Friday, March 13, 2026
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पिता को खोया, चोट से लड़ी, परिवार का सहारा बनीं,  ब्यूटी डुंगडुंग की प्रेरक कहानी

नयी दिल्ली । महज 22 वर्ष की उम्र में भारतीय महिला हॉकी टीम की फॉरवर्ड ब्यूटी डुंगडुंग अपने कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी उठाए हुए हैं। इस समय वह बेंगलुरु में भारतीय महिला हॉकी टीम के राष्ट्रीय शिविर में पसीना बहा रही हैं, लेकिन मैदान पर वापसी उनके जीवन की सबसे कठिन लड़ाई रही है।
साल 2023 में घुटने की गंभीर चोट के कारण उन्हें लगभग दो वर्षों तक पुनर्वास से गुजरना पड़ा। इस दौरान वह लगातार यह सोचती रहीं कि क्या वह दोबारा भारत के लिए खेल पाएंगी। लेकिन मैदान की शारीरिक पीड़ा से भी बड़ा दुख उन्हें निजी जीवन में झेलना पड़ा—चोट के दौरान ही उनके पिता का निधन हो गया।
ब्यूटी ने हॉकी इंडिया के हवाले से कहा, “चोट के समय ही मेरे पिता का देहांत हो गया। मैं घर और शिविर के बीच लगातार आ-जा रही थी। एक साथ बहुत कुछ हो रहा था। कई बार लगा कि शायद अब वापसी नहीं हो पाएगी।”
झारखंड के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं ब्यूटी के लिए उनके पिता ही सबसे बड़े प्रेरणास्रोत थे। आर्थिक तंगी के बीच जब वह केवल पांच वर्ष की थीं, तब उनके पिता ने बांस से उनकी पहली हॉकी स्टिक बनाई थी, क्योंकि असली स्टिक खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। बाद में उन्होंने बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम भी किया।
वह भावुक होकर कहती हैं, “जब पापा थे तो बहुत सहारा था। अब सब कुछ मुझे खुद संभालना है।” ब्यूटी अपने परिवार की मुख्य आधार हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी में नौकरी के माध्यम से वह पूरे परिवार का खर्च उठाती हैं। अपने भाई के परिवार की मदद करने के साथ-साथ भतीजी और भतीजों की पढ़ाई का खर्च भी वहन करती हैं। उनकी मां आंशिक रूप से लकवाग्रस्त हैं और स्मृति कमजोर हो चुकी है, जिनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर है।
ब्यूटी कहती हैं, “कभी-कभी तनाव हो जाता है। मां चीजें भूल जाती हैं और बार-बार पूछती हैं कि मैं घर कब आऊंगी। जब मैं बाहर रहती हूं तो मन उन्हीं के पास रहता है।” अंतरराष्ट्रीय हॉकी के दबाव और घर की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, लेकिन ब्यूटी हार मानने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है, “अगर ज्यादा सोचूंगी तो खुद ही परेशान हो जाऊंगी। इसलिए पूरा ध्यान खेल पर लगाती हूं। अच्छा लगता है कि मैं अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पा रही हूं।”
जब भावनात्मक बोझ बढ़ जाता है, तो वह अपनी टीम के साथियों का सहारा लेती हैं। उन्होंने कहा, “अगर मैच से पहले मन ठीक नहीं होता तो मैं साथियों से खुलकर कहती हूं कि आज मेरा मन भारी है, मुझे प्रेरित करें। टीम हमेशा मेरा साथ देती है,”
लंबे संघर्ष के बाद ब्यूटी ने फिर से लय हासिल करनी शुरू कर दी है। वह एशियाई चैंपियंस ट्रॉफी और हाल ही में आयोजित हॉकी इंडिया लीग में भी खेल चुकी हैं। अब वह हैदराबाद, तेलंगाना में होने वाले वर्ष 2026 के एफआईएच महिला हॉकी विश्व कप क्वालीफायर की तैयारियों के लिए राष्ट्रीय शिविर में कड़ी मेहनत कर रही हैं। अपनी तेज दौड़ और गेंद प्राप्त करने की क्षमता के लिए पहचानी जाने वाली ब्यूटी स्ट्राइकिंग सर्कल में आत्मविश्वास दोबारा हासिल करने की कोशिश कर रही हैं।
ब्यूटी डुंगडुंग अब केवल खेल के लिए नहीं खेलतीं। हर बार जब वह हॉकी स्टिक थामती हैं, तो उसमें उनकी मां की देखभाल, परिवार का भविष्य और उस पिता की याद जुड़ी होती है, जिन्होंने बांस से उनकी पहली स्टिक बनाकर उनके सपनों को आकार दिया था।

होली में आरामदायक रहे फैशन का सजीला अंदाज

होली का त्योहार रंगों, मस्ती और पकवानों का मिलन है। लेकिन असली मजा तभी आता है जब आप अपने कपड़ों में कंफर्टेबल महसूस करें और आपकी स्किन भी सेफ रहे। होली में फैशन का ट्रेंड पूरी तरह से स्किन-फ्रेंडली और रिलैक्स्ड लुक की तरफ जा रहा है। इस बार लोग भारी-भरकम कपड़ों की जगह ऐसे फैब्रिक चुन रहे हैं जो हल्के हों और भीगने के बाद शरीर पर चिपके नहीं। सही आउटफिट सिर्फ फोटो अच्छी आने के लिए नहीं, बल्कि रंगों के केमिकल और धूप से बचने के लिए भी जरूरी है।
होली पर फैब्रिक पसंद करना काफी मुश्किल होता है। सिंथेटिक या मोटे जींस जैसे कपड़े पानी सोखकर भारी हो जाते हैं और स्किन को छील सकते हैं। इन सब से बचने के लिए पहने यह कपड़े
प्योर कॉटन : होली के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं। यह पसीना सोखता है, हवा लगती रहती है और धूप में आपकी स्किन को ठंडा रखता है।
लिनेन: अगर आप थोड़ा एलीट और क्लासी लुक चाहते हैं, तो लिनेन का कुर्ता या शर्ट पहनें। यह बहुत जल्दी सूखता है और दिखने में बहुत कूल लगता है।
सॉफ्ट मलमल : लड़कियों के लिए मलमल की कुर्तियां बेस्ट हैं। ये बहुत हल्की होती हैं और त्यौहार की भाग-दौड़ में आपको बिल्कुल बोझ महसूस नहीं होने देतीं। होली पर सफेद रंग पहना सबको बेहद पसंद है। सफेद कपड़ों पर जब गुलाल के अलग-अलग शेड्स चढ़ते हैं, तो वह अपने आप में एक यादगार डिजाइन बन जाता है। लेकिन अगर आप सफेद से हटकर कुछ ट्राई करना चाहते हैं, तो इस होली ब्राइट नियॉन, लेमन येलो और स्काई ब्लू जैसे रंग काफी ट्रेंड में हैं। गहरे कलर जैसे काला या गहरा नीला पहनने से बचें, क्योंकि उन पर रंगों की खूबसूरती नजर नहीं आती। हल्के पेस्टल शेड्स आपकी होली की पिक्चर्स को सोशल मीडिया के लिए एकदम परफेक्ट बना देंगे।

यहां होलिका दहन पर जलती आग पर चलते हैं पुजारी

रंगों के पर्व होली की शुरुआत ब्रज क्षेत्र में फुलेरा दूज के साथ हो चुकी है। फूलों की होली, लठमार या लड्डू की होली, सभी मन मोहते हैं। वहीं, कृष्ण नगरी मथुरा के फालैन गांव में अनोखी परंपरा देखने को मिलती है, जहां के निवासी सदियों से चली आ रही परंपरा का निर्वहन भक्ति और विश्वास के साथ करते हैं। मथुरा जिले के फालैन गांव में सदियों पुरानी होलिका दहन की परंपरा आज भी जीवंत है, जो भक्त प्रह्लाद की आस्था और अग्नि परीक्षा की याद दिलाती है। यह गांव ‘प्रह्लाद की नगरी’ के नाम से जाना जाता है और यहां होलिका दहन केवल अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं, बल्कि अटूट विश्वास, तपस्या और साहस का उदाहरण है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अनुसार, फालैन गांव का होलिका दहन आस्था का अद्भुत उत्सव है। होलिका दहन से लगभग 45 दिन पहले गांव का पुजारी कठोर व्रत, तप, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि-शयन और विशेष अनुष्ठान शुरू करता है। प्रह्लाद मंदिर में रहकर वह दिन में एक बार भोजन करता है और सात्विक जीवन जीता है।
इसके बाद होलिका दहन की रात, प्रह्लाद कुंड में स्नान और पूजा के बाद विशाल होलिका प्रज्वलित की जाती है। जब आग प्रचंड रूप ले लेती है और अंगारे दहकने लगते हैं, तब पुजारी नंगे पैर, निडर होकर जलती हुई होलिका के बीच से गुजरता है या दौड़ लगाता है। यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद खास होता है। यह परंपरा सतयुग से चली आ रही मानी जाती है, जो भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की कहानी से जुड़ी है।
होलिका, प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, लेकिन प्रह्लाद की आस्था से वह खुद जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित रहे। फालैन में पुजारी इसी घटना का जीवंत रूप निभाते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि सदियों से यह परंपरा चली आ रही है और कोई भी पुजारी कभी घायल नहीं हुआ।

मथुरा–वृंदावन की दिव्य यात्रा और 10 प्रमुख दर्शनीय स्थल

मथुरा और वृंदावन केवल घूमने की जगहें नहीं हैं, बल्कि वे अनुभूति हैं, जिन्हें महसूस किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि और उनकी बाल लीलाओं से जुड़ी यह पावन धरती श्रद्धा, आस्था और इतिहास का अनूठा संगम प्रस्तुत करती है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु, साधक और पर्यटक यहां के मंदिरों, घाटों और गलियों में बसती भक्ति को करीब से महसूस करते हैं। यात्रा की दृष्टि से ये दोनों नगर एक-दूसरे के बेहद निकट हैं, जिससे दर्शन और भ्रमण सुगम हो जाता है।

मथुरा: श्रीकृष्ण की जन्मभूमि

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर – मथुरा का यह प्रमुख तीर्थ स्थल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान के रूप में पूजित है। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही भक्तिमय वातावरण मन को शांति से भर देता है। यहां निरंतर गूंजते भजन, कीर्तन और श्रद्धालुओं की आस्था इस स्थान को विशेष बनाती है।

द्वारकाधीश मंदिर –राजसी स्वरूप में श्रीकृष्ण को समर्पित यह मंदिर मथुरा की पहचान माना जाता है। इसकी भव्य वास्तुकला और रंगीन सजावट, विशेष रूप से त्योहारों के समय, दर्शकों को आकर्षित करती है।

विश्राम घाट – यमुना नदी के तट पर स्थित यह घाट धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहां विश्राम किया था। संध्या आरती के समय यहां का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है।

गीता मंदिर – लाल पत्थर से निर्मित यह मंदिर अपने भव्य स्वरूप के साथ-साथ दीवारों पर अंकित भगवद्गीता के श्लोकों के लिए प्रसिद्ध है। आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में आने वाले यात्रियों के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है।

कंस किला – मथुरा के ऐतिहासिक स्थलों में शामिल यह किला पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। यह स्थान नगर के गौरवशाली अतीत और उसकी सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करता है।

वृंदावन: श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं की धरती

बांके बिहारी मंदिर – वृंदावन का सबसे प्रसिद्ध मंदिर, जहां श्रीकृष्ण के बाल रूप के दर्शन होते हैं। यहां की आरती और भक्तों की उमंग से भरी भीड़ वातावरण को जीवंत बना देती है।

इस्कॉन मंदिर (कृष्ण–बलराम मंदिर) – श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर अपनी भव्यता और शांति के लिए जाना जाता है। यहां होने वाले कीर्तन और भजन मन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देते हैं।

प्रेम मंदिर – भव्य संगमरमर से बना यह मंदिर राधा–कृष्ण की लीलाओं को दर्शाती सुंदर नक्काशियों के लिए प्रसिद्ध है। रात्रि में प्रकाश से सजा यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है।

राधारमण मंदिर – 16वीं शताब्दी से जुड़ा यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र है। यहां स्थापित स्वयं प्रकट विग्रह की पूजा भक्तिभाव से की जाती है।

सेवा कुंज और निधिवन – वृंदावन का यह पावन उपवन रहस्य और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि यहां राधा–कृष्ण की रास लीला संपन्न होती थी, जिसके कारण इस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व है।

दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का निधन

नयी दिल्ली । दूरदर्शन की पूर्व समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का गत 12 फऱवरी को निधन हो गया। उनके परिवारिक मित्र शम्मी नारंग ने यह जानकारी दी। माहेश्वरी 71 वर्ष की थीं और 1980 और 1990 के दशक में टीवी समाचार जगत के सबसे जाने-माने चेहरों में से एक थीं। उन्होंने 1976 से 2005 तक दूरदर्शन पर समाचार वाचिका के रूप में कार्य किया था। माहेश्वरी उस दौर में दूरदर्शन की जानी-मानी समाचार वाचिका थीं, जब प्रसारण पूरे दिन में कुछ ही घंटों तक सीमित था। नारंग ने ‘एक्स’ और इंस्टाग्राम पर इस खबर की जानकारी देते हुए पोस्ट किया। नारंग ने कहा, ‘‘दूरदर्शन में मेरी पूर्व सह-समाचार प्रस्तोता सरला माहेश्वरी के निधन की जानकारी देते हुए मुझे अत्यंत पीड़ा हो रही है।’’

उन्होंने माहेश्वरी को ‘‘शिष्टता और विनम्रता की साक्षात प्रतिमूर्ति’’ के रूप में याद किया। नारंग ने सोशल मीडिया मंच पर पोस्ट किया, ‘‘मुझे यह बताते हुए बहुत दुख हो रहा है कि दूरदर्शन में मेरी पूर्व सह-समाचार प्रस्तोता सरला माहेश्वरी का निधन हो गया है… वह न केवल दिखने में सुंदर थीं बल्कि हृदय से भी कहीं अधिक उदार थीं, भाषा पर उनकी अद्भुत पकड़ थी और वह ज्ञान का भंडार थीं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘दूरदर्शन के पर्दे पर उनकी उपस्थिति का एक विशिष्ट प्रभाव था। वह सभी का सम्मान करती थीं और जिस भी क्षेत्र का हिस्सा होती थीं, उसे एक नयी दिशा देती थीं।’’ खबरों के मुताबिक, माहेश्वरी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद सार्वजनिक प्रसारक दूरदर्शन में काम करना शुरू किया था। तीन दशकों के अपने करियर में माहेश्वरी ने टेलीविजन समाचारों के श्वेत-श्याम से रंगीन प्रसारण में परिवर्तन को देखा। दूरदर्शन नेशनल ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘दूरदर्शन परिवार की ओर से श्रीमती सरला माहेश्वरी को भावभीनी श्रद्धांजलि। वह दूरदर्शन की एक सम्मानित और प्रतिष्ठित समाचार वाचिका थीं, जिन्होंने अपनी मधुर आवाज, सटीक उच्चारण और गरिमामय प्रस्तुति से भारतीय समाचार जगत में एक विशेष स्थान बनाया था। उनकी सादगी, संयम और व्यक्तित्व ने दर्शकों के दिलों में गहरा विश्वास अर्जित किया।’’

साहित्यकार शंकर का 92 वर्ष की आयु में निधन

कोलकाता । प्रख्यात बंगाली साहित्यकार मणिशंकर मुखर्जी, जिन्हें उनके लेखकीय नाम ‘शंकर’ के रूप में जाना जाता है, का शुक्रवार को निधन हो गया। 92 वर्षीय लेखक ने गत 20 फरवरी को एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वह अपने पीछे दो बेटियों को छोड़ गए हैं। साहित्यकार शंकर ने शहरी जीवन की साधारण दिखने वाली वास्तविकताओं को कालजयी कथाओं में रूपांतरित किया। उनकी कई कृतियों पर विख्यात फिल्मकार सत्यजीत रॉय ने फिल्में बनाईं, जिनमें ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित शंकर अपने चर्चित उपन्यास ‘चौरंगी’ के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं। इस उपन्यास ने उन्हें घर-घर में पहचान दिलाई। बारिश से भीगे कोलकाता और ग्रैंड होटल की रोशनी से प्रेरित यह उपन्यास काल्पनिक ‘शाहजहां होटल’ की दुनिया के माध्यम से महानगर के अभिजात्य समाज, व्यापारिक जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करता है।

‘चौरंगी’ पर 1968 में बनी फिल्म ने भी अपार लोकप्रियता हासिल की और यह कृति कई भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई। शंकर की कृतियां साहित्य और सिनेमा के बीच एक सशक्त सेतु बनीं। ‘सीमाबद्ध’ और ‘जन अरण्य’ सत्यजीत रॉय की चर्चित ‘कलकत्ता त्रयी’ का हिस्सा रहीं। इसके अलावा उनके उपन्यास ‘मन सम्मान’ पर हिंदी फिल्म ‘शीशा’ का निर्माण हुआ।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कलकत्ता उच्च न्यायालय में अंतिम अंग्रेज बैरिस्टर नोएल बारवेल के क्लर्क के रूप में की थी। अपने गुरु के प्रति सम्मान प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘कतो अजानारे’ की रचना की, जिससे उनके साहित्यिक जीवन की औपचारिक शुरुआत हुई।

शंकर का साहित्य केवल शहरी जीवन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने युवाओं के लिए भी व्यापक लेखन किया और संस्मरणात्मक कृतियों में सामाजिक टिप्पणियों के साथ स्मृतियों को सजीव रूप दिया। उनके लेखन में स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित शोधपरक कृतियां भी शामिल हैं, जिनमें आध्यात्मिक और मानवीय दोनों पक्षों को उकेरा गया।

वर्ष 2021 में उन्हें आत्मकथात्मक कृति ‘एका एका एकाशी’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पुस्तकों का अनुवाद अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, गुजराती, फ्रेंच और स्पेनिश सहित कई भाषाओं में हुआ।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें “बंगाली साहित्य का उज्ज्वल नक्षत्र” बताया और कहा कि उनका निधन सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।

शंकर ने अपने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता-उत्तर भारत के शहरी समाज की आकांक्षाओं, द्वंद्वों और नैतिक उलझनों को सजीव रूप दिया। उनके निधन से न केवल एक लोकप्रिय उपन्यासकार का अंत हुआ है, बल्कि उस साहित्यिक युग का भी समापन हुआ है जिसने महानगर के जीवन को अमर शब्दों में ढाला।

रेवड़ी नहीं रोजगार के अवसर पैदा करें : सुप्रीम कोर्ट

-फ्री ब्रिज पर की सख्त टिप्पणी
नयी दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त योजना संस्कृति यानी फ्री ब्रिज पर सख्त टिप्पणी की है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्यों को सलाह दी कि मुफ्त चीजें बांटने के बजाय, रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा, भारत में हम कैसी संस्कृति बना रहे हैं? क्या यह वोट पाने की नीति नहीं बन जाएगी? फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब अगली सुनवाई में तय होगा कि ऐसे मुफ्त बिजली योजनाओं पर क्या नियम लागू होंगे।सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। दरअसल, राज्य सरकार ने कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में सब्सिडी स्कीम की घोषणा की थी। इससे पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पर फाइनेंशियल दबाव पड़ा। राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि राज्यों में अपनाई गई मुफ्त सुविधाओं की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा डालती है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत समेत जजों ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा ज्यादातर राज्य पहले से ही घाटे में हैं, फिर भी विकास को छोड़कर मुफ्त सुविधाएं बांट रहे हैं। कोर्ट ने साफ कहा- जो लोग भुगतान नहीं कर सकते, उन्हें सहायता देना समझ में आता है। लेकिन अमीर-गरीब में फर्क किए बिना सबको मुफ्त देना गलत नीति है। इस दौरान कोर्ट ने चेतावनी दी और कहा अगर सुबह से शाम तक मुफ्त खाना, साइकिल और बिजली मिलती रही तो लोगों में काम करने की भावना कम हो जाएगी।

उत्तर-पूर्व राज्यों में एक जैसे हैं16,000 वाहनों के चेसिस-इंजन नंबर

-सीएजी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
नयी दिल्ली । नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में करीब 16,000 वाहन ऐसे पाए गए हैं जिनके चेसिस और इंजन नंबर एक जैसे हैं। यह रिपोर्ट असम विधानसभा के 126 सदस्यीय सदन में हाल ही में पेश की गई।ऑडिट के दौरान वाहन डेटाबेस की जांच में यह पाया गया कि असम समेत सात अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में 15,849 वाहन ऐसे हैं, जिनके चेसिस और इंजन नंबर समान हैं। और वे दो या उससे अधिक राज्यों में रजिस्टर्ड हैं। हाल ही में आई कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) की रिपोर्ट से पता चला है कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में एक ही चेसिस और इंजन नंबर वाली करीब 16,000 गाड़ियां रजिस्टर्ड हैं।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक हालिया रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में करीब 16,000 वाहन ऐसे पाए गए हैं जिनके चेसिस और इंजन नंबर एक जैसे हैं। यह रिपोर्ट असम विधानसभा के 126 सदस्यीय सदन में हाल ही में पेश की गई। ऑडिट के दौरान वाहन डेटाबेस की जांच में यह पाया गया कि असम समेत सात अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में 15,849 वाहन ऐसे हैं, जिनके चेसिस और इंजन नंबर समान हैं। और वे दो या उससे अधिक राज्यों में रजिस्टर्ड हैं। इनमें से 12,112 वाहन (करीब 76 प्रतिशत) असम में बिना नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) के पंजीकृत पाए गए।
मोटर वाहन कानून के तहत किसी भी समय एक वाहन का पंजीकरण नंबर और चेसिस-इंजन नंबर यूनिक (उसके जैसा कोई दूसरा नहीं) होना अनिवार्य है। यदि कोई वाहन एक राज्य से दूसरे राज्य में स्थानांतरित (ट्रांसफर) होता है, तो पहले पुराने पंजीकरण को रद्द करना जरूरी होता है। इस नियम का उल्लंघन गंभीर प्रशासनिक चूक मानी जाती है। रिपोर्ट में आठ जिला परिवहन कार्यालयों (डीटीओ) में परिवहन परमिट जारी करने की प्रक्रिया में भारी विसंगतियां भी सामने आई हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इन रिपोर्टों के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच 1,19,369 पंजीकृत वाहनों के मुकाबले केवल 26,105 परमिट जारी किए गए, जो महज 21.98 प्रतिशत है। सीएजी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि आठ जिलों में स्कूल बसों को शैक्षणिक संस्थान बस (ईआईबी) परमिट की जगह अनुबंध गाड़ी परमिट जारी किए गए। इससे अनिवार्य फिटनेस जांच को दरकिनार कर दिया गया। रिपोर्ट के अनुसार, यह व्यवस्था स्कूल परिवहन की सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य को ही कमजोर करती है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि 1.29 लाख कमर्शियल वाहनों में से 29,560 वाहनों ने मोटर वाहन टैक्स जमा नहीं किया। इससे मार्च 2024 तक सरकार को और 24.53 करोड़ रुपये का जुर्माना नुकसान हुआ।इसके अलावा, आठ जिलों में 1.51 लाख वाहनों से मोटर व्हीकल टैक्स में अंतर पर जुर्माना वसूल नहीं किया गया। जिससे सरकार को 3.79 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व नुकसान हुआ। सात डीटीओ में 64 प्रतिशत पेनल्टी अब तक वसूल नहीं हो पाई, जिससे प्रवर्तन व्यवस्था कमजोर पड़ी है। रिपोर्ट में प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े नियमों के पालन में भी गंभीर खामियां पाई गईं। कैग ने कहा कि असम में वाहनों की संख्या, परिवहन विभाग की स्टाफ क्षमता से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ी है। विभाग में 30 से 57 प्रतिशत तक पद खाली हैं, जिससे नियमों को लागू करने की क्षमता पर सीधा असर पड़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 7.85 प्रतिशत लर्नर लाइसेंस और ड्राइविंग लाइसेंस मामलों में ड्राइविंग टेस्ट की तारीख दर्ज ही नहीं की गई। इससे बिना उचित मूल्यांकन के लाइसेंस जारी होने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा, ड्राइविंग टेस्ट स्लॉट के विश्लेषण में पाया गया कि 2019-2024 के दौरान 40 मामलों में से 24 में एक दिन में असामान्य रूप से ज्यादा टेस्ट दिखाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रक्रियागत लापरवाही या मूल्यांकन की गंभीरता से समझौते की ओर इशारा करता है।

एआई समिट में भारत के विजन पर 88 देशों-संगठनों की मुहर

– सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय पर वैश्विक सहमति
नयी दिल्ली । भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ को एक बड़ी कूटनीतिक और तकनीकी सफलता मिली है। 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को इसकी घोषणा करते हुए साफ किया कि दुनिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मानव-केंद्रित एआई दृष्टिकोण’ को खुले तौर पर स्वीकार कर लिया है। यह कदम वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के सुरक्षित, समान और जवाबदेह विकास की दिशा में एक अहम मील का पत्थर माना जा रहा है।केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि कुल 88 हस्ताक्षरकर्ताओं में से 86 देशों और दो अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ (सभी का कल्याण, सभी की खुशी) के सिद्धांत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है। इस विजन का मुख्य लक्ष्य एआई संसाधनों का इस तरह से लोकतंत्रीकरण करना है कि इस उन्नत तकनीक और इसके आर्थिक फायदों की पहुंच दुनिया भर में समाज के हर वर्ग तक सुनिश्चित हो सके। तकनीक और नीति-निर्माण से जुड़े इस अहम वैश्विक सम्मेलन के दौरान कुछ राजनीतिक विवाद भी सुर्खियों में रहे। भारतीय युवा कांग्रेस के नेताओं द्वारा आयोजन स्थल पर किए गए ‘शर्टलेस/टॉपलेस’ विरोध प्रदर्शन की कड़ी आलोचना हुई। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू, राज्य मंत्री जयंत चौधरी और भाजपा नेता शहजाद पूनावाला के साथ-साथ बीआरएस नेता केटीआर ने इसे सस्ती ‘राजनीतिक नौटंकी’ करार दिया। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने युवा कांग्रेस नेताओं की पांच दिन की रिमांड मांगी है। ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026’ का यह ऐतिहासिक घोषणापत्र बताता है कि एआई जैसी क्रांतिकारी तकनीक पर अब किसी एक देश या चंद टेक कंपनियों का एकाधिकार नहीं रहेगा। 88 देशों और संगठनों की यह एकजुटता एआई के सुरक्षित विकास और इसके आर्थिक लाभों को विकासशील देशों तक पहुंचाने का रास्ता साफ करेगी। आगे चलकर इन सहमतियों को व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय नीतियों में कैसे बदला जाता है, इस पर उद्योग जगत और निवेशकों की पैनी नजर रहेगी।

गुजरात में विवाह पंजीकरण से पहले माता-पिता को सूचना देना अनिवार्य

गांधीनगर। गुजरात सरकार ने लव जिहाद के मामलों को रोकने और लड़कियों की सुरक्षा के लिए विवाह पंजीकरण नियमों में बड़े बदलाव की घोषणा की है। 20 फरवरी 2026 को राज्य विधानसभा में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री हर्ष संघवी ने गुजरात मैरिज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 2006 के नियमों में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया। यह बदलाव मुख्य रूप से अंतर-धार्मिक विवाहों (खासकर लव जिहाद के आरोप वाले मामलों) में धोखाधड़ी, पहचान छिपाने और बालिका/युवतियों को बहला-फुसलाने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लाया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, विवाह पंजीकरण के लिए आवेदन करते समय दूल्हा-दुल्हन को एक घोषणा-पत्र देना अनिवार्य होगा, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने अपने माता-पिता को इस विवाह की जानकारी दी है या नहीं। आवेदन में दोनों पक्षों के माता-पिता के नाम, पता, आधार कार्ड नंबर और मोबाइल नंबर जैसे विवरण जमा करने होंगे। असिस्टेंट रजिस्ट्रार आवेदन की जांच के बाद 10 कार्य दिवसों के अंदर माता-पिता को व्हाट्सएप, ईमेल या अन्य माध्यम से सूचना भेजेगा। विवाह प्रमाण-पत्र जारी करने में अब 30 से 40 दिनों का समय लगेगा, ताकि आपत्तियां या जांच पूरी हो सके। सभी दस्तावेज ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड होंगे, और एक अलग पोर्टल भी बनाया जाएगा। गवाहों की तस्वीरें और आधार कार्ड भी अनिवार्य होंगे।
हर्ष संघवी ने कहा कि यह कदम बेटियों की इज्जत, सनातन परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा के लिए है। उन्होंने ‘लव जिहाद’ को सांस्कृतिक आक्रमण करार दिया और कहा कि पहचान छिपाकर (जैसे सलीम बनकर सुरेश बनना) शादी करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। यह प्रस्ताव 30 दिनों तक जनता से सुझाव-आपत्तियां मांग रहा है, जिसके बाद अंतिम नियम बनेंगे।
गुजरात में पिछले वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां युवतियों को बहला-फुसलाकर अन्य राज्यों में ले जाया गया। महाराष्ट्र में भी इसी तरह की मांग उठ रही है। कई घटनाएं रिपोर्ट हुई हैं जहां हिंदू लड़कियों को धोखा देकर शादी की गई और उन्हें अन्य इलाकों में ले जाया गया। महाराष्ट्र सरकार से भी ऐसे नियम लागू करने की अपील की जा रही है ताकि युवा हिंदू लड़कियों को सुरक्षा मिले।