नयीदिल्ली : अगर आपने कोविड का टीका लगवा लिया है तो आपका प्रमाणपत्र आपके फोन पर आ जायेगा। दरअसल, अपना कोविड टीका प्रमाण पत्र कुछ सेकेंड के अंदर ही व्हाट्सएप से प्राप्त कर सकते हैं। फिलहाल लोगों को अपना टीकाकरण प्रमाण पत्र कोविन पोर्टल पर लॉग-इन कर डाउनलोड करना होता है।
मांडविया के कार्यालय ने ट्वीट किया, ”प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर आम आदमी के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाया जा रहा है। अब कोविड-19 टीकाकरण प्रमाण पत्र तीन आसान चरणों में ‘माईगोव कोरोना हेल्पडेस्क’ से प्राप्त करें। संपर्क नंबर +91 9013151515 को सेव करें। व्हाट्सएप पर ‘कोविड सर्टिफिकेट’ टाइप कर भेजें। ओटीपी प्रविष्ट करें। अपना प्रमाण पत्र कुछ सेकेंड के अंदर हासिल करें।” रविवार को जारी एक अस्थायी रिपोर्ट के मुताबिक देश में लोगों को कोविड-19 के कुल 50,68,10,492 टीके लग चुके हैं और इनमें से 55,91,657 खुराक एक दिन में दी गयी है।
गूगल ने गत 8 अगस्त रविवार को सरला ठकराल को उनके 107वें जन्मदिन पर डूडल बनाकर याद किया। सरला देश की पहली महिला पायलट थीं। इस डूडल में एक महिला को दिखाया गया है। वह हवाई जहाज उड़ाती दिख रही है। इस डूडल का डिजाइन वृंदा जवेरी ने बनाया है। ठकराल एविएशन सेक्टर में करियर बनाने वाली महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत रही हैं। यही कारण है कि अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनी ने उनके सम्मान में डूडल बनाने का फैसला लिया। सरला का जन्म 8 अगस्त, 1914 को दिल्ली में हुआ था। बाद में वह लाहौर में शिफ्ट हो गयी थीं। 1936 में 21 साल की उम्र में उन्हें एविएशन पायलट लाइसेंस मिल गया था। वह शानदार पायलट होने के साथ बेहतरीन डिजाइनर और उद्यमी भी थीं। उनके पति पीडी शर्मा एयरमेल पायलट थे। बताया जाता है कि उनकी ससुराल में करीब 9 लोग हवाई जहाज उड़ा लेते थे। उन्हीं से सरला को पायलट बनने की प्रेरणा मिली। 21 साल की उम्र में सरला ने जिप्सी मॉथ नाम का दो सीटर एयरक्राफ्ट उड़ाया था। इस दौरान उन्होंने पारंपरिक साड़ी पहन रखी थी। थी। जोधपुर फ्लाइंग क्लब में उन्होंने विमान उड़ाने की ट्रेनिंग ली थी। 16 साल की उम्र में पीडी शर्मा से सरला की शादी हुई थी। पायलट बनने में सरला को पति का भरपूर सहयोग मिला।
बनी अखबारों की सुर्खियां
लाहौर फ्लाइंग क्लब की छात्रा के तौर पर सरला ने 1,000 घंटे की उड़ान भरकर ‘ए’ लाइसेंस प्राप्त किया। यह उपलब्धि भी हासिल करने वाली वह पहली भारतीय महिला थीं। जल्द ही वह तमाम अखबारों की सुर्खियां बनने लगीं। इसके बाद वह कमर्शियल पायलट बनने की तैयारियों में जुट गईं। हालांकि, 1939 में सरला की जिंदगी में अचानक बड़ा तूफान आया। विमान क्रैश में उनके पति की मौत हो गयी । वहीं, उसी साल दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया। इसके चलते सरला को अपनी ट्रेनिंग रोकनी पड़ी। बाद में उन्होंने लाहौर (पाकिस्तान) के मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (अब नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स) में फाइन आर्ट्स और पेंटिंग की शिक्षा ली।
उद्यमी के तौर पर बनाई पहचान
कुछ साल बाद वह अपने गृहनगर दिल्ली लौट आईं। अपनी दो बेटियों के साथ फिर वह राजधानी में ही रहने लगीं। इस दौरान उन्होंने पेंटिंग जारी रखी। साथ ही ज्वेलरी और क्लोदिंग डिजाइनिंग में शानदार करियर बनाया। उनके क्लाइंटों में पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित जैसी हस्तियां शामिल थीं। 2008 में 91 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था। गूगल ने बताया कि ठकराल की उपलब्धियां भारतीय महिलाओं को प्रेरणा देने वाली हैं। उन्होंने दिखाया है कि अपने सपनों को हकीकत में कैसे बदला जा सकता है।
भुवनेश्वर : टाटा स्टील बीएसएल लिमिटेड ने कोक अवन अपशिष्ट जल में साइनाइड के शोधन के लिए ओडिशा के ढेंकनाल जिले में अपने प्रतिष्ठान में इस्पात उद्योग में “दुनिया का पहला” अल्ट्रावाइलेट (यूवी) ऑक्सीकरण संयंत्र स्थापित किया है। साइनाइड एक घातक प्रदूषक है।
कंपनी ने एक विज्ञप्ति में कहा कि यूवी ऑक्सीकरण इकाई की स्थापना मूल कंपनी टाटा स्टील की अनुसंधान एवं विकास टीम के सहयोग से की गयी है। इस्पात कंपनी ने कहा कि कोक अवन अपशिष्ट जल में साइनाइड के शोधन की पारंपरिक विधि को ठोस गाद पृथक्करण प्रौद्योगिकी कहा जाता है। इसमें कहा गया कि यूवी ऑक्सीकरण प्रौद्योगिकी से नरेंद्रपुर संयंत्र में प्रति घंटे 80 घनमीटर अपशिष्ट जल के शोधन की क्षमता के साथ इस समस्या का समाधान करने में मदद मिलेगी। टाटा स्टील बीएसएल के मुख्य परिचालन अधिकारी सुबोध पांडे ने कहा, “साइनाइड से निपटने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक इसे ऑक्सीकरण द्वारा पूरी तरह से नष्ट करना है।” उन्होंने कहा कि यूवी ऑक्सीकरण संयंत्र से कंपनी को यह उद्देश्य हासिल करने में मदद मिलेगी। टाटा स्टील बीएसएल पूर्व में भूषण स्टील लिमिटेड के तौर पर जानी जाती थी।
वाशिंगटन : रोजगार आधारित करीब एक लाख ग्रीन कार्ड के दो महीने के भीतर बर्बाद होने का खतरा है जिससे भारतीय आईटी पेशेवरों में नाराजगी है जिनका वैध स्थायी निवास का इंतजार अब दशकों तक के लिए बढ़ गया है।
आधिकारिक तौर पर स्थायी निवास कार्ड के तौर पर जाने जाना वाला ग्रीन कार्ड आव्रजकों को साक्ष्य के तौर पर जारी एक दस्तावेज है कि धारक को अमेरिका में स्थायी रूप से निवास करने की सुविधा दी गई है।
भारतीय पेशेवर संदीप पवार ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि इस साल आव्रजकों के लिए रोजगार आधारित कोटा 2,61,500 है जो 1,40,000 के सामान्य तौर पर कोटा से काफी ज्यादा है। उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से, कानून के तहत, अगर ये वीजा 30 सितंबर तक जारी नहीं किए जाते, तो ये हमेशा के लिए बर्बाद हो जाते हैं।”
उन्होंने कहा कि अमेरिकी नागरिकता एवं आव्रजन सेवा या यूएससीआईएस द्वारा वीजा प्रक्रिया की मौजूदा गति दिखाती है कि वे 1,00,000 से ज्यादा ग्रीन कार्ड बेकार कर देंगे। इस तथ्य की वीजा उपयोग निर्धारित करने वाले विदेश मंत्रालय के प्रभारी ने हाल में पुष्टि भी की थी। पवार ने खेद जताया कि अगर यूएससीआईएस या बाइडन प्रशासन कोई कदम नहीं उठाता तो इस साल उपलब्ध अतिरिक्त 1,00,000 ग्रीन कार्ड बर्बाद हो जाएंगे।
इस संबंध में पूछे गए प्रश्नों पर व्हाइट हाउस ने कोई जवाब नहीं दिया। इस बीच, अमेरिका में रह रहे 125 भारतीयों एवं चीनी नागरिकों ने प्रशासन द्वारा ग्रीन कार्ड बर्बाद होने से रोकने के लिए एक मुकदमा दायर किया है।
पवार ने कहा, “अधिकतर संभावित लाभार्थी, जैसे कि मैं, भारत से हैं, एक ऐसा देश जो स्वाभाविक रूप से नस्लवादी और भेदभावपूर्ण प्रति-देश कोटा के कारण सबसे पीछे है। कई के जीवनसाथी भी यहां हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं, जो स्थायी निवासी बनने तक काम करने में असमर्थ हैं।” उन्होंने कहा, “कई के बच्चे हैं जिनकी आश्रित की श्रेणी में आने वाली उम्र पार होने वाली है और उन्हें खुद से देश छोड़कर जाने पर मजबूर होना पड़ेगा जबकि वे सिर्फ इसी देश को जानते हैं। अगर ये ग्रीन कार्ड जारी नहीं किए जाते तो नुकसान अथाह एवं अपूर्णीय है।”
इम्पैक्ट के कार्यकारी निदेशक नील मखीजा, जिन्होंने राष्ट्रपति जो बाइडन से एक प्रतिनिधिमंडल के हिस्से के रूप में मुलाकात की थी, ने कहा कि उन्होंने बाइडन से ग्रीन कार्ड सीमा और कोटा को समाप्त करके आव्रजन कानूनों में सुधार करने और सभी ‘ड्रीमर्स’ की सुरक्षा के प्रयासों के तहत लंबी अवधि के वीजा धारकों के 2,00,000 बच्चों को शामिल करने का आग्रह किया।
‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ में एक लेख में, काटो इंस्टीट्यूट में शोधार्थी डेविड जे बियर ने आरोप लगाया कि ग्रीन कार्डों की बर्बादी के लिए बाइडन प्रशासन जिम्मेदार है।
नयी दिल्ली : भारत के सर्वोच्च खेल सम्मान खेल रत्न पुरस्कार का नाम अब राजीव गांधी खेल रत्न नहीं बल्कि मेजर ध्यानचंद खे रत्न होगा । भारतीय हॉकी टीमों के तोक्यो ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन के बाद इस सम्मान का नाम महान हॉकी खिलाड़ी के नाम पर रखने का फैसला लिया गया ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा करते हुए कहा कि उन्हें देशवासियों के अनुरोध मिल रहे हैं कि खेल रत्न पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद के नाम पर रखा जाये ।
मोदी ने ट्वीट किया ,‘‘ देश को गर्वित कर देने वाले पलों के बीच अनेक देशवासियों का ये आग्रह भी सामने आया है कि खेल रत्न पुरस्कार का नाम मेजर ध्यानचंद जी को समर्पित किया जाये। लोगों की भावनाओं को देखते हुए, इसका नाम अब मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार किया जा रहा है। ’’प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि तोक्यो ओलंपिक में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों के प्रदर्शन ने पूरे देश को रोमांचित किया है । उन्होंने कहा कि अब हॉकी में लोगों की दिलचस्पी फिर से बढ़ी है जो आने वाले समय के लिये सकारात्मक संकेत है । खेल रत्न सम्मान के तहत 25 लाख रुपये नकद पुरस्कार दिया जाता है।
तोक्यो : भारत ने 7 पदक जीतते हुए तोक्यो ओलिंपिक में इतिहास रच दिया है। वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने भारत की तोक्यो ओलिंपिक में शुरुआत रजत पदक से कराई थी तो जेवलिन थ्रो ऐथलीट नीरज ने सुनहरा समापन किया। वह भारतीय ऐथलेटिक इतिहास में पहला मेडल जीतने वाले खिलाड़ी बने। यह भारत का तोक्यो में 7वां पदक रहा। इसके साथ ही भारत ने अपने लंदन ओलिंपिक-2012 के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 6 पदकों को पीछे छोड़ दिया।
नीरज और मीराबाई के अलावा रवि कुमार दहिया ने रजत पदक जीता तो बॉक्सर लवलीना, शटलर पीवी सिंधु, पहलवान बजरंग पूनिया और हॉकी टीम ने कांस्य पदक अपने नाम किया। आइए देखें किस खेल में भारत को मिला मेडल…
1. वेटलिफ्टरमीराबाईचानू : मणिपुर की 26 वर्षीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने तोक्यो ओलिंपिक में भारत के लिए पहला रजत पदक जीता। उन्होंने महिलाओं के 49 किग्रा में 202 किग्रा (87 किग्रा + 115 किग्रा) भार उठाकर रजत अपने नाम किया।
2. बॉक्सर लवलीनाबोरगोहेन: भारत की स्टार मुक्केबाज लवलीना बोर्गोहेन को महिला वेल्टरवेट वर्ग (69 किग्रा) के सेमीफाइनल में तुर्की की मौजूदा विश्व चैंपियन बुसेनाज सुरमेनेली के खिलाफ शिकस्त के साथ कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा।
3. शटलरपीवीसिंधु: सिंधु ने महिला बैडमिंटन के सिंगल्स का कांस्य पदक अपने नाम किया। उन्होंने चीन की ही बिंग जियाओ को 2-0 से हराया था। यह उनका ओलिंपिक में रेकॉर्ड दूसरा पदक रहा।
4. पहलवानरविदहिया: भारत के पहलवान रवि कुमार दहिया को पुरुष फ्रीस्टाइल 57 किग्रा भार वर्ग के फाइनल मुकाबले में रूस ओलंपिक समिति (आरओसी) के जायूर उगयेव के हाथों 4-7 से हार का सामना कर रजत पदक से संतोष करना पड़ा।
5. पुरुषहॉकीटीम: भारत की पुरुष हॉकी टीम ने जर्मनी को 5-4 से हराकर ऐतिहासिक कांस्य पदक अपने नाम किया। 1980 के बाद यह पहला मौका था जब भारत ने हॉकी में पदक जीता है।
6. पहलवान बजरंग पूनिया: पूनिया ने पुरुषों के फ्री स्टाइल 65 किलो वर्ग कुश्ती स्पर्द्धा का कांस्य पदक जीतते हुए इतिहास रच दिया। उन्होंने कजाखस्तान के डाउलेट नियाजबेकोव को 8-0 से एकतरफा हराया। इसके साथ ही भारत के पदकों की संख्या 6 हो गयी है, जो लंदन ओलिंपिक-2012 के कराबर है।
7. जेवलिन थ्रो एथलीट नीरजचोपड़ा: भाला फेंक ऐथलीट नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। वह देश के लिए व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाले दूसरे खिलाड़ी और पहले ऐथलीट हैं।
मॉस्को : साइबेरिया की बर्फ में जमी हुए अवस्था में पाए गए एक पूरी तरफ से संरक्षित शेर के शावक की पुष्टि ‘मादा’ के रूप में हुई है, जिसकी मौत करीब 28,000 साल पहले हो गई थी। जीवों से जुड़े एक नए अध्ययन में इसकी जानकारी दी गई। यह अब तक पाए गए सबसे अच्छी तरह संरक्षित हिमयुग के जानवरों में से एक है। सेंटर फॉर पैलियोजेनेटिक्स, स्टॉकहोम, स्वीडन की टीम ने इसका नाम स्पार्टा (Sparta) रखा है। अभी भी पहले जैसे दांत और त्वचा
रिसर्च के मुताबिक मादा शावक की मौत के समय उसकी उम्र दो महीने से भी कम थी। वह गोल्डेन फर से ढकी हुई पाई गई। मादा शावक के दांत, त्वचा और मूछें अभी भी बरकरार हैं। इसको पर्माफ्रॉस्ट में संरक्षित किया गया था, जो जमीन पर या उसके नीचे ऐसी सतह होती है जहां का तापमान लगातार शू्न्य डिग्री सेल्सियस से कम रहता है। यह दो विलुप्त हो चुके ‘बिग कैट’ शावकों में से एक थी, जिसे सेम्युल्याख नदी के तट पर मैमथ टस्क हंटर्स ने खोजा था। दूसरा शावक 43,448 साल पुराना
अनुमान था कि यह दोनों शावक भाई-बहन थे क्योंकि वे सिर्फ 49 फीट दूर पाए गए थे। रिसर्च में सामने आया है कि स्पार्टा दूसरे शावक की तुलना में 15,000 साल बाद जीवित थी। रेडियो कार्बन डेटिंग के अनुसार, बोरिस नाम के दूसरे शावक की उम्र ज्यादा है और वह 43,448 साल का है। जब उसकी मौत हुई तो उसकी उम्र भी एक-दो महीने के बीच की थी। रूस और जापानी वैज्ञानिकों की जांच में इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि उन्हें किसी शिकारी ने मारा था। हादसे का शिकार हुए शावक
टीम ने कहा कि स्कैन में उनकी खोपड़ी और पसलियों की चोट दूसरी संभावनाओं की ओर इशारा करती है। शोधकर्ता लव डेलन ने कहा कि शायद वे किसी मडस्लाइड में मर गए होंगे या पर्माफ्रॉस्ट किसी दरार में गिर गए होंगे। 2017 और 2018 के बीच पूर्वी साइबेरिया में उनकी खोज की गयी थी।
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में मल्लावां क्षेत्र में सुनासीर नाथ मंदिर है। माना जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग की स्थापना सतयुग में देवराज इंद्र ने की थी। वैसे तो पूरे वर्ष यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन सावन महीने में यहां देश-विदेश से भी लोग पूजा-अर्चना करने आते हैं। पूर्व में इस मंदिर में सोने के कलश, दरवाजे और जमीन पर गिन्नियां जड़ी थीं, लेकिन 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस मंदिर का सोना लूट लिया और शिवलिंग पर आरी चलवाकर इसे काटने की कोशिश भी की, लेकिन नाकाम रहा, उसकी बर्बरता का सबूत आज भी मौजूद है। मल्लावां कस्बे से तीन किलोमीटर दूर इस मंदिर के विषय में पुजारी राम गोविंद मिश्र बताते हैं कि यहां के शिवलिंग की स्थापना इंद्र देव ने की थी। 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने मंदिर में जड़ा सोना लूटने के लिए यहां आक्रमण किया था। गौराखेड़ा के शूरवीरों ने किया डटकर मुकाबला
औरंगजेब की सेना की भनक जैसे ही क्षेत्र के गौराखेड़ा के लोगों को लगी तो वहां के शूरवीरों मुगल बादशाह की फौज के आगे चट्टान की तरह खड़े हो गए। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। जिसमें सैकड़ों सैनिक मारे गए। मुगल बादशाह की भारी फौज के आगे गौराखेड़ा के शूरवीर ज्यादा देर नहीं टिक पाए और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, इसके बाद मुगल सेना को मढ़िया के गोस्वामियों ने भी चुनौती दी, लेकिन उनको भी हार झेलनी पड़ी। मंदिर का सोना लूट लिया
मुगल बादशाह के सैनिक मंदिर के अंदर पहुंचकर मंदिर को लूटने लगे। मंदिर में लगे दो सोने के कलश, फर्श में जड़ी सोने की गिन्नियां और सोने के घंटे व दरवाजे सब लूट लिए। इसके बाद मुगल बादशाह ने मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया। सैनिकों ने मंदिर को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। इसके बाद सैनिक शिवलिंग को खोदने लगे और जब वह इसमें सफल नहीं हुए तो शिवलिंग पर आरी चलाकर काटने की कोशिश की। शिवलिंग से निकली बर्रैयों ने किया हमला
बताते हैं कि जब शिवलिंग पर सैनिकों ने आरी चालाई तो पहले शिवलिंग से दूध की धारा बाहर निकली और फिर असंख्य बर्रैया और ततैया निकल आईं। उन्होंने मुगल बादशाह की फ़ौज पर हमला बोल दिया। जिसके बाद सैनिक भाग खड़े हुए। बरैया और ततैयों ने शुक्लापुर गांव तक फ़ौज का पीछा किया। तब जाकर बादशाह और सैनिकों के प्राण बचे। शिवलिंग पर आरे का निशान आज भी देखा जा सकता है। (साभार – नवभारत टाइम्स)
आज भारत पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा रहा है । 1980 के बाद भारत शीर्ष 50 देशों में शामिल हो पाया है। यानी भारत 47वें स्थान पर पहुंच गया है। सोना, चांदी और कांस्य मिलाकर भारत ने 7 पदक हासिल किए है। इस बार 128 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था।
गोल्डन ब्वॉय नीरज चोपड़ा ने भाला फेंक प्रतियोगिता में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया है। इस प्रतियोगिता में स्वर्ण जीतकर वो दूसरे एशियाई खिलाड़ी बन गए हैं। वहीं बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु 2 ओलंपिक पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी हैं।
इस बार हॉकी और भारोत्तालन में भी भारत का शानदार प्रदर्शन रहा। कोविड परिस्थिति में ओलंपिक्स गेम्स को लेकर अनिश्चितता थी लेकिन बावजूद इस बार टोक्यो में ओलंपिक्स गेम्स सफल रहा। भारत के अच्छे प्रदर्शन के बाद भारतीय एथलीट्स की आर्थिक मदद को लेकर ट्विटर पर लोग मुखर हो रहे हैं।
दरअसल, ओलंपिक्स गेम्स के दौरान ही कई तरह की खबरें हमारे कुछ एथलीट्स को लेकर सामने आई है। इन एथलीट्स ने आर्थिक तंगी में आकर खेलना छोड़ दिया। हालांकि इनमें महिला वेट लिफ्टर मीराबाई चानू अपवाद है जिन्होंने आर्थिक तंगी में भी खुद को संभाला।
हालांकि, वहीं कई एथलीट्स जिनमें कोई बॉक्सर तो कोई वेट लिफ्टर , इसके अलावा भी अन्य खेल से संबद्ध खिलाड़ियों ने तंगी से परेशान होकर इन खेलों से मुंह मोड़ लिया। इसका कारण है कि महंगे कोच का खर्च ये खिलाड़ी उठा नहीं पाते हैं।। इनमें से कईयों को खेतों में मजदूरी करते हुए देखा जा रहा है तो कुछ को पार्किंग की जगह में काम करते हुए।
अगर ये खिलाड़ी निरंतर अपनी ट्रेनिंग लेते तो शायद इनका भविष्य कुछ और होता। ये खिलाड़ी भी ओलंपिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर पाते और भारत के लिए और ज्यादा पदक ला पाते। इतिहास गवाह है कि भारत में जितना ध्यान और महत्व क्रिकेट को मिलता है. उतना तो हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी को नहीं मिलता है।
भारत आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है। अगर, हमारी सरकार इन खिलाड़ियों को लेकर गंभीरता से सोचे और उनकी आर्थिक मदद की व्यवस्था करें तो शायद भारत भी अमरीका और चीन को टक्कर दे सके। अमरीका और चीन में एथलीट्स को हर संभव मदद सरकार द्वारा की जाती है। तभी दोनों देश के खिलाड़ी आज शिखर पर हैं।
मीराबाई चानू
शूटर दादी ने ट्विटर पर खिलाड़ियों को आर्थिक मदद के लिए लगाई गुहार
शूटर दादी प्रकाशी तोमर ने ट्वीट कर उन खिलाड़ियों के लिए आवाज उठाई जो आर्थिक तंगी के कारण खेल को छोड़ने के लिए बाध्य होते हैं। दादी प्रकाशी तोमर ने ट्वीट किया, “मुझे लगता है जितना खिलाड़ियों को पदक जीतने के बाद दिया जाता है, उसका एक चौथाई हिस्सा उनकी तैयारी के लिए पहले दिया जाए तो हमारे देश में ज्यादा पदक आ सकते हैं।
बता दें कि पदक जीतने के बाद खिलाड़ियों को उनकी राज्य सरकार की तरफ से करोड़ों रुपये दिए गए हैं। केंद्र सरकार भी उन्हें पुरस्कार दे रही है। दूसरी तरफ, शूटर दादी की ट्वीट पर लोगों ने भी कॉमेंट कर अपनी सहमति जताई है। अब देखना ये है कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है।
अमरीका ने इस बार भी मारी बाजी, चीन दूसरे नंबर पर
इस बार भी अमरीका ने ओलंपिक्स में अपना डंका बजाया है। अमरीका ने इस बार 113 पदक हासिल किये है तो चीन ने 88 पदक बटोरे हैं। बता दें कि टोक्यो ओलंपिक्स में इस बार 11000 एथलीट्स ने हिस्सा लिया था। इस बार 340 स्वर्ण पदक गए और 338 रजत पदक जीते गए। वहीं खिलाड़ियों ने 402 कांस्य पदक जीते हैं। बताया जा रहा है कि अगले ओलंपिक्स गेम्स की मेजबानी पेरिस करेगा। 2024 में ओलंपिक्स गेम्स पेरिस में आयोजित ।
वो पहली मुलाक़ात
आज भी याद है मुझे
अजनबी थे हम दोनों
एक दूसरे के लिए
फिर भी हमारी
पहली मुलाक़ात हुईं।
बहुत लम्बा सफर था
जो तय किया था हमने
सोशल मीडिया पर हुईं
उस पहली बात से लेकर
पहली मुलाक़ात तक का।
दूरियाँ तो बहुत थी हमारे बीच
पर उन दूरियों को कम किया
उस पहली मुलाक़ात ने,
बढ़ा दी थीं मेरी धड़कनें
मैं कल्पनाओं के जाल से
हकीकत में आ रही थी
वो पहली बार था,
ज़ब आमने सामने थे हम
चुप मैं भी थे
नजरें मेरी झुकी थी तो
पलके तुम भी नहीं उठा पाए थे
बस चुप चाप बेचैन दिलों की
धड़कनें महसूस कर रहे थे हम
तुम्हारें अंदर के उमड़तें
हर जज़्बात को
समझ रहे थे हम, यूं कहें कि
इश्क़ को नजदीक से
समझ रहे थे हम
तुम्हारी हर बातों को धीरे से
दिल में बसा रहे थे हम।।
*कुछ परेशान सी हो रही थी मैं
लग रहा था जैसे ये कोई ख्वाब था,
क्या कहूंगी तुमसे और
ना जाने क्या- क्या बातें होंगी
डर भी था एक, कि क्या कभी
फिर मुलाक़ात होंगी या पहली
मुलाक़ात बस आखरी होंगी,
पर जो भी होगा, जैसे भी होगा
मेरी जिंदगी के एक पन्ने पर तेरा
जिक्र होगा, लिखूंगी तुझपर
लिखती ही रहूँगी, सालो बाद
ज़ब हम साथ होंगे……
इन लम्हों को याद कर होठों
पर हसीं और आँखों में नमी होंगी।
शाम के 6 बज बज रहे थे
दिसंबर की सर्दी
और ब्रिज के ऊपर हमदोनों
और साथ ही साथ तुम्हारी प्यारी बातें
बातों ही बातों में
वो लम्हा गुजर गया था
ऐसा लगता था जैसे,
बहुत कुछ रह गया था।
उस पहली मुलाक़ात का
हर पल बेहद ख़ास था
हाय!
वह पहली मुलाक़ात जिसमें
अलग सी बात थी,
झिझकती नज़रें और
काँपते हुए हाथ
धड़कनोंं की बढ़ रही थी रफ़्तार
फिर भी ये नज़रें देखने के लिए
उनको हो रही थे बेक़रार
यूं तो कुछ पल ही साथ थे हम
पर उस पल से
आज हर पल साथ है हम
मेरी पहली मुलाक़ात !