Saturday, April 11, 2026
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पढ़ाई छूटी, हौसला नहीं, मुश्किलों के आगे तनकर खड़ी है कबड्डी खिलाड़ी प्रीति

कोयंबटूर : कोयंबटूर के सीरानैकेन पलायम की आर प्रीति को अपनी पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी क्योंकि उसके परिवार के पास स्कूल फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे। प्रीति के माता-पिता पेशे से मजदूर हैं। महामारी और लॉकडाउन में उन्हें काम नहीं मिला और बच्ची की पढ़ाई छूट गई। प्रीति के घर में बिजली भी नहीं है, दो वक्त का पेट भर खाना बहुत मुश्किल से जुट पाता है, लेकिन कबड्डी खेलते समय प्रीति के दिमाग में ये बातें नहीं आती हैं।
प्रीति ने पिछले महीने नेपाल में आयोजित एक टूर्नामेंट में लड़कियों की कबड्डी टीम का नेतृत्व किया। इससे पहले टीम ने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीती थी। उनके पास नेपाल जाने के लिए रुपये नहीं थे। चूंकि यह सरकारी कार्यक्रम नहीं था, इसलिए उन्हें प्रायोजकों की तलाश करनी पड़ी। टीम के कोच जी सतीश कुमार ने कुछ लोगों से मदद ली और बाकी अपनी जेब से रुपये खर्च करके लड़कियों की टीम नेपाल भेजी, जहां उन्हें कामयाबी मिली।
छूट गयी पढ़ाई
प्रीति ने कहा, ‘पिछले साल मैंने कॉलेज जॉइन किया था, लेकिन ऑनलाइन कक्षाएं अटैंड करने के लिए मेरे पास मोबाइल नहीं था। मेरी पढ़ाई यहीं से बंद हो गई। अब मैंने फिर से दाखिला ले लिया है लेकिन मुझे आगे सेमेस्टर फीस देनी है, जो मेरे पास नहीं है। खेल कठिनाइयों को भूलने में मदद करता है। मैं पिछले छह साल से खेल रही हूं और सारी मुश्किलों का सामने कर रही हूं।’
पिता की मौत, मां ने पढ़ाने के लिए 5000 रुपये लिए उधार
प्रीती की टीम की साथी सी कीर्तना 11वीं में पढ़ती है। उसने कहा कि एक साल पहले उसके पिता का निधन हो गया। उसकी मां अपने चार बच्चों की परवरिश के लिए एक मजदूरी करती है। कबड्डी उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है। थडगाम के रहने वाले कीर्तना कोयंबटूर के नेहरू स्टेडियम के लिए सुबह 5.30 बजे बस पकड़ती है, तब वह सुबह 7 बजे तक प्रैक्टिस के लिए पहुंच पाती है, लेकिन वह कभी भी अपनी प्रैक्टिस मिस नहीं करती है।
खाली पेट कबड्डी खेलने को मजबूर
कीर्तना ने कहा, ‘मैं सुबह खाना खाकर नहीं आती हूं। दोपहर के भोजन के लिए, मैं अपने कोच के घर और एक टीम के साथी के घर पर वैकल्पिक दिनों में खाना खाती हूं क्योंकि मेरी मां मुझे खाने के लिए पैसे नहीं दे सकती हैं। उसने मेरे स्कूल में दाखिले के लिए 5,000 रुपये उधार लिए और उसे किश्तों में चुका रही है। लेकिन वह मुझे खेल को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती रहती हैं। मेरी इच्छा प्रो कबड्डी लीग में खेलने की है।’
चार साल पहले बनी यह टीम
चार साल पहले कोच सतीश के मार्गदर्शन में लड़कियां एक साथ आई थीं। एक पूर्व कबड्डी खिलाड़ी सतीश का कहना है कि 20 लड़कियों की टीम संगठित रूप से बनी है। उन्होंने एक निजी स्कूल में कोचिंग के साथ शुरुआत की, उसी दौरान इन बच्चियों ने उन्हें संपर्क किया। सतीश ने कहा कि आज उन्हें अपनी इस टीम पर गर्व है।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

अमित खरे: बिहार कैडर के आईएएस अधिकारी से प्रधानमंत्री मोदी के सलाहकार तक

रांची : साल 1977 में सोलह साल के रहे अमित खरे ने रांची के एक केंद्रीय विद्यालय से मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की तो, उन्हें क़रीब 80 फ़ीसद नंबर मिले थे। वे उस साल अपने स्कूल के टॉपर रहे. इसके बाद की पढ़ाई उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज से की।
फिर भारतीय प्रबंधन संस्थान (आइआइएम) अहमदाबाद गए और वहां से मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएशन (पीजीएम) किया. बाद में उन्होंने अमेरिका के साइकेरस यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई भी की।
साल 1985 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए चुने गए. पहले बिहार और बिहार विभाजन के बाद (2000) में झारखंड कैडर के अधिकारी रहे अमित खरे भारतीय प्रशासनिक सेवा से अपनी हालिया सेवानिवृति के बाद अब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकार नियुक्त किए गए हैं।
इस कारण वे चर्चा में हैं लेकिन यह पहला मौक़ा नहीं है, जब उनकी चर्चा हो रही हो। नब्बे के दशक के बहुचर्चित पशुपालन घोटाला (चारा घोटाला) से लेकर पिछले साल बनी नई शिक्षा नीति-2020 और आइटी रुल्स-2021 के प्रावधानों को बनाने में भूमिका के लिए भी अमित खरे चर्चा में रहे हैं। कई अहम पद पर रहे
अमित खरे की छवि एक गंभीर अधिकारी की रही है।
झारखंड में उनके अधीनस्थ रहे एक अधिकारी ने बताया, “वे कम बोलते हैं. गंभीर रहते हैं. कभी-कभार मुस्कुराते हैं. लूज़ टॉक नहीं करते और फ़ाइलों को पेंडिंग रखने की उनकी आदत नहीं. वे कई-कई फ़ाइलें एक दिन में निपटाते रहे हैं. लोग उन्हें पढ़ाकू, रिसर्चर और अंतर्मुखी मानते हैं. प्रशासनिक प्रबंधन और वित्त उनके प्रिय विषय रहे है। .”
आईएएस अधिकारी के तौर पर अपने 36 साल के करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों को संभाला है. पिछले 30 सितंबर को अपनी सेवानिवृति के वक़्त वे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय में सचिव थे।
इससे पहले वे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में भी सचिव रह चुके हैं. बिहार में वे पटना समेत कई दूसरे ज़िलों के ज़िलाधिकारी, प्राथमिक शिक्षा निदेशक और बिहार राज्य चर्म उद्योग विकास निगम के सर्वेसर्वा रहे। साल 2000 में बिहार बंटवारे के बाद उन्होंने झारखंड कैडर चुना और वे रांची आ गए।
झारखंड में वित्त सचिव, उच्च शिक्षा सचिव, विकास आयुक्त रहने के साथ वे तत्कालीन राज्यपाल वेद मारवाह के प्रधान सचिव रहे। उन्होंने एक वक़्त रांची विश्वविद्यालय के कुलपति का भी पद संभाला।

भाई आईएफ़एस, पत्नी आईएएस
रांची में उप-महालेखापरीक्षक रहे अविनाश चंद्र खरे (पिताजी) और नलिनी खरे (मां) के घर जन्मे अमित खरे के बड़े भाई अतुल खरे भारतीय विदेश सेवा के 1984 बैच के अधिकारी रहे हैं।
आईएफ़एस से रिटायर होने के बाद वे इन दिनों संयुक्त राष्ट्र के लिए काम कर रहे हैं। अमित खरे की पत्नी निधि खरे 1992 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। वे इन दिनों केंद्र सरकार के खाद्यान्न व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में अपर सचिव हैं। वे भी झारखंड कैडर की अधिकारी हैं और इन दिनों केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं।
पशुपालन घोटाला में जाँच
नब्बे के दशक में मौजूदा झारखंड का हिस्सा बिहार राज्य की परिधि में था। बिहार सरकार ने अप्रैल 1995 में अमित खरे को पश्चिमी सिंहभूम का ज़िलाधिकारी बनाकर चाईबासा भेजा।
उन्हीं दिनों बिहार के तत्कालीन मुख्य महालेखापरीक्षक टीएन चतुर्वेदी ने पशुपालन विभाग में आवंटित बजट से अधिक ख़र्च से संबंधित कुछ गड़बड़ियां पकड़ीं और सरकार को इस बारे में बताया।
तब राज्य के वित्त सचिव रहे वीएस दुबे ने इन गड़बड़ियों के बारे में बिहार के सभी ज़िलाधिकारियों को चिट्ठी लिखी। पटना से निकली वह चिट्ठी कई सौ किलोमीटर का सफ़र तय कर चाईबासा पहुँची।
तब वहाँ डीएम रहे अमित खरे ने उस पत्र के आधार पर इसकी छानबीन करायी, तो उन्हें भी गड़बड़ियां दिखीं। खरे ने वहां के ज़िला पशुपालन अधिकारी से जवाब तलब किया, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
इसके बाद 27 जनवरी 1996 को उन्होंने चाईबासा के पशुपालन कार्यालय पर छापा मारा और कई गड़बड़ियों के सबूत मिलने के बाद उस दफ़्तर को सील करा दिया। उस मामले में एफ़आइआर करायी गई और बाद के दिनों में रांची, जमशेदपुर, गुमला और दुमका में भी छापे पड़े। फिर कुछ लाख की गड़बड़ियों से शुरू हुआ यह मामला 900 करोड़ रुपये से भी अधिक के पशुपालन घोटाला के तौर पर सामने आया।
उस मामले में बिहार के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों डॉ जगन्नाथ मिश्र और लालू प्रसाद यादव को सज़ा भी हुई। डॉ जगन्नाथ मिश्र का देहांत हो चुका है और लालू प्रसाद यादव अभी ज़मानत पर हैं। यह पहला मामला था, जब एक आईएएस के तौर पर अमित खरे मीडिया की सुख़ियों में आए। वे इसपर किसी भी तरह की सीधी टिप्पणी से बचते रहे हैं। हालांकि, कुछ साल पहले उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें तब किसी तरह का डर नहीं लगा और न किसी ने उन्हें कोई प्रलोभन दिया।

चुनौतियां और उपलब्धि
पशुपालन घोटाला में पुलिस रिपोर्ट कराने के कुछ ही दिनों बाद अमित खरे का तबादला तब मृतप्राय समझे जाने वाले बिहार राज्य चर्म उद्योग विकास निगम में कर दिया गया।
वे पटना चले गए और उसके बाद बिहार में नौकरी करने का दौर हमेशा सुखद नहीं रहा। साल 1997 में पिताजी की तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने छुट्टी ली, जो बीच में ही रद्द कर दी गयी। उसी दौरान उनके पिताजी का निधन भी हो गया। झारखंड में काम करते हुए भी वे किसी सरकार के बहुत क़रीब या बहुत दूर नहीं रहे। उनकी छवि तटस्थ अधिकारी की रही। इस कारण वे और उनकी आईएएस पत्नी कई बार केंद्रीय प्रतिनियुक्तियों पर जाते रहे।
वे केंद्र की मौजूदा सरकार में सूचना व प्रसारण मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय में सचिव रहे। इस दौरान नई शिक्षा नीति-2020 और डिजिटल मीडिया पर निगरानी से संबंधित आइटी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रुल 2021 बनाने में उनकी भूमिकाएं भी चर्चा में रहीं । वे तब एचआरडी सचिव बनाए गए, जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू) में फ़ी-स्ट्रक्चर में बढ़ोतरी के बाद वहाँ के छात्र आन्दोलन कर रहे थे। उन्होंने सचिव रहते हुए कुलपति से बात कर फ़ीस बढ़ोतरी को वापस कराया और वह आंदोलन शांत हुआ। ऐसे कई और क़िस्से अमित खरे के साथ जुड़े हैं।

 

विजयादशमी की मिठास और राजभोग का स्वाद

सामग्री : 1 .5 लीटर (7. 5 कप) दूध , 1 किग्रा. (4 कप) चीनी , 2 छोटी चम्मच अरारोट, आधा छोटी चम्मच या 3 चने के बराबर टुकड़े टाटरी (टार्टरिक एसिड), 10-12 काजू, 1 टेबल स्पून ,  6-7 छोटी इलायची।

विधि : राजभोग बनाने के लिये सबसे पहले छेना बनाकर तैयार करना है: छैना बनाने के लिये दूध को गर्म करने के लिये गैस पर रख दीजिये। छेना फाड़ने के लिये टाटरी (टार्टरिक एसिड) को आधा कप पानी में घोल कर टाटरी का घोल बना लीजिये। दूध में उबाल आने के बाद गैस बन्द कर दीजिये, दूध को गैस से उतार लीजिये और थोड़ा सा ठंडा होने दीजिये, दूध को 80 % गरम रहने के बाद उसमें थोड़ा थोड़ा टाटरी का पानी डालिये और चमचे से मिलाते हुये चलाइये, जब तक दूध फटने न लगे तब तक टाटरी का पानी मिलाते और दूध को चलाते रहें। जैसे ही दूध फट जाय टाटरी का पानी मिलाना बन्द कर दीजिये. दूध 2 मिनट में अच्छी तरह फटकर तैयार हो जाता है।

अब सूती, सफेद, पतले कपड़े को धोकर छलनी के ऊपर फैलायें और छलनी को किसी बड़े बर्तन के ऊपर रख लीजिये. फटे दूध को कपड़े पर डालिये, छेना कपड़े के ऊपर रह जायेगा, और पानी नीचे के बर्तन में आ जायेगा। कपड़े को चारों ओर से उठा कर, पकड़ कर छेना को दबाकर सारा पानी निचोड़ दीजिये। छैना तैयार है। छेना को किसी बड़ी प्लेट में निकाल लीजिये, और दोनों हाथो की उंगलियों से मथ मथ कर चिकना कीजिये, चिकने छेना में अरारोट डालिये और अच्छी तरह मलते हुये मिला लीजिये. राजभोग के लिये छैना तैयार हो गया है।

पिठ्ठी बना लीजिये: काजू को छोटे छोटे टुकडे में काट लीजिये, पिस्ते को भी छोटे छोटे टुकड़े में काट लीजिये (आप चाहें तो पिस्ते को गरम पानी में डाल कर थोड़ा रख लीजिये, और उसका छिलका उतार लीजिये)। इलायची को छील कर कूट कर पाउडर बना लीजिये। 1 टेबल स्पून छेना और सारी कटे हुये मेवे, इलायची पाउडर अच्छी तरह मिलाकर पिठ्ठी तैयार कर लीजिये. (पिठ्ठी में पसन्द के अनुसार, पीला या लाल फूड कलर डाल सकते हैं).
राजभोग के गोले बनाकर तैयार कर लीजिये: छेना को बराबर बराबर के छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ लीजिये (इतने छैना को 12-14 टुकड़ों में तोड़ लीजिये). छेना का एक टुकड़ा उठाइये, हथेली पर रखकर थोड़ा बड़ा कर, बीच में थोड़ी सी गहराई बना लीजिये, गहराई के ऊपर 1/4 छोटी चम्मच पिठ्ठी रख लीजिये। छेना को चारों ओर से उठाकर पिठ्ठी को बन्द कर दीजिये, और अच्छी तरह दोंनों हाथों की सहायता से गोल कर लीजिये, तैयार गोले को प्लेट में रखिये, सारे राजभोग के गोले इसी तरह बनाकर तैयार कर लीजिये.

चाशनी बना लीजिये : किसी बर्तन में चीनी डालिये, और 2.5 कप पानी डाल दीजिये, और चाशनी को चीनी घुलने तक पकने दीजिये. चीनी अगर साफ न हो तो चीनी पानी में घुलने के बाद आधा कप दूध चाशनी में डालिये, उबल कर जो गन्दे से जो झाग चाशनी के ऊपर आ जाय उन्हैं चम्मच से निकाल कर हटा दीजिये। चाशनी को 1 तार या 2 तार देखना आवश्यक नहीं है। चाशनी में अच्छी तरह उबाल आने पर राजभोग को 1 – 1 करके अच्छी तरह उबलती चाशनी में डालिये, गैस प्लेम तेज रखिये, चाशनी हमेशा उबलती रहनी चाहिये। बर्तन को ढककर राजभोग को पकाइये ताकि चाशनी के ऊपर भरपूर झाग बनते रहें, ये चाशनी के झाग राजभोग को पकने में मदद करते हैं। 8-10 मिनट में चाशनी गाढ़ी होने लगती है, अब चम्मच से 1-1 चम्मच पानी डालें, लेकिन ध्यान रहे कि चाशनी में हमेशा उबाल बना रहे, धीरे धीरे एकदम थोड़ा थोड़ा पानी डालते रहे कि चाशनी पतली बनी रहें। राजभोग को उबलती चाशनी में 20 मिनिट तक पका लीजिये। चाशनी में पड़े राजभोग ठंडे हो जाय तब थोड़ा 1-2 चुटकी पीला फूड कलर या केसर एक टेबल स्पून पानी में घोल कर चाशनी में डालकर मिला दीजिये, पीले गोल्डन, बहुत अच्छे राजभोग तैयार है।

रावण वध के माध्यम से मानवता के रक्षण में श्रीराम के सहायक बने ये योद्धा

रावण ज्योतिष, वास्तुकला, इन्द्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास विमान और घातक अस्त्र एवं शस्त्र थे। उसे शिव से वरदान प्राप्त था। उसके किले की रक्षा देवी करती थी। रावण मायावी शक्तियों का स्वामी था। रावण को भगवान राम कभी नहीं मार पाते, यदि उन्हें इन 10 लोगों का साथ नहीं मिलता तो। लेकिन यह सभी राम की ही लीला थी। जानते हैं इन लोगों को कृतज्ञता के साथ –

1.हनुमान : हनुमानजी ने ही प्रभु श्रीराम की अंगूठी को लेकर समुद्र को पार करने के बाद उसे माता सीता को दिया, मेघनाद के पुत्र अक्षय कुमार का वध कर लंका दहन किया, विभीषण और सुग्रीव को राम से मिलाया, राम और लक्ष्मण का अपहरण कर जब अहिरावण पाताल लोक ले गया था, तो उन्हें मुक्त कराया और उन्होंने ही हिमालय से संजीवनी बूटी को लाकर लक्ष्मण की जान बचाई थी।

2 .लक्ष्मण : प्रभु श्रीराम के भाई लक्ष्मण शेषनाग के अवतार थे। अपनी पत्नी उर्मिला से 14 वर्ष तक दूर रहे लक्ष्मण के बगैर राम न तो सीता माता को ढूंढ पाते और न ही वे युद्ध की तैयारी कर पाते। लक्ष्मण एक श्रेष्ठ धनुर्धर थे और वे पाशुपतास्त्र का संधान करना जानते थे।
3.संपाती और जटायु : राजा दशरथ के मित्र जटायु ने ही सीता को ले जा रहे रावण को रोकने का प्रयास किया और वे मारे गए। जटायु ने राम को पूरी कहानी सुनाई और यह भी बताया कि रावण किस दिशा में गया है? इसके बाद संपाती ने अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की थी। संपाती ने ही दूरदृष्टि से देखकर बताया था कि सीता माता अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं।

4.सुग्रीव : बाली ने सुग्रीव की पत्नी और संपत्ति हड़पकर उसको राज्य से बाहर धकेल दिया था। यही कारण था कि प्रभु श्रीराम ने सुग्रीव से अपने बड़े भाई बाली से युद्ध करने को कहा और इसी दौरान श्रीराम ने छुपकर बाली पर तीर चला दिया और वह मारा गया। बाली वध के बाद सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने और उन्होंने राम के लिए वानर सेना को गठित किया था।

5.अंगद : राम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बाली का पुत्र अंगद भी था। युद्ध के पूर्व श्रीराम ने अंगद को अपना दूत बनाकर लंका भेजा था। वहां अंगद ने अपना पैर जमाकर अपनी शक्ति का परिचय दिया था। अंगद हनुमान की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान थे। रावण की सभा में अंगद ने जो उपदेश दिया, वह अनूठा है।
6.जामवंत : श्रीराम ने जामवंतजी को शिवलिंग स्थापना के समय रावण को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा था। जामवंतजी ने ही हनुमानजी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था। वे एक इंजीनियर भी थे। समुद्र के तटों पर वे एक मचान को निर्मित करने की तकनीक जानते थे, जहां यंत्र लगाकर समुद्री मार्गों और पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। मान्यता है कि उन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जो सभी तरह के विषैले परमाणुओं को निगल जाता था। जामवंतजी आज भी जिंदा हैं।
7.नल : नल और नील दो भाई थे। नल ने ही लंका और भारत के बीच पुल बनाया था। यह पुल लगभग 5 दिनों में बन गया जिसकी लंबाई 100 योजन और चौड़ाई 10 योजन थी। रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्नपूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था। यह सेतु कालांतर में समुद्री तूफानों आदि की चोटें खाकर टूट गया था।

8.गरुड़ भगवान : जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गरुड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरुड़ को संदेह हो गया था। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरुड़ के संदेह को दूर किया।
9.सुषेण वैद्य : राम-रावण युद्ध के समय मेघनाद के तीर से लक्ष्मण घायल होकर मूर्छित हो गए थे, ऐसे में सुषेण वैद्य को बुलाया गया। लक्ष्मण की ऐसी दशा देखकर राम विलाप करने लगे। सुषेण ने कहा- ‘लक्ष्मण के मुंह पर मृत्यु-चिह्न नहीं है अत: आप निश्चिंत रहिए, आप संजीवनी बूटी का इंजताम कीजिए।’ हनुमानजी यह बूटी लेकर आए। यदि सुषेण वैद्य नहीं होते तो लक्ष्मण का जिंदा रहना मुश्किल था और यदि लक्ष्मण का देहांत हो जाता तो संभवत: प्रभु श्रीराम यह युद्ध रोककर पुन: लौट जाते। अत: सुषेण वैद्य की रामकथा में महत्वपूर्ण भूमिका रही।
10. विभीषण : रावण के 10 सिर थे। जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते थे पुन: उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। राम द्वारा लाख प्रयास करने के बाद भी जब रावण नहीं मारा गया, तो वानर सेना में चिंता होने लगी थी। रावण ने अमरत्व प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा ने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा था कि तुम्हारा जीवन नाभि में स्थित रहेगा। यही कारण था कि वानर सेना पर रावण भारी पड़ने लगा था। ऐसे में विभीषण ने राम को यह राज बताया कि रावण का जीवन उसकी नाभि में है। नाभि में ही अमृत है। तब राम ने रावण की नाभि में तीर मारा और रावण मारा गया।

माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर और श्रीराम के हाथों रावण के वध का दिन है विजया दशमी

भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक रही है। आज से अनेक वर्ष पूर्व त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने 9 दिन मां भगवती की आराधना उपरांत विजयादशमी के दिन बलशाली रावण का वध कर माता सीता को बंधनमुक्त किया था। भगवान श्रीराम की यह विजय सत्य की असत्य पर, न्याय व धर्म की अधर्म पर, अच्‍छाई की बुराई पर, पुण्य की पाप पर विजय होने के कारण विजयादशमी महापर्व मनाया जाता है। देवी भगवती के विजया नाम पर दशमी पूर्णातिथि होने के कारण भी विजयादशमी कहा जाता है। आश्विन शुक्ल दशमी को श्रवण का सहयोग होने से विजयादशमी होती है।
‘ज्योतिर्निबंध’ में लिखा है कि-
‘आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेय: सर्वाकार्यार्थसिद्धये।।’
अर्थात् आश्विन शुक्ल दशमी के सायंकाल में तारा उदय होने के समय विजय काल रहता है, जो सभी कार्यों को सिद्धि प्रदान करता है।
ऋतु परिवर्तन
नवरात्र से ऋतु परिवर्तन की शुरुआत होने लगती है। इन पवित्र दिनों में संयम, सदाचार और ब्रह्मचर्य का व्रत करते हुए शरद ऋतु का स्वागत करना चाहिए और खुद को उसके अनुरूप ढालने का प्रयत्न करना चाहिए।
दशहरे पर पूरे दिनभर ही मुहूर्त होते हैं इसलिए सारे बड़े काम आसानी से संपन्न किए जा सकते हैं। यह एक ऐसा मुहूर्त वाला दिन है जिस दिन बिना मुहूर्त देखे आप किसी भी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं।
आश्विन शुक्ल दशमी को मनाए जाने वाला यह त्योहार ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ के नाम से प्रचलित है। यह त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति का सूचक है। इन दिनों चौमासे में स्थगित कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं।
दशहरे के दिन भगवान श्रीराम की पूजा का दिन भी है। इस दिन घर के दरवाजों को फूलों की मालाओं से सजाया जाता है। घर में रखे शस्त्र, वाहन आदि भी पूजा की जाती है। दशहरे का यह त्योहार बहुत ही पावनता के साथ संपन्न किया जाता है। उसके बाद रावण दहन किया जाता है।
* भगवान राम-सीता और हनुमान की पूजा-अर्चना की जाती है।
* विजयादशमी पर शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है।
* रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र से भगवान शिव की आराधना की जाती है।
* इस दिन करोड़ों रुपए के फूलों की बिक्री होती है और लोग अपने घर के दरवाजे फूलों की मालाओं से सजाकर उत्सव मनाते हैं।
* इस दिन लोग अपनी-अपनी क्षमतानुसार सोना-चांदी, वाहन, कपड़े तथा बर्तनों की खरीददारी करते हैं।
* इस दिन देशभर में रावण के पुतले बनाकर जगह-जगह जलाए जाते हैं।
* दशहरे के दिन शहर-कस्बों और गांवों में श्रीराम-सीता स्वयंवर प्रसंग, रामभक्त हनुमान का लंकादहन कार्यक्रम, रामलीला का बखान करते हुए राम-रावण युद्ध के साथ रावण दहन किया जाता है।
* इस दिन खासतौर पर गिलकी के पकौड़े और गुलगुले (मीठे पकौड़े) बनाने का प्रचलन है।
* रावण दहन के बाद एक-दूसरे के घर जाकर, गले मिलकर, चरण छूकर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है और साथ ही शमी पत्तों को एक-दूसरे को बांटा जाता है। यह पावन त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है।
(साभार – वेबदुनिया)

राधा कृष्ण की प्रेम लीलाओं का वर्णन है रानी बख्त कुंवरि के काव्य में

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। साथ ही देवी पर्व की अशेष शुभकामनाएँ। देवी पर्व पर सबसे ज्यादा उपेक्षा हम तथाकथित देवियों को ही झेलनी पड़ती है, इस बात को हम से बेहतर और कौन समझ सकता है। लेकिन इस तस्वीर को बदलने के लिए कोशिश भी हमें ही करनी है। जब तक हम स्त्रियाँ अपनी स्थिति को बेहतर बनाने या बदलने के लिए किसी मसीहा की आकांक्षा में बैठी रहेंगी, स्थिति खराब ही रहेगी और अगर बदलाव आया भी तो वह ऊपरी और दिखावटी ही होगा। हम स्त्रियों को इस बनावटी बदलाव से बचने की आवश्यकता है और कोशिश करनी चाहिए कि हमारे जीवन में वास्तविक धरातल पर परिवर्तन आए, सिर्फ किताबी नहीं।

सदियों से देवी के नाम पर पूजित लेकिन आम जीवन में हो या साहित्य पटल पर उपेक्षित स्त्रियों की कतार इतनी लंबी है कि उनकी गणना करना मुश्किल काम है। आज ऐसी ही एक कवयित्री से आप का परिचय करवाना चाहती हूं जिनके बारे में बहुत कम जानकारी हमारे पास है। इनका नाम है रानी बख्त कुंवरि और ये “प्रियासखी” उपनाम से कविताएँ लिखा करती थीं। इनके बारे में विभिन्न खोज रपटों से इतनी ही जानकारी मिलती है कि इनका रचनाकाल संवत 1734 था और इस हिसाब से ये मध्ययुगीन कवयित्री ठहरती हैं। ये दतिया की रानी थीं। इनके एक ग्रंथ के बारे में जानकारी मिलती है, जिसका नाम है “प्रियासखी की बानी” जिसमें राधा कृष्ण की प्रेम लीलाओं का वर्णन है। भले ही पदों में आलंबन रूप में राधा और कृष्ण के नामों का प्रयोग किया गया है लेकिन पदों का स्वरूप भक्तिमय न होकर शृंगार परक है। प्रेमी युगल की उन्मुक्त क्रीड़ाएं राधा कृष्ण की प्रणय लीला के आवरण में मुखर हो उठी हैं। मध्ययुगीन स्त्री वह चाहे साधारण स्त्री हो या छोटे-बड़े रियासत की रानी, न जाने कितने सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई भी सुखी और संतुष्ट होने का स्वांग रचती थी या फिर सामाजिक मर्यादा की रक्षा के नाम पर अपनी इच्छाओं- आकांक्षाओं को‌ हँसते हुए कुर्बान कर देती थी। लेकिन मन के किसी कोने में दुबकी पड़ी इच्छाएँ कल्पनाशीलता की डोर थामे, कलम की नोंक पर आ बैठती थीं और अंततः कागज पर उतर ही जाती थी। संभवतः लोक लज्जा की ओट के कारण रचनाओं का बाह्य आवरण भले ही भक्ति का रहता था पर वर्णन की सघनता में ऐन्द्रिकता का समावेश सायास या अनायास हो ही जाता था। इसके लिए तत्कालीन युग की परिस्थितियाँ भी काफी हद तक जिम्मेदार थीं जहाँ स्त्री को साँस लेने, जीने और स्वप्न देखने के लिए भी सामाजिक अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। लेकिन स्त्री तो हर हाल में एक झरोखा खोज या खोल ही लेती है। प्रियासखी ने यह झरोखा भक्ति के गलियारे में खोला ताकि कोई उंगली ना उठा सके लेकिन मन में कैद प्रेमिल कल्पनाओं को शब्दों में साहस के साथ पिरोने से उन्हें कोई नहीं रोक पाया। एक ऐसा ही पद देखिए जिसमें राधा कृष्ण के होली खेलने का उन्मुक्त चित्र खींचा गया है-

 “सखी ! ये दोई होरी खेलें।

रंगमहल में राधावल्लभ रूप परस्पर झेलें

रूप परस्पर झेलत होली खेलत खेल नवेले

प्रेम पिचक पिय नैन भरे तिय, रूप गुलाल।”

यह साधारण होली का चित्र नहीं है। दो प्रेमी युगलों की प्रेम के रंग से रंगमहल अर्थात एकांत में खेली जाने होली है जिसके साक्षी सिर्फ वही दोनों हैं और कोई नहीं। इस तरह की प्रेमसिक्त होली की आकांक्षा हर प्रेमी युगल के मन के कोने में कहीं ना कहीं छिपी होती है। प्रियासखी ने उस आकांक्षा को शब्दों में पिरोकर बंधनों में जकड़ी मध्ययुगीन स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा को भी शब्द दिए हैं। 

सखियों, प्रियासखी के अन्यान्य पदों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। प्रेमपगे पदों की रचयिता प्रियासखी के सरस- सुंदर पद इतिहास के पन्नों में जाने कहाँ विलुप्त हो गये। 

दुर्गोत्सव 2021 : दिल्ली पब्लिक स्कूल, रूबी पार्क में दुर्गा पूजा

कोलकाता : दिल्ली पब्लिक स्कूल, रूबी पार्क में दुर्गा पूजा मनायी गयी। इस आयोजन में प्री प्राइमरी कक्षा के बच्चों ने वर्चुअल यानी आभासी माध्यम पर महिषासुरमर्दिनी शक्ति की विजय का आनन्द लेते हुए कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल की प्रिंसिपल जयती चौधरी के स्वागत भाषण से हुई। इसके बाद एक नाटक का मंचन हुआ जिसमें त्योहार के 5 दिनों का उल्लास प्रदर्शित किया गया। बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।

दुर्गोत्सव 2021 : रूबी पार्क पब्लिक स्कूल के प्रांगण में दुर्गोत्सव

कोलकाता : दुर्गा पूजा पूरे भारत में देवी दुर्गा की पूजा के लिए मनाई जाती है। दुर्गा को आदि शक्ति या अंतिम/परम शक्ति भी कहा जाता है। यह नौ दिनों का त्योहार है, जो शरद ऋतु के दौरान मनाया जाता है। त्योहार महिषासुर राक्षस पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है और इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
दुर्गा पूजा भी एक फसल उत्सव है जो देवी दुर्गा को ब्रह्मांड के निर्माता और भोजन के प्रदाता के रूप में याद दिलाता है। इस प्रकार रूबी पार्क पब्लिक स्कूल के छात्रों ने सिर झुकाकर अपने अंतरात्मा को रोशन करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। कार्यक्रम की शुरुआत नवीं कक्षा के सौनाब दत्ता द्वारा गाए गए एक सुंदर श्लोक के साथ हुई, जिसके बाद गणेश वंदना ,विभिन्न नृत्य और गीतों का प्रदर्शन किया गया।इसके बाद ही स्लाइड प्रस्तुति के माध्यम से छात्रों की कला का मिलान किया गया।

‘कबीर, रवीन्द्रनाथ और छायावाद का मूल स्वर मनुष्यता है’

कोलकाता  :   नव बालीगंज महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा ‘रवींद्र: कबीर और छायावाद प्रसंग’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश से साहित्य-प्रेमियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो.वेद रमण, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट, मॉरीशस, प्रो.गीता दुबे, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, प्रो. अल्पना नायक, श्रीशिक्षायतन कॉलेज और प्रो.संजय जायसवाल, विद्यासागर विश्वविद्यालय उपस्थित थें। स्वागत भाषण देते हुए प्रो. अब्दुल सत्तार ने कबीर के दोहों की ख़ूब प्रशंसा की तथा छायावाद के उत्थान में रोमांटिसिज्म की भूमिका पर प्रकाश डाला। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री शुक्ला ने तुलनात्मक रूप से कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद के बीच बौद्धिक दृष्टिकोण पर समानता की बात कही। इन्होंने कहा कि रवींद्रनाथ पर संत कवियों का काफी गहरा प्रभाव था और वैश्विक मानवता के स्वर तीनों में समान रूप में विधमान है। प्रो. संजय जायसवाल ने कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद में समतुल्यता दिखाते हुए कहा कि कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद तीनों मानवता और विवेकपरकता के त्रिभुज हैं। साथ ही कबीर की आध्यात्मिकता का विकास रवींद्रनाथ और छायावाद में देखा जा सकता है। तीनों का लक्ष्य समान रूप से आत्मा के विस्तार, मानवमुक्ति के स्वर और लौकिक सम्बन्ध के सार्वभौम सत्य के रूप में जुड़ा है। इन्होंने कहा कि कबीर, रवींद्र और छायावाद में मानवीय संवेदना और तार्किकता का स्वर प्रबलता से दिखाई देता है। प्रो.गीता दुबे ने कहा कि कबीर, रवींद्र और छायावाद तीनों प्रेम के डोर से बंधे हुए हैं तथा उनके यहां मानवता का विस्तार है।उन्होंने तीनों के बीच के संबंधों और प्रभाव का तुलनात्मक विश्लेषण किया।प्रो.अल्पना नायक ने भारतीय जागरण को कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद का मूल मंत्र कहा और इसके अंतर्गत सामाजिक जागरण, राजनीतिक जागरण और सांस्कृतिक जागरण पर प्रमुखता से बल दिया। प्रो.वेद रमण ने रहस्यवाद को कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद के बीच केंद्रित करते हुए तमाम तरह के रहस्यों का जिक्र किया तथा रवींद्रनाथ को कबीर और छायावाद की कड़ी कहा।उन्होंने रवींद्रनाथ के हंड्रेड पोयम्स ऑफ कबीर के अनुवाद की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण चर्चा की। कार्यक्रम का सफल संचालन और धन्यवाद ज्ञापन देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. मनीषा साव ने कहा कि कबीर, रवीन्द्रनाथ और छायावाद का मूल स्वर मनुष्यता का है।

दुर्गोत्सव 2021 : यंग ब्वॉयज क्लब के पूजा पंडाल का उद्घाटन

कोलकाता : कोलकाता के यंग ब्वॉयज क्लब की दुर्गा पूजा में दुर्गति नाशिनि मां दुर्गा कोरोना विनाशिनी के रूप में कोरोना राक्षस का संहार करते दिखेंगी। इस पूजा पंडाल का पंचमी यानी रविवार को उद्धाटन किया गया। पंडाल का उद्घाटन सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने किया। इस मौके पर, सुशील कुमार सिंह, मीना देवी पुरोहित, स्मिता बख्शी, संजय बख्शी, शगुफ्ता परवीन, रेहाना खातून, राकेश सिंह, मुख्य आयोजक; विक्रांत सिंह, युवा अध्यक्ष; विनोद सिंह, सक्रिय सदस्य; ओपी मॉल, अध्यक्ष; बी सी पुगुलिया, अध्यक्ष; राम चंद्र बडोपलिया, महासचिव और कई अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तित्व। कोलकाता के यंग ब्वॉयज क्लब ने अपने 52वें वर्ष पर ‘कोरोना विनाशनी मां’ को थीम बनाया है, जो कोरोना दानव का संहार करेंगी। प्रतिमा मेदिनीपुर के कलाकार देव शंकर महेश ने बनायी मंडप की ऊंचाई 40 फीट है। इसके साथ ही उनके पूजा समिति की ओर से डॉक्टर, पुलिस, चिकित्सा कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, परिवहन चालक और कंडक्टर को उनके काम के लिए उन्हें सलाम करते हैं।