Saturday, April 11, 2026
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ऐ सखी सुन 50वाँ अंक : रत्नकुँवरि कहै राम रँगीलो, रूप गुनन आगारो रे

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों साहित्य- सृजन के क्षेत्र में आज असंख्य स्त्रियाँ सक्रिय हैं लेकिन एक जमाना वह भी था जब अक्षर ज्ञान तक स्त्रियों के लिए वर्जित था, लिखना तो दूर की बात है। हालांकि राजकुल की स्त्रियों की नियति इस मायने में थोड़ी सी ही सही अलग जरूर हुआ करती थी। राजकुल की लड़कियों को पढ़ने- लिखने के अवसर आसानी से मुहैया हो जाते थे और उनमें से कुछ प्रतिभावान लड़कियाँ, स्त्रियाँ पोथी पढ़ते हुए ग्रंथ लिखने के रास्ते पर भी अनायास ही चल पड़ती थीं। राजस्थान की बहुत सी स्त्रियों ने साहित्य- सृजन कर तत्कालीन समाज और साहित्य को अपने रचनात्मक अवदान से समृद्ध किया है। राजस्थान राजघराने की ऐसी कुछ स्त्रियों की साहित्य साधना से मैं आपको परिचित करवा चुकी हूं। आज आपका परिचय मध्यकालीन कवयित्री रत्नकुँवरि बाई से करवाऊंगी जो रत्नकुँवरि भटियानी के नाम से भी जानी जाती हैं। 

रत्नकुँवरि बाई जोधपुर के महाराजा मानसिंह की महारानी प्रतापकुँवरि बाई के भाई ठाकुर लक्ष्मण सिंह जखाणा की सुपुत्री थीं। कहा जाता है कि जब इनकी उम्र सिर्फ पाँच वर्ष की थी तभी इनका ब्याह महाराजा तख्तसिंह के पुत्र प्रतापसिंह के साथ हो गया था जो बाद में ईडर (शेखावत)  के महाराजा बने। विवाह के समय प्रतापसिंह की उम्र नौ वर्ष थी। “स्त्री कवि कौमुदी” के रचनाकार श्री ज्योति प्रसाद “निर्मल” के अनुसार रत्नकुँवरि का विवाह पंद्रह वर्ष की उम्र में हुआ था और यह विवाह उनकी फूफी प्रतापकुँवरि ने करवाया था। प्रतापकुँवरि जो स्वयं एक ऊंचे दर्जे की राम भक्त  कवयित्री थीं, की संगति में रत्नकुँवरि का मन भी भक्ति में रम गया और उन्होंने राम की भक्ति में विभोर होकर भक्तिकाव्य की रचना की। सियावर राम के चरणों में स्वयं को न्योछावर करती हुई वह लिखती हैं –

“सियावर तेरी सूरत पै हूँ वारी रे।

सीस- मुकुट की लटक मनोहर मंजु लगत है प्यारी रे।।

या छवि निरखन को मो नैना जोवत बाट तिहारी रे।

रत्नकुँवरि कहे मो ढिंग आके झलक दिखा धनुधारी रे।।”

राम की भक्ति में आपाद मस्तक डूबी कवयित्री अपनी मनस्थिति का वर्णन इस प्रकार करती हैं –

“मेरा मन मोह्यो रंगीले राम।

उनकी छवि निरखत ही मेरो बिसर गयो सब काम।

आठों पहर ह्रदय बीच मेरो आन कियो निज धाम।।

रत्नकुँवरि कहै वाकै पल पल ध्यान धरूँ नित सा।।”

ध्यान देने की बात यह है कि धनुर्धारी और मर्यादापुरुषोत्तम राम को कवयित्री अपने इस पद में “रंगीले राम” कहकर संबोधित करती हैं। ऐसा लगता है मानो भक्तिभाव ही मुख्य है और उसके वेगमय प्रवाह में राम और कृष्ण की छवियाँ आपस में घुलमिलकर एक हो गई हैं। तभी तो राम भी कृष्ण की भांति रंगीले नजर आते हैं और उनके प्रति अपने ह्रदय का प्रेम उड़ेलती हुई, अपनी विरह व्यथा को चित्रित करती हुई मिलन की आकांक्षा को कवयित्री इस प्रकार स्वर देती हैं –

“रघुवर म्हांरा रे म्हांकू दरस दिखाजारे|

तो देखन की चाह बनी है, टुक इक झलक दिखा जा रे|

लाग रही तेरी केते दिन की, मीठे बैन सुना जा रे|

रतनकुँवरि तो सों यह विनती, एक बेर ढिग आ जा रे||

भक्तिकाव्य में भक्त द्वारा भगवान के रूप वर्णन की परंपरा देखने में आती है। कवयित्री रत्नकुँवरि भी इसका अपवाद नहीं हैं। अपने आराध्य देव राम के प्रेम में मगन होकर, उनके प्यारे, मनभावन रूप का वर्णन वह बेहद सरसता के साथ करती हैं-

“रघुवर प्यारो रे।

दसरथराज-दुलारो रे।

सीस मुकुट पर छत्र विराजत, कानन कुंडल वारो रे।

बाँकी अदा दिखाय रसीली, मोह लियो मन म्हाँरो रे।।

रत्नकुँवरि कहै राम रँगीलो, रूप गुनन आगारो रे।।

सहज, सरल ब्रजभाषा में रचित ये पद अत्यंत सरस और ह्दयग्राही हैं। जनमानस के बीच इनकी रचनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इनके पद और भजन हरजस रात्रि जागरण पर गाए जाते हैं। इन्होंने राजस्थानी भाषा में भी पदों की रचना की है। भाषा भले ही अलग है लेकिन भाव वही हैं। यहाँ भी राम को प्रियतम के रूप में याद किया गया है और स्वयं को उनके चरणों में वारती हुई कवयित्री उनसे कृपा की आकांक्षा व्यक्त करती हैं। उदाहरण देखिए-

“थारी छूँ जी म्हाँरा प्यारा राम, कीजो म्हाँसू दिलदाड़ी बात।

मिल बिछुड़ण नहिं कीजै साँवरा, राखो जी चरणारी साथ।।

ध्यान धरूँ हरदय बिच तुमको, याद करूँ दिन रात।

रत्नकुँवरि पर महर करो अब, निज कर पकरो हाथ।।”

रत्नकुँवरि बाई के किसी संग्रह के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। विभिन्न पुस्तकों में संकलित उनके पद अवश्य मिलते हैं जो पाठकों को अपनी सरसता से सहज ही प्रभावित कर लेते हैं। भक्त कवयित्री की विरह व्यथा और व्याकुलता में बंधनों में जकड़ी मध्युगीन स्त्री की पीड़ा को सहजता से अनुभूत किया जा सकता है जो मुक्ति के लिए अपने आराध्य से विनती करती दिखाई देती है।   

 

संघर्षशीलों का सम्बल बनें, तभी देवी की आराधना सफल होगी।

देवी पक्ष का आगमन हो रहा है और मातृ शक्ति की आराधना के लिए हम सब तैयार हैं। देखा जाये तो उत्सव का यह वातावरण बहुत प्रिय लगता है। स्त्री की शक्ति का अनुभव होता है, गर्व होता है मगर यथार्थ से टकराव होता है…बस मन सोच में पड़ जाता है। आखिर किस दृष्टि को सच माना जाये? देखा जाये तो स्त्री आगे तो बढ़ी ही है..हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही है मगर उसके संघर्ष भी उतने ही बढ़े हैं। स्त्री की उपलब्धियों को स्वीकारना, उसे सम्मान देना तो समाज सीख ही नहीं पा रहा है। पुरुषों की छोड़िए, आज ही नहीं, बल्कि हमेशा से स्त्रियाँ ही स्त्रियों की राह में पत्थर डालती आ रही हैं। पितृसत्ता पहनावा नहीं है, एक भयानक विचार है..जो वैचारिक स्तर पर बहुत खतरनाक है और आज इसका कुप्रभाव हमें आस – पास दिखाई भी पड़ रहा है। तन स्वतन्त्र होवे स्वतन्त्रता की तड़प का होना जरूरी है, आज पितृसत्ता को पोषण देने वाली स्त्रियों के कारण संघर्षशील सबल स्त्री की लड़ाई कहीं अधिक कठिन हो गयी है। स्त्री को ईर्ष्या, द्वेष से भरी अनचाही प्रतियोगिता के बीच अनायास खड़ा कर दिया गया है। उसकी आधी शक्ति तो इन प्रतियोगिताओं से जूझने में समाप्त हो रही है। कल्पना कीजिए कि ऐसी प्रतियोगिता अगर सृष्टि बनाने वालों के बीच होती तो सृष्टि की क्या स्थिति होगी। एक सामन्जस्य , तारतम्य और एकता होना बहुत जरूरी है स्त्री सशक्तीकरण के लिए…पीछे मुड़कर अपनी पूर्वजाओं से सीखने की जरूरत है। अपने क्षुद्र स्वार्थ से आगे बढ़कर संघर्षशील स्त्रियों का सम्बल बनें, तभी देवी की आराधना सफल होगी।

शुभजिता के स्तम्भ ऐ सखी सुन अपने 50 अंक पूरे कर चुका है। स्तम्भ लेखिका प्रो. गीता दूबे का आभार और आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन।

दुर्गोत्सव 2021 : यंग ब्वायज क्लब के मंडप में दिखेंगी कोरोना विनाशिनी माँ दुर्गा

कोलकाता : पिछले दो सालों से कोरोना महामारी से पूरा विश्व त्रस्त है और कोरोना महामारी के बीच ही दूसरी बार पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की तैयारी शुरू हो गयी है। इस साल कोलकाता के यंग ब्वायज क्लब की दुर्गा पूजा में दुर्गति नाशिनी माँ दुर्गा कोरोना विनाशिनी (दुर्गा – द डिस्ट्रॉयर ऑफ कोरोना) के रूप में कोरोना राक्षस का नााश करते दिखेंगी। ध्यातव्य है कि पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा में थीम पूजा का प्रचलन है। महानगर के यंग ब्वायज क्लब ने अपने 52वें वर्ष पर ‘कोरोना विनाशनी मां’ को थीम बनाया है, जो कोरोना नामक दानव का संहार करेंगी।

दुर्गा पूजा के मद्देनजर कोलकाता में थीम पर आधारित मूर्तियों का निर्माण शुरू हो गया है। इस  साल स्थापना के 52 वर्ष पूरे करने वाला यंग ब्वायज क्लब शारदोत्सव पर खास तैयारी कर रहा है। कोरोना महामारी की थीम को ध्यान में रखते हुए मिदनापुर के मूर्तिकार देव शंकर महेश 40 फीट ऊँची प्रतिमा बना रहे हैं। पूजा के मुख्य मुख्य आयोजक राकेश सिंह ने कहा, “महामारी के दौरान हर कोई कोरोना दानव को मिटाने के लिए देवी दुर्गा से प्रार्थना कर रहा है। ऐसे में मां दुर्गा से हम प्रार्थना कर रहे हैं कि वह हमेशा के लिए कोरोना वायरस को नष्ट कर दें। हमें गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा है, इनसे हमें मुक्ति दें. कोविड-19 वायरस का प्रकोप अभी भी है। कोविड योद्धा अपनी जान की परवाह किए बगैर हमारी रक्षा कर रहे हैं। इस साल दुर्गा पूजा को हम उन्हें समर्पित कर रहे हैं। कोविड योद्धाः डॉक्टर, पुलिस, चिकित्सा कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, परिवहन चालक और कंडक्टर को उनके काम के लिए उन्हें सलाम करते हैं। हम यह भी प्रार्थना करते हैं कि मां दुर्गा घातक कोरोना वायरस को मिटा दें.”

यंग ब्वायज क्लब  के युवा अध्यक्ष विक्रांत सिंह ने कहा कि महामारी ने हमारे जीवन को मान्यता को बदल दिया है। कोरोना एक ऐसा दानव है जिसे हर कोई पहचानता है, यह वह दानव है जिससे हर कोई लड़ रहा है और हम सब उसे हराने के लिए ताकत की तलाश कर रहे हैं। इस विचार के साथ हम सभी को कोरोना के दानव से बचाने के लिए देवी से प्रार्थना करें।  इस साल, देवी एक नए अवतार में दिखेंगी, जो कि कोरोन वायरस के विजेता के रूप में होगा और वह कोरोना दानव का संहार करेंगी। यह बुराई पर अच्छाई की जीत होगी और कोरोना का वध होगा।”

मध्यकालीन विदुषी कवयित्री कविरानी देवी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, हिन्दी साहित्य का उत्तर मध्यकाल जिसे हम  रीतिकाल के नाम से भी जानते हैं, में कुछ कवयित्रियों ने भी कलम का हुनर दिखाया था। यह बात और है कि मोटे- मोटे इतिहास – ग्रंथों के बेशुमार पन्नों पर इन कवयित्रियों के नाम कहीं दर्ज नहीं हुए। प्रश्न यह नहीं है कि उनके द्वारा लिखी गई कविताएँ, पद या गीत कला या कविता के मानदंडों पर खरे उतरते हैं या नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि देश और समाज की उस पराधीनता के दौर में जहाँ स्त्रियाँ सबसे ज्यादा पराधीन थीं, अगर वे कुछ भी लिख, पढ़ या बोल रही थीं तो उसका नोटिस लिया जाना जरूरी है। उनकी रचनाओं को औरताना रचनाएँ कहकर टाल देना उन स्त्रियों के प्रति अन्याय होगा जो अपने तमाम सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के उपरांत ह्दय में बसे भावों को कविता में ढालने का अवसय निकाल लेती थीं। लेकिन हमारा समाज स्त्रियों के प्रति हमेशा ही अनुदार रहा है। गाँवों में जो स्त्रियाँ लोकगीत गाती हैं, कभी कभार उसमें समयानुसार कुछ परिवर्तन भी करती हैं या कुछ  कड़ियाँ अपनी कल्पनाशक्ति से जोड़ देती हैं या फिर प्रचलित धुन पर कोई नया गीत भी लिख लेती हैं। समय के साथ वह परिवर्तन स्वीकार्य हो जाता है और गीत लोकप्रिय लेकिन उस स्त्री विशेष की रचनात्मकता को कोई याद नहीं रखता। रचना तो लोककंठ में सुरक्षित रह जाती है लेकिन रचनाकार विस्मृत हो जाता है। लोक जीवन में न जाने ऐसी कितनी प्रतिभाशाली स्त्रियाँ हैं जिनके रचनात्मक अवदान को जाने -अनजाने भुला दिया गया। यह बात और है कि साहित्य में बहुत बार यह काम  बहुत सुनियोजित ढंग से होता आया है। न जाने कितने रचनाकारों का काम तो दूर नाम तक विस्मृति के गर्त में समा जाता है। थोड़ा -बहुत काम अगर होता भी है तो उस पर समय और उपेक्षा की धूल इस कदर छा जाती है कि उनकी पहचान धूमिल हो जाती है, इसीलिए समय- समय पर इस धूल को साफ करना जरूरी हो जाता है। ऐसा करने की कोशिश में ऐसी बहुत सी प्रतिभाशाली कवयित्रियों से मैं आपको मिलवा चुकी हूँ, आज आप का परिचय करवाऊँगी, रीतिकालीन कवयित्री कविरानी देवी से।

कविरानी देवी का एक परिचय यह है कि वह कवि लोकनाथ चौबे की पत्नी थीं, जो बूंदी के राजा बुधसिंह के दरबारी या आश्रित कवि थे और एक और परिचय है कि वह भी काव्य- रचना करती थीं।  बुधसिंह का कार्यकाल संवत 1752 से 1805 तक माना जाता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि लोकनाथ चौबे और कविरानी देवी का रचनाकाल  भी वही रहा होगा। ज्योतिप्रसाद मिश्र “निर्मल” ने अपनी पुस्तक “स्त्री-कवि-कौमुदी” में कविरानी देवी को ‘सुकवि’ मानते हुए उनका परिचय इस प्रकार दिया है- “कविरानी देवी के पति कविराज लोकनाथ चौबे एक अच्छे कवि थे। इन्हीं की सत्संग में कविरानी देवी को भी कविता करने का अच्छा अभ्यास हो गया था। ये कविता अपने पति के समान सरल, सुन्दर और सरस करती थीं।” कविरानी देवी वस्तुत: एक पति परायणा पारंपरिक भारतीय नारी थीं जिन्हें कविराज की पत्नी होने का गर्व तो था ही और वह प्रसन्नता के साथ इसका बखान भी करती थीं। उनका एक पद यहाँ उद्धृत है जिसमें वह पतिप्रेम का वर्णन करती हुई अपनी विरह भावना की अभिव्यक्ति मार्मिक ढंग से करती हैं-

”  मैं तो यह जानी हो कि लोकनाथ पति पाय,

 

संग ही रहौंगी अरधंग जैसे गिरजा ।

 

एते पै विलक्षण ह्वै उत्तर गमन कीन्हों,

 

कैसे कै मिटत ये वियोग विधि सिरजा ।।

 

अब तौ जरूर तुम्हे अरज करे ही बने,

 

वे हू द्विज जानि फरमाय हैं कि फिरजा ।

 

जो पै तुम स्वामी आज अटक उलंघ जैहौ ,

 

पाती माहिं कैसे लिखूं मिश्र मीर मिरजा ।।”

कविरानी देवी में काव्य प्रतिभा ही नहीं थीं बल्कि वह अत्यंत बुद्धिमति स्त्री भी थीं और अपने बुद्धि कौशल से अपने जीवन की समस्याओं को सुलझाने का सामर्थ्य रखती थीं। उनके बारे में एक कथा सुनने में आती है। एक बार बूंदी नरेश बुधसिंह कवि लोकनाथ को अपने साथ लेकर राज कार्य से दिल्ली गये थे। वहाँ पहुँचकर राव राजा ने चौबे जी को किसी महत्वपूर्ण कार्य का भार देकर अटक के उस पार अर्थात सिंध नदी के पार जाने का हुक्म सुनाया। कहते हैं कि यह समाचार पाकर कविरानी देवी  बेहद चिंतित हुईं। चूंकि वह अत्यंत धर्मपरायण स्त्री थीं अतः उन्हें चिंता हुई कि कहीं सिंध के उस पार जाने से उनके पति के धर्म पर कोई आँच न आए क्योंकि उस तरफ दूसरे धर्म के लोगों का निवास था। वह समय ही ऐसा था कि लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं एवं जीवन शैली को लेकर अतिरिक्त रूप से सजग थे। साथ ही खान -पान से संबंधित नियमों को भी मानते थे और भक्ष्य-अभक्ष्य आदि के प्रति भी सचेत रहते थे। ऐसे में कविरानी देवी जैसी पारंपरिक एवं धार्मिक स्त्री का चिंतित होना स्वाभाविक ही था। इस समस्या के निवारण हेतु उन्होंने एक कवित्त लिखकर‌ अपने पति को भेजा और पति ने वह कवित्त राजा बुधसिंह को सुनाया। राजा उसे सुनकर इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने लोकनाथ चौबे को अटक पार भेजने का हुक्म लौटा लिया। उस कवित्त में विदुषी कविरानी देवी ने राव‌ राजा से विनती की थी कि वे उनके पति को घर लौट आने की आज्ञा दें ताकि उनकी विरह- व्यथा दूर हो। वह कवित्त देखिए –

“बिनती करहुगे जो वीर राव राजाजी सो,

 

सुनत तिहारी बात ध्यान मे धरहिंगे ।

 

पाती ‘कविरानी’ मोरी उनहिं सुनाय दीन्हो,

 

अवसि विरह-पीर मन की हरहिगे ।।

 

वे हें बुद्धीमान सुखदान बड़भागी बड़े,

 

धरम की बात सुन मोद सों भरहिंगे ।

 

मेरी बात मानौ राव राजा सों अरज करौ,

 

लौटन को घर फरमाइस करहिंगे ।।”

सखियों, कविरानी देवी की कविताओं का कोई संकलन नहीं मिलता। इनके सिर्फ यही दो कवित्त मिलते हैं। हो सकता है इनके अन्य कवित्त समय के साथ नष्ट हो गये हों। हालांकि कविरानी देवी की कविताओं में काव्य -कौशल का चमत्कार नहीं दिखाई देता लेकिन इनकी सहज और सरस शैली अपना स्वाभाविक प्रभाव छोड़ती है। मध्ययुगीन स्त्री के दांपत्य प्रेम, विरहानुभूति, प्रतीक्षा के साथ ही मिलन की कामना की अभिव्यक्ति भी बड़े स्वाभाविक रूप में हुई है। डॉ. सावित्री सिन्हा ने कविरानी देवी के काव्य का मूल्यांकन इस प्रकार किया हैं- “इनके पदों में न तो वाग्विदग्धता है न काव्य-सरसता। अनलंकृत, सज्जाहीन किन्तु प्रवाहयुक्त कवित्त शैली में अपनी भावनाओं की सरल अभिव्यक्ति कर देने में वे सफल रही हैं। संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों का यद्यपि अभाव नहीं है परंतु ब्रजभाषा के देशज शब्दों का प्रयोग भी अधिक हुआ है। उर्दू के शब्दों के प्रयोग भी यत्र -तत्र मिलते हैं। सीधी तथा सरल अभिव्यंजना ही इनके काव्य का गुण है।”

इस संबंध म़े मैं यही कहना चाहूंगी कि मध्ययुगीन वातावरण में स्त्री जीवन बहुत आसान नहीं था। तमाम तरह के बंधनों और सीमाओं के साथ जीते हुए अपनी रचनात्मकता को किसी भी रूप में जीवित रखना और लिखना ही बड़ी बात थी। अपने सीमित अनुभवों को सरल -सहज और ह्रदयग्राही भाषा में ढालने की कला कविरानी देवी में निश्चित रूप से थी और हमें निष्कपट भाव से उसकी सराहना करनी चाहिए।

कन्हैया लाल सेठिया..रचनाकर्म पर कुछ बातें.. तीसरा और अंतिम भाग

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

    गतांक से आगे

निर्ग्रन्थ’ कविता संग्रह की कविताओं में सत्य अन्वेषी सर्वोदय तीर्थ के प्रवर्तक महावीर की देशना की युगीन निशीथ की संभाव्य उषा है। निर्ग्रन्थ अनुकंपा के परम क्षण की प्रतीक कृति है। कवि का मानना है कि वे नैपथ्य में चेतना की विपंची पर झंकृत प्रभाती की लय को स्पष्ट सुन रहे हैं। वे कहते हैं – मर्म मुझे दो आत्म धर्म का /जीवन बने पवित्र /करुँ स्वयं पर अनुकंपा मैं पकड़ तुम्हारा पंथ! (निर्ग्रन्थ पृष्ठ 26)
‘निर्ग्रन्थ’ कविता में कवि स्पष्ट कहते हैं कि नहीं दबे /अढ़ाई हजार वर्षों के /मलबे के तले /महावीर। पृष्ठ 11नि।
लड़ना पड़ता है अर्हत बनने के लिए क्योंकि यह स्वयं की स्वयं से लड़ाई है।बौद्ध धर्म में अर्हत वही है जिसने अस्तित्व की यथार्थ प्रकृति का अंतर्ज्ञान प्राप्त कर लिया हो जिसे निर्वाण प्राप्त हो चुका है।
कवि का जैन धर्म के प्रति अगाध विश्वास है क्योंकि जैन की उत्पत्ति जिन से मानी गयी है जिसका अर्थ ही है विजेता। विजेता वह है जिसने अपनी इच्छाओं कामनाओं और मन पर विजय प्राप्त कर ली हो एवं हमेशा के लिए संसार के आवागमन से मुक्ति प्राप्त कर ली हो। जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर की देशना ही हमें इस संसार के बंधनों से मुक्त कर सकती है। राजकुल में जन्म लेकर भी उस मुक्ति के मार्ग पर चलकर महावीर बनते हैं।
अपने पितामह रूपचंद जी सेठिया और पितामही जडा़व देवी जी सेठिया को समर्पित निर्ग्रन्थ कविता संग्रह पूर्णतः महावीर की देशना के प्रति विश्वास की है। – – स्व की स्फुरणा/टूट जाएगी /घनीभूत मूर्च्छा /नहीं है गहरी! /असत् की जड़ /पुरुषार्थ की पकड़ में है /श्रेयस् का पंथ /अनुबंधित है/गति से /मील का अंतिम पत्थर /सिद्ध शिला! पृष्ठ 16 निर्ग्रन्थ ।
जैन धर्म में सिद्ध शिला उत्कृष्ट 525 धनुष का अवगाहन करने वाले सिद्ध भगवान आठ कर्मों से छूटकर सम्यकतत्व दर्शन ज्ञान आदि अनंत गुणों के सागर स्वरूप अरूपी अशरीरी नित्य निरंजन कृत्कृत्य होकर एक ही समय में युग पत् तीन लोक तीन कालवर्ती समस्त पदार्थों को जान लेते हैं और अनंत सुख सागर में स्थित सदा के लिए निमग्न हो जाते हैं। सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र रूप रत्नत्रय हैं जिनके बल से कर्मौ का नाश करके स्वयं ही अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं यही सिद्धावस्था है – ‘सिद्ध स्वात्मोलब्धि’ इसके लिए सम्यक पुरुषार्थ करना पड़ता है तभी सिद्धावस्था प्राप्त की जा सकती है।
महावीर ने – महाभिनिष्क्रमणः के लिए किसी के जगने की प्रतीक्षा या किसी की नींद की प्रतीक्षा नहीं की वे—स्वयं जागे /जगाया वातावरण। पृष्ठ 17नि।
महावीर से संबंधित सभी देशना को कविता में स्थान दिया गया है और यह स्पष्ट माना कि सत्य का अनुसंधान करने वाला हर मनुष्य विजेता बन सकता है। यह जैन धर्म की मौलिक मान्यता है।
अपरिग्रह, णमोकार मंत्र, वीतराग भगवंत, विस्मृति, विभाजित व्यक्तित्व, अच्युत, ईश्वर, अर्थवत्ता, अंखुवाया दर्शन, प्रश्न हुए उत्तर, फगुनाया क्षण आदि कविताओं में छोटी-छोटी उपमाएं देकर कवि ने चित्त की विविध स्थितियों को उजागर किया है। लहरों की सिलवटें, अनगाई ग़जल उगी, अंसुवाया बादर, निंदियाया अम्बर आदि बहुत से शब्दों के नये प्रयोग कवि ने बड़े प्यार से किए हैं । अपनी भावनाओं को समवेत रूप से उड़ेला है अपने शब्दों को प्रेम से सहलाया है।
पाश्चात्य की आंँधी में हम दिगम्बर महावीर, भिक्षु बुद्ध और लंगोटी पहने गांधी की शिक्षाओं को भूलते जा रहे हैं। कवि दुखी है कि चेतना के चिंतन को इंद्रियाँ ठहरने नहीं देतीं। उसके लिए यूंँ ही बाँसुरी के छिद्रों पर अंँगुलियों को रखे बिना प्रणय की रागिनी नहीं निकलेगी। परिश्रम के बिना मस्तिष्क व्यर्थ हो जाता है। पृष्ठ 61-62नि।
तुम और मैं ‘कविता ‘अहं ब्रहास्मि ‘की ही बात कहती है।
‘चेतना का क्षण’ उजाला का अहसास है। उस स्थिति में शब्द यानि ब्रह्म में सोया अक्षर जाग उठता है। तथागत वही है जो’ अनागत /निरवधि/ जिसकी /उपलब्धि/ वह तथागत ‘पृष्ठ 89 नि।’ विभूति’ कविता में कवि ने जगत की उपस्थिति को भी अपेक्षित भूति नहीं माना है। शंकराचार्य ने भी इसी जीव को चेताने के लिए ‘ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या , जीवो ब्रह्मैव नापरःकहा। इस आभासी जगत में कवि जीवों को सत्यम् शिवम् और सुंदरम् से साक्षात्कार कराना चाहता है।

जज़्बात

– श्वेता गुप्ता

जज्बातों को दिल में छुपाए फिरते हैं,
उन लम्हों को पलकों में बिछाए रखते हैं,
दर्द हो तो होटों को सी लिया करते हैं,
बेचैनियों को चुप्पी में दबाएं रखते हैं।

वो कहते हैं कि क्यों, बयां नहीं करते हाले दिल अपना,
वो कहते हैं कि क्यों, बयां नहीं करते हाले दिल अपना…
लफ्जों को छोड़, हम अश्कों मैं बयां करते हैं।
सोचते हैं कि अब, एहसास होगा उन्हें मेरी तरप का मगर,
वो हर बार हंसी में उड़ा दिया करते हैं।

जिंदगी अब ऐसे मझधार में आ गई है,
वो कहते हैं कि तुम्हें चीजों की समझ थोड़ी कम है,
हम मुस्कुरा कर सर झुका लिया करते हैं।

उम्मीदों की कश्ती को किनारा मिल जाए,
भटके राही को सहारा मिल जाए,
किस्मत से लड़ना छोड़ दिया हमने,
खुदा से रिश्ता जोड़ लिया हमने।

पितर पक्ष

डॉ. वसुन्धरा मिश्र

मृत्यु उपरांत का उत्सव है पितर पक्ष
अंतर्मन की इंद्रियों की संवेदना है
पीढ़ी से जुड़ी संस्कृति की सीढ़ी है
माता – पिता से मिले संस्कार हैं
पूर्वजों का आशीर्वाद है
समय के पहिए में
अटके दर्द भरे चित्रों की रील है
घर के किसी भी सदस्य का
मृत्यु की गोद में समा जाना
आँखों का शाश्वत सत्य है
हर व्यक्ति की मृत्यु तिथि है
हर वर्ष करते हैं हम उन्हें याद
घर से बिछुड़ी सभी पीढ़ियों का कर तर्पण
पितरों की पूजा करते हैं
जल और भोजन का भोग परोस
सूक्ष्म आत्मा की शान्ति की करते हैं प्रार्थना
दर्द के उन लम्हों में
श्रद्धा और भक्ति से जुड़ते जाते
गंगा जल की पावन लहरों में
तिल – जल से संकल्पित हो
उसे बहाते जाते
पुनः स्मृति में लाकर
मुक्ति कामना में रत हो जाते
अपने राग – रंग- रस – गंध – मोह – तृष्णा को
हर वर्ष हम तिरोहित करते जाते
जीवन दर्शन और अध्यात्म की रस धारा में
संस्कृति- संस्कारों की बहती नदिया में
तन-मन की उलझनों को संतुलित करते जाते
जीवन जीने की कला को निखारते जाते

भवानीपुर कॉलेज में इंटर कॉलेज युवाओं ने बिखेरे ‘अल्फाज़ों के रंग’

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी के प्लेसमेंट हॉल में इंटर कॉलेज ओपन माइक पर विभिन्न कॉलेजों से आए विद्यार्थियों ने जीवन के रंगों और भावों को शब्दों में पिरोया। कुछ स्वरचित और कुछ अलग हटकर सुनाया। युवाओं के मन की बात अल्फाजों में सामने आई जो अद्भुत और मन को छूने वाली थी। इस अवसर पर डॉ. वसुंधरा मिश्र ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अपने एक स्वरचित गीत ‘एक बार जो तुम कह देते व्यथा अपनी हम तुझको सुनाते ‘से की। कॉलेज की छात्रा अंजलि दूबे ने मधुर हिमाचली गीत चंबा गीत की प्रस्तुति दी। यश खंडेलवाल (जेवियर्स कॉलेज) ने उसकी मुस्कुराहट जैसे चाहतों का-मैं लिखता हूँ जब भी, दृष्टि(अपनी कहानी) , दृष्टि, प्रीतम रावत, आशिका (कहानी)
संगीत विशेषज्ञ सौरभ गोस्वामी ने ‘बड़े अच्छे लगते हो’ गीत गाया। डीन प्रो. दिलीप शाह ने दुष्यंत कुमार की कविता “हो गई है पीर पर्वत सी” सुनाकर विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया।
शिवम खेतान (जेवियर्स कॉलेज) के छात्र ने कुमार विश्वास की तर्ज पर। दिल से दिल लगाने में उम्र देखी नहीं जाता। अब तो डीपी देखकर प्यार होता है। पूजा रानी पॉल -(भवानीपुर कॉलेज) कोरोना पर अपने मानसिक और शारीरिक पीड़ा को शब्दों में बांधा। तानिया ने अंग्रेजी में कविता, आदित्य जाजोदिया, जैन कॉलेज के छात्र ने एक अलग सी पहचान बनाने की आदत है हमें कविता –
रमशा तूबा और सिनचर दासगुप्ता ने गिटार के साथ अंग्रेजी गीत, शेख मोहम्मद फैशल ने क्यों न पुराने दिनों को याद किया जाय, स्नेह मिश्रा – तेरे मेरे इश्क की बात कुछ और होगी। ओम पचिसिया – मुस्कान का कोई मोल नहीं होता। तौकिफ ने शेर, भास्कर ज्योति ने दो अंग्रेजी और हिंदी गीत गिटार के साथ, मयंक विदानी ने – एकतरफा आशिक के विषय में कविता, समीरा और शशांक पुरोहित – दोनों ने मिलकर वर्तमान कैशोर्य प्रेम की बातें बताई जो संदेश के रूप में रहा, खलीजा अहमद – कम्प्यूटर सांइस की – कहानी, पेशे से वकील सैयदा (कलकत्ता विश्वविद्यालय)ने अपने अनुभवों को उर्दू के शेर से आकार दिया।
भविष्य गिलानी ने गिटार के साथ नथिंग लाइक यू अंग्रेजी संगीत, हर्ष कुमार झा टेक्नोलॉजी कॉलेज के छात्र ने अपनी रचना, आदित्य वारिसपुरी ने शाहरूख खान के देवदास की मिमिक्री और कविता, आरिफ ने गिटार के साथ गीत,श्यामल इब्राहिम ने शेर शायरी गज़ल सुनाए, भावना जैनानी ने अंग्रेजी की दो कविताएँ, अंत हुआ अमित सक्सेना के शानदार गीत संगीत के साथ। कार्यक्रम का संचालन और संयोजन किया अंजली और आकिता ने वहीं तकनीक और संयोजन सहयोग रहा सम्राट और रमशा तूबा की टीम का। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह, कोऑर्डिनेटर प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या ऊदेशी का प्रबंधन सहयोग सराहनीय रहा। इस कार्यक्रम में कोरोना के नियमों का पालन करते हुए पचास विद्यार्थियों को ही शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों को और ओपन टीम को धन्यवाद दिया डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

देश को 2022 में मिलेगी नयी सहकारी नीति : अमित शाह

कोलकाता : केंद्रीय गृह मंत्री और देश के पहले सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा है कि सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का काम उनका मंत्रालय करेगा। भारत सरकार का सहकारिता मंत्रालय सभी राज्यों के साथ सहकार, सहयोग करके चलेगा। ये किसी राज्य से संघर्ष के लिए नहीं बना है। देश के पहले सहकारिता सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए  शाह ने कहा कि उन्हें गर्व है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें पहला सहकारिता मंत्री होने का मौका दिया है। शाह ने कहा कि सहकारिता को मजबूत करने की दिशा में सरकार नई सहकारी नीति लाएगी। दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में गत शनिवार को पहले सहकारिता सम्मेलन का आयोजन किया गया। शाह ने स्टेडियम में मौजूद दो हजार से अधिक सहकारिता सहयोगियों और सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़े करीब छह करोड़ लोगों को सहकारिता मंत्रालय के उद्देश्यों और सहकारिता से समृद्धि पाने के मूल मंत्र का अर्थ बताया। शाह ने कहा, ‘मैं सहकारिता मंत्री के नाते देशभर के नेताओं और कार्यकर्ताओं से कहना चाहता हूं कि अब लापरवाही का समय समाप्त हो गया है। प्राथमिकता का समय शुरू हुआ है। इसलिए सब साथ मिलकर सहकारिता को आगे बढ़ाएं।’ अमित शाह ने प्रख्यात सहकारी समिति इफको द्वारा निर्मित विश्व के पहले नैनो तरल यूरिया को सराहा। उन्होंने कहा कि नैनो तरल यूरिया कृषि क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाएगा।

 अमित शाह ने कहा, ‘भारत में सहकारिता आंदोलन कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकता। यहां के विचारों, जनता के स्वभाव में सहकारिता घुल मिल गई है। ये कोई उधार लिया हुआ विचार नहीं है। सहकारिता आंदोलन भारत के ग्रामीण समाज की प्रगति करेगा और एक नई सामाजिक पूंजी की अवधारणा भी खड़ी करेगा। सहकारिता आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व के बारे में श्री शाह ने कहा, ‘मैं 25 साल तक सहकारिता आंदोलन से जुड़ा रहा हूं। देश पर जब-जब कोई विपदा आई है, सहकारिता आंदोलनों ने देश को बाहर निकाला है। कॉपरेटिव बैंक बिना मुनाफे की चिंता किए लोगों के लिए काम करते हैं। क्योंकि, भारत के संस्कारों में सहकारिता है।’ प्रधानमंत्री के मन की इच्छा है कि छोटे से छोटे व्यक्ति को विकास की प्रक्रिया में हिस्सेदार बनाना, सहकारिता की प्रक्रिया से हर घर को समृद्ध बनाना और हर परिवार की समृद्धि से देश को समृद्ध बनाना, यही सहकार से समृद्धि का मंत्र है।

  शाह ने सहकारिता के क्षेत्र में अमूल व लिज्जत का उदाहरण देते हुए कहा कि अमूल से जहां देश के करोड़ों किसान जुड़े हुए हैं तो लिज्जत पापड़ से हजारों महिलाओं को रोजगार मिला है। देश में सहकारिता को मजबूत करने के साथ—साथ अब इसका आधुनिकीकरण भी करना है। शाह ने कहा कि हमने तय किया है कि कुछ समय के अंदर नई सहकारी नीति जो पहले 2002 में अटल जी लेकर आए थें और अब 2022 में मोदी जी लेकर आएंगे और आजादी के अमृत महोत्सव में नयी सहकारी नीति बनाने की हम शुरुआत करेंगे।

देश के विकास में सहकारिता के योगदान का महत्व बताते हुए  अमित शाह ने ये भी कहा कि भारत के 91 प्रतिशत गांवों में सहकारी सहमितियां हैं। देश की 5 ट्रिलियन की इकोनॉमी के लिए सहकारिता की जरूरत है। सहकारिता गरीबों और पिछड़ों के विकास के लिए है। आज सहकारिता से 36 लाख करोड़ परिवार जुड़े हुए हैं। सहकारिता भारत के संस्कारों में हैं, सबको साथ लेकर चलना है। गृहमंत्री ने कहा कि इफको ने गरीब क्रांति को एक नई दिशा देने का काम किया।

प्राप्ति ने कजाकिस्तान में जीता रजत पदक

कोलकाता : भवानीपुर कॉलेज की छात्रा प्राप्ति सेन ने कजाकिस्तान में तिरंगे की शान बढ़ाई। बीए अंग्रेजी (एच) द्वितीय वर्ष की छात्रा प्राप्ति सेन ने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उपविजेता के रूप में रजत पदक हासिल किया ।
क्वार्टर फाइनल में वैलेरी कोटिकुर (रूस) के खिलाफ सिंगल्स इवेंट में 4-3 के स्कोर से हार का सामना किया ।
और 15-19 सितंबर 2021 के दौरान कजाकिस्तान गणराज्य में आयोजित ओपन इंटरनेशनल टेबल टेनिस टूर्नामेंट में स्कोर 3-2 से डबल्स वर्ग में फाइनल में रूस के खिलाफ सुरक्षित उपविजेता बनीं प्राप्ति सेन। टेबल टेनिस में इस स्तर को हासिल करने के लिए निश्चित रूप से प्राप्ति सेन और भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के लिए यह वास्तव में हमारे देश के लिए गर्व का क्षण है। यह एक रिकॉर्ड भी स्थापित करता है कि यह पहली बार है जब भवानीपुर कॉलेज की किसी छात्रा ने हमारे देश का प्रतिनिधित्व किया है और इस तरह के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेला है।
हमारे छात्रों को ऐसी मान्यता प्राप्त करने में मदद करने के लिए हमारे प्रबंधन से समर्थन और मार्गदर्शन की सराहना करते हैं। इस गर्व के क्षणों में कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह, कोऑर्डिनेटर प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या उदेशी, कॉलेज खेल प्रशिक्षक रूपेश गांधी और कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज शाह ने प्राप्ति सेन को शुभकामनाएँ और बधाई दी। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने । कजाकिस्तान में आयोजित टेबल टेनिस टूर्नामेंट में प्राप्ति ने रजत पदक जीता। डीन प्रो दिलीप शाह , प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या ऊदेशी, खेल प्रशिक्षक रूपेश गांधी और कॉलेज के उपाध्यक्ष मिराज शाह ने बधाई और शुभकामनाएं दी। प्राप्ति का यह पहला प्रयास था। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इसकी जानकारी दी।