Saturday, March 14, 2026
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दीपावली विशेष : उत्तराखंड के कुमाऊं में ‘च्यूड़ा बग्वाल’ के तौर पर मनायी जाती थी दीपावली

समय के साथ हमारे परंपरागत त्योहार अपना स्वरूप बदलते जाते हैं, और बहुधा उनका परंपरागत स्वरूप याद ही नहीं रहता। आज जहां दीपावली का अर्थ रंग-बिरंगी बिजली की लड़ियों से घरों-प्रतिष्ठानों को सजाना, महंगी से महंगी आसमानी कान-फोड़ू ध्वनियुक्त आतिषबाजी से अपनी आर्थिक स्थिति का प्रदर्शन करना और अनेक जगह सामाजिक बुराई-जुवे को खेल बताकर खेलने और दीपावली से पूर्व धनतेरस पर आभूषणों और गृहस्थी की महंगी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं को खरीदने के अवसर के रूप में जाना जाता है, ऐसा अतीत में नहीं था। खासकर कुमाऊं अंचल में दीपावली का पर्व मौसमी बदलाव के दौर में बरसात के बाद घरों को साफ-सफाई कर गंदगी से मुक्त करने, घरों को परंपरागत रंगोली जैसी लोक कला ‘ऐपण’ से सजाने तथा तेल अथवा घी के दीपकों से प्रकाशित करने का अवसर था। मूलतः ‘च्यूड़ा बग्वाल” के रूप से मनाए जाने वाले इस त्योहार पर कुमाऊं में बड़ी-बूढ़ी महिलाएं नई पीढ़ी को सिर में नए धान से बने ‘च्यूड़े’ रखकर आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने जैसी शुभाशीषें देती थीं। विषम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद प्रकृति एवं पर्यावरण से जुड़ी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाला पूरा उत्तराखंड प्रदेश और इसका कुमाऊं अंचल अतीत में धन-धान्य की दृष्टि से कमतर ही रहा है। यहां आजादी के बाद तक अधिसंख्य आबादी दीपावली पर खील-बताशों, मोमबत्तियों तक से अनजान थी।

पटाखे भी यहां बहुत देर से आए। बूढ़े-बुजुर्गों के अनुसार गांवों में दीपावली के दीए जलाने के लिए कपास की रुई भी नहीं होती थी। अलबत्ता, लोग नए खद्दर का कपड़ा लाते थे, और उसकी कतरनों को बंटकर दीपक की बत्तियां बनाते थे। दीपावली से पहले घरों को आज की तरह आधुनिक रंगों, एक्रेलिक पेंट या डिस्टेंपर से नहीं, कहीं दूर-दराज के स्थानों पर मिलने वाली सफेद मिट्टी-कमेट से गांवों में ही मिलने वाली बाबीला नाम की घास से बनी झाड़ू से पोता जाता था। इसे घरों को ‘उछीटना’ कहते थे। घरों के पाल (फर्श) गोबर युक्त लाल मिट्टी से हर रोज घिसने का रिवाज था। दीपावली पर यह कार्य अधिक वृहद स्तर पर होता था। गेरू की जगह इसी लाल मिट्टी से दीवारों को भी नीचे से करीब आधा फीट की ऊंचाई तक रंगकर बाद में उसके सूखने पर भिगोए चावलों को पीसकर बने सफेद रंग (बिस्वार) से अंगुलियों की पोरों या नीबू, नारंगी आदि की पत्तियों से ‘बसुधारे’ निकाले जाते थे। फर्श तथा खासकर द्वारों पर तथा चौकियों पर अलग-अलग विशिष्ट प्रकार के लेखनों से लक्ष्मी चौकी व अन्य आकृतियां ऐपण के रूप में उकेरी जाती थीं, जो कि अब प्रिंटेड स्वरूप में विश्व भर में पहचानी जाने लगी हैं। द्वार के बाहर आंगन तक बिस्वार में हाथों की मुट्ठी बांधकर छाप लगाते हुए माता लक्ष्मी के घर की ओर आते हुए पदचिन्ह इस विश्वास के साथ उकेरे जाते थे, कि माता इन्हीं पदचिन्हों पर कदम रखती हुई घर के भीतर आएंगी। दीपावली के ही महीने कार्तिक मास में द्वितिया बग्वाल मनाने की परंपरा भी थी। जिसके तहत इसी दौरान पककर तैयार होने वाले नए धान को भिगो व भूनकर तत्काल ही घर की ऊखल में कूटकर ‘च्यूड़े’ बनाए जाते थे, और इन च्यूड़ों को बड़ी-बुजुर्ग महिलाएं अपनी नई पीढ़ी के पांव छूकर शुरू करते हुए घुटनों व कंधों से होते हुए सिर में रखते थे। साथ में आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने तथा इस दिन को हर वर्ष सुखपूर्वक जीने की शुभाशीषें देते हुए कहती थीं, ‘लाख हरयाव, लाख बग्वाल, अगाश जस उच्च, धरती जस चौड़, जी रया, जागि रया, यो दिन यो मास भेटनै रया।’ कहते हैं कि आकाश की तरह ऊंचे और धरती की तरह चौड़े होने की यह आशीषें सबसे पहले भगवान राम को भी दी गयी थीं। इसी दौरान गोवर्धन पड़वा पर घरेलू पशुओं को भी नहला-धुलाकर उन पर गोलाकार गिलास जैसी वस्तुओं से सफेद बिस्वार के गोल ठप्पे लगाए जाते थे। उनके सींगों को घर के सदस्यों की तरह सम्मान देते हुए तेल से मला जाता था।

यहां महालक्ष्मी के साथ इसलिए विष्णु की जगह विराजते हैं गणेश
लोक चित्रकार एवं परंपरा संस्था के प्रमुख बृजमोहन जोशी के अनुसार पहाड़ पर दिवाली छोटी दिवाली से बूढ़ी दिवाली तक तीन स्तर पर मनाई जाती है। यहां कोजागरी पूर्णिमा कही जाने वाली शरद पूर्णिमा को छोटी दिवाली माता लक्ष्मी के बाल स्वरूप के साथ मनाई जाती है। कोजागरी पूर्णिमा से बूढ़ी दिवाली यानी हरिबोधनी एकादसी तक घरों के बाहर पितरों यानी दिवंगत पूर्वजों के लिये आकाशदीप जलाया जाता है। इस दौरान चूंकि लक्ष्मीपति भगवान विष्णु चातुर्मास के लिये क्षीरसागर में निद्रा में होते हैं, इसलिए महालक्ष्मी के पूजन पर माता लक्ष्मी के साथ विष्णु की जगह प्रथम पूज्य गणेश की पूजा होती है, तथा कुमाऊं की प्रसिद्ध डिगारा शैली में गन्ने से बनाई जाने वाली लक्ष्मी को घूंघट में बनाकर कुमाऊं की परंपरागत ऐपण विधा में बनने वाली लक्ष्मी चौकी पर कांशे की थाली में रखा जाता है। साथ ही घर के छज्जे से गन्ने लटकाए जाते हैं, ताकि देवगण इन्हें सीढ़ी बनाकर घर प्रवेश करें। महालक्ष्मी पूजन के लिये प्रयुक्त कुल्हड़, ऊखल व तुलसी के बरतनों में भी अलग तरह के ऐपण बनाए जाते हैं। वहीं बूढ़ी दिवाली को चूंकि विष्णु भगवान जाग जाते हैं, इसलिये इस दिन लक्ष्मी के साथ विष्णु के चरण भी ऐपण के माध्यम से बनाए जाते हैं।

धनतेरस पर 50 हजार करोड़ रुपये के सोना-चांदी के व्यापार का अनुमान

– सोना और चांदी के बढ़े दामों का बाजार में असर नहीं
– सिक्कों की भारी मांग

नयी दिल्‍ली। दीपावली के त्‍योहार पर इस वर्ष दिल्ली सहित देशभर के बाजारों में बड़ी धूमधाम है। ग्राहकों का लंबा तांता बाजारों की ओर रोज रूख कर रहा है। कारोबारी संगठन कॉन्‍फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) तथा इसके ज्वेलरी विंग ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन (एआईजेजीएफ) ने धनतेरस के अवसर पर देशभर में करीब 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक के सोने-चांदी के व्यापार होने का अनुमान जताया है। कैट एवं एआईजेजीएफ ने शुक्रवार को एक बयान में बताया कि देशभर के सर्राफा बाजारों में किए गए धनतेरस सर्वेक्षण के अनुसार इस वर्ष धनतेरस पर सोने–चांदी के सिक्कों की बिक्री में जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है, जबकि स्वर्ण आभूषणों की बिक्री में कुछ गिरावट का अनुमान है। लंबे समय के बाद व्यापारियों और ग्राहकों के चेहरे पर खुशी की चमक देखने को मिल रही है। शनिवार को धनतेरस का त्‍योहार मनाया जा रहा है। इस दिन सोना चांदी, बर्तन और रसोई उपकरण को खरीदना शुभ माना जाता है। कैट के राष्ट्रीय महामंत्री एवं सांसद प्रवीन खंडेलवाल और एआईजेजीएफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंकज अरोरा ने बताया कि सोना–चांदी के रिकॉर्ड ऊंचे दामों के चलते मध्यम और उच्च वर्ग के ग्राहक निवेश के रूप में अब ठोस सिक्कों को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं। ज्वैलरी की मांग में कमी दर्ज की जा रही है। विवाह सीजन के खरीदार भी अब भारी आभूषणों की जगह हल्के गहनों को प्राथमिकता दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष दीपावली के दौरान सोने की कीमत करीब 80 हजार रुपये प्रति 10 ग्राम थी, लेकिन इस वर्ष बढ़कर 1,30,000 रुपये प्रति 10 ग्राम को पार कर गई है, जो करीब 60 फीसदी की वृद्धि है। इसी प्रकार चांदी की कीमतें 2024 में 98 हजार रुपये प्रति किलोग्राम थीं, जो अब 1,80,000 रुपये प्रति किलोग्राम के पार पहुंच गई, इसमें लगभग 55 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन बढ़ी कीमतों के चलते निवेशक बड़ी संख्या में सर्राफा बाजार की ओर आकर्षित हुए हैं। खंडेलवाल के अनुसार धनतेरस से दीपावली तक के त्योहारी सीजन में सबसे अधिक मांग बुलियन और सिक्कों की रहने की संभावना है। अरोरा ने बताया कि देशभर में करीब 5 लाख छोटे-बड़े ज्वैलर्स सक्रिय हैं। उन्‍होंने कहा कि यदि प्रत्येक ज्वैलर औसतन 50 ग्राम सोना बेचता है, तो कुल मिलाकर लगभग 25 टन सोने की बिक्री होगी, जिसकी मौजूदा भाव से अनुमानित कीमत 32,500 करोड़ होगी। खंडेलवाल एवं अरोरा ने कहा कि बदलते बाजार रुझानों को देखते हुए ज्वैलर्स अब फैंसी ज्वैलरी और चांदी के सिक्कों जैसे नए विकल्पों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं, ताकि ग्राहकों की बदलती मांग के अनुरूप व्यापार को गति दी जा सकती है।

दीपावली विशेष : इस मंदिर में एक साथ विराजमान हैं मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर

धनतेरस और दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। दोनों को ही धन का देवता माना जाता है, लेकिन तमिलनाडु में एक ऐसा मंदिर है, जहां मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर एक साथ भक्तों को दर्शन देते हैं। यह दक्षिण भारत का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर एक साथ विराजमान हैं। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के रत्नमंगलम और वंडालूर के पास श्रीलक्ष्मी कुबेर मंदिर है, जहां दीपावली के दिन मंदिर को फूलों से सजाकर मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर को प्रसन्न करने के लिए खास अनुष्ठान किए जाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन जो भक्त मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करता है, तो उसकी झोली धन-धान्य और समृद्धि से भर जाती है। दीपावली और धनतेरस के मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखी जाती है, जो अपनी आर्थिक तंगी से निकलने के लिए मां लक्ष्मी के दर पर आते हैं।
मंदिर में मां लक्ष्मी और भगवान कुबेर की प्रतिमा काले पत्थर से बनाई गई है, और मंदिर में भगवान कुबेर अकेले नहीं बल्कि अपनी पत्नी सिद्धरानी के साथ विराजित हैं। तीनों प्रतिमाओं के पास धन को आकर्षित करने वाली मछली और कछुए की प्रतिमा रखी गई है। मछली और कछुए को धन-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, लोग आमतौर पर भी घर में क्रिस्टल का कछुआ रखते हैं। ये भी कहा जाता है कि मछलियों को आटा खिलाने से धन में वृद्धि होती है और घर सुख-समृद्धि से भर जाता है।
मंदिर की मान्यता है कि भगवान कुबेर को प्रसन्न करने के लिए हरे रंग का इस्तेमाल होता है। भक्त हरे रंग का कपड़ा भी भगवान कुबेर को अर्पित करते हैं और हरी पत्तियां और फूल भी चढ़ाते हैं। वहीं, मां लक्ष्मी को कमल के फूल सबसे ज्यादा प्रिय हैं और पूजा में कमल के फूल जरूर रखे जाते हैं। पर्यटन की दृष्टि से भी मंदिर बहुत खास है क्योंकि मंदिर 4,000 वर्ग फुट में बना है और मंदिर को बनाने में 30 लाख रुपये से ज्यादा लगे हैं। मंदिर का निर्माण राजलक्ष्मी कुबेर ट्रस्ट ने कराया है, जो आज भी मंदिर की देखरेख कर रहा है।

(साभार – खास खबर)

दीपावली विशेष यहां धनतेरस पर होती है अनोखी पूजा

राजस्थान की धरती पर ऐसे कई स्थान हैं जहाँ इस पर्व की पूजा एक अद्वितीय रूप ले लेती है। यह केवल सोना-चांदी की खरीदारी का त्योहार नहीं, बल्कि मां लक्ष्मी, भगवान धन्वंतरि और कुबेर देवता की आराधना का उत्सव है जो प्रत्येक शहर व कस्बे में अपना अलग रंग दिखाता है। अगर आप इस सांस्कृतिक धनतेरस का असली अनुभव चाहते हैं, तो 18 अक्टूबर 2025 के आसपास राजस्थान के प्रमुख शहरों की यात्रा आपकी सूची में होनी चाहिए। जयपुर, नाथद्वारा, उदयपुर, जोधपुर और पुष्कर—ये वो केंद्र हैं जहाँ इस दिन जीवंत परंपराएँ जीवित होती हैं और दर्शन के योग्य होती हैं।

जयपुर
जयपुर की गलियों में धनतेरस की शाम “सुवर्ण दीपदान” की परंपरा से जगमगा उठती है। लक्ष्मी नारायण मंदिर, जिसे बिड़ला मंदिर के नाम से भी जानते हैं, इस दिन हजारों दीयों की रोशनी में नहा जाता है। यहाँ भक्त चांदी या पीतल के बर्तन में दीप जला कर माँ लक्ष्मी का स्वागत करते हैं, यह मानते हुए कि इस अर्चना से पूरे वर्ष घर में समृद्धि बनी रहेगी। रात होते ही पूरी राजधानी सुनहरी रोशनी में बदल जाती है, और वातावरण दिव्य हो उठता है।

नाथद्वारा
नाथद्वारा में धनतेरस का महत्व भक्तिभाव से जुड़ा है। श्रीनाथजी मंदिर में इस दिन चांदी के सिक्के अर्पित करने की परंपरा है। भक्त पुराने सिक्के बदलकर नए चढ़ाते हैं, यह मानते हुए कि नए सिक्कों का अर्पण आने वाला वर्ष शुद्ध और शुभ बनाता है। यह एक पूजा ही नहीं, बल्कि श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक भी है।

उदयपुर
उदयपुर “झीलों की नगरी” होने के नाते धनतेरस पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाता है। यहां भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा के साथ-साथ झीलों पर दीपोत्सव का आयोजन होता है। पिचोला झील और फतेहसागर की जलधाराओं पर तैरते हुए दीपों का दृश्य मन को मोह लेता है। इस अवसर पर आरोग्य पूजा भी होती है, जिसमें लोग अपने परिवार की स्वास्थ्य-कल्याण की कामना करते हैं।

जोधपुर
जोधपुर में मेहरानगढ़ किले के आसपास के मंदिरों में धनतेरस को कुबेर पूजन की परंपरा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पुराने शासकों ने इसी दिन राजकोष की पूजा प्रारंभ की थी। आज भी व्यापारी समुदाय नए खातों या बहीखातों का पूजा-अर्चना करते हैं, जिसे “खाता पूजन” कहा जाता है। इस दिन व्यापार से जुड़ी शुभता की कामना करते हुए आर्थिक समृद्धि की प्रार्थना होती है।

पुष्कर
पुष्कर, भगवान धन्वंतरि को समर्पित असाधारण मंदिरों वाला स्थल, धनतेरस पर श्रद्धालुओं का केंद्र बन जाता है। यहां दूर-दूर से लोग आते हैं और आरोग्य यज्ञ, दीपदान, स्वास्थ्य पूजा जैसे अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। कहा जाता है कि इस पूजा से जीवन में संतुलन, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

दार्जिलिंग की पहाड़ियों में घट रहा वन क्षेत्र

-राज्य पर केंद्र की चेतावनी नजरअंदाज करने का आरोप
कोलकाता । पश्चिम बंगाल सरकार पर आरोप है कि उसने दार्जिलिंग की पहाड़ियों में वर्ष 2011 से लगातार घटते वन क्षेत्र को लेकर केंद्र सरकार की चेतावनियों को अनदेखा किया। इस बीच, हाल ही में हुई भारी वर्षा और भूस्खलन के बाद इस क्षेत्र में पारिस्थितिक असंतुलन को लेकर राज्य सरकार पर सवाल और गहरे हो गए हैं। विपक्षी दलों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने कहा है कि अनियंत्रित निर्माण और रियल एस्टेट गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई ने दार्जिलिंग की संवेदनशील पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। वन सर्वेक्षण विभाग की वर्ष 2023 की नवीनतम रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि दार्जिलिंग जिले में वन क्षेत्र में तेजी से कमी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011 में जहां जिले का कुल वन क्षेत्र लगभग दो हजार दो सौ उन्नासी वर्ग किलोमीटर था, वहीं वर्ष 2023 में यह घटकर लगभग एक हजार चार सौ दो वर्ग किलोमीटर रह गया। इस अवधि में वन क्षेत्र में लगभग 31 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वन क्षेत्र में यह कमी सभी श्रेणियों—अत्यंत घना वन, मध्यम घना वन और खुला वन—में दर्ज की गई है। अत्यंत घने वन क्षेत्र में सबसे अधिक गिरावट आई है, जो वर्ष 2011 की तुलना में लगभग आधा रह गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह गिरावट केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और अंधाधुंध विकास नीति का परिणाम है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि यदि राज्य सरकार ने वन संरक्षण को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में दार्जिलिंग की पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति हो सकती है। उनका कहना है कि पहाड़ी इलाकों में निर्माण गतिविधियों पर नियंत्रण और वनों की पुनर्स्थापना अब तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।

ब्रिगेड परेड ग्राउंड में पांच लाख लोग एक साथ करेंगे गीता का पाठ

कोलकाता। गीता पाठ को लेकर एक बार फिर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में विश्व रिकॉर्ड बनाने जा रहा है। इस ऐतिहासिक धार्मिक आयोजन के तहत कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आगामी 7 दिसंबर काे इस बार पांच लाख लोगाें के साथ सामूहिक गीता पाठ का आयोजन करने की तैयारी है। इस संबंध में शनिवार को भारत सेवाश्रम संघ के श्रीनिधि सभा गृह में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में इस कार्यक्रम की जानकारी सनातन संस्कृति संसद की ओर से दी गई। पत्रकार सम्मेलन में स्वामी ज्ञानानंद महाराज, प्रदीप्तानंद महाराज और निर्गुणानंद ब्रह्मचारी उपस्थित थे। बताया गया कि यह आयोजन 7 दिसंबर को होगा और इसके लिए प्रशासनिक तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। आयोजकों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, देश के सभी मुख्यमंत्रियों, और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को आमंत्रित करने की घोषणा की है। ज्ञानानंद महाराज ने कहा, “भगवद गीता किसी एक धर्म या जाति के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक है। यह शांति और सद्भावना का संदेश देती है। मानसिक क्लेश और जीवन के संघर्षों से निपटने के लिए गीता का अध्ययन आवश्यक है। इसीलिए इतनी भारी जनसमूह के बीच गीता का सामूहिक पाठ होगा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आयोजन किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और सामाजिक सद्भावना को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। कहा कि पांच लाख कंठों से गीता पाठ किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि बंगाल की गौरवपूर्ण परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए है। स्वामी जी ने बताया कि इस बार गीता पाठ के लिए समान ड्रेस कोड रखा गया है ताकि एकरूपता रहे। महिलाओं के लिए लाल किनारी वाली साड़ी और हाथ में शंख, जबकि पुरुषों के लिए धोती-पंजाबी। किसी तरह की पंजीकरण प्रक्रिया नहीं होगी और हर व्यक्ति इस आयोजन में शामिल हो सकेगा। कार्तिक महाराज ने कहा कि गीता विश्वकल्याण का मार्ग है। आज के युवा समाज में जो नैतिक और चारित्रिक पतन देखा जा रहा है, उसका समाधान गीता में ही निहित है। सभी के उद्धार का मार्ग गीता दिखाती है। उन्होंने बताया कि गीता पाठ की परंपरा नवद्वीप धाम से शुरू हुई थी और अब यह बंगाल के हर जिले तक पहुंच चुकी है। गीता की लोकप्रियता इतनी बढ़ी है कि पिछले 100 वर्षों में इतनी अधिक प्रतियां नहीं बिकीं जितनी हाल के महीनों में बिकी हैं। स्वामी निर्गुणा नंद ने कहा कि यह आयोजन न केवल एक धार्मिक उत्सव होगा, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को नई ऊंचाई देने का प्रतीक भी बनेगा। उल्लेखनीय है कि, 24 दिसंबर, 2023 को इसी तरह का आयोजन ब्रिगेड परेड मैदान में हुआ था, जिसमें एक लाख लोगों ने सामूहिक तौर पर गीता पाठ किया था। हालांकि उस समय कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी उपस्थित नहीं हो पाए थे।

बंगाल में ई-रिक्शा टोटो का पंजीकरण हुआ अनिवार्य

– मालिकों के लिए 30 नवंबर तक की समयसीमा तय

कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य में ई-रिक्शा, जिन्हें आमतौर पर ‘टोटो’ कहा जाता है, के संचालन को नियमित करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। परिवहन विभाग ने सभी ई-रिक्शाओं का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया है। इसके लिए वाहन मालिकों को 30 नवंबर तक अनिवार्य रूप से प्रक्रिया पूरी करनी होगी। परिवहन विभाग की ओर से शनिवार को जारी विज्ञप्ति में बताया गया है कि सभी ई-रिक्शाओं को ‘डिजिटल अस्थायी टोटो एनरोलमेंट नंबर’ (टीटीईएन) लेना होगा। यह प्रक्रिया कल सोमवार 13 अक्टूबर से शुरू होगी। विभाग के अनुसार, एक नया ऑनलाइन पोर्टल तैयार किया गया है, जिसके माध्यम से सभी पंजीकृत ई-रिक्शाओं को क्यूआर कोड से ट्रैक किया जाएगा। इससे अवैध टोटो संचालन पर रोक लगेगी और वाहनों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकेगी। परिवहन सचिव सौमित्र मोहन ने कहा कि राज्य सरकार बिना पंजीकरण वाले और असुरक्षित ई-रिक्शाओं पर सख्त कार्रवाई कर रही है। उन्होंने बताया कि सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि स्थानीय गैराजों में तैयार किए गए गैर-पंजीकृत बैटरी चालित रिक्शाओं की पहचान कर उन्हें जब्त किया जाए। उन्होंने कहा कि कई ई-रिक्शा केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम 1989 के मानकों का पालन नहीं करते। ऐसे वाहनों को बनाने या जोड़ने वाले यूनिटों को नोटिस जारी कर सील किया जाएगा। केवल वही यूनिट संचालन कर सकेंगे जिनके पास निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप लाइसेंस होगा। परिवहन विभाग ने स्पष्ट किया कि जो ई-रिक्शा निर्धारित प्रोटोटाइप के अनुरूप नहीं बनाए गए हैं, उन्हें राज्य या राष्ट्रीय राजमार्गों पर चलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। स्थानीय प्रशासन को अपने क्षेत्र में चलने वाले सभी ई-रिक्शाओं की सूची तैयार करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें मालिकों के नाम और निर्धारित रूट का विवरण शामिल होगा। वहीं, जिन ई-रिक्शाओं को मान्यता नहीं मिली है, उनके मालिकों को दो वर्ष का समय दिया जाएगा ताकि वे अपने वाहन बदल सकें। विभाग ने यह भी कहा कि स्थानीय स्तर पर निर्मित या डीलर्स एसोसिएशन अथवा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की मंजूरी प्राप्त ई-रिक्शा भी तब तक नहीं चल सकेंगे, जब तक उन्हें मोटर वाहन प्राधिकरण की स्वीकृति और एचएसआरपी फिटमेंट नहीं मिल जाता। बिना पंजीकरण वाले ई-रिक्शा मालिकों को छह महीने के अस्थायी प्राधिकरण नंबर के लिए हजार रुपये का शुल्क देना होगा, जबकि आगे के नवीनीकरण के लिए 100 का शुल्क तय किया गया है।

ईआरओ व बीएलओ चयन में नियमों से कोई समझौता नहीं : चुनाव आयोग

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया 15 अक्टूबर के बाद शुरू होने की संभावना है। इसी बीच भारत निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में निर्वाचन अधिकारियों, विशेषकर बूथ स्तर अधिकारी (बीएलओ) और निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) के चयन में तय मानकों से किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव मनोज पंत को एक नया पत्र भेजकर इन पदों के चयन से जुड़ी विस्तृत दिशानिर्देशों को दोहराया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय के सूत्रों ने शनिवार को इसकी पुष्टि की है।
निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार, बीएलओ के चयन में प्राथमिकता स्थायी राज्य सरकारी कर्मचारियों को दी जानी चाहिए, जिनमें सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी शामिल हैं। केवल उन्हीं परिस्थितियों में संविदा (ठेका) कर्मचारियों को बीएलओ नियुक्त करने की अनुमति दी जा सकती है, जब किसी जिले या क्षेत्र में पर्याप्त संख्या में स्थायी कर्मचारी उपलब्ध न हों। हालांकि, इस विकल्प को अपनाने से पहले संबंधित जिले के जिलाधिकारी —जो जिला निर्वाचन अधिकारी भी होते हैं —को यह स्पष्ट कारण बताना होगा कि संविदा कर्मचारी की नियुक्ति क्यों आवश्यक है और इस पर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा। इसी तरह, ईआरओ का चयन केवल पश्चिम बंगाल सिविल सर्विस (कार्यकारी) के अधिकारियों में से किया जा सकेगा। ये अधिकारी कम से कम उपमंडलाधिकारी (एसडीएम), उपमंडल अधिकारी या ग्रामीण विकास अधिकारी के पद से नीचे के नहीं होने चाहिए। वहीं, पश्चिम बंगाल भाजपा इकाई ने लंबे समय से बीएलओ के चयन में अनियमितताओं का आरोप लगाया है। शुक्रवार को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने निर्वाचन आयोग का ध्यान ईआरओ चयन में कथित गड़बड़ियों की ओर दिलाया। अधिकारी ने कहा कि कई मामलों में वरिष्ठता के सिद्धांतों की अनदेखी की गई है। उन्होंने 226 ऐसे ईआरओ की सूची भी सौंपी है, जिनकी नियुक्ति उनके अनुसार आयोग के तय दिशा-निर्देशों के विपरीत की गई। अधिकारी ने आरोप लगाया कि इस तरह की अनियमितताओं ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

वर्षों बाद दिवाली पर दिल्ली-एनसीआर में फूटेंगे पटाखे

– सुप्रीम कोर्ट ने दी अनुमति 
नयी दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाली के दौरान पांच दिनों के लिए दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पटाखों की बिक्री और फोड़ने की अनुमति दी जाएगी। यह राजधानी में वर्षों बाद कानूनी आतिशबाजी के साथ पहला त्यौहारी सीजन हो सकता है, हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञों और न्यायमित्र ने प्रवर्तन खामियों को लेकर चिंता जताई है। मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला तब लिया जब केंद्र सरकार ने एक प्रस्ताव दिया कि सिर्फ “ग्रीन पटाखे” (जो कम प्रदूषण करते हैं) को ही बेचने और फोड़ने की इजाजत दी जाए। ये पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान द्वारा अनुमोदित हैं। पीठ ने कहा: “फिलहाल, हम इसे दिवाली के पांच दिनों के दौरान ट्रायल के आधार पर अनुमति देंगे। यह टिप्पणी तब आई जब केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में एक विस्तृत प्रवर्तन योजना पेश की। इस में कहा गया है कि पटाखों की बिक्री सिर्फ लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों को ही करने दी जाएगी, और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर पटाखों की बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित होगी। सरकार ने वादा किया कि पारंपरिक पटाखों (पुराने प्रकार के पटाखे) पर प्रतिबंध जारी रहेगा। हालांकि, केंद्र ने यह छूट सभी त्योहारों पर लागू की जाने की मांग की। सरकार ने पटाखे फोड़ने के लिए सख्त समय सीमा प्रस्तावित की: दिवाली और प्रमुख त्योहारों पर रात 8 बजे से 10 बजे तक। नए साल की पूर्व संध्या पर रात 11.55 बजे से 12.30 बजे तक। और गुरुपर्व के लिए सुबह और शाम एक घंटे का समय। इसके अलावा, सरकार ने कहा कि शादियों और निजी समारोहों में भी पटाखों के सीमित उपयोग की अनुमति दी जा सकती है। सुनवाई के दौरान, मेहता ने अदालत से दिवाली के समय में ढील देने का अनुरोध किया और तर्क दिया कि बच्चों को दो घंटे के उत्सव तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “दिवाली कुछ ही दिनों की बात है। बच्चों को धूमधाम से दिवाली मनाने दें।” विशेषज्ञों ने इस तरह के कदम पर बार-बार चिंता जताई। उन्होंने कहा कि 2018 से 2020 के बीच जब “ग्रीन पटाखों” की नीति लागू की गई थी, तब भी प्रदूषण स्तर में कोई कमी नहीं आई थी। उनका तर्क है कि जमीनी स्तर पर ग्रीन पटाखे और पारंपरिक पटाखों में फर्क करना लगभग असंभव है। विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे और बूढ़े वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि मौसम और हवा की स्थिति, और कृषि अपशिष्ट जलाना, ज्यादातर पंजाब में, वर्ष के इस समय क्षेत्र में वायु प्रदूषण में वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं।

 

आईआईएसईआर कोलकाता ने कैंसर से लड़ने के लिए विकसित किया ‘फ्रेंडली बैक्टीरिया’

कोलकाता। भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) कोलकाता की एक टीम ने कैंसर के इलाज में एक नई और प्रभावशाली पहल करते हुए इंजीनियर्ड प्रोबायोटिक्स तैयार किए हैं। इस परियोजना का नाम रिसेट (रिसेट – ट्यूमर माइक्रो एनवायरनमेंट की दमनकारी परिस्थितियों को पुनःसृजित करना) रखा गया है। इसका उद्देश्य केवल ट्यूमर का पता लगाना ही नहीं, बल्कि उसकी गतिविधियों को बाधित कर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को पुनः सक्रिय करना भी है। विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर अक्सर टी रेगुलेटरी कोशिकाओं (टीरेग्स) के पीछे छिपकर शरीर की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली को दबा देता है, जिससे रासायनिक और प्रतिरक्षा आधारित उपचार कम प्रभावी साबित होते हैं। आईआईएसईआर कोलकाता की टीम ने ऐसे ‘फ्रेंडली बैक्टीरिया’ तैयार किए हैं, जो ट्यूमर की मौजूदगी का पता लगा सकते हैं और टीरेग्स की गतिविधियों को बाधित कर सकते हैं। इन बैक्टीरिया को जीवित दवाओं के रूप में तैयार किया गया है जो सीधे शरीर के अंदर कैंसर से लड़ते हैं। टीम ने उपचार की प्रभावशीलता पर नजर रखने के लिए एक निगरानी प्रणाली भी विकसित की है, जिससे उपचार और निगरानी एक साथ संभव हो सके। यह कदम कैंसर उपचार में सटीक और प्रभावी इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति है। टीम ने प्रयोगशाला की सीमाओं से परे जाकर ऑन्कोलॉजिस्ट, सर्जन, कैंसर सर्वाइवर, स्वयंसेवी संगठन और मरीज सहायता समूहों के साथ सक्रिय संवाद किया। उन्होंने स्कूलों में कैंसर जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा अभियान जैसे सामाजिक अभियान भी चलाए। इन प्रयासों से यह सुनिश्चित किया गया कि तैयार की गई थेरेपी वैज्ञानिक रूप से मजबूत, नैतिक रूप से जिम्मेदार और सामाजिक रूप से प्रासंगिक हो। टीम के एक सदस्य ने बताया “हमारा काम यह दर्शाता है कि लक्षित माइक्रोबियल थेरेपी कैंसर उपचार की पूरी नई दिशा खोल सकती है। टीरेग्स मार्ग को लक्षित करके हम उपचार को सुरक्षित, प्रभावी और सभी के लिए उपलब्ध बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।” आईआईएसईआर कोलकाता की 11 सदस्यीय अंडरग्रेजुएट टीम इस परियोजना को आईजेम ग्रैंड जैम्बोरी-2025 में प्रस्तुत करेगी, जो विश्व की सबसे बड़ी सिंथेटिक जीवविज्ञान प्रतियोगिता है और इस अक्टूबर पेरिस में आयोजित होगी। टीम इस मंच पर अपने संस्थान और भारत का प्रतिनिधित्व करेगी