कोलकाता : मो. अली पार्क यूथ एसोसिएशन समिति ने एक चुनौती के तौर पर इस साल का पंडाल का थीम ‘वैक्सीनेशन वीन्स ओवर कोरोना’ रखा है। पंडाल का उद्धाटन सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने किया तथा इस मौके पर तापस रॉय, नयना बंद्योपाध्याय, विवेक गुप्त, संजय बख्शी, स्मिता बख्शी, रेहाना खातून आदि उपस्थित थे। इस मौके पर संवाददाताओं से बात करते हुए समिति के महासचिव सुरेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि यदि साल 2020 का दुर्गापूजा कोरोना संक्रमण में बीता तो साल 2021 का दूर्गापूजा वैक्सीनेशन को समर्पित है।
इस साल हम अपने पूजा परिसर में वैक्सीनेशन का महत्व बताने का प्रयास कर रहे हैं। गौर हो कि पिछले साल मो. अली पार्क ने महिषासुर को कोरोनासुर के तौर पर दर्शाया था। संरक्षक रामचन्द्र बड़ोपलिया, चेयरमैन मनोज पोद्दार, कार्यकारी अध्यक्ष प्रमोद चाण्डक, संयुक्त सचिव अशोक ओझा, पवन बंसल, गणेश शर्मा, कोषाध्यक्ष सुभाष चन्द्र गोयनका, वाईस चेयरमैन ओम प्रकाश पोद्दार एवं अन्य गणमान्य उपस्थित थे।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 11 अक्टूबर, 1884 ईस्वी को बस्ती जिले के अगोना नामक गांव में हुआ था।
इनकी माता जी का नाम निवासी था और पिता पं॰ चंद्रबली शुक्ल की नियुक्ति सदर कानूनगो के पद पर मिर्जापुर में हुई तो समस्त परिवार वहीं आकर रहने लगा।
जिस समय शुक्ल जी की अवस्था नौ वर्ष की थी, उनकी माता का देहान्त हो गया। मातृ सुख के अभाव के साथ-साथ विमाता से मिलने वाले दुःख ने उनके व्यक्तित्व को अल्पायु में ही परिपक्व बना दिया।अध्ययन के प्रति लग्नशीलता शुक्ल जी में बाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका।
मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में स्कूल फाइनल परीक्षा (एफए) उत्तीर्ण की। उनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल जी कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, किंतु शुक्ल जी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पिता जी ने उन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत में न होकर साहित्य में थी। अतः परिणाम यह हुआ कि वे उसमें अनुत्तीर्ण रहे। शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदारी की जगह दिलाने का प्रयास किया, किंतु उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह संभव न हो सका।
1903से 1908 तक ‘आनन्द कादम्बिनी’ के सहायक संपादक का कार्य किया। 1904 से 1908 तक लंदन मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक रहे। इसी समय से उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और धीरे-धीरे उनकी विद्वता का यश चारों ओर फैल गया। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें हिन्दी शब्दसागर के सहायक संपादक का कार्य-भार सौंपा जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया।
श्यामसुन्दरदास के शब्दों में ‘शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पं. रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए जहाँ बाबू श्याम सुंदर दास की मृत्यु के बाद 1937 से जीवन के अंतिम काल (1941) तक विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित किया। कृतित्व – आलोचनात्मक ग्रंथ : सूर, तुलसी, जायसी पर की गई आलोचनाएं, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद, रसमीमांसा आदि शुक्ल जी की आलोचनात्मक रचनाएं हैं। निबन्धात्मक ग्रन्थ : उनके निबन्ध चिंतामणि नामक ग्रंथ के दो भागों में संग्रहीत हैं।
अन्य निबंधों में मित्रता निबन्ध जीवनोपयोगी विषय पर लिखा गया उच्चकोटि का निबन्ध है जिसमें शुक्लजी की लेखन शैली गत विशेषतायें झलकती हैं। क्रोध निबन्ध में उन्होंने सामाजिक जीवन में क्रोध का क्या महत्व है, क्रोधी की मानसिकता-जैसै संबंधित पहलुओं का विश्लेषण किया है। ऐतिहासिक ग्रन्थ : हिन्दी साहित्य का इतिहास उनका अनूठा ऐतिहासिक ग्रंथ है।
अनूदित कृतियां – ‘शशांक’ उनका बांग्ला से अनुवादित उपन्यास है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी से विश्वप्रपंच, आदर्श जीवन, मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन, कल्पना का आनन्द आदि रचनाओं का अनुवाद किया। आनन्द कुमार शुक्ल द्वारा “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अनुवाद कर्म” नाम से रचित एक ग्रन्थ में उनके अनुवाद कार्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
सम्पादित कृतियाँ – सम्पादित ग्रन्थों में हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार, सूर, तुलसी, जायसी ग्रंथावली उल्लेखनीय है।आचार्य शुक्ल हिन्दी के आलोचक, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि थे। उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में हिन्दी साहित्य का इतिहास है जिसमें हिन्दी इतिहास के कालनिलवर्धारण को प्रामाणिक स्वीकृति मिली और पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा किया गया । हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में भी शुक्ल जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भाव, मनोविकार सम्बंधित मनोविश्लेषणात्मक निबन्ध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। शुक्ल जी ने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनर्व्याख्या की।
शैली – शुक्ल जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप है। उनकी शैली अत्यंत प्रौढ़ और मौलिक है। उसमें गागर में सागर पूर्ण रूप से विद्यमान है। शुक्ल जी की शैली के मुख्यतः तीन रूप हैं –
आलोचनात्मक शैली- निबंध की इस शैली की भाषा गंभीर है। उनमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है। वाक्य छोटे-छोटे, संयत और मार्मिक हैं। गवेषणात्मक शैली- इस शैली में शुक्ल जी ने नवीन खोजपूर्ण निबंधों की रचना की है। आलोचनात्मक शैली की अपेक्षा यह शैली अधिक गंभीर और दुरूह है। इसमें भाषा क्लिष्ट है। वाक्य बड़े-बड़े हैं और मुहावरों का नितान्त अभाव है। भावात्मक शैली– शुक्ल जी के मनोवैज्ञानिक निबंध भावात्मक शैली में लिखे गए हैं। यह शैली गद्य-काव्य का सा आनंद देती है। इस शैली की भाषा व्यवहारिक है। भावों की आवश्यकतानुसार छोटे और बड़े दोनों ही प्रकार के वाक्यों को अपनाया गया है। बहुत से वाक्य तो सूक्ति रूप में प्रयुक्त हुए हैं। जैसे – बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।
इनके अतिरिक्त शुक्ल जी के निबंधों में निगमन पद्धति, अलंकार योजना, तुकदार शब्द, हास्य-व्यंग्य, मूर्तिमत्ता आदि अन्य शैलीगत विशेषताएं भी मिलती हैं।
विशेष अंश – –
सभ्यता के आवरण और कविता–
सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ ज्यों-ज्यों मनुष्यों के व्यापार बहुरूपी और जटिल होते गए त्यों-त्यों उनके मूल रूप बहुत कुछ आच्छन्न होते गए। भावों के आदिम और सीधे लक्ष्यों के अतिरिक्त और-और लक्ष्यों की स्थापना होती गई; वासनाजन्य मूल व्यापारों के सिवा बुद्धि द्वारा निश्चित व्यापारों का विधान बढ़ता गया। इस प्रकार बहुत से ऐसे व्यापारों से मनुष्य घिरता गया जिनके साथ उसके भावों का सीधा लगाव नहीं। जैसे आदि में भय का लक्ष्य अपने शरीर और अपनी संतति ही की रक्षा तक था, पर पीछे गाय, बैल, अन्न आदि की रक्षा आवश्यक हुई, यहाँ तक कि होते-होते धान, मान, अधिकार, प्रभुत्व इत्यादि अनेक बातों की रक्षा की चिंता ने घर किया और रक्षा के उपाय भी वासना-जन्य प्रवृत्ति से भिन्न प्रकार के होने लगे। इसी प्रकार क्रोध, घृणा, लोभ आदि अन्य भावों के विषय भी अपने मूल रूपों से भिन्न रूप धारण करने लगे। कुछ भावों के विषय तो अमूर्त तक होने लगे, जैसे कीर्ति की लालसा। ऐसे भावों को ही बौद्धदर्शन में ‘अरूपराग’ कहतेहैं।
भावों के विषयों और उनके द्वारा प्रेरित व्यापारों में जटिलता आने पर भी उनका संबंध मूल विषयों और मूल व्यापारों से भीतर-भीतर बना है और बराबर बना रहेगा। किसी का कुटिल भाई उसे संपत्तिा से एकदम वंचित रखने के लिए वकीलों की सलाह से एक नया दस्तावेज तैयार करता है। इसकी खबर पाकर वह क्रोध से नाच उठता है। प्रयत्क्ष व्यावहारिक दृष्टि से तो उसके क्रोध का विषय है वह दस्तावेज या कागज का टुकड़ा। पर उस कागज के टुकड़े के भीतर वह देखता है कि उसे और उसकी संतति को अन्न-वस्त्रा न मिलेगा। उसके क्रोध का प्रकृत विषय न तो वह कागज का टुकड़ा है और न उस पर लिखे हुए काले-काले अक्षर। ये तो सभ्यता के आवरण मात्र हैं। अत: उसके क्रोध में और उस कुत्तों के क्रोध में जिसके सामने का भोजन कोई दूसरा कुत्ता छीन रहा है, काव्य-दृष्टि से कोई भेद नहीं है-भेद है केवल विषय के थोड़ा रूप बदलकर आने का। इसी रूप बदलने का नाम है सभ्यता। इस रूप बदलने से होता यह है कि क्रोध आदि को भी अपना रूप कुछ बदलना पड़ता है, वह भी कुछ सभ्यता के साथ अच्छे कपड़े-लत्ते पहनकर समाज में आता है जिससे मार-पीट, छीन-खसोट आदि भद्दे समझे जानेवाले व्यापारों का कुछ निवारण होता है।
क्रोध – –
यह कहा जा चुका है कि क्रोध दु:ख के चेतन कारण के साक्षात्कार या परिज्ञान से होता है, अत: एक तो जहाँ कार्यकारण के संबंध ज्ञान में त्रुटि या भूल होती है, वहाँ क्रोध धोखा देता है। दूसरी बात यह है कि क्रोध करनेवाला जिस ओर से दु:ख आता है उसी ओर देखता है; अपनी ओर नहीं। जिसने दु:ख पहुँचाया उसका नाश हो या उसे दु:ख पहुँचे, क्रोध का यही लक्ष्य होता है। न तो वह यह देखता है कि मैंने भी कुछ किया है या नहीं, और न इस बात का ध्या न रहता है कि क्रोध के वेग में मैं जो कुछ करूँगा उसका परिणाम क्या होगा। यही क्रोध का अंधापन है। इसी से एक तो मनोविकार ही एक दूसरे को परिमित किया करते हैं, ऊपर से बुद्धि या विवेक भी उन पर अंकुश रखता है। यदि क्रोध इतना उग्र हुआ कि मन में दु:खदाता की शक्ति के रूप और परिणाम के निश्चय, दया, भय आदि और भावों के संचार तथा अनुचित विचार के लिए जगह ही न रही तो बड़ा अनर्थ खड़ा हो जाता है, जैसे यदि कोई सुने कि उसका शत्रु बीस पचीस आदमी लेकर उसे मारने आ रहा है और वह चट क्रोध से व्याकुल होकर बिना शत्रु की शक्ति का विचार और अपनी रक्षा का पूरा प्रबंध किए उसे मारने के लिए अकेले दौड़ पड़े, तो उसके मारे जाने में बहुत कम संदेह समझा जाएगा। अत: कारण के यथार्थ निश्चय के उपरांत, उसका उद्देश्य अच्छी तरह समझ लेने पर ही आवश्यक मात्रा और उपयुक्त स्थिति में ही क्रोध वह काम दे सकता है, जिसके लिए उसका विकास होता है।
शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा, जिसमें काव्य प्रवृत्तियों एवं कवियों का परिचय भी है और उनकी समीक्षा भी लिखी है। दर्शन के क्षेत्र में भी उनकी विश्व प्रपंच पुस्तक उपलब्ध है। पुस्तक यों तो रिडल ऑफ दि युनिवर्स का अनुवाद है, पर उसकी लंबी भूमिका शुक्ल जी के द्वारा किया गया मौलिक प्रयास है। इस प्रकार शुक्ल जी ने साहित्य में विचारों के क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इस संपूर्ण लेखन में भी उनका सबसे महत्त्वपूर्ण एवं कालजयी रूप समीक्षक, निबंध लेखक एवं साहित्यिक इतिहासकार के रूप में प्रकट हुआ है।
नलिन विलोचन शर्मा ने अपनी पुस्तक साहित्य का इतिहास दर्शन में कहा है कि शुक्ल जी से बड़ा समीक्षक संभवतः उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। अपनी समस्त सीमाओं के बावजूद उनका पैनापन, उनकी गंभीरता एवं उनके बहुत से निष्कर्ष एवं स्थापनाएं किसी भी भाषा के समीक्षा साहित्य के लिए गर्व का विषय बन सकती हैं।
रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रथम साहित्यिक इतिहास लेखक हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर रहते हुए ही सन् 1941 ई. में उनकी श्वास के दौरे में हृदय गति बंद हो जाने से मृत्यु हो गयी। साहित्यिक इतिहास लेखक के रूप में उनका स्थान हिंदी में अत्यंत गौरवपूर्ण है।
डांस स्कूल में टेनिस खेलने का मौका मिला वहीं से टेनिस मेरे जीवन का हिस्सा बन गया और फिर मेरी रुचि टेनिस में बढ़ती चली गई। भवानीपुर कॉलेज ने मुझे बहुत ही कम समय में कजाकिस्तान जाने के लिए सारी औपचारिकताएं पूरी की जिसके लिए मैं बहुत आभारी हूँ। कहती हैं प्राप्ति सेन। भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की द्वितीय अंग्रेजी ऑनर्स की छात्रा प्राप्ति सेन ने हिन्दी भाषा के प्रति भी अपना प्रेम प्रदर्शित किया। डॉ. वसुन्धरा मिश्र ने इस युवा खिलाड़ी का साक्षात्कार लिया जो आपके सामने प्रस्तुत है –
प्र. कब से टेनिस खेल रही हैं? टेनिस के प्रति आपका रुझान कैसे हुआ?
पाँच वर्ष की उम्र से मेरी माँ ने मुझे नृत्य शिक्षा के लिए डांस स्कूल में दाखिला करवाया था। जहाँ पर टेनिस भी था। मैंने वहीं टेनिस खेलना शुरू किया था। डांस कम और टेनिस अधिक खेलती थी। शुरु में तो प्रोफेशनल रूप से नहीं खेलती थी। स्कूल में आ कर मैंने प्रोफेशनल ढंग से खेलना शुरू किया था। प्र. आप किस स्कूल से पढी़ हैं?
मैं जोका के केन्द्रीय विद्यालय की छात्रा हूँ। मैं बंगाल की हूँ लेकिन मुझे हिन्दी से बहुत लगाव है। प्र. आपने स्कूल जीवन में टेनिस का कौन-सा अवार्ड प्राप्त किया?
स्कूल जीवन में 2013 में कैडट नेशन चैम्पियनशिप,2019 में जूनियर नेशन चैम्पियनशिप और वेस्ट बंगाल गवर्नमेंट द्वारा 2019 में खेलश्री का अवार्ड मिला। प्र. कजाकिस्तान में आपको किस आधार पर आमंत्रित किया गया?
मैम एक तो मैंने बहुत से टेनिस मैच खेल चुकी जो राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर रहे। दूसरा अवार्ड भी प्राप्त की। नेशनल रैंकिंग की वजह से कजाकिस्तान में मुझे अवसर दिया गया। प्र. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रजत पदक मिला? आपको कैसा लग रहा है?
20 सितंबर 2021 में कजाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय टेनिस टूर्नामेंट में भाग लेना बहुत ही रोमांचक रहा। बहुत कम समय में मुझे सारे दस्तावेज भेजने थे। समय पर यदि नहीं भेजती तो भाग नहीं ले पाती। इसके लिए भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो. दिलीप शाह और खेल प्रशिक्षक रूपेश गांधी और भावेन परवान, दिव्या उदेशी, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी का पूरा सहयोग रहा जिनकी वजह से सारी औपचारिकताएं पूरी हो सकी। अवार्ड में रजत पदक, प्रमाणपत्र के साथ ही 700 डॉलर भी मिले। प्र. अब आगे आप टेनिस खिलाड़ी के रूप में किस टूर्नामेंट में भाग लेने जा रही हैं?
अब पंचकूला में होने वाले टूर्नामेंट में जाने के लिए तैयारी कर रही हूँ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टेनिस के लिए तुनिशिया और इक्वेडर जाना है।
कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज में प्रथम सेमेस्टर के विद्यार्थियों को मिशन ओरिएंटेशन 2021 के कार्यक्रम में नये विद्यार्थियों का स्वागत किया गया। कोरोना के नियमों का पालन करते हुए मिशन ओरिएंटेशन में कॉलेज में डिग्री प्राप्त करने के अतिरिक्त कई करेंट विषयों एवं अन्य रोजगार संबन्धित विषयों की शिक्षा देने के विषय में जानकारी दी गई । मिशन का उद्देश्य है विद्यार्थियों को अपनी डिग्री से इतर विषयों को पढ़ने का अवसर प्रदान करना। भवानीपुर कॉलेज में चार दिनों तक चलने वाले इस मिशन ओरिएंटेशन में दस सत्रों में विभिन्न स्ट्रीम के एक हजार से अधिक छात्र छात्राओं ने भाग लिया जिसमें बीकॉम बीए बीबीए बीएससी के छात्र रहे। इस मिशन में अट्ठारह से अधिक कलेक्टिव के विषय में बताया गया । नये विद्यार्थियों का स्वागत किया गया। सीनियर विद्यार्थियों के कलेक्टिव क्रिसेंडो, फ्लेम, इन-एक्ट आदि ने अपने कार्यक्रम दिए। मिशन का उद्देश्य ही है अवसर देना। संगीत, नृत्य और अंतहीन संभावनाएं। डिग्री के अलावा खेल, एथलीट, पैशन, पब्लिक स्पीकिंग, डीजे, टेनिस, छोटे, बड़े और समसामयिक विभिन्न क्षेत्रों में कोर्सेज के एवी की प्रस्तुतियां दी गईं । कॉमर्स में 15 सीए फैकल्टी हैं जो कैरियर कनेक्ट आदि के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कॉस्ट एकांउट्स, विदेश में शिक्षा का अवसर एसीसीए कोर्स के द्वारा कर सकते हैं जो विदेशों में 170 देशों में मान्यता प्राप्त है। । मिशन ओरिएंटेशन का सी फील लर्न अर्न का उद्देश्य है। सर्टिफाइड फाइनेंशियल, प्लानर सीएफपी,
कैरियर कनेक्ट, डेटा एनालिसिस, डिजिटल, साइबर सिक्युरिटी आदि बहुत से कोर्स की जानकारी दी गयी।
विद्यार्थी अपने उद्देश्य और लक्ष्य को देखते हुए तय करें इसके लिए गूगल फार्म भरवाए गए । कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन, डायनामिक्स ऑफ कैपिटल मार्केट, इ-लर्निंग, जी सूट, सर्टिफाइड ट्रैनर ऑफ गूगल, जीएसटी, टैली, स्टॉक एक्सचेंज आदि के एवी दिखाए गए।
कलेक्टिव में किसी की लीडरशिप नहीं है बल्कि समूह में काम करने की सीख है। तीन वर्षों तक टीम के साथ काम करना । रुचि के अनुसार अपने विषय को विद्यार्थियों ने क्रिसेंडो, फ्लेम, इन-एक्ट, एक्सप्रेशन, फैशन, बी ई एस टी बिजनेस संबंधित चौपाल बिजनस।एम यू एन, डिबेट सेतु बुलजाइ, क्विजार्ड, एन सी सी, एन एस एस आदि क्षेत्रों में नाम दिए।
मिशन ओरिएंटेशन 2021 में नये विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए डीन प्रो. दिलीप शाह, प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या उदेशी, प्रो विवेक पटवारी आदि शिक्षकों और विद्यार्थियों ने सहयोग दिया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।
कोलकाता : इतिहास और बऊबाजार का एक गहरा रिश्ता है। जब हम दुर्गापूजा परिक्रमा पर निकले तो यहाँ की गलियों से गुजरते रहे। माँ दुर्गा के आगमन का उल्लास हर तरफ नजर आ रहा है। दुर्गापूजा कमेटियों के सदस्य बेहद व्यस्त हैं। जो सड़कें और गलियाँ खाली दिख रही हैं, वह गुलजार होने जा रही हैं। यह सही है कि कोरोना का भय है मगर बात जब 2020 की करें तो 2021 कहीं बेहतर होता नजर आ रहा है। थीम के रूप में भी कोरोना इस बार भी दुर्गा पूजा आयोजकों की पसन्द है। कुछ पंडाल तो दूर से ही कोरोना के प्रति सजग हैं और जागरुकता लाने में जुटे हैं। शुभजिता दुर्गोत्सव में आज हम आपको नींबूतला के दो मंडप दिखाने जा रहे हैं और आज का फोकस है सन्तोष मित्रा स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति। अलग – अलग थीम पर बने इस पूजा के मंडप कोलकाता ही नहीं बल्कि कोलकाता के बाहर भी लोगों को लुभाते रहे हैं। इस साल संतोष मित्रा स्क्वायर में दुर्गा पूजा आयोजन के 86 साल पूरे हो रहे हैं। सन्तोष मित्रा स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति अपनी बेहतरीन थीम पूजा के लिए विशेष स्थान रखती है। यह पूजा 1936 में स्थापित हुई थी और कोलकाता के बेहतरीन दुर्गा पूजा मंडपों में इस दुर्गोत्सव का विशेष स्थान है।सन्तोष मित्रा स्क्वायर यानी नींबूतला दुर्गापूजा के माध्यम से आप कोलकाता में बैठे – बैठे राजस्थान के जयपुर का भव्य लक्ष्मी नारायण मंदिर देख सकते हैं। इस मंदिर की प्रतिकृति ही होगा सन्तोष मित्रा स्क्वायर का दुर्गा पूजा मंडप। इस दुर्गोत्सव समिति के अध्यक्ष कांग्रेस नेता प्रदीप घोष हैं। इस दुर्गापूजा की विशेषता यह है कि आपको थीम अलग – अलग दिखेगी मगर प्रतिमा पारम्परिक बांग्ला साज वाली ही होती है और इस बार भी प्रतिमा मिंटू पाल ने बनायी है। प्रतिमा में माँ की सज्जा साबेकीयाना होगी। यहाँ हर पंडाल के बार मेला भी लगता है जो कोरोना के कारण इस साल नहीं हो रहा है।
सन्तोष मित्रा स्क्वायर सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति के महासचिव नवकुमार हाइप ने बताया कि पूजा के अतिरिक्त यह दुर्गापूजा समिति काफी सामाजिक कार्य करती है। ठाकुरपुकुर कैंसर अस्पताल में समिति की तरफ से 2 निःशुल्क बेड उपलब्ध करवाये गये हैं। क्रांतिकारी सन्तोष मित्र के नाम पर इस समिति का नाम रखा गया है। कमेटी ने यहाँ स्थित 100 साल पुराने शिक्षण संस्थान का पुनरुद्धार करवाया है। पास ही की चटर्जी बाड़ी में पहली बार यह पूजा स्थापित हुई। पूजा से ज्ञान प्रकाश घोष, चारू प्रकाश घोष, मृंगाक मोहन सूर, रायचंद बड़ाल, आलोक कुमार दे समेत कई हस्तियाँ इस पूजा से जुड़ी रही हैं। 1993 में पहली बार थीम पूजा की शुरुआत यहाँ से हुई। यहाँ कई कलाकार निःशुल्क प्रस्तुति देते हैं।
कोरोना को लेकर यह दुर्गापूजा समिति काफी सक्रिय है। सैनेटाइजर और मास्क की व्यवस्था करने के साथ ही लोगों को सजग भी किया जा रहा है। आयोजक चाहते हैं कि भीड़ एकत्रित न हो.यानी पूजा देखिए मगर सेल्फी या तस्वीरों के लिए अधिक देर तक खड़े न रहिए।
दुर्गा पूजा को लेकर तैयारियां अब अपने अंतिम चरण में है। महालया के साथ ही दुर्गा पूजा की शुरुआत हो जाएगी। दुर्गा पूजा के पहले महालया का अपना एक खास महत्व है। बंगाल में इस दिन को लोग खास तरीके से मनाते हैं। इसके साथ ही जिन राज्यों में दुर्गा पूजा धूमधाम से मनाया जाता है उन राज्यों में भी महालया का विशेष महत्व है। लोग महालया की साल भर लोग प्रतीक्षा करते हैं। हिंदू धर्म में महालया का अपना एक अलग महत्व होता है। यह अमावस्या के आखिरी दिन मनाया जाता है जो पितृपक्ष का भी अंतिम दिन होता है।
क्या है महालया
हिंदू शास्त्रों के अनुसार महालया और पितृ पक्ष अमावस्या एक ही दिन मनाया जाता है। इस बार यह 6 अक्टूबर को होगा। महालया के दिन ही मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखें तैयार करता है। इसके बाद से मां दुर्गा की मूर्तियों को अंतिम रूप दिया जाता है। दुर्गा पूजा में मां दुर्गा की प्रतिमा का विशेष महत्व है और यह पंडालों की शोभा बढ़ाती हैं। दुर्गा पूजा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इस बार यह 7 अक्टूबर से शुरू हो रहा है जबकि मां दुर्गा की विशेष पूजा 11 अक्टूबर से शुरू होकर 15 अक्टूबर दशमी तक चलती रहेगी।
ऐतिहासिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन अत्याचारी राक्षस महिषासुर का संहार करने के लिए भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान महेश ने मां दुर्गा के रूप में एक शक्ति सृजित किया था। महिषासुर को वरदान था कि कोई भी देवता या मनुष्य उसका वध नहीं कर सकता है। ऐसा वरदान पाकर महिषासुर राक्षसों का राजा तो बन ही गया था साथ ही साथ उसे घमंड भी हो गया था और वह लगातार देवताओं पर ही आक्रमण करता रहता था। एक बार देवताओं से युद्ध हुआ और वे हार गए। इसके बाद देवलोक में महिषासुर का राज हो गया। तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ-साथ आदिशक्ति की आराधना की थी। इसी दौरान देवताओं के शरीर से एक दिव्य रोशनी निकली। उसने मां दुर्गा का स्वरूप धारण किया। 9 दिन तक चले भीषण युद्ध के बाद मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। महालया को मां दुर्गा के धरती पर आगमन का दिन माना जाता है। मां दुर्गा शक्ति की देवी है।
बंगाल में है खास महत्व
महालया का महत्व बंगाल में कुछ खास ही है। इसे धूमधाम से मनाया जाता है। मां दुर्गा में आस्था रखने वाले लोग इस दिन का लगातार इंतजार करते हैं और महालय के साथ ही दुर्गा पूजा की शुरुआत करते हैं। महालया नवरात्रि और दुर्गा पूजा की शुरुआत का प्रतीक है। कहा जाता है कि महालया के दिन ही सबसे पहले पितरों को विदाई दी जाती है। इसके बाद मां दुर्गा कैलाश पर्वत से सीधे धरती पर आती हैं और यहां 9 दिन तक वास करती है तथा अपनी कृपा के अमृत बरसाती हैं। महालया के दिन मां दुर्गा की आंखों को तैयार किया जाता है। मूर्तिकार इस में रंग भरते हैं। इससे पहले वह मां दुर्गा की विशेष पूजा करते हैं।
कोलकाता : डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी जैन की जैन ऑनलाइन ने आधिकारिक तौर पर अपने नया ब्रांड अभियान जारी किया। यह विज्ञापन ऑनलाइन शिक्षा को लेकर संशयों को दूर करने का प्रयास करता है। दो 60-सेकंड की फिल्मों के नेतृत्व में, विज्ञापनों को 15-30 सेकंड के छोटे और सामयिक संदेशों के साथ विविध प्लेटफार्मों के अनुरूप अनुकूलित किया गया है। जिज्ञासु कार्यालय सहयोगियों और जांच करने वाले पड़ोसियों की विशेषता वाला एकीकृत ओमनी चैनल अभियान, इस बात की पड़ताल करता है कि कैसे प्रभावशाली लोगों का एक समूह एक महत्वाकांक्षी शिक्षार्थी की पसंद को प्रभावित करता है। हाइपर कनेक्ट एशिया द्वारा परिकल्पित ब्रांड फिल्में हास्य व्यंग्य के माध्यम से ब्रांड का मूल संदेश देती हैं। रिलीज होने के बाद से, वीडियो को 10 मिलियन से अधिक बार देखा जा चुका है।
डॉ. राज सिंह, कुलपति- जैन (डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी) ने इस अभियान पर अपने विचार साझा किए, “हमारा ब्रांड अभियान हमारे विश्वास को रेखांकित करता है कि विकल्पों से भरी दुनिया में, सही सलाह अक्सर किसी के प्रभाव या राय निर्माताओं से आती है। ”
हाइपर कनेक्ट एशिया के सह-संस्थापक और क्रिएटिव लीड, किरण खड़के ने कहा, “महामारी ने उन छात्रों के लिए विकल्पों के एक पूल के दरवाजे खोल दिए हैं, जो ऑनलाइन विश्वसनीय डिग्री प्रोग्राम की तलाश में हैं। इससे एडटेक सेक्टर में तेजी आई है। हमने पहले अभियान के लिए कार्यस्थल में आगे रहने के लिए एक भावुक पेशेवर हमेशा अपने पैर की उंगलियों पर इस विचार को चुना, और दूसरा उस परिदृश्य की पड़ताल करता है जहां एक पड़ोसी की जिज्ञासा कुछ फायदेमंद होती है। फिल्म सापेक्ष जीवन स्थितियों के माध्यम से उनकी चिंताओं का समाधान देने की कोशिश करती है जिससे दर्शक संबंधित हो सकते हैं। ”
कोरोना पर टीकाकरण की जीत को दर्शाएगी थीम कोलकाता : कोलकाता के प्रख्यात दुर्गोत्सवों में शामिल यूथ एसोशिएशन की दुर्गा पूजा 2 साल बाद एक बार फिर मोहम्मद अली पार्क में आयोजित हो रही है। इस दुर्गोत्सव को पार्क के निकट सेन्ट्रल एवेन्यू फायर स्टेशन में कुछ समय के लिए स्थानान्तरित करना पड़ा था। इस वर्ष पूजा में कोरोना टीकाकरण को थीम बनाया गया है और कोरोना पर टीकाकरण की जीत इस पूजा की थीम होगी। मोहम्मद अली पार्क पूजा के महासचिव सुरेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि 2020 अगर कोविड -19 संक्रमण के लिए था तो 2021 कोविड टीकाकरण का है जो कोविड -19 का एकमात्र उपचार है। थीम महामारी से बचाव पर केन्द्रित होगी मगर लोग बाहर से ही 15 फीट की दूरी से मंडप देख सकेंगे। लोगों के स्वास्थ्य से महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है। गौरतलब है कि इस पूजा में महिषासुर की जगह कोरोनासुर को दिखाया गया था। पूजा 1969 में ताराचंद दत्त स्ट्रीट में आरम्भ हुई थी। इस वर्ष हुगली जिले पंकज घोष सजावट की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हैं। मंडप की ऊँचाई 30 फीट होगी और प्रतिमा नदिया जिले के कुश बेरा बना रहे हैं।
जालान पुस्तकालय में छायावाद पर विचार गोष्ठी आयोजित
कोलकाता : सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय द्वारा छायावाद की शत वर्ष पूर्ति पर एक राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन रविवार को किया गया। पुस्तकालय सभागार में आयोजित इस विचार गोष्ठी का विषय था ‘शताब्दी के आलोक में छायावाद ‘ । इस विषय पर विचार रखते हुए प्रमुख वक्ता हिन्दुस्तानी अकादमी, प्रयागराज के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि छायावाद को नकारने की पूरी कोशिश की गयी। यह उपेक्षा आज भी बनी हुई है। छायावाद पर लगे पलायन के आरोपों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि वह पलायन नहीं बल्कि शांति की तलाश है। शांति, सौहार्द, समरसता और प्रेम के बगैर किसी देश का विकास नहीं हो सकता। छायावादी कवि अपनी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्त करते हुए आशा का संचार करते हैं।
श्री बड़ाबाजार कुमारसभा पुस्तकालय के अध्यक्ष डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि छायावादी कवियों ने मानवता को विजयी बनाने का सूत्र दिया। उन्होंने छायावाद को शक्ति एवं जागरण का काव्य बताया।
ऋषि बंकिम चंद्र कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. ऋषिकेश कुमार सिंह ने कहा कि छायावाद का नवजागरण से गहरा सम्बन्ध है। भारतेन्दु की कविताओं में राष्ट्रीयता की भावना ही छायावाद में जाकर प्रबल हो उठती है। स्वयं को जानना ही परम्परा है और मौलिकता ही भारतीयता है। छायावाद में यही मौलिकता और राष्ट्रीय चेतना दिखती है।
विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो. नन्द किशोर पाण्डेय ने कहा कि स्वाधीनता आन्दोलन में साहित्यकारों की भूमिका प्रशंसनीय है।
उन्होंने कहा कि स्वदेशी को विचार के केन्द्र में लाने वाले भारतेन्दु ही थे। दुःखद तथ्य है कि साहित्यकारों के अवदान की चर्चा राजनेता नहीं करते। वे साहित्यकारों की उपेक्षा करते हैं। चर्चा इस पर होनी चाहिए क्योंकि राजनेता साहित्यकारों के जीवन से प्रेरणा पाते हैं। सभी छायावादी कवि सिर्फ कवि नहीं थे बल्कि आलोचक भी थे। स्वागत भाषण सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने दिया। कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रख्यात गायक एवं वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश मिश्र द्वारा सरस्वती वन्दना की प्रस्तुति से हुआ। संगोष्ठी का संचालन बानरहाट कार्तिक उरांव हिन्दी गवर्नमेंट कॉलेज, जलपाईगुड़ी के सहायक प्रवक्ता डॉ. अभिजीत सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया। समारोह को सफल बनाने में पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, विजय तिवारी, दिव्या प्रसाद समेत अन्य कई लोगों का योगदान रहा। विचार गोष्ठी का प्रसारण आभासी पटल जूम पर भी हुआ। समारोह में कोरोना सम्बन्धी नियमों का पालन किया गया और कई गण्यमान्य अतिथि भी इस अवसर पर उपस्थित रहे।
कोलकाता : कोलकाता के सुप्रतिष्ठित कॉलेज खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज के हिंदी विभाग तथा आइक्यूएसी के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी साहित्य एवं सिनेमा का अंतर्द्वंद्व’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. सुबीर कुमार दत्त के स्वागत भाषण से हुआ। अतिथि एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए उन्होंने साहित्य और सिनेमा के संबंध को उजागर किया । हिंदी विभाग और आईक्यूएसी के संयुक्त तत्त्वावधान में हुए इस कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए कहा कि साहित्य और सिनेमा का सम्बंध काफी गहरा है। साहित्य के माध्यम से सिनेमा जीवन को नई दिशा देने का काम करता है। दिल्ली से जुड़े वरिष्ठ लेखक प्रो.जवरीमल्ल पारख ने बीज वक्तव्य दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने हिंदी सिनेमा के इतिहास पर चर्चा करते हुए साहित्य और सिनेमा के शिल्पगत भेद की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और सिनेमा दोनों हमारी चेतना को उद्वेलित करते हैं, एक शब्दों के माध्यम से और एक दृश्यों के माध्यम से।उन्होंने साहित्यिक कृतियों में उपस्थित मूल्यों को सिनेमा के द्वारा व्यापक स्तर तक पहुँचाने की बात पर भी बल दिया। प्रख्यात कवि एवं गीतकार देवमणि पांडेय ने सिनेमा में प्रयुक्त गीतों एवं गीतकारों की विडम्बनापूर्ण चिंताओं की ओर दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया। उन्होंने साहित्यिक कृतियों और साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों को मूल्यपरक मानते हुए कहा कि हिंदी सिनेमा में संगीतबद्ध फिल्मों की एक लंबी परम्परा रही है। साथ ही साथ उन्होंने धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साम्प्रदायिकता जैसे साहित्यिक विषयों पर आधारित फिल्मों की चर्चा की। कल्याणी विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं युवा आलोचक डॉ. हिमांशु ने कहा साहित्य और संस्कृति को सिनेमा और अन्य कला माध्यमों से जोड़ने की जरूरत है। सिनेमा में साहित्य की तरह सामंती और पूंजीवादी व्यवस्था के बरक्स प्रतिरोध की क्षमता है। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक श्री प्रहलाद अग्रवाल भारतीय ज्ञान परम्परा को नाटक के साथ-साथ सिनेमा में भी देखने की बात करते हैं। वे सिनेमा को कला के साथ व्यावसायिकता से जोड़ने की बात करते हैं। वे पार्श्व संगीत को सिनेमा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए कहा कि सिनेमा और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। सिनेमा समाज और संस्कृति को कई स्तरों पर प्रभावित करता है और उनसे प्रेरणा भी लेता है। इस अवसर पर देश-विदेश से भारी संख्या में साहित्य-संस्कृति और सिनेमा प्रेमी जुड़े थें। अतिथि परिचय एवं तकनीकी सहयोग विभाग की शिक्षिका प्रो. मधु सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो. राहुल गौड़ ने दिया।