Wednesday, April 8, 2026
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एसोचैम बना अंतर्राष्ट्रीय एक्सबीआरएल सम्मेलन 2021 का मेजबान

कोलकाता : एसोचैम ने हाल ही में “अंतर्राष्ट्रीय एक्सबीआरएल सम्मेलन 2021 – उभरते रुझान और अवसर” पर एक वेबिनार का आयोजन किया, जिसमें एक्सबीआरएल के आवेदन, उपयोगकर्ताओं और पेशेवरों को शिक्षित करने, इसके आवेदन को बढ़ावा देने और इसे संबोधित करने के लिए उभरते क्षेत्रों पर चर्चा और विचार-विमर्श किया गया। हितधारकों की समस्याएं और प्रश्न के समाधान पर चर्चा हुई।
वक्ता इस तथ्य पर सहमत हुए कि एक्सबीआरएल व्यावसायिक सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए विश्वसनीय वैश्विक ढांचा है जो व्यापार रिपोर्टिंग में आमतौर पर आवश्यक अर्थ अर्थ की अभिव्यक्ति की अनुमति देता है। यह व्यवसाय के प्रदर्शन की जवाबदेही और पारदर्शिता में सुधार करने में भी मदद करता है और सभी हितधारकों के लिए बहुत ही किफायती है । एक्सबीआरएल के लाभों पर प्रकाश डालते हुए कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की उप महानिदेशक गीता सिंह राठौर ने कहा, ” एक्सबीआरएल विश्व स्तर पर व्यावसायिक सूचनाओं को संग्रहीत करने और प्रसारित करने के मानक तरीके के रूप में उभरा है। यह विभिन्न हितधारकों के लिए सटीकता, विश्वसनीयता, समयबद्धता और निर्णय उपयोगिता सुनिश्चित करता है। यह सूचना और डेटाबेस के विभिन्न उपयोगकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ है।
बीएसई लिमिटेड के मुख्य नियामक अधिकारी नीरज कुलश्रेष्ठ ने अंतर्राष्ट्रीय एक्सबीआरएल सम्मेलन 2021 के आयोजन के लिए एसोचैम को धन्यवाद दिया। एसोचैम के लेखा मानकों की टास्क फोर्स के अध्यक्ष और आईसीएआई के पूर्व सचिव डॉ. अशोक हल्दिया ने कहा कि भारत को एक राष्ट्रीय डेटा रिपोर्टिंग मानक की आवश्यकता है। नेक्सजेन के निदेशक सीए विनोद कश्यप ने कहा कि भारत को एक्सबीआरएल पर अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाना चाहिए और एमसीए में दायर एक्सबीआरएल टैग किए गए डेटा की गुणवत्ता में बहुत आवश्यक सुधार लाने के लिए आवश्यक कदम उठाना चाहिए। इस कार्यक्रम में आईसीएआई के पूर्व अध्यक्ष और एक्सबीआरएल इंटरनेशनल के सदस्य सी ए अतुल कुमार के अतिरिक्त अन्य वक्ताओं ने विचार रखे।

‘रघुनाथ के होते कोई अनाथ कैसे होगा’

कोलकाता : राष्ट्रीय कवि संगम पश्चिम बंगाल के प्रांतीय पटल पर विगत रविवार को गंगा दशहरा एवं पितृ दिवस के अवसर पर एक भव्य कवि सम्मेलन का सफलतम आयोजन हुआ l इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय कवि संगम के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश मित्तल जी की उपस्थिति ने उपस्थित सभी कवियों एवं श्रोताओं का अभूतपूर्व उत्साह वर्धन करके इस कार्यक्रम में चार चाँद लगा दिया था l इस कवि सम्मेलन की अध्यक्षता प्रांतीय अध्यक्ष डॉक्टर गिरधर राय तथा संचालन अंजनी कुमार राय द्वारा की गई थी l कार्यक्रम का संयोजन डॉ अनिरुद्ध राय द्वारा तथा कार्यक्रम का शुभारंभ रीमा पांडेय द्वारा सुमधुर गंगा वंदना से हुआ ।उपस्थित कवियों में चंद्रिका प्रसाद ‘अनुरागी’, रामपुकार सिंह, बलवंत सिंह, कामायनी संजय, रीमा पांडेय, सीमा सिंह, देवेश मिश्र, शिव शंकर सिंह, संतोष कुमार तिवारी, अशोक कुमार शर्मा, अरविंद कुमार मिश्र एवं कोमल चूड़ीवाल ने अपने काव्य स्वर द्वारा कार्यक्रम की सफलता में अपना विशिष्ट योगदान दियाl मित्तल ने यह कहकर दर्शकों और श्रोताओं का दिल जीत लिया कि “रघुनाथ के और बाबा विश्वनाथ के होते हुए कोई भी व्यक्ति अनाथ कैसे हो सकता है?” प्रांतीय अध्यक्ष गिरधर राय ने अपनी लोकप्रिय घनाक्षरी द्वारा यह उद्घोष कर कि वाम को भी दिखने लगे हैं अब राम जी” श्रोताओं को आनंद विभोर कर दिया । कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन अशोक शर्मा ने किया । कुल मिलाकर यह कार्यक्रम राष्ट्रीय कवि संगम के मूल “मंत्र राष्ट्र जागरण धर्म हमारा” का उद्घोष था।

सहचन की पत्तियों से चॉकलेट औऱ स्नैक्स बना रहे हैं पुणे के प्रमोद

भारत के ज्यादातर राज्यों में सहजन की खेती बड़े पैमाने पर होती है। सेहत के लिहाज से सहजन की अहमियत काफी ज्यादा है। इसमें कई तरह के मल्टी विटामिन, प्रोटीन, एमीनो एसिड्स मौजूद होते हैं। देश में पिछले कुछ सालों से हेल्थ सप्लीमेंट्स के रूप में इसकी माँग बढ़ी है। कई स्टार्टअप सहजन की प्रोसेसिंग कर नए स्वास्थ्यप्रद उत्पाद बना रहे हैं। महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाले प्रमोद पानसरे भी इसी का बिजनेस कर रहे हैं। वे पिछले दो साल से सहजन की पत्तियों और हल्दी की मदद से चॉकलेट, चिक्कियां, खाखरा, स्नैक्स तैयार कर देशभर में मार्केटिंग कर रहे हैं। फिलहाल वे हर महीने तीन लाख रुपए का बिजनेस कर रहे हैं।
30 साल के प्रमोद एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। खेती उनके परिवार में होती रही है। 2012 में फूड टेक्नोलॉजी से बीटेक करने के बाद उन्होंने नौकरी के बजाय खुद का काम शुरू करने का फैसला किया। कुछ साल उन्होंने खजूर का बिजनेस किया। हालांकि इसमें उतनी आमदनी नहीं हुई और उन्हें काम बंद करना पड़ा। चूंकि घर-परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही थीं, परिवार में कोई और कमाने वाला नहीं था, इसलिए न चाहते हुए भी प्रमोद एक फूड कंपनी में काम करने लगे। करीब 3 साल तक उन्होंने वहां काम किया। इस दौरान अलग-अलग फूड प्रोडक्ट के बारे में उन्हें जानकारी मिली। उसकी प्रक्रिया को भी समझने में मदद मिली।

प्रमोद कहते हैं कि सहजन सेहत के लिए फायदेमंद होता है, ये तो मुझे पहले से पता था, लेकिन काम के दौरान मुझे जानकारी मिली कि इससे प्रोडक्ट बनाकर फूड सप्लीमेंट्स के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात कि इसके लिए हमें कहीं दूर जाने की भी जरूरत नहीं थी। हमारे आसपास ही भरपूर मात्रा में सहजन के प्लांट उपलब्ध हैं।
इसके बाद प्रमोद ने अपने घर पर ही इसे आजमाना शुरू किया। उन्होंने सहजन की पत्तियां और फलियों को सुखाकर एक पाउडर तैयार किया। फिर इसे लैब टेस्ट में भेजा, जहां पता चला कि इसमें हेल्थ के लिए जरूरी लगभग सभी न्यूट्रिशन भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। उन्होंने खुद के खाने में भी इसका इस्तेमाल करना शुरू किया। कुछ दिनों बाद उन्हें इसका असर भी देखने को मिला।
प्रमोद कहते हैं- खुद इस्तेमाल करने के बाद मुझे लगा कि इसे कॉमर्शियल लेवल पर शुरू किया जा सकता है। कई लोग हैं जिन्हें हेल्दी फूड सप्लीमेंट्स की जरूरत है और वे ऐसी चीजों को लेना भी पसंद करेंगे। इसके बाद उन्होंने सहजन के पाउडर को पैक करके कुछ लोगों को इस्तेमाल के लिए दिए। वे कहते हैं कि कुछ लोगों ने इस्तेमाल के बाद पॉजिटिव रिस्पॉन्स दिया, लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे थे जिन्होंने घर में इसे ले जाकर रख दिया। वे रेगुलर इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। जब हमने वजह जानने की कोशिश की तो पता चला कि पाउडर के रूप में होने और इसके टेस्ट की वजह से लोग कम पसंद कर रहे हैं। इसके बाद प्रमोद ने तय किया कि इसे पाउडर के रूप में सेल करने की जगह क्यों न प्रोडक्ट के रूप में कन्वर्ट किया जाए ताकि इसकी ब्रांड वैल्यू भी हो सके और ज्यादा से ज्यादा लोग इसका इस्तेमाल भी कर सकें।
साल 2018 में प्रमोद ने अपनी नौकरी छोड़ दी। करीब एक साल उन्होंने मार्केट रिसर्च पर फोकस किया। सहजन से क्या-क्या प्रोडक्ट बनाए जा सकते हैं, उनका प्रॉसेस क्या होगा? कितने लोग उन्हें खरीदेंगे? मार्केटिंग की अप्रोच क्या होगी? इसको लेकर उन्होंने काम किया।
इसके बाद दिसंबर 2018 से उन्होंने सहजन की पत्तियों और फलियों से चिक्कियां बनानी शुरू की। वे खुद ही इसे तैयार कर स्टॉल लगाकर बेचने लगे। प्रमोद कहते हैं कि हमने अपने प्रोडक्ट की कीमत बहुत कम रखी थी। इसलिए जो लोग हमारे स्टॉल पर आते थे, उनमें से ज्यादातर लोग प्रोडक्ट खरीद लेते थे। इस तरह कुछ महीनों तक हमने मार्केटिंग की। कुछ वक्त बाद प्रमोद को एक निवेशक मिल गया। उन्होंने 15 लाख रुपए का निवेश किया और पुणे में एक ऑफिस लेकर अपना काम शुरू किया। उन्होंने खुद की कंपनी रजिस्टर की। फिर फूड लाइसेंस सहित जरूरी डॉक्युमेंट्स जुटाए और बिजनेस शुरू कर दिया। कुछ महीनों तक उनका काम बढ़िया चला। इसके बाद 2020 में कोरोना की वजह से उनका काम प्रभावित होने लगा। लॉकडाउन लगने के बाद कुछ महीने तक उनका काम न के बराबर हुआ।
प्रमोद कहते हैं कि हमारे व्यवसाय पर कोरोना का असर तो पड़ा, कुछ नुकसान भी हुआ, लेकिन एक फायदा ये भी हुआ कि इसके बाद लोग हेल्दी फूड सप्लीमेंट्स पर जोर देने लगे। इससे हमें अपने बिजनेस का दायरा बढ़ाने में काफी मदद मिली। हमारे प्रोडक्ट्स की डिमांड बढ़ गई।
वे कहते हैं कि इस साल जब कोरोना की सेकेंड वेव ने तबाही मचाई तो यह भी कहा जाने लगा कि तीसरी लहर भी आएगी और यह बच्चों को ज्यादा प्रभावित करेगी। हालांकि इसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। फिर भी लोग अपने बच्चों की हेल्थ को लेकर अवेयर हो रहे हैं। वे हेल्दी फूड सप्लीमेंट्स पर जोर दे रहे हैं, लेकिन एक दिक्कत यह है कि बच्चे इन चीजों को खाने में कम दिलचस्पी रखते हैं। इसलिए हमने तय किया कि एक हेल्दी चॉकलेट उतारी जाए।
प्रमोद ने इस साल की शुरुआत में इसको लेकर काम करना शुरू कर दिया और मई में चॉकलेट की मार्केटिंग करने लगे। अभी वे तीन फ्लेवर में चॉकलेट बना रहे हैं। जिसमें डार्क, व्हाइट और मिल्क फ्लेवर शामिल है। इसमें सहजन के साथ हल्दी, काली मिर्च जैसे इम्यून बूस्टर शामिल हैं।
प्रमोद कहते हैं कि शुरुआत में हम स्टॉल लगाकर अपने उत्पाद की मार्केटिंग करते थे। धीरे-धीरे जब हमारे प्रोडक्ट की माँग बढ़ने लगी, कुछ लोग जानने लगे तो हमने रिटेलर्स और बड़े-बड़े होलसेल डीलर्स से सम्पर्क किया। उन्होंने ट्रायल के बाद हमारा उत्पाद लेना शुरू कर दिया। इसके बाद हमने सोशल मीडिया की मदद ली और अपने प्रोडक्ट का प्रमोशन करने लगे। हमने वॉट्सऐप ग्रुप भी बनाया। कई लोग फोन के जरिए भी ऑर्डर करते हैं।
प्रमोद के मुताबिक हर महीने वे 2 टन चॉकलेट और चिक्कियां बना रहे हैं। इसके साथ ही बड़े लेवल पर खाखरा भी तैयार करते हैं। हर महीने 100 से ज्यादा उनके पास ऑर्डर आ रहे हैं। पिछले महीने उन्होंने श्रीलंका में भी अपना प्रोडक्ट भेजा था। जल्द ही वे खुद की वेबसाइट लॉन्च करने वाले हैं। साथ ही अमेजन और इंडिया मार्ट जैसे प्लेटफॉर्म पर भी वे अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करेंगे।
प्रमोद कहते हैं कि हमारे साथ करीब 15 लोग काम करते हैं। इनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। सबसे पहले हम सहजन की पत्तियों को सुखाते हैं। फिर उसका पाउडर तैयार करते हैं। इसके बाद उसमें शुगर फ्री गुड़, मूंगफली और ग्लूकोज मिलाकर सहजन की चिक्कियां तैयार करते हैं। इसके बाद इसकी क्वालिटी टेस्टिंग और पैकेजिंग का काम करते हैं। इसी तरह चॉकलेट तैयार करने के लिए भी हमने एक फॉर्मूला तैयार किया है। उसका हमें पेटेंट भी मिल चुका है। उस फॉर्मूले के साथ हल्दी और काली मिर्च मिलाकर मिला लेते हैं। फिर उसे एक मशीन के जरिए पिघला लिया करते हैं। इसके बाद उसकी शेपिंग और फिर पैकेजिंग का काम होता है।
ऑर्गेनिक चॉकलेट की बढ़ रही है माँग
आमतौर पर चॉकलेट को लेकर यह मान्यता रही है कि इससे सेहत को नुकसान पहुंचता है। खासकर के बच्चों को। इससे बचने के लिए हाल के कुछ सालों में ऑर्गेनिक और होममेड चॉकलेट की माँग बढ़ी है। देश में ऐसे कई स्टार्टअप हैं, जो इस तरह के उत्पाद बना रहे हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

अचार बेचकर अपनी पहचान बनाने वाली यादे

यादे दुजोम पिकल क्वीन के नाम से अपनी अलग पहचान रखती हैं। वह जब 4 साल की थीं, तब उसकी मां का निधन हो गया। बचपन से अपनी नानी और सौतेली मां के दुर्व्यवहार को सहने के बाद यादे ने हारकर बैठ जाने के बजाय अपने भविष्य को संवारने की योजनाओं पर काम किया। वैसे भी ईटानगर एक ऐसी जगह है जहां बहुत कम महिलाएं काम करती हैं, वहां यादे न सिर्फ एक उद्यमी के तौर पर जानी जाती हैं, बल्कि उनका ब्रांड ‘अरुणाचल पिकल हाउस’ भी अचार के लिए कस्टमर्स की पहली पसंद बना हुआ है।
यादे कहती हैं, मेरा अब तक का जीवन संघर्ष करते हुए ही बीता। मेरी मां के न रहने पर मुझे और मेरी बड़ी बहन को नानी के घर रहना पड़ा। वह खेती करती थीं और हम दोनों भी उनके काम में मदद करते। जैसे-तैसे मेहनत करके हम दोनों बहनें कुछ बड़े हुए कि एक दिन नानी भी दुनिया छोड़कर चली गईं। तब मैंने आठवीं कक्षा पास की थी। नानी के न रहने पर दोनों बहनों को अपनी सौतेली मां और पिता के साथ रहना पड़ा। सौतेली मां के साथ रहते हुए उन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती थी। न ही पहनने को कपड़े दिए जाते थे। ऐसे हालतों में भी 12 वीं कक्षा तक यादे ने पढ़ाई की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए वे ईटानगर आ गईं। यहां अपनी पढ़ाई जारी रखने और खुद का खर्च उठाने के लिए वे नौकरी करने लगीं। अपने व्यवसाय की शुरुआत से पहले वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम किया करती थीं। वह हर महीने बचत भी करने लगीं। उन्हीं दिनों यादे ने फूड प्रोसेसिंग, लेबल मेकिंग और प्रिजर्वेटिव्स से जुड़ी जानकारी इकट्‌ठा की। उसने मणिपुर की कुछ महिलाओं से अचार बनाना सीखा। उसके बाद अरुणाचल प्रदेश में इसका प्रशिक्षण लिया। इसी साल यादे ने अपने ब्रांड अरुणाचल पिकल हाउस की शुरुआत की। यहां वे गांव की कुछ महिलाओं को भी रोजगार उपलब्ध करा रही हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

स्वदेशी 5जी नेटवर्क समाधान हेतु एयरटेल और टाटा ग्रुप ने मिलाया हाथ

नयी दिल्ली : देश में अगली पीढ़ी की कम्युनिकेशन सेवा यानी 5जी सेवा को लेकर सभी टेलीकॉम कंपनियां तैयारी कर रही हैं। इस बीच सुनील भारती मित्तल की भारती एयरटेल ने 5जी नेटवर्क सॉल्यूशन उपलब्ध कराने के लिए टाटा ग्रुप से हाथ मिलाया है। दोनों कंपनियों की ओर से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि इस साझेदारी के तहत टाटा ग्रुप ओपन रेडियो बेस्ड O-RAN (ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क) डेवलप और NSA/SA (नॉन-स्टैंडअलोन/स्टैंडअलोन) कोर डेवलप करेगा। इससे स्वदेशी टेलीकॉम स्टैक तैयार होगा। साथ ही टाटा ग्रुप और इसके साझीदार की क्षमता बढ़ेगी।
बयान में कहा गया है कि इस तकनीक का कमर्शियल डेवलपमेंट जनवरी 2022 से उपलब्ध होगा। बयान के मुताबिक, टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज (टीसीएस) अपने ग्लोबल सिस्टम इंटीग्रेशन एक्सपर्ट्स को साथ लाएगा और 3GPP एंड O-RAN स्टैंडर्ड का एंड-टू-एंड सॉल्यूशन उपलब्ध कराने में मदद करेगा। एयरटेल पायलेट प्रोजेक्ट के तौर पर इस स्वदेशी सॉल्यूशन को 5जी रोलआउट प्लान के तहत डिप्लॉय करेगा। इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट जनवरी 2022 से शुरू होगा। यह मेड इन इंडिया 5जी प्रोडक्ट और सॉल्यूशन ग्लोबल स्टैंडर्ड के आधार पर तैयार किए जाएंगे।
निर्यात के अवसर भी पैदा होंगे
इस 5जी सॉल्यूशन के एयरटेल के डाइवर्स और ब्राउनफील्ड नेटवर्क में कमर्शियल परीक्षण के बाद भारत के लिए निर्यात के अवसर भी पैदा होंगे। भारत अभी वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे बड़ा टेलीकॉम बाजार है। एनालिस्टों का कहना है कि टाटा ग्रुप के साथ साझेदारी से भारती एयरटेल का मनोवैज्ञानिक तौर पर मनोबल बढ़ेगा। 2016 में शुरू हुई रिलायंस जियो के कारण भारती एयरटेल पर दबाव बना हुआ था।
एयरटेल और टाटा ग्रुप में 2017 में भी हुआ था सौदा
यह साझेदारी एयरटेल और टाटा ग्रुप के बीच 2017 में हुए एक सौदे का नतीजा है। तब टाटा ग्रुप के घाटे में चल रहे कंज्यूमर मोबाइल कारोबार का मित्तल की कंपनी में विलय हो गया था। हालांकि, इस साझेदारी का उस सौदे से कोई सीधा कनेक्शन नहीं है। इस साझेदारी से नोकिया, एरिक्शन और हुवावे जैसे पारंपरिक उपकरण सप्लायर्स पर भी निर्भरता कम होगी। इस साझेदारी का मुख्य मुकाबला रिलायंस जियो से होगा।
5जी तकनीक को लेकर काफी उत्साहित
टाटा ग्रुप/टीसीएस के एन गणपति सुब्रमण्यम का कहना है कि हम 5जी तकनीक को लेकर काफी उत्साहित हैं। हम विश्वस्तरीय नेटवर्किंग उपकरण और समाधान तैयार करने की ओर देख रहे हैं। हम एयरटेल को अपने ग्राहक के रूप में पाकर काफी प्रसन्न हैं। अर्नेस्ट एंड यंग के टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम पार्टनर प्रशांत सिंघल का कहना है कि इस साझेदारी से ग्लोबल बिजनेस के अवसर पैदा होंगे। इससे स्वदेशी तकनीक को लेकर लड़ाई में तेजी आएगी।
विदेशी निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी पर जोर दे रही है सरकार
5जी तकनीक के विकास में विदेशी निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार स्वदेशी उपकरणों के डेवलपमेंट पर जोर दे रही है। इसके लिए सरकार ने घरेलू कंपनियों के बीच साझेदारी बढ़ाने पर बल दिया है। सरकार का मकसद 5जी तकनीक में चीन और यूरोपीय देशों की महत्ता को कम करना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद घरेलू इनोवेशन और सॉल्यूशंस को बढ़ावा देने की वकालत कर चुके हैं।
रिलायंस जियो ने विकसित किया स्वदेशी नेटवर्क
मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो ने स्वदेशी 5जी नेटवर्क विकसित कर लिया है। जियो ने अमेरिकी कंपनी क्वालकॉम के साथ मिलकर 5जी समाधान तैयार किया है। अमेरिका में इसका सफल परीक्षण भी हो चुका है। इंडियन मोबाइल कांग्रेस 2020 में मुकेश अंबानी ने कहा था कि रिलायंस जियो 2021 की दूसरी छमाही (जुलाई-दिसंबर) में 5 जी लॉन्च करने की योजना बना रही है। उन्होंने आगे कहा था कि देश में डिजिटल लीड को बनाए रखने, 5जी की शुरुआत करने और इससे सस्ता और सभी जगह उपलब्ध कराने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता है।
सरकार ने किया 5जी स्पेक्ट्रम का आवंटन
देश में 5जी सेवाएं शुरू करने के लिए सरकार ने स्पेक्ट्रम भी आवंटन कर दिया है। डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकॉम ने ट्रायल के लिए देश की तीनों प्रमुख कंपनियों रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया को 5जी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर दिया है। डीओटी ने तीनों टेलीकॉम कंपनियों को 700 मेगाहर्टज, 3.5 गीगाहर्टज और 26 गीगाहर्टज बैंड के स्पेक्ट्रम का आवंटन किया है। यह 5 जी ट्रायल एयरवेब्स 6 महीने के लिए आवंटित की गयी हैं। टेलीकॉम कंपनियों को शहरी क्षेत्र के साथ ग्रामीण और सेमी-अर्बन क्षेत्रों में भी ट्रायल करना होगा।

बैंक में रखी गृहणियों की नकद राशि पर नहीं लग सकता कर : आइटीएटी

नयी दिल्ली :   नोटबंदी के दौरान गृहिणियों की पोटली से निकली रकम को लेकर तरह-तरह के मजाक बने। उनकी छोटी बचत हड़पने और उस पर कर वसूलने के आरोप लगे, लेकिन आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आइटीएटी) की आगरा खंडपीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि यह आय कर योग्य नहीं मानी जाएगी। ग्वालियर के किला गेट निवासी उमा अग्रवाल की अपील का निस्तारण करते हुए न्यायिक अधिकारी ललित कुमार और लेखाकार सदस्य डा. मीठा लाल मीणा की खंडपीठ ने यह व्यवस्था दी है।

खंडपीठ ने आदेश में कहा है कि विमुद्रीकरण योजना 2016 के दौरान गृहिणियों द्वारा बैंक में जमा की गई ढाई लाख रुपये से कम नकद राशि कर योग्य राशि नहीं मानी जाएगी और न उसके स्रोत के बारे में पूछा जाएगा। न्याधिकरण ने स्वीकार किया कि यह छोटी राशि पिछले कई वर्षो में परिवार द्वारा की गई विभिन्न गतिविधियों से जुटाई गई है। इस मामले की खंडपीठ में इसी 14 जून को सुनवाई शुरू हुई और 18 जून को फैसला आ गया।
यह है पीठ का फैसला
विमुद्रीकरण योजना 2016 के दौरान बैंक खाते में ढाई लाख तक की नकद जमा पर कर लगाने का कोई आदेश नहीं है। उस समय महिलाओं के पास बैंकों में राशि जमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। महिला ने स्पष्टीकरण दिया था कि बैंक में जमा की गई राशि पिछले कई वर्षो में उसके द्वारा बचाए गए पैसे थे और आपातकालीन आवश्यकता में स्वयं और परिवार की सुरक्षा के लिए उन्हें रखा था। इसलिए माना जा सकता है कि महिला ने धारा 69ए में आवश्यक जमा के स्त्रोत को विधिवत समझाया है। आइटीएटी मानता है कि विमुद्रीकरण के दौरान गृहिणियों द्वारा नकद जमा से उत्पन्न होने वाली कार्यवाही के संबंध में यदि जमा ढाई लाख रुपये तक है, तो इस निर्णय को माना जा सकता है।रिटर्न में उल्लेख न होने पर नोटिस ग्वालियर के किला गेट निवासी उमा अग्रवाल ने रिटर्न में अपनी आय एक लाख 30 हजार 810 दिखाई थी। उनके बैंक में 211500 (दो लाख 11 हजार) रुपये जमा थे। इस पर ग्वालियर के आयकर अधिकारी ने उन्हें नोटिस जारी कर दिया। उन्होंने फेसलेस योजना में कमिश्नर के यहां अपील की। वहां खारिज होने पर एटीआइटी आगरा में अपील की। उमा अग्रवाल के पति ओमप्रकाश अग्रवाल कपड़े की छोटी दुकान चलाते हैं। बेटा भरत अग्रवाल ब्रोकर का काम करता है, वही मामले को लेकर न्यायाधिकरण में आया था। उनका कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। दो लाख 11 हजार 500 रुपये मां ने कैसे-कैसे जोड़े, हम ही जानते हैं।परिवार के भविष्य के लिए जमा की धनराशि एटीआइटी में उमा अग्रवाल ने कहा था कि नोटबंदी के दौरान उन्होंने धनराशि अपने व परिवार के भविष्य के उद्देश्यों के लिए पति, बेटे, रिश्तेदारों द्वारा दी गई व बचत से एकत्र कर सहेजी थी। गृहिणियां सब्जी विक्रेताओं, दर्जी व मिश्रित व्यापारियों से सौदेबाजी करके, घर के बजट से बचाई गई नकदी ऐसे ही जमा करती हैं। त्योहारों पर रिश्तेदारों से मिलने वाले छोटे-छोटे नकद उपहारों को जोड़ती हैं और वर्षो से पति और बेटे के कपड़े धोते हुए, उसमें से निकले रुपये को उन्होंने जोड़ा। 500 और एक हजार रुपये के नोट 2016 में प्रतिबंधित हुए, तो उनके पास उस बचत को बैंकों में जमा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

दिल्ली ही नहीं, हावड़ा के लिए भी प्रयागराज से मिलेगी हाई स्पीड ट्रेन 

प्रयागराज : दिल्ली-प्रयागराज-वाराणसी के बीच हाई स्पीड ट्रेन चलाए जाने के लिए बनाए जाने वाले हाई स्पीड रेल कॉरीडोर का विस्तार अब हावड़ा तक किए जाने की तैयारी की गयी है। यानी कि प्रयागराज से सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि हावड़ाके लिए भी हाई स्पीड ट्रेन लोगों को उपलब्ध होगी। इसके लिए वाराणसी से हावड़ा तक नेशनल हाईस्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनएचआरसीएल ) द्वारा  जल्द हीसर्वे शुरू होगा।इस सर्वे के लिए भी पहले की तरह लिडार तकनीक का प्रयोग किया जाएगा।
दरअसल अहमदाबाद-मुंबई केबाद रेलवे ने दिल्ली से वाराणसी के बीच हाई स्पीड कॉरीडोर बनाने का निर्णय लिया। इसके लिए पिछले वर्ष दिसंबर माह से ही लिडार तकनीक से नई दिल्ली-आगरा-प्रयागराज-वाराणसी हाई स्पीड रेल कॉरिडोर के लिए भूमि सर्वेक्षणका कार्य शुरू हुआ। इस दौरान हेलीकॉप्टर पर लगे उपकरण के सहारे सटीक सर्वेक्षण का आंकड़ा, लेजर आंकड़ा,जीपीएस, उड़ान और तस्वीरों को इकट्टा करके एनएचआरसीएल के अधिकारियों की टीम ने रिपोर्ट तैयार की। कोरोना कीदूसरी लहर की वजह से इसका डीपीआर मई तक तैयार नहीं हो सका।
फिलहाल यह डीपीआर अब अगस्त माह तक केंद्र सरकार को सौंपे जाने की तैयारी कीगई है। इस बीच इस कॉरीडोर का विस्तार हावड़ा तक करने की योजना बनी है। यानी की दिल्ली सेहावड़ा तक आने वाले कुछ वर्षों में हाई स्पीड ट्रेन फर्राटा भरेगी।इस योजना कोलेकर हाई स्पीडरेल कारपोरेशन द्वारा संबंधित रूट पर सर्वे करवाने की तैयारी की गई है। इसकी शुरूआत रेकॉन सर्वे से होगी। उसके बाद दिल्ली-वाराणसी रूट की तर्ज पर हावड़ातक लिडार तकनीकसे भी सर्वे होगा। इस रूट के तैयार होने के बाद हाई स्पीड ट्रेन द्वारा प्रयागराज  से दिल्ली महज तीन से साढ़े तीन घंटे में तो हावड़ा साढ़े चार से पांच घंटे में पहुंचा जा सकेगा।
दिल्ली-वाराणसी रूट पर हाई स्पीड ट्रेन संचालन के लिए नेशनल हाईस्पीड रेल कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा भले ही अभी डीपीआर तैयार किया जा रहा हो लेकिन यह रूट देश के अन्य रेल रूटों से एकदम अलग होगा। यह पूरा प्रोजेक्ट एलिवेटेड (खंभों पर) होगा। इसके अलावा हाई स्पीड रेल कॉरिडोर में हाई स्पीड ट्रेन पर्यावरण के ट्रैक से होकर दौड़ेगी। नई दिल्ली-वाराणसी के बीच प्रस्तावित 810 किमी कॉरिडोर किनारे छायादार पौधे रोपे जाएंगे।  यह हाई स्पीड कारिडोर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज समेत 22 जिलों से होकर गुजरेगा।
नेशनल हाइवे के समानांतर बनायाजाएगा हाई स्पीड रेल मार्ग
हाई स्पीड रेल कॉरीडोर दिल्ली से वाराणसी तक नेशनल हाइवे के समानांतर बनाए जाने की तैयारी की गई है। इसका सर्वे भी पूरा हो गया है। कुछ स्थानों पर हाई स्पीड रेल मार्ग यमुना एक्सप्रेस-वे के समानांतर रहेगा। इसे गौतम बुद्ध नगर जिले में बन रहे जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से भी जोड़ा जाएगा। हवाई अड्डे के पास इसे भूमिगत बनाये जाने का प्रस्ताव है।

 

सीबीएसई ने 12वीं के परिणाम की गणना में स्कूलों की मदद के लिए बनाया पोर्टल

नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने 12वीं कक्षा के परिणामों की गणना के लिए एक पोर्टल बनाया है ताकि अंकों/ग्रेड का व्यवस्थित ढंग से आकलन किया सके और समय की बचत हो। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
सीबीएसई ने “बारहवीं बोर्ड परीक्षा 2021 के लिए अंकों के सारणीकरण के लिए नीति” जारी की है। इस संबंध में, सीबीएसई ने अपने स्कूलों के परिणाम की तैयारी में परिणाम समिति/ स्कूलों की सहायता करने का निर्णय लिया है। इसी के तहत बोर्ड के आईटी विभाग ने एक पोर्टल तैयार किया है जो बारहवीं कक्षा के परिणामों की गणना के लिए सभी संबंधित स्कूलों को सुविधा प्रदान करेगा।
बोर्ड के आईटी विभाग के निदेशक अंतरिक्ष जौहरी ने कहा कि सीबीएसई से सबंद्ध स्कूलों के छात्रों के अंकों की गणना के लिये उपलब्ध परिणाम के आधार पर एक प्रणाली तैयार की गई है। दूसरे बोर्ड के संदर्भ में सीबीएसई क्षेत्रीय कार्यालयों की मदद से गणना करने के लिये परिणाम संबंधी आंकड़े जुटायेगी। सीबीएसई का कहना है कि यह प्रणाली गणना के काम के बोझ को कम करेगी, लगने वाले समय और कई अन्य परेशानियों को भी कम करेगी।
कोविड-19 महामारी के कारण सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षा को रद्द कर दिया था। बोर्ड ने परीक्षा परिणाम के संबंध में इन दोनों कक्षाओं के लिये वैकल्पिक मूल्यांकन नीति की घोषणा की है। स्कूलों से 10वीं कक्षा के अंक 30 जून तक जमा करने को कहा गया है जबकि 12वीं कक्षा के लिये स्कूलों को 15 जुलाई की समयसीमा दी गई है ।
सीबीएसई दसवीं कक्षा, 11वीं कक्षा और 12वीं कक्षा के परिणामों के आधार पर 12वीं कक्षा के छात्रों के अंक मूल्यांकन में क्रमश: 30:30:40 का फार्मूले पर कर रहा है ।

‘सबार ऊपरे मानुष सत्य’ के लेखक हैं रेणु’

कोलकाता : हावड़ा में नवनिर्मित हिंदी विश्वविद्यालय की ओर से ‘आपदा,मानवीय दृष्टि एवं एकजुट हम'(रेणु के विशेष संदर्भ में) विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल शिक्षक प्रशिक्षण, शिक्षण योजना एवं प्रबंधन विश्वविद्यालय एवं संस्कृत कॉलेज एवं विश्वविद्यालय की माननीय कुलपति प्रो.सोमा बंद्योपाध्याय एवं हिंदी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। बायोटेक्नोलोजी बीटेक की छात्रा अन्वेषा चक्रवर्ती ने ‘वर दे वीणा वादिनी’ पर उद्घाटन संगीत प्रस्तुत किया। स्वागत वक्तव्य रखते हुए प्रो.दामोदर मिश्र ने सभी आमंत्रित विद्वानों का स्वागत करते हुए कहा कि एक अहिंदी क्षेत्र बंगाल में हिंदी को पर्याप्त सम्मान एवं अधिकार मिलना हमारे लिए गर्व का विषय है। प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का यह प्रथम प्रयास है। स्वागत गीत का गायन हिंदी विश्वविद्यालय की छात्रा सीमा प्रजापति एवं ज्योति चौरसिया ने किया। उद्घाटन वक्तव्य रखते हुए प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना विश्वबंधुत्व की चेतना के प्रसार हेतु की गयी है । यह विश्वविद्यालय हिंदी और अहिंदी भाषियों के बीच एक सेतु का कार्य करेगा जिससे सभी इस विश्वविद्यालय से जुड़कर भारत की साझा संस्कृति को प्रसारित करें । यह बंगाल और भारत की संस्कृति के समन्वय का कार्य तथा वैश्विक भाषिक समन्वय का कार्य भी हिंदी के माध्यम से करेगा । विषय पर बात रखते हुए प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि रेणु ने सबार ऊपरे मानुष सत्य को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाया। रेणु जीवन सत्य के प्रामाणिक आख्यान रचने वाले मानवीय और संवेदनशील लेखक थे।इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि प्रो.विजय कुमार भारती ने कहा कि रेणु जीवन की कड़ी सच्चाई को व्यक्त करने वाले लेखक हैं। वे मानवीय दृष्टि के साथ सांस्कृतिक, प्रौद्योगिक और राजनीतिक मूल्यों की रक्षा करते हैं। बीज वक्तव्य देते हुए शिक्षाविद संदीप अवस्थी ने कहा कि रेणु का साहित्य मानव जीवनके सत्य की आवाज उठाने वाला साहित्य है। वे व्यवस्था की खामियों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने का साहस भी दिखाते हैं। डॉ. संदीप अवस्थी ने ही कार्यक्रम की मुख्य संयोजन की भूमिका का निर्वहन किया । प्रथम सत्र के सभी विद्वानों के प्रति धन्यवाद देते हुए हिंदी विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ सुकृति घोषाल ने कहा कि भविष्य में भी हिंदी विश्वविद्यालय ऐसे आयोजनों से वैचारिक संवाद की परंपरा को आगे ले जाएगा। दूसरे सत्र में ‘रेणु के कथा संसार में भारतीयता के सूत्र’ विषय पर अपना विचार रखते हुए नीदरलैंड से जुड़ी प्रख्यात लेखिका पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि रेणु अपने विरासत के प्रति गहरी आस्था रखते हैं। वे तमाम प्रतिगामी शक्तियों से टकराते हुए आदमियत की प्रतिष्ठा के प्रति दृढ़ दिखते हैं। इस सत्र में डॉ विभा कुमारी और अनीता कुमारी ठाकुर ने शोधपत्र- सार वाचन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्व हिंदी सचिवालय,मारीशस के महासचिव प्रो.विनोद मिश्र ने कहा कि रेणु भारतीय जनमानस के सरोकारों से सम्बद्ध लेखक हैं। वे भारतीयता को मात्र संकल्पना नहीं बल्कि जीवन शैली मानते हैं। कार्यक्रम का संचालन करते हुए मधु सिंह ने कहा कि रेणु का साहित्य एवं जीवन हमें महामारी और आपदाओं से लड़ने का नैतिक बल प्रदान करता है। धन्यवाद ज्ञापन अनुवाद साहित्य विभाग के शिक्षक हेमंत कुमार यादव ने किया।

आयुर्वेद और ऐलोपैथी : उपचार पद्धति, विवाद और विचार

वसुंधरा मिश्र

आज मनुष्य उत्तर-आधुनिक युग में जी रहा है जहां परंपरा, प्रकृति, पर्यावरण और विज्ञान को मानो उसने अपनी मुट्ठी में रख लिया है। आदर्श, मूल्य और चरित्र में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। विज्ञान के नये- नये आविष्कार हुए जिनमें चिकित्सा के क्षेत्र में एलोपैथी यानी आधुनिक चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ और दूसरी चिकित्सा पद्धतियाँ जैसे आयुर्विज्ञान, होम्योपैथिक, नेचरोपैथ आदि विकसित हुए।
आयुर्विज्ञान, विज्ञान अर्थात (आयु +र् + विज्ञान ) आयु का विज्ञान है। यह वह विज्ञान व कला है जिसका संबंध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका शमन करने तथा आयु (निरोगी जीवन) बढ़ाने से है। प्राचीन सभ्यताएं मनुष्य में होने वाले रोगों के निदान की कोशिश करती रही हैं। इससे कई चिकित्सा (आयुर्विज्ञान) पद्धतियाँ विकसित हुई। इसी प्रकार भारत में भी आयुर्विज्ञान का विकास हुआ जिसमें आयुर्वेद पद्धति सबसे ज्यादा जानी जाती है अन्य पद्धतियाँ जैसे कि सिद्ध वैद्य, नेचरोपैथ, योग प्रणाली, होम्योपैथी और एलोपैथी भी भारत में विकसित हुई। प्रारम्भिक समय में आयुर्विज्ञान का अध्ययन जीव विज्ञान की एक शाखा के समान ही किया गया था, बाद में ‘शरीर रचना’ तथा ‘शरीर क्रिया विज्ञान’ आदि को इसका आधार बनाया गया।
पाश्चात्य सभ्यता में औद्योगीकरण के समय जैसे अन्य विज्ञानों का आविष्कार व उद्धरण हुआ उसी प्रकार आधुनिक आयुर्विज्ञान एलोपैथी का भी विकास हुआ जो कि तथ्य आधारित चिकित्सा पद्धति के रूप में उभरी।
एलोपैथी चिकित्सा पद्धति आधुनिक चिकित्सा पद्धति है जिसकी दवाइयां बहुत जल्दी असर दिखाती हैं। एलो का अर्थ है अन्य और पैथी का अर्थ है पद्धति या विधि। इसका नाम होम्योपैथी के जन्मदाता जर्मन चिकित्सक सैमुअल हैनिमैन ने सन् 1810 में दिया था। होम्योपैथी में सही लक्षणों से सटीक इलाज होता है बशर्ते रोग की सही पहचान हो।
स्वतंत्रता के पहले आयुर्वेद उपेक्षित तो था ही किंतु स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक आयुर्वेद की उपेक्षा होती रही। स्वतंत्रता के बाद आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ही मानी गई। कोलकाता, बनारस, हरिद्वार, इंदौर, पूना, बंबई, केरल, गुजरात आदि क्षेत्रों में आयुर्विज्ञान के संस्थान बने।
वेदों में ऋग्वेद में च्यवन ऋषि को पुनः युवा करने का कथानक आता है और रोगों का निवारण जल, वायु, सौर, मानस आदि चिकित्सा पद्धति से किया जाने का विधान है।
यजुर्वेद में औषधि सूक्त, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का वर्णन है।
अथर्ववेद के प्रथम मंत्र में ही आयुर्वेद के सिद्धांत का परिचय मिलता है जो कि त्रिदोष सिद्धांत एवं सप्तधातु सिद्धांत है। तीन दोष वात पित्त और कफ़ तथा सात धातुएं रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि तथा शुक्र आदि है। ऋषि कहते हैं – – –
ये त्रिषप्ताःपरियन्ति विश्वा रूपाणि विभ्रतः।
वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे।।
अर्थात तीन और सात का यह संयोग या समुच्चय विश्व के समस्त रूपों को धारण करता हुआ गतिशील है, वाणी का पति सोम या इन्द्र उनके बलों को हमें प्राप्त कराएं। अथर्ववेद को क्षत्रवेद और भैषज्य वेद भी कहते हैं, इसमें औषधि रोग चिकित्सक एवं चिकित्सा का ज्ञान है। वेदों में बहुत ही विस्तार से शल्य, गर्भाधान, बाजीकर, विष आदि प्रकरणों का विश्लेषण मिलता है। वेदों में शरीर को ब्रह्मपुरी कहा गया है। रोग निवारण के लिए सूर्य, अग्नि, जल, विद्युत, वायु आदि का सहयोग होता है। वेदों में एक रोग के लिए एक औषधि का वर्णन मिलता है।
एलोपैथी में बीमारी के लक्षण उभर नहीं पाते और धीरे-धीरे ठीक होता है। डॉक्टर नर्स फार्मासिस्ट हेल्थकेयर प्रोफेशनल डिग्री और डिप्लोमा लेते हैं। इनको प्रेक्टिस करने के लिए लाइसेंस मिलता है। इसमें दवाएँ, सर्जरी रेडियेशन कई थैरेपी शामिल हैं। एलोपैथी में दवाओं के अलावा प्रिवेंटिव मेडिसिन भी मिलती है जैसे वैक्सीन जो बीमारी होने से रोकती है। साथ ही कोई दवा देने से पहले क्लिनिकल रिसर्च और फिर ह्युमन ट्रायल होता है।
कोरोना वैक्सीन आ गई हैं और सभी को दी जा रही है।
अभी भारत कोरोना की दूसरी लहर से जूझ रहा है। संभवतः अब महामारी अपनी ढलान की ओर है। दूसरी लहर खतरनाक रही जिसने बहुत से परिवारों को मृत्यु की ओर ढकेल दिया। तब वैक्सीन भी नहीं लग सकी थी।

एलोपैथी चिकित्सा बहुत वर्षों से आधुनिक समाज में लागू होने के कारण हम उसे ही प्रमुखता देते आए हैं। इसका कारण है हमें रोग से तुरंत आराम चाहिए। दर्द, पीड़ा और वेदना सहने की सहनशक्ति अब हमारे भीतर नहीं है। रोग से लड़ने की शक्ति तो बिल्कुल ही नहीं है यह बात अलग है कि शरीर में अपनी प्रतिरोधक क्षमता होती है जो छोटी-मोटी और साधारण मौसमी बिमारी जुकाम, सर्दी, खांसी आदि अपने आप तीन – चार दिनों में ठीक हो जाती है लेकिन हम अपने इन रोगों की एलोपैथी दवाई लेकर तुरंत ठीक होने पर तत्काल आराम पाते हैं जो मनुष्य स्वभाव का परिचायक है । एलोपैथी में एंटी बैक्टीरिया होते हैं जो इंफेक्शन को तुरंत समाप्त कर देते हैं। इससे एक समस्या का निदान होता है तो दूसरी समस्या या अधिक समस्याओं का जन्म भी हो सकता है। एलोपैथी में कैंसर जैसे रोगों तक का इलाज है।
आयुर्वेद में भी कैंसर का इलाज है लेकिन उसमें बहुत लंबा समय लगता है और उतनी सहनशक्ति किसी भी रोगी में नहीं होती। आयुर्वेदिक दवा खाने से कभी भी नुकसान नहीं होता। यह बिमारी को जड़ से खत्म करती है। आयुर्वेद हजारों वर्षों से स्वस्थ जीवन का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह प्राचीन विज्ञान है जिसे सिस्टर सांइस के नाम से भी जाना जाता है। पांच हजार वर्षों से आयुर्वेद का मुख्य फोकस जीवन के भावनात्मक और भौतिक रूप को पहचान कर उसे जड़ से दूर करना है। इससे शरीर का शुद्धिकरण, स्वस्थ वजन, त्वचा बाल का रखरखाव, तनाव से बचाना, जलन सूजन को दूर करना, निम्न रक्तचाप, कोलेस्ट्राल और बहुत सी बीमारी का उपचार संभव है। आयुर्वेद सात्विक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाता है। यह जीवन का भौतिक, मौलिक तथा आत्मिक ज्ञान का नाम है। आयुर्वेद का उपचार मानव शरीर और मस्तिष्क को प्राकृतिक रूप से ठीक करता है। आयुर्वेद के प्रति यह भ्रामक धारणा प्रचलित है कि यह केवल जप, योग, पिसे हुए पदार्थ, तेल की मालिश आदि तक ही सीमित है।
संस्कृत के शब्द अयुर यानी विज्ञान और वेद का यानी ज्ञान इन दोनों से आयुर्वेद नाम आया जो वेद पुराणों में मिलता है। भारत में ही इसका उद्गम हुआ है।आयुर्वेद प्रमुख रूप से शरीर को पंचतत्वों जल पृथ्वी आकाश अग्नि वायु से निर्मित मानता है जो विज्ञान पर आधारित है।
आयुर्वेद में तीन चीजों पर अधिक ध्यान दिया जाता है–वात पित्त और कफ़। इन तीनों के संतुलन से शरीर मन चेतना ठीक रहते हैं।वात पित्त और कफ़ में परिवर्तन से शरीर में विकार आते हैं। वात शरीर की गति से जुड़ी सूक्ष्म ऊर्जा है जो अंतरिक्ष और वायु से बनी है। यह श्वास निमिष मांसपेशियों ऊतक आंदोलन हृदय की धड़कन और साइटोप्लाज्म और कोशिका झिल्ली में होने वाले सभी आंदोलनों को नियंत्रित करता है। वात संतुलित न होने पर भय चिंता पैदा होती है। पित्त शरीर के पाचन अवशोषण आत्मसात पोषण चयापचय और शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। पित्त आग और पानी की से बना है। कफ़ वह ऊर्जा है जो शरीर की संरचना हड्डियों मांसपेशियों का निर्माण करती है। कोशिकाओं को जोड़ने का काम करता है। यह पृथ्वी और जल से बनता है। यह जोड़ों में चिकनाई देता है त्वचा को नमी देता है प्रतिरक्षा को बनाए रखता है। अतः शरीर में सब घटकों को संतुलित करने के लिए आयुर्वेद चिकित्सा का महत्व है।
कोरोना महामारी के दौरान आयुर्वेद के प्रति लोगों का रुझान बढा़ है क्योंकि कोरोना महामारी के इलाज की खोज एलोपैथी में अभी तक नहीं हो पाई है। इस महामारी की वैक्सीन आ गई है लेकिन दोनों डोज़ लगने के बाद भी देखा गया कि वह व्यक्ति कोरोना ग्रसित हो गया। कोरोना का निदान एकांत वास, योग, आहार-विहार, प्राणायाम, स्वच्छ वातावरण, घर में बना स्वच्छ और हल्का सुपाच्य भोजन करना आदि सब आयुर्वेद से संबंधित इलाज पर केंद्रित है।
जब घर के अंदर इसका इलाज हो सकता है तो ऐसे में एलोपैथी की बड़ी – बड़ी कंपनियों का मुंह लटक गया। उनकी मोनोपोली कहीं समाप्त न हो जाए और अरबों का घाटा कहीं उनकी दुकानदारी को खत्म न कर दे।
इस लोकतंत्र में वैसे तो सभी को अपनी सेवाएं देने का अधिकार है।
चिकित्सा पद्धति वही अच्छी और कारगर है जो रोगी के प्राण बचाए और स्वस्थ करे।
कोरोना का प्रामाणिक इलाज तो आयुर्वेद या एलोपैथी दोनों के ही पास अभी नहीं है लेकिन भारत सरकार द्वारा दी गई सावधानियों और सुझाव जैसे मास्क लगाना, सेनेटाइजर,
से हाथों को बार बार साफ करना, दो गज की दूरी बनाए रखना, छींक, जुकाम खांसी को दूरी से करना संक्रमण को दूर करने में सहायक है। आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों ही भारत में फले फूले, साधारण आदमी का यही मानना है। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन एफडीए आदि वैश्विक संस्थाएं एलोपैथी पर नजर रखती हैं। आयुर्वेद का सरकारी बजट भी नाममात्र का है लेकिन एलोपैथी पर सरकारी बजट लगभग 90% से भी ज्यादा है। भारत की चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। जब अथर्ववेद का मंत्र कहता है कि ” विश्वा रूपाणी विभ्रतः” तब आशय समस्त प्राणियों के शरीर से है चाहे वे मनुष्य हो अथवा पशु हो अथवा पादप स्थावर आदि। भारतीय का मंत्र “वसुधैव कुटुम्बकम” में निहित है।