Saturday, April 11, 2026
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पूर्व रेलवे ने हावड़ा स्टेशन पर लगाया डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड

कोलकाता : पूर्व रेलवे ने हावड़ा स्टेशन पर डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड लगाया है। रेल यात्रियों को उनके आरक्षित टिकट की स्थिति के बारे में स्पष्ट जानकारी देने के लिए नई सुविधा शुरू की गई है। पूर्व रेलवे के एक वरिष्ठ कर्मचारी के हाथों इसकी शुरुआत कराई गई। यह सुविधा उन लोगों के लिए मददगार साबित होगी, जिनका टिकट कंफर्म नहीं है और वे रेलवे स्टेशन पर उसे चेक करना चाहते हैं।
डिजिटल यात्री आरक्षण चार्ट बोर्ड के तहत आठ 50 इंच वाले एलईडी टीवी का सेट हैं। इनमें से चार स्क्रीन पर विज्ञापन प्रदर्शित होंगे और चार अन्य पर ट्रेन टिकट की आरक्षण की स्थिति दिखेगी। डिजिटल आरक्षण चार्ट बोर्ड का रखरखाव एक एजेंसी द्वारा किया जाएगा।
पूर्व रेलवे के सीपीआरओ कमल देव दास ने बताया कि इससे लाइसेंस शुल्क के रूप में प्रति वर्ष 50 लाख रुपये का गैर-किराया राजस्व प्राप्त होगा। डिजिटल आरक्षण चार्ट बोर्ड को धीरे-धीरे अन्य प्लेटफार्मों में भी लगाया जाएगा। यात्री अब स्पष्ट रूप से जानकारी प्राप्त कर सकेंगे क्योंकि कई बार आरक्षण चार्ट पर मुद्रित विवरण समय के साथ धुंधले हो जाते हैं।
पूर्व रेलवे के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यात्री चार्ट प्रदर्शित करने के लिए डिजिटल चार्टिंग पर्यावरण के अनुकूल तरीका है। यह कागज की खपत को भी कम करेगा और रेलवे को पर्यावरण के अनुकूल संगठन के रूप में पेश करेगा। यह यात्रियों को मैन्युअल रूप से तैयार किए गए पेपर चार्ट की प्रतीक्षा करने के बजाय डिजिटल रूप से जानकारी प्राप्त करने में मदद करेगा, जो ट्रेन के निर्धारित प्रस्थान से ठीक पहले ट्रेनों में चिपकाए जाते हैं।

 

एक साल बाद बंगाल में खुले सिनेमाघर, उमड़े दर्शक

बांग्ला फिल्मों ने किया शानदार कारोबार

कोलकाता : बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान रिलीज हुई कई बांग्ला फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया। उद्योग से जुड़े के सूत्रों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि देव अभिनीत ‘गोलोंदाज’ अब तक हाउसफुल चल रही थी, जीत अभिनीत ‘बाजी’, कोयल मलिक और परमब्रत चटर्जी की मुख्य भूमिका वाली ‘बोनी’, अंकुश की ‘एफआइआर’ और शाश्वत चटर्जी की ‘शोरोरिपु टू जोतुगृहो’ ने भी 10 से 20 अक्टूबर की अवधि के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया। ‘गोलोंदाज’ के निर्माताओं की एक प्रवक्ता ने शुक्रवार को बताया, ‘सिनेमाघरों में 50 प्रतिशत दर्शकों के साथ ‘गोलोंदाज’ गुरुवार लक्ष्मी पूजा और उसके अगले दिन तक बाक्स ऑफिस पर लगभग तीन करोड़ रुपये की कमाई करने वाली पूर्वी भारत की पहली फिल्म बन गई।’
उन्होंने दावा किया कि कोलकाता के अधिकांश सिनेमाघरों में पहले 4-5 दिनों तक लगातार एक के बाद एक हाउसफुल शो दिखे। वितरक एसएसआर सिनेमाज के सतदीप साहा और शहर में स्थानीय अजंता मल्टीप्लेक्स के मालिक ने कहा, ‘गोलोंदाज, बाजी, बोनी, सभी ने सिनेमाघरों में बहुत अच्छा कारोबार किया। एक के बाद एक हाउसफुल शो के कारण बाजी सिने प्रेमियों के बीच भी हिट रही।’

अभिनेता देव ने ‘कहा, ‘‘मुझे खुशी है कि लोग सिनेमा देखने के लिए सिनेमाघरों में वापस आए। पिछले दो वर्षों से इस महामारी की स्थिति में लोगों को सिनेमा हॉल में वापस लाना बहुत मुश्किल था और हम एक टीम के रूप में दर्शकों को एक के बाद एक हाउसफुल शो, तालियों की गड़गड़ाहट और सीटी के साथ सिनेमाघरों में वापस लाने के लिए बहुत खुश हैं।’

 

आदर्श और त्याग की आड़ में अपने अधिकारों की आहुति मत दीजिए

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज थोड़ी सी बात स्त्री के अधिकारों और उसके प्रति होने वाले शोषण पर करने का बहुत मन हो रहा है। कारण कोई विशेष तो नहीं। दरअसल स्त्री के अधिकारों को लेकर जितना हल्ला मचता है, उतना काम नहीं होता। जी हाँ हल्ला, इस शब्द का प्रयोग मैं जानबूझकर कर रही हूँ क्योंकि हल्ला मचाने से यह भ्रम जरूर तैयार होता है कि काम हो रहा है लेकिन उस हल्ले में जरूरी मुद्दे सायास दब या दबा दिया जाते हैं। आजकल इस हल्ले के हम इस कदर आदी होते जा रहे हैं कि असली सवालों से हमारा ध्यान हट सा गया है। कहने को स्त्री विमर्श तो है ही, साहित्य का एक विमर्श, जिसके तहत विद्यार्थियों को एक पेपर पढ़ाया ही जा रहा है तो स्त्रियों को उसी में खुश हो जाना चाहिए कि साहित्य के इतिहास में एक अध्याय तो उनके नाम हुआ। भले ही जमीनी तौर पर आम स्त्री ने इस विमर्श का नाम ही ना सुना हो। उसके लिए पति देवता और ससुराल स्वर्ग समान है और उसी के सपनों में वह दिन- रात खोई रहती है या फिर ऐसा करने को बाध्य होती है। अब ससुराल अगर सच का स्वर्ग अथवा स्वर्ग जैसा भी हुआ तो गनीमत है न हुआ तो चुनौती उसके सामने रख दी जाती है कि “बड़े घर की बेटी” तो वही होती है जो खंडहर को भी अपने त्याग और समर्पण से स्वर्ग में तब्दील कर दे और निष्ठुर से निष्ठुर व्यक्ति के मन में प्रेम का दीप जला दें। और इस चुनौती को स्वीकारने के सिवाय और कोई रास्ता उसके पास होता ही नहीं। लेकिन उस तथाकथित स्वर्ग में कभी- कभार उसे ऐसी नारकीय यंत्रणाओं से गुजरना पड़ता है कि उसके बयान के लिए शब्दों को दर्द की स्याही में डुबाने की जरूरत पड़ती है। 

यह बात तो हुई ससुराल रूपी स्वर्ग की। अब थोड़ी सी बात उस घर की भी कर लें जहाँ की मिट्टी में खेल‌ -कूदकर वह बड़ी होती है। वहाँ क्या उसके लिए फूलों की चादर बिछी होती है या उन फूलों में कांटे भी छिपे होते हैं ? चलिए फूलों और कांटों को तितलियों और भंवरों के लिए छोड़ देते हैं और बात करते हैं लड़कियों की जिन्हें बचपन से ही यह मंत्र घुट्टी में पिलाया जाता है कि यह घर तो उनके लिए पराया है और उन्हें किसी और बगिया को अपने परिश्रम से महकाना है। और इसी पराए या किसी और स्थान में बसने के साथ ही जुड़ा होता है एक पारंपरिक और तथाकथित पवित्रता मंडित शब्द “विवाह” जो लड़कियों के लिए लगभग अनिवार्य स्थिति होती है। अर्थात लड़की के जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, विवाह। और विवाह के उपरान्त जिस घर में वह जाएगी वह होगा उसका स्वर्ग या ??? इस बहस को अगर छोड़ भी दें तो भी यह प्रश्न तो अधर में टंगा ही रहेगा कि  क्या लड़की को विवाह करना ही होगा ? हाँ सो तो करना होगा अन्यथा इधर- उधर डोलती फिरेगी और खानदान का नाम डुबाएगी। और यही सब कह- कह कर, लड़कियों को विवाह की वेदी पर होम किया जाता है। लेकिन अगर लड़की विवाह न करना चाहे तो क्या समाज इसे सहजता से स्वीकार करेगा ? शायद क्या बिल्कुल नहीं।  दरअसल परायेपन और पराया धन बनाने का षडयंत्र इसलिए रचा गया था ताकि लड़की को संपत्ति के अधिकार से वंचित किया जा सके। चूंकि वंश परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अलिखित संविधान के तहत लड़कों की होती है इसीलिए संपत्ति का उत्तराधिकारी भी वही होता है। हालांकि भारत में समान नागरिक संहिता की मांग 1930 में ही उठाई गई थी। उसके बाद 19848 में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल का जो प्रारूप तैयार किया था, उसमें स्त्रियों के लिए विरासत के अधिकार का मुद्दा भी शामिल था लेकिन कट्टरपंथियों के भय से सरकार ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। लंबी लड़ाई के बाद उत्तराधिकार कानून 2005 में हुए संशोधन के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्रियों को भी पुत्रों के समान हक मिला। 5 सितंबर 2005 को संसद ने अविभाजित हिंदू परिवार के उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में संशोधन किया जो  9 सितंबर 2005 से देश भर में लागू हुआ। लेकिन हम जानते हैं कि कानून बनने से भारत जैसे देश में कुछ भी नहीं बदलता। बदलाव तो तब आएगा जब हमारी सोच बदलेगी। अक्सर शादीशुदा लड़कियों से कह दिया जाता है कि उनकी शादी में जो खर्च किया गया वही उनका प्राप्य है गोया लड़कों की शादी तो बिना किसी खर्च के हो जाती है। और संबंधों को टूटने से बचाए‌ रखने के लिए प्राय: विवाहित लड़कियाँ सारी संपत्ति भाई के लिए त्याग कर‌ खुश होने का भ्रम पाल लेती हैं। इस प्रसंग को सुधा अरोड़ा ने अपनी  कविता “राखी बांधकर लौटती हुई बहन” में बड़ी मार्मिकता से पिरोया है। उनकी पंक्तियाँ त्याग और संतोष के पीछे छिपे असंतोष को बड़ी कुशलता से उभारती हैं। देखिए-

“कितना अच्छा है राखी का त्यौहार !

बिछड़े भाई -बहनों को मिला देता है

कोठी के एक हिस्से पर हक जताकर

क्या वह सुख मिलता

जो मिला है भाई की कलाई पर राखी बांधकर !

मायके का दरवाजा खुला रहने

का मतलब क्या होता है

 यह बात सिर्फ वह बहन जानती है 

जो उम्र के इस पड़ाव पर भी इतनी भोली है 

कि चुका कर इसकी बहुत बड़ी कीमत 

अपने को बड़ा मानती है।” 

 अब रही बात अविवाहित लड़की को‌ तो उसे हमेशा तानों से छीला जाता है कि वह परिवार वालों की छाती पर मूंग दलने के लिए बैठी है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर बहुत सी खुदमुख्तार लड़कियाँ संपत्ति का मोह त्याग अपना अलग रास्ता चुन लेती हैं। मजबूत पंखों के सहारे उड़ जाती हैं, आकाश की ऊंचाइयों तक और अगर न उड़ पाईं तो भाइयों और भाभियों की चाकरी बजाती हैं। लेकिन यह तो कोई विकल्प नहीं है क्योंकि इससे संपत्ति में अधिकार का सवाल हल नहीं होता। इसके बावजूद हमारे यहाँ इन सवालों को इसी तरह हल करने की मानसिकता दिखाई देती है। भरण- पोषण के वायदे के नाम पर उम्र भर की गुलामी करने को, अविवाहित या विधवा औरतों को बाध्य होना पड़ता है। इसके बावजूद अगर कोई लड़की अधिकारों के नाम पर पैतृक घर और संपत्ति में हिस्सा मांगती है तो‌ पहले तो उसे तानों से छेदा जाता है कि वह भाई- भाभी और उनके बच्चों के हिस्से और सुख- समृद्धि पर कुंडली मारकर बैठी है और इतने पर भी अगर वह अपनी मांग से पीछे नहीं हटती तो कदम- कदम पर‌ उसके लिए मुश्किलें खड़ी की जाती हैं। परिस्थितियों को इतना दुसह्य बना दिया जाता है कि उसका जीना मुश्किल हो‌ जाता है। कहा जा सकता है कि लड़की कानूनी सहायता ले सकती है लेकिन व्यवहारिक स्तर पर उतरकर देखें तो वह भी बहुत आसान नहीं होता । पहले तो अपने ही पिता -भाइयों के खिलाफ खड़ी होने वाली लड़की की बेतरह लानत- मलामत की जाती है और अगर इसके बावजूद वह अपने इरादों पर दृढ़ रही तो बैलगाड़ी की रफ्तार से चलने वाली भारतीय न्याय व्यवस्था उसकी हिम्मत तोड़ देती है। और उसी बीच पारिवारिक, सामाजिक और भावनात्मक दबाव अपना काम करते रहते हैं। ऐसी स्थिति में डटे रहने के लिए बड़ी हिम्मत की जरूरत होती है। जो डटी रहती हैं, वे इतिहास लिखती हैं और औरों के लिए मिसाल बनती हैं। लेकिन ऐसी लड़कियाँ अंगुलियों पर‌ गिनी जाने लायक ही हैं क्योंकि लड़कियों को‌ तो बचपन से ही अधिकारों से वंचित रखा जाता है,‌ ऐसे में वे अपने हक की बात करें भी तो कैसे करें। अक्सर हम कहते हैं कि लड़कियों को विवाहोपरांत शोषण का शिकार होना पड़ता है लेकिन शोषण का चक्र तो उनके जन्म के साथ आरंभ हो जाता है। लिंगभेद की राजनीति की यंत्रणाओं को झेलने की शुरुआत उनके अपने घर या मायके में ही हो जाती है ताकि वह दीर्घकालिक शोषण को बर्दाश्त करने के लिए, हर हाल में खुश रहने या एडजस्ट करने के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो सकें। हत्या का सिलसिला भी ऐसे ही शुरू होता है- भ्रूण हत्या, सम्मान हत्या से लेकर दहेज हत्या तक के सुनियोजित षड्यंत्र का सिलसिला परंपरा के महिमा मंडन के नाम पर सुचारू रूप से चलता है। हमें इन षड्यंत्रों को पहचान कर उससे बचने और उसका तोड़ खोजने की जरूरत है अन्यथा सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के प्रचार के विज्ञापनों पर धन लुटाकर महिला उत्थान का छद्म रचती रहेगी और लड़कियाँ परंपरागत आदर्शों की रक्षा के नाम पर अपनी अस्मिता की हत्या की गवाह बनती रहेंगी। वर्तमान समय में उम्मीद की किरण इस रूप में नजर आती है कि इस स्थिति को लड़कियाँ – स्त्रियाँ अपने जीवट से बदलने की मुहिम में लग चुकी हैं। आज की स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, वह लड़ रही है, सवाल पूछ रही है, देर तक टिके रहने के भरोसे और जीत की उम्मीद के साथ वह अपने अधिकारों के लिए लड़ने की शुरुआत कर चुकी है। कात्यायनी इस जागरूक स्त्री की छवि को अपनी कविता में बेबाकी से उकेरती हैं-

“यह स्त्री

सब कुछ जानती है

पिंजरे के बारे में

जाल के बारे में

यंत्रणागृहों के बारे में।

 

उससे पूछो

पिंजरे के बारे में पूछो

वह बताती है

नीले अनन्त विस्तार में

उड़ने के

रोमांच के बारे में।

 

जाल के बारे में पूछने पर

गहरे समुद्र में

खो जाने के

सपने के बारे में

बातें करने लगती है।

 

यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही

गाने लगती है

प्यार के बारे में एक गीत।

रहस्यमय हैं इस स्त्री की उलटबासियाँ

इन्हें समझो,

इस स्त्री से डरो।”

 इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि कानूनी अधिनियमों के संशोधन किताबों के पन्नों से निकलकर व्यवहारिक जिंदगी का हिस्सा बने और कानून के रखवाले इस दिशा में क्रियाशील हों तो यह लड़ाई थोड़ी आसान जरूर हो जाएगी। 

कोटाक महिन्द्रा ने नदिया के अस्पताल में दिए 2 एम्बुलेंस

कोलकाता : कोटाक महिन्द्रा बैंक ने नदिया में 2 एम्बुलेंस उपलब्ध करवाये हैं। बैंक की सीएसआर गतिविधि के तहत सानंद और मुम्बई के बाद नदिया में यह पहल की गयी। कोटाक महिन्द्रा बैंक के वरिष्ठ सदस्य बी. एस. शिवकुमार ने एम्बुलेंस इंटरनेशमल सोसायटी ऑफ कृष्णा कॉन्शशियस को यह एम्बुलेंस सौंपी। उन्होंने कहा कि एम्बुलेंस सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त हैं। कोटाक महिन्द्रा ने ये 2 एम्बुलेंस श्री मायापुर कम्यूनिटी हॉस्पिटल को प्रदान किये हैं।

 

लेखन और लेखकों से जुड़ीं सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की छात्राएँ

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में हाल ही में मेमोरियल डे मशहूर लेखक रस्किन बांड के साथ मनाया गया। इस कार्यक्रम में लेखक से सुजय प्रसाद चटर्जी ने बात की। यह कार्यक्रम एक लिटरेरी फेस्ट यानी साहित्य उत्सव का हिस्सा था। इस साहित्य उत्सव में रीडिंग सेशन य़ानी पाठ्य रचना पाठ सत्र और रचनात्मक लेखन जैसे सत्र हुए। इन कार्यक्रमों में सम्पूर्णा चटर्जी, तिलोत्तमा गोस्वामी, हिमांजलि शंकर, प्रो. सैकत मजुमदार और डॉक्टर साधना झा ने भाग लिया। थिंक आर्ट द्वारा विद्यार्थिय़ों के लिए रचनात्मक लेखन की कार्यशाला भी आयोजित की गयी। प्राथमिक स्तर की छात्राओं स्वाति खेरिया और सोनम मंत्री के साथ कहानी सुनाने का सत्र हुआ। चौथी से बारहवीं कक्षा की छात्राओं द्वारा लिखी गयी यूटोपिया इन डिस्टोपिया नामक पुस्तक का लोकार्पण हुआ। पुस्तक में चित्र भी छात्राओं द्वारा ही बनाये गये हैं। पुस्तक का ई संस्करण स्कूल की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। विद्यार्थियों ने रीडिंग सेशन में अगाथा क्रिस्टी, एच. जी. वेल्स और रोनॉल्ड दहल जैसे लेखकों की कृतियों के अंश पढ़े गये। इन सभी लेखकों की जयन्ती सितम्बर में पड़ती है। इन लेखकों के जीवन पर आधारित स्लाइड्स भी दिखायी गयीय़

जानिए लक्ष्मी और महालक्ष्मी का अन्तर

हिन्दू धर्म में त्रिदेवियों में से एक है माता लक्ष्मी। दीपावली के दिन इनकी विशेष पूजा होती है साथ ही विशेष अवसरों पर महालक्ष्मी की घर में स्थापना करके उनकी पूजा की जाती है। खासकर महाराष्ट्र में महालक्ष्‍मी की पूजा का प्रचलन है। हम अक्सर 2 नाम सुनते हैं लक्ष्मी और महालक्ष्मी। आखिर क्या यह दोनों एक ही हैं या दोनों में कोई अंतर या फर्क है?  जानते हैं प्रचलित मान्यता-

1. भृगु पुत्री लक्ष्मी: पुराणों में एक लक्ष्मी वह है जो समुद्र मंथन से जन्मीं थीं और दूसरी वह है जो भृगु की पुत्रीं थी। भृगु की पुत्री को श्रीदेवी भी कहते थे। उनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ था।
2. दो लक्ष्मी : लक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति को दो रूपों में देखा जाता है- 1. श्रीरूप और 2. लक्ष्मी रूप। श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में वे भगवान विष्णु के साथ हैं। महाभारत में लक्ष्मी के ‘विष्णुपत्नी लक्ष्मी’ एवं ‘राज्यलक्ष्मी’ दो प्रकार बताए गए हैं।
3. भूदेवी और श्रीदेवी : एक अन्य मान्यता के अनुसार लक्ष्मी के दो रूप हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा से जुड़ी हैं, दूसरी महिमा और शक्ति से। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं जबकि श्रीदेवी चंचल हैं। विष्णु को हमेशा उन्हें खुश रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है।
5. समुद्र मंथन की महालक्ष्मी : समुद्र मंथन की लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। उनके हाथ में स्वर्ण से भरा कलश है। इस कलश द्वारा लक्ष्मीजी धन की वर्षा करती रहती हैं। उनके वाहन को सफेद हाथी माना गया है। दरअसल, महालक्ष्मी के 4 हाथ बताए गए हैं। वे 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और मां महालक्ष्मी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है।
6. विष्णुप्रिया लक्ष्मी : ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है। राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब वे राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी।

7. धन की देवी : देवी लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। देवी लक्ष्मी कमल वन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं।
8. इसके अलावा 8 अवतार बताए गए हैं:- महालक्ष्मी, जो वैकुंठ में निवास करती हैं। स्वर्गलक्ष्मी, जो स्वर्ग में निवास करती हैं। राधाजी, जो गोलोक में निवास करती हैं। दक्षिणा, जो यज्ञ में निवास करती हैं। गृहलक्ष्मी, जो गृह में निवास करती हैं। शोभा, जो हर वस्तु में निवास करती हैं। सुरभि (रुक्मणी), जो गोलोक में निवास करती हैं और राजलक्ष्मी (सीता) जी, जो पाताल और भूलोक में निवास करती हैं।
9. अष्टलक्ष्मी : आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी या जायालक्ष्मी और विद्यालक्ष्मी। ये सभी माता लक्ष्मी के विभिन्न रूप हैं।
10. लक्ष्मी और महालक्ष्मी में अंतर : शाक्त परंपरा में तीन रहस्यों का वर्णन है- प्राधानिक, वैकृतिक और मुक्ति। इस प्रश्न का, इस रहस्य का वर्णन प्राधानिक रहस्य में है। इस रहस्य के अनुसार महालक्ष्मी के द्वारा विष्णु और सरस्वती की उत्पत्ति हुई अर्थात विष्णु और सरस्वती बहन और भाई हैं। इन सरस्वती का विवाह ब्रह्माजी से और ब्रह्माजी की जो पुत्री सरस्वती है, उनका विवाह विष्णु से हुआ है। इससे यह पता चलता है कि महालक्ष्मीजी, विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी से भिन्न हैं। महालक्ष्मी आदिदेवी हैं।
(साभार – वेबदुनिया)

शुभजिता स्वदेशी : टाटा की एयर इंडिया वापस टाटा के पास

एयर इंडिया अब टाटा की हो गयी। 68 साल बाद घर वापसी हुई। टाटा ने भी बाहें फैला कर स्वागत किया।  68 साल के लम्बे इंतजार के बाद बार एयर इंडिया की कमान टाटा ग्रुप के पास फिर से वापस आ गई है। इस मौके पर रतन टाटा काफी भावुक नजर आये। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘वेलकम बैक, एयर इंडिया’। इसके साथ ही उन्होंने एक बहुत ही पुरानी तस्वीर और मैसेज भी शेयर किया। सरकार ने अपनी पूरी 100 फीसदी हिस्सेदारी टाटा संस को बेच दी है। टाटा इस सौदे में कुल 18000 करोड़ रुपये खर्च करेगी। एक हिस्से से कर्ज चुकाएगी और दूसरा सरकार की हिस्सेदारी का भुगतान होगा। कुल मिलाकर एयर इंडिया अब टाटा ग्रुप की हो चुकी है। मालिक वही पुराना, लेकिन अंदाज अब नया होगा पर क्या आप जानते हैं कि एयर इंडिया की शुरुआत टाटा समूह ने ही की थी और उस वक्त इसका नाम टाटा एयरलाइंस हुआ करता था। य
एयर इंडिया के इतिहास की बात करें तो इसकी शुरुआत अप्रैल 1932 में हुई थी। एयर इंडिया की स्थापना उद्योगपति जेआरडी टाटा ने की थी। उस वक्त नाम टाटा एयरलाइंस हुआ करता था। जेआरडी टाटा ने महज 15 की उम्र में साल 1919 में पहली बार शौकिया तौर पर हवाई जहाज उड़ाया था लेकिन शौक जुनून बन गया और जेआरडी टाटा ने अपना पायलट का लाइसेंस ले लिया।


एयरलाइन की पहली व्यावसायिक उड़ान 15 अक्टूबर को भरी गई थी। तब सिर्फ सिंगल इंजन वाला ‘हैवीलैंड पस मोथ’ हवाई जहाज था, जो अहमदाबाद-कराची के रास्ते मुम्बई गया था। जानकर हैरानी होगी कि हवाई जहाज में उस वक्त एक भी यात्री नहीं था बल्कि 25 किलो चिट्ठ‍ियां थीं।
चिट्ठियों को लंदन से ‘इम्पीरियल एयरवेज’ से कराची लाया गया था। इम्पीरियल एयरवेज ब्रिटेन का राजसी विमान वाहक था। इसके बाद साल 1933 में टाटा एयरलाइन्स ने यात्रियों को लेकर पहली उड़ान भरी। टाटा ने दो लाख रुपये की लागत से कंपनी स्थापित की थी। इस एयरलाइन ने अपने पहले साल में 155 यात्रियों और 10.71 टन चिठ्ठियों को लेकर 2,60,000 किलोमीटर की उड़ान भरी। इस दौरान इसने 60,000 रुपये का मुनाफा कमाया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह एयरलाइन एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी में बदल गई और इसका नाम एयर इंडिया हो गया।

एयर इंडिया (उस वक्त टाटा एयरलाइंस) ने इसके बाद लगातार चिट्ठियां पहुँचाने का काम किया। पूरी तरह भारतीय एयरलाइन होने के नाते उस वक्त की अंग्रेजी हुकूमत ने एयरलाइंस को कोई आर्थिक मदद भी नहीं की। एयरलाइन से चिट्ठियां ले जाने के लिए टाटा को हर चिट्ठी पर सिर्फ चार आने मिलते थे। टाटा एयरलाइंस के लिए मुंबई के जुहू में ऑफिस बनाया गया. लेकिन, ये ऑफिस मिट्टी के मकान में था। प्लेन को उड़ाने के लिए ‘रनवे’ का इस्तेमाल पास के ही एक मैदान का होता था।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारत से सामान्य फ्लाइट्स शुरू की गईं और तब इसका नाम एयर इंडिया रखा गया। सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी बनाया गया। साल 1947 में आजादी के बाद एक नेशनल एयरलाइंस की जरूरत थी। भारत सरकार ने एयर इंडिया में 49% हिस्सेदारी अधिग्रहीत कर ली। इसके बाद 1953 में भारत सरकार ने एयर कॉरपोरेशन एक्ट पास किया और टाटा समूह से इस कंपनी में बहुलांश हिस्सेदारी खरीद ली। इस तरह एयर इंडिया पूरी तरह से एक सरकारी कंपनी बनी।
आजादी के बाद 1953 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जब इसका राष्ट्रीयकरण किया तो जेआरडी टाटा को खासा झटका लगा लेकिन नेहरू ने उन्हें आश्वस्त किया कि वो हमेशा एयरइंडिया के सर्वेसर्वा रहेंगे। इसके बाद 1978 तक टाटा लगातार इसके चेयरमैन बने रहे। जब जनता पार्टी के शासनकाल में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें पद से हटाया और जिस तरह हटाया, उससे जेआरडी बहुत आहत हुए। 33 सालों तक अवैतनिक चेयरमैन रहे।
शायद जेआरडी अपनी जगह सही थे. उन्होंने 1953 में एयर इंडिया का चेयरमैन बनने के लेकर हटाए जाने तक सरकार से अपने काम के बदले कोई वेतन नहीं लिया था। वह खुद अवैतनिक तौर पर ये जिम्मेदारी संभाल रहे थे। जेआरडी को इस तरह हटाए जाने का असर एयरलाइंस के कर्मचारियों के मनोबल पर भी पड़ा। देश में भी इसका विरोध हुआ. लंदन के “द टेलीग्राफ” अखबार ने खबर छापी, “अनपेड एयर इंडिया चीफ इन सेक्ड बाई देसाई”. प्रधानमंत्री देसाई की इस मामले पर काफी किरकिरी हुई।


1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में जब वापस लौटीं तो उन्होंने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस दोनों में प्रमुख के पद पर फिर जेआरडी की नियुक्ति कर दी. वो 1986 में वो तब तक काम करते रहे जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन बना दिया। 1982 में जब टाटा के विमान सेवा में उतरने के 50 साल पूरे हो रहे थे जब टाटा ने एक और गजब का काम किया। उन्होंने फिर पस मोट विमान को कराची से मुंबई तक उड़ाया. तब वो 78 साल के हो रहे थे.
भारत सरकार ने एयरलाइन का नाम बदलकर एयर इंडिया इंटरनेशनल कर दिया और इसकी घरेलू उड़ान सेवा को रिस्ट्रक्चरिंग के तहत इंडियन एयरलाइंस को ट्रांसफर कर दिया गया। अगले 40 सालों तक एयर इंडिया की गिनती केंद्र सरकार के रत्नों में होती रही और डोमेस्टिक एयरलाइन के मार्केट शेयर का अधिकतर हिस्सा इसके पास बना रहा।
हालांकि 1994 में सरकार ने एयर कॉरपोरेशन एक्ट 1953 को निरस्त कर दिया और एविएशन सेक्टर में प्राइवेट कंपनियों को भी भाग लेने की इजाजत दे दी। 1994-95 के अंत तक 6 प्राइवेट एयरलाइन ने इस सेक्टर में एंट्री की। इनमें जेट एयरवेज, एयर सहारा, मोदीलुफ्त, दमानिया एयरवेज, एनईपीसी एयरलाइन और ईस्ट-वेस्ट एयरलाइंस शामिल हैं।
एयर इंडिया का लोगो लाल रंग का उड़ता हुआ हंस है। इसमें नारंगी रंग का कोणार्क चक्र है। प्लेन के पिछले हिस्से पर लोगो को जगह दी जाती है. कंपनी का शुभंकर ‘महाराजा’ पहली बार 1946 में दिखा था। यह एयरलाइन की खास पहचान रहा है।
एयर इंडिया ने इस दौरान प्रीमियम सेवाएं देना जारी और देश के इंटरनेशन ट्रैफिक के अधिकांश हिस्से पर उसका कंट्रोल बना रहा है। हालांकि घरेलू मार्केट में उसने जेट एयरवेज और सहारा एयरलाइंस के हाथों मार्केट शेयर खोना शुरू कर दिया। यह दोनों एयरलाइंस लक्जरी सेवाएं नहीं मुहैया करा रही थीं, लेकिन वे किफायती रेट पर घरेलू उड़ान ऑफर कर रही थीं, जो लोगों को आकर्षित कर रहा था।


2000-01 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने फंड जुटाने की कोशिशों के तहत एयर इंडिया में अल्पांश हिस्सेदारी (40 प्रतिशत) बेचने की कोशिश की। 2000-01 में सरकार ने 27 सरकारी कंपनियों को निजीकरण के लिए आगे किया था, लेकिन इनमें से कोई भी कंपनी उस साल बिक नहीं पाई थी।
जून 2017 में सरकार ने एयरइंडिया के निजीकरण को मंजूरी दी और मार्च 2018 में इसने एयर इंडिया की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) मंगाएं। इसमें एयर इंडिया के साथ एयर इंडिया एक्सप्रेस की हिस्सेदारी सहित एयर इंडिया SATS एयरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी भी शामिल थी। एयर इंडिया एसएटीएस एयरपोर्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, एयर इंडिया और सिंगापुर एयरपोर्ट टर्मिनल सर्विसेज का ज्वाइंट वेंचर है।
एयर इंडिया की निजीकरण की दूसरी कोशिश के तहत, सरकार ने एयरलाइन के नए मालिक को इसका 33,392 करोड़ का कर्ज लेने और मई के मध्य तक बोली जमा करने का निर्देश दिया। सरकार की मंशा 2018 के अंत तक एयरइंडिया का निजीकरण पूरा करने की थी। हालांकि किसी भी प्राइवेट कंपनी ने घाटे में चल रही इस सरकारी एयरलाइन को खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाई।
टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। वहीं, विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक साझा उपक्रम है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है।

(स्त्रोत साभार – जी बिजनेस, हिन्दी मनीकंट्रोल, न्यूज 18)

नहीं रहीं हिमोजी’, ‘अलबेली’, ‘चित्रगीत’ की सर्जक अपराजिता शर्मा

नयी दिल्ली : मिरांडा हाउस कालेज में हिंदी की एसोसिएट प्रोफेसर अपराजिता शर्मा का हृदयाघात से निधन हो गया। अपराजिता अपने विद्यार्थियों के बीच तो लोकप्रिय रहीं और हिन्दी में भावाभिव्यक्ति वाले स्टीकर देकर उन्होंने भाषा की प्रगति में बड़ा योगदान दिया। उनका बनाया हिमोजी एप बहुत चर्चित हुआ था। कुछ साल पहले हिमोजी एप लांच हुआ था। दरअसल, इमोजी तो सिर्फ भावनाओं का संचार करता है लेकिन हिमोजी में एक चरित्र के साथ कुछ शब्दों के जरिए भावनाओं को व्यक्त किया जाता है। अपराजिता ने 270 से अधिक हिमोजी बनाए। जो गुस्सा, नाराजगी, प्यार, दोस्ती आदि पर आधारित हैं। अपराजिता एक कलाकार थीं और कला के जरिए महिलाओं की व्यथा को समाज के सामने रखती थी। इंटरनेट मीडिया खासकर फेसबुक पर अपराजिता द्वारा ईजाद वर्चुअल कैरेक्टर अलबेली खासी लोकप्रिय है। कारण, अलबेली महिलाओं के हक की आवाज बुलंद करती है।

समीक्षा : आत्मकथात्मक शैली में प्रेम की संवेदनशील गाथा है ‘अंत में बारिश’

डॉ. वसुंधरा मिश्र

‘अंत में बारिश’ उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में प्रेम और विवाह के बीच होने वाली विभिन्न घटनाओं और सूत्रों को जोड़ने वाली बहुत ही संवेदनशील कथा है। एक ऐसे प्रेमी नायक की कहानी जिसकी उम्र उनतीस वर्ष की और प्रेमिका नायिका की उम्र मात्र पंद्रह वर्ष की है यानि विवाह के लिए नाबालिग है। उम्र, जाति, नैतिक, अनैतिक वैचारिक द्वंद्वों के जद्दोजहद को पार कर विवाह और फिर अंत तक का सफ़र इस उपन्यास को नया और सकारात्मक आयाम देता है। सभी घटनाएँ पत्र शैली और डायरी शैली में उजागर होती हैं। घटनाक्रम फ्लैशबैक में क्रमशः आइने की तरह साफ होता जाता है। साठ के दशक में प्रेम होना और उसकी अभिव्यक्ति करना लड़के और लड़कियों दोनों के लिए तनावपूर्ण स्थितियाँ बयां करने वाली रही हैं। प्रेम की परिभाषा पीड़ा से होकर अपना आकार लेती है। कभी प्रेमी सफल तो कभी असफल। वैसे तो इस उपन्यास में प्रेमी अपने दृढ़ प्रेम और प्रेमिका अपनी समझदारी के कारण परिणाम अर्थात विवाह तक पहुंँचते हैं।
‘अंत में बारिश’ शीर्षक अपने आप में व्यक्त करने में सक्षम है। उपन्यास की लेखिका ने यह बात ‘ प्रतिशब्द’ में स्वीकार करते हुए लिखा है कि उपन्यास के आरंभ में वर्षा की गति सुहावनी और तरल’ रिमझिम होती है और अंत में घनघोर वर्षा होती है। इस बीच कई ऋतुएँ आती-जाती रहती हैं। अंतिम बारिश में नायक की पलकें भींगती चली जाती हैं।और कथा समाप्त होती है।’ (प्रतिशब्द)
जीवन यात्रा में आई बारिश की निरंतरता इसी बात का संकेत है कि विभिन्न ऋतुओं की तरह हमारा जीवन भी कई उतार चढ़ाव से गुजरता है और हम सुख- दुख, मान – अपमान, लाभ- हानि आदि के तराजू में तुलते हुए जीवन को जीते चले जाते हैं। यही जीवन दर्शन है। प्रेम की परिणति और फिर गृहस्थ जीवन तक के विभिन्न रंगों के चित्रों को दर्शाता है ये उपन्यास। प्रमुखता से नायक-नायिका ही इस कथा के केन्द्रीय पात्र हैं।
पत्र लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है। वर्तमान समय में अब वाट्सप, फेसबुक और सोशल मीडिया आदि के कारण पत्र लेखन की वैसी परंपरा समाप्तप्राय है।
लेखिका का यह पहला उपन्यास है। लेखिका चाहती है कि पत्रों के लेखन में व्यक्ति के मन की बात अधिक संवेदनशील होती है। और प्रेम पत्र तो हृदय में ही समाहित होनेवाले होते हैं। प्रेम से लिखे एक एक शब्द मानो उसके अपनेपन का अहसास कराते हैं। पत्र शैली को इस उपन्यास में आधार बनाकर कथा को क्रमशः बढ़ाया गया है।
डॉ. मुक्ता ने उपन्यास की भूमिका ‘प्रेम के ताने-बाने में बुना मनोरम उपन्यास’ में प्रेम को संबोधित करते हुए लिखा है – ‘प्रेम के बीच रिश्तों के जुड़ने में टकराव और संघर्ष की स्थितियाँ बनती हैं। मूल में प्रेम है। मैं अपना कथन प्रेम के संदर्भ से ही शुरु कर रही हूँ। प्रेम का कोई वायवीय धरातल है या वह शक्ति जो बरबस ही हमें यात्रा में सहभागी बना देता है। प्रेम बाह्य संबंधों को लेकर नहीं वरन् उसकी अंतरंगता को लेकर निश्चित किया जाता है। ‘
मेरे विचार से उपन्यास’ अंत में बारिश’ में प्रेम की एक नई परिभाषा गढ़ी गई है। आज जहाँ विवाह टूटने के कगार पर है, प्रेमी प्रेमिकाएंँ वाट्सप की डीपी देखकर और सोशल मीडिया पर प्रेम का इजहार कर रहे हैं और वहीं ब्रेकअप जैसी घटनाएँ भी लगातार घटित होती जा रही हैं। ऐसे में प्रेम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। लेखिका ने प्रेम के विशुद्ध रूप को कहीं भी अमर्यादित नहीं होने दिया है। वरन् वह नायिका और नायक की नैतिक जिम्मेदारी को बड़े ही अंतरंगता के साथ प्रेम को स्थापित करती है जहाँ ईमानदारी और विश्वास का दृढ़ संकल्प है।
आसमान में घने काले बादल एक छोर से दूसरे छोर तक ऐसे छाये थे मानों वे अभी अवनि तल पर उतर आयेगें। ऐसी जोरदार घनी बरसात के मौसम में प्रोफेसर संजय के मन मस्तिष्क में फ्लेश बैक की घटनाओं के साथ जया का पहली बार बारिश में रिक्शे पर आना जिसमें प्लास्टिक का पर्दा लगा होता है। संजय को याद आता है कि वह भीगते हुए उससे मिलने आई थी। संजय एमबीबीएस के प्रोफेसर है और अपने अड़ोस पड़ोस में प्रसिद्ध होने के कारण जया से मिलने नहीं जा सकता था।
जया एक मासूम, नाजुक, दुबली – पतली, छरहरे बदन की, घुँघराले बालों वाली साँवलें रंग की अत्यंत खूबसूरत लड़की थी। संजय स्वयं स्वीकार करता है कि जया से पहला परिचय पटना में लगभग आठ महीने पूर्व होता है। दो मकानों में से एक मकान में संजय किरायेदार थे। वहीं मकान-मालिक यमुना प्रसाद जी की लड़की प्रभा अंकल संजय से अपनी सहेली जया का परिचय कराती है। जया के पिता बिजली विभाग में अस्सिटेंट इंजिनियर के पद पर कार्यरत थे। प्रभा के पिता उसी विभाग में चीफ इंजीनियर थे। दोनों परिवारों के बीच एक पड़ोसी का रिश्ता था। संजय की बड़ी बहन विमला दीदी जो उम्र में काफी बड़ी थी, दोनों परिवारों और दोनों सहेलियों के बीच सेतु का काम करती थीं।
जया और संजय के बीच उम्र का काफी फ़ासला होने पर भी संजय जया के प्रेम में धीरे – धीरे डूबता चला जाता है जबकि जया इस बात से बेखबर थी। लेकिन जब उसे संजय की गहरी अनुरक्ति का पता चलता है जहांँ जीवन और मृत्यु के बीच की दिवार भी ढहाई जा सकती है ऐसे में जया भी कालांतर में उसकी ओर आकर्षित हो जाती है। जया का प्रेम अद्भुत, सात्विक, दुराग्रहपूर्ण मानसिक और अंतर्मुखी था।
प्रथम 28 दिसम्बर 1957 जब संजय ने अपने मित्र राजीव को अपने एकतरफा प्रेम के बारे में बताया था । नायक अपने नितांत व्यक्तिगत संघर्षों को झेलते हुए विगत पांँच छह महीनों में जया के काफी करीब आ जाता है और बाकी एक वर्ष का समय पंख पर सवार हो ऐसे बीतता जैसे आंँधी से वृक्ष के पत्ते उड़ जाते हैं। (पृ.6)
डायरी में लिखे शब्दों से नायक की व्यथा, भावावेग और प्रेम के उत्कर्ष का पता चलता है। उपन्यास में डायरी में लिखी तारीख़ और सन् को इंगित किया गया है। जैसे
1 जनवरी सन् 1959 का नववर्ष जब संजय 29 वर्ष का होता है। जया की रेशमी फ्राक और उसका गुलाबी गुलाब की पंखुरी की तरह मासूम और आकर्षक लगना उसकी उम्र को दर्शाता है। कभी नीले लंबे कोट और इंद्रधनुषी मफलर और अपेक्षाकृत अनसँवरे बालों में पहाड़ी लड़की सी लगती। जया भी उसकी तरफ अनायास ही आकर्षित होती चली गई। जया के पिता से दोनों के विवाह की बात करना और संजय का आश्वासन देना कि मैं आपकी लड़की को खुश रक्खूंँगा। ये सब कहने की हिम्मत वह नहीं जुटा सका। (पृ. 8)
4 जनवरी की शाम का वर्णन संजय अपनी डायरी में करता है। जया उससे 100 गज की ही दूरी पर रहती है लेकिन रिक्शे से आती है क्योंकि उसके पिता को उस पर शक है और वह नहीं चाहती कि उसके चरित्र पर कोई आक्षेप लगाए। वह अपने प्यार को पाने के लिए कुछ भी कर सकती है लेकिन पिता उसके प्रेमी का अपमान करे, नहीं सह सकती। छिप कर आना, अपनी व्यथा को बांँटना, नाराज और फिर खुश होना, खीझना, डांँटना, कॉलेज न जाना, शरीर और मन के बीच लक्ष्मण रेखा खींचना, पीड़ित होना और पीड़ित करना आदि बहुत से सुंदर चित्र हैं जो जया के प्रेम को उदात्त रूप प्रदान करते हैं। प्रेम में बहुत अधिक निकटता से वह चौंक जाती है। वह आतंकित हो उठती है उसे लगता है शरीर के स्पर्श मात्र से कुछ हो जाता है उसके दिमाग में भरा हुआ है। (पृ. 15)
इसी तरह 20.12.1960 के पत्र में संजय प्रिय जया को लिखता है कि तुम्हारे यहाँ अफवाह है कि “मैं एक गरीब आदमी हूँ। मेरे पास कुल दस बीघे खेत हैं कौन कहता है जी? मैं गरीब अवश्य हूँ पर इतना भी नहीं।” वह अपनी हैसियत का प्रमाण देता है। वह अपने प्रेम को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता। संजय पहले भी बंद कमरे में न जाने कितनी ही बार रो चुका है। जया को भूलना बहुत ही मुश्किल है।
संजय को पटना के मेडिकल कॉलेज में अस्थाई नियुक्ति हुई थी अब भगवान की कृपा से दरभंगा के मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हो गया। दो वर्ष का प्रोबेशन के बाद वहीं परमानेंट हो जाएगा। और जया भी चाहती थी कि वह पीएचडी करे। और यहीं से पत्रों का सिलसिला शुरु होता है।
संजय का पत्र ‘दुविधा, भविष्य के लिए कुछ संकल्प,’ दिनांक 5.02.1960, दिनांक 12.3.1960,भविष्य की योजना दिनांक 22.4.60, कुछ अंतराल के बाद, वही ऐतिहासिक जगह पटना – दिनांक 4.5.1960,फिर जया का एक संक्षिप्त पत्र, कुछ नोक झोंक, जया का पत्र संजय के नाम जिसमें जया की प्रेम वेदना मुखर हो उठती है – – वह लिखती है
भ्रमित हूँ आज मैं, है चतुर्दिक जो अँधेरा
बाँध लो नाँव मेरे ठाँव, न डरो कि छीन ले कोई पतवार
उस पर सवार हो हम चले जहांँ हो स्वर्णिम उजाला।
ले चलो तुम ज्योति मग में, धन्य हो मेरा सवेरा। ‘पृ 67
आदि कई घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनमें संजय ने अपनी दादी बहन की बीमारी की बात लिखी है। संजय लिखता है कि’ हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढे़गे पृ69.’
नैराश्य भरे पत्र में संबोधन मेरी निराशा! से किया गया है। जया की माँ को भी पत्र लिखा है संजय ने जहांँ वह स्पष्ट लिखता है कि वह एक ईमानदार आदमी है, जिंदगी में अगर आवारागर्दी और मौज का खेल खेलना होता तो इतनी ठोकरें नहीं खानी पडतीं। पृ 73। बिना संबंध के जया के नाम क्या लिख दूंँ? यदि आप तैयार हों तो आप जहांँ कहें मैं चलकर अपना सब कुछ लिख देने को तैयार हूँ। पृ 74।
जया अपने निर्णय में लिखती है “मैं वहाँ तक आपका साथ दूंँगी जहाँ तक सत्य है, ईश्वर है, यह पृथ्वी है। क्या इससे भी अधिक प्रूफ की आवश्यकता है? – बहुत भावुक हो रही हूँ – बस आपकी जया। पृ 77
साथ ही प्रोफेसर संजय अपनी थीसिस के बाद की योजनाएं भी बनाता है और जया जो उसके जीवन की आधार है उसको आश्वस्त करता है कि जाति कुल की बातें करने वाला समाज पीड़ा ही देता है। वे ऊँचे कुल के राजपूत चंद्रवंशी या सूर्यवंशी की दुहाई देते हैं और बड़ी उम्र की।
21.9.1960 के इस पत्र में संजय ने जया को स्पष्ट लिखा है कि एक बार अंत में हमें किसी की खुशी, दम्भ, या झूठे अभिमान के लिए मरना नहीं है। हमें मारने वाले मार डालें तो ठीक है। दूसरी बात यह है कि यह लडाई संयोगवश पूरी की पूरी तुम्हारे हाथों में है। वे तुमसे ही हारेंगे। समय निरावधि है। हमारी निष्ठा है तो हम एक साथ रहेंगे। रही बात भविष्य की हम अपने अनुसार अपना गढेंगे। ‘पृष्ठ 69
संजय जानता है कि जया और उसका विवाह समाज में मान्य नहीं है। फिर भी वह और जया अपने निर्णय पर अडिग हैं।
एक पत्र में जया को वह’ भोली बाल सखी ‘और’ बालिका वधू ‘से भी संबोधित किया है। संजय अपने को’ एक एडल्ट पुरुष’ मानते हैं।स्त्री ही अपमानित नहीं होती बल्कि पदस्थ, चर्चित, सम्मानित पुरुष को स्त्री से भी अधिक विवश किया जाता है।
5.12.1960 के पत्र से पता चलता है कि संजय की नियुक्ति फिर दरभंगा में एक वर्ष के प्रोवेशन पर हो गई है। जया हर हाल में उसका साथ ही देने का निर्णय करती है । अपना निर्णय देती है कि जहाँ सत्य है, ईश्वर है यह पृथ्वी है तब तक वह संजय की है। संजय पीएचडी भी पूरा कर लेना चाहता है।
जया उसे बराबर पत्रों में आश्वस्त करती है कि यदि वह आपकी नहीं होगी तो किसी की भी नहीं होगी, वह पलायनवादी संस्कृति की नहीं है, वह उसी ठाकुर अजीत सिंह की बेटी है जो अपने निश्चयों पर अड़े हुए हैं। वह पत्थर से टकरा सकती है। पर उन पत्थरों की चोट संजय को न लगे। पृ83। पत्रों में संजय अंत में लिखता है तुम्हारा केवल तुम्हीं में खोया हुआ।
पत्रों के सिलसिले चलते रहे। 4.4.1961 के पत्र के बाद से लगातार छ महीनों तक परिवार के रिश्तेदारों सगे-संबंधियों और कॉलेज के कुछ आत्मीय मित्रों ने मिलकर जया के पिता को मनाया। अन्ततः आकाश को धरित्रि पर झुकना ही पड़ा।जून 1961 में जया एडल्ट हो गई तब विवशतावश पिता ने धूमधाम से विवाह किया और विदाई हो गई।
यहाँ भी मर्यादा का पालन करते हुए घूंँघट में जया की विदाई होती है। संजय अपने गांँव सुदामापुर ले गए जो गाजीपुर से गंगा के पार ताड़ी घाट से 7-8 किलोमीटर दूर था। जया के चेहरे को देख संजय ने कहा दो वर्ष बाद मिली हो। ‘सिंदूर लिप्त मांग, ललाट पर बिंदी घूंँघट से अस्त व्यस्त होने के कारण काली घुँघराली लटें उसके चेहरे पर बिखरी हुई थीं और बनारसी साड़ी तथा आभूषणों से सुसज्जित उसका सौंदर्य अनिर्वचनीय था, मैं भाव विमुग्ध हो गया।’
गाँव में संजय और जया का विधि विधान से मंगल गीतों की गूँज के साथ पुश्तैनी मकान में स्वागत हुआ। दो तीन दिन बाद ही दरभंगा मेडिकल कॉलेज से संजय को कॉलेज ज्वाइन करना पड़ा जो दोनों के लिए बहुत ही कष्टप्रद रहा। बहन और भुआ के पास नई नवेली दुल्हन जया को छोड़कर जाना संजय को दुखी कर रहा था क्योंकि जया इस तरह के पिछड़े गाँव में कभी रही न थी। जया की पढाई के लिए भी संजय प्रयास कर रहा है।
फिर संजय के पत्रों से पता चलता है कि वह मकान की तलाश भी कर रहा है और शांतिनिकेतन की यात्रा के विषय में भी लिखता है। अब वह उसका पति है।
जया भी साइंस में केमेस्ट्री से एम एस सी किया। संजय का भी लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर और वहीं गवर्नमेंट गर्ल्स डिग्री कॉलेज में जया भी प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हो गईं। दो पुत्र मन्नू और टुन्नू भी हुए। संघर्षों के दिन समाप्त हुए, में छह वर्षों तक लखनऊ में रहे।
संजय के पटना वाले पुराने मित्र राजीव रंजन भी आते हैं और 12 वर्ष के बीच कितना परिवर्तन हो गया इस पर दोनों बातचीत करते हुए खाना भी खाते हैं। राजीव हिन्दी के प्रोफेसर हैं लेकिन कुंवारे हैं। संजय अपनी रिसर्च स्कॉलर जो हार्ट पर रिसर्च कर रही है, उससे परिचय कराते हैं।हँसी मजाक में समय कट जाता है।
संजय की शादी के 15 वर्ष बीत गए। जया भी घर की जिम्मेदारी निभाते हुए खुश है और चाहती है कि संजय अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में वैंकुवर जाए और अपना शोध पत्र पढ़ें । 25 सितंबर 1978 में कनाडा जाते हैं जब तक संजय चार बच्चों के पिता बन चुके थे। ये सब सपने पूरे हो रहे थे लेकिन जया संजय का विछोह सहन नहीं कर पाती थी और जार बेजार रोती रहती थी । सेंट पाल्स हॉस्पिटल में कॉन्फ्रेंस की सभी बातों को संजय ने जया को टेलिफ़ोन पर बताया। एक पत्नी की तरह उसने भी यही कहा कि किसी विदेशिनी से दिल मत लगाना। फिर तो संजय मैक्सिको में डेढ़ महीने रहे। फिर लंदन, न्यूयॉर्क आदि जगहों पर भी योग्यता के कारण जाना रहा। इसी बीच तबियत भी खराब हो जाती है। संजय उम्र के अंतिम पड़ाव की तरफ भी जा रहे थे लेकिन मन और मस्तिष्क की जिज्ञासाएं बराबर रहती थी। अपने फाइल में दबे जया को लिखी चिट्ठियों को भी पढ़ते जिसमें गाँव की पगडंडी से होते हुए शहर और विदेश यात्रा करने वाले एक व्यक्ति के प्रतिफल भोगे हुए क्षणों, मनोदशा और अपना देश, अपना शहर, अपना घर – परिवार के प्रति आकर्षण का यथार्थ चित्र भी ही जिन्हें मैं अपनी अपनी फाइल से प्रस्तुत कर रहा हूँ –
मेक्सिको प्रवास से जया को प्रेषित पत्र के विषय में संजय जया के करीब ही रहता। पृष्ठ 118।
विदेशों का वैभव पैसा रूपये सब देखने के बाद भी अमरीका यूरोप आदि से मन भर गया। बस अपने देश की ही याद आती रहती और अपने बच्चों को भी यही बताता कि गाँव की गरीबी पढ़ते समय देखी थी, यहाँ विदेश में आकर अमीरी देख ली। पृष्ठ 119। जया के बिना अब संजय एक पल भी कहीं नहीं रह पा रहे हैं। अपने 25 से उन्तीस पत्रों में मेक्सिको अमेरिका जापान आदि देशों के खान पान आदि विभिन्न विषयों पर भी उल्लेख किया है। मिस्टर सैमुएल, मिस जेसिका आदि के विषय में भी बातें लिखी। संजय विदेशों में भारतविद कहलाने लगे। योग और शरीर तंत्र पर विविध व्याख्यान देते रहे। फिल्म बनाने का निमंत्रण भी आने लगा। विदेश में बुखार, ब्लड प्रेशर, ब्लड सूगर आदि बीमारी भी हुई। सबसे बड़ी एक बात यह समझ में आई कि अध्ययन कर्म आदमी को कहाँ से कहाँ पहुंँचा देता है। पर देश की गरीबी और गंदगी के बावजूद संजय देश की मिट्टी को नहीं भूल आते। मिस्टर सैमुएल की सेवा, प्रभा ठकराल की सेवा, शशि की सेवा को संजय अविस्मरणीय बताते हैं जिन्होंने मेक्सिको में उनका ध्यान रखा। घटनाक्रम धीरे-धीरे जीवन के अंतिम पड़ाव तक आता है और संजय उन घटनाओं को सहेज कर अपने अंतर्मन में संजो कर रखता चला जाता है।

विदेश भ्रमण में बारह वर्ष बीत गए। जया भी 30 सितंबर 2003 में सेवानिवृत्त हो जाती है। संजय तो जया से 15 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके थे। मन्नू टुन्नू और पम्मी ने जया के प्रथम सेवानिवृत्ति पूरी होने पर केक भी काटा। बड़े खुशी से जीवन बीत रहा था पर जया के सेवानिवृत्ति के दो वर्ष भी नहीं हुए थे कि एक दिन आधी रात को उसके पेट में असह्य दर्द होता है जो गॉलब्लेडर में पथरी के कारण हुआ था। ऑपरेशन भी होता है फिर भी पेट का दर्द ठीक नहीं होता। दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भी भर्ती कराया गया। संजय स्वयं उसका ऑपरेशन कर न सके। अपने मित्र द्वारा करवाया। अॉपरेशन हुआ लेकिन गॉलब्लेडर के बगल की एक नस में एक अत्यंत सूक्ष्म छिद्र हो गया था और मामला गंभीर हो चला था। आईसीयू में ले जाया गया लेकिन जया तीसरे दिन चल बसी।
संजय ने अंतिम संस्कार किया। उसके जाने के पंद्रहवें दिन बाद भरे पूरे घर में संजय को अकेला पन काट रहा था वही शाम का वक्त बरामदे में बैठे हुए संजय को जया की वही छवि याद आ रही थी जब ऐसी ही घनघोर बरसात में विवाह के पूर्व प्लास्टिक का पर्दा लगे हुए रिक्शे में मिलने आती है। अगले ही पल जया की अंतिम यात्रा के समय की छवि संजय की पनियल आँखों में तैर जाती हैं।
उपन्यास अंत में बारिश में घटनाएँ तीन भागों में बँटी हैं। पहली विवाह के पहले प्रेम को पाने की पीड़ा दूसरी विवाह के लिए कई संघर्षों का सामना और तीसरा विवाहोपरांत विदेश जाने की आकांक्षा में घर से दूर रहना।
देखा जाए तो 1960 से लेकर 2003 तक के नायक और नायिका की प्रेम यात्रा को चिट्ठियों द्वारा एक सूत्र में बांधने की कोशिश की है। और अधिकतर चिट्ठियां संजय द्वारा लिखी गई हैं। पत्नी का कल्पित नाम जया है जिसे वह चिट्ठियों में प्रेम प्रदर्शित करने और अपने कार्योँ का ब्योरा देने के लिए लिखता रहता है। जबकि जया की ओर से जो लिखा गया वह बहुत कम है लेकिन महत्वपूर्ण है। उसका प्रेम सिर्फ समर्पण है। प्रेम की पीड़ा, हर्ष, अपनापन, उदासी आदि भावनाएंँ हृदय में आत्मसात करती हैं जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्रेम की प्राप्ति होने पर प्रिय के साथ दूरियांँ समाप्त हो जाती हैं। प्रेम से उम्र की संख्या भी कोई मायने नहीं रखती। प्रेम से हर दूरी घट जाती है। जया संजय मय हो जाती है। उसकी घुटन ऊब पीड़ा और पराजय का बोध भी ऊपर उठ कर ममता स्नेहिल भावों से परिपूर्ण हो जाता है। संजय कितनी ही विपरित स्थितियों से गुजरा लेकिन प्रिय जया के साथ उसमें नवीन उत्साह और आत्मविश्वास का संचार ही भरा रहा । यही मनुष्य को पौरूष प्रदान करता है और हर प्रकार की बाधाओं से जूझने की शक्ति देता है।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर आकर भी जया की प्रेम बारिश संजय को प्रेमासिक्त करती रही। घनघोर बारिश के पानी ने संजय के आँसुओं धो डाला और नाती- पोतों से भरा- पूरा एक परिवार छोड़ जाती है जो दोनों के प्रेम की निशानियाँ हैं। जीवन और मृत्यु मानव जीवन के चरम सत्य है परंतु उनके बीच का फासला नियती नहीं स्वयं प्रिय का है, प्रेम यही आत्मविश्वास जगाता है। उमड़ते घुमड़ते इस बारिश में भी संजय को काले बादलों के बीच चमकती हुई बिजली की रोशनी में अपने बच्चों का हँसता मुस्कुराता चेहरा नजर आता है जो उसके बचे खुचे जीवन को आश्वस्त करता नजर आता है। संजय जया के प्रेम की कसक लिए सकारात्मक होने का निश्चय करता है जबकि वह सबके साथ रहते हुए भी अकेला ही है।
लेखिका भगवंती सिंह का यह प्रथम उपन्यास है जो उनके जीवन के सत्तर दशक का परिणाम है। हिंदी साहित्यकार और कबीर मर्मज्ञ पति डॉ शुकदेव सिंह के गुजर जाने के बाद वे उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने में लगी हैं। उनका लिखा कथा साहित्य यथार्थ जीवन का चित्र है। उन्होंने जीवन के बहुमूल्य अनुभवों को बहुत ही सहज बहते हुए झरने की तरह एक एक शब्द मोतियों को पिरोया है। इस उपन्यास में ऐसा लगता है कि मानो लेखिका के निजी जीवन की कहानियों की लड़ियों का गुच्छा पत्रों के माध्यम से धीरे-धीरे खुल रहा हो।
भाषा शैली बहुत ही सहज, सरल और चरित्र के अनुरूप है। बिना किसी अनावश्यक प्रयास के स्वतः स्फूर्त शब्दों ने उपन्यास का रूप ले लिया। कई घटनाओं का विन्यास और उनकी कथा तारतम्यता में प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी और माँ- पिता सभी के किरदार अपनी-अपनी सामाजिक मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं। कहीं-कहीं उपन्यास की कसावट में आई खामियाँ खटकती हैं जो मूक ढंग से व्यक्त हो जाती हैं। विदेश जाने के दौरान लिखे पत्र कभी-कभी औपचारिकता निभाते हुए भी लगते हैं।
समाज के झूठे दंभ को बेनकाब करने वाला यह उपन्यास अपने परिवार, बड़े कहलाने वाले तथाकथित दादा, अहंकारी लोगों की कलई खोलने वाला है। दो प्रेम करने वालों को एक नहीं होने देने के लिए कई दलीलें देता यह समाज अपनी दकियानूसी सडे़ गले विचारों में जीने वाले समय के साथ किस तरह धराशायी और अवसरवादी हो जाते हैं यह भी इस पूरे उपन्यास की पर्तें खोलते पत्र महत्वपूर्ण संदेश देते हैं। एक अकेला व्यक्ति समाज की खोखली दिवारों से कब तक सिर फोड़ता रहेगा। संजय का लिखना ‘जिन्हें शीशा समझकर हम टकरा गए वे पत्थर निकले। हमने सोचा था कुछ शीशा टूटेगा, सब कुछ हम जोड़ने की कोशिश करेंगे फिर जिंदगी सामने होगी। लेकिन हम टूट गए। पत्थर तो पत्थर ठहरा। – – – जो इतने भयानक और कठोर हैं अपने हों या पराये उनके प्रति कैसी श्रद्धा? कैसी ममता? पृ69।
लेखिका ने पुरुष की संवेदनशीलता को समाज के परिप्रेक्ष्य में देखा है जो समाज के मूल्यों, आचार विचार को एक नये एंगल से देखने का आईना प्रदान करता है। प्रेम का सूत्र अंत तक अपने दामन से जुड़ा रहता है।
बहुत कुछ छूट गया है। कुछ समझने का प्रयास किया है। अभी तो “अंत में बारिश” की गहराई में छिपी बहुत सी कहानियां हैं जिन्हें उजागर करना है।

भूखी रहती हैं घरों में अन्नपूर्णा, 51.4 फीसदी महिलाएं एनेमिया से पीड़ित

एक स्त्री पहले खाना नहीं खा सकती? वह खाना तभी खाएगी, जब घर के सारे सदस्य खास तौर पुरुष खा लें। चाहे उसे कितनी ही भूख क्यों न लगी हो। कई घरों में तो बच्चियां भी बाकी सदस्यों को खाना परोसती नजर आती हैं। यह हकीकत देश के ज्यादातर घरों की है।  हमारे देश में उनको अन्नपूर्णा का दर्जा दिया गया है। वे सबका पेट तो भरती हैं, मगर अक्सर खुद भूखी रह जाती हैं या फिर उन्हें ही पर्याप्त पौष्टिक खाना नहीं मिल पाता है जबकि, देश और दुनिया में बहुत सा खाना बर्बाद भी हो जाता है।

एनीमिया से पीड़ित सबसे ज्यादा 15-49 साल की महिलाएं
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2020 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब 19 करोड़ लोगों को पौष्टिक खानपान नहीं मिल पाता है। यानी देश की 14 फीसदी आबादी को अच्छा खानपान नहीं मिल पा रहा है। वहीं, 15-49 साल की 51.4 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जो एनीमिक हैं, यानी खून की कमी से जूझ रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इन महिलाओं को आयरन, कैल्शियम जैसे मिनरल्स वाला खानपान नहीं मिल पा रहा है।

दुनिया में 81 करोड़ आबादी सोती है भूखे पेट, इनमें 60 फीसदी महिलाएं
वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, दुनिया की करीब 81 करोड़ आबादी को भूखे पेट सोना पड़ता है या फिर इन्हें पर्याप्त खाना नहीं मिल पाता है। इनमें से करीबी 60 फीसदी तो महिलाएं ही हैं। दुनिया में 5 साल की उम्र के करीब 20 फीसदी बच्चों का वजन अपने उम्र के हिसाब से कम है।

एक तिहाई खाना हाे जाता है बर्बाद, इसमें 40 फीसदी फल-सब्जियां
यह एक त्रासदी है कि एक तरफ तो बड़ी आबादी को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा है, वहीं दूसरी ओर कड़वी हकीकत यह है कि दुनिया में हर साल कुल खाने का एक तिहाई बर्बाद हो जाता है। 40 फीसदी फल और सब्जियां, 30 फीसदी अनाज तो हर साल बाजार में सही वक्त पर नहीं पहुंच पाने से और सड़ने के चलते बर्बाद हो जाता है।

आयरन की कमी से जूझ रहीं महिलाएं, ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भी पिछड़ा देश
यूनाइटेड नेशंस की इस संंस्था की रिपोर्ट बताती है कि भारत जैसे विकासशील देशों में महिलाएं ज्यादा कुपोषित हैं। 15-49 साल की उम्र में जब उन्हें अच्छा खाना मिलना चाहिए तो वे मेंस्ट्रुएशन, खराब खानपान और बार-बार मां बनने की वजह आयरन की कमी से जूझ रही होती हैं। हाल ही में जारी हुई  ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2021 में भारत को 116 देशों में 101वां स्थान मिला है। 2021 की रैकिंग में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से पीछे है।

बेहतर हो कि घर के पुरुष सदस्य दें ध्यान, साथ खाने की आदत डालें

देश में महिलाओं के खानपान को लेकर शुरू से ही जानकारियों का अभाव है। एक महिला को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अच्छे खानपान की जरूरत होती है। वजह है, उनके शरीर में लगातार होने वाले हॉर्मोनल बदलाव और मेंस्ट्रुएशन। इससे उनमें खून की कमी हो जाती है। महिलाओं को ऐसा खाना दिया जाना चाहिए, जो आयरन, सोडियम, पोटैशियम और प्रोटीन से भरपूर हो। हालात यह है कि देश में आज भी खासकर गांवों में महिलाओं को बेहतर खानपान नहीं मिल पाता है। औरतें भरपेट खाना न होने की वजह से चौलाई के पत्तों की सब्जी खाती हैं या मांड पीती हैं। अक्सर देखा गया है कि घरों में महिलाएं सभी को खाना खिलाने के बाद ही खाती हैं। शहरों या गांवों में ज्यादातर घरों की महिलाएं सबको खिलाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही खाकर रह जाती हैं। बेहतर हो कि घर के पुरुष सदस्य इस पर ध्यान दें और साथ खाने की आदत डालें। इससे महिलाओं को एक तो पर्याप्त खाना मिलेगा और उनके खाने में पालक, पनीर, दूध, गोभी, आंवला जैसी पौष्टिक चीजों की उपलब्धता बनी रहेगी, जो उनके लिए जरूरी है।