Thursday, April 30, 2026
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भारतीय महिलाओं के लिए आसान नहीं रहा क्रिकेट विश्व विजेता बनने का सफर

भारत ने अपना पहला महिला क्रिकेट विश्व कप साल 1978 में खेला। साल 1979 से अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर भारतीय महिला टीम ने नियमित रूप से क्रिकेट खेलना शुरू किया। डब्लूसीएआई ने यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी ली कि भारत में लड़कियों के लिए अधिक से अधिक क्रिकेट मैच आयोजित किए जाएं। हालांकि समस्या यह थी कि डब्लूसीएआई एक स्व-वित्तपोषित संस्था थी जो महिला टीम की देखरेख कर रही थी। इसलिए, साल 1986 से 1991 के बीच भारतीय महिला टीम ने एक भी अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेला क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे। भारत के पहली विश्व कप में निराशाजनक प्रदर्शन के 19 साल बाद साल 1997 में एक और महिला विश्व कप आयोजित हुआ जिसकी मेज़बानी भारत ने की। इसे हीरो होंडा महिला विश्व कप 1997 भी कहा जाता है। भारत ने इस विश्व कप में सेमी फाइनल तक अपनी जगह बनाई। उस समय महिला टीम की हालत उतनी अच्छी नहीं थी। जितनी कि होनी चाहिए थी। भले ही टीम सेमीफाइनल तक पहुंची लेकिन कोई भी व्यक्ति साइट स्क्रीन को हिलाने के लिए मौजूद नहीं था। साल 1998 से 2002 के बीच का समय भारतीय महिला क्रिकेट के लिए बहुत खास था। इस दौर में कई घरेलू टूर्नामेंट भी आयोजित किए गए। उदाहरण के लिए 1999 में एक अंतर-क्षेत्रीय टूर्नामेंट रानी झांसी टूर्नामेंट खेला गया। जिसमें कुल छह टीमों ने हिस्सा लिया और कुल 15 मैच खेले गए।
भारत ने अपना पहला महिला क्रिकेट विश्व कप 1978 में खेला। साल 1978 के विश्व कप के बाद से भारतीय महिला टीम के लिए परिस्थितियां धीरे-धीरे बेहतर होने लगीं। साल 1979 से भारतीय महिला टीम ने नियमित रूप से क्रिकेट खेलना शुरू किया न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बल्कि घरेलू स्तर पर भी। साल 2003 से 2006 का समय भारत में महिला क्रिकेट के लिए मुश्किलों से भरा था। इसी समय एशिया कप की शुरुआत भी हुई। साल 2004 में खेले गए पहले एशिया कप में केवल दो टीमों भारत और श्रीलंका ने हिस्सा लिया और भारत ने श्रीलंका को 5-0 से हराया। वहीं, साल 2005 में भारत ने पहली बार महिला क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में प्रवेश किया। इस समय तक आईसीसी महिला क्रिकेट की ज़िम्मेदारी नहीं संभालता था, बल्कि आईडब्ल्यूसीसी नामक एक अलग संस्था थी जो महिला क्रिकेट टूर्नामेंट्स का संचालन करती थी।


हालांकि साल 2005 में आईडब्ल्यूसीसी का आईसीसी के साथ मर्ज हो गया और आईसीसी ने दुनिया भर के क्रिकेट बोर्ड्स से भी ऐसा ही करने को कहा यानि महिला और पुरुष क्रिकेट के बोर्ड्स का एकीकरण। उस समय का वुमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया उन अंतिम प्रमुख बोर्ड्स में से एक था जिसने खुद को आईसीसी से जोड़ा। इन उपलब्धियों के पीछे के संघर्ष को देखें तो टीम के लिए शुरुआती दिन काफी मुश्किलों से भरे थे । 2004 में खेले गए पहले एशिया कप में केवल दो टीमों भारत और श्रीलंका ने हिस्सा लिया और भारत ने श्रीलंका को 5-0 से हराया। 2005 में भारत ने पहली बार महिला क्रिकेट विश्व कप के फाइनल में प्रवेश किया। 2005 तक का समय महिला क्रिकेट के लिए एक दिलचस्प दौर था न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में।
नवंबर 2006 में डबल्यूसीआई को बीसीसीआई में शामिल कर लिया गया और तभी से बीसीसीआई भारत में महिला क्रिकेट का केंद्रीय संचालन बोर्ड बन गया। हालांकि यह प्रक्रिया बिल्कुल भी आसान नहीं थी। बीसीसीआई ने इस एकीकरण का काफी विरोध किया। आईसीसी की कई चेतावनियों के बाद जाकर बीसीसीआई ने डब्ल्यूसीआई को स्वीकार किया। बीसीसीआई के इस विरोध को हम बीबीसी की रिपोर्ट में प्रकाशित भारत की पूर्व कप्तान डायना एडुलजी के एक बयान से समझ सकते हैं, वह बताती हैं कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड के एक चुने हुए अध्यक्ष ने उनसे कहा था कि अगर मेरा बस चलता तो मैं महिला क्रिकेट होने ही नहीं देता। डब्ल्यूसीआई के संचालन में विकसित हो रही महिला क्रिकेट टीम, बीसीसीआई के अंतर्गत इंग्लैंड में टेस्ट मैच खेला। इस टेस्ट मैच में भारत ने इंगलेंड को हराकर टेस्ट मैच जीता। एशिया कप में भारत की लगातार जीतों के अलावा देखा जाए तो कुछ प्रदर्शन बहुत अच्छे नहीं रहे और इसके लिए काफी हद तक बीसीसीआई को दोषी ठहराया जा सकता है। इसका एक बड़ा कारण यह था कि उस समय महिला टीम को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम मैच खेलने दिए जाते थे। बीसीसीआई महिला क्रिकेट के विकास को लेकर बहुत गंभीर नहीं था। इसके बाबजूद भारतीय महिला क्रिकेट टीम को एक बार फिर इंग्लैंड जाने का मौका मिला और वहां साल 2014 में खेले गए एकमात्र टेस्ट मैच में इंग्लैंड को हरा दिया। इस टेस्ट में इंग्लैंड की पहली पारी को सिर्फ 92 रनों पर समेट दिया गया और भारत ने 6 विकेट से जीत हासिल की। यह जीत कई मायनों में ऐतिहासिक थी क्योंकि उस मैच में भारत की ओर से खेलने वाली 11 खिलाड़ियों में से 8 का यह पहला टेस्ट मैच था। बीसीसीआई के साथ होकर इस नए दौर में भी, महिला क्रिकेट में बहुत सी असमानताएं थी जैसे कि महिला क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों को पुरुष खिलाड़ियों के स्पॉन्सर के बनाए गए ड्रेस में से बाक़ी बचे कपड़ों में खेलना होता था। साल 2015 में पहली बार बीसीसीआई ने महिला क्रिकेटरों को सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट दिए। यह एक सही दिशा में बड़ा कदम था क्योंकि उससे पहले महिला खिलाड़ी केवल दैनिक भत्ते और मैच फीस पर निर्भर थीं। यह इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि दुनिया के 8 क्रिकेट बोर्डों में भारत ही एकमात्र ऐसा देश था जहां महिलाओं के लिए कोई केंद्रीय वेतन प्रणाली मौजूद नहीं थी। इसी दौर में आज जो नियमित घरेलू टूर्नामेंट हम देखते हैं जैसे सीनियर वुमेन्स ओ डी आई ट्रॉफी और सीनियर वुमेन्स टी -20 ट्रॉफी उनकी शुरुआत हुई। महिला क्रिकेट में स्प्लिट कैप्टेंसी (विभाजित कप्तानी) का भी दौर शुरू हुआ। साल 2016 में भारत ने पहली बार महिला टी-20 विश्व कप की मेज़बानी की और सबसे यादगार वर्ष 2017 रहा खासकर उस विश्व कप का सेमीफाइनल महिला क्रिकेट का अब तक का सबसे ज़्यादा देखा गया फाइनल मैच था। सिर्फ भारत में ही इस वर्ल्ड कप को लगभग 15.6 करोड़ लोगों ने देखा जिससे टीवी व्यूअरशिप में जबरदस्त उछाल आया। इसके बाद वह समय था जब पहली बार टी-20 चैलेंज टूर्नामेंट का आयोजन हुआ और भारत ने साल 2020 के टी-20 विश्व कप में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। इस मैच को एमसीजी में 86,000 लोगों ने देखा जो कि एक रिकॉर्ड था। साल 2017 के वीमेंस वर्ल्ड कप और 2020 के टी-20 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम फ़ाइनल तक पहुंची । इस कामयाबी से भारतीय खिलाड़ियों को और ज़्यादा एक्सपोज़र मिला। भारत की शीर्ष महिला खिलाड़ियों को वीमेंस बिग बैश टूर्नामेंट और इंग्लैंड में के सुपर लीग और वीमेंस हंड्रेड में खेलने का मौक़ा मिला। साल 2022 में भारतीय टीम ने राष्ट्रमंडल खेलों में सिल्वर मेडल जीता। यह एक ऐसा टूर्नामेंट था जिसमें केवल महिला क्रिकेट टीम ने भाग लिया था। यह साल भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ भी था क्योंकि साल 2022 में पुरुषों और महिलाओं की टीमों को समान मैच फीस मिलनी शुरू हुई।

इसरो ने ‘बाहुबली’ रॉकेट अंतरिक्ष में भेजा, नौसेना की तीसरी आंख बनेगा

नयी दिल्ली । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने रविवार को सबसे भारी ‘बाहुबली’ रॉकेट जीसैट-7 लॉन्च करके इतिहास रचा दिया। श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन केंद्र से अंतरिक्ष में भेजा गया यह उपग्रह भारतीय नौसेना के लिए बहुत खास है। स्वदेश में डिजाइन और विकसित इस उपग्रह से न केवल समुद्री इलाकों में संचार सुविधा मिलेगी, बल्कि अंतरिक्ष में नौसेना के लिए तीसरी आंख का काम करेगा। इसरो ने आज शाम को निर्धारित 5.26 बजे अपना अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट सीएमएस-03 देश को जमीन से लॉन्च कर दिया। यह सैटेलाइट 4410 किलो वजन का है और इसे एलवीएम3-एम5 रॉकेट के माध्यम से गेसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में भेजा गया है। यह भारत के लिए एक अहम उपग्रह माना जा रहा है, क्योंकि ऑपरेशन ‘सिंदूर’ जैसे महत्वपूर्ण अभियानों से सीखे गए सबकों को इससे मजबूती मिलेगी। इस उड़ान में भारत का सबसे भारी संचार उपग्रह सीएमएस-03 अंतरिक्ष में भेजा गया है। सीएमएस-03 एक बहु-बैंड संचार उपग्रह है, जो भारतीय भूभाग सहित एक विस्तृत महासागरीय क्षेत्र में सेवाएं प्रदान करेगा। भारतीय नौसेना के मुताबिक यह भारतीय नौसेना का अब तक का सबसे उन्नत संचार उपग्रह होगा। यह उपग्रह नौसेना की अंतरिक्ष आधारित संचार और समुद्री क्षेत्र जागरुकता क्षमताओं को मजबूत करेगा। स्वदेश में डिजाइन और विकसित इस उपग्रह में कई अत्याधुनिक घटक शामिल हैं, जिन्हें विशेष रूप से भारतीय नौसेना की परिचालन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विकसित किया गया है। जटिल होती सुरक्षा चुनौतियों के इस युग में जीसैट-7आर आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलते हुए उन्नत प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग कर राष्ट्र के समुद्री हितों की रक्षा करने के भारतीय नौसेना के अटूट संकल्प का प्रतीक है। नौसेना के मुताबिक जीसैट-7आर उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापक और बेहतर दूरसंचार कवरेज प्रदान करेगा। इसके पेलोड में ऐसे उन्नत ट्रांसपोंडर लगाए गए हैं, जो विभिन्न संचार बैंडों पर ध्वनि, डेटा और वीडियो लिंक को सपोर्ट करने में सक्षम हैं। उच्च क्षमता वाली बैंडविड्थ के साथ यह उपग्रह भारतीय नौसेना के जहाजों, विमानों, पनडुब्बियों और समुद्री संचालन केंद्रों के बीच सुरक्षित, निर्बाध तथा वास्तविक समय संचार को सुनिश्चित करेगा, जिससे नौसेना की सैन्य क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। एलवीएम3 के पिछले मिशन ने चंद्रयान-3 मिशन का प्रक्षेपण किया था, जिसमें भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक उतरने वाला पहला देश बना था।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में   नेक्सस 2025 सम्पन्न

-व्यावसायिक कौशल, रचनात्मकता और समय प्रबंधन पर दो दिवसीय कार्यक्रम
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के भवानीपुर एंटरप्रेन्योरशिप एंड स्टार्ट-अप ट्रेनिंग (बेस्ट) कलेक्टिव ने 13 और 14 अक्टूबर, 2025 को अपने वार्षिक व्यवसाय और प्रबंधन कार्यक्रम, नेक्सस 2025: इंडिपेंडेंस बनाम इंटरडिपेंडेंस की मेजबानी की।  कॉलेज परिसर के जुबली हॉल में उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ ।  इस अवसर पर प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी ने अतिथियों का स्वागत किया, बाद में रेक्टर और छात्र मामलों के डीन, प्रो.दिलीप शाहने एक संक्षिप्त भाषण दिया। उदाहरण देते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि कैसे दुनिया पोकर के खेल की तरह काम करती है, जहां हमें स्वतंत्र रूप से सोचना चाहिए लेकिन परस्पर निर्भर होकर कार्य करना चाहिए। समापन समारोह एक घंटे की ध्वनि के साथ समाप्त हुआ, जो स्टॉक मार्केट में होने वाली ध्वनि के समान है, जो उत्साह और प्रसन्नता के साथ पूरे हॉल में फैल गई।  सार्वजनिक भाषण के अंतर्गत कार्यक्रम के प्रथम दिन कमरा नंबर 530 में आयोजित किया गया था, जिसमें पाँच भाग लेने वाली टीमें थीं, जिनमें से प्रत्येक में 1-2 सदस्य थे। पहले दिन के निर्णायक जेनिफर हेलेन घोष और रौनक अग्रवाल थे। इवेंट के प्रत्येक दौर को मापदंडों के एक अनूठे सेट के साथ स्कोर किया गया और आंका गया। पहले दिन दो-दो सब-राउंड के साथ तीन राउंड आयोजित किए गए। कुछ राउंड में प्रतिभागियों से अपेक्षा की गई कि वे दिए गए संक्षिप्ताक्षरों के पूर्ण रूप लिखें, उन वस्तुओं को पिच करें जिन्हें वे स्पिन व्हील के माध्यम से लाए थे या उनके सामने आए किसी संकट का समाधान करें।
द्वितीय दिन की शुरुआत कॉलेज परिसर के कॉन्सेप्ट हॉल में हुआ जिसमें निर्णायक जय शंकर गोपालन थे। दूसरे दिन, 2 और राउंड आयोजित किए गए जहां प्रतिभागियों को प्रवाह और सामग्री के आधार पर आंका गया। कार्यक्रम के समापन पर प्रोफेसर दिलीप शाह ने दोनों दिन निर्णायकों को सम्मानित किया।

मानव संसाधन में कार्यक्रम का पहला दिन प्लेसमेंट हॉल में पांच भाग लेने वाली टीमों के साथ आयोजित किया गया था, जिनमें से प्रत्येक में तीन प्रतिभागी थे।  निर्णायक रोहित भूत थे। कार्यक्रम की शुरुआत टीमों द्वारा नकली बायोडाटा की पहचान करने, सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार का चयन करने और उनकी पसंद को सही ठहराने के लिए बायोडाटा का विश्लेषण करने के साथ हुई। राउंड 2, पीपल पोकर में एक आदमकद मोनोपोली बोर्ड का परीक्षण किया गया जो संकट की समझ, रणनीति, सहानुभूति, नैतिकता और संचार का परीक्षण करता है। राउंड 3 संकट प्रबंधन पर केंद्रित था, जहां टीमों ने समान मूल्यांकन मानदंडों के तहत तीन प्रमुख संकटों से निपटा। दूसरे दिन जुबली हॉल में आयोजित और निर्णायक सीए मौशिखा सरकार द्वारा राउंड 4 से शुरू हुआ। तीन की टीमों ने बायोडाटा और एक केस स्टडी का विश्लेषण करने से पहले एक सदस्य को वोट दिया। उनका मूल्यांकन उनकी सार्वजनिक माफी, मानसिक स्वास्थ्य पहल, हितधारक प्रबंधन, कंपनी लचीलापन, नैतिकता और प्रतिष्ठा पुनर्निर्माण पर किया गया था। कर्मचारी भुगतान पर्ची बनाने के लिए राउंड 5 में टीमों की आवश्यकता होती है, जिसका मूल्यांकन सटीकता, रणनीतिक संरेखण, नवाचार, रक्षा, प्रभाव और प्रस्तुति पर किया गया । कार्यक्रम के समापन पर, प्रोफेसर मीनाक्षी चतुर्वेदी द्वारा निर्णायक को एक स्मृति चिन्ह और एक गमले में लगे पौधे से सम्मानित किया गया। इस आयोजन के प्रथम उपविजेता द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज थे और विजेता सेंट जेवियर्स कॉलेज था।

नेक्सस 2025 में भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह प्रमाणपत्र देते हुए

रणनीतिक प्रबंधन में कार्यक्रम के पहले दिन कॉलेज परिसर के जुबली हॉल में आयोजित किया गया था। आगे, दो-दो प्रतिभागियों की आठ टीमों के साथ। चूँकि यह एक तैयारी का दौर था, इसलिए किसी निर्णायक की आवश्यकता नहीं थी। बदलती बाज़ार स्थितियों के अनुरूप ढलते हुए आवास परियोजनाएँ बनाने के लिए टीमों को एक संसाधन दस्तावेज़ प्राप्त हुआ। कक्ष 528 में आयोजित दूसरे दिन का मूल्यांकन रोहित प्रसाद और शिवानी जैन द्वारा लाभप्रदता, रणनीति, अनुकूलनशीलता, अनुपालन, प्रस्तुति और पिचिंग पर किया गया। टीमों ने अपनी परिसंपत्तियां प्रस्तुत कीं और यह तय किया कि किराए पर देना है, रखना है, विस्तार करना है या बेचना है, इसके बाद प्रश्नोत्तरी सत्र हुआ। निर्णायक मंडल ने विसंगतियों पर सवाल उठाए, और अन्य टीमों को प्रस्तुतकर्ताओं से जिरह करने की अनुमति दी गई। कार्यक्रम का समापन करने के लिए निर्णायकों को गमले में पौधे और मोमेंटो देकर सम्मानित किया प्रातःकालीन सत्र की वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने ।

इवेंट का दूसरा रनर-अप सेंट जेवियर्स कॉलेज था, इवेंट का पहला रनर-अप भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज था, और विजेता एनएसएचएम कॉलेज था।

नीलामी: आईपीएल नीलामी एक गतिशील कार्यक्रम था जिसने विभिन्न कॉलेजों के प्रतिभागियों को वास्तविक आईपीएल प्रीगेम अनुभव प्राप्त किया । प्रत्येक में तीन सदस्यों वाली नौ टीमों ने भाग लिया। पहला दिन सुबह 10:30 बजे शुरू हुआ। कॉलेज परिसर के कॉन्सेप्ट हॉल में, जहाँ टीमों को अपने दल बनाने के लिए एक निर्धारित बजट दिया गया था। इस दिन फ्रेंचाइजी, आइकन खिलाड़ियों, भारतीय खिलाड़ियों और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के लिए क्रमिक नीलामी हुई। दूसरे दिन सुबह 9:00 बजे शुरू हुआ। कमरा 530 में क्रिकेट-थीम वाले प्रश्नावली दौर के साथ, उसके बाद तेजी से प्रश्नोत्तरी हुई । कार्यक्रम का समापन निर्णायक श्रेयांश रोहतगी द्वारा जज किए गए पीपीटी राउंड के साथ हुआ।

दूसरा उपविजेता एनएसएचएम कॉलेज था, पहला उपविजेता द हेरिटेज कॉलेज था, और विजेता भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज था।

वित्त: यह आयोजन योजना, संगठन और जोखिम प्रबंधन पर केंद्रित था। पहले दिन दोपहर 12:00 बजे शुरू हुआ। कक्ष 547 में सात टीमें, प्रत्येक में अधिकतम दो सदस्य शामिल हैं। टीमों ने अपने आवंटित कोष का उपयोग करके नीलामी में भाग लेने से पहले वर्टिकल की एक सूची का विश्लेषण किया। दूसरे दिन, दोपहर 12:00 बजे से प्लेसमेंट हॉल में आयोजित, दो राउंड आयोजित किए गए। टीमों ने सबसे पहले अपने वर्टिकल, स्टार्टअप और चुनी गई संपत्तियों को प्रदर्शित करते हुए एक पावरपॉइंट तैयार किया और प्रस्तुत किया। उन्होंने निर्णायक संजय सराफ के समक्ष अपनी रणनीतियों, समस्या-समाधान दृष्टिकोण और निवेश योजनाओं का प्रदर्शन किया। बाद में, टीमों से उनके तर्क और संयम का परीक्षण करने के लिए क्रॉस-क्वेश्चन किया गया। अंतिम दौर में प्रत्येक टीम को यह बचाव करना था कि उन्हें बाहर क्यों नहीं किया जाना चाहिए।

द्वितीय उपविजेता द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज, प्रथम उपविजेता द एनएसएचएम कॉलेज और विजेता सेंट जेवियर्स कॉलेज था।

उद्यमिता: इस विचार पर आधारित कि स्टार्टअप दबाव में फलते-फूलते हैं, यह कार्यक्रम पहले दिन सुबह 10:30 बजे शुरू हुआ। नौ भाग लेने वाली टीमों के साथ कक्ष 548 में। यह दो चरणों में सामने आया। पहले चरण में, टीमों ने मिनी रिवील राउंड के दौरान अर्जित पावर कार्डों को सक्रिय किया, प्रत्येक ने अद्वितीय लाभ या चुनौतियाँ प्रदान कीं, जिन्होंने रणनीतियों को नया रूप दिया और अनुकूलन क्षमता का परीक्षण किया। अंतिम स्टार्टअप-बिल्डिंग दौर में, टीमों ने अवधारणा, लक्ष्य बाजार, संसाधन उपयोग, वित्तीय संरचना और भविष्य के अनुमानों को कवर करते हुए अपने निर्दिष्ट क्षेत्रों के भीतर स्टार्टअप विचारों को तैयार किया और पेश किया। सीए शिवम बजाज द्वारा निर्धारित इस कार्यक्रम में प्रतिभागियों के धैर्य, व्यावसायिक कौशल, रचनात्मकता और समय प्रबंधन का परीक्षण किया गया।

दूसरा रनर-अप गोयनका कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन था, पहला रनर-अप सेंट जेवियर्स कॉलेज था, और विजेता भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज था।

मार्केटिंग: इस आदर्श वाक्य के साथ, “मार्केटिंग अराजकता में चमकती है,” इवेंट ने प्रतिभागियों को दबाव में ब्रांड पहचान को फिर से बनाने के लिए चुनौती दी। इसकी शुरुआत सोसायटी हॉल में सुबह 11 बजे हुई। आठ टीमों ने नकली मुद्रा का उपयोग करके संघर्षरत कंपनियों का अधिग्रहण करने के लिए नीलामी में बोली लगाई। प्रत्येक टीम को अपनी यूएसपी को रेखांकित करने वाली एक कंपनी प्रोफ़ाइल प्राप्त हुई और लक्षित दर्शकों, ब्रांड पोजिशनिंग, रचनात्मक अभियानों और ग्राहक सहभागिता रणनीतियों को कवर करने वाली दस-स्लाइड प्रस्तुति तैयार करने के लिए एक घंटे का समय मिला। बाद में यह स्थल जेंगा ब्लॉक राउंड के लिए प्लेसमेंट हॉल में स्थानांतरित हो गया, जिसमें रैपिड-फायर और मिनी मार्केटिंग चुनौतियां शामिल थीं। टीमों के पास सोचने के लिए सिर्फ एक मिनट और निर्णायक कुसुंभी कोठारी सेट को जवाब देने के लिए 90 सेकंड का समय था, जिससे उनकी रचनात्मकता और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता का परीक्षण किया जा सके। दूसरा दिन दोपहर 12:00 बजे शुरू हुआ। बोर्ड रूम प्रेशर राउंड के साथ, जहां टीमों ने एक सीएफओ, एक निवेशक, एक ग्राहक प्रतिनिधि और निर्णायक अंगशुमन सेट के पैनल के सामने अपनी पुनरुद्धार रणनीतियों को प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का समापन रेक्टर और छात्र मामलों के डीन प्रो. दिलीप शाह द्वारा श्री सेट के अभिनंदन के साथ हुआ। द्वितीय उपविजेता ईआईसीएएसए कॉलेज था, प्रथम उपविजेता सेंट जेवियर्स कॉलेज था, और विजेता भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज था।

समापन समारोह: कॉलेज परिसर के जुबली हॉल में आयोजित नेक्सस 2025 का समापन समारोह, भविष्य के होनहार उद्यमियों को पोषित करने वाली रचनात्मकता, प्रतिस्पर्धा और सहयोग के दो दिनों के एक जीवंत और यादगार समापन को चिह्नित करता है। अंततः, प्रत्येक आयोजन के अंतिम परिणाम घोषित किए गए, जिसमें समग्र विजेता भी शामिल थे। प्रथम उपविजेता सेंट जेवियर्स कॉलेज था और उभरता हुआ विजेता भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज था।

समारोह में नेक्सस 2025 के समन्वयकों और कॉलेज प्रतिनिधियों द्वारा वक्तव्य दिया गया, जिसमें इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए टीमों, स्वयंसेवकों और इवेंट मास्टर्स के प्रति आभार और प्रशंसा व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की योजना बनाने की उनकी यात्रा को दर्शाया गया। डाॅ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि जैसे-जैसे औपचारिकताएँ पूरी हुईं, डीजे ध्रुव के कार्यभार संभालते ही ऊर्जा जश्न में बदल गई और प्रतिभागियों और आयोजकों ने समान रूप से नृत्य किया, जश्न मनाया और एक-दूसरे से जुड़े रहे, और नेक्सस’25 को एक उच्च, अविस्मरणीय नोट पर समाप्त किया। कार्यक्रम के रिपोर्टर आन्या सिंह, रुद्रायन दत्ता, सप्तक रॉयचौधरी और फोटोग्राफर: स्पंदन सामंता, अग्रग घोष, देव सिन्हा, सागर डे, नैना रॉय, रिद्धि लोढ़ा, अभिषेक कुमार राम, दृष्टि ड्रोलिया, निशांत अग्रवाल रहे ।कार्यक्रम बहुत ही प्रेरणादायक रहा।मैरी फोर्लो का मानना है कि कभी भी पैसा कमाने के लिए व्यवसाय शुरू न करें, बदलाव लाने के लिए व्यवसाय शुरू करें।

यूएसआई में पहुचे भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के पदाधिकारी

– रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने दी संस्थान की जानकारी

नयी दिल्ली । यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया (यूएसआई) ने 22 अक्टूबर 2025* को एक प्रतिष्ठित पुस्तक-लोकार्पण कार्यक्रम की मेजबानी की, जिसमें उच्च-स्तरीय रक्षा और अकादमिक गणमान्य व्यक्ति एक साथ आए। लेफ्टिनेंट राजसुखला, पीवीएसएम, वाईएसएम, एसएम (सेवानिवृत्त) द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक “सिविल मिलिट्री फ्यूज़न एज़ ए मेट्रिक नेशनल पावर एंड कॉम्प्रिहेंसिव सिक्योरिटी” जिसमें नागरिकों को सशस्त्र बलों में एकीकृत करने और राष्ट्रीय सेवा के लिए युवाओं को सशक्त बनाने के विषय पर लिखा गया है, का औपचारिक रूप से अनावरण किया गया। मेजर जनरल समीर सिन्हा ऑडिटोरियम, यूएसआई, नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि रक्षा मंत्री, श्रीराजनाथ सिंह की गौरव पूर्ण उपस्थिति में सम्मानित किया गया, उनके साथ थे चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ, जनरल अनिल चौहान, पीवीएसएम, यूवाईएसएम, एवीएसएम, एसएम, वाईएसएम और चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, जनरल उपेन्द्र द्विवेदी, पीवीएसएम, एवीएसएम, एडीसी , जिनकी उपस्थिति ने इस कार्यक्रम की शोभा बढ़ा दी।
इसके अलावा, छात्र मामलों के रेक्टर और डीन, प्रो.दिलीप शाह – भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज* को आमंत्रित किया गया था और उन्होंने संस्था का सम्मानपूर्वक प्रतिनिधित्व किया। कार्यक्रम की शुरुआत यूएसआई के महानिदेशक मेजर जनरल बी के शर्मा की परिचयात्मक टिप्पणी के साथ हुई, जिसके बाद रक्षा मंत्री का मुख्य भाषण हुआ, उन्होंने नागरिक-सैन्य विभाजन को पाटने में लेखक की पहल की सराहना की और राष्ट्रीय सुरक्षा भूमिकाओं में अधिक से अधिक युवाओं की भागीदारी का आह्वान किया। इसके बाद पुस्तक का औपचारिक विमोचन किया गया – लेफ्टिनेंट जनरल राज सुखला ने तालियों की गड़गड़ाहट और एक चयनित अंश के संक्षिप्त वाचन के बीच प्रकाशन का अनावरण किया। पुस्तक दो महत्वपूर्ण विषयों को संबोधित करती है: पहला, सशस्त्र बलों में नागरिकों को शामिल करने की प्रक्रिया, और दूसरा, देश के युवाओं को रक्षा और राष्ट्रीय सेवा में सार्थक भूमिकाओं के लिए तैयार करने की रणनीति। प्रकाशन नागरिक समाज और वर्दीधारी बलों के बीच सहजीवी संबंध को रेखांकित करता है, राष्ट्र की सेवा के लिए आवश्यक मानसिकता, कौशल और अभिविन्यास के साथ युवा पीढ़ी को तैयार करने के महत्व पर जोर देता है। औपचारिक कार्यक्रम के बाद, एक सौहार्दपूर्ण मुलाकात और अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। जिसमें वरिष्ठ रक्षा अधिकारियों, शिक्षाविदों, लेखकों और यूएसआई फेलो सहित आमंत्रित अतिथि अनौपचारिक बातचीत हुई और नेटवर्किंग में लगे रहे।
भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने अपनी संस्था की भूमिका और चल रही विभिन्न गतिविधियों के बारे में रक्षा मंत्री और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के साथ बातचीत की जो कॉलेज के लिए महत्वपूर्ण कदम है । डाॅ वसुंधरा मिश्र ने कॉलेज द्वारा दी गई रिपोर्ट के अनुसार जानकारी दी ।

रिश्तों के बीच पुल बनिए, दीवार बनना सही नहीं

सोशल मीडिया पर जिस तरह के कंटेंट महिलाएं बना रही हैं और अपने पारिवारिक झगड़ों का उपयोग टीआरपी पाने और फॉलोवर बढ़ाने के लिए कर रही हैं, उसके दूरगामी परिणाम कुछ अच्छे नहीं है। हैरत की बात यह है कि इसमें लड़के भी साथ दे रहे हैं। अधिकतर कंटेंट आजादी के नाम पर सास-बहू की आलोचना के लिए या बहू के अधिकारों की रक्षा के नाम पर उनकी गलतियों को जस्टीफाई करते हुए बनाए जाते हैं। मां का घर है मायका मगर ससुराल आपके सास-ससुर के नाम पर है यानी शाब्दिक दृष्टि से भी यह घर आपके पति से अधिक उनके माता -पिता का है। भारतीय परिवारों की समस्या यह है कि अपने मायके में एडजस्ट करने वाली लड़कियां और माता- पिता की प्रतिष्ठा के लिए समझौते करने वाली लड़कियां भी ससुराल में पहले दिन से ही अपनी एक अलग दुनिया बनाने लगती हैं जिसमें वह, उनके पति व बच्चे होते हैं, और कोई नहीं। वह यह मान लेती हैं कि वह इस घर में आ गयी हैं तो अब पति पर, पति के जीवन पर, पति की इच्छाओं पर तो उनका अधिकार है, बस पति के रिश्तेदार उनके कुछ नहीं लगते। वहीं माता-पिता अब भी उसी पुरानी दुनिया में जी रहे हैं, उनको अब भी अब भी अपना बेटा 24 घंटे अपने पास चाहिए। जिन औरतों को रिश्तों के बीच पुल बनना चाहिए, वह अब दीवार बन रही हैं तो कलह स्वाभाविक है। कामकाजी लोगों को उनकी ही भाषा में समझाया जाना चाहिए…क्या जब आप नये दफ्तर से जुड़ते हैं तो क्या पहले ही दिन बॉस बन जाते हैं या अपनी मेहनत से, अपनी लगन से बरसों तक मेहनत करने के बाद आपको वह जगह मिलती है? क्या आप जहां काम करते हैं, उस कम्पनी के मालिक होने का दावा कर सकते हैं कि दो दिन में कम्पनी आपके नाम कर दी जाए? अब घर का मामला देखिए…जिस गृहस्थी को पाने के लिए आप मरी जा रही हैं, पहली बात, वह गृहस्थी आपने नहीं बनायी, वह आपके सास-ससुर की जीवन भर की तपस्या का फल है। जिस तरह एक कर्मचारी की जिम्मेदारी और अधिकारों को धीरे – धीरे बढ़ाया जाता है, वैसे ही विश्वास होने पर सास-ससुर खुद आपको आगे बढ़ाते हैं। आपको जो सफल, संस्कारी पति मिला है, वह उनकी परवरिश का नतीजा है। उसे जो सहयोग मिला है, वह उसके भाई-बहनों व परिवार के कारण है और इसे बनाने में आपकी कोई भूमिका नहीं है। जिस तरह आपकी कम्पनी में आपके सीनियर्स की भूमिका है और आपकी इच्छा मात्र से उनको नहीं हटाया जा सकता, आपके बॉस आपकी खुशी के लिए उनको हाशिए पर नहीं डाल सकते। ठीक उसी प्रकार परिवार में आपकी इच्छा मात्र से आपके पति अपने माता-पिता,भाई-बहन व रिश्तेदारों को सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकते कि आपको यह पसंद नहीं हैं। समस्या यह है कि लड़कियां गृहस्थी का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं मगर उनको दूसरों की बनाई गृहस्थी को नोंचकर अपनी दुनिया बनानी है। तुर्रा यह है कि उनको इस पर भी ससुराल से प्यार चाहिए…नहीं मिलेगा बहिन।
हमारे घरों में जब भी कोई नववधू आती है, तो उसके लिए सबसे अच्छा कमरा देवर या ननद ही खाली करते हैं क्योंकि नयी बहू को कष्ट नहीं होना चाहिए मगर बहू को इस बात से ऐतराज है कि उसके आने के बाद भी पति अपनी मां की देखभाल क्यों कर रहा है, पापा के चश्मे, भाई की पढ़ाई और बहन की नौकरी की चिंता उसे क्यों करनी है, आपकी सोच पर तरस ही खाया जा सकता है बहन। सच तो यह है कि कोई बहन अपने भाई का घर नहीं तोड़ती, कई लड़कियां तो कलह से बचने के लिए अपने मायके तक जाना छोड़ देती हैं। और क्या चाहिए आपको….अगर कोई देवर या ननद साथ रहता है तो उसे अपने घर में अजनबी की तरह रहें….अहसान मानें कि उनको उनके ही घर में भाई-भाभी रहने दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर बाकायदा रील्स चलती है कि रिश्ते बनाए रखने के लिए भौजाइयों को थैंक यू बोला जाए। तो अब यह बताइए कि बात-बात पर जेठ, जेठानी, सास-ससुर, देवर व ननद को छोटी – छोटी बातों के लिए जलील करने वाली बहुओं व भौजाइयों की इज्जत कैसे व कहां तक की जानी चाहिए? कई बहुएं तो अपनी जिम्मेदारी अपने पति व बच्चों तक समझती हैं, काम उनके लिए करती हैं….पति के कारण सास-ससुर एक्सटेंशन मोड में हैं…देवर या ननद की तो गिनती ही नहीं है। कई औरतें तो अपने तानों से ही देवर और ननद की आत्मा और अधिकारों को खत्म कर देती हैं। ननद से इनको घर के काम में सहयोग की उम्मीद होती है और शिकायत ननदों की ही अपने मायके में करनी होती हैं। इनके घर में पैर रखते ही आठवीं में पढ़ने वाली ननद को युवा और पराया मान लिया जाता है। स्नातक में पढ़ते हुए लड़के देखे जाने लगते हैं क्योंकि घर का बोझ इनके पति पर है, सब उनकी कमाई खा रहे हैं। मैडम को कोई बताए कि वह जिसके भरोसे इस घर में हैं, उसके और भी रिश्ते हैं दुनिया में। क्या यह स्वार्थपरता नहीं है। घर में कोई आयोजन हो तो मायके के लोग पहले बुलाए जाएंगे और पति के भाई-बहन घर में रहते हुए ही कोने में रखे जाएंगे और उनके सारे काम अहसान जताते हुए होंगे। उस पर सारी दुनिया के सामने आपके चेहरे पलट जाएंगे। मुझे लगता है कि यह सही समय है कि भाई-भौजाइयों से बचाने के लिए देवर-ननद के पक्ष में कानून बनाए जाए। आज बड़ी तेजी से वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं, लाचार होते माता-पिता को घर से निकालने के लिए बच्चों को लानतें भेजी जा रही हैं मगर रुककर सोचिए इन बच्चों ने यह सीखा किससे है? कहीं ऐसा तो नहीं है आज के माता-पिता जब खुद युवा थे तो हर प्रकार की शक्ति इनके पास थी तो क्या उन्होंने यही बर्ताव अपने माता -पिता के साथ नहीं किया होगा । बहुएं अपने पति को लेकर ससुराल को कोसती हुईं अलग होती हैं, अपने पति को अपनों से दूर करती हैं, बच्चों को दादा-दादी, बुआ – चाचा से दूर करती हैं, जो मौन आर्तनाद इन टूटे कलेजों से निकलता है, जो हूक निकलती है, जिस तरह वह तड़पकर जी रहे होते हैं और अंतिम सांस तक अपनी संतानों को आपके कारण नहीं देख पाते, ये हूक ईश्वर तक जाती है, कर्म लौटते हैं और जो खेल आपने कल खेला था, आज वही खेल आपके साथ खेला जा रहा है तो हैरत कैसी? बच्चों ने जो किया, बुरा किया मगर वृद्ध -वृद्धाओं से भी पूछा जाना चाहिए कि अपने समय में इन्होंने अपने बुजुर्गों के साथ कैसा बर्ताव किया। अधिकतर सफल औरतें अपने माता-पिता को अपनी कमाई का अंश देना चाहती हैं जिससे उनके माता-पिता को हाथ न पसारना पड़े। वह चाहती हैं कि उनके भाई की कमाई का हिस्सा उनकी भाभी की जगह माता-पिता को मिले। अच्छी बात है मगर तब आपको गुस्सा क्यों आता है जब आपके पति अपने माता-पिता को अपनी कमाई सौंपते हैं और अपने भाई-बहनों को तोहफे देते हैं।
मेरी समझ में तो होना चाहिए कि लड़का हो या लड़की, यह सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है कि उनके रहते माता-पिता व जब तक भाई-बहन आर्थिक रूप से उन पर आश्रित हैं, उनको हाथ पसारना नहीं पड़े। एक सीमा के बाद भाई -बहन को भी बहुत अधिक जरूरत पड़ने पर ही बड़े भाई-बहनों की मदद लेनी चाहिए मगर माता-पिता? अपनी कमाई का दस प्रतिशत हिस्सा यानी पांच – पांच प्रतिशत अपने माता-पिता को दीजिए जिससे उनको आपकी पत्नी से नहीं मांगना पड़े। इसके बाद जरूरी है तो 10 प्रतिशत, 5-5 प्रतिशत के अनुपात में भाई-बहनों को दीजिए। जो बहन व भाई कमाते हैं, अपनी कमाई का दस प्रतिशत घर में दें। 5 प्रतिशत माता-पिता को व 5 प्रतिशत अपने घर के बच्चों को दें। छोटे- छोटे खर्च उठाएं। बहू परिवार को अपना समझे, सास-ससुर से ईर्ष्या मत कीजिए और न ही प्रतियोगिता कीजिए क्योंकि वह आपके घर में जाकर नहीं रह रहीं हैं, आपको इस घर का भविष्य बनाकर लाई हैं, कल आप ही रहेंगी…। अगर आप अपने पति-बच्चों व परिवार के बीच पुल बनेंगी तो यकीन मानिए कल को ये लोग आपके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहेंगे। जो व्यवहार आप अपने लिए अपने लिए चाहती हैं, वही व्यवहार अपनी ननदों के साथ कीजिए। हो सकता है कि आप जिन चीजों को लेकर परेशान हों, वह परेशानी ये लोग दूर दें।

तीन साल से बकाया बीएसएनएल का किराया पांच करोड़, तमतमाया हाईकोर्ट

-फंड जारी करने में देरी से नाराज, वित्त सचिव को बुलाया
कोलकाता । कलकत्ता हाईकोर्ट का तीन साल का बीएसएनएल का बिल, जो 5 करोड़ रुपये का है, बकाया है। यह खुलासा सोमवार को हाईकोर्ट प्रशासन की एक रिपोर्ट से हुआ। फंड जारी करने में देरी से नाराज हाईकोर्ट ने वित्त सचिव को आज 29 अक्टूबर को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के साथ एक बैठक करने का निर्देश दिया है। यह बैठक जेलों और न्यायिक बुनियादी ढांचे की स्थिति पर चल रही सुनवाई के संबंध में है। सोमवार को हाईकोर्ट प्रशासन ने एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इस बकाया राशि का जिक्र था। राज्य सरकार ने बेंच को बताया कि इंटरनेट सुविधा के लिए 2.9 करोड़ रुपये की प्रशासनिक मंजूरी जारी की गई है। 5 करोड़ रुपये के कुल बकाया को देखकर बेंच हैरान रह गई। बेंच ने राज्य के वकील से पूछा कि यह राशि क्यों नहीं दी गई। राज्य ने बताया कि यह खाता रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के पास है और आधी राशि मंजूर हो चुकी है। जस्टिस देबांग्शु बासक और जस्टिस एमडी शबबर रशीदी की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। बेंच ने कहा, “बिल पिछले तीन सालों से बकाया है। क्या राज्य में कोई वित्तीय आपातकाल है? अगर बीएसएनएल बिलों का भुगतान न होने के कारण सेवाएं बंद कर दे तो क्या होगा? तीन साल काफी समय है। उन्होंने बिलों का भुगतान करना जरूरी नहीं समझा… क्या हाईकोर्ट के काम के लिए फंड का आवंटन प्रशासनिक काम के अंतर्गत नहीं आता है?राज्य के वकील ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया क्योंकि महाधिवक्ता किशोर दत्ता इस मामले में बहस करेंगे। वकील ने कुछ समय मांगा क्योंकि आधी राशि मंजूर हो चुकी है। कोर्ट ने निर्देश दिया, “यदि 29 अक्टूबर को सभी मामले अनसुलझे रहते हैं, तो 6 नवंबर को आगे की बैठकें होंगी, जिसमें वित्त सचिव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेंगे। 29 अक्टूबर को, राज्य पेपर बुक्स में प्रत्येक मामले के संबंध में अपना रुख बताएगा।” मामले की अगली सुनवाई 10 नवंबर को तय की गई है।यह मामला राज्य में न्यायिक बुनियादी ढांचे की बदहाल स्थिति को उजागर करता है। हाईकोर्ट का अपना ही बिल तीन साल से अटका हुआ है, जो दिखाता है कि सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कितनी कमी है। 5 करोड़ रुपये की राशि कोई छोटी रकम नहीं है, और इसका भुगतान न होना चिंता का विषय है। यह सवाल उठता है कि क्या राज्य सरकार हाईकोर्ट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान के लिए भी समय पर फंड जारी करने में सक्षम नहीं है। बीएसएनएल जैसी सेवा प्रदाता कंपनी अगर भुगतान न होने पर सेवाएं बंद कर दे, तो इसका सीधा असर अदालती कामकाज पर पड़ेगा। इससे न्याय मिलने में देरी होगी, जो किसी भी नागरिक के लिए स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने इस मामले को ‘कोर्ट की अपनी गति’ के तहत उठाया है, जिसका मतलब है कि कोर्ट ने खुद ही इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है। यह दर्शाता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। वित्त सचिव और रजिस्ट्रार जनरल के बीच होने वाली बैठकें इस समस्या का समाधान निकालने की दिशा में एक कदम हैं। उम्मीद है आज 29 अक्टूबर की बैठक में राज्य सरकार अपना स्पष्ट रुख बताएगी और लंबित बिलों का भुगतान करने के लिए ठोस कदम उठाएगी। अगर फिर भी समस्या हल नहीं होती है, तो वित्त सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति में होने वाली 6 नवंबर की बैठक से कुछ सकारात्मक परिणाम निकलने की उम्मीद है। यह मामला राज्य के वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक दक्षता पर भी सवाल खड़े करता है।

केंद्र ने दी आठवें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी

-न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) होंगी अध्यक्ष
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने मंगलवार को 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी। यह आयोग अपने गठन की तिथि से 18 महीनों के भीतर अपनी सिफारिशें देगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव ने यहां राष्ट्रीय मीडिया केन्द्र में पत्रकार वार्ता में मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी दी। वैष्णव ने बताया कि 8वां वेतन आयोग एक अस्थायी निकाय होगा। आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य (अंशकालिक) और एक सदस्य-सचिव शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि यह आयोग अपने गठन की तिथि से 18 महीनों के भीतर अपनी सिफारिशें देगा। सरकार ने जनवरी में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन और अन्य लाभों में बदलावों की जांच और सिफ़ारिश करने के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा की थी। न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) आयोग की अध्यक्ष होंगी। प्रोफ़ेसर पुलक घोष सदस्य होंगे और पंकज जैन आयोग के सदस्य-सचिव होंगे। वेतन आयोगों का गठन समय-समय पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पारिश्रमिक ढांचे, सेवानिवृत्ति लाभों और अन्य सेवा शर्तों के विभिन्न मुद्दों पर विचार करने और उनमें आवश्यक बदलावों पर सिफारिशें करने के लिए किया जाता है। आमतौर पर वेतन आयोग की सिफारिशें हर 10 साल के अंतराल पर लागू की जाती हैं। इसके अनुसार 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें अगले साल से अपेक्षित हैं।

डियर युवाओं, परिवार से अच्छा सहयात्री कोई नहीं

मन में विचार आता है कि आज के दौर में स्त्री होने का क्या मतलब है….स्त्री एवं पुरुष के लिए परिवार की परिभाषा कैसे इतनी संकीर्ण हो गयी। बात जब छठ की है तो छठ तो स्वयं ही एक प्रकार से भाई-बहन का पर्व है क्योंकि छठी मइया तो खुद ही सूर्यदेव की बहन हैं…भाई दूज में यम और यमुना भाई – बहन हैं और दीपावली में नरकासुर के वध के बाद जो सुभद्रा कृष्ण के माथे पर तिलक लगाती हैं, वह भी उनकी बहन हैं। इससे पीछे देखिए तो शक्ति नारायण की बहन हैं औऱ सरस्वती शिव की बहन हैं। अशोक सुन्दरी गणेश और कार्तिकेय की बहन हैं और शांता श्रीराम की बहन हैं। कहने का तात्पर्य तो यही है कि हमारे पुराणों में तो भाई-बहन के सम्बन्धों का उल्लेख है मगर सोचने वाली बात यह भी है कि ऐसा क्या हो गया कि बहनों को हाशिये पर रखकर समस्त देवी-देवताओं को पत्नी और बच्चों तक समेटकर बांध दिया गया। शक्ति, शिव, सरस्वती और लक्ष्मी में गहरा सम्बन्ध है, सब के सब एक दूसरे के पूरक हैं, फिर ऐसा किसने किया होगा कि पारिवारिक अवधारणा को अपने स्वार्थ के लिए पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित कर दिया जबकि श्रीकृष्ण तो राधा के साथ सुभद्रा और द्रौपदी को भी सिर आँखों पर रखते हैं। वस्तुतः देखा जाए तो शिव परिवार हो राम दरबार या फिर श्रीकृष्ण का परिवार एक संयुक्त परिवार की अवधारणा को सामने रखता है। ये जानना जरूरी है कि वैदिक काल से चली आ रही इस अवधारणा को तहस-नहस कर स्त्री व पुरुष के जीवन से अन्य सभी संबंधों को निकालकर नितांत एकाकी बनाने वाले कौन लोग रहे होंगे और इनमें उनका क्या स्वार्थ रहा होगा। खास बात यह है कि सुभद्रा को कृष्ण से कुछ कहना या मांगना नहीं पड़ता, वह स्वयं ही उसे समझकर उसकी इच्छा पूरी कर देते हैं तो कृष्ण को पूजने वालों के मन में इतनी संवेदनशीलता क्यों नहीं है? छठी मइया ने तो आपको नहीं कहा कि आप अपने माता – पिता समान सास-ससुर से अपने पति को दूर कर दें क्योंकि वह आपकी गृहस्थी के साम्राज्य को फिट नहीं करते। आपको बुरा लगता है जब मायके में बहन के रूप में आपको भाभी जितना सम्मान नहीं मिलता मगर अपनी ससुराल में आप खुद बर्दाश्त नहीं कर पातीं कि आपको छोड़कर आपका पति किसी और की बात सुनें, करें। पता नहीं…लड़के और लड़कियों को यह अहंकार का रोग कहां से लग गया। पता नहीं क्यों कई बार सास-ससुर भी अपनी बहू-बेटे को नहीं समझना चाहते। मैं नहीं समझ पाती कि अनायास सामंजस्य से चलने वाला परिवार वैमनस्य और वर्चस्व का अखाड़ा कैसे बन जाता है? परिवार से दूर रहना और कई बार मायके वालों के कहने में आकर अपनी गृहस्थी बना लेना पहले -पहल बहुत अच्छा लगता है मगर चुनौतियां वहाँ कम नहीं होतीं, बढ़ जाती हैं। आपको ताने कसने वाले कम नहीं होते बल्कि बढ़ जाते हैं। एक समय के बाद आप थक जाती हैं क्योंकि अंततः हम सभी मनुष्य हैं। ससुराल में जो काम आपके साथ चार लोग करते थे, वह सारे काम अब आपको अकेले करने होते हैं, जो खर्च मिल-बांट कर उठा लिया जाते थे…वह सारे खर्च अब आपको खुद करने होते हैं। आपको सुनने वाला कोई नहीं होता, आप किसी के कंधे पर सिर रखकर नहीं रो पाते। पहले वाला प्यार अब खीझ में बदलकर द्वेष और कलह बन जाता है। जिम्मेदारियों के बोझ से दबी आप ठीक से रहना भूल जाती हैं। जिन्होंने आपका घर तोड़ा, गौर से देखिएगा, वह अपने घर नहीं टूटने देते। समझदारी और वैयक्तिता को महत्व देने की जरूरत है और दोनों ओर से दिये जाने की जरूरत है। आप नहीं जानते कि एक पीढ़ी जब साथ रहती है और जुड़ी रहती है तो वह आपका सुरक्षा कवच रहती है, सपोर्ट सिस्टम बनी रहती है। परिवार से दूर रहना सपोर्ट सिस्टम खो देना होता है। बुजुर्गों को थोड़ा सा आदर चाहिए और उनकी जरूरतों को पूरा करते रहने की जरूरत है। आज आपको यह खटक सकता है लेकिन कल्पना कीजिए कि कल आप दोनों भी बूढ़े होंगे और आपके बच्चे आपको ताने मारेंगे। हाथ उठा सकते हैं और आप अपना बचाव भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि शरीर और मन से आप थक चुके होंगे। आज जिस तरह से अपने भाई -बहनों से जुड़े रहने के लिए आप अपने पति को कोसती हैं, कल को आपके बेटे को आपकी बहू कोसेगी..तब क्या आपके पास कोई जवाब होगा। मगर भाई या देवर व जेठ ननद, जेठानी, देवरानी, बहन और बुआ के साथ रहते हुए ऐसा करने में वह दस बार सोचेगा…..लिहाज न हो तो भी लिहाज बड़ी चीज है। हिंदू संस्कृति अत्यंत पुरातन होते हुए भी चिर नूतन है, इसकी मान्यताएं आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारे जीवन को सार्थक दिशा दिखाती हैं। जीवन मूल्य और संस्कार हमें पुरातन संस्कृति से ही प्राप्त होते हैं ,तथा इस संस्कृति के मूल आधार हैं हमारे सनातन परिवार। अतः सनातन संस्कृति को जागृत और चैतन्य रखने का दायित्व हमारे परिवारों पर ही है। परिवार केवल व्यक्तियों के एकत्र रहने की व्यवस्था का नाम नहीं है, यह समाज की आधारभूत सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा आर्थिक इकाई है ।प्रत्येक परिवार उत्तम मनुष्य निर्माण की पाठशाला है। भारतीय संस्कृति में परिवार की परिभाषा में तीन-चार पीढ़ियों का समावेश होता था। कल आज और कल का समन्वय ही परिवार कहलाता था। दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई- भाभी, बहन- बहनोई ये सब एक ही छत के नीचे एक परिवार का हिस्सा होते थे। यहां तक कि घर में काम करने वाले सेवक, कर्मचारी, पड़ोसी इन सब से भी पारिवारिक संबंध होते थे। इतना ही नहीं हम तो पशु -पक्षी, पेड़- पौधे, प्रकृति को भी परिवार मानते हैं- तुलसी माता, गौ माता, गंगा मैया आदि।
आपके अहंकार में बच्चों ने रिश्ते नहीं देखे, निभाना नहीं सीखा, झुकना नहीं सीखा। लाड़ -दुलार ने उनको जिद्दी और स्वार्थी बना दिया है । जो बात आज आपको कूल लग रही है, कल वही जी का जंजाल भी बन सकती है क्योंकि कल को अगर कोई भी उल्टा- सीधा कदम उठाता है तो लोग आप पर ताने कसेंगे..कैसे रोकेंगे आप दोनों।
वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा हमारी ही संस्कृति की उपज है, अर्थात पूरा विश्व ही हमारा परिवार है, सभी हमारे अपने हैं।
परिवार समाज और देश का अस्तित्व नारी से ही है नारी के बिना परिवार की कल्पना भी नहीं कर सकते। मां ,बहन, पत्नी अथवा बेटी के बिना कोई घर घर नहीं लगता।कहावत है -बिन घरनी घर भूत का डेरा। जिस घर में परिवार के सदस्यों को महिला के हाथ का बना भोजन प्राप्त नहीं होता, जहां मां की कोमल वाणी नहीं गूंजती, जहां बहन का स्नेह सिक्त स्पर्श नहीं मिलता वह घर तो सोने का महल हो तो भी वीरान ही लगता है। आज के सन्दर्भ में देखा जाए तो खाना बनाने का काम महिला-पुरुष मिलकर कर सकते हैं। जिन लड़कियों ने संयुक्त परिवार की मिठास नहीं देखी, जो अपने पारिवारिक यूटोपिया में रहती आ रही हैं, परिवार उनको ही खतरा लगता है। सच तो यह है कि अगर ऐसी स्थिति है तो आपको विद्रोह भी उसी व्यवस्था के भीतर रहकर करना होता है, वरना सोचिए आप कितने तालाब खोद सकती हैं।
ईश्वर ने आपको क्षमता दी है कि आप परिवार को साथ लेकर चल सकें तो आपको यह दायित्व तो निभाना होगा। पेशेवर जगत के लिहाज से देखा जाए तो पूछा जा सकता है कि क्या आप दिक्कत होने पर अपने पति को लेकर ससुराल से अलग हो गयीं, क्या कल को अपनी कम्पनी में दिक्कत होने पर उससे अलग हो जाएंगी या सबको साथ लेकर चलने का प्रयास करेगी। जो प्रयास आप बाहर की दुनिया में करती हैं, वह अपने घर में क्यों नहीं कर सकतीं? आप आर्थिक मामलों में सुझाव देकर सहभागिता कर सकती है। घर की छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी समस्याओं से परिवार को बाहर निकालने की हिम्मत और क्षमता हर महिला में होती है। घर में एक महिला जाने अनजाने अनेकों दायित्वों का वहन खुशी-खुशी अपने परिवार के लिए करती है। एक अच्छी भोजन विशेषज्ञा, सेविका, शिक्षिका, चिकित्सक ,समय प्रबंधक, वित्त प्रबंधक आदि के जन्मजात गुण ईश्वर ने उसे दिए हैं। जिसने अपने मां -पिता और बड़ी मां या बड़े बाबूजी या चाचा को साथ देखा है। सुख-दुःख बांटते देखा है, वह कभी इस तरह की वाहियात बातें नहीं करेगा। आप अपने पापा के भाई को चाचा कहने में शर्माती हैं, पति के भाई को देवर कहने में शरमाती हैं तो सबसे पहले तो आपको अपना आकलन और विश्लेषण खुद करना होगा।
यहां एक बात जरूरी है कि सारी भूमिकाओं के निर्वहन की उम्मीद सिर्फ एक महिला से नहीं की जानी चाहिए। घर के बड़े बुजुर्ग जिम्मेदारियां बांट सकते हैं। निष्पक्ष होकर बात सुन सकते हैं और बहुत ज्यादा उम्मीद के बगैर भी अच्छी तरह जी सकते हैं।
इस बात को दिमाग से निकालिए कि स्त्री कोई देवी है। वह मानवी है, उसकी संवेदनाओं का ख्याल रखिए और उसे भी सबकी संवेदनाओं के बारे में सोचना चाहिए। प्यार और आदर दोनों हाथों से बजने वाली ताली है। यह लड़कों और लड़कियों के हाथ में है कि अपने जीवनसाथी को अपने रिश्तों के बीच में किसी कीमत पर नहीं आने दें। यह उम्मीद छोड़ दीजिए कि आपके आने से आपके साथी का जीवन बदल जाएगा। अगर आप 25-30 साल रहकर, सब कुछ छोड़कर आई हैं तो आपकी सास और ननद ने भी अपने जीवन की पूंजी आपको सौंपी है। योगदान दोनों तरफ से है तो अहंकार किसी एक में क्यो और किसलिए? आप क्यों अपने साथी को समंदर से बाहर लाकर कुएं में रखना चाहती हैं। आप अपने पति को साथ रखना चाहती हैं तो उसका एक ही तरीका है, उनको अपने परिवार से और अपने बच्चों को उनके दादा-दाद, चाचा-चाची, बुआ-फूफा या भाई -बहनों से अलग मत करें। बच्चे स्ट्रेस बस्टर होते हैं। आपको उनको भौतिक तौर पर अलग कर भी लें मगर अन्दर ही अन्दर आप अपने साथी को खो रही होती हैं। जीवन की गाड़ी अकड़ से नहीं, संतुलन से चलती है। यही बात सास-ससुर, देवर-देवरानी, ननद- जेठ -जेठानी पर लागू होती है….आप अपनी संतानों की गृहस्थी का सीमेंट बनिए…जहाँ जरूरी हो, वहां हस्तक्षेप जरूर कीजिए मगर उनकी मजबूरियों को समझिए….फिर भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं की है और उनको यह समझना होगा कि शादी उनकी जिन्दगी का हिस्सा है, पूरी जिन्दगी नहीं है।
परिवार है तो स्वावलंबन है बशर्ते परिवार सामंजस्य की कसौटी पर खरा उतरे। आप घर में ही कोई काम अपने परिवार के सदस्यों के साथ कर सकती हैं या अगर नौकरी भी करती हैं तो निश्चित होकर अपने बच्चों को घर में छोड़ सकती हैं। हम यह नहीं कहते कि मामा-मामी या मौसा-मौसी प्यार नहीं करते मगर वह आपके साथ हमेशा नहीं रह पाएंगे, यह भी सच है। ऐसी स्थिति में आपके जेठ, देवर, देवरानी, ननद जैसे रिश्ते खड़े रहेंगे, याद रखएभले ही आप दोनों को साथ चलना है मगर सफर को आसान बनाना हो तो सहयात्रियों की जरूरत पड़ती है और परिवार से अच्छा सहयात्री कोई नहीं हो सकता। यही बात हमारे हर पर्व-त्योहार सिखाते हैं।

 

 

 

 

छठ पूजा पर यह व्यंजन हैं खास

 कद्दू-भात 
सामग्री- 1 कप कद्दू (छोटे टुकड़ों में कटा हुआ) , 1 कप चावल, 2 बड़े चम्मच घी , 1/4 चम्मच हींग , 1/2 चम्मच जीरा,  2-3 हरी इलायची,  1 चम्मच कद्दूकस किया हुआ अदरक, 2 कप पानी (चावल पकाने के लिए), नमक स्वादानुसार, 1-2 चम्मच (स्वाद के अनुसार) शक्कर

विधि- सबसे पहले, चावल को अच्छे से धोकर पानी में उबाल लें। चावल को नरम होने तक पकाएं और पानी में थोड़ा नमक भी डाल सकते हैं। फिर चावल को एक तरफ रख दें। एक कढ़ाई में घी गर्म करें। फिर उसमें जीरा और हींग डालें। जब जीरा तड़कने लगे, तो उसमें कद्दू के टुकड़े डालकर अच्छे से भूनें। अब उसमें कद्दू को पूरी तरह से नरम होने तक पकने दें। कद्दू को ढककर थोड़ी देर पकने दें ताकि वह हल्का-सा पक जाए। अब कद्दू में कद्दूकस किया हुआ अदरक और हरी इलायची डालकर अच्छे से मिला लें। साथ ही, शक्कर भी डाल दें। यह मिठास का स्वाद देगा, जो कद्दू-भात के स्वाद को और भी बढ़ा देता है। अब तैयार चावल को कद्दू में डालकर अच्छे से मिला लें। ध्यान रखें कि चावल और कद्दू अच्छे से मिल जाएं। अब थोड़ा पानी डालकर कद्दू-भात को पका लें। यदि आपको थोड़ा और गीला रखना है, तो पानी ज्यादा डाल सकते हैं। अब आपका स्वादिष्ट कद्दू-भात तैयार है। इसे गर्मा-गर्म परोसें।
रसियाव
सामग्री – 1 कप (धुला हुआ) चावल , ¾ कप गुड़, 4 कप पानी, 1 टेबलस्पून घी, 1 तेजपत्ता (वैकल्पिक), 1 टीस्पून सौंफ
विधि- चावल को घी में हल्का भून लें। फिर पानी डालकर मध्यम आंच पर पकाएं। जब चावल पूरी तरह पक जाएं, तब गुड़ डालें। सौंफ व तेजपत्ता डालें और ढककर कुछ देर धीमी आंच पर पकाएं।  यह रसियाव खरना के दिन का मुख्य भोग होता है।

छठ पूजा विशेष : कौन हैं छठी मइया

छठी मैया, जिन्हें षष्ठी देवी या देवसेना के नाम से जाना जाता है, छठ पूजा की मुख्य पूजनीय देवी हैं। यह पवित्र पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड और उत्तरप्रदेश में सूर्य देव के साथ-साथ छठी मैया की आराधना के रूप में मनाया जाता है। लोककथा और लोक मान्यताओं के कारण ही छठ पर्व में छठी मैया की पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि इनकी आराधना से आरोग्यता, वैभव और संतान सुख की प्राप्ति होती है।
सूर्यदेव की बहन और कार्तिकेय की पत्नी? (विभिन्न मान्यताएं)
छठी मैया के संबंध में कई मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। यह एक लोकमान्यता है। दिलचस्प बात यह है कि यह उन कुछ सौर पर्वों में से एक है जो सूर्योदय के बजाय सूर्यास्त से शुरू होता है।
सूर्य की पत्नी या सहचरी (ऊषा/प्रत्यूषा):
  1. एक प्रमुख लोकमान्यता के अनुसार, छठी मैया को सूर्यदेव की बहन भी माना गया है। चूँकि छठ पूजा सूर्य की उपासना का पर्व है, इसलिए छठी मैया की पूजा साथ में की जाती है।
  2. एक अन्य मान्यता अनुसार देवी छठी मैया/ऊषा को सूर्य की सहचरी कहा जाता है, जो श्रद्धा और पूजा का एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
  3. छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य की उपासना का पर्व है। इस त्योहार में डूबते (प्रत्यूषा) और उगते (ऊषा) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
  4. कुछ लोककथाओं और स्थानीय मान्यताओं में छठी मैया को सूर्य की बहन या सूर्य की पत्नी/शक्ति के रूप में पूजनीय माना जाता है, इसलिए सूर्य पूजा के साथ ही उनकी पूजा होती है।
2. भगवान कार्तिकेय की पत्नी (देवसेना/षष्ठी देवी):
1. पुराणों में, विशेष रूप से ब्रह्मवैवर्त पुराण में, ‘षष्ठी देवी’ (जिनके नाम पर यह पर्व ‘सूर्य षष्ठी’ या ‘छठ’ कहलाता है) को भगवान कार्तिकेय की पत्नी ‘देवसेना’ के रूप में वर्णित किया गया है। षष्ठी देवी को संतान की रक्षक देवी माना जाता है, और छठ पूजा का एक मुख्य उद्देश्य संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य भी है।
3. एक अन्य मान्यता के अनुसार, उन्हें इंद्र की पुत्री भी कहा जाता है, और इंद्र ने ही उनका विवाह कार्तिकेय से कराया था, जब कार्तिकेय देवताओं के सेनापति बने थे। महाभारत में देवसेना को प्रजापति दक्ष की पुत्री बताया गया है, जबकि कुछ संस्कृत ग्रंथ उन्हें देवों के राजा इंद्र और उनकी पत्नी शची की पुत्री मानते हैं। स्कंद पुराण के तमिल संस्करण में, उन्हें भगवान विष्णु की पुत्री के रूप में चित्रित किया गया है, जिन्हें बाद में इंद्र ने गोद लिया था और बाद में इंद्र ने उनकी सगाई कार्तिक से कर दी थी।
कंफ्यूजन:
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, जब भगवान ने दुनिया बनाई, तो उन्होंने पुरुष और प्रकृति की द्वैतता भी बनाई। फिर प्रकृति को कई तत्वों में विभाजित किया गया, जिनमें से छठा भाग छठी/षष्ठी है… उन्हें ‘देवसेना कहा जाता है।” हालांकि जबकि छठी मैया को अक्सर सूर्य की सहचरी कहा जाता है, ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवसेना का उल्लेख कार्तिक की पत्नी के रूप में भी मिलता है।
रॉबर्ट एल. ब्राउन, अपनी पुस्तक ‘गणेश: स्टडीज ऑफ एन एशियन गॉड’ में, गणेश खंड से उद्धृत करते हैं कि कामदेव ने कार्तिक को ‘यौन विज्ञान का ज्ञान’ दिया; इसके बाद “ब्रह्मा ने वेदों का पाठ किया और सुंदर, मनमोहक, अच्छे स्वभाव वाली देसेना (जिसे विद्वान षष्ठी कहते थे) का कार्तिक से विवाह किया।”
  • उपर्युक्त मान्यताएं लोककथाओं और कुछ क्षेत्रीय ग्रंथों पर आधारित हैं।
  • स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्मांड पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख बहुत संक्षिप्त में मिलता है।
  • वहीं, उत्तर भारत में, भगवान कार्तिकेय को आमतौर पर ब्रह्मचारी और अविवाहित माना जाता है।
  • पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, छठी मैया, जिन्हें षष्ठी देवी या देवसेना कहा जाता है, भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं।
  • लोक आस्था और पर्व की परंपरा में, वह सूर्य की उपासना से जुड़ी हुई हैं, जहाँ उन्हें सूर्य की बहन या उनकी शक्ति के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।
  • दोनों ही मान्यताएँ इस पर्व का हिस्सा हैं, इसलिए ये कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है।
  • आप छठी मैया को संतान की रक्षक देवी (कार्तिकेय की पत्नी) और सूर्य देव से जुड़ी शक्ति (पर्व का आधार) के रूप में याद रख सकते हैं।
  • (साभार – वेब दुनिया)