Friday, April 10, 2026
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यू. एस. कॉन्सुलेट ने आयोजित की पूर्वोत्तर भारत की उद्यमियों के लिए कार्यशाला

कोलकाता : यू. एस. कॉन्सुलेट एवं शिलांग के एशियन कन्फ्लूएंस द्वारा नेक्सस इन्क्यूबेशन हब के सहयोग से पूर्वोत्तर भारत की उद्यमियों के लिए कार्यशाला आयोजित की। अमेरिकन सेंटर में ग्लोबल आंट्रेप्रिनयरशिप के तहत अमेरिकन सेंटर में गत 12 -13 नवम्बर को आयोजित इस 2 दिवसीय कार्यशाला में 25 चयनित महिला उद्यमियों ने भाग लिया। यह कार्यशाला द अकादमी फॉर विमेन आंट्रेप्रेनियर्स (एडब्ल्यूई) की फंडिंग स्टेट्स ब्यूरो ऑफ एडुकेशन एंड कल्चरल अफेयर्स (ईसीए) द्वारा की गयी है। कोरोना महामारी के बीच 50 देशों की 5 हजार महिलाओं को इसका लाभ मिल रहा है। यू. एस. कॉन्सुलेट जनरल कोलकाता के नेतृत्व में भारत में एडब्ल्यूई का पहला कार्यक्रम है जिससे 150 उद्यमियों को सहायता मिली है। इस कार्यशाला में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय और नगालैंड की उद्यमियों ने भाग लिया और उनको सफल उद्यमियों से व्यवसाय के गुर सीखने को मिले। इन उद्यमियों को सम्बोधित करते हुए कौंसुल जनरल मेलिंडा पावेक ने कहा कि अमेरिका हमेशा से महिलाओं को सशक्त बनाने में विश्वास रखता है और यह कार्यशाला इसी दिशा में उठाया गया कदम है। नवम्बर 2020 में आरम्भ हुई इस योजना से 80 महिला उद्यमियों को ड्रीम बिल्डर सर्टिफिकेट प्रदान किया गया है। इसका अगला चरण 19 नवम्बर को बिहार एवं झारखंड में होगा।

दोहे के प्रकार

1/—भ्रमर दोहा — 22 गुरु 4 लघु
2/;- सुभ्रमर दोहा –21 गुरु 6 लघु
3/- शरभ दोहा –20 गुरु 8 लघु
4/- श्येन दोहा — 19 गुरु 10 लघु
5/- मंडूक दोहा — 18 गुरु 12 लघु
6/- मर्कट दोहा –17 गुरु 14 लघु
7/- करभ दोहा — 16 गुरु 16 लघु
8/- नर दोहा — 15 गुरु 18 लघु
9/- हंस दोहा — 14 गुरु 20 लघु
10/- गयंद दोहा — 13 गुरु 22 लघु
11/- पयोधर दोहा — 12 गुरु 24 लघु
12/- बल दोहा — 11 गुरु 26 लघु
13/- पान दोहा — 10 गुरु 28 लघु
14/- त्रिकल दोहा — 9 गुरु 30लघु
15/-कच्छप दोहा– 8 गुरु 32 लघु
16/-मच्छ दोहा — 7 गुरु 34 लघु
17/-शार्दुल दोहा — 6 गुरु 36 लघु
18/- अहिवर दोहा — 5 गुरु 38 लघु
19/-व्याल दोहा– 4 गुरु 40 लघु
20/-विडाल दोहा — 3 गुरु 42लघु
21/-श्वान दोहा- 2 गुरु 44 लघु
22/-उदर दोहा– 1गुरु 46 लघु
23/-सर्प दोहा– 0 गुरु 44 लघु

—–.बिलासा छंद महालय

(प्रो. प्रेम शर्मा के सौजन्य से प्राप्त)

दिव्यांगों के लिए फुटबॉल टूर्नामेंट, जारी हुआ ‘खेला होबे’ का थीम गीत

कोलकाता : दिव्यांगों और महिलाओं के लिए महानगर में फुटबॉल टूर्नामेंट आयोजित होने जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता सर्मिस्ता आचार्य, मशहूर एंकर अंकित साव एवं जंक्शन हाउस द्वारा आयोजित हो रहे इस टूर्नामेंट का थीम गीत ‘खेला होबे’ हाल ही में जारी किया गया। यह गीत अन्तर्राष्ट्रीय फुटबॉलर अलविटो डिकुन्हा, विधायक मदन मित्रा, मशहूर भारतीय फुटबॉलर सुब्रत भट्टाचार्य, शुभ्रो जोआरदार, क्रिकेटर जोजो मुखर्जी के साथ ‘खेला होबे’ के गायक प्रबीर सरकार, पैरा एथलिट प्रणय पोद्दार तथा केन्या ते मानद कौंसल समेत अन्य लोग उपस्थित थे। इस अवसर पर जंक्शन हाउस के निदेशक राज रॉय ने कहा कि हम इन दिव्यांगों में जागरुकता लाना चाहते हैं कि दिव्यांग चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं और यही ‘खेला होबे’ का सन्देश है। एंकर अंकित साव ने कहा कि विशेष रूप से उपेक्षितों और दिव्यांगों के लिए आयोजित यह अपनी तरह का अनोखा और पहला आयोजन होगा जो अब तक नहीं देखा गया होगा। सामाजिक कार्यकर्ता सर्मिस्ता आचार्य ने कहा कि ‘खेला होबे’ एक उद्देश्य और सन्देश को लेकर चल रहा है और यह बदलाव लाने का प्रयास है।

भवानीपुर 75 पल्ली को विश्व बांग्ला शारद सम्मान

कोलकाता :  भवानीपुर 75 पल्ली दुर्गा पूजा को सर्वश्रेष्ठ  कोविड सचेतनता (स्वास्थ्य विधि) के लिए विश्व बांग्ला शारद सम्मान पुरस्कार प्राप्त हुआ। ‘भवानीपुर 75 पल्ली’ नाम को वर्तमान में दक्षिण कोलकाता की प्रमुख थीम पूजाओं में एक उभरता हुआ सितारा माना जाता है। इस वर्ष अपनी थीम ‘मानविक’ को सार्थक करते हुए भवानीपुर 75 पल्ली पूजा समिति ने अपनी सीएसआर पहल में यह कार्य किया। कमेटी छऊ नर्तकों की सहायता के लिए आगे आई जो लॉकडाउन से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। छऊ एक पारम्परिक नृत्य है जिसमें नर्तक रामायण एवं महाभारत जैसे पौराणिक आख्यानों को अपने नृत्य के माध्यम से जीवन्त करते हैं। इस दुर्गा पूजा कमेटी के सचिव सुबीर दास ने कहा कि कमेटी ने पुरुलिया के चारिदा गाँव में 250 छऊ नर्तकों के बच्चों को वस्त्र वितरित किया है और उनके परिवार के सदस्यों को भी वस्त्र दिये जाएंगे। दुर्गा पूजा के दौरान छऊ नर्तकों के ऐसे 50 परिवारों की सहायता की गयी।

छठ पर्व की आस्था को आडंबर में ना बदलें….प्लीज

लोकनाथ तिवारी

छठ पर सेवा और दान करने की होड़ में जुटे नेता और तथाकथित समाजसेवियों को शायद बुरा लगे, फिर भी सुन लीजिए. आपके दान की सामग्री से गरीब से गरीब व्रती भी अर्घ्य नहीं देना चाहती. देना भी नहीं चाहिए. आस्था का पर्व छठ दिखावे का पर्व नहीं है. तभी तो हमारे घरों में बनी सामग्री का ही उपयोग पूजा के लिए होता है. ठेकुआ, सूथनी, अमरूद, मूली, हल्दी, ईंख, नारियल, जैसे फल जो बिहार और पूर्वी यूपी में आसानी से उपलब्ध होते हैं, उन्हीं से अर्घ्य दिया जाता है. आप के दान की सामग्री लेने के लिए लगी लंबी कतार में घंटों खड़ी महिलाएं व्रती नहीं हो सकती. अगर वे जरूरतमंद हैं भी तो उनको कतार में लगाकर आप लोग पाप के भागी बन रहे हैं. साथ ही बिहारी आस्था के इस पर्व को भी अन्य पर्वों की तरह दिखावे का बनाने की कोशिश कर रहे हैं. छठ एक पवित्र व्रत है. इसमें जाति-पांति, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब का भेद-भाव नहीं होता. जिसके पास जो है. जितना है, उसी से छठ व्रत करता है.
अब तो छठ भी देखा-देखी आडंबरयुक्त होता जा रहा है. हमारे यहां तो गंगा नदी के किनारे जीवन व्यतीत करनेवाले भी अपने दरवाजे पर ही छठ मनाते थे. दो-तीन दिन पहले से ही अपने दुआर (गांव में हर घर के बाहर खुला स्थान रहता था जहां पुरुषों के बैठने का स्थान होता था) के ईनार (कुआं) पर हम सभी साफ सफाई शुरू कर देते थे. हमारे साथ पास पड़ोस के बच्चे भी रहते थे. खेतों से साफ माटी लाकर छठ माई की बेदी बनाते थे. लीप-पोत कर छठ तक उसकी रखवाली भी करते थे ताकि कोई गाय-बकरी उस बेदी के पास भी न फटकने पाये. हमारा गांव गंगा के किनारे है लेकिन अधिकांश परिवार अपने मुहल्ले में स्थित कुएं पर ही छठ मनाते थे.
छठ माई के बारे में हमें इतना बताया गया था कि इस व्रत में किसी भी प्रकार का गलती करने पर भारी दंड मिलता है. इसलिए केवल व्रती ही नहीं घर परिवार के दूसरे लोग भी शूचिता का भरपूर ख्याल रखते थे. यहां तक कि छठ के पहले हम लोग गन्ना, पानी फल, मूली आदि उन फलों को सेवन भी नहीं करते थे, जिनको छठ के अरघ (अर्घ्य) में उपयोग किया जाता था. छठ के दिन मां ठेकुआ बनाती थी, जिसके सुगंध से घर आंगन भर जाता था. हम लोग जब रसोई घर की चौखट से टेक लगाकर ठेकुआ बनते हुए टकटकी लगाकर ताकने लगते थे तो मां झिड़क कर भगा देती थी. कहती थी पूजा के पहले ललचायी नजरों से ठेकुआ की ओर ताकने से भी पाप लगता है. छठ का सारा दिन ठेकुआ और फलों को अगले दिन खाने की प्रतीक्षा में कटता था. दोपहर बाद नहा धोकर नये कपड़े पहन कर ठेकुआ, फल-फूल से लदे दऊरा को घर से लेकर छठ घाट जो कि हमारे दरवाजे पर ही होता था, लेकर जाते थे. पीछे-पीछे माई (मां) हाथ में लोटा लेकर नयी साड़ी और शॉल ओढ़े घाट तक आती थी. पास-पड़ोस की बड़की माई, चाची, दादी, बुआ और दीदी छठ बेदी के चारोओर बिछी चादर पर बैठ कर छठ की गीत पूरे लय से गाती थीं.
हम बच्चे अपने छठ घाट के अलावा गांव के दूसरे छठ घाटों पर भी जाकर अपने साथियों से मिलते थे. पटाखे और फूलझड़ियां छोड़ते थे. सूर्यास्त के ठीक पहले हम फिर अपने घाट पर हाजिर हो जाते थे. अर्घ्य दिलवाने के बाद सूर्य देवता को प्रणाम करते थे और फिर धीरे-धीरे दऊरा उठाकर घर ले जाते थे. यहां ध्यान रखा जाता था कि हम छठ घाट पर न कुछ खाते थे और न ही मुंह जूठा करते थे. रात में भी मां सुबह के अर्घ्य के लिए ठेकुआ बनाती थी. सुबह तड़के नहा धोकर सूर्योदय से घंटे भर पहले फिर छठ घाट पर पहुंच जाते थे. छठ के गीतों के साथ सूर्य देव के उगने की अधीर प्रतीक्षा होती थी. सूर्यदेव के उगने के बाद जो खुशी मिलती थी, वैसी खुशी अब नहीं मिलती. अब हम बड़े जो हो गये हैं.
हमारा गांव
उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी इलाके में स्थित बलिया जिले के पूर्वी भाग द्वाबा का नारायणपुर-पचरुखिया गांव गंगा के किनारे पर है. अब यह बलिया-बैरिया राष्ट्रीय राजमार्ग (इसे हमलोग बांध कहते हैं क्योंकि यह जमीन से 20 फुट से अधिक ऊंचा है) के उत्तर में है. पहले हमारा गांव बलिया-बैरिया राष्ट्रीय राजमार्ग के दक्षिण में था. गंगा के कटान में हमारा नारायणपुर पचरूखिया गांव ही नहीं बल्कि आसपास के सारे गांव ही नदी के कटान में चले गये.

छठ पूजा विशेष : करते हैं ठेकुआ की बात

छठ मतलब एक ऐसा पर्व जिसमें सभी भेदभाव समाप्त हो जाते हैं, हर घर से भीनी खुशबू आनी शुरू हो जाती है। गांव से जुड़े इस महापर्व में भी अब आधुनिकता का रंग चढ़ने लगा है, विभिन्न तरीके के प्रसाद बनाए जाने लगे हैं लेकिन आज भी एक प्रसाद कॉमन है और वह है ठेकुआ। ठेकुआ एक ऐसा प्रसाद है जो हर अमीर से अमीर और गरीब से गरीब घरों में छठ में बनाकर सूर्यदेव और छठी मैया को चढ़ाया जाता है। सोमवार को ठेकुआ बनाने के लिए गेहूं सुखाने जब तमाम छतों पर महिलाएं जुटी तो लोकगीतों के लय ने अमीर-गरीब और ऊंच-नीच के तमाम भेदभाव मिट गए।

कृषि से जुड़ा है छठ पर्व का हर तार
चार दिवसीय छठ में वैसे तो कई प्रसाद चढ़ाए जाते हैं लेकिन ठेकुए का अलग महत्व है। ठेकुआ गुड़ व आटे से बनता है। यह समय गन्ने के काटने का होता है और गन्ने से गुड़ बनता है। बताया जाता है कि छठ के साथ ही सर्दी के मौसम की शुरुआत हो जाती है। ऐसे में ठंड से बचने और स्वस्थ रहने के लिए गुड़ फायदेमंद होता है। इस चलते ठेकुआ चढ़ाने की पंरपरा है। प्रसाद बनाने के लिए गेंहूं की सफाई की जाती है, इसलिए इस पर्व को श्रम से भी जोड़ा जाता है और आज हम जानेंगे ठेकुआ के बारे में, जिसे हम महाप्रसाद भी कहते हैं।

यहाँ हुई ठेकुआ की शुरूआत 

ठेकुआ बनाने की शुरूआत कहां से हुई और किसने की इसके बारे में ठीक से पता कर पाना थोड़ा कठिन है। लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह बिहार के सालों पहले रहें ‘हथ्वा राजवंश’ की रसोई से निकला ये एक शाही पकवान है। जिसे प्राचीन काल में ‘हथ्वा राजवंश’ की रसोई में ही बनाया जाता था।

इसलिए पड़ा ऐसा नाम

ठेकुआ खानें में जितना स्वादिष्ट है अपने नाम को लेकर भी ये उतना ही अनोखा है। जानकार लोग बताते हैं कि इसका नाम ठेकुआ इसलिए रखा गया क्योंकि इसे बनाने से पहले सही एवं सुंदर रूप दिया जाता है। ऐसा करने के लिए इसे पत्थर या लकड़ी के बने एक सांचे में रखकर हाथों से ठोका जाता है। जिस कारण इसका नाम ‘ठेकुआ’ पड़ गया।

 ये ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद है

ठेकुआ ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद है। लेकिन ऐसा क्यों है? ये शायद हम नहीं जानते। यहाँ आपको ये बताना आवश्यक है कि ये ‘छठ’ का मुख्य प्रसाद इसलिए है क्योंकि भगवान सूर्य को चढ़ाए जाने वाली दान सामग्री में गेंहू और गुड़ दोनो का विशेष महत्व है। गेंहू और गुड़ को सामान्यता भी सूर्य के दान की वस्तुएं माना जाता है। इसलिए इससे बने खास पकवान ‘ठेकुआ’ को ‘छठ’ में प्रसाद स्वरूप भगवान भास्कर को अर्पित किया जाता है।
ठेकुआ आया कहां से?
इसे लेकर कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि ठेकुआ नाम ‘ठुका’ से पड़ा, क्योंकि इसका आटा सख्त गूंथा जाता है और उसे शेप देने के लिए हथेली से खूब पीटा जाता है। ठेकुआ की उत्पत्ति आटे के तले हुए स्नैक्स बनाने की परंपरा से भी जुड़ी हुई बताई जाती है। जगन्नाथपुरी में मीठी मठरी से लेकर खाजा तक सूखे प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। आटा, चीनी और घी से बने ये प्रसाद भी इसी परंपरा का हिस्सा हैं। हालांकि, अब भारत में मिलने वाले आटे के ज्यादातर फ्राइड स्नैक मैदा या रिफाइन आटे के होते हैं। लेकिन बिना रिफाइन किए गेहूं से बना ठेकुआ न सिर्फ काफी पुरानी रेसिपी है, बल्कि यह मैदा या सूजी से बने पकवानों से कहीं ज्यादा हेल्दी है।

इन नामों से भी जाना जाता है ठेकुआ
खजुरिया या ठिकारी के नाम से भी जाना जाने वाला ठेकुआ जिसे छठ के दूसरे दिन यानी खरना के दिन आधी रात में या सुबह में बनाया जाता है। यह बिहार के साथ-साथ यूपी, मध्य प्रदेश, झारखंड इत्यादि राज्यों में भी प्रसिद्ध है। खजूरिया और ठेकुआ में बस थोड़ा सा का अंतर होता है। ठेकुआ खाने में नरम होता है जो गुड़ में बनाया जाता है और खजुरिया थोड़ा-सा ठोस होता है जो चीनी में बनाया जाता है। इसे बनाने के काफ़ी दिनों बाद तक भी आप खाने में इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे गेहूँ के आटे से आम के लकड़ी के द्वारा चूल्हे पर बनाया जाता है।
ऐसा माना जाता है कि ठेकुआ को लोग अपने स्थानीय उपलब्ध चीज़ों के इस्तेमाल से बनाया करते थे। जिसमें गेहूँ के आटे के साथ-साथ गुड़, घी, नारियल, सौंफ का इस्तेमाल होता है और यह भी कहा जाता है कि ठेकुआ भगवान सूर्य को बहुत पसंद है। यही कारण है कि सूर्य को अर्घ्य देते समय इसे शामिल किया जाता है।
लोक आस्था के महापर्व छठ में ठेकुआ का अलग महत्व है और इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण प्रसाद ठेकुआ ही माना जाता है। बिहार में स्वादिष्ट व्यंजन निर्माण की परंपरा पुरानी समय से समृद्ध रही है और छठ के ठेकुआ का तो कहना ही क्या। लोकगीत के मधुर धुनों पर झूमती महिलाएं जब ठेकुआ बनाती हैं तो इसमें ना सिर्फ चीनी और गुड़, बल्कि महिलाओं के सुमधुर गीत की मिठास भी घुल जाती है। कहा जाता है कि सूर्य देव और छठी मैया को भी ठेकुआ काफी पसंद है, जिसके कारण इसका स्वाद और दोगुना हो जाता है।

अर्घ्य समाप्त होते ही रिश्तेदारों को दिया जाता है प्रसाद
आज भी प्रातः कालीन अर्घ्य समाप्त होते ही प्रसाद रिश्तेदारों के यहां पहुंचाने का प्रचलन है लेकिन प्रसाद में खासकर ठेकुआ का आदान-प्रदान जरूर किया जाता है। बेटियां अपने मायके से आने वाले प्रसाद में ठेकुआ का इंतजार करते रहती है। यूं तो ठेकुआ सालों भर बनाए जाते हैं, पहले के जमाने में जब लोग कहीं बाहर जाने लगते थे तो ठेकुआ बनाकर दे दिया जाता था।

 सामग्री : गेहूँ का आटा, घी (मोयन के लिए), सूखा नारियल, गुड़, इलायची पाउडर, सौंफ, मेवे, तलने के लिए घी
विधि : पहले पानी उबालकर उसमें पिघलने के लिए गुड़ डाल दें और उसे चलाते रहें। पिघलने के बाद जब गुड़ वाला पानी ठंडा हो जाए, तो थाली में आटा निकाल कर उसमें सूखा नारियल, पिसी इलायची, सौंफ, मेवे की बारीक क’तर’न और मोयन के लिए घी डालकर मिक्स कर लें। इस के बाद इस आटे को गुड़ वाले पानी से गूंथ लें, आटा तैयार होने पर इसकी लोइयाँ बनाले। अब इस लाइए को सांचे की मदद से आकार देकर घी में तल लें। इस तरह आपके ठेकुए तैयार हैं।

(साभार – रेलयात्री डॉट इन ब्लॉग और नवभारत टाइम्स)

बंगाल के पूर्व मंत्री रविरंजन चट्टोपाध्याय का निधन

कोलकाता :   बंगाल के पूर्व मंत्री रविरंजन चट्टोपाध्याय का लंबी बीमारी के बाद कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों ने यह जानकारी दी। बर्द्धमान दक्षिण से दो बार विधायक रहे चट्टोपाध्याय मधुमेह और वृद्धावस्था की बीमारियों से पीड़ित थे।वह तृणमूल कांग्रेस सरकार में राज्य के तकनीकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण, विज्ञान एवं प्रौद्येागिकी विभाग के मंत्री रहे थे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चट्टोपाध्याय के निधन पर शोक जताया है।
चट्टोपाध्याय ने बर्दवान विश्वविद्यालय में लंबे समय तक अध्यापन किया था। बाद में वह तृणमूल में शामिल हो गए। मालूम हो कि उन्हें हाल ही में कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 25 दिनों से कोलकाता के एक निजी अस्पताल में भर्ती थे। वह विभिन्न बिमारियों से पीड़ित थे। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका था।
ममता बनर्जी ने अपने शोक संदेश में कहा, ‘ मैं पूर्व तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण मंत्री और विज्ञान, प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी मंत्री रविरंजन चट्टोपाध्याय के निधन से बहुत दुखी हूं। उनके निधन से राजनीतिक जगत में एक शून्य पैदा हो गया। मैं रविरंजन चट्टोपाध्याय के परिवार और प्रशंसकों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करती हूँ।’ अपने राजनीतिक जीवन के अलावा, रविरंजन चट्टोपाध्याय एक प्रोफेसर थे। साल 2011 में पहली बार राजनीति में शामिल हुए थे। तृणमूल के पहले कार्यकाल में वे तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण मंत्री थे।
साल 2011 में, ममता बनर्जी ने बर्द्धमान विश्वविद्यालय में पूर्व प्रोफेसर रवि रंजन चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया था। प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी ने उनके लिए सिफारिश थी। बर्द्धमान दक्षिण से जीतकर वे मंत्री बने। उन्हें वर्द्धमान विकास बोर्ड का अध्यक्ष भी बनाया गया था। बर्द्धमान सीट से उनके प्रतिद्वंद्वी सीपीएम के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री निरुपम सेन थे। रविरंजन चट्टोपाध्याय ने उन्हें 30,000 से अधिक मतों से हराया था और ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल में उन्हें जगह मिली थी।

बंगाल में कोलकाता टीकाकरण में अव्वल, पहले डोज में उत्तर 24 परगना आगे

कोलकाता : राज्य में वैक्सीनेशन की गति अब काफी बढ़ी है। केंद्रीय स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़े के मुताबिक राज्य में कुल 8,07,01,298 को वैक्सीन लग चुकी है। यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र के बाद है। पूरे देश में वैक्सीनेशन के मामले में पश्चिम बंगाल इस समय तीसरे स्थान पर है। कोविन डैशबोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कुल वैक्सीनेशन में कोलकाता शीर्ष पर है। यहां कुल 7924516 को टीके लगे हैं।
हालांकि सबसे बड़ी बात है कि पहले डोज के वैक्सीनेशन में उत्तर 24 परगना जिला आगे हैं। यहां कुल वैक्सीनेशन 7717979 हुआ है, लेकिन पहला डोज 5349253 लोगों को लगा है। दूसरी तरफ कोलकाता में कुल 4802295 लोगों को टीके लगे हैं। वेस्ट बंगाल डॉक्टर्स फोरम की ओर से डा. राजीव पांडेय ने कहा कि पहले डोज व दूसरे डोज के वैक्सीनेशन में अधिक अंतर नहीं होना चाहिए। यह काफी अच्छी बात है कि राज्य में वैक्सीनेशन की गति तेज है। हालांकि जरूरत है कि सभी जिलों में वैक्सीनेशन की गति एक समान हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाए।
एसोसिएशन ऑफ हेल्थ सर्विस डॉक्टर के महासचिव डा.मानस गुमटा ने कहा कि वैक्सीन के बाद भी लोगों को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। हम बार-बार लोगों से आग्रह कर रहे हैं कि भीड़ में जाने पर मास्क अवश्य लगाएं। सैनिटाइजर का प्रयोग करें।
पश्चिम बंगाल में रविवार को कोविड-19 के 723 नए मामले आए और 11 लोगों की मौत हो गयी। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी एक बुलेटिन में इसकी जानकारी दी गयी है। बुलेटिन के मुताबिक नए मामले के साथ संक्रमितों की संख्या 15,98,488 हो गयी है। संक्रमण से 11 और लोगों की मौत होने से मृतकों की संख्या 19,226 हो गई है। उत्तर 24 परगना में चार, कोलकाता, दक्षिण 24 परगना में दो दो लोगों की मौत हो गयी।
दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और हावड़ा में एक-एक व्यक्ति की मौत हुई। राज्य में 8,029 उपचाराधीन मरीज हैं। पिछले 24 घंटे में 774 लोग स्वस्थ हो गए। बुलेटिन के अनुसार संक्रमण के सबसे ज्यादा 205 मामले कोलकाता से आए। राज्य में अब तक 15,71,295 लोग संक्रमण मुक्त हो चुके हैं। संक्रमण दर 2.40 प्रतिशत और ठीक होने की दर 98.30 प्रतिशत है। शनिवार को कोविड-19 के लिए 30,124 नमूनों की जांच के साथ अब तक 1,94,69,502 नमूनों की जांच की जा चुकी है।

अगले दो साल में पेट्रोल गाड़ियों के बराबर मूल्य पर ही बिकेंगे इलेक्ट्रिक वाहन: नितिन गडकरी

नयी दिल्ली :  यदि आप इलेक्ट्रिक वाहन खरीदना चाहते हैं और कीमत की वजह से पीछे हट रहे हैं तो फिर आपके लिए यह अहम खबर है। केंद्रीय परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने अगले दो साल में पेट्रोल और इलेक्ट्रिक वाहनों की कीमत बराबर होने का दावा किया है। उनका कहना है कि दो साल बाद पेट्रोल और इलेक्ट्रिक गाड़ियां एक ही कीमत पर बिकनी शुरू हो जाएंगी। सस्टेनेबिलिटी फाउंडेशन नाम की संस्था की ओर से आयोजित वेबिनार में बोलते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों की जीएसटी महज 5 फीसदी है, जबकि पेट्रोल वाहनों पर यह काफी ज्यादा है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों में सबसे ज्यादा कीमत लिथियम बैटरी की पड़ रही है। इसे भी जल्दी ही कम करने का प्रयास किया जाएगा। ऐसे होने पर कीमतों में कमी आएगी और पेट्रोल वाहनों के बराबर रेट पर ही इलेक्ट्रिक गाड़ियां भी मिल सकेंगी। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लिथियम बैटरी की कुल जरूरत का 81 फीसदी उत्पादन स्थानीय स्तर पर ही किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसके विकल्प को लेकर भी रिसर्च की जा रही है और जल्दी ही इस दिशा में कोई सुधार देखने को मिलेगा। उन्होंने कहा कि मेरा सपना है कि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों का हब बने। उन्होंने कहा कि इसीलिए मैंने मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू को आमंत्रित किया है।

सड़कों के किनारे बन रहे हैं चार्जिंग पॉइंट्स
नितिन गडकरी ने कहा कि हमने दोपहिया वाहनों के मामले में लीड ली है। भारत की बजाज और हीरो जैसी कंपनियां अपने इलेक्ट्रिक टूवीलर्स को एक्सपोर्ट भी कर रही हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों के चार्जिंग पॉइंट्स की कमी के सवाल पर उन्होंने कहा कि अगले दो साल में देश भर में इनकी संख्या में इजाफा किया जाएगा। उन्होंने कहा कि रोड के किनारे और मार्केट वाले इलाकों में फिलहाल 350 स्थानों पर चार्जिंग पॉइंट्स बनाने का काम चल रहा है। इसके अलावा पेट्रोल पंपों को भी परमिशन दी जा रही है कि वे इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग पॉइंट्स लगा सकें।

गडकरी ने बताया, इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर अपना ‘प्लान 2030’
उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने के लिए अपने पॉइंट्स हैं। नितिन गडकरी ने कहा कि देश में इलेक्ट्रिक वाहन इंडस्ट्री तेजी से बढ़ रही है और आने वाले दिनों में कीमतों में कमी के चलते इसके इस्तेमाल में इजाफा देखने को मिलेगा। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य है कि 2030 तक 30 फीसदी प्राइवेट कार, 70 फीसदी तक कमर्शियल कार और 40 फीसदी बसें इलेक्ट्रिक हो जाएं।

कोलकाता फिल्म महोत्सव 7 व पुस्तक मेला 31 जनवरी से होगा शुरू

कोलकाता : कोलकाता अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव अगले साल सात जनवरी और कलकत्ता पुस्तक मेला 31 जनवरी से शुरू होगा। फिल्म महोत्सव 14 जनवरी तक चलेगा। राज्य सरकार ने सोमवार को इसकी घोषणा की। गौरतलब है कि पिछले साल कोरोना के कारण पुस्तक मेले का आयोजन नहीं हो सका था। इस बार पुस्तक मेले की थीम देश ‘बांग्लादेश’ होगा। 2019 में पुस्तक मेले का थीम देश ग्वाटेमाला था।
अप्रैल में राज्य में विश्व बांग्ला व्यापार सम्मेलन
अगले साल अप्रैल में राज्य में विश्व बांग्ला व्यापार सम्मेलन भी आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन संभवत: न्यूटाउन स्थित विश्व बांग्ला कांवेंशन सेंटर में ही आयोजित होगा। इस बाबत एक विशेष समिति का गठन किया गया है। कमेटी में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अलावा राज्य के मुख्य सचिव हरिकृष्ण द्विवेदी भी शामिल हैं।
दो साल सम्मेलन का आयोजन नहीं हुआ
उद्योगपतियों को जल्द ही इसकी जानकारी दी जाएगी। गौरतलब है कि पिछले दो साल कोरोना के कारण सम्मेलन का आयोजन नहीं हुआ। इसका मुख्य लक्ष्य राज्य में निवेश आकर्षित करना है। इससे पहले राज्य सरकार द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के उद्योगपति और औद्योगिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। 2022 के सम्मेलन में भी देश-विदेश के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाएगा। इस बार का लक्ष्य इस सम्मेलन को पहले की तुलना में बड़े पैमाने पर आयोजित करना है। हालांकि, इस सम्मेलन के आयोजन से अब तक सरकार को अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।