सोशल मीडिया पर जिस तरह के कंटेंट महिलाएं बना रही हैं और अपने पारिवारिक झगड़ों का उपयोग टीआरपी पाने और फॉलोवर बढ़ाने के लिए कर रही हैं, उसके दूरगामी परिणाम कुछ अच्छे नहीं है। हैरत की बात यह है कि इसमें लड़के भी साथ दे रहे हैं। अधिकतर कंटेंट आजादी के नाम पर सास-बहू की आलोचना के लिए या बहू के अधिकारों की रक्षा के नाम पर उनकी गलतियों को जस्टीफाई करते हुए बनाए जाते हैं। मां का घर है मायका मगर ससुराल आपके सास-ससुर के नाम पर है यानी शाब्दिक दृष्टि से भी यह घर आपके पति से अधिक उनके माता -पिता का है। भारतीय परिवारों की समस्या यह है कि अपने मायके में एडजस्ट करने वाली लड़कियां और माता- पिता की प्रतिष्ठा के लिए समझौते करने वाली लड़कियां भी ससुराल में पहले दिन से ही अपनी एक अलग दुनिया बनाने लगती हैं जिसमें वह, उनके पति व बच्चे होते हैं, और कोई नहीं। वह यह मान लेती हैं कि वह इस घर में आ गयी हैं तो अब पति पर, पति के जीवन पर, पति की इच्छाओं पर तो उनका अधिकार है, बस पति के रिश्तेदार उनके कुछ नहीं लगते। वहीं माता-पिता अब भी उसी पुरानी दुनिया में जी रहे हैं, उनको अब भी अब भी अपना बेटा 24 घंटे अपने पास चाहिए। जिन औरतों को रिश्तों के बीच पुल बनना चाहिए, वह अब दीवार बन रही हैं तो कलह स्वाभाविक है। कामकाजी लोगों को उनकी ही भाषा में समझाया जाना चाहिए…क्या जब आप नये दफ्तर से जुड़ते हैं तो क्या पहले ही दिन बॉस बन जाते हैं या अपनी मेहनत से, अपनी लगन से बरसों तक मेहनत करने के बाद आपको वह जगह मिलती है? क्या आप जहां काम करते हैं, उस कम्पनी के मालिक होने का दावा कर सकते हैं कि दो दिन में कम्पनी आपके नाम कर दी जाए? अब घर का मामला देखिए…जिस गृहस्थी को पाने के लिए आप मरी जा रही हैं, पहली बात, वह गृहस्थी आपने नहीं बनायी, वह आपके सास-ससुर की जीवन भर की तपस्या का फल है। जिस तरह एक कर्मचारी की जिम्मेदारी और अधिकारों को धीरे – धीरे बढ़ाया जाता है, वैसे ही विश्वास होने पर सास-ससुर खुद आपको आगे बढ़ाते हैं। आपको जो सफल, संस्कारी पति मिला है, वह उनकी परवरिश का नतीजा है। उसे जो सहयोग मिला है, वह उसके भाई-बहनों व परिवार के कारण है और इसे बनाने में आपकी कोई भूमिका नहीं है। जिस तरह आपकी कम्पनी में आपके सीनियर्स की भूमिका है और आपकी इच्छा मात्र से उनको नहीं हटाया जा सकता, आपके बॉस आपकी खुशी के लिए उनको हाशिए पर नहीं डाल सकते। ठीक उसी प्रकार परिवार में आपकी इच्छा मात्र से आपके पति अपने माता-पिता,भाई-बहन व रिश्तेदारों को सिर्फ इसलिए नहीं हटा सकते कि आपको यह पसंद नहीं हैं। समस्या यह है कि लड़कियां गृहस्थी का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं मगर उनको दूसरों की बनाई गृहस्थी को नोंचकर अपनी दुनिया बनानी है। तुर्रा यह है कि उनको इस पर भी ससुराल से प्यार चाहिए…नहीं मिलेगा बहिन।
हमारे घरों में जब भी कोई नववधू आती है, तो उसके लिए सबसे अच्छा कमरा देवर या ननद ही खाली करते हैं क्योंकि नयी बहू को कष्ट नहीं होना चाहिए मगर बहू को इस बात से ऐतराज है कि उसके आने के बाद भी पति अपनी मां की देखभाल क्यों कर रहा है, पापा के चश्मे, भाई की पढ़ाई और बहन की नौकरी की चिंता उसे क्यों करनी है, आपकी सोच पर तरस ही खाया जा सकता है बहन। सच तो यह है कि कोई बहन अपने भाई का घर नहीं तोड़ती, कई लड़कियां तो कलह से बचने के लिए अपने मायके तक जाना छोड़ देती हैं। और क्या चाहिए आपको….अगर कोई देवर या ननद साथ रहता है तो उसे अपने घर में अजनबी की तरह रहें….अहसान मानें कि उनको उनके ही घर में भाई-भाभी रहने दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर बाकायदा रील्स चलती है कि रिश्ते बनाए रखने के लिए भौजाइयों को थैंक यू बोला जाए। तो अब यह बताइए कि बात-बात पर जेठ, जेठानी, सास-ससुर, देवर व ननद को छोटी – छोटी बातों के लिए जलील करने वाली बहुओं व भौजाइयों की इज्जत कैसे व कहां तक की जानी चाहिए? कई बहुएं तो अपनी जिम्मेदारी अपने पति व बच्चों तक समझती हैं, काम उनके लिए करती हैं….पति के कारण सास-ससुर एक्सटेंशन मोड में हैं…देवर या ननद की तो गिनती ही नहीं है। कई औरतें तो अपने तानों से ही देवर और ननद की आत्मा और अधिकारों को खत्म कर देती हैं। ननद से इनको घर के काम में सहयोग की उम्मीद होती है और शिकायत ननदों की ही अपने मायके में करनी होती हैं। इनके घर में पैर रखते ही आठवीं में पढ़ने वाली ननद को युवा और पराया मान लिया जाता है। स्नातक में पढ़ते हुए लड़के देखे जाने लगते हैं क्योंकि घर का बोझ इनके पति पर है, सब उनकी कमाई खा रहे हैं। मैडम को कोई बताए कि वह जिसके भरोसे इस घर में हैं, उसके और भी रिश्ते हैं दुनिया में। क्या यह स्वार्थपरता नहीं है। घर में कोई आयोजन हो तो मायके के लोग पहले बुलाए जाएंगे और पति के भाई-बहन घर में रहते हुए ही कोने में रखे जाएंगे और उनके सारे काम अहसान जताते हुए होंगे। उस पर सारी दुनिया के सामने आपके चेहरे पलट जाएंगे। मुझे लगता है कि यह सही समय है कि भाई-भौजाइयों से बचाने के लिए देवर-ननद के पक्ष में कानून बनाए जाए। आज बड़ी तेजी से वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं, लाचार होते माता-पिता को घर से निकालने के लिए बच्चों को लानतें भेजी जा रही हैं मगर रुककर सोचिए इन बच्चों ने यह सीखा किससे है? कहीं ऐसा तो नहीं है आज के माता-पिता जब खुद युवा थे तो हर प्रकार की शक्ति इनके पास थी तो क्या उन्होंने यही बर्ताव अपने माता -पिता के साथ नहीं किया होगा । बहुएं अपने पति को लेकर ससुराल को कोसती हुईं अलग होती हैं, अपने पति को अपनों से दूर करती हैं, बच्चों को दादा-दादी, बुआ – चाचा से दूर करती हैं, जो मौन आर्तनाद इन टूटे कलेजों से निकलता है, जो हूक निकलती है, जिस तरह वह तड़पकर जी रहे होते हैं और अंतिम सांस तक अपनी संतानों को आपके कारण नहीं देख पाते, ये हूक ईश्वर तक जाती है, कर्म लौटते हैं और जो खेल आपने कल खेला था, आज वही खेल आपके साथ खेला जा रहा है तो हैरत कैसी? बच्चों ने जो किया, बुरा किया मगर वृद्ध -वृद्धाओं से भी पूछा जाना चाहिए कि अपने समय में इन्होंने अपने बुजुर्गों के साथ कैसा बर्ताव किया। अधिकतर सफल औरतें अपने माता-पिता को अपनी कमाई का अंश देना चाहती हैं जिससे उनके माता-पिता को हाथ न पसारना पड़े। वह चाहती हैं कि उनके भाई की कमाई का हिस्सा उनकी भाभी की जगह माता-पिता को मिले। अच्छी बात है मगर तब आपको गुस्सा क्यों आता है जब आपके पति अपने माता-पिता को अपनी कमाई सौंपते हैं और अपने भाई-बहनों को तोहफे देते हैं।
मेरी समझ में तो होना चाहिए कि लड़का हो या लड़की, यह सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी है कि उनके रहते माता-पिता व जब तक भाई-बहन आर्थिक रूप से उन पर आश्रित हैं, उनको हाथ पसारना नहीं पड़े। एक सीमा के बाद भाई -बहन को भी बहुत अधिक जरूरत पड़ने पर ही बड़े भाई-बहनों की मदद लेनी चाहिए मगर माता-पिता? अपनी कमाई का दस प्रतिशत हिस्सा यानी पांच – पांच प्रतिशत अपने माता-पिता को दीजिए जिससे उनको आपकी पत्नी से नहीं मांगना पड़े। इसके बाद जरूरी है तो 10 प्रतिशत, 5-5 प्रतिशत के अनुपात में भाई-बहनों को दीजिए। जो बहन व भाई कमाते हैं, अपनी कमाई का दस प्रतिशत घर में दें। 5 प्रतिशत माता-पिता को व 5 प्रतिशत अपने घर के बच्चों को दें। छोटे- छोटे खर्च उठाएं। बहू परिवार को अपना समझे, सास-ससुर से ईर्ष्या मत कीजिए और न ही प्रतियोगिता कीजिए क्योंकि वह आपके घर में जाकर नहीं रह रहीं हैं, आपको इस घर का भविष्य बनाकर लाई हैं, कल आप ही रहेंगी…। अगर आप अपने पति-बच्चों व परिवार के बीच पुल बनेंगी तो यकीन मानिए कल को ये लोग आपके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहेंगे। जो व्यवहार आप अपने लिए अपने लिए चाहती हैं, वही व्यवहार अपनी ननदों के साथ कीजिए। हो सकता है कि आप जिन चीजों को लेकर परेशान हों, वह परेशानी ये लोग दूर दें।
रिश्तों के बीच पुल बनिए, दीवार बनना सही नहीं
तीन साल से बकाया बीएसएनएल का किराया पांच करोड़, तमतमाया हाईकोर्ट
-फंड जारी करने में देरी से नाराज, वित्त सचिव को बुलाया
कोलकाता । कलकत्ता हाईकोर्ट का तीन साल का बीएसएनएल का बिल, जो 5 करोड़ रुपये का है, बकाया है। यह खुलासा सोमवार को हाईकोर्ट प्रशासन की एक रिपोर्ट से हुआ। फंड जारी करने में देरी से नाराज हाईकोर्ट ने वित्त सचिव को आज 29 अक्टूबर को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के साथ एक बैठक करने का निर्देश दिया है। यह बैठक जेलों और न्यायिक बुनियादी ढांचे की स्थिति पर चल रही सुनवाई के संबंध में है। सोमवार को हाईकोर्ट प्रशासन ने एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इस बकाया राशि का जिक्र था। राज्य सरकार ने बेंच को बताया कि इंटरनेट सुविधा के लिए 2.9 करोड़ रुपये की प्रशासनिक मंजूरी जारी की गई है। 5 करोड़ रुपये के कुल बकाया को देखकर बेंच हैरान रह गई। बेंच ने राज्य के वकील से पूछा कि यह राशि क्यों नहीं दी गई। राज्य ने बताया कि यह खाता रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के पास है और आधी राशि मंजूर हो चुकी है। जस्टिस देबांग्शु बासक और जस्टिस एमडी शबबर रशीदी की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। बेंच ने कहा, “बिल पिछले तीन सालों से बकाया है। क्या राज्य में कोई वित्तीय आपातकाल है? अगर बीएसएनएल बिलों का भुगतान न होने के कारण सेवाएं बंद कर दे तो क्या होगा? तीन साल काफी समय है। उन्होंने बिलों का भुगतान करना जरूरी नहीं समझा… क्या हाईकोर्ट के काम के लिए फंड का आवंटन प्रशासनिक काम के अंतर्गत नहीं आता है?राज्य के वकील ने सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया क्योंकि महाधिवक्ता किशोर दत्ता इस मामले में बहस करेंगे। वकील ने कुछ समय मांगा क्योंकि आधी राशि मंजूर हो चुकी है। कोर्ट ने निर्देश दिया, “यदि 29 अक्टूबर को सभी मामले अनसुलझे रहते हैं, तो 6 नवंबर को आगे की बैठकें होंगी, जिसमें वित्त सचिव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहेंगे। 29 अक्टूबर को, राज्य पेपर बुक्स में प्रत्येक मामले के संबंध में अपना रुख बताएगा।” मामले की अगली सुनवाई 10 नवंबर को तय की गई है।यह मामला राज्य में न्यायिक बुनियादी ढांचे की बदहाल स्थिति को उजागर करता है। हाईकोर्ट का अपना ही बिल तीन साल से अटका हुआ है, जो दिखाता है कि सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कितनी कमी है। 5 करोड़ रुपये की राशि कोई छोटी रकम नहीं है, और इसका भुगतान न होना चिंता का विषय है। यह सवाल उठता है कि क्या राज्य सरकार हाईकोर्ट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान के लिए भी समय पर फंड जारी करने में सक्षम नहीं है। बीएसएनएल जैसी सेवा प्रदाता कंपनी अगर भुगतान न होने पर सेवाएं बंद कर दे, तो इसका सीधा असर अदालती कामकाज पर पड़ेगा। इससे न्याय मिलने में देरी होगी, जो किसी भी नागरिक के लिए स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने इस मामले को ‘कोर्ट की अपनी गति’ के तहत उठाया है, जिसका मतलब है कि कोर्ट ने खुद ही इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है। यह दर्शाता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। वित्त सचिव और रजिस्ट्रार जनरल के बीच होने वाली बैठकें इस समस्या का समाधान निकालने की दिशा में एक कदम हैं। उम्मीद है आज 29 अक्टूबर की बैठक में राज्य सरकार अपना स्पष्ट रुख बताएगी और लंबित बिलों का भुगतान करने के लिए ठोस कदम उठाएगी। अगर फिर भी समस्या हल नहीं होती है, तो वित्त सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति में होने वाली 6 नवंबर की बैठक से कुछ सकारात्मक परिणाम निकलने की उम्मीद है। यह मामला राज्य के वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक दक्षता पर भी सवाल खड़े करता है।
केंद्र ने दी आठवें वेतन आयोग के गठन को मंजूरी
-न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) होंगी अध्यक्ष
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार ने मंगलवार को 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी। यह आयोग अपने गठन की तिथि से 18 महीनों के भीतर अपनी सिफारिशें देगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्वनी वैष्णव ने यहां राष्ट्रीय मीडिया केन्द्र में पत्रकार वार्ता में मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी दी। वैष्णव ने बताया कि 8वां वेतन आयोग एक अस्थायी निकाय होगा। आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य (अंशकालिक) और एक सदस्य-सचिव शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि यह आयोग अपने गठन की तिथि से 18 महीनों के भीतर अपनी सिफारिशें देगा। सरकार ने जनवरी में केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन और अन्य लाभों में बदलावों की जांच और सिफ़ारिश करने के लिए 8वें वेतन आयोग के गठन की घोषणा की थी। न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई (सेवानिवृत्त) आयोग की अध्यक्ष होंगी। प्रोफ़ेसर पुलक घोष सदस्य होंगे और पंकज जैन आयोग के सदस्य-सचिव होंगे। वेतन आयोगों का गठन समय-समय पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पारिश्रमिक ढांचे, सेवानिवृत्ति लाभों और अन्य सेवा शर्तों के विभिन्न मुद्दों पर विचार करने और उनमें आवश्यक बदलावों पर सिफारिशें करने के लिए किया जाता है। आमतौर पर वेतन आयोग की सिफारिशें हर 10 साल के अंतराल पर लागू की जाती हैं। इसके अनुसार 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें अगले साल से अपेक्षित हैं।
डियर युवाओं, परिवार से अच्छा सहयात्री कोई नहीं
मन में विचार आता है कि आज के दौर में स्त्री होने का क्या मतलब है….स्त्री एवं पुरुष के लिए परिवार की परिभाषा कैसे इतनी संकीर्ण हो गयी। बात जब छठ की है तो छठ तो स्वयं ही एक प्रकार से भाई-बहन का पर्व है क्योंकि छठी मइया तो खुद ही सूर्यदेव की बहन हैं…भाई दूज में यम और यमुना भाई – बहन हैं और दीपावली में नरकासुर के वध के बाद जो सुभद्रा कृष्ण के माथे पर तिलक लगाती हैं, वह भी उनकी बहन हैं। इससे पीछे देखिए तो शक्ति नारायण की बहन हैं औऱ सरस्वती शिव की बहन हैं। अशोक सुन्दरी गणेश और कार्तिकेय की बहन हैं और शांता श्रीराम की बहन हैं। कहने का तात्पर्य तो यही है कि हमारे पुराणों में तो भाई-बहन के सम्बन्धों का उल्लेख है मगर सोचने वाली बात यह भी है कि ऐसा क्या हो गया कि बहनों को हाशिये पर रखकर समस्त देवी-देवताओं को पत्नी और बच्चों तक समेटकर बांध दिया गया। शक्ति, शिव, सरस्वती और लक्ष्मी में गहरा सम्बन्ध है, सब के सब एक दूसरे के पूरक हैं, फिर ऐसा किसने किया होगा कि पारिवारिक अवधारणा को अपने स्वार्थ के लिए पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित कर दिया जबकि श्रीकृष्ण तो राधा के साथ सुभद्रा और द्रौपदी को भी सिर आँखों पर रखते हैं। वस्तुतः देखा जाए तो शिव परिवार हो राम दरबार या फिर श्रीकृष्ण का परिवार एक संयुक्त परिवार की अवधारणा को सामने रखता है। ये जानना जरूरी है कि वैदिक काल से चली आ रही इस अवधारणा को तहस-नहस कर स्त्री व पुरुष के जीवन से अन्य सभी संबंधों को निकालकर नितांत एकाकी बनाने वाले कौन लोग रहे होंगे और इनमें उनका क्या स्वार्थ रहा होगा। खास बात यह है कि सुभद्रा को कृष्ण से कुछ कहना या मांगना नहीं पड़ता, वह स्वयं ही उसे समझकर उसकी इच्छा पूरी कर देते हैं तो कृष्ण को पूजने वालों के मन में इतनी संवेदनशीलता क्यों नहीं है? छठी मइया ने तो आपको नहीं कहा कि आप अपने माता – पिता समान सास-ससुर से अपने पति को दूर कर दें क्योंकि वह आपकी गृहस्थी के साम्राज्य को फिट नहीं करते। आपको बुरा लगता है जब मायके में बहन के रूप में आपको भाभी जितना सम्मान नहीं मिलता मगर अपनी ससुराल में आप खुद बर्दाश्त नहीं कर पातीं कि आपको छोड़कर आपका पति किसी और की बात सुनें, करें। पता नहीं…लड़के और लड़कियों को यह अहंकार का रोग कहां से लग गया। पता नहीं क्यों कई बार सास-ससुर भी अपनी बहू-बेटे को नहीं समझना चाहते। मैं नहीं समझ पाती कि अनायास सामंजस्य से चलने वाला परिवार वैमनस्य और वर्चस्व का अखाड़ा कैसे बन जाता है? परिवार से दूर रहना और कई बार मायके वालों के कहने में आकर अपनी गृहस्थी बना लेना पहले -पहल बहुत अच्छा लगता है मगर चुनौतियां वहाँ कम नहीं होतीं, बढ़ जाती हैं। आपको ताने कसने वाले कम नहीं होते बल्कि बढ़ जाते हैं। एक समय के बाद आप थक जाती हैं क्योंकि अंततः हम सभी मनुष्य हैं। ससुराल में जो काम आपके साथ चार लोग करते थे, वह सारे काम अब आपको अकेले करने होते हैं, जो खर्च मिल-बांट कर उठा लिया जाते थे…वह सारे खर्च अब आपको खुद करने होते हैं। आपको सुनने वाला कोई नहीं होता, आप किसी के कंधे पर सिर रखकर नहीं रो पाते। पहले वाला प्यार अब खीझ में बदलकर द्वेष और कलह बन जाता है। जिम्मेदारियों के बोझ से दबी आप ठीक से रहना भूल जाती हैं। जिन्होंने आपका घर तोड़ा, गौर से देखिएगा, वह अपने घर नहीं टूटने देते। समझदारी और वैयक्तिता को महत्व देने की जरूरत है और दोनों ओर से दिये जाने की जरूरत है। आप नहीं जानते कि एक पीढ़ी जब साथ रहती है और जुड़ी रहती है तो वह आपका सुरक्षा कवच रहती है, सपोर्ट सिस्टम बनी रहती है। परिवार से दूर रहना सपोर्ट सिस्टम खो देना होता है। बुजुर्गों को थोड़ा सा आदर चाहिए और उनकी जरूरतों को पूरा करते रहने की जरूरत है। आज आपको यह खटक सकता है लेकिन कल्पना कीजिए कि कल आप दोनों भी बूढ़े होंगे और आपके बच्चे आपको ताने मारेंगे। हाथ उठा सकते हैं और आप अपना बचाव भी नहीं कर सकेंगे क्योंकि शरीर और मन से आप थक चुके होंगे। आज जिस तरह से अपने भाई -बहनों से जुड़े रहने के लिए आप अपने पति को कोसती हैं, कल को आपके बेटे को आपकी बहू कोसेगी..तब क्या आपके पास कोई जवाब होगा। मगर भाई या देवर व जेठ ननद, जेठानी, देवरानी, बहन और बुआ के साथ रहते हुए ऐसा करने में वह दस बार सोचेगा…..लिहाज न हो तो भी लिहाज बड़ी चीज है। हिंदू संस्कृति अत्यंत पुरातन होते हुए भी चिर नूतन है, इसकी मान्यताएं आज के वैज्ञानिक युग में भी हमारे जीवन को सार्थक दिशा दिखाती हैं। जीवन मूल्य और संस्कार हमें पुरातन संस्कृति से ही प्राप्त होते हैं ,तथा इस संस्कृति के मूल आधार हैं हमारे सनातन परिवार। अतः सनातन संस्कृति को जागृत और चैतन्य रखने का दायित्व हमारे परिवारों पर ही है। परिवार केवल व्यक्तियों के एकत्र रहने की व्यवस्था का नाम नहीं है, यह समाज की आधारभूत सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा आर्थिक इकाई है ।प्रत्येक परिवार उत्तम मनुष्य निर्माण की पाठशाला है। भारतीय संस्कृति में परिवार की परिभाषा में तीन-चार पीढ़ियों का समावेश होता था। कल आज और कल का समन्वय ही परिवार कहलाता था। दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई- भाभी, बहन- बहनोई ये सब एक ही छत के नीचे एक परिवार का हिस्सा होते थे। यहां तक कि घर में काम करने वाले सेवक, कर्मचारी, पड़ोसी इन सब से भी पारिवारिक संबंध होते थे। इतना ही नहीं हम तो पशु -पक्षी, पेड़- पौधे, प्रकृति को भी परिवार मानते हैं- तुलसी माता, गौ माता, गंगा मैया आदि।
आपके अहंकार में बच्चों ने रिश्ते नहीं देखे, निभाना नहीं सीखा, झुकना नहीं सीखा। लाड़ -दुलार ने उनको जिद्दी और स्वार्थी बना दिया है । जो बात आज आपको कूल लग रही है, कल वही जी का जंजाल भी बन सकती है क्योंकि कल को अगर कोई भी उल्टा- सीधा कदम उठाता है तो लोग आप पर ताने कसेंगे..कैसे रोकेंगे आप दोनों।
वसुधैव कुटुंबकम् की धारणा हमारी ही संस्कृति की उपज है, अर्थात पूरा विश्व ही हमारा परिवार है, सभी हमारे अपने हैं।
परिवार समाज और देश का अस्तित्व नारी से ही है नारी के बिना परिवार की कल्पना भी नहीं कर सकते। मां ,बहन, पत्नी अथवा बेटी के बिना कोई घर घर नहीं लगता।कहावत है -बिन घरनी घर भूत का डेरा। जिस घर में परिवार के सदस्यों को महिला के हाथ का बना भोजन प्राप्त नहीं होता, जहां मां की कोमल वाणी नहीं गूंजती, जहां बहन का स्नेह सिक्त स्पर्श नहीं मिलता वह घर तो सोने का महल हो तो भी वीरान ही लगता है। आज के सन्दर्भ में देखा जाए तो खाना बनाने का काम महिला-पुरुष मिलकर कर सकते हैं। जिन लड़कियों ने संयुक्त परिवार की मिठास नहीं देखी, जो अपने पारिवारिक यूटोपिया में रहती आ रही हैं, परिवार उनको ही खतरा लगता है। सच तो यह है कि अगर ऐसी स्थिति है तो आपको विद्रोह भी उसी व्यवस्था के भीतर रहकर करना होता है, वरना सोचिए आप कितने तालाब खोद सकती हैं।
ईश्वर ने आपको क्षमता दी है कि आप परिवार को साथ लेकर चल सकें तो आपको यह दायित्व तो निभाना होगा। पेशेवर जगत के लिहाज से देखा जाए तो पूछा जा सकता है कि क्या आप दिक्कत होने पर अपने पति को लेकर ससुराल से अलग हो गयीं, क्या कल को अपनी कम्पनी में दिक्कत होने पर उससे अलग हो जाएंगी या सबको साथ लेकर चलने का प्रयास करेगी। जो प्रयास आप बाहर की दुनिया में करती हैं, वह अपने घर में क्यों नहीं कर सकतीं? आप आर्थिक मामलों में सुझाव देकर सहभागिता कर सकती है। घर की छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी समस्याओं से परिवार को बाहर निकालने की हिम्मत और क्षमता हर महिला में होती है। घर में एक महिला जाने अनजाने अनेकों दायित्वों का वहन खुशी-खुशी अपने परिवार के लिए करती है। एक अच्छी भोजन विशेषज्ञा, सेविका, शिक्षिका, चिकित्सक ,समय प्रबंधक, वित्त प्रबंधक आदि के जन्मजात गुण ईश्वर ने उसे दिए हैं। जिसने अपने मां -पिता और बड़ी मां या बड़े बाबूजी या चाचा को साथ देखा है। सुख-दुःख बांटते देखा है, वह कभी इस तरह की वाहियात बातें नहीं करेगा। आप अपने पापा के भाई को चाचा कहने में शर्माती हैं, पति के भाई को देवर कहने में शरमाती हैं तो सबसे पहले तो आपको अपना आकलन और विश्लेषण खुद करना होगा।
यहां एक बात जरूरी है कि सारी भूमिकाओं के निर्वहन की उम्मीद सिर्फ एक महिला से नहीं की जानी चाहिए। घर के बड़े बुजुर्ग जिम्मेदारियां बांट सकते हैं। निष्पक्ष होकर बात सुन सकते हैं और बहुत ज्यादा उम्मीद के बगैर भी अच्छी तरह जी सकते हैं।
इस बात को दिमाग से निकालिए कि स्त्री कोई देवी है। वह मानवी है, उसकी संवेदनाओं का ख्याल रखिए और उसे भी सबकी संवेदनाओं के बारे में सोचना चाहिए। प्यार और आदर दोनों हाथों से बजने वाली ताली है। यह लड़कों और लड़कियों के हाथ में है कि अपने जीवनसाथी को अपने रिश्तों के बीच में किसी कीमत पर नहीं आने दें। यह उम्मीद छोड़ दीजिए कि आपके आने से आपके साथी का जीवन बदल जाएगा। अगर आप 25-30 साल रहकर, सब कुछ छोड़कर आई हैं तो आपकी सास और ननद ने भी अपने जीवन की पूंजी आपको सौंपी है। योगदान दोनों तरफ से है तो अहंकार किसी एक में क्यो और किसलिए? आप क्यों अपने साथी को समंदर से बाहर लाकर कुएं में रखना चाहती हैं। आप अपने पति को साथ रखना चाहती हैं तो उसका एक ही तरीका है, उनको अपने परिवार से और अपने बच्चों को उनके दादा-दाद, चाचा-चाची, बुआ-फूफा या भाई -बहनों से अलग मत करें। बच्चे स्ट्रेस बस्टर होते हैं। आपको उनको भौतिक तौर पर अलग कर भी लें मगर अन्दर ही अन्दर आप अपने साथी को खो रही होती हैं। जीवन की गाड़ी अकड़ से नहीं, संतुलन से चलती है। यही बात सास-ससुर, देवर-देवरानी, ननद- जेठ -जेठानी पर लागू होती है….आप अपनी संतानों की गृहस्थी का सीमेंट बनिए…जहाँ जरूरी हो, वहां हस्तक्षेप जरूर कीजिए मगर उनकी मजबूरियों को समझिए….फिर भी सबसे बड़ी जिम्मेदारी युवाओं की है और उनको यह समझना होगा कि शादी उनकी जिन्दगी का हिस्सा है, पूरी जिन्दगी नहीं है।
परिवार है तो स्वावलंबन है बशर्ते परिवार सामंजस्य की कसौटी पर खरा उतरे। आप घर में ही कोई काम अपने परिवार के सदस्यों के साथ कर सकती हैं या अगर नौकरी भी करती हैं तो निश्चित होकर अपने बच्चों को घर में छोड़ सकती हैं। हम यह नहीं कहते कि मामा-मामी या मौसा-मौसी प्यार नहीं करते मगर वह आपके साथ हमेशा नहीं रह पाएंगे, यह भी सच है। ऐसी स्थिति में आपके जेठ, देवर, देवरानी, ननद जैसे रिश्ते खड़े रहेंगे, याद रखएभले ही आप दोनों को साथ चलना है मगर सफर को आसान बनाना हो तो सहयात्रियों की जरूरत पड़ती है और परिवार से अच्छा सहयात्री कोई नहीं हो सकता। यही बात हमारे हर पर्व-त्योहार सिखाते हैं।
छठ पूजा पर यह व्यंजन हैं खास
छठ पूजा विशेष : कौन हैं छठी मइया
- एक प्रमुख लोकमान्यता के अनुसार, छठी मैया को सूर्यदेव की बहन भी माना गया है। चूँकि छठ पूजा सूर्य की उपासना का पर्व है, इसलिए छठी मैया की पूजा साथ में की जाती है।
- एक अन्य मान्यता अनुसार देवी छठी मैया/ऊषा को सूर्य की सहचरी कहा जाता है, जो श्रद्धा और पूजा का एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
- छठ पूजा मुख्य रूप से सूर्य की उपासना का पर्व है। इस त्योहार में डूबते (प्रत्यूषा) और उगते (ऊषा) सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
- कुछ लोककथाओं और स्थानीय मान्यताओं में छठी मैया को सूर्य की बहन या सूर्य की पत्नी/शक्ति के रूप में पूजनीय माना जाता है, इसलिए सूर्य पूजा के साथ ही उनकी पूजा होती है।
- उपर्युक्त मान्यताएं लोककथाओं और कुछ क्षेत्रीय ग्रंथों पर आधारित हैं।
- स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्मांड पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे ग्रंथों में इसका उल्लेख बहुत संक्षिप्त में मिलता है।
- वहीं, उत्तर भारत में, भगवान कार्तिकेय को आमतौर पर ब्रह्मचारी और अविवाहित माना जाता है।
- पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, छठी मैया, जिन्हें षष्ठी देवी या देवसेना कहा जाता है, भगवान कार्तिकेय की पत्नी हैं।
- लोक आस्था और पर्व की परंपरा में, वह सूर्य की उपासना से जुड़ी हुई हैं, जहाँ उन्हें सूर्य की बहन या उनकी शक्ति के रूप में भी सम्मान दिया जाता है।
- दोनों ही मान्यताएँ इस पर्व का हिस्सा हैं, इसलिए ये कन्फ्यूजन होना स्वाभाविक है।
- आप छठी मैया को संतान की रक्षक देवी (कार्तिकेय की पत्नी) और सूर्य देव से जुड़ी शक्ति (पर्व का आधार) के रूप में याद रख सकते हैं।
- (साभार – वेब दुनिया)
पीरियड (मासिक धर्म) में छठ पूजा कैसे करें
पीरियड्स के दौरान छठ पूजा करना एक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक सवाल है, और इसके बारे में अलग-अलग विचार हो सकते हैं। कुछ लोग मानते हैं कि पीरियड्स के दौरान पूजा या धार्मिक अनुष्ठान नहीं करने चाहिए, क्योंकि इसे शारीरिक और मानसिक दृष्टिकोण से अस्थिर माना जाता है। जबकि कुछ लोग इसे सामान्य तौर पर करते हैं, बशर्ते वे साफ-सफाई का ध्यान रखें और अपनी स्थिति का ध्यान रखें। छठ पूजा एक अत्यंत पवित्र और कठिन व्रत है, जिसमें शुद्धता और स्वच्छता का विशेष महत्व होता है। मासिक धर्म/ पीरियड्स के दौरान छठ पूजा करने के संबंध में कई मान्यताएं और नियम हैं। आइए यहां जानते हैं…
1. व्रत जारी रखना
• अधिकांश पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अगर छठ पूजा के दौरान मासिक धर्म शुरू हो जाए, तो भी व्रत को नहीं छोड़ना चाहिए। चूंकि यह व्रत पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाला पारंपरिक व्रत माना जाता है, इसलिए इसे बीच में नहीं तोड़ना चाहिए।
• महिलाएं व्रत जारी रख सकती हैं, लेकिन उन्हें कुछ विशेष नियमों का पालन करना होता है।
2. पूजा और अर्घ्य के नियम
• पूजा सामग्री को स्पर्श न करना: मासिक धर्म के दौरान व्रत रखने वाली महिला को पूजा की किसी भी सामग्री (जैसे प्रसाद, अर्घ्य की टोकरी आदि) को सीधे छूने से बचना चाहिए।
• सहयोगी का चुनाव: इस स्थिति में, पूजा के कार्यों- जैसे प्रसाद बनाना, पूजा की सामग्री घाट तक ले जाना, अर्घ्य की तैयारी करना) के लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य (पति, घर की अन्य महिला, या कोई सहयोगी को चुना जा सकता है। सहयोगी को भी शुद्धता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखना होता है।
• अर्घ्य देना: व्रती महिला स्वयं अर्घ्य देने के बजाय, सहयोगी के माध्यम से अर्घ्य दिलवा सकती हैं। महिला घाट पर परिवार के साथ जा सकती हैं, हाथ जोड़कर प्रार्थना कर सकती हैं, लेकिन विशेषकर मासिक धर्म के पहले 1-4 दिनों में सूर्य देव को सीधे अर्घ्य नहीं देना चाहिए।
• पांचवा दिन: कुछ मान्यताओं के अनुसार, यदि मासिक धर्म का पांचवा दिन हो, तो स्नान करके और बाल धोकर प्रसाद बनाने और भोग लगाने का कार्य सहयोगी ही कर सकती हैं।
3. स्वास्थ्य और सुविधा
• छठ व्रत शारीरिक रूप से बहुत कठिन होता है (36 घंटे का निर्जला उपवास)। यदि मासिक धर्म के दौरान अत्यधिक कमजोरी, चक्कर आना या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं महसूस हों, तो शारीरिक क्षमता के अनुसार ही व्रत करें।
• डॉक्टरों की सलाह है कि इस दौरान निर्जला उपवास जैसी कठोरता से बचें, खासकर यदि स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो। यदि आप शारीरिक रूप से सक्षम न हों, तो मन और हृदय से भक्ति करें और केवल व्रत के नियमों, जैसे सात्विक भोजन और साफ-सफाई का पालन करें।
निष्कर्ष:
• व्रत न तोड़ें, लेकिन पूजा की सामग्री को न छूएं।
• अर्घ्य और प्रसाद के लिए परिवार में किसी सहयोगी की सहायता लें।
• घाट पर जाकर प्रार्थना कर सकती हैं, लेकिन मासिक धर्म के शुरूआती दिनों में सीधे अर्घ्य देने से बचें
• सबसे महत्वपूर्ण है मन में सच्ची श्रद्धा और भक्ति बनाए रखना।
10 साल में प्रदूषण से 38 लाख मौतें, छोटे शहरों में भी हवा जहरीली
नयी दिल्ली । भारत में सांस लेना अब जानलेवा होता जा रहा है। स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण ने देश में 38 लाख लोगों की जान ली, जबकि छोटे और औद्योगिक शहर अब नए प्रदूषण हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहे हैं। इस बात का उल्लेख दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की पुस्तक सांसों का आपातकाल करते हुए चेतावनी दी गई है कि यह संकट अब महानगरों से निकलकर पूरे भारत की हवा को विषाक्त कर चुका है। कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की रिसर्च बताती है कि 2009 से 2019 के दशक में भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतें कुल मृत्यु दर का 25 प्रतिशत हैं। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सख्त मानक (5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) को आधार बनाया जाए तो यह संख्या अनुमानित रूप से 1.66 करोड़ मौतों तक जा सकती है। कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट का अध्ययन भारत के 655 जिलों में किया गया था, जिसमें सभी क्षेत्रों में पीएम 2.5 का स्तर मानक से ऊपर पाया गया। अध्ययन में कहा गया है कि भारत की पूरी आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहां पीएम 2.5 का स्तर डब्ल्यूएचओ के मानकों से कहीं अधिक है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पीएम 2.5 के कण बेहद सूक्ष्म होते हैं, यहां तक कि बाल की मोटाई के मुकाबले 30 गुना पतले जो सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंच जाते हैं। हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि पर मौतों में 8.6% इजाफा दर्ज किया गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार असम-मेघालय सीमा पर स्थित छोटा औद्योगिक नगर बर्नीहाट अब देश का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। यहां का सालाना पीएम 2.5 स्तर 133.4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। दिल्ली स्थित क्लाइमेट-टेक स्टार्टअप रेस्पिरर लिविंग साइंसेज के चार वर्षीय अध्ययन (2021 – 2024) में पाया गया कि देश के 11 बड़े शहरों में पीएम 10 स्तर राष्ट्रीय सुरक्षा मानक 60 माइक्रोग्राम से कई गुना ज्यादा बना रहा। दिल्ली के आनंद विहार में यह स्तर 313.8 माइक्रोग्राम, जबकि पटना में 237.7 माइक्रोग्राम तक पहुंचा। रेस्पिरर के सीईओ रोनक सुतारिया ने कहा, अब यह समस्या केवल सर्दियों की नहीं रही। हम पूरे साल जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। प्रदूषण घटाने में कोई स्थायी सुधार नहीं दिखता।
डूबतो सुरुज के जे पूजे इहे बाटे हमर बिहार
– सुषमा त्रिपाठी
बिहार के आत्मा बसेला छठ महापर्व में और हम हईं बिहारी। हमनी के इंहा मैं न चलेला, हम चलेला। गौर करे वाला बात ई ह कि हम शब्द बिहार में अहंकार के परिचय ना देवला बल्कि समूह, घर – परिवार अउरी समाज के परिचय देवेला। जहवां -जहवां बिहारी गइले…आपन समाज आपन करेजा में रखले…दुनिया के नजर में..अउरी अपने ही देस में हमनी के मजदूर कहल जाता। एगो भाषा के लेके कहियों पर आपन भाषा बोलवाए खातिर लोग आपन अहंकार में गरीब बिहारी के पीट के अपना के बड़का सेर बुझता…मगर भासा परेम के चीज ह….थोपे के न। कवनो भाषा अपना साहित्य से बढ़ेले, ओकरा प्रति जागरूकता से बढ़ेले, दूसरा के महत्व समझ के विनम्र होके साथ चलला से बढ़ेले। हम मान तनी कि भोजपुरी में अश्लील गीत से बदनाम करे वाला कलाकार बाड़े अउरी ओकरा से हमनी के माथा लाज से गड़ जाला लेकिन भोजपुरी खाली ओतने त न ह। छठ के मौका बा…बोल दीं कि शारदा सिन्हा के गीत सुन के कि राउर अंखियन से लोर न आ जाला। आज पूरा संसार में जइसे भोजपुरी लोग सुनतरे, ओइसहीं छठ पूजा भी होखता…हमनी के कवनो भासा बा संस्कृति के अपमान न करेलींजा, उ बात अलग बा कि रउरा सबके नजर में बाप – दादा के जमाने से राउर अर्थव्यवस्था के रीढ़ रहे वाला बिहारी बहिरागत अउरी वोट बैंक ही रह गइल। कभी छठ पूजा में देखब…जे सुरूज देव….भर संसार के उजियार करेलन…हमनीं के ओनकर पूजा करेलींजा। परकति देवी के छठां अंश हईं छठी मइया…हमनी के ओनकर पूजा करेलीं जा। हमनी के बिहारी हईं…साल भर परदेस में खट लेब जा लेकिन बरिस में एक बार त घरे जाहिं के बा…छठ के बहाने परिवार से मिलल हो जाला, माई-बाबू के देख ले लीं जा…इ चार दिन के चैन भी बहुत जगहा खटकेला।
छठ पूजा परिवार के एक राखे के मंगलकामना के पूजा ह..कवनो ऊंच -नीच न। लोक साहित्य पढ़ब त जानब कि छठी मइया सुरुज देव के बहिन हईं। जब जीवन देवे वाला जल के साधन मानके हमनीं के ओनका से गोहार लगाइलें त परिवार के आगे बढ़ाए के आसीरबाद मिलेला। हमनीं के इहां मइया स्त्री अउरी ममता के प्रतीक हई। परिवार के सही मतलब तब बूझब रउरा, जब छठ के गीत गहराई से सुनब। छठ के गीत में कुल अउरी परिवार के बात बा, मजबूत सम्बन्ध – आपसी सहयोग के बात बा। परिवार के मतलब अहजा पति-पत्नी अउर बच्चा भर न ह बल्कि एकरा के आगे बढ़के बा। पूरा परिवार छठ के तैयारी में शामिल होला। आज के एकल परिवार में जब आगे -पीछे केहु नइखे। बच्चन से बूझे अउर बतिवाले वाला केहू नइखे…तब इहे परिवार खड़ा होला। छठ ए परिवार के भावना के मजबूत करेके नाम ह..अवसर ह…जहाँ बच्चन से लेकर जवान अउरी बुढ़वन तक, सब के सब छठी माई के पूजा में आपन-आपन भूमिका निभावेला। अइसन कवनो बाध्यता नइखे कि खाली महिला ही इ बरत करिहें, मरद लोग भी करेला। परसादी बनाए में, घाट सजाए में, पूजा के सामान जुटाए में सबके भूमिका रहेला। गेहूं सुखाते – सुखाते बतरस में कब दुःख सूख गइल पते न चलेला। इ समाज रेगिस्तान में चलेला…छठ नीहन परब..एकरा में पोखर नीहन बा..जे पियास बुझावेला…टूटत करेजा के सम्भार लेला। दादा-दादी, नाना-नानी, भाई- बहिन, भउजी, चाचा -चाची, मउसा- मउसी, मामा-मामी, फुआ -फूफा, बच्चा सबके लेके परिवार बनेला…। समस्या कहवां नइखे लेकिन…उ समस्या में राह देखावे खातिर सबसे पहिले इहे लोग खड़ा होएला। बच्चन के हमनी के इहां अकेले न छोड़ल जाला। बड़का बाबूजी,चाचा, मामा कब बाप बन जाएले..पतो न चलेला। फूआ-चाची,मउसी, मामी कब महतारी नीहन अंकवारी में सब ताप हर लेली, बुझियो न पाइब…एहे परिवार ह…इहे परिवार ह। जब नइकी दुलहिन बियाह कइके ससुरारी आवेली…तब इहे परिवार ओनका साथ रहेला..ननद कब भउजाई खातिर अपने परिवार के सामने खड़ा हो जाएली…पता न चलेला। काहे कि ए घर में ननद ही बहिन के जगहा पर बाड़ी । दुलहिन भी जब बरत करेली तब समूचा कुल-परिवार के आपन आराधना में शामिल करेली -लिहिएं अरग हे मईया/ दिहीं आशीष हजार । पहिले पहिल हम कईनी/छठी मईया व्रत तोहर । करिहा क्षमा छठी मईया/ भूल-चूक गलती हमार ।
छठी मैया से संतान, स्वास्थ्य और परिवार की समृद्धि के कामना कइल जाला। प्रार्थना कवनो व्यक्ति विशेष खातिर ही न होवेला। परदेस जाकर काम करे वाला बबुआ खातिर महतारी पूजा करेलीं कि कइसहूं छठ पर बबुआ घरे आवस। छठ के गीत में बेटी के अउरी ओकर कल्याण के कामना कइल जाला — हम तोहसे पूछी बरतिया ए बरतिया से केकरा लागी, हम तोहसे पूछी बरतिया ए बरतिया से केकरा लागी ।। के करेलू छठ बरतिया से केकरा लागी, के करेलू छठ बरतिया से केकरा लागी ।। हमरो जे बेटी तोहन बेटिया से उनके लागी, हमरो जे बेटी तोहन बेटिया से उनके लागी ।। से करेली छठ बरतिया से उनके लागी, से करेली छठ बरतिया से उनके लागी ।।
खाली बेटी न बल्कि पढ़ल-लिखल दामाद भी बरती के चाहीं। -‘रुनकी-झुनकी बेटी मांगिला, पढ़ल पंडितवा दामाद…हो छठी मईया, तोहर महिमा अपरमपार’।
छठ के गीतों में देवर के चर्चा बा -कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय बहंगी लचकत जाय होई ना देवर जी कहरिया, बहंगी घाटे पहुंचाय बहंगी घाटे पहुंचाय ऊंहवे जे बारि छठि मैया बहंगी के उनके के जाय बहंगी उनका के जाय। शारदा सिन्हा के हई गीत सुनीं -हमरो सुन लीं पुकार/ससुरा में अईनी कईनी बरतिया/हिवआ जुड़ाई दीहिं पिया के पीरीतिया/अचल सुहाग दीह मईया, कईनी बरत तोहार/गोदिया भराई दीहीं धियवा अऊर पुतवा/अंचरा में भरी दीहीं ममता दुलरवा/ सूपवा चढ़ाईब छठी मैया, देहब अरघ तोहार/ सास-ससुर के रोगवा मिटईह/उनकर कयवा के कंचन बनईह/कंचन बनईह लऊके अन्हार छठी मईया/कर दीहिं घर ऊजियार/देवरा-ननदिया के दीहीं वरदनवा/परजन पुजन पुराई सपनवा
छठ खातिर कवनो पंडित -पुरोहित न चाहीं। परिवार से लेके आस- पड़ोस, गांव -जवार, सब परिवार हो जाला। घाट पर अनजान भी परिवार हो जाला। छठ सामूहिक, आपन बना लेवे के परब ह। बिहार के मैथिली में एगो गीत बा – ‘डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै, उग हो सुरुज देव/ अरघ केर बेर, हो पुजन केर बेर। मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै, उग हो सुरुज देव।।’ गीतों में पेड़-पौधे, फूल-पत्ती की विस्तार से चर्चा बा, ओनकर महातम के चर्चा बा। मसलन- ‘कोन जल पटेब मालिन, बेली-चमेली/ मालिन कोन जल पटेब अड़हुल फूल।।’ अइजा परम्परा बा, प्रकृति बा, सरजनहार बाड़े। अब त दुःख – पीड़ा मिटाए के गोहार बा – दिन-रात खटी-खटी पैसा कमाइला, सब कमाई करजा में जाय; हे छठी मइया बिहारे में दे दीं रोजगार।
दुःख के बीच अगर जीयल सीखे के बा त बिहार आईं। कम में गुजार करके कइसे कमर्ठ होके संतोष से सुख से जीयल जाला, इ सीखे के बा त कवनो परदेसी बिहारी के पास जाईं। सब तरह के बेइज्जती के बीच कइसे श्रमदान से लेके …सीमा पर सैनिक जीवनदान करेलन…इ देखे खातिर बिहार आईं। बिहार के नाम पर मजाक आसान ह। राम जी के भी सीता मइया खातिर बिहार के मिथिला में ही आइके पड़ल रहे। बाल्मीकि…लिखलेह तबे रउरा राम जी के जानतनी। बाकी अउरी का कहीं…काहे कि कृतज्ञता बिहार के रोम-रोम में बसल बा -डूबतो सुरुज के जे पूजे इहे बाटे हमर बिहार इहे बाटे हमर बिहार।
मशहूर अभिनेता सतीश शाह का निधन
मुम्बई। मशहूर हास्य अभिनेता सतीश शाह का शनिवार को निधन हो गया है। फिल्मकार अशोक पंडित ने इस बात की जानकारी सोशल मीडिया पर शेयर की। सतीश शाह ने करीब 4 दशकों तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम किया। इस दौरान उन्होंने कई हिट फिल्मों और टीवी सीरियल्स में अपनी अदाकारी से लोगों का दिल जीता। उनकी अदाकारी इतनी रियल होती थी कि उनके साथ काम करने वाले एक्टर शूटिंग करने की बजाय हंस-हंसकर लोटपोट हो जाया करते थे। ऐसा ही एक वाकया फिल्म ‘मैं हूं ना’ की शूटिंग के दौरान हुआ। दरअसल, एक सीन को फिल्माते समय उनकी एक्टिंग और कमाल की कॉमिक टाइमिंग देख शाहरुख खान की हंसी छूट गई थी, लेकिन सतीश शाह ने उसे शॉट खराब करने की कोशिश समझा और डायरेक्टर फराह खान से फिल्म छोड़ने की बात कह दी। मामला बिगड़ते देख शाहरुख खान आगे आए और उन्होंने सतीश शाह की गलतफहमी दूर की। यह किस्सा खुद उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में शेयर किया था। सतीश शाह ने बताया था कि फिल्म ‘मैं हूं ना’ के डायरेक्टर फराह खान ने उन्हें दो किरदार ऑफर किए थे। पहला था कॉलेज के प्रिंसिपल का और दूसरा था एक थूकने वाले प्रोफेसर का।
यह किरदार लेक्चर या बात करते समय थूक फेंकता था। सतीश को लगा कि ये रोल उनकी कॉमिक स्टाइल से मैच करेगा और वाकई ये उनके करियर का एक यादगार हिस्सा बन गया।
‘मैं हूं ना’ की शूटिंग शुरू हुई। सतीश ने मिरर के सामने उस लहजे में बोलने की प्रैक्टिस की, लेकिन सेट पर पहुंचे तो हालात उलट गए। पहले ही टेक में सतीश ने जब डायलॉग बोला, “क्लास, अटेंशन!” और ‘थूकने’ का ऐक्ट किया तो साथी कलाकार शाहरुख खान, सुष्मिता सेन समेत वहां मौजूद सभी लोग हंस पड़े।
सतीश को लगा कि उनसे शॉट गलत हो गया, लेकिन फराह खान ने कट न कहकर कहा- ‘परफेक्ट! फिर से।” दूसरे टेक में फिर वही—हंसी का दौर।
8 टेक तक ऐसे ही चलता रहा, कभी शाहरुख की आंखों में आंसू आ जाते, कभी सुष्मिता कंधे हिला-हिलाकर हंसतीं। यह देख सतीश का चेहरा लाल हो गया। वे इतने परेशान हो गए कि मन बना लिया कि अब वह यह फिल्म छोड़ देंगे, सब उनका मजाक उड़ा रहे हैं।
सतीश गुस्से में फराह खान के पास गए और बोले, “ये क्या हो रहा है? अगर ऐसे ही चलेगा तो मैं जा रहा हूं।” तभी शाहरुख ने बीच में कूदकर कहा, “सर, रुकिए! समस्या ये है कि आपकी एक्टिंग इतनी रियल है कि हम अपनी हंसी रोक नहीं पा रहे, लेकिन सीन तो पूरा करना है।”
फिर टीम ने इसे शूट करने का आइडिया निकाला। सतीश शाह के शॉट्स अलग से फिल्माए गए और बाकी कलाकारों के अलग। आखिरी में जब एडिटिंग हुई, तो सीन परफेक्ट लग रहा था। जब फिल्म रिलीज हुई, तो दर्शक ठहाकों से लोट-पोट हो गए। सतीश शाह के इस किरदार की आज भी लोग नकल करते दिखाई देते हैं।




