नयी दिल्ली: ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर की बिक्री जब से शुरू हुई है, यह रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाता जा रहा है। बात स्कूटर के प्री- बुकिंग की करें तो ये 15 जुलाई से शुरू हुई और 24 घंटे के दौरान ही इसके एक लाख से ज्यादा स्कूटर बुक हो गए थे। वहीं अब बिक्री में भी एक दिन में 600 करोड़ कीमत की बिक्री पूरी होने के बाद कंपनी ने दूसरे दिन 500 करोड़ के इलेक्ट्रिक स्कूटर बेच डाले। इस तरह कंपनी की दो दिन की बिक्री 1100 करोड़ रुपए से ज्यादा कीमत की हो गई है।
ओला के फाउंडर भाविश अग्रवाल ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए बिक्री के आंकड़े जारी किए हैं। उन्होंने लिखा, ‘दूसरा दिन पहले से भी शानदार रहा। 2 दिन में 1100 करोड़ रुपए की बिक्री पार हो गई। खरीदारी 1 नवंबर को फिर से शुरू होगी।’ बता दें कि कंपनी ने 15 सितंबर से स्कूटर की आधिकारिक बुकिंग शुरू की थी, जो 16 सितंबर तक चली है। भाविश अग्रवाल की मानें तो कंपनी ने हर सेकेंड 4 स्कूटर्स की बिक्री की है।
ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर दो वैरिएंट- S1 और S1 प्रो में आता है। ओला S1 की कीमत 99,999 रुपये और ओला S1 प्रो वैरिएंट की कीमत 1,29,999 रुपए है। बिक्री के दिन ग्राहक 20,000 रुपये की बुकिंग राशि देकर स्कूटर ऑनलाइन बुक कर सकते हैं। हालांकि अगर आप खरीदारी करने से चूक गए हैं, तब भी आप अगली सेल के लिए स्कूटर 499 रुपये में ऑनलाइन बुक कर सकते हैं। सिंगल चार्ज में 180किमी तक की रेंज मिलेगी
कंपनी का दावा है कि इसकी बैटरी 750W की क्षमता के पोर्टेबल चार्जर से तकरीबन 6 घंटे में फुल चार्ज हो जाएगी। इसके अलावा कंपनी के सुपरचार्जर से ये बैटरी महज 18 मिनट में ही 50% तक चार्ज हो सकती है।
ओला का दावा है कि ये इलेक्ट्रिक स्कूटर एक बार फुल चार्ज होने के बाद 180 किलोमीटर तक का ड्राइविंग रेंज देता है। ओला इलेक्ट्रिक स्कूटर में कंपनी ने 3.9 केडबल्यूएच की क्षमता का बैटरी पैक दिया है और इसका इलेक्ट्रिक मोटर 8.5 kW का पीक पावर जेनरेट करता है।
घर में बेटा हुआ तो ढोल-नंगाड़े बजवा दिए गए, बात जब पढ़ाई-लिखाई की आई तो बेटे को प्राइवेट स्कूल में और बेटी को सरकारी स्कूल में धकेल दिया। मैंने ये गैर-बराबरी बचपन से अपने आसपास देखी। भविष्य की बेटियों के साथ ऐसा नहीं देखना चाहती थी इसलिए अपने बल पर उनके लिए स्कूल की फीस जमा की। मैं किसी बहुत रईस खानदान से नहीं थी, लेकिन एक लड़की की जिंदगी में एजुकेशन का महत्त्व जानती हूं। अगर मैं खुद पढ़ी-लिखी नहीं होती, तो आज शायद 34, 500 बेटियों के लिए 3 करोड़ 80 लाख रुपये स्कूल फीस जमा नहीं कर पाती। ये बातें हैं गुजरात के वडोदरा की निशिता राजपूत की।सबकुछ करने की हिम्मत रखता है, लेकिन दूसरों के भले के लिए कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं है।
एक बार मैं अपने पापा के साथ कहीं गई थी, वहां मुझे एक बूढ़ी अम्मा दिखीं, जो सूखे चावल खा रही थीं। जब मैंने जानना चाहा कि वे ऐसा रूखा-सूखा खाना क्यों खा रही हैं, तब पता चला कि उनके आगे पीछे-कोई नहीं है और एक परिवार उन्हें टिफिन दे जाता है। घर लौटकर भी मेरा मन उन बूढ़ी अम्मा की सोच में खोया रहा। उनका घर इतना दूर था कि चाहते हुए भी हर दिन उन तक अपने घर से खाना पहुंचाना मुश्किल था। उस समय हमने एक तरकीब निकाली। अम्मा के आस-पास रहने वाली एक महिला से संपर्क किया, जो हर दिन टिफिन बनाकर उन तक पहुंचाती और बदले में उन्हें पैसे मिलते। इससे दो चीजें हुई, अम्मा को अच्छा खाना मिला और उस महिला को फाइनेंशियल हेल्प। एक अम्मा से शुरू हुआ ये सफर आज 204 बुजुर्गों तक जा पहुंचा है। इससे बूढ़े अम्मा-बाबा को अच्छा खाना और कई महिलाओं को घर बैठे रोजगार मिल सका है। हमारी ये कोशिश भी पूरी तरह से डोनेशन पर चल रही है।
मैं न किसी संस्था से जुड़ी हूं और न मेरा अपना कोई फाउंडेशन है, लेकिन शिक्षित बेटियों को देखने का मेरा सपना है। मैं लोगों से बेटियों के लिए फंड मांगती हूं और फीस जमा करती हूं। इसी साल जनवरी में मेरी शादी हुई है। अपनी शादी की गैर जरूरी खर्चों को किनारे कर उन पैसों से मैंने 251 बच्चियों की स्कूल फीस जमा की और 21 लड़कियों के नाम से 5 हजार की एफडी कराई। बच्चियों की पढ़ाई के लिए मैंने 11 साल पहले काम शुरू किया, तब से आज तक कुल 34,500 बच्चियों के लिए 3 करोड़ 80 लाख रुपये स्कूल फीस के तौर पर जमा कर चुकी हूं। मुझे हमेशा से लगता था कि शिक्षा पर अधिकार जेंडर देखकर तय नहीं किया जाना चाहिए। फिर भी बदहाली, अशिक्षा और लड़के-लड़की के बीच समाज में ऐसा अंतर है, जो कहता है कि लड़कों की शिक्षा लड़कियों की शिक्षा से ऊपर होनी चाहिए। ये बात मुझे हमेशा खटकती रही और इसीलिए आज से 11 साल पहले मैंने तय किया कि मैं छात्राओं की शिक्षा के लिए काम करूंगी।
मेरे इस फैसले की शुरुआत 151 बच्चियों के साथ हुई। ये वो दौर था, जब किसी के दरवाजे पर जाती और बच्चियों की फीस भरने के लिए उनसे मदद मांगती, तो ज़्यादातर लोग पल्ला झाड़ लेते, लेकिन जिन लोगों ने मदद की उसके बाद से उन्होंने मेरासाथ नहीं छोड़ा। मुझे जब भी कहीं से कोई फाइनेंशियल हेल्प मिलती, उस डोनेशन की ट्रान्स्पेरन्सी बनाए रखने के लिए मैं डोनर्स तक बच्चों का बायोडाटा शेयर करती, जिससे उन्हें इस बात की जानकारी रहे कि उनके पैसे किस बच्चे की पढ़ाई पर खर्च हो रहे हैं।
अपनी कोशिशों के बाद आज मुझे इतनी मदद मिल रही है, जिससे हर दिन मैं कई बच्चियों के सपने पूरे कर पा रही हूं। मजेदार बात ये है कि इन 11 सालों के सफर में मेरी टीम सिर्फ दो की रही। मैं और मेरे पापा। हम दोनों मिलकर सारा काम देखते हैं। चूंकि मैं कोई संस्था नहीं चला रही, इसलिए लोगों को अपने साथ जोड़ना मेरे लिए नामुमकिन है। मेरा काम स्कूल और डोनर्स के बीच एक ब्रिज बनने का है। मुझे मेरा बचपन याद है, जब मैं और पापा सड़क किनारे बच्चों को केले और बिस्कुट देने जाया करते थे, तब उनका जोर इस बात पर रहता था कि इंसान अपने लिए
पालमपुर : बांस का नाम सुनते ही कुछ चीजें ध्यान में आती हैं। पहला पशुओं के लिए बांस का चारा, दूसरा इसकी लकड़ी से तैयार होने वाली टोकरियां व ग्रामीण क्षेत्र में मिट्टी के मकानों में बनने वाली छत। कम ही लोग जानते हैं कि बांस अब खाने की थाली में भी शामिल हो रहा है। बांस का अचार तो बनता था, अब इससे बने नूडल्स, कैंडी और पापड़ का भी जायका ले सकते हैं। हिमालय जैव संपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आइएचबीटी) पालमपुर ने बांस से खाद्य पदार्थ भी तैयार किए हैं। ये पदार्थ स्वादिष्ट तो हैं ही, इनमें प्रोटीन, कैल्शियम व फाइबर भी मिलते हैं।
खाद्य पदार्थों के अलावा विज्ञानियों ने बांस का कोयला भी तैयार किया है। यह कोयला जल्दी जलता है। इससे ऊर्जा व लकड़ी के संरक्षण में भी मदद मिलेगी। संस्थान में बांस की मदद से धागा बनाने का कार्य चल रहा है। यह कार्य लगभग अंतिम चरण में है।
आइएचबीटी कई वर्ष से बांस पर शोध कर रहा है। बांस की कई प्रजातियां तैयार करने के लिए मशहूर इस संस्थान में 10 वर्ष पहले बांस का संग्रहालय बना था। इसमें दरवाजे, खिड़कियां, फर्श और छत सब बांस का है। यह आज भी वैसा ही लगता है जैसे शुरुआती दौर में था। इसे हाउस आफ बैंबू कहते हैं। विज्ञानियों के अनुसार बांस की मदद से कपड़ा, लकड़ी की टाइल, शैंपू, प्लाई बोर्ड सहित कई पदार्थ तैयार किए जा सकते हैं। इस दिशा में कई देशों में कार्य हो भी चुका है। नूडल्स, बडिय़ों और पापड़ में बांस का 35 प्रतिशत फाइबर
आइएचबीटी में तैयार खाद्य पदार्थों में नूडल्स बनाने में करीब 35 प्रतिशत बांस के फाइबर व आटे का प्रयोग किया गया है। बडिय़ों व पापड़ में भी करीब 35 प्रतिशत बांस के फाइबर का प्रयोग हुआ है। कैंडी पूरी तरह बांस से बनाई गई है। फाइबर से शरीर स्वस्थ रहता है।
हिमाचल में बांटे 50 हजार पौधे
आइएचबीटी ने राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत अब तक हिमाचल में करीब 50 हजार पौधे किसानों को वितरित किए हैं। संस्थान में बांस की कुल 40 प्रजातियां हैं। इनमें बेहद कम समय में लगने वाली प्रजातियां भी हैं।
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपका परिचय मध्ययुगीन कवयित्री तुलछराय से करवाऊंगी। इनका समय संवत 1850 के आस-पास माना जाता है। तुलछराय जोधपुर के महाराजा मानसिंह की आश्रिता या रक्षिता थीं। वही मानसिंह जिन्होंने तेरह विवाह किये थे और इसके अलावा भी उनकी बहुत सी उप पत्नियां थीं। इन्हीं में से एक थीं तुलछराय। इसके अतिरिक्त इनका और कोई परिचय नहीं मिलता। वैसे भी भारतीय समाज में स्त्रियों का कोई विशेष परिचय तो होता नहीं है। जिसके साथ रही, उसके नाम से जानी गई। पति और समाज ने मान दिया तो रानी का ओहदा मिला अन्यथा दासी, आश्रिता या बेहद अपमानजनक शब्द, रक्षिता। तुलछराय को भी इस असम्मानजनक स्थिति को झेलना पड़ा होगा लेकिन निराश्रित या पारिवारिक संरक्षण से वंचित स्त्री के लिए इस तरह के आश्रय को स्वीकारने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं था। इस स्थिति में एक रास्ता भक्ति की ओर सहजता से ले जाता है। और इस मार्ग पर दासी, रानी या रक्षिता में कोई विशेष अंतर नहीं रहता। अपनी सपत्नी अर्थात राजा मानसिंह की पत्नी प्रताप कुंवरी बाई जो तीजण भटियाणी के नाम से ख्यात थीं और रामभक्ति पर केंद्रित पंद्रह ग्रंथों की रचना की थी, की संगति में इन्होंने भी भक्ति मार्ग की ओर कदम बढाए एवं काव्य रचना आरंभ की। इन्होंने भी राम को ही अपना आराध्य देव बनाया। राम की भक्ति में डूबकर लिखी गई इन रचनाओं में तुलछराय ने स्वयं को राम के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दिया है। सामाजिक प्रतिष्ठा न मिल पाने की स्थिति में भक्ति के द्वारा मुक्ति का रास्ता सहज रूप से आकर्षित करता है। भक्तिन के रूप में एक तरह का समादर न भी सही महत्व तो मिलता ही है जो विलासिता में डूबी रानी या रक्षिता को प्राय: नहीं मिलता। साथ ही अपने हृदय की भावनाओं को भक्ति की चाशनी में लपेटकर अभिव्यक्ति देने का मार्ग भी सुलभ हो जाता है। तुलछराय जैसी स्त्रियों के लिए भक्ति का रास्ता पलायन का नहीं बंधनों के प्रति थोड़ा ही सही, विद्रोह का सुलभ रास्ता था। अपनी दीन दशा से मुक्ति के लिए राम को आर्त भाव से पुकारती हुई तुलछराय के पदों में मध्ययुगीन स्त्री की पीड़ा और बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट को सहजता से अनुभूत किया जा सकता है। राम से अपनी सुध लेने का आग्रह करती हुई कवयित्री कहती हैं-
“मेरी सुध लीजो जी रघुनाथ।
लाग रही जिय केते दिन की, सुनो मेरे दिल की बात।
मोको दास जान सियाबर, राखो चरण के साथ।
तुलछराय कर जोड़ कहे, मेरो निज कर पकड़ो हाथ।”
एक और पद देखिए जिसमें कवयित्री अपने आराध्य देव का स्वरूप वर्णन करती हुई, उन पर न्यौछावर होती हुई उनसे अपने ह्रदय में बस जाने का आग्रह करती हैं –
“सियावर श्याम लगे मोहे प्यारे हैं।
क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल हाल तिलक सुखकारो है।
मुख की शोभा कहा कहूं उनकी, कोटि चंद उज्यारो है।।
गल बिच कंठी है रतनारी, बनमाला उर धारी है।
केसरिया जम जरकस को, दुपटो लाल लप्पारी है।।
पीताम्बर पट कटि पर सोहे, पायन झंझर न्यारी है।
तुलछराय कहे मो ह्रदय बिच, आय बसों धनुधारी है।।”
इस पद में भक्ति और प्रेम का प्राबल्य इतना अधिक है कि राम और कृष्ण में कोई विशेष अंतर नहीं रहा है। कवयित्री राम का स्वरूप चित्रित करती हैं लेकिन पाठकों को पढ़ते हुए ऐसा लगाता है मानो दृष्टि के समक्ष कृष्ण की सांवरी सूरत चित्रित हो उठी हैं। इस पद को पढ़ते हुए मीराबाई का पद “बसों मेरे नैनन में नंदलाल” का स्मरण अनायास हो आता है। एक और पद में कवयित्री राम के साथ होली खेलने का प्रसंग सृजित करती हैं जिसे पढ़ते हुए राम की जगह कृष्ण का स्वरूप ही दृष्टि के समक्ष साकार हो उठता है-
“सीताराम जी से खेलूं मैं होरी। भर लूं गुलाल की झोली।।
सजकर आई जनक किशोरी। चहुं बंधुन की जोरी।
मीठे बोल सियावर बोलत। सब सखियन की तोरी।।
हंसे हर सूं कर जोरी।”
दरअसल सखी या सपत्नी के प्रभाव से तुलछराय ने राम के प्रति अपनी भक्ति तो प्रकट की लेकिन उनके द्वारा सृजित पदों में राम और कृष्ण दोनों आपस में घुल-मिल गए हैं। दरअसल भक्ति, रूढ़ियों में जकड़ी मध्ययुगीन स्त्री के लिए ताजा हवा के झोंके की तरह थी। कुछ भी लिखना या अपने को अभिव्यक्त कर पाना ही उसके लिए मुख्य था। चूंकि सामाजिक बंधन ऐसे थे कि भक्ति के अतिरिक्त स्त्रियों के लिए और कोई रास्ता बचता नहीं था इसलिए राजकुल से संबंधित अधिकांश मध्ययुगीन स्त्रियों ने सामाजिक मर्यादा का निर्वाह करते हुए भक्ति की राह चुनी। लेकिन इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि भक्ति के माध्यम से ही ह्रदय में संचित कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति भी अनायास हो जाती थी। आराध्य देव के प्रति प्रेम का स्फुरण और उसका प्रकटन बेहद स्वाभाविक था। इसी कारण अपनी सामाजिक मर्यादा की रक्षा करते हुए भक्त नारी अपने आराध्य देव राम की मूर्ति को अपने ह्रदय में बसा लेने का स्वप्न देखती है या उनके साथ होली खेलना चाहती है। इसी तथ्य की ओर संकेत करती हुई और तुलछराय के पद को उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत करती हुई डॉ. सुमन राजे अपनी पुस्तक “इतिहास में स्त्री” में लिखती हैं- “रामकाव्य लिखते समय भी राम का चरित्र भर स्वीकार किया गया है, अनुभूति और अभिव्यक्ति वही कृष्णकाव्य की ही रही। संभव है राम भक्ति के ‘रसिक’ संप्रदाय का प्रभाव रहा हो या नारी जीवन की ‘कोमल- वृत्ति’ का तकाजा।”
उपास्य देव कोई भी क्यों ना हो, उपास्य के प्रति समर्पित तुलछराय के पदों में भक्ति की सहज स्वाभाविक एवं मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। जहाँ बहुत से लोग भक्त कवयित्री तुलछराय के नाम से भी अपरिचित हैं वहीं कुछ ऐसे भी साहित्यकार हैं जो उनके साहित्यिक अवदान को स्वीकारते हुए भक्ति साहित्य में उनके महत्व को रेखांकित करते हैं। शांता भानवत अपनी पुस्तक “मध्यकालीन राजस्थानी काव्य के विकास में कवयित्रियों का योगदान” में लिखती हैं- “भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से राम-काव्य धारा की कवयित्रियों में तुलछराय का भी गौरवपूर्ण स्थान है। विरहानुभूति कवयित्री के पदों का शृंगार है।” तुलछराय का कोई स्वतंत्र ग्रंथ नहीं मिलता। यत्र -तत्र बिखरे इनके फुटकर पद अवश्य मिलते हैं। सहज- सरल राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में सृजित ये पद साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
कोलकाता : हिन्दी दिवस के अवसर पर शिक्षाविद् तथा लेखिका प्रो. प्रेम शर्मा के नव प्रकाशित कहानी संग्रह ‘रिश्ते’ का लोकार्पण सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय कक्ष में किया गया। इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कमला प्रसाद द्विवेदी ने उक्त कहानी संग्रह पर विचार रखते हुए कहा कि कहानी के यथार्थ में सपने का होना अनिवार्य है। लेखिका ने कहानी के यथार्थ का निर्वाह किया है। विशिष्ट वक्ता कविता अरोड़ा ने संग्रह में प्रकाशित कहानियों के शीर्षक को केन्द्र रखकर कहानियों और इनमें समाहित सम्बन्धों की समीक्षा की। सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने शुभकामनाएँ दीं। शिक्षाविद् तथा साहित्यकार दुर्गा व्यास ने संग्रह की कहानियों की सराहना की। इस अवसर पर उपस्थित समाजसेवी राजीव सिन्हा ने भी पुस्तक के लोकार्पण पर शुभकामनाएँ दीं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ताजा टीवी के चेयरमैन तथा छपते -छपते के सम्पादक विश्वम्भर नेवर ने कहानियों को अखबारों का महत्वपूर्ण लोकप्रिय अंग बताया और साथ ही आधुनिक समय में मोबाइल के माध्यम से साहित्य को लोकप्रिय बनाने पर जोर दिया। लेखकीय वक्तव्य में प्रो. प्रेम शर्मा ने अपनी रचना प्रक्रिया और कहानी संग्रह से जुड़े अपने अनुभव साझा किये।
कार्यक्रम का शुभारम्भ सुगन्धा झुनझुनवाला द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुआ। इसके बाद अतिथियों का स्वागत राजकुमार शर्मा, विनय कुमार शर्मा, अनीता शर्मा, लता शर्मा और पूजा शर्मा ने किया। इस अवसर पर युवा कलाकार नमिता सिंह ने स्वनिर्मित कलाकृतियाँ अतिथियों को भेंट दीं।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी आयोजित हुई जिसमें गजेन्द्र नाहटा, वी. अरुणा, वसुन्धरा मिश्र, कमलेश जैन, सुगन्धा झुनझुनवाला, सिद्धि जैन, राधा ठाकुर और प्रीति साव ने कविता पाठ किया। कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया औऱ दूसरे सत्र का संचालन प्रीति साव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी ने किया। इस अवसर पर समाजसेवी संजय बिन्नानी, विजय कुमार तिवारी, सपना कुमारी समेत गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।
कोलकाता: उत्तराखंड में शनिवार 18 सितंबर से चारधाम यात्रा शुरू होग रही है। नैनीताल उच्च न्यायालय के ताजा आदेश को देखते हुए यात्रा का आयोजन कोविड नियमानुसार किया जाएगा। गुरुवार को ही हाईकोर्ट ने चारधाम यात्रा पर लगी रोक को कुछ पाबंदियों के साथ हटा लिया है।
कोर्ट के आदेश के मुताबिक केदारनाथ धाम में रोजाना 800, बद्रीनाथ धाम में 1000, गंगोत्री में 600 और यमनोत्री धाम में 400 श्रद्धालुओं की संख्या पर रोक है। कोर्ट ने चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जिलों में चारधाम यात्रा के दौरान जरूरत के मुताबिक पुलिस बल तैनात करने को कहा है। इसके साथ ही श्रद्धालुओं को यात्रा के दौरान किसी भी कुंड में स्नान नहीं करने दिया जाएगा। चारधाम की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए यह भी अनिवार्य होगा कि वे 72 घंटे पहले तक कोविड परीक्षण या दोहरी वैक्सीन के प्रमाण पत्र की नकारात्मक रिपोर्ट दिखाएं। इसके साथ ही देवस्थानम बोर्ड में पंचकरण करवाना भी अनिवार्य होगा। राज्य के मुख्य सचिव डॉ एसएस संधू ने सभी संबंधित विभागों को यात्रा की तैयारियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं. मुख्य सचिव के अनुसार, चारधाम राज्य में लाखों लोगों के रोजगार और आजीविका का स्रोत है। चारधाम आने वाले सभी श्रद्धालुओं के लिए मास्क पहनना, शारीरिक दूरी के मानक का पालन करना और सैनिटाइजेशन कराना सुनिश्चित किया जाए।
दिलीप जावलकर, सचिव पर्यटन उत्तराखंड ने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय ने स्थानीय लोगों की आजीविका, कोविड महामारी के बेहतर प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, एसओपी का कड़ाई से पालन आदि को ध्यान में रखते हुए चारधाम यात्रा पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है। यात्रा से उत्तरकाशी, चमोली और रुद्रप्रयाग जिले के हजारों यात्रा व्यवसायियों और तीर्थ पुजारियों सहित वासियों की रोजी-रोटी पटरी पर आ सकेगी।
उत्तराखंड भा रहा है बंगाल के सैलानियों को
कोलकाता : उत्तराखंड बंगाल के पर्यटकों के लिए प्रिय पर्यटन स्थल बनता जा रहा है। उत्तराखंड आने वाले पर्यटकों की संख्या के मामले में बंगाल शीर्ष 5 राज्यों में शामिल है। सर्दियों में सैलानियों की तादाद बढ़ने की उम्मीद है, अतएव उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद (यूटीडीबी) ने तैयारी शुरू कर दी है। धार्मिक पर्यटन के साथ शीतकालीन तथा साहसिक खेलों के प्रोत्साहन के लिए यूटीडीबी ने जिला प्रशासन के साथ नैनीताल, भीमताल, पंगोट, मसूरी समेत विंटर कार्निवल आयोजित करना आरम्भ किया है। उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के अपर निदेशक विवेक सिंह चौहान ने कहा कि उत्तराखंड आने वालों में 10 फीसदी पर्यटक कोलकाता के ही हैं। उत्तराखंड ने इस वर्ष टीटीएफ पर्यटन मेले में भाग भी लिया था। उत्तराखंड सरकार ने होम स्टे योजना पर काम करना आरम्भ किया है।
कोलकाता : रुबी पार्क पब्लिक स्कूल द्वारा आयोजित ‘कौशल’ कार्यक्रम बड़े हीउत्साह और उमंग के साथऑनलाइन ज़ूमकेमाध्यम से ४ सितम्बर २०२१कोसंपन्न हुआ।इसउत्सवकाशुभारंभविद्यालयकीप्रधानाचार्याश्रीमती जोयितामजूमदारजीनेदीपप्रज्ज्वल से किया।तदोपरांत उन्होंने ख़ुशी ज़ाहिर करते हुए कहा कि इस परिस्थिति में इस तरह का कार्यक्रम एक महोत्सव है | भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है | बहुत सरल,सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवतः सबसे वैज्ञानिक भाषा है | यह कार्यक्रम एक प्रयास है बच्चों के अंदर छुपी प्रतिभा को उभारने का, उनका आत्मविश्वास बढ़ाने का और उन्हें अपनी भाषा के ‘हिंदी से हिंदुस्तान’ तक के इतिहास से परिचित करने का | साथ ही साथ उन्होंने उन सभी विद्यालयों को हृदय से धन्यवाद दिया जिन्होंने इस उत्सव में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया ।कौशल कार्यक्रम में मुख्यतः तीन प्रतियोगिताएं थी | जिसमें अभिनय में कक्षा २ से ४ के छात्रों ने भाग लिया दूसरा काव्य आवृत्ति में कक्षा ५ और ६ के छात्रों ने भाग लिया और अंतिम कथा वाचन दृश्य के साथ में ७ और ८ के छात्रों ने भाग लिया |इस प्रतियोगिता में २५ विद्यालयों ने भाग लिया | सभी प्रतिभागियों ने अपने हुनर को बखूबी से सभी के सामने प्रस्तुत करते हुए यह साबित कर दिया कि छात्र यदि कुछ करने की ठान लेते हैं तो कैसी भी परिस्थिति क्यों न हो वो कर दिखाते हैं |
महाकवि सेठियाजी का काव्य’ दीप किरण’ – – -महाकवि सेठियाजी का संपूर्ण काव्य जीवन की चरम विरोधी धाराओं के बीच विराजित सत्य के अस्तित्व को ढूंढने की गूढ़तम अनुभूतियों की जय यात्रा है।
दीपकिरण का कवि चिरंतन का साधक है। इस काव्य संग्रह में 147 के लगभग कविताएं संग्रहित हैं। कवि ने स्वयं कहा है कि गो धूलि की बेला में प्रज्वलित इस दीपकिरण को अब पौ फटने की बेला से लेकर पथ पर चलने का उपक्रम हुआ है तो इसके उर में स्नेह है या नहीं, इसकी चिंता मैं क्यों करूँ? क्षितिज पर जब कि एक प्रभापूर्ण रक्त बिम्ब उदय हुआ ही चाहता है तब इस दीपकिरण के बांटे पड़े मिटते अंधेरे को ही इसका सुहाग क्यों न मान लूँ।
कवि की कोमल भावनाएं स्वतः ही प्रकृति प्रीतम से जुड़ी हुई हैं उसे किसका डर है – –
प्रात – सा प्रियतम सुंदर
फूंक सखी झकझोर
कहेगी मिल ले, क्या डर!(नव प्रबाल – सा रंग)
दीप की इन किरणों में सूर्य किरणों – सी प्रचंडता नहीं है, वे तो अनमोल हैं – –
रवि किरणों का ताप नहीं है,
चपला का उत्ताप नहीं है,
अर्ध – निशा का प्रिय – पथ- पंथी बता सकेगा मोल!
दीप की ये किरणें अनमोल।
छोटा सा दीप लेकिन उसकी कोमल किरणें उग्र नहीं शांत हैं जो हृदय को शान्ति प्रदान करती हैं।
‘फूल विहंसता शूल मौन है’ कविता में कवि कहता है – – –
फूल विहँसता शूल मौन है,
एक डाल के दोनों साथी,
दोनों को ही हवा झूलाती,
फूल झरेगा, शूल रहेगा, सत्य कौन है?
भूल कौन है?
एक ही पेड़ में रहने वाले फूल और शूल में फूल खिला हुआ होता है हंसता है लेकिन शूल अंत तक पेड़ में ही रहता है। फूल को पता है कि उसे झड़ जाना है फिर भी हँसी खुशी में अपना क्षणभंगुर जीवन बिताता है वहीं शूल कठोर और नीरस बनकर रहता है इसलिए सभी उससे दूर रहते हैं। वह अपने लिए ही जीता है दूसरों को तो कष्ट ही देता है।
सुख दुःख इस सृष्टि के दो भाग हैं जिनका वर्णन हमारे शास्त्रों में हुआ है।वेद, गीता , उपनिषद, पुराण आदि भारतीय काव्य के उत्स रहे हैं जो हिंदी के आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक किसी न किसी रूप में उसकी धारा में अंतर्निहित है। निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासकों और संतों ने अपने भीतर स्थित शक्तियों को पहचानने पर बल दिया है। भारतीय दर्शन का प्रभाव सेठिया जी की रचनाओं पर पड़ना स्वाभाविक है। उनका कहना था कि बिना दर्शन के कविता का मूल्य नहीं है। भारतीय दर्शन जीवन जीने की कला है।
दीपकिरण काव्य संग्रह की अधिकतर रचनाएँ दीप के विभिन्न रूपों को उजागर करती हैं और उसी के मिस जीवन दर्शन को विश्लेषित करती हैं – –
नीर भरी नदियाँ लहराते
सागर उनमें प्यास बुझाते
किंतु गगन की एक बूंद हित
चातक के नयनों में जल है (दीपकिरण, पृष्ठ 25)
कवि के लिए प्रकृति छांँह की तरह है – – –
‘छांँह – सी तुम, धूप सा मैं ‘कविता में वे कहते हैं – – – लहर सी तुम, फूप सा मैं
गीत सी तुम रूप सा मैं (दीपकिरण, पृष्ठ 26)
प्रकृति कवि की सखी है – – वे उसके सूखे हृदय में अपनी स्नेह की स्निग्धता भरना चाहते हैं –
ठहर सखी मैं दीप जला दूँ
शुष्क हृदय में स्नेह भरूँ मैं
फिर बाती को ज्वलित करूँ मैं
स्वयं तृषित हूँ तो इससे क्या
इन प्यासों की प्यास बुझा दूँ। (पृष्ठ 36)
कवि दीप के माध्यम से समाज के साधारण और निचले वर्ग के लोगों के लिए द्रवित है। धूप के प्रचंड रूप के सामने छोटे-छोटे दीपों की क्या बिसात है। कवि उनके जीवन में अपनी प्यास नहीं, उनकी प्यास को बुझाने के लिए उद्यत है। तभी तो वह कहता है – –
मैंने तो जलना ही सीखा (पृष्ठ 34)—
उजला दिन ढलता है – – – –
सूने नभ में एक सितारा
दिन का बन प्रतिरूप बिचारा
झाँक रहा है बिना दिवस के जग
कैसे चलता है? (पृष्ठ 37)
मिट्टी से बना दीप कितने संघर्षों को झेलता है।उसी तरह सागर की सीप की भी स्थिति है – – –
मैं मिट्टी का दीप
चिनगारी ही पी लेता हूँ
जल जलकर ही जी लेता हूँ
पर जब प्रिय आगम की बेला
एक फूंँक में पहुंँचा देते मुझको मरण समीप
मैं सागर की सीप
युग युग तल के तम में रोती
किंतु पीर जब बनती मोती
कर दो टूक कलेजा मेरा
एक चोट में पहुंँचा देते मुझको मरण समीप
मैं अधरों का गीत
शब्द शब्द गूंँथ गूँथ कर कोई
बड़े यत्न से लड़ी सँजोई
किंतु बहाना लेकर लय का
एक कम्प में पहुँचा देते मुझको मरण समीप।(पृष्ठ 40)
गरीब क्षुद्र और निम्न श्रेणी के लोग अपने अंँधेरों को दूर करने के लिए कई संघर्ष झेलते हैं और समाज को अपना बहुमूल्य योगदान देते हैं लेकिन उसका मोल उन्हें मरण समीप पहुंँचा कर दिया जाता है।
कवि ने ‘मैं तुम्हारे प्यार का आधार लेकर क्या करूँ’ , ‘देख घन के बीच उजली दामिनी की रेख’ , ‘ढल चली दिन की अवस्था हो गया दिन वृद्ध’ , ‘मौन सोई छाँह’ , ‘प्रीत की क्या रीत साथी’ , ‘सहसा दीप जला’ , ‘कितना विषम प्राण का सौदा’ , ‘विहग के लघु लघु कोमल पंख’ ,’ रात अंधेरी पथ पर चलता’ आदि दीप के लिए अनगिनत भावों से पूर्ण चित्रों का प्रयोग किया है। अपनी ‘सांस’ को तूली और,’ रंग जीवन ‘को मानते हुए कवि संपूर्ण चित्र के बनने का सपना देखता है – –
पूर्ण होगा चित्र जिस दिन
तूलिका रुक जाएगी फिर
तू चितेरा जो अचिर है
उस घड़ी बन जाएगा चिर
चाहता है और क्या तू
मोल इस श्रम का अकिंचन।
जड़ता और अचेतन मनुष्य को प्रेम का स्पर्श आकाश का विस्तार देता है – – रवीन्द्र नाथ की ये पंक्तियाँ स्मरण हो आईं। ‘ पारसमणि छुआओ प्राणे– ऐ जीवन धन्य करो’। कवि सेठियाजी की पंक्तियाँ – –
मधुरे मैं आकाश बन गया
मैं जड़ तेरे सरस परस से सहसा नया विकास बन गया। ऐसा ही अहसास दिलाती हैं।
फूलों को खिलते देख कवि को अच्छा लगता है लेकिन ‘सांझ’ होते ही वह गिर जाता है और शूल भी चुभ जाता है लेकिन वैसी स्थिति में भी वह दीप को जलते हुए देखता है।
‘मेघों की ढोलक की धुन पर’ कविता में वर्षा का बहुत सुंदर चित्रण है जहांँ मेघों की धुन और लय में बूंँदों का मंजीरा पहनकर विद्युत रूपी ‘पतुरिया’ की थिरकन देखते ही बनती। चाँद सितारे ऊँघते लगे लेकिन विरहिन प्रिय के आने इंतजार करते करते उसकी ‘अँगुरिया’ घिस गईं। पवन की’ कुटलाई’ भी इतनी तेजी से बढ़ गई थी कि प्रिय के दस्तक देने पर भी बंद ‘किंवरिया’ खुल न सकी।वर्षा में नायिका का नायक के लिए प्रतीक्षा करना रीति कालीन नायिकाओं की भी याद दिलाती है।(पृष्ठ 89)वर्षा के मानवीकरण का बहुत सूक्ष्म और सुंदर वर्णन है।
जयशंकर प्रसाद जी ने प्रकृति को एक नवयुवती के रूप में चित्रित किया है लेकिन राष्ट्र के हितों को ध्यान में रखते हुए देशवासियों को जागरण का संदेश भी देते हैं जो कवि की जिम्मेदारी को दर्शाता है।
‘बीती विभावरी जाग री, अंबर पनघट में डूबो रही तारा घट उषा नागरी’ जैसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। जहाँ प्रकृति का मानवीकरण और राष्ट्र जागरण का संदेश है।
कवि सेठिया जी कविता में अपने मन की बात’ मुझे राह का शूल बना दो’ कविता में माखनलाल चतुर्वेदी की कविता का आभास होता है।पुष्प की अभिलाषा की पंक्तियाँ – मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेंक, मातृभूमि पर शीश नवाने, जिस पथ जाएँ वीर अनेक’ कहते हैं।
सेठियाजी उस काल के कवि हैं जब राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, रामधारी सिंह’ दिनकर’ आदि कवियों की रचनाएँ भारतवासियों को उद्वेलित कर रही थीं।
महादेवी वर्मा के’ मधुर – मधुर मेरे दीपक जल ‘की – सी एक कसक सेठिया जी की हर रचना में दिखाई पड़ता है। राष्ट्र के प्रति उनका अनवरत प्रेम शेष लोगों तक पहुंँचाने के लिए उद्यत है – – –
तुम मधुर गान, मैं वेणु विकल
हैं जिसके उर में भी छेद,
तुम प्रथम पाठ, मैं शेष पृष्ठ
अब रहा न जिसमें भेद, (पृष्ठ 111दीप)
वे कहते हैं मैं ऐसे हर व्यक्ति का गीत बनूँ, तुम गाओ। कवि उनके स्वरों का मादक मधु लेकर पतझर को वसंत में बदलना चाहता है।
‘काले बादलों की ओट लेकर छिपी हुई रात’ रो रही है। प्रकृति उनके दुख से दुखी है। (पृष्ठ 114,दीप )
‘तारों की बिखरी बस्ती में’ – जब वे कहते हैं कि पूनम को उस दिन देखा था /चेहरा था कैसा गोल भरा? पर, आज दूज को देख रहा /बस, दुबला पतला डरा डरा।
कवि चाँद को अपने से तुलना कर देखता है। कमजोर वर्ग हमेशा अपनी कमजोरी के कारण चिंताओं से घिरा हुआ होता है। (पृष्ठ 144दीप)’ झंझा के प्रबल झकोरे’ में चाँद सितारे डूबे हुए हैं और चपल विद्युत का करुण उजाला है। चित्रों का प्रयोग बहुत ही अलग उपमाओं से की है पृष्ठ 166दीप)
दीप किरण में ननद भाभी के रिश्तों और बेटी के रूपक से वर्षा का सुंदर चित्रण है जो संभवतः किसी कवि में नहीं मिलता – – -‘ नभ वर के घर में रोती
पीहर की सुधि में पगली(‘ पृष्ठ 178 दीप)
दीप जलता है। उसकी किरणों से वह अपने तिमिर को तिरोहित करना चाहता है – बहुत ही सुंदर पंक्तियां – – –
अपनी कोमल किरण आँज कर /मेरा तिमिर तिरोहित कर दो। नेह पिये अकुलाती प्रतिपल /मेरी सुघड़ सलोनी बाती, /आधी रात कटी आँखों में/कब से बैठी विरहा गाती, – – – मुझे मिले पाथेय प्रभा का
मैं प्रभात की बाँह पकड़ लूँ/—अपनी अरुण अंगुलियों से छू /मेरा शाप विमोचित कर दो!
दर्द, शून्य, ठोकर, कटुता,घृणा जितने अधिक मिलते हैं वह उतना ही ज्यादा खुशी का अनुभव करेगा। उसके लिए गरल पीना आसान है लेकिन उसको पचाना कठिन होता है।, प्यार को पाना कठिन क्या /है कठिन उसको निभाना (पृष्ठ 180) कवि जानता है कि इस असंगति से भरे संसार में संगति का शिवमय रूप संजोना होगा।पृष्ठ 184। अंत में, कवि का अटूट विश्वास है कि काल भाल पर चढ़ने वाले जग में यदा-कदा ही आते हैं। ‘क्षर से अक्षर बनने वाले होते कोई नर विरले ‘194-।
अपनी मन गंगा में अवगाहन करने वाला ही सहज मुक्ति की मुक्ता चुगता है 195, दीप। वे कहते हैं वही सत्य है जो अशेष है। अतः इसका अनुसंधान चलता रहता है। शूल, सुमन, दीप, प्रेम, पीड़ा, दिन, रात, मौन, विकल, आँसू, पतझर, अम्बुद, कोयल, चाँद, बादल, किरणें, अचल, प्रकाश, चमेली, नलिनियांँ, अंबिया, क्षितिज आदि प्रकृति के प्रतीकों के साथ कवि अपने भावों को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। दुखों से गुजर कर ही कवि ऐसे गीत गा सका।
कोलकाता : भारतेंदु जयंती के उपलक्ष्य में बंगीय हिंदी परिषद में 15 सितंबर को नवजागरण दिवस मनाया गया।इस अवसर पर एक परिसंवाद गोष्ठी का आयोजन किया गया,जिसकी अध्यक्षता वर्द्धमान विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. शशि शर्मा ने की। वक्ताओं का स्वागत परिषद के मंत्री डॉ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी ने किया। मुख्य वक्ता शंभु कुमार यादव और प्रियंका सिंह ने भारतेंदु के नायकत्व पर प्रश्न खड़ा किया और परम्परा के पुनर्मूल्यांकन की बात कही। शम्भू यादव ने नवजागरण के संदर्भ में दलितों और आदिवासियों के आंदोलनों का जिक्र न होने का प्रश्न उठाया तो प्रियंका सिंह ने स्त्रियों के प्रश्नों के सन्दर्भों में भारतेंदुकालीन नवजागरण को देखने की कोशिश की। रितेश पांडेय ने कहा कि भारतेंदु और नवजागरण पर बात करते समय हमें केवल रामविलास जी की अवधारण ही सामने नहीं रखनी चाहिए बल्कि साथ साथ नामवर जी समेत अन्य आलोचकों के विचारों को भी देखना चाहिए, तभी एक समग्र मूल्यांकन संभव हो सकेगा। वक्ता भानु पांडेय ने जहाँ भारतेंदु को आज के समय से जोड़कर देखा वहीं वक्ता निखिता पांडेय ने भारतेन्दु के साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया और वक्ता पूजा मिश्रा ने भारतेंदु के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन अनूप यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापित करते हुए परिषद के सह सचिव डॉ. रणजीत कुमार ने कहा कि एक 18 साल के युवक(भारतेंदु) ने हिंदी साहित्य और समाज के लिए जिस चिंतन परंपरा की नींव रखी उसके लिए उसे नायक ही कहा जा सकता है खलनायक नहीं। ज्ञातव्य है कि भारतेंदु जयंती को नवजागरण दिवस के रूप में मनाने की परंपरा की शुरुआत बंगीय हिंदी परिषद ने ही की थी। परिसंवाद गोष्ठी में शहर के कई साहित्यकार, बुद्धिजीवी, शिक्षक और छात्र उपस्थित थे।