराश नहीं होना चाहिए।
इसके पश्चात अंत में परिषद की अध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने सभी वक्ताओं का धन्यवाद ज्ञापन किया तथा युवा शक्ति की सराहना करते हुए सकारात्मकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी।
इस कार्यक्रम का संयोजन अनूप यादव और भानु प्रताप पांडेय ने किया तथा जिउतलाल प्रजापति, सिद्धार्थ त्रिपाठी, निखिता पांडेय, सुशील पांडेय, राजेश सिंह, अभिषेक पांडेय, ज़ोया अहमद और दीपा ओझा ने अपना पूरा सहयोग दिया।

प्रकृति अब मौन नहीं

वसुंधरा मिश्र
करोड़ों वर्षों से सजाया था
सपनों का ये आशियाना
मनुष्य की भावना पर कर विश्वास
सौंप दिया मनुज को यह पूरा हरा भरा संसार
सात्विक बन बैठे राजसिक तामसिक
जर्जरित विचार और चिंतन ने
घर की दिवारों में ही लगा लिया है सेंध
हवा-पानी धूप पर किया पूर्ण प्रहार
प्रकृति के संरक्षक ही बन बैठे सब भक्षक
प्रकृति नहीं रही अब मौन
कड़ी सुरक्षा के घेरे में बांध
मनुज को किया अधिकारविहीन
मृत्यु भय के पाश में जकड़ा
उसके ही हथियारों से उसको है मारा
तोड़ दिए सभी प्रेम के बंधन
प्रकृति तो जीवन प्रतीक है
उसे मारने वाले को वह
कभी क्षमा न करती
दैवीय शक्ति बन
छीन लेती उसका प्रभुत्व
आओ! आज कबूलें
जाने – अनजाने अपराध हमारे
पेड़ – पौधे नदी-नाले और पहाड़ों की भाषा को
नये सिरे से जाने-परखें
भारतीय संस्कृति तो प्रकृति पूजक है
क्यों न बचाएं फिर से अपनी धरती को
भूल आधुनिक धंधों को
आओ अपनी भूल सुधारें
जीवनदायिनी प्रकृति को गले लगाएं।

निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री राजस्थान की दयाबाई

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों  को नमस्कार। सखियों, हिन्दी साहित्य के मध्ययुग में बहुत सी ऐसी कवयित्रियाँ हुई हैं जिनके नाम समय के साथ इतिहास के खंडहरों में गुम हो गए हैं। कुछ के नामों का उल्लेख अवश्य मिलता है लेकिन उन पर विस्तार से चर्चा नहीं हुई है। उन सब के साहित्यिक अवदानों को याद करना और उस पर चर्चा करना भी हमारे लिए बेहद आवश्यक है। वैसे भी मध्ययुगीन कवयित्रियों में भक्त कवयित्री के रूप में मीराबाई का वर्णन ही प्रमुखता से हुआ है। बाकियों के अस्तित्व और अवदान की पर्याप्त अनदेखी या उपेक्षा हुई है। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक अवदान के बारे में पता लगाएँ और उनके मूल्यांकन का प्रयास भी करें। भक्तिकाल की दो कवयित्रियों के नाम तकरीबन एक साथ लेकर हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर दी है, ये हैं- सहजोबाई और दयाबाई। दोनों ही संत कवयित्रियाँ चरणदासी संप्रदाय में दीक्षित थीं। कुछ लोगों का कहना है कि ये चचेरी या मौसेरी बहनें थीं और कुछ का मानना है कि गुरुबहने थीं। लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि दोनों ही संत चरण दास की शिष्या थीं। सहजोबाई के विषय में मैं अपने एक आलेख में चर्चा कर चुकी हूं, आज दयाबाई के साहित्यिक अवदान और भक्ति के स्वरूप पर चर्चा करूंगी। 

दयाबाई का जन्म मेवात के डहरा नामक गांव में सन 1693 में और मृत्यु  1773 में हुई। इन्होंने आजीवन ब्रह्मचारिणी रहकर दिल्ली में अपने गुरु चरणदास की सेवा में जीवन व्यतीत किया एवं ईश्वर की भक्ति एवं प्रेम में पगी कविताओं की रचना की। “दयाबोध” इनका प्रकाशित ग्रंथ‌ हैं जिसमें लेखिका ने अपने रचनाकाल का संकेत भी दिया है जिसके अनुसार इसका प्रणयन 1818 में हुआ था-

“‘‘संवत ठारा सै समै, पुनि ठारा गये बीति।

चैत सुदी तिथि सातवी, भयो ग्रंथ सुभ रीति।’’

 इसके अतिरिक्त “विनय मालिका” में भी उनके द्वारा सृजित रचनाएँ संकलित हैं। दयाबाई ने शुद्ध व परिष्कृत ब्रजभाषा में रचना की है, जिस पर मेवाती का प्रभाव सहज रूप से लक्षित किया जा सकता है। इन्होंने पद, साखी, चौपाई आदि में वैराग्य, प्रेम, सत्संग और ईश्वरीय कृपा का मार्मिक वर्णन किया है।

तमाम प्रमुख भक्त कवियों की भांति दयाबाई के काव्य में भी गुरु के प्रति अनन्य भक्ति भाव की अभिव्यक्ति हुई है। गुरु कृपा के बिना ज्ञान नहीं मिलता, इस तथ्य पर कवयित्री को पूर्णतया विश्वास है। गुरु की कृपा से ही वह अनहद नाद को सुनकर भवसागर से मुक्ति का पथ पाती हैं, जिसे अपनी कविता में उन्होंने इस भांति उकेरा है-

‘चरणदास गुरुकृपा ने मनुवां भयो अपंग

सुनत नाद अनहद ‘दया’ आठौ जाम अभंग।

गगन मध्य मुरली बजै में जु सुनी निज कान।

‘दया’ दया गुरुदेव की परस्यौ पद निर्बान।’’

गुरु के बिना ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती इसकी अभिव्यक्ति भी उनकी रचनाओं में मिलती है। मन को सांसारिक मोह माया से मुक्त करके ईश्वर की राह पर उसे ले जाने वाला गुरु ही होता है।

‘‘गुरु सब्दन कूँ ग्रहण करि विषयन कूँ दे पीठ।

गोविन्द रूपी गदा मारो कमरन ठीठ।

जग तजि हरि भजि दया गहि क्रूर कपट सब छांड

हरि सन्मुख गुरु ज्ञान गहि मनही सूं रन मांड।’’

दयाबाई निर्गुण भक्ति धारा की कवयित्री थीं और उनपर अद्वैतवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है। उन के काव्य में सांसारिक विषय वासनाओं से मुक्ति के लिए गुरु की कृपा से प्राप्त ईश्वरीय प्रकाश की भी अभिव्यक्ति हुई है जिसके प्रभाव से जीव और ब्रह्म के बीच का भेदाभेद समाप्त हो जाता है-

“भयो अविद्या तम को नास॥

ज्ञान रूप को भयो प्रकास।

सूझ परयो निज रूप अभेद।

सहजै मिठ्यो जीव को खेद॥

जीव ग्रह्म अन्तर नहिं कोय।

एकै रूप सर्व घट सोय॥

जगत बिबर्त सूँ न्यारा जान।

परम अद्वैत रूप निर्बान॥

बिमल रूप व्यापक सब ठाईं।”

दयाबाई की कविता में उस वैराग्य भाव का वर्णन हुआ है जिसका अवलंब लेकर भक्त सांसारिक माया से मुक्ति पाकर ईश्वरीय आभा का साक्षात्कार करता है और अंततः मोक्ष लाभ करता है। उस पावन‌ अवस्था का वर्णन दयाबाई इस प्रकार करती हैं-

“बिन दामिनि उजियार अति, बिन घन पडत फुहार।

मगन भयो मनुवां तहां, दया निहार निहार॥”

सत्संग अर्थात साधु संगति की महिमा बखान जैसे संत कबीर करते हैं उसी तरह दयाबाई भी “साध को अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित वाणी में, सत्संग के साथ साधुओं या सज्जन लोगों की सेवा के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए, उसे असार संसार से मुक्ति का मार्ग मानती हैं-

“साध साध सब कोउ कहै, दुरलभ साधू सेव।

जब संगति ह्वै साधकी, तब पावै सब भेव॥”

प्रेम का प्रकाश और उसके प्रभाव को दयाबाई ने अपनी गुरुबहन सहजोबाई और संत कबीर की भांति अनुभूत भी किया है और उसे शब्दों में पिरोया भी है-

“दया प्रेम प्राय्यौ तिन्है, तन की तनि न संभार।

हरि रस में माते फिरें, गृह बन कौन बिचार॥

हरि रस माते जे रहें तिनको मतो अगाध।

त्रिभुवन की सम्पति ‘दया’ , तृन सम जानत साध॥”

प्रेम के आत्मबोध के साथ ही कवयित्री उसके अटपटेपन की ओर संकेत करते हुए उस अद्भुत स्थिति का चिती करती हैं जिसमें प्रेमी या भक्त उस अवर्णनीय आनंद से साक्षात्कार करता है जिसका अनुभव मात्र वही कर सकता है, अन्य कोई नहीं –

“पथ प्रेम को अटपटो, कोइ न जानत बीर।

कै मन जानत आपनो, कै लागी जेहि पीर॥”

भक्ति काव्य में नाम- स्मरण या प्रभु सुमिरन का बहुत महत्व है। दयाबाई भी अगाध विश्वास के साथ प्रभु के नाम का स्मरण करते हुए, सत्संग और भजन के माध्यम से इस भवसागर से पार उतरना चाहती हैं, जिसका सुंदर निदर्शन प्रस्तुत पद में हुआ है-

“दयादासि’ हरि नाम लै, या जग में यह सार।

हरि भजते हरि ही भये, पायो भेद अपार॥

सोवत जागत हरि भजो, हरि हिरदै न बिसार।

डोरा गहि हरि नाम की, ‘दया’ न टूटै तार।

नारायन नर देह में, पैयत हैं ततकाल।

सतसंगति हरि भजन सूँ, काढ़ो तृस्ना व्याल॥

दया नाव हरि नाम को, सतगुरु खेवन हार।

साधू जन के संग मिलि, तिरत न लागै वार॥”

“वैराग्य का अंग” शीर्षक के अंतर्गत संकलित दोहों में दयाबाई संसार की स्वार्थपरता की ओर संकेत करती हुई सांसारिक नातों से मुक्त होकर मात्र अपने प्रभु के साथ ही प्रेम का संबंध जोड़ने की बात करती हैं-

“‘‘दयाकुँवर या जगत में नहीं अपनी कोय

स्वारथ-बंधी जीव है राम नाम चित जोय।’’

सखियों, दयाबाई का काव्य हर दृष्टि से अन्यान्य भक्त कवियों के काव्य की समकक्षता कर सकता है। जरूरत है, इसके पुनर्खोज और पुनर्पाठ की। मेरा आग्रह है कि इन्हें भी भक्तिकाव्य के तमाम कवियों के साथ समान आसन और आदर मिलना चाहिए।

 

वेदों में पर्यावरण चिंतन

प्रो. श्रीराम अग्रवाल
वैदिक ॠषि कहते हैं है कि हम पृथ्वी वासी पर्यावरण को दूषित न करें, छिन्न न करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। यह एक ऐसा सत्य है जिसकी वर्तमान में अवहेलना कर हम पर्यावरण संतुलन को समाप्त करते जा रहे हैपर्यावरण का सीधा- सरल अर्थ है प्रकृति का आवरण। कहा गया है कि ‘परित: आवृणोति’।  प्राणी जगत को चारों ओर से ढकने वाला प्रकृति तत्व, जिनका हम प्रत्यक्षत: एवं अप्रत्यक्षत:, जाने या अनजाने उपभोग करते हैं तथा जिनसे हमारी भौतिक, आत्मिक एवं मानसिक चेतना प्रवाहित एवं प्रभावित होती है, वही पर्यावरण है। यह पर्यावरण भौतिक, जैविक एवं सांस्कृतिक तीन प्रकार का कहा गया है। स्थलीय, जलीय, मृदा, खनिज आदि भौतिक; पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव व मानव आदि जैविक एवं आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक आदि सांस्कृतिक तत्वों की परस्पर क्रियाशीलता से समग्र पर्यावरण की रचना व परिवर्तनशीलता निर्धारित होती है। प्रकृति के पंचमहाभूत-क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा- भौतिक एवं जैविक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। वेदों में मूलत: इन पंचमहाभूतों को ही दैवीय शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है। मानव कृत संस्कृति का निर्माण मानव मन, बुद्धि एवं अहं से होता है। इसीलिए गीता में भगवान कृष्ण ने प्रकृति के पांच तत्वों के स्थान पर आठ तत्वों का उल्लेख किया है। ‘भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धि रेव च। अहंकार इतीयं में भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥” (श्रीमद्भागवद्गीता अ-7/4)

वेदों में पर्यावरण से सम्ब्न्धित अधिकतम ॠचाएं यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में प्राप्त होती हैं। ॠग्वेद में भी पर्यावरण से सम्बंधित सूक्तों की व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में सभी पंचमहाभूतों की प्राकृतिक विशेषताओं व उनकी क्रियाशीलता का विशद्- वर्णन है। आधुनिक विज्ञान भी प्रकृति के उन रहस्यों तक बहुत बाद में पहुंच सका है जिसे वैदिक ॠषियों ने हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर लिया था। इतना ही नहीं, वेदों में प्रकृति तत्वों से अनावश्यक व अमर्यादित छेड़छाड़ करने के दुष्परिणामों की ओर भी संकेत किया गया है तथा मानव को सीख भी दी गई है कि पर्यावरण संतुलन को नष्ट करने के दुष्परिणाम समस्त सृष्टि के लिए हानिकारक होंगे। यजुर्वेद में पृथ्वी को ऊजार्र् (उर्वरकता) देने वाली ‘तप्तायनी’ तथा धन -सम्पदा देने वाली ‘वित्तायनी’ कह कर प्रार्थना की गई है कि वह हमें साधनहीनता/दीनता की व्यथा व पीड़ा से बचाए ‘तप्तायनी मेसि वित्तायनी मेस्यवतान्मा नाथितादवतान्मा व्यथितात्।’-(यजुर्वेद 5/9)।अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में ‘क्षिति’-पृथ्वी- तत्व का मानव जीवन में क्या महत्व है तथा वह किस प्रकार अन्य चार प्रकृति तत्वों के संग, समायोजन पूर्वक क्रियाशील रह कर, उन समस्त जड़-चेतन को जीवनी शक्ति प्रदान करती है जिनको वह धारण किए हुए है, की विशद व्याख्या उपलब्ध है। अथर्ववेद में पृथ्वी को, अपने में सम्पूर्ण सम्पदा प्रतिष्ठित कर, विश्व के समस्त जीवों का भरण पोषण करने वाली कहा गया है। ‘विश्र्वम्भरा वसुधानी प्रतिश्ठा हिरण्यवक्षा जगतों निवेषनी’- (अथर्ववेद 12/1/6)।  जब हम पृथ्वी की सम्पदा (अन्न, वनस्पति, औषधि, खनिज आदि) प्राप्त करने हेतु प्रयास करें तो प्रार्थना कह गई है कि हमें कई गुना फल प्राप्त हो परन्तु चेतावनी भी दी गई है कि हमारे अनुसंधान व पृथ्वी को क्षत विक्षत (खोदने) करने के कारण पृथ्वी के मर्मस्थलों को चोट न पहुंचे। अथर्ववेद में पृथ्वी से प्रार्थना की गई है ‘यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु। मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयमर्पिपम्॥’-(अथर्ववेद 12/1/35)-इसके गम्भीर घातक परिणाम हो सकते हैं। आधुनिक उत्पादन व उपभोग एवं अधिकतम धनार्जन की तकनीक ने पृथ्वी के वनों-पर्वतों को नष्ट कर दिया है। खनिज पदार्थों को प्राप्त करने हेतु अमर्यादित विच्छेदन कर पृथ्वी के मर्मस्थलों पर चोट पहुंचाने के कारण पृथ्वी से जलप्लावन व अग्नि प्रज्ज्वलन, धरती के जगह – जगह फटने व दरारें पड़ने के समाचार हमें प्राप्त होते रहते हैं। खानों में खनन करते समय इसी प्रकार की दुर्घटनाओं ने न जाने कितने लोगों की जानें ही नहीं ली अपितु उन क्षेत्रों के सम्पूर्ण पर्यावरण का विनाश कर उसे बंजर ही बना दिया है।

वेदों में अग्नि (पावक) तत्व को सर्वाधिक शक्तिशाली एंव सर्वव्यापक माना गया है। उसे समस्त जड़-चेतन में ऊर्जा, चेतना तथा गति प्रदान करने वाला एवं नव सृजन का उत्प्रेरक माना गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि ‘यस्ते अप्सु महिमा, यो वनेशु य औशधीशु पषुश्वप्स्वन्त:। अग्ने सर्वास्तन्व: संरभस्व ताभिर्न एहिद्रविणोदा अजस्त्र:॥’ (अ. 19/3/2)-हे अग्निदेव आपकी महत्ता जल में (बड़गाग्नि रूप में), औषधियों व वनस्पतियों में (फलपाक रूप में), पशु व प्राणियों में (वैश्वानर रूप में) एवं अंतरीक्षीय मेघों में (विद्युत रूप में) विद्यमान हैं। आप सभी रूप में पधारें एवं अक्षय द्रव्य (ऐश्वर्य) प्रदान करने वाले हों। यजुर्वेद के अनुसार यही अग्नि द्युलोक (अंतरिक्ष से भी ऊपर परम प्रकाश लोक) में आदित्य (सूर्य) रूप में सर्वोच्च भाग पर विद्यमान होकर, जीवन का संचार करके धरती का पालन करते हुए, जल में जीवनी शक्ति का संचार करता है। -‘अग्निर्मूूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथ्व्यिा अयम्। अपांरेतां सि जिन्वति।’ (3/12)

पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति एवं समस्त गृह नक्षत्र मंडल सहित पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के जिस तथ्य को आधुनिक विज्ञान आज केवल लगभग 200 वर्ष पूर्व ही समझ पाया है, उस भौगोलिक व सौर्य मण्डल के रहस्यपूर्ण तथ्य को हमारे वैदिक ॠषि हजारों वर्ष पूर्व अनुभूत कर चुके थे। अथर्ववेद में ॠषियों ने कहा है -‘मल्वं विभ्रती गुरूभृद् भद्रपापस्य निधनं तितिक्षु:। वरोहण पृथिवी संविदाना सूकराय कि जिहीते मृगाय॥’(अ0वे0-12/1/48)- अर्थात गुरूत्वाकर्षण शक्ति के धारण की क्षमता से युक्त, सभी प्रकार के जड़ चेतन को धारित करने वाली, जल देने के साथ मेघों से युक्त सूर्य की किरणों से अपनी मलीनता (अंधकार) का निधन (निवारण) करने वाली पृथ्वी सूर्य के चारों ओर भ्रमण करती है।

वेदों में सभी ॠषियों ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सूर्य की केन्द्रीय सत्ता को वैज्ञानिकता प्रदान की है जिसे कि आधुनिक विज्ञान अब क्रमश: समझ सकने में सक्षम हो पा रहा है। ॠग्वेद में कहा है -‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुशश्र्च’-( ़ॠ.वे.-1.115.1)-सूर्य समस्त सृष्टि की आत्मा /जन्मदाता है। सूर्य से पदार्थों को पूर्णता तथा ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मानव के जन्म के समय सूर्य तथा उसके आश्रित ग्रहों की स्थिति से मानव को समस्त गुण-सूत्र प्राप्त होते हैं। अथर्ववेद में सूर्यदेव को समस्त सृष्टि का प्रादुर्भावकर्ता, अवलम्बनकर्ता एवं स्वामी माना गया है। ‘सवा अन्तरिक्षादजायत तस्मादन्तरिक्ष जायत’-(अ.वे.-13/7/3)-अर्थात सूर्य अंतरिक्ष से उत्पन्न हुए एवं अंतरिक्ष उनसे उत्पन्न हुआ है। आगे कहा गया है -‘तस्यामू सर्वानक्षत्रा वषे चन्द्रमसा सह’ ’-(अ.वे.-13/6/7)-अर्थात चन्द्रमा सहित समस्त नक्षत्र उनके ही वश में हैं। वे सूर्यदेव दिन, रात्रि, अंतरिक्ष, वायुदेव, द्युलोक, दिशाओं, पृथ्वी, अग्नि, जल, ॠचाओं एवं यज्ञ से प्रगट हुए हैं एवं ये सब भी सूर्य से ही प्रगट हुए हैं। उपरोक्त सभी के अंश, गुण व अणु सूर्य में विद्यमान रहे हैं एवं रहेंगे इसीलिए सूर्य से ये समस्त पदार्थ एवं पंचभूत उत्पन्न हुए हैं। सूर्य ही एक ऐसे देव हैं जिनसे आकाश (नक्षत्रलोक), जल एवं ऊर्जा एवं प्रकाश तथा कीर्ति एवं यश ( ‘यश-अपयश विधि हाथ’ -सूर्य राशि के अधीन) समस्त अन्न एवं उपभोग सामग्री, वनस्पति एवं औषधि इत्यादि सृष्टि को प्राप्त हुआ है। ‘कीर्तिश्र्च यषश्र्चाम्भश्र्च नभश्र्च ब्राह्मणवर्चसं चान्नं चान्नाद्यं च। य एतं देवमेकवृतं वेद। (अथर्ववेद 13/5/1 से 8)

निष्कर्ष रूप में, यह सम्पूर्ण पर्यावरण, प्रकृति आवरण, ही है जो विलक्षण दैवीय शक्तियों से व्याप्त है जिससे सृष्टि के समस्त जंगम एवं स्थावर, प्राणी व वनस्पति को चेतना, ऊर्जा एवं पुष्टि प्राप्त होती है। -‘द्योश्च म इदं पृथिवी चान्तरिक्षं चमेव्यच:। अग्नि: सूर्य आपो मेधां विश्र्वेदेवाश्र्च सं ददु:।’ (अथर्ववेद 12/1/53)-अर्थात द्युलोक, पृथ्वी, अंतरिक्ष, अग्नि, सूर्य, जल एवं विश्व के समस्त देवों (ईश्वरीय प्रकृति शक्तियों) ने सृष्टि को व्याप्त किया है॥ इसीलिए यजुर्वेद में कहा गया है कि पृथ्वी इन समस्त शक्तियों को ग्रहण करे एवं इन सभी शक्तियों के लिए भी सदैव कल्याणकारक रहे। पृथिवी-पृथिवीवासी- इन दैवीय शक्तियों को प्रदूषित न करे।

‘सन्तेवायुर्मातरिश्र्वा दधातूत्तानाया हृदयं यद्विकस्तम्। यो देवानां चरसि प्राणथेन कस्मैदेव वशडस्तु तुभ्यम्॥ (यजुर्वेद-11/39)-अर्थात् उर्ध्वमुख यज्ञकुण्ड की भांति पृथ्वी अपने विशाल हृदय को मातृवत प्राणशक्ति संचारक वायु, जल एवं वनस्पतियों से पूर्ण करें। वायुदेव दिव्य प्राणऊर्जा से संचारित होते हैं। अत: पृथ्वी (अपने दूषित उच्छवास-कार्बन उत्सर्जन) से उन्हें दूषित न करें। वर्तमान में अन्यथा की स्थिति के कारण ही वायु की प्राण पोषक शक्ति-ऑक्सीजन दूषित होकर सृष्टि के जीवन को दुष्प्रभावित कर रही है।

इस पर्यावरण के जनक इन पंचमहाभूतों से ही प्राणिमात्र की 5 ज्ञानेन्द्रियां प्रभावित एवं चेतन होती हैं। इन पंचमहाभूतों के गुण ही हमारी ज्ञानेन्दियों के माध्यम से प्राण, मन, बु़िद्ध, कौशल, अहं अर्थात् भौतिक, जैविक, आत्मिक एंव संस्कारिक पर्यावरण का निर्माण करते हैं। आकाश का गुण शब्द; वायु का गुण शब्द एव स्पर्श़़; तेज (पावक-अग्नि) का गुण शब्द, स्पर्श एवं रूप; जल का गुण शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस (स्वाद) तथा पृथ्वी समस्त उपरोक्त चारों गुण सहित सुगंध गुण भी अर्थात समस्त गुणों का धारण करती है। इसी कारण पृथ्वी के प्राणी पंचमहाभूतों के 5 गुणों को धारित करते हैं एवं उनसे प्रभावित भी होते हैं। अत: आवश्यक है कि हम पृथ्वी वासी पर्यावरण को दूषित न करें, छिन्न न करें अन्यथा हमें उनसे दूषित अवगुण ही प्राप्त होंगे। यह वैदिक ॠषियों द्वारा प्रस्तुत एक ऐसा सत्य है जिसकी वर्तमान में अवहेलना कर हम पर्यावरण संतुलन को समाप्त करते जा रहे हैं।

ॠषियों ने न केवल पर्यावरण को प्रदूषित करने के मानव जीवन एवं सृष्टि पर पड़ने वाले हानिकारक विनाशक परिणामों की ओर संकेत किया अपितु पर्यावरण की रक्षा एवं, हम जो कुछ प्रकृति देवों से प्राप्त कर रहे हैं उसे उन्हें लौटा कर, पर्यावरण को प्रदूषित करने की अपेक्षा, उसे संरक्षित एवं सवंर्धित करने का भी आदेश दिया है। ”यदीमृतस्य पयसा पियानो नयन्नृृतस्य पथिभीरजिष्ठै:। अर्यमा मित्रो वरूण: परिज्मा त्वचं पृन्चन्त्युपरस्य योनौ॥”-ॠग्वेद/1/79/3-(हे अग्निदेव) आप यज्ञ के रसों से चराचर जगत का पोषण करते हैं।

यज्ञ के प्रभाव को सरल मार्गों से अंतरिक्ष में पहुंचाते हैं। तब अर्यमा, मित्र, वरूण एवं मरूद्गण, मेघों के उत्पत्ति स्थल पर इनकी त्वचा में जल को स्थापित करते हैं। प्रकृति चक्र सब जगह व्याप्त है। यह चक्र प्राणियों के लिए अन्नादि पोषक पदार्थों को, उपज रूपी शकट के माध्यम से पहुंचाता है। प्रजाओं (मानवों), को इन्द्रादि देवों द्वारा प्रदत्त अनुदानों (प्रकृति प्रदत्त संसाधनों) को यज्ञों-कर्मों के माध्यम से पुन: सब देवों तक पहुंचा कर सृष्टि चक्र संचालन में देवों का सहयोगी बनना चाहिए।

इसी कारण, ॠषियों ने सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को शांत करने व लोक कल्याणकारी बनाए रखने की प्रार्थना की है। अथर्ववेद में उल्लेखित शांति सूक्त का पर्यावरण रक्षण में अपरिमित महत्व है-‘षान्ता द्यौ: षान्ता पृथ्वी षान्तमिदमुर्वन्तरिक्षम्।षान्ता उदन्वतीराप: षान्ता न: सन्त्वोशधी:॥(अ.वे.-19/9/1 ) षं नो मित्र: षं वरूण: षं विश्णु: षं प्रजापति:। षं नो इन्द्रो बृहस्पति: षं नो भवत्वर्यमा॥ (अ.वे.-19/9/6) ‘पृथिवी षान्तिरन्तरिक्षं षांतिर्द्यौ: षान्तिराप: षान्तिरोशधय: षांतिर्वनस्पतय: षांतिर्विश्र्वे मे देवा: षान्ति: सर्वे में देवा: षान्ति: षान्ति: षान्ति: षान्तिभि:। ताभि: षान्तिभि: सर्वषान्तिभि: षमयामोहं यदिह घोरं यदिहक्रूरं यदिह पापं तच्छान्तं तच्छिवं सर्वमेव षमस्तु न:॥’- ( अ.वे-19/9/14)-अर्थात् घुलोक, पृथ्वी, विस्तृत अंतरिक्ष लोक, समुद,्र जल, औषधियां ये सभी उत्पन्न होने वाले अनिष्टों का निवारण करके हमारे लिए सुख शांति दायक हों। दिन के अधिष्ठाता देव सूर्य (मित्र) रात्रि के अभिमानी देव वरूण, पालनकर्ता विष्णु, प्रजापालक प्रजापति, वैभव के स्वामी इन्द्र, बृहस्पति आदि सभी देव शांत हों एवं हमें शांति प्रदान करने वाले हों। पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक, जल, औषधियां, वनस्पतियां एवं समस्त देव हमारे लिए शांतिप्रद हों। शांति से भी असीम शांति प्रदान करे। हमारे द्वारा किए गए घोर-अघोर कर्म, क्रूरकर्म, पापकर्म के फलों का शमन कर, शांत होकर हमारे लिए कल्याणकारी एवं मंगलकारी बने।

(साभार – हिन्दी विवेक)

वर्धा विश्वविद्यालय कोलकाता केंद्र कार्यालय 15 जून तक बंद

कोलकाता : कोरोना महामारी को देखते हुए प.बंगाल सरकार के दिशानिर्देशों के आलोक में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा का क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता कार्यालय 15 जून तक बंद रहेगा। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि इस आशय का कार्यालय आदेश कुलपति के अनुमोदन से विश्वविद्यालय कुलसचिव ने जारी किया है। इस बीच ऑनलाइन कक्षाएँ पूर्ववत जारी रहेंगी तथा विद्यार्थियों के अकादमिक संवर्द्धन के लिए केंद्र के अध्यापक ऑनलाइन उपलब्ध रहेंगे।