Wednesday, April 8, 2026
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दावा : 15 हजार साल पहले थी बिलासपुर में थी इंसानों की बस्ती

अरपा नदी के किनारे हजारों साल पुराने पत्थर के औजार मिलने का दावा
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में अरपा नदी किनारे पाषाण काल के अवशेष मिले हैं। इनमें पत्थर के औजार हैंडेक्स, क्लिवर, प्वाइंट्स और अन्य चीजें शामिल हैं। इन्हें जशपुर में एंथ्रोपोलॉजी (मानव शास्त्र) के प्रोफेसर डॉ. विनय तिवारी ने इकट्ठा किया है। उनका दावा है कि यह औजार 15 हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इसका काम खुदाई, छिलाई, कटाई सहित अन्य काम में होता था। इससे पता चलता है कि अरपा के किनारे पाषाण काल दौरान मानव संस्कृति बसा करती थी।
दावे के पीछे तीन कारण
अरपा नदी का इतिहास समृद्ध रहा है। काफी साल पहले जब यह इलाका जंगल था, तब निश्चित रूप से नदी बहा करती थी। इसके पानी का उपयोग यहां रहने वाले जंगली जानवर के अलावा पाषाण काल के मनुष्य किया करते थे। नदी में मछलियाँ, जंगल में कंद-मूल सहित खाने और शिकार की दूसरी चीजें आसानी से उपलब्ध थीं। जिसके चलते ही यहां इंसानों के बसने के तथ्य में दम लगता है।उपकरण और रॉ मटेरियल का उपलब्ध होना। इन्हीं के जरिए वे शिकार और रोजमर्रा के जीवन की दूसरी चीजें करते होंगे।


भू-गर्भ शास्त्रियों से की चर्चा, जांचेंगे कितना पुराना है औजार
प्रोफसर तिवारी का कहना है कि उन्होंने इसके संदर्भ में रायपुर के जियोलॉजी डिपार्टमेंट के अधिकारियों से बात की है। आने वाले दिनों में यह शोध का विषय होगा कि यह पत्थर और औजार कितने पुराने हैं। उन्होंने बताया कि जो पत्थर मिले हैं, उनमें क्वाडजाइट, सैंडस्टोन है और जेसफर है। कहा कि यह पत्थर पाषाण काल के सबसे प्राचीन समय का है। जिसकी जांच के लिए वे जल्द ही रायपुर के अधिकारियों से मिलकर उन्हें जांच करने की बात कहेंगे।
बिलासपुर के तोरवा निवासी डॉ. विनय तिवारी जशपुर के एक शासकीय कॉलेज में प्रोफेसर हैं। वे साल 2012 से पढ़ा रहे हैं। इससे पहले रायपुर की रविशंकर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। उनकी खास रुचि भी इतिहास को जानने में रही है। बिलासपुर आने के दौरान जब भी सुबह टहलने निकलते तो उनकी नजर ऐसे पत्थरों पर पड़ जाती। वे इसे इकट्ठा करते। कहते हैं जिस तरह के पत्थरों के औजार को उन्होंने संग्रहित किया है उसे प्रकृति नहीं बनाती, बल्कि जरूरतमंद लोग बनाते हैं। छत्तीसगढ़ के पुरातत्व विभाग के पुरात्वविद आरके भगत का कहना है कि पत्थर अरपा के किनारे मिले पत्थर इस बात के प्रमाण हैं कि पाषाण काल में मानव संस्कृति यहां रहती थी। ये बेहतरीन उपकरण हैं। यह कितने पुराने हैं, इसकी जाँच करेंगे।

दस हजार रुपये में शुरू की मोतियों की खेती, आज कमाते हैं लाखों

नयी दिल्ली : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के रहने वाले संजय गंडाते एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता पारंपरिक खेती करते थे। संजय ने कुछ साल सरकारी नौकरी की तैयारी की। सफलता नहीं मिली तो मोतियों की खेती करना शुरू किया। पिछले 7 साल से वे मोतियों की फार्मिंग (Pearl Farming) और मार्केटिंग का काम कर रहे हैं। भारत के साथ ही इटली, अमेरिका जैसे देशों में भी उनके मोतियों की डिमांड है। अभी इससे वे सालाना 10 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। 38 साल के संजय बताते हैं कि मेरा लगाव बचपन से मोतियों से रहा है। गांव के पास ही नदी होने से अक्सर हम अपने दोस्तों के साथ सीपियां चुनने जाते थे। हालांकि कभी इसके बिजनेस के बारे में नहीं सोचा था और कोई खास जानकारी भी नहीं थी। कुछ साल सरकारी टीचर बनने की तैयारी की, लेकिन जब सिलेक्शन नहीं हुआ तो प्लान किया कि कहीं कंपनी में काम करने से अच्छा है खेती बाड़ी की जाए।
नौकरी नहीं मिली तो मोतियों की खेती शुरू की
संजय पारंपरिक खेती नहीं करना चाहते थे। वे कुछ नया करने का प्लान कर रहे थे। तभी उन्हें ख्याल आया कि जो सीपें उनके गांव की नदी में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं, उनसे वे कुछ तैयार कर सकते हैं क्या? इसके बाद वे पास के कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचे। वहां से संजय को पता चला कि इन सीपियों की मदद से मोती तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि इसकी प्रोसेस के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं मिली।
संजय कहते हैं कि सीपियों से मेरा लगाव था ही इसलिए तय किया कि अब जो भी नफा-नुकसान हो अपने पैशन को ही प्रोफेशन में बदलेंगे। इसके बाद उन्होंने इस संबंध में गांव के कुछ लोगों से और कुछ पत्र-पत्रिकाओं के जरिए जानकारी जुटाई। फिर नदी से वे कुछ सीपी लेकर आए और किराए पर तालाब लेकर काम शुरू कर दिया। तब उन्होंने ज्यादातर संसाधन खुद ही डेवलप किया था। इसलिए उनकी लगात 10 हजार रुपए से भी कम लगी थी।
शुरुआत में घाटा हुआ, लेकिन हार नहीं मानी
संजय चूंकि नए-नए थे। उन्हें इसका कोई खास तौर तरीका पता नहीं था। इसके चलते उन्हें शुरुआत में नुकसान उठाना पड़ा। ज्यादातर सीपियां मर गईं। इसके बाद भी उन्होंने इरादा नहीं बदला। उन्होंने इसकी प्रोसेस को समझने के लिए थोड़ा और वक्त लिया। इंटरनेट के माध्यम से जानकारी जुटाई। कुछ रिसर्च किया। और फिर से मोतियों की खेती शुरू की। इस बार उनका काम चल गया और काफी अच्छी संख्या में मोती तैयार हुए। इसके बाद संजय ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे वे अपने काम का दायरा बढ़ाते गए। आज उन्होंने घर पर ही एक तालाब बना लिया है। जिसमें अभी पांच हजार सीपियां हैं। इनसे वे एक दर्जन से ज्यादा डिजाइन की अलग-अलग वैराइटी की मोतियां तैयार कर रहे हैं।
संजय कहते हैं कि मैं अपने उत्पाद किसी कंपनी के जरिए नहीं बेचता हूं। मिडिलमैन का रोल खत्म कर दिया है। क्योंकि इससे सही कीमत नहीं मिलती और वे लोग औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। इससे बचने के लिए मैं खुद ही मार्केटिंग करता हूँ। वे कहते हैं कि हमने सोशल मीडिया से मार्केटिंग की शुरुआत की थी। आज भी हम उस प्लेटफॉर्म का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। साथ ही हमने खुद की वेबसाइट भी शुरू की है। जहां से लोग ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं। कई लोग फोन के जरिए भी ऑर्डर करते हैं। उसके बाद हम कूरियर के जरिए उन तक मोती भेज देते हैं। वे 1200 रुपए प्रति कैरेट के हिसाब से मोती बेचते हैं।
फार्मिंग के साथ प्रशिक्षण भी देते हैं
संजय ने अपने घर पर ही मोतियों की खेती का एक ट्रेनिंग सेंटर खोल रखा है। जहां वे लोगों को इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हैं। उन्होंने इसके लिए अभी 6 हजार रुपए फीस रखी है। लॉकडाउन से पहले महाराष्ट्र के साथ ही बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से लोग उनके पास ट्रेनिंग के लिए आते थे। उन्होंने एक हजार से ज्यादा लोगों को अब तक ट्रेंड किया है। वे पूरी तरह से व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं।

नहीं रहे हिन्दी सिनेमा के वयोवृद्ध अभिनेता चंद्रशेखर वैद्य

मुम्बई : हिन्दी सिनेमा के जानें-मानें अभिनेता चंद्रशेखर वैद्य अब इस दुनिया में नहीं रहे। 98 साल के चंद्रशेखर का मुम्बई के अंधेरी स्थित घर में निधन हो गया। चंद्रशेखर ने बॉलीवुड में अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर अलग पहचान बनाई। बता दें कि, चंद्रशेखर ने बॉलीवुड की कई हिट फिल्मों में काम किया लेकिन उनको पहचान मिली ‘रामायण’ में आर्य सुमंत का किरदार निभाने की वजह से। खबरों के मुताबिक, चंद्रशेखर को कोई गंभीर बीमारी नहीं थी। चंद्रशेखर का जन्म 1923 में हैदराबाद में हुआ था।

फिल्म इंडस्ट्री में काम करने की वजह से उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। चंद्रशेखर अपने संघर्ष के दिनों में चौकीदार का काम करते थे। चंद्रशेखर ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया।  इसके बाद उन्होंने अभिनय में भाग्य आजमाया और सफल हुए। चंद्रशेखर ने सीआईएनटीएए (CINTAA) एसोसिएशन का गठन किया। चंद्रशेखर ने अपने कॅरियर में 110 से ज्यादा फिल्में कीं। चंद्रशेखर ने 1964 में आई फिल्म ‘चा चा चा’ और 1966 में आई फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ का निर्देशन किया।  चंद्रशेखर ने रामानंद सागर की रामायण में राजा दशरथ के महामंत्री सुमंत का किरदार निभाया था। इस भूमिका से उन्हें खूब लोकप्रियता हासिल हुई। चंद्रशेखर, रामानंद सागर के करीबी दोस्त थे। रामायण की उस स्टारकास्ट में वो सबसे उम्रदराज कलाकार थे।

कोरोना संक्रमण से लड़ने में 90.4 प्रतिशत कारगर है नोवावैक्स की वैक्सीन

तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजे आए

वॉशिंगटन : नोवावैक्स वैक्सीन के ट्रायल ब्रिटेन में किए गए हैं। यह अलग-अलग वैरिएंट्स से बचाव करने में भी कारगर रही है। अमेरिका की कंपनी नोवावैक्स की बनाई वैक्सीन के तीसरे फेज के ट्रायल के नतीजे आ गए हैं।कंपनी ने सोमवार को बताया कि कोरोना वायरस के खिलाफ यह काफी असरदार साबित हुई है। वैक्सीन ने माइल्ड, मॉडरेट और सीवर डिजीज में 90.4% अंतिम क्षमता दिखाई है। ये ट्रायल ब्रिटेन में किए गए हैं। बेहतर परिणामों की वजह से जल्द ही इस वैक्सीन को आपातकालीन स्थितियों की मंजूरी मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। ये वैक्सीन अलग-अलग वैरिएंट्स से बचाव करने में भी कारगर रही है। दुनिया भर में वैक्सीन की कमी की बीच कंपनी ने ये नतीजे जारी किए हैं।
भारत के लिए कितने काम की खबर
नोवावैक्स और भारत की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने साल में कोरोना वैक्सीन के 200 करोड़ खुराक तैयार करने का करार किया है। अगस्त में यह सौदा हुआ था। समझौते के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले देशों और भारत के लिए कम के कम 100 करोड़ खुराक का उत्पादन किया जाएगा। अब ट्रायल के नतीजे आने के बाद कंपनी 2021 की तीसरी तिमाही में अमेरिका, यूके और यूरोप में इमरजेंसी यूज का अप्रूवल मांगेगी। इस वजह से सितंबर से पहले वैक्सीन मिल पाना मुश्किल है।
बच्चों पर भी टीके का ट्रायल कर रही कंपनी
नोवावैक्स अपनी वैक्सीन के बच्चों पर ट्रायल की शुरुआत कर चुकी हैं। कंपनी ने 12-17 साल उम्र के 3,000 बच्चों पर ट्रायल्स शुरू किए हैं। हालांकि, इसे अब तक किसी भी देश में मंजूरी नहीं मिली है। इसमें शामिल हो रहे बच्चों की दो साल तक निगरानी की जाएगी।
अमेरिका पहले ही कर चुका 12 हजार करोड़ की डील
नोवावैक्स ने अमेरिका को 10 करोड़ डोज देने के लिए करार किया है। यह सौदा 1.6 बिलियन डॉलर (करीब 12 हजार करोड़ रु.) का है। इसके साथ ही ब्रिटेन, कनाडा और जापान के साथ भी टीके की सप्लाई के लिए समझौते किए गए हैं।

स्कूल बंद, शिक्षक ने शिक्षा का माध्यम बनाया मंदिर का लाउडस्पीकर

गाँव में जगह-जगह वर्णमाला लगाई
​​​​​​​तेलो (बोकारो) : लॉकडाउन की वजह से इन दिनों स्कूल बंद है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए एक टीचर ने गांव में जगह-जगह दीवारों पर हिंदी-इंग्लिश की वर्णमाला लगा दी। साथ ही गांव के मंदिर में लगे लाउड स्पीकर को जरिया बनाया और बच्चों की पढ़ाई शुरू करवाई। शिक्षक लाउड स्पीकर से बोलते हैं तो दूर तक बैठे बच्चे उनके साथ ही इसे दोहराते हैं। हम बात कर रहे हैं चंद्रपुरा प्रखंड की पपलो पंचायत के तहत आने वाले जुनौरी गांव की। यहां सरकारी शिक्षक भीम महतो ने यह पहल की है।
पढ़ाई रुकने पर आया विचार
स्कूल बंद होने से बच्चों की पढ़ाई रुक गई थी। कई स्कूल छात्र-छात्राओं की ऑनलाइन पढ़ाई करवा रहे हैं, लेकिन गरीब बच्चों के पास स्मार्ट फोन न होने से उन्हें परेशानी हो रही थी। देश में लॉकडाउन लगने के बाद से ही राजकीय मध्य विद्यालय, जुनौरी के शिक्षक भीम महतो लगातार क्षेत्र में बच्चों को फ्री में पढ़ा रहे हैं। वे अपने खर्च पर बच्चों को कॉपी, पेन, मास्क, सैनिटाइजर और बिस्कुट भी देते हैं। उन्होंने घटियारी पंचायत के मंगलडाडी गांव में बसे बच्चों को सबसे पहले पढ़ाने की शुरुआत की थी। भीम महतो लाउड स्पीकर से बोलते हैं तो दीवारों पर बनी वर्णमाला के पास बैठे बच्चे उनके साथ दोहराते हैं। गांव के गोपाल गिरी और चंद्रिका गिरी ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सभी बच्चे पढ़ाई से दूर होते जा रहे थे। भीम महतो ने कोरोना संक्रमण को देखते हुए मंदिर परिसर में लगे लाउड स्पीकर से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इससे बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकी।

कई बच्चों के पास स्मार्ट फोन नहीं, लाउड स्पीकर को जरिया बनाया
भीम महतो का कहना है कि कोरोना काल में बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे। इसे देखते हुए मैंने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। लॉकडाउन के वक्त स्मार्टफोन से ऑनलाइन पढ़ाई की बात कही गई। गांव में ऐसे कई बच्चे हैं, जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं है। ऐसे में मैंने सोचा कि इन्हें पढ़ाने के लिए मंदिर के लाउड स्पीकर की मदद ली जाए। इससे पहले मैंने गांव में कई जगह हिंदी-इंग्लिश वर्णमाला, फ्रूट नेम, वेजिटेबल नेम जैसे चार्ट लगाए। लाउड स्पीकर से पढ़ाने के बाद मैं कुछ बच्चों से फोन पर बात कर चेक करता हूं कि जो पढ़ाया वह उन्होंने लिखा है या नहीं। मेरी क्लास में पहली, दूसरी और तीसरी के 30-35 बच्चे होते हैं। मंदिर से करीब आधा किलोमीटर के अंदर बच्चों को ठीक से मेरी आवाज सुनाई देती है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

नहीं रहे दिग्गज फिल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता का निधन

कोलकाता : प्रख्यात फिल्म निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता का काफी दिनों तक गुर्दे की बीमारी से जूझने के बाद बृहस्पतिवार सुबह को दिल का दौरा पड़ने से यहां स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 77 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और उनकी पहली शादी से दो बेटियां हैं।
बेहतरीन निर्देशक के परिवार एवं मित्रों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, “प्रख्यात फिल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता के निधन से दुखी हूं। अपने काम के जरिए उन्होंने सिनेमा की भाषा को अनूठा बना दिया। उनका निधन फिल्म समुदाय के लिए बड़ा नुकसान है।” परिवार के सदस्यों ने बताया कि दासगुप्ता की पत्नी सोहिनी ने शहर में कलिकापुर इलाके में स्थित उनके आवास में सुबह छह बजे देखा कि दासगुप्ता के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें नींद में ही दिल का दौरा पड़ा था।
उनके निधन पर दुख जाहिर करते हुए फिल्मकार गौतम घोष ने कहा, “बुद्ध दा खराब सेहत के बावजूद फिल्म बना रहे थे, लेख लिख रहे थे और सक्रिय थे। उन्होंने स्वस्थ न होते हुए भी टोपे और उरोजहाज का निर्देशन किया। उनका जाना हम सबके लिए बहुत बड़ा नुकसान है।” अभिनेत्री-निर्देशक अर्पणा सेन ने कहा कि दासगुप्ता की फिल्में ‘‘यथार्थवाद में डूबी’’ रहती थीं।
सेन ने कहा, “मुझे दुख है कि मैं बुद्धदेब दा को श्मशान घाट जाकर अंतिम विदाई नहीं दे पाउंगी जैसा मैंने मृणाल दा को दी थी। यह दुखी करने वाला है कि हम इस कोविड वैश्विक महामारी और लॉकडाउन के कारण उनके जैसे क्षमतावान निर्देशक को उचित सम्मान नहीं दे सकते हैं।”
अभिनेता एवं रंगमंच की हस्ती कौशिक सेन ने कहा कि दासगुप्ता सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों के स्तर के थे “जिन्होंने बांग्ला सिनेमा को वैश्विक मंचों तक पहुंचाया।” सेन ने कहा, “उनपर अकसर आरोप लगता था कि वह ऐसा सिनेमा बनाते हैं जो बड़े जमसमूह को आसानी से समझ में नहीं आता है। लेकिन वह उस शैली पर टिके रहे, वह कभी अपने यकीन से भटके नहीं।”
1944 में पुरुलिया में जन्मे, दासगुप्ता ने अपने कॅरियर की शुरुआत एक कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर की थी। बाद में कलकत्ता फिल्म सोसाइटी में सदस्य के तौर पर नामांकन के बाद वह 1970 के दशक में फिल्म निर्माण में उतर गए। उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म ‘‘दूरात्वा” 1978 में बनाई थी और एक कवि-संगीतकार-निर्देशक के तौर पर अपनी छाप छोड़ी थी।
उससे पहले, उन्होंने लघु फिल्म ‘समायर काचे’ बनाई थी। उनके निर्देशन में बनीं कुछ प्रसिद्ध फिल्मों में ‘नीम अन्नपूर्णा’, ‘गृहजुद्ध’, ‘बाग बहादुर’, ‘तहादेर कथा’,‘चाराचर’, ‘लाल दर्जा’, ‘उत्तरा’, ‘स्वपनेर दिन’, ‘कालपुरुष’ और ‘जनाला’ शामिल है। उन्होंने ‘अंधी गली’ और ‘अनवर का अजब किस्सा’ जैसी हिंदी फिल्मों का भी निर्देशन किया।
दासगुप्ता ने अपने जीवनकाल में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। वह उदारवादी विचारधारा के थे और हाल के वर्षों में उन्होंने कई राजनीतिक गतिविधियों की आलोचना की थी। वह युवा फिल्मकार अनिक दत्ता के साथ उस वक्त खड़े रहे जब सरकार विरोधी ‘भोबिष्योतेर भूत’ फिल्म को रिलीज के एक हफ्ते बाद शहर के सिनेमाघरों से हटा लिया गया था।
वेनिस फिल्म उत्सव सिल्वर लायन, लोकार्नो क्रिटिक्स पुरस्कार और लोकार्नो स्पेशल जूरी पुरस्कार के विजेता ने कुछ साल पहले अपनी एक फिल्म को व्यावसायिक रिलीज न मिलने पर पीटीआई-भाषा से कहा था, “मुझे दुख होता है कि मेरी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलती है लेकिन कोलकाता और बंगाल के अन्य हिस्सों में वे सिनेमाघरों में नहीं पहुंच पाती हैं। कार्यस्थल पर वितरण के स्तर पर एक मजबूत लॉबी काम करती है।”

भारतीय मुक्केबाजी के सुपरनोवा थे डिंको सिंह

नयी दिल्ली : डिंको सिंह ने कभी ओलंपिक पदक नहीं जीता लेकिन इसके बावजूद उन्होंने भारतीय मुक्केबाजी में अमिट छाप छोड़ी जो भावी पी​ढ़ी को भी प्रेरित करती रहेगी। डिंको सिंह केवल 42 साल के थे लेकिन चार साल तक यकृत के कैंसर से जूझने के बाद उन्होंने इम्फाल स्थि​त अपने आवास पर अंतिम सांस ली जिससे भारतीय मुक्केबाजी में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बैकाक एशियाई खेल 1998 में स्वर्ण पदक जीतना था। यह भारत का मुक्केबाजी में इन खेलों में 16 वर्षों में पहला स्वर्ण पदक था। उनके प्रदर्शन का हालांकि भारतीय मुक्केबाजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा​ जिससे प्रेरित होकर कई युवाओं ने इस खेल को अपनाया और इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल हैं। इनमें एम सी मैरीकोम भी शामिल हैं जिन्हें मुक्केबाजी में अपना सपना पूरा करने के लिये घर के पास ही प्रेरणादायी नायक मिल गया था। मैरीकोम के अलावा उत्तर पूर्व के कई मुक्केबाजों पर डिंको का प्रभाव पड़ा जिनमें एम सुरंजय सिंह, एल देवेंद्रो सिंह और एल सरिता देवी भी शामिल हैं। डिंको ने एक बार कहा था ‘मुझे विश्वास नहीं था कि मेरा इतना व्यापक प्रभाव पड़ेगा। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था। ‘
डिंको का जन्म इम्फाल के सेकता गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके लिये दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी मुश्किल था जिसके कारण उनके माता​ पिता को उन्हें स्थानीय अनाथालय में छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा।यहीं पर भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) द्वारा शुरू किये गये विशेष क्षेत्र खेल कार्यक्रम (सैग) के लोगों की नजर डिंको पर पड़ी थी।
डिंको प्रतिभाशाली तो थे ही वह मजबूत शा​रीरिक क्षमता के भी धनी थी। वह अपने प्रतिद्वंद्वी से कभी नहीं घबराते थे। राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मुक्केबाज अखिल कुमार ने कहा, ‘उन पर किसी का नियंत्रण नहीं था। उन्हें वश में नहीं किया जा सकता था।’ भारतीय मुक्केबाजी में डिंको की पहली झलक 1989 में अंबाला में राष्ट्रीय सब जूनियर में देखने को मिली थी जब वह 10 साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियन बने थे। यहां से शुरू हुई उनकी यात्रा सतत चलती रही और वह बैंथमवेट वर्ग में विश्वस्तरीय मुक्केबाज बन गये जो बड़ी प्रतियोगिताओं में अपना कारनामा दिखाने के लिये तैयार था।


डिंको के साथ राष्ट्रीय शिविरों में भाग ले चुके अखिल ने कहा, ‘उनके बायें हाथ का मुक्का, आक्रामकता, वह बेहद प्रेरणादायी थी। मैंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान उन्हें गौर से देखा था। वह क्या दमदार व्यक्तित्व के धनी थे। मैं जानता था कि वह रिंग पर कितने आक्रामक थे क्योंकि राष्ट्रीय शिविरों में मैंने भी उनके कुछ मुक्के झेले थे। ‘ डिंको की आक्रामकता के उनके व्यक्तित्व में भी झलकती थी। उन्होंने 1998 में एशियाई खेलों की टीम में नहीं चुने जाने पर आत्महत्या करने की धमकी तक दे डाली थी। उन्हें आखिर में टीम में चुना गया और उन्होंने इसे सही साबित करके स्वर्ण पदक जीता जिसके लिये उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पदम श्री से नवाजा गया।
बैकाक एशियाई खेलों के दौरान राष्ट्रीय कोच रहे गुरबख्श सिंह संधू ने कहा, ‘वह नाटकीय हो सकते थे लेकिन आप उस जैसी प्रतिभा के धनी मुक्केबाज से नहीं लड़ सकते थे।’ लेकिन यह प्रतिभाशाली मुक्केबाज शराब का आदी हो गया जो उनकी बर्बादी का कारण बनी। इससे उन्हें कई तरह की बीमारियों से जूझना पड़ा। ओलंपिक 2000 और राष्ट्रमंडल खेल 2002 में जल्दी बाहर होने के बाद डिंको का करियर लगभग समाप्त हो गया और इसके कुछ समय बाद उन्होंने मुक्केबाजी से संन्यास लेकर इम्फाल में साइ केंद्र में कोचिंग का जिम्मा संभाल दिया।
उन्हें 2014 में कथित तौर पर एक महिला भारोत्तोलक को पीटने के कारण निलंबित कर दिया गया था। ऐसे कई अन्य किस्से हैं जबकि डिंको ने अपना आपा खोया। अखिल के अनुसार, ‘उन्होंने कभी निजी लाभ के लिये किसी की मिन्नत नहीं की फिर चाहे वह कोच हों, महासंघ या अधिकारी। उन्हें अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा था। इसलिए वह नायक थे। ‘ इस स्टार मुक्केबाज को 2017 में पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं। पिछले साल वह पीलिया और फिर कोविड—19 से संक्रमित हो गये थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बीमारी से उबरने के बाद उन्होंने कहा था, ‘यह आसान नहीं था लेकिन मैंने स्वयं से कहा, लड़ना है तो लड़ना है। मैं हार मानने के लिये तैयार नहीं था। किसी को भी हार नहीं माननी चाहिए। ‘ उन्हें उम्मीद थी कि वह कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर वापसी करेंगे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

(साभार – पीटीआई)

देश में 132 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बुआई का अनुमान : प्रसंस्करणकर्ता

इंदौर : देश में मॉनसून की बारिश की शुरुआत के बीच प्रसंस्करणकर्ताओं के एक संगठन ने अनुमान जताया कि मौजूदा खरीफ सत्र के दौरान सोयाबीन का राष्ट्रीय रकबा 10 फीसद बढ़कर 132 लाख हेक्टेयर के आस-पास रह सकता है। इंदौर स्थित सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन डेविश जैन ने “पीटीआई-भाषा” को बताया, “हमें लगता है कि इस बार देश में सोयाबीन के रकबे में करीब 10 फीसद का इजाफा होगा।”
उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 के खरीफ सत्र के दौरान देश में करीब 120 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बोया गया था, जबकि इसकी पैदावार 105 लाख टन के आस-पास रही थी। जैन ने कहा, “हमें लगता है कि खासकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसान उपज के बेहतर दाम की उम्मीद में खरीफ की अन्य फसलों के मुकाबले सोयाबीन उगाने को तरजीह देंगे।” केंद्र सरकार ने वर्ष 2021-22 के खरीफ विपणन सत्र के लिये सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 3,950 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। एमएसपी की यह दर पिछले सत्र के मुकाबले 70 रुपये प्रति क्विंटल अधिक है।

सरलता, निश्छलता तथा प्रेम सिक्त भक्ति के माधुर्य से भरी हैं प्रताप बाला की कविताएँ

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, इन दिनों मैं आप लोगों से मध्ययुगीन कवयित्रियों के बारे बातचीत कर रही हूँ। इन में से कुछ के बारे में हम सब लोगों ने इतिहास की किताबों में पढ़ रखा था तो कुछ के सिर्फ नाम भर सुन रखे थे, जैसा कि मुझे मेरी पाठिकाओं ने बताया कि, “इन लोगों के तो नाम भर सुन रखें थे जो पता नहीं कैसे स्मृति में अंकित रह गये।” सखियों, कुछ कवयित्रियों को तो इतिहास के पन्नों पर‌ जगह मिली‌ और उनके नाम पाठकों को याद‌ रह गये लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जिनके नामों का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं समझा गया। सवाल‌ यह नहीं है कि किसका अवदान ज्यादा है, किस का कम, किसने ज्यादा अच्छा लिखा और किस ने कम,  जब एक युग की प्रवृत्तियों और रचनाकारों की बात की जाती है तो उस युग विशेष में सक्रिय सभी रचनाकारों के अवदान पर संक्षेप ही सही चर्चा अवश्य होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। इतिहास किसी देश का हो या साहित्य का या फिर समाज का, यह तो लिखनेवाले अपनी पसंद, नापसंद, विचारधारा या अन्यान्य कारणों या सुविधाओं के मद्देनजर तय करते हैं कि उन्हें अपनी किताब में किसे शामिल करना है, किसे नहीं। और शायद इसके पीछे एक वजह वह भी है जिसे “लिंगभेद की राजनीति” के नाम से चिह्नित किया जा सकता है। जिन महान लेखकों के हाथों में इतिहास को कलमबद्ध करने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी रही उन्होंने तय कर लिया कि कौन से नाम स्वर्णाक्षरों में चमकेंगे और किन्हें एक ऐसी दराज में दफन कर दिया जाएगा जो शायद ही कभी खोली जाए। लेकिन दराजें तो खोली जाती ही हैं और उनमें कैद नामों को भी विस्मृति के अंधेरे से बाहर निकाल कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि उनका सही मूल्यांकन हो सके। इस श्रमसाध्य महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी कुछ रचनाकार सायास अपने कंधों पर ले लेते हैं। जैसे विस्मृति की खोह में गुम बहुत सी स्त्री रचनाकारों को सामने लाने का  काम  सफलतापूर्वक संपन्न किया, डा. सावित्री सिन्हा, डा. सुमन राजे सक्सेना जैसी गंभीर लेखिकाओं ने। उनके परिश्रम पूर्ण किए गए शोधकार्य के लिए उन्हें नमन करती हुई आज मैं आप सबका परिचय एक ऐसी ही विस्मृत कवयित्री से करवाने जा रही हूँ जिनका नाम शायद बहुत कम लोगों ने सुन रखा हो। वह हैं, प्रताप बाला।

प्रताप बाला का जन्म संंवत् 1891 में गुजरात के जामनगर राज्य में हुआ था। इनका विवाह जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह के साथ हुआ और वह महारानी के आसन पर विराजमान हुईं। कहा जाता है कि स्वजन- परिजनों की असामयिक मृत्यु के कारण सांसारिकता से उनका मोहभंग हो गया। सांसारिक विरक्ति ने इनके मन में कृष्ण के प्रति अनुरक्ति जागृत की और मीराबाई की तरह इन्होंने भी कृष्ण की भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया। कृष्ण की अराधना करते हुए उन्होंने भक्ति रस में डूबे पदों की रचना की। उनके पदों में भक्ति की गहराई भी है और प्रेम की शक्ति पर अगाध विश्वास भी। उनका काव्य मध्ययुगीन भक्त कवियों की भांति ही पूरे समर्पण और साधना से सृजित है जिसमें कभी वह कृष्ण के मनोहारी स्वरूप का वर्णन करती हैं तो कभी उनके चरणों में स्वयं को समर्पित करती हुई मुक्ति की कामना करती हैं। भक्तिरस में डूबा हुआ एक पद देखिए जिसमें विनय का भाव भी व्यक्त हुआ है-

“भजु मन नंदनंदन गिरिधारी। 

 

सुख-सागर करुणा को आगर भक्तवछल बनवारी॥ 

 

मीरा करमा कुबरी सबरी तारी गौतमनारी। 

 

वेद पुरानन में जस गायो ध्याये होवत प्यारी॥ 

 

जामसुता को स्याम चतुरभुज लेजा ख़बरि हमारी॥”

इनकी भक्ति में माधुर्य भाव की अभिव्यक्ति भी हुई है जिसमें वह कृष्ण को अपना प्रियतम मानती हुई उन्हें पति रूप में पूजती हैं-

 “प्रीतम हमारो प्यारो श्याम गिरिधारी है। 

 

मोहन अनाथनाथ संतन के डोलै साथ, 

 

वेद गुन गावैं गाथ गोकुल बिहारी हैं। 

 

कमल विशाल नैन निपट रसीले बैन, 

 

दीनन को सुख दैन चारिभुजा धारी हैं। 

 

केशव कृपानिधान वाही सो हमारो ध्यान, 

 

तन मन बारूँ प्रान जीवन मुरारी हैं। 

 

सुमिरूँ मैं साँझ-भोर बार-बार हाथ जोर।”

कृष्ण का स्वरूप वर्णन करते हुए कवयित्री भावविभोर हो जाती हैं और उनकी छवि पर करोड़ों कामदेवों को वार देना चाहती हैं-

“चतुरभुज झुलत श्याम हिंडोरे। 

 

कंचन खंभ लगे मणिमानिक रेसम की रंग डोरें॥ 

 

उमड़ि घुमड़ि घन बरसत चहुँदिसि नदियाँ लेत हिलोरें। 

 

हरी-हरी भूमि लता लपटाई बोलत कोकिल मोरें॥ 

 

बाजत बीन पखावज बंशी गान होते चहुँ ओरें। 

 

जामसुता छबि निरखि अनोखी वारूँ काम किरोरें॥”

चतुर्भुज कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई वह अपनी एकनिष्ठ भक्ति का संकेत भी देती हुई कहती हैं कि उनका मन कृष्ण के चरणों के अतिरिक्त और कहीं नहीं ठहरता-

मो मन परी है यह बान। 

 

चतुरभुज को चरण पठिहरि ना चाहूँ कछु आन। 

 

कमल नैन विसाल सुंदर मंद मुख मुसकान॥ 

 

सुभग मुकुट सुहावनो सिर लसे कुंडल कान। 

 

प्रगट भाल विशाल राजत भौंह मनहुँ कमान॥ 

 

अंग-अंग अनंग को छबि पीत पट पहिरान। 

 

कृष्णरूप अनूप को मैं धरूँ निसि दिन ध्यान॥ 

 

सदा सुमिरूँ रूप पल-पल कला कोटि निधान। 

 

जामसुता परताप के भुज चार जीवन-प्रान॥”

सहज सरल ब्रजभाषा में सृजित भक्तिरस में सराबोर, कवयित्री प्रताप बाला के पदों मेंं सिर्फ उनके समर्पित ह्रदय के गहन भावों की ही अभिव्यक्ति नहीं हुई है बल्कि उनकी  कवि क्षमता का भी यथेष्ठ परिचय मिलता है। कवयित्री के ह्रदय की सरलता और निश्छलता तथा प्रेम सिक्त भक्ति का माधुर्य  उनकी कविताओं को बरबस ही सरसता के गुण से संपन्न कर देता है। आप से आग्रह है कि आप भी इनके पदों को पढ़िए और स्वयं इनका मूल्यांकन करिए।

आज विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।

   

विस्मृत सेनानी : पत्रकार मौलवी मुहम्मद बाकिर, जिनको 1857 में अंग्रेजों ने तोप से उड़ा दिया

1857 की क्रांति की बुनियाद सिपाहियों ने ही डाली थी. वे क्रांति की शुरुआत से लेकर अंत तक रीढ़ की हड्डी भी बने रहे। इन्हीं सिपाहियों के साथ राजा-महाराजाओं का भी नाम हमारी जुबां पर आ ही जाता है। किन्तु, इनके साथ-साथ मजदूर, किसान, ज़मीदार, पूर्व सैनिक, लेखक और पत्रकार के भी भूमिका कम नहीं रही. वह बात और है कि इनमें से कई नाम ऐसे रहे, जो गुमनामी के अँधेरे में खो गए ! मौलवी मोहम्मद बाकिर एक ऐसा ही नाम हैं.
विद्रोह कर
1857 की क्रांति में सक्रिय एक ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता से अंग्रेजों के खिलाफ दिया था। कहते हैं उन्होंने बिना तलवार उठाए अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
सरकारी नौकरी छोड़ निकाला अपना उर्दू अख़बार!
1790 में दिल्ली के एक रसूखदार घराने में पैदा हुए। मौलवी मोहम्मद ने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता से हासिल की। बाद में वह आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए ‘दिल्ली कालेज’ गए। वहाँ से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह फारसी भाषा के अध्यापक हो गए। इन नौकरी के बाद वह आयकर विभाग में तहसीलदार के पद पर नियुक्त किए गए।
इस तरह करीब 16 साल तक वह सरकारी महकमे में आला पदों पर रहे। चूंकि, सरकारी नौकरी में उनका मन लगता नहीं था, इसलिए एक दिन अचानक इन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी।
आगे 1836 में प्रेस अधिनियम में संशोधन किया गया और समाचार पत्रों को निकालने की अनुमति दे दी गयी, तब इन्होंने भी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. 1837 में उन्होंने साप्ताहिक ‘देहली उर्दू अख़बार’ के नाम से अपना समाचार पत्र निकालना शुरू कर दिया। यह देश का दूसरा उर्दू अख़बार था, इससे पहले उर्दू भाषा में ‘जामे जहाँ नुमा’ अख़बार कलकत्ता से निकलता था।
मौलवी मोहम्मद बाकिर का ‘देहली उर्दू अख़बार’ लगभग 21 वर्षों तक जीवित रहा, जो उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ। इस अख़बार की मदद से मौलवी बाकिर सामाजिक मुद्दों के साथ ही लोगों को जागरूक करने का काम बखूबी अंजाम देने लगे। कहते हैं इस अख़बार का मकसद व्यवसाय करना नहीं, बल्कि यह एक मिशन के तहत काम करता था। इसकी प्रतियों के बिकने पर जो भी पैसे आते, उन्हें मौलवी मोहम्मद बाकिर गरीबों में बाँट दिया करते थे।
इस अख़बार की कीमत मात्र 2 रूपये थी। मौलवी मोहम्मद बाकिर ने अपने अख़बार का आकार भी बड़ा ही रखा था। इसके साथ ही इन्होंने ख़बरों में रूचि पैदा करने और उसको आसानी से पढ़ने योग्य बनाने के लिए अलग-अलग भागों में बाँट रखा था। इस अख़बार में न्यायालय खबर के लिए ‘हुजूर-ए-वाला जबकि, कंपनी की खबर को ‘साहिब-ए-कलान बहादुर’ के तहत और भी भागों में वर्गीकृत किया गया था। इसी के साथ मौलवी मोहम्मद बाकिर उस ज़माने में भी नवीनतम समाचार प्राप्त करने के लिए भरोसेमंद नामा निगार (रिपोर्टर) से भी संपर्क बनाये रखते थे। खास उनसे, जिनकी पहुँच उच्च अधिकारियों तक थी। दिल्ली उर्दू अख़बार राष्ट्र की भावनाओं का प्रचारक था। इसने राजनितिक चेतना को जागृत करने के साथ ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक जुट होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक तरफ मौलवी मोहम्मद बाकिर अपने अख़बार के माध्यम से भारतीयों के अंदर आज़ादी का प्यार जगाने का काम कर थे. दूसरी तरफ सिपाहियों ने 1857 की क्रांति छेड़ दी। यह देखकर मौलवी साहब ज्यादा सक्रिय हो गए।
कहा जाता है कि उन्होंने कई बागी सिपाहियों को मेरठ से दिल्ली बहादुर शाह जफर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी जानकारी अंग्रेजों को हुई तो उनकी नज़रों में वह चढ़ गये। उनका अखबार और उनका जीवन दांव पर लग चुका था। बहरहाल वह डरे नहीं और डटे रहे।

तस्वीर साभार – पीएनएन24

अख़बार के माध्यम से मौलवी कंपनी की लूटमार और गलत नीतियों के खिलाफ खुल कर लिखने लगे। कहते है कि इस अख़बार के तीखे तेवर ने बाकी अख़बारों के संपादकों और लेखकों के अंदर आज़ादी का जोश भर दिया था। वहीं अख़बार में आज़ादी के दीवानों की घोषणा पत्रों और धर्म गुरुओं के फतवे को भी जगह दी जाती। इसके साथ ही लोगों को इसके समर्थन के लिए अपील भी की जाती थी.
इनका अख़बार जहां एक तरफ हिन्दू सिपाहियों को अर्जुन और भीम बनने की नसीहत देता, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम सिपाहियों को रुस्तम, चंगेज़ और हलाकू की तरह अंग्रेजों पर कहर बरपाने की बात करता था।
इसी के साथ बागी सिपाहियों को सिपाही-ए-हिंदुस्तान की संज्ञा भी देता।
अखबार का नाम बदलने से भी पीछे नहीं हटे
मौलवी मोहम्मद बाकिर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पैरोकार थे। इन्होंने अपने अख़बार की मदद से कई बार अंग्रेजों के सांप्रदायिक तनाव को फ़ैलाने की चालों और उनके मंसूबों को जनता के सामने उजागर किया। यही नहीं सभी धर्मों के लोगों को ऐसी बातों में न उलझकर देश की आज़ादी में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की पुरज़ोर अपील की। इस अख़बार ने 5 जुलाई 1857 के अंक में जामा मस्जिद पर चिपके एक साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाले पोस्टर की छानबीन करके अंग्रेजों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया था इसी के साथ ही मौलवी मोहम्मद बाकिर ने बहादुर शाह जफ़र को समर्पित करते हुए अपने अख़बार ‘देहली उर्दू अख़बार’ का नाम बदलकर अख़बार-अल-जफ़र कर दिया था।
नाम बदलने के बाद इस अख़बार से अंतिम दस प्रतियाँ और छपी। गौरतलब हो कि मौलवी मोहम्मद बाकिर के अख़बार को अंग्रेजों से लगातार चेतावनी मिलती रही लेकिन इन्होंने इसके बावजूद स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
1857 की क्रांति में कई माओं की गोद सूनी हो गयी। न जाने कितनी औरतों ने अपना पति खो दिया. बावजूद इसके क्रांति की आग जलती रही, जिसको दबाने के लिए अंग्रेजों का दमन लगातार चलता रहा।
उन्होंने बादशाह बहादुर शाह ज़फर को बंदी बनाकर दिल्ली पर अपना दोबारा कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद ब्रिटिश ताकतों ने एक-एक भारतीय सिपाहियों को ढूंढ-ढूंढ कर कालापानी, फांसी और तोपों से उड़ाने का काम करने लगी।
इसी के साथ अंग्रेजों ने 14 सितम्बर 1857 को मौलवी मोहम्मद बाकिर को भी गिरफ्तार कर लिया और इन्हें 16 सितम्बर को कैप्टन हडसन के सामने पेश किया गया। उसने मौलवी मोहम्मद बाकिर को मौत की सजा का फरमान सुनाया।

इसके तहत दिल्ली गेट के सामने मौलवी को तोप से उड़ा दिया गया। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इनको तोप से नहीं बल्कि फांसी दी गयी थी।

(साभार – रोर मीडिया)