Thursday, April 9, 2026
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बिहार के तेलहारा से निकला इतिहास का एक लुप्त पन्ना

पहली शताब्दी का एक विशाल विद्या केंद्र सामने आया है

प्राचीन भारत के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा जुड़ा है बिहार से। मगध परिक्षेत्र यानी पटना, नालंदा, गया जैसी जगहों पर सैकड़ों टीलों के भीतर छोटी-बड़ी कई सभ्यताएं इतिहास का कोई महत्वपूर्ण अध्याय होने का संकेत देती रहती हैं। जब-तब इनमें दफ़्न जानकारी बाहर आती है तो उस कालखंड से एक पर्दा हटता है, जैसा कि अभी हो रहा है। विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से महज 33 किमी दूर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क्षेत्र एकंगरसराय प्रखंड में पड़ता है एक गांव, तेलहारा। यहां पहली शताब्दी का एक विशाल विद्या केंद्र सामने आया है। माना जा रहा है कि यह विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशिला से भी पुराना है। अब तक मिले साक्ष्य रोशनी डालते हैं कुषाण काल से लेकर पाल काल के क्रमबद्ध इतिहास पर।

तेलहारा में जारी उत्खनन से ये तथ्य सामने आने लगे हैं कि ऊंचे-ऊंचे टीलों में कई राजवंशों की कहानियां समाई हैं। खुदाई में मिली हैं 42×32×6 सेंटीमीटर की ईंटें। यह अपने आप में इस बात की गवाही है कि निर्माण पहली शताब्दी का है। नालंदा विश्वविद्यालय पांचवीं और विक्रमशिला सातवीं शताब्दी के हैं। सातवीं सदी में चीनी यात्री हृवेनसांग और इत्सिंग भी आए थे तेलहारा में। दोनों ने अपने यात्रा वृत्तांत में यहां का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि बौद्ध धर्म के एक पंथ महायान का यह केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय से भी उच्च स्थान रखता है। प्राचीन इतिहास की बिहार पर केंद्रित डीआर पाटिल लिखित दुर्लभ क़िताब ‘द एन्टिक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार’ में इस बात की रोमांचक चर्चा है कि खोजी अंग्रेज़ इतिहासकार बुकानन की आंखों से तेलहारा ओझल हो गया। 1873 में अंग्रेज़ इतिहासकार बगलर की रिपोर्ट से इसे थोड़ा विस्तार ज़रूर मिला। लेकिन, 1875-78 में ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर कनिंघम ने अपनी खोज से सभी को चकित कर दिया। उनकी रिपोर्ट इशारा करती रही कि टीले के अंदर कोई बड़ा साम्राज्य समाया हुआ है। इसी उत्सुकता से बिहार पुरातत्व विभाग ने तेलहारा में गहरी रुचि दिखाई और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से यहां खुदाई का आग्रह करता रहा।

वैसे यहां के इतिहास को जानने का एक प्रयास पहले भी हुआ था। ब्रिटिश काल में ही 1915 में यहां खुदाई शुरू की गई, लेकिन महज एक साल ही काम चला। उस समय कुछ हाथ नहीं लगा। दरअसल माना गया कि कनिंघम के सम्मान में सरकार ने काम तो शुरू करा दिया, लेकिन उसे यहां कोई दिलचस्पी थी नहीं। लंबे समय बाद 2009 में एएसआई और बिहार पुरातत्व विभाग का ध्यान इस ओर गया। हालांकि इस बार भी भारतीय सर्वेक्षण इंस्टिट्यूट ने यहां खुदाई पर रोक लगा दी। हालांकि सीएम नीतीश कुमार के दखल और अनुरोध के बाद काम शुरू हो गया।

बिहार पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर अतुल कुमार वर्मा उत्खनन के साइट इंचार्ज भी हैं। वह कहते हैं, ‘उत्खनन से स्पष्ट हो गया कि तेलहारा को पहली सदी में स्थापित किया गया था। नालंदा और विक्रमशिला की स्थापना इसके बाद हुई। हालांकि पाकिस्तान में पड़ने वाले तक्षशिला विश्वविद्यालय को सबसे प्राचीन ज्ञान केंद्र होने का गौरव प्राप्त है।’

यह भी कम दिलचस्प नहीं कि जिस जगह सरकार की नज़र अब गई, वह पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के बीच पूज्य है। स्थानीय पत्रकार लक्ष्मी नारायण सुधांशु बताते हैं कि पूर्वज उस भूरी मिट्टी वाले टीले पर उग आए पेड़ों के नीचे बैठकर आराम करते। कहीं आते-जाते समय उन पेड़ों की छांव उनका ठिकाना होती। स्थानीय लोगों ने उस टीले को कभी मिट्टी का अंबार भर नहीं समझा। वहां उगे पेड़ों की पूजा की जाती थी। कई कहानियां प्रचलित हैं इसके बारे में। किसी क़िस्से में बताया गया कि इस ज़मीन में एक राजवंश दबा पड़ा है तो किसी में इस जगह को बताया गया नगर रक्षिका देवी का आश्रयस्थल। अब साफ़ हो चला है कि नालंदा के बगल में ज्ञान की एक और जगह थी। यहां भी देश-विदेश से छात्र उसी लालसा में आते, जैसे अब ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज में जाते हैं।

अतुल कुमार वर्मा बताते हैं कि यह साइट ढाई किलोमीटर एरिया में है। अभी तक केवल 20 फ़ीसदी ही खुदाई हो पाई है। सात टीले हैं। इनमें से तीन के राज़ सामने आ चुके हैं। बाकी के नीचे दबी विरासत का बाहर आना बाकी है। खुदाई में तीन कालखंड के अवशेष मिले हैं। पहली शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी तक के कुषाण काल, चौथी से पांचवीं सदी के गुप्त काल और आठवीं से 12वीं सदी के पाल काल। खोज के क्रम में पता चला कि यहां 10 हज़ार विद्यार्थी पढ़ते थे। उन्हें पढ़ाने के लिए नियुक्त थे तीन हज़ार शिक्षक।

बौद्ध मूर्तियां मिली हैं तो साथ में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी। विद्वानों का मानना है कि बौद्ध ज्ञान का केंद्र था तेलहारा, लेकिन यहां हिंदू धर्म और दर्शन की तुलनात्मक पढ़ाई भी होती थी। पटना संग्रहालय के पूर्व निदेशक डॉ. सीपी सिन्हा कहते हैं, ‘इसकी खुदाई और पहले होनी चाहिए थी। नालंदा विश्वविद्यालय के आभामंडल में यह जगह दब गई। खुदाई में अब तक कांस्य और टेराकोटा की मूर्तियां मिली हैं, जो कुषाण काल से पाल काल तक की हैं। तीन मंजिला इमारत मिली है, जिसे बौद्व भिक्षुओं का प्रार्थना और मेडिटेशन सेंटर माना गया। इसका किसी प्रचीन विद्वान ने तिलकाडीह नाम से उल्लेख किया तो किसी ने तिल-कस्य के नाम से।’

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व निदेशक बीएस वर्मा ने 1971 से 81 के बीच तेलहारा का सर्वेक्षण किया था। उन्होंने पाया कि विक्रमशिला से कहीं अधिक विश्वसनीय उत्कीर्ण लेख, प्रमाण, मठ, लिपि यहां दबे हैं। बिहार विरासत समिति के निदेशक विजय कुमार चौधरी कहते हैं कि बहुत हद तक संभव है मगध शासक बिंबिसार ने ही इसकी स्थापना की होगी। बौद्ध धर्म में उसकी गहरी रुचि थी। उसी ने राजगिर को मगध की राजधानी बनाया। वह गौतम बुद्ध का रक्षक और परम मित्र भी था। उसे ज्ञान और संस्कृति से गहरा लगाव था। खुदाई जारी है और इसकी परतों से कई अबूझ पहेली सामने आने वाली है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

स्विजरलैंड, स्वीडन को लुभा रही चंद्रपुर झुग्गी की बांबू राखियाँ

मुम्बई: चंद्रपुर के बंगाली कैंप झोपडपट्टी में रहनेवाली बांबू डिजाइनर और महिला सक्षमीकरण कार्यकर्ता मीनाक्षी मुकेश वालके की बांबू राखियां देशभर में लोकप्रिय हो चुकी है
बांबू की पूर्णतया इको फ्रेंडली ऐसी बांबू राखियों में प्लास्टिक का तनिक भी अंश न होना यह मीनाक्षी वालके की विशेषता है और राखियों को सजाने वे खादी धागे के साथ तुलसी मणी एवम् रुद्राक्ष का प्रयोग करती है। मुख्य रूप से प्लास्टिक का प्रयोग न्यूनतम हो इस दिशा में चलता है।
मीनाक्षी ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने 50 हजार राखियों का लक्ष्य रखा है. विदेशों से मांग बढ़ने के बाद अब स्थानीय स्तर से भी पूछ परख बरबस ही बढ़ गयी है। लॉक डाउन से मीनाक्षी व उनकी सहयोगी महिलाओं पर भुखमरी ही नहीं, कर्ज की नौबत आई है. ऐसे में अब राखी ने उन्हें नव संजीवनी देकर उम्मीदें काफी बढ़ा दी है.
इको फ्रेंडली फ्रेंडशिप बैंड वैसे उपलब्ध या प्रचलित नहीं था। मुख्य रूप से धातू, प्लास्टिक के ही स्वरूप में वह अधिकांश उपलब्ध है. मीनाक्षी ने इसी वर्ष जून माह में बांबू के फ्रेंडशिप बैंड बनाने का आविष्कार किया. इसके माध्यम से भी स्वदेशी, पर्यावरण से मित्रता ऐसा संदेश दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि आज तक बांबू के फ्रेंडशिप बैंड उपलब्ध व लोकप्रिय नहीं थे।

बांग्लादेश में दो फ़ीट की गाय देखने पहुँचे 15 हज़ार लोग

सिर्फ़ 51 सेंटीमीटर है भुट्टी नस्ल की गाय रानी की ऊंचाई
ढाका : बांग्लादेश में इन दिनों गाय चर्चा में है और उसे देखने अब तक हजारों लोग आ चुके हैं। कारण कुछ और नहीं बल्कि उसका छोटा आकार है। दरअसल, रानी एक ‘भुट्टी गाय’ यानी भूटानी नस्ल की गाय है जिसकी उम्र क़रीब दो वर्ष है। रानी की ऊंचाई महज़ 51 सेंटीमीटर है और उसका वज़न सिर्फ़ 28 किलोग्राम है।
रानी को बांग्लादेश की राजधानी ढाका के क़रीब स्थित चारीग्राम के एक फ़ार्म-हाउस में रखा गया है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, बांग्लादेश में कोरोना महामारी से संबंधित प्रतिबंध लागू होने के बावजूद, 15 हज़ार से ज़्यादा लोग रानी से मिलने यहाँ पहुँचे हैं। इस फ़ार्म के मैनेजर हसन होलादार ने रानी का नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के लिए भेजा है। उनका कहना है कि रानी दुनिया की सबसे छोटी गाय है।
हसन होलादार रानी को पिछले साल बांग्लादेश के ही नौगाँव ज़िले के एक फ़ार्म से लेकर आये थे। वे कहते हैं कि “रानी को चलने में थोड़ी परेशानी होती है, इसलिए फ़ार्म में उसे बाकी गायों से अलग रखा जाता है। हमें डर रहता है कि बड़ी गायें कहीं उसे चोट ना पहुँचा दें।”
“वो ज़्यादा खाती भी नहीं है। वो थोड़ा बहुत भूसा खाती है और मामूली चारे में उसका काम हो जाता है। उसे जब घुमाने ले जाते हैं, तो वो खुश होती है और कोई अगर उसे बाहों में उठा ले, तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता।”
अभी तक ‘दुनिया की सबसे छोटी गाय’ का टाइटल मनिकयम नामक एक भारतीय गाय के पास है जिसकी ऊंचाई 61.1 सेंटीमीटर बताई जाती है। रानी अब ‘दुनिया की सबसे छोटी गाय’ का खिताब पाने की दौड़ में हैं।
हसन होलादार के मुताबिक गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की एक टीम इसी साल रानी को देखने पहुँचेगी को दिया जा सकता है या नहीं।

मालवा की धरती से मिले औरंगजेब के जमाने के सिक्के

363 साल पहले ढाले गये हैं सिक्के
एक साल बाद बेचने निकले तो पकड़ाए
शाजापुर : ऐतिहासिक धरोहरों को अपने अंदर छुपाए बैठी मालवा की धरती से अब राजा-महाराजाओं का खजाना भी निकलने लगा है। 163 से ज्यादा सोने-चांदी के सिक्के शाजापुर के ग्राम पचोला के मजदूरों को नींव खोदते समय एक साल पहले मिले थे। इस खजाने का तीनों ने बंटवारा कर अपने-अपने घरों में गड्ढा कर छिपा दिए, ताकि किसी को भनक न लगे लेकिन गत बुधवार को जब वे इसे बाजार में बेचने के इरादे से निकले तो पुलिस ने उन्हें दबोच लिया। मजदूरों के पास मिले सिक्के देख हर कोई दंग रह गया।
यह साधारण सिक्के नहीं, बल्कि औरंगजेब के जमाने के बताए जा रहे हैं। इन सिक्कों की पड़ताल अश्विनी शोध संस्था महिदपुर के मुद्रा विशेषज्ञ डॉ.आर.सी. ठाकुर से कराई गयी तो उन्होंने बताया कि मालवा की धरती से यह सिक्के मिलना अपने आप में दुर्लभ है।
पुलिस ने मौके से जितेंद्र के पास से 60 चांदी के सिक्के व 7 सोने तथा किशन के पास से 60 चांदी और 6 सोने के सिक्के जब्त किये जबकि संतोष के पास से 30 चांदी के सिक्के मिले। संतोष, किशन और जितेंद्र को मिला खजाना, पुलिस की कहानी में एक साल पहले मिलना बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार संतोष के पास से सिर्फ 30 सिक्के मिले, संतोष के अनुसार उसके खुद के मकान की नींव खुदाई में यह सिक्के एक मिट्टी के बर्तन में मिले थे। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से तीनों ने अपने अपने घरों में ही गड्ढा कर सिक्के गाड़ दिए थे।
शाजापुर जिला ऐतिहासिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। पुराविद् डॉ रमण सोलंकी के अनुसार इसे बौद्ध पथ माना जाता है। यानी इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का काफी वर्चस्व रहा है। इसके प्रमाण कुरावर में बौद्ध स्तूप के अवशेष मिलने और सारंगपुर व मक्सी में भी इस तरह के प्रमाण मिलते हैं। शाजापुर को मुगल शासक शाहजहां से जोड़ा जाता है। औरंगाबाद टकसाल की मुद्राएं शाजापुर पहुंचने का कारण उज्जैन से अरबसागर तक व्यापारी आते-जाते थे। व्यापारियों का मार्ग शाजापुर होकर ही था। उज्जैन से शाजापुर होकर विदिशा होते हुए भरूच से अरब सागर की ओर व्यापारियों का आना-जाना था। उज्जैन रत्नों और मसालों की मंडी था। खासकर मोतियों का कारोबार उज्जैन से होता था। इसलिए उज्जयिनी के सिक्कों पर क्रास वाला व्यापारिक चिह्न था चारों दिशाओं के प्रतीक क्रास के चारों कोनों पर गोलाकार चिह्न हैं। उज्जैन के अरब सागर वाले पश्चिमी मार्ग में शाजापुर आता था।
363 साल पहले औरंगाबाद टकसाल में ढले
यह सिक्के 1658 से 1707 (हिजरी सन् 1068 से 1158) के हैं। इस पर 12 अंक लिखा है, जो महीने का प्रतीक है। इस तरह के सिक्के उज्जैन जिले के रूनीजा में सालों पहले स्व. डॉ. श्रीधर वाकणकर ने भी खोजे थे। यह सिक्के औरंगाबाद टकसाल के होने से खास है। एक सिक्के की कीमत लगभग 50 हजार रुपए हो सकती है। सोने के सिक्कों का वजन 142.3 ग्राम तक है, वहीं चांदी के 150 कुल सिक्कों का वजन एक किलो 710 ग्राम है। चांदी के सिक्कों की कीमत 1 लाख 12 हजार रुपए के लगभग तो सोने के एक सिक्के की कीमत 50 हजार यानी कुल 13 सिक्कों की कीमत 6 लाख 50 हजार रुपये कीमत है।

जय…जय…जय…जगन्नाथ

भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को प्रारंभ होती है। इस बार 2021 की जगन्नाथ रथयात्रा 12 जुलाई को है। पद्मपुराण के अनुसार आषाढ माह के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि सभी कार्यों को करने के लिए सिद्धि प्रदान करने वाली होती है। चार पवित्र धामों में से एक श्रीजगन्नाथ धाम में भगवान विष्णु जगन्नाथ रूप में विराजते हैं। मान्यता है कि यहां बाकी के तीनों धाम जाने के बाद अंत में यहां आना चाहिए। उड़ीसा राज्य में स्थित पुरी में श्रीजगन्नाथ मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय का एक प्रसिद्द हिन्दू मंदिर है जो जग के स्वामी भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। जगन्नाथ पुरी को धरती का वैकुंठ कहा गया है, इस स्थान को शाकक्षेत्र, नीलांचल और नीलगिरि भी कहते हैं। अनेकों पुराणों के अनुसार जगन्नाथ पुरी में भगवान कृष्ण ने अनेकों लीलाएं की थीं और नीलमाधव के रूप में यहां अवतरित हुए।
वेद स्वरूप हैं यहां भगवान
जगत के नाथ यहां अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। तीनों ही देव प्रतिमाएं काष्ठ की बनी हुई हैं। हर बारह वर्ष बाद इन मूर्तियों को बदले जाने का विधान है। पवित्र वृक्ष की लकड़ियों से पुनः मूर्तियों की प्रतिकृति बना कर फिर से उन्हें एक बड़े आयोजन के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है। वेदों के अनुसार भगवान हलधर ऋग्वेद स्वरूप, श्री हरि (नारायण) सामदेव स्वरूप, सुभद्रा देवी यजुर्वेद की मूर्ति हैं और सुदर्शन चक्र अथर्ववेद का स्वरूप माना गया है। श्री जगन्नाथ का मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है इसके शिखर पर अष्टधातु से निर्मित विष्णु जी का सुदर्शन चक्र लगा हुआ है जिसे नीलचक्र भी कहते हैं। यहां चारों प्रवेश द्वारों पर हनुमान जी विराजमान हैं जो कि श्री जगन्नाथ जी के मंदिर की सदैव रक्षा करते हैं।

श्रीकृष्ण का हृदय है यहां
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब श्री कृष्ण की लीला अवधि पूर्ण हुई तो वे देह त्यागकर वैकुंठ चले गए। उनके पार्थिव शरीर का पांडवों ने दाह संस्कार किया। लेकिन इस दौरान उनका दिल जलता ही रहा। पांडवों ने उनके जलते हुए दिल को जल में प्रवाहित कर दिया, तब यह दिल लट्ठे के रूप में परिवर्तित हो गया। यह लट्ठा राजा इंद्रदयुम्न को मिल गया और उन्होंने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर इसे स्थापित कर दिया,तब से वह यहीं है। हालांकि बारह वर्ष बाद मूर्ति बदली जाती है पर लट्ठा अपरिवर्तित रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मंदिर के पुजारियों ने भी इसे कभी नहीं देखा है। लट्ठा परिवर्तन के समय पुजारी की आँखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ कपड़े से ढके हुए होते है। बगैर देखे और बिना स्पर्श किए इस लट्ठे को पुरानी मूर्ति में से निकल कर नई मूर्ति में स्थापित कर दिया जाता है। उनके एहसास के मुताबिक यह लट्ठा बहुत कोमल है। मान्यता है कि कोई यदि इसको देख लेगा तो उसके प्राणों को खतरा हो सकता है।
(साभार – अमर उजाला)

975 आइसक्रीम स्टिक से बनाया भगवान जगन्नाथ का रथ

भुवनेश्वर : ओडिशा में रहने वाले एक कलाकार ने भगवान जगन्नाथ का रथ आइसक्रीम स्टिक की मदद से बनाया है। इसके लिए कलाकार ने 975 आइसक्रीम स्टिक इस्तेमाल की हैं।
ओडिशा में हर साल निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का विशेष होता है। इस बार पुरी के एक कलाकार विश्वजीत नायक ने 975 आइसक्रीम स्टिक की मदद से भगवान जगन्नाथ का रथ बनाया है। ये रथ बेहद प्यारा लग रहा है. वहीं कुछ दिन पहले कलाकार ने आइसक्रीम स्टिक की मदद से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति भी बनाई थी। एक इंटरव्यू में विश्वजीत ने बताया कि उन्होंने 975 आइसक्रीम स्टिक के साथ भगवान जगन्नाथ का छोटा सा रथ तैयार किया है। साथ ही बताया कि इस रथ में 16 पहिए और चार घोड़े बनाए गए हैं। वहीं विश्वजीत ने रथ को पांच दिन में तैयार किया है।

 ‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आप को एक और मध्ययुगीन भक्त कवयित्री की कथा सुनाऊंगी जो “राजस्थान की मोनालिसा” के नाम से भी चर्चित हैं। सौन्दर्य, भक्ति, प्रेम और काव्यमयता का अद्भुत संयोजन मिलता है, उनके व्यक्तित्व और कवित्त में, जिनका एक नाम “बनी -ठनी” या “बणी- ठणी” भी है। यह बात और है कि उसके वास्तविक नाम का पता नहीं चलता। वह किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह (18 वीं शताब्दी) की दासी थीं जो महाराज से अगाध प्रेम भी करती थीं। महाराजा जो स्वयं एक कवि और कला पारखी थे, भी अपनी इस दासी से बहुत प्रेम करते थे। एक और मत के अनुसार वह कलाप्रेमी महाराज की शिष्या भी थीं। सावंत सिंह स्वयं एक कुशल चित्रकार भी थे। उन्होंने एक बार अपनी इस प्रिय दासी को रानियों जैसी पोशाक और आभूषण पहनाकर उनका एक चित्र बनाया। वह चित्र उन्होंने तत्कालीन राज चित्रकार निहालचंद को दिखाकर उनकी राय मांगी। निहालचंद ने उन्हें कुछ सुझाव दिए जिनके अनुसार राजा ने पुनः चित्र में संशोधन करके, उसे अपने व्यक्तिगत संग्रहालय में शामिल कर लिया। बाद में निहालचंद ने अपने सामने, वह चित्र दोबारा बनवाकर, उसे सार्वजनिक रूप से दरबार में प्रर्दशित किया। इस चित्र की बहुत प्रशंसा हुई और चित्र में चित्रित स्त्री अर्थात दासी को नाम दिया गया “बणी -ठणी” जो राजस्थानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, सजी संवरी। इस चित्र की ख्याति के उपरांत उस दासी को सब “बणी ठणी” कह कर ही संबोधित करने लगे। निहालचंद ने बणी ठणी को आदर्श बनाकर और भी कई चित्र बनाएँ जो इतने चर्चित हुए कि किशनगढ़ चित्रकला की शैली को बणी ठणी के नाम से जाना जाने लगा। बणी ठणी का पहला चित्र सन 1700 के आस- पास बना था। इन चित्रों की आज भी विदेशों में अच्छी मांग है। 

एक ओर बणी ठणी के चित्रों की ख्याति आसमान छूने लगी तो दूसरी ओर  राजा सावंत सिंह और बनी- ठनी का प्रेम उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता गया और उनकी जोड़ी में प्रजा को राधा कृष्ण की छवि दिखाई देने लगी। राजा को नागरीदास, चितेरे, अनुरागी, मतवाले आदि कई नामों से नवाजा गया तो उनकी प्रिय दासी को भी कलावंती, किर्तनिन, लवलीज, नागर रमणी, राजस्थान की मोनालिसा, राजस्थान की राधा आदि नामों से पुकारा गया। निहालचंद ने राजाज्ञा से राजा और सभी कमी, जो बाद में उनकी उपपत्नी बन गईं, को राधा कृष्ण के रूप में अपने चित्रों में अमरत्व प्रदान किया। इन चित्रों में कला, सौन्दर्य और प्रेम -भावना का अद्भुत संयोजन दिखाई देता है।

कालांतर में पारिवारिक विवादों के चलते महाराज सावंत सिंह का घर परिवार से मोहभंग हो गया और वह राजपाट त्याग कर, अपने पुत्र सरदार सिंह को राजगद्दी सौंपकर, वृंदावन आ गए तथा वल्लभाचार्य के पंथ में दीक्षित हुए। वह नागरीदास नाम से कृष्ण काव्य की रचना करने लगे। बणी ठणी भी उनके साथ ही वृंदावन आ गईं और रसिक बिहारी मंदिर के महंत रसिक देव से दीक्षा ग्रहण की तथा “रसिक बिहारी” के नाम से कविता लिखने लगीं। इन कविताओं में श्रीकृष्ण और राधिका के जन्म के विवरणों के साथ उनके बीच प्रेम के स्फुरण और उसकी प्रगाढता के जीवंत चित्रण के साथ ही कुंज विहार, रास-क्रीड़ा, होली, साँझ, हिंडोला, पनघट आदि विविध लीला-प्रसंगों का वर्णन अत्यंत सरसता से हुआ है। राधा- कृष्ण के प्रेम में पगे अत्यंत मनोहारी पदों की रचना रसिक बिहारी ने की है और उनकी विविध लीलाओं का अत्यंत सरस और मार्मिक वर्णन भी किया है। राधा के उपवन में झूला झूलने और कृष्ण द्वारा छिपकर इस मनोहर दृश्य को निहारने का एक सुंदर प्रसंग निम्नलिखित पद में बड़ी स्वाभाविक रूप में चित्रित किया गया है-

“धीरे झूलो री राधा प्यारी जी । 

 

नवल रंगीली सबै झुलावत गावत सखियाँ सारी जी । 

 

फरहरात अंचल चल चचल लाज न जात सँभारी जी । 

 

कुंजन ओट दुरे लखि देखत प्रीतम रसिक बिहारी जी ।”

बणी ठणी  अर्थात रसिक बिहारी के काव्य में नायिका भेद का वर्णन भी अत्यंत कुशलतापूर्वक हुआ है और वह इसके लिए भी जानी जाती हैं।  प्राय: यह माना जाता है कि रीतिकालीन कवियों ने ही नख -शिख वर्णन के कवित्त और पदों की रचना की है लेकिन कुछ कवयित्रियों ने भी इस क्षेत्र में अपनी काव्य क्षमता का प्रदर्शन किया है जिनमें रसिक बिहारी का नाम भी लिया जा सकता है। राधिका की रसभरी रतनारी आँखों के सौन्दर्य को इस पद में बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है-

“रतनारी हो थारी आंखड़ियाँ।

प्रेम छकी रस-बस अलंसाणी जाणि कमल की पांखड़ियाँ॥

सुन्दर रूप लुभाई गति मति हौं गई ज्यूं मधु मांखड़ियाँ।

रसिकबिहारी वारी प्यारी कौन बसी निसि कांखड़ियाँ॥”

भक्त नागरीदास ने ब्रह्म कुंड पर सांझी अर्थात ब्रज की लोक कला पर केंद्रित मेले का आयोजन भी किया और भक्तिन रसिक बिहारी ने सांझी पर कई मार्मिक पदों की रचना की। सांझी का एक पद आपके अवलोकनार्थ उद्धृत है जिसमें गोपियों के सज धजकर सांझी खेलने का मनोरम वर्णन किया गया है और प्रियतम कृष्ण की मनोदशा का भी यथार्थ चित्रण हुआ है जो गोपियों का रूप निहार कर ठगे से रह जाते हैं – 

“खेले सांझी साँझ प्यारी|

गोप कुंवरि साथणी लियां सांचे चाव सों चतुर सिंगारी||

फूल भरी फिरें फूल लेण ज्यौ भूल री फुलवारी|

रहया ठग्या लखि रूप लालची प्रियतम रसिक बिहारी||”

रसिक बिहारी का ब्रज, राजस्थानी और पंजाबी भाषा पर समान अधिकार था। पंजाबी में रचित एक वियोग का पद देखिए जिसमें बिछड़े जोड़ों को आपस में मिला देने को उन्होंने सबाब का काम अर्थात पुण्य कार्य कहा है-

“बहि सौंहना मोहन यार फूल है गुलाब दा| 

रंग रंगीला अरु चटकीला गुल होय न कोई जबाब दा|

उस बिन भंवरे ज्यों भव दाहें यह दिल मुज बेताब| 

कोई मिलावै रसिक बिहारी नू है यह काम सबाब दा || “

रसिक बिहारी की कविताओं में ब्रज की लोक संस्कृति का भी जीवंत चित्रण मिलता है। रसखान की ही भांति वह उस स्थान विशेष से भी प्रेम करती थीं जो उनके आराध्य राधा कृष्ण की क्रीड़ा स्थली रही थी इसीलिए उन्होंने ब्रज के लोक समारोहों और उत्सवों को भी अपनी कविताओं में कुशलता से उतारा है। ब्रज की होली का एक मनभावन दृश्य उनके पद में साकार हो उठा है-

” होरी होरी कहि बोले सब ब्रज की नारि । 

 

नन्द गाँव बरसानो हिलि मिलि गावत इत उत रस की गारि । 

 

उड़त गुलाल अरूण भयो अम्बर चलत रंग पिचकारि कि धारि। 

 

रसिक विहारी भानु-दुलारी नायक संग खेलें खेलवारि ।”

रसिक बिहारी एक उच्च कोटि की कवयित्री थी। उनकी कविताओं में प्रेम, शृंगार, भक्ति और लोक-संस्कृति, इन सभी का सुंदर निदर्शन मिलता है। कवयित्री होने के साथ ही वह अत्यंत रूपवती और गुणवंत नारी भी थीं जिनका कला और कविता के इतिहास में अक्षुण्ण स्थान है। वह एक समर्पित प्रेमिका और एकनिष्ठ भक्त भी थीं। उनके द्वारा रचित भक्ति का एक पद आपके साथ साझा करते हुए मैं आज की बात समाप्त करूंगी। उद्धृत पद में भक्त के ह्रदय की बेबाकी को अभिव्यक्ति मिली है जो प्रेम और भक्ति के लिए दुनिया वालों की परवाह नहीं करता और भक्ति के अथाह सागर में डूबकर ही आनंद की प्राप्ति करता है-

“मैं अपनो मन-भावन लीनौं, इन लोगन को कहा न कीनौं।

मन दै मोल लयौ री सजनी, रतन अमोलक नन्ददुलारे॥

नवल लाल रंग भीनो।

कहा भयो सब के मुख मोरे, मैं पायो पीव प्रबीनौं।

 ‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ॥”

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया पर्यावरण दिवस

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में गत 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया गया। इस अवसर पर स्कूल की पाँचवीं कक्षा की छात्राओं ने पर्यावरण संरक्षण का सन्देश विभिन्न सृजनात्मक माध्यमों से दिया। छात्राओं ने अपने आहार से जुड़ी आदतों को बदलने, शहरों को हरा – भरा बनाने और अधिक पेड़ लगाने का प्रण लिया। सभी गतिविधियाँ यूएन के स्थायी विकास से जुड़े उद्देश्य से नजदीकी से जुड़े थे जिनमें कार्बन उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य भी शामिल है।

सुरधारा – लोकगीत संध्या

विश्व संगीत दिवस के अवसर पर गत 21 जून 2021 को आयोजित संगीत संध्या की झलक

प्रकृति

पर्यावरण दिवस पर आयोजित कार्यक्रम. 5 से 10 जून तक चला, उत्सव की झांकी