नयी दिल्ली । देश भर के कई इलाकों में लगातार बढ़ रहे गर्मी के प्रकोप बीच सरकार ने भीषण गर्मी में खुद को सुरक्षित रखने के लिए जनता के लिए हेल्थ एडवाइजरी (स्वास्थ्य सुझाव) जारी की है।
गर्मी को मात देने के लिए, सरकार द्वारा सुझाए गए कुछ उपायों में हाइड्रेटेड रहना, घर के अंदर पर्याप्त पानी पीना, ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ओआरएस) का उपयोग करना और उच्च पानी की मात्रा वाले मौसमी फल और सब्जियां खाना शामिल हैं।
साथ ही लोगों को हल्के रंगों के पतले, ढीले, सूती कपड़े पहनने की भी सलाह दी गयी है। एडवाइजरी में आगे कहा गया है: “अपना सिर ढकें: सीधी धूप के संपर्क में आने के दौरान छाता, टोपी, टोपी, तौलिया और अन्य पारंपरिक हेडगियर का उपयोग करें।” सरकार ने लोगों को बाहरी गतिविधियों को दिन के ठंडे समय – सुबह और शाम तक सीमित रखने की भी सलाह दी है।
सरकार ने ऐसे लोगों को भी सूचीबद्ध किया है जो गर्मी या गर्मी से संबंधित बीमारी से पीड़ित होने का अधिक जोखिम रखते हैं – जिनमें शिशु, छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं, मानसिक बीमारी वाले लोग और बाहर काम करने वाले लोग शामिल हैं।
क्या न करें
धूप में बाहर निकलना, विशेष रूप से दोपहर 12:00 बजे से 03:00 बजे के बीच, नंगे पांव बाहर जाना, गर्मी के चरम घंटों के दौरान खाना पकाना।
सरकार की एडवाइजरी के अनुसार हीट रैश, हीट एडिमा (हाथों, पैरों और टखनों में सूजन, हीट क्रैम्प्स (मांसपेशियों में ऐंठन), हार्ट सिंकोप (बेहोशी), हीट स्ट्रोक गर्मी से संबंधित कुछ बीमारियां हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण द्वारा शनिवार को जारी की गई एडवाइजरी में कहा गया है, ‘स्वास्थ्य सुविधाओं को ठंडा करने वाले उपकरणों के निरंतर कामकाज के लिए निर्बाध बिजली की व्यवस्था करके, सौर पैनलों की स्थापना (जहां भी संभव हो), इनडोर गर्मी को कम करने के उपायों के माध्यम से, ग्रीन रूफ (एनडीएमए दिशानिर्देशों को संदर्भित किया जा सकता है), खिड़की के रंग, बाहर की छाया, आदि अत्यधिक गर्मी में लचीलापन बढ़ाने की आवश्यकता है।। पानी में आत्मनिर्भरता के लिए वर्षा जल संचयन और पुनर्चक्रण संयंत्रों का भी पता लगाया जा सकता है।
इस एडवाइजरी में लिखा गया है, ‘राज्य सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) के साथ-साथ सामुदायिक स्तर की जागरूकता सामग्री का उपयोग भी कर सकते हैं, जो कि गर्मी की लहर से खुद को बचाने के लिए आबादी द्वारा बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में है। इस पत्र के साथ एनसीडीसी द्वारा तैयार ‘क्या करें और क्या न करें’ को शामिल करते हुए जन स्वास्थ्य परामर्श का एक मानक परिपत्र संलग्न किया जा रहा है। इस दस्तावेज़ को एक टेम्पलेट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप अनुकूलित किया जा सकता है और साथ ही व्यापक प्रसार के लिए स्थानीय भाषाओं में अनुवाद किया जा सकता है।”
देश के कुछ हिस्सों में पिछले कुछ हफ्तों से भीषण गर्मी पड़ रही है, जहां उत्तर पश्चिम और मध्य भारत में उच्च तापमान क्रमशः 35.9 और 37.78 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। देश के दोनों क्षेत्रों ने 122 वर्षों में सबसे गर्म अप्रैल का अनुभव किया।
लगातार बढ़ रहे गर्मी के प्रकोप बीच केंद्र ने जारी की ‘हेल्थ एडवाइजरी
बिहार में दो साल से प्यासी है बलदहिया नदी
नारायण कुमार, रतनी फरीदपुर (जहानाबाद)। बिहार में एक तरफ जल जीवन हरियाली योजना के तहत विलुप्त हो चुके जल स्रोतों को ढूंढने और उसके जीर्णोद्धार करने का प्रयास चल रहा है, वहीं कल-कल कर बहने वाली एक नदी को कुर्बान कर दिया गया।
इलाके के किसानों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली बलदहिया नदी पिछले दो साल से बूंद बूंद पानी को तरस रही है। यह नदी गया जिले की सीमा से आगे बहते हुए प्रखंड क्षेत्र के भूमि को सिंचित कर सदर प्रखंड के खेतों को पानी देते हुए पटना जिले के सीमावर्ती क्षेत्र में पुनपुन में मिलती है।
इलाके के किसान बताते हैं कि इस नदी से हजारों एकड़ भूमि वर्षों से सिंचित होती थी, लेकिन पिछले दो साल से बरसात में भी यह प्यासी रह जा रही है। दरअसल, गया जिले के टेकारी थाना अंतर्गत फेनगी के समीप बांध बनाया गया है। इस कारण इस नदी को बांध दिया गया है। बांध इतना ऊंचा है कि बाढ़ आने के बाद ही इस नदी तक पानी पहुंच सकेगा। परिणामस्वरूप दो सालों से यह नदी प्यासी है।
नदी में पानी नहीं आने से किसानों की फसल सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है। इलाके का भूजल स्तर भी नीचे जा रहा है। यदि निकट भविष्य में इस नदी के साथ न्याय नहीं हुआ तो इसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और हजारों एकड़ भूमि बंजर हो जाएगी। सैकड़ों गांवों में भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा। इलाके के किसान नदी की दुर्दशा देख परेशान हैं।
बलदहिया नदी के नाम पर है सर्किट हाउस का एक कमरा
जहानाबाद सर्किट हाउस में कमरों के नाम नदियों के नाम पर रखे गये हैं। इनमें एक कमरा बलदहिया के नाम से भी है। ताकि अतिथिशाला में ठहरने वाले लोगों को यहां के जल स्रोतों की जानकारी मिल सके। यह पूरी पहल जिला प्रशासन द्वारा की गयी है जो निश्चित ही जल स्रोतों के प्रति लोगों को सजग करने की अच्छी पहल है। लेकिन बलदहिया के नेम प्लेट को देख नदी की दुर्दशा की तस्वीर भी जेहन में ताजा हो जा रही है। जिस नदी का नाम जिला प्रशासन अपने अतिथियों के समक्ष गर्व से रखता है। उस नदी को पानी के बूंद- बूंद के लिए तरसना पड़ रहा है। ऐसा न हो कि नेम प्लेट तक ही इस नदी का नाम सीमित रहे और धरातल से यह विलुप्त हो जाए।
(साभार – दैनिक जागरण)
अक्षय तृतीया पर हल्के और आकर्षक गहने
अक्षय तृतीया पर सोना खरीदने की परम्परा है। आम तौर पर शादियों में भारी जेवर खरीदे जाते हैं मगर रोजमर्रा की जिन्दगी में हल्के जेवर ही अधिक पसन्द किये जाते हैं। एच.के. ज्वेल्स के किसना डायमंड ज्वेलरी के कलेक्शन में ऐसे ही हल्के जेवरों के डिजाइन आप यहाँ देख सकते हैं। इनकी कीमत 5 हजार से 25 हजार रुपये के बीच है –







(सभी आभूषण किसना डायमंड ज्वेलरी के कलेक्शन से)
अक्षय तृतीया पर आभूषण बाजार को 10 हजार करोड़ के कारोबार की उम्मीद
सोने में तेजी से मंदी के बावजूद माँग बढ़ेगी
कोलकाता । इस बार अक्षय तृतीया पर आभूषण उद्योग बेहतर रहने की उम्मीद है। हालांकि सोने की भारी कीमतों के कारण कारोबार थोड़ा कम रह सकता है मगर यह कोरोना पूर्व की स्थिति में पहुँच सकता है। एच के ज्वेल्स (किसना डायमंड ज्वेलरी) के निदेशक पराग शाह ने अक्षय तृतीया के कारोबार पर यह उम्मीद जतायी है। उन्होंने कहा कि हाल ही में लंबे समय तक वैश्विक उथल-पुथल के बाद चिंताएं बढ़ीं, उपभोक्ताओं ने बढ़ती मुद्रास्फीति को मात देने के तरीकों का सहारा लिया। उम्मीद है कि लोग मुद्रास्फीति को दूर करने के लिए इस अक्षय तृतीया पर परम्परा निभाएं और सोना खरीदें। कोरोना -19 के पूर्व 2019 में अक्षय तृतीया के दिन करीब 29,000 किलोग्राम सोने और आभूषणों का कारोबार हुआ। इस दौरान 35,000 रुपये प्रति 10 ग्राम सोने की दर से 10,000 करोड़ रुपये का व्यवसाय हुआ था। 50000 रुपये प्रति 10 ग्राम पर अधिक कीमत के कारण 20,000 किलोग्राम का पहले से कम व्यवसाय होगा। इस बार अक्षय तृतीया बाजार 10,000 करोड़ रुपये के पूर्व-महामारी के स्तर तक पहुंचने का अनुमान है। पूरे भारत में लगभग चार लाख सोने और आभूषण के व्यापारी हैं। भारत के आभूषण व्यापार के शीर्ष संगठन ऑल इंडिया ज्वैलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन के राष्ट्रीय संयोजक के अनुसार, अक्षय तृतीया और धनतेरस पर सोने की दूसरी सबसे बड़ी एकल-दिवस बिक्री है।
शाह ने कहा कि उनका ब्रांड किसना अक्षय तृतीया आभूषण बाजार में 1 प्रतिशत यानी 100 करोड़ रुपये पर कब्जा करने की इच्छा रखता है। अक्षय तृतीया के शुभ दिन सहित अप्रैल ~ मई 2022 सीजन के दौरान पूरे भारत में प्रदर्शनियों के माध्यम से लगभग 66 सुपर नॉर्मल मास कंज्यूमर कॉन्टैक्ट [एसएनएमसीसी] आयोजित होने की उम्मीद है। KISNA को इस सीजन में 15 फीसदी की वृद्धि की उम्मीद है।
मजबूत होगा स्वर्ण बाजार
सोने की कीमतों पर पर बात रखते हुए पराग शाह ने कहा कि अनिश्चितता और समसामायिक घटनाओं को लेकर बनी परिस्थितियों से सोने की कीमतों में तेजी आई। क्रिप्टो में नए निवेशकों के बढ़ते प्रवाह के भी सोना खरीदने की ओर बढ़ने की संभावना है। इससे भी सोने की कीमतों में मजबूती आने की संभावना है। स्पॉट गोल्ड की कीमतें 1 जनवरी, 2022 को 48157 रुपये प्रति 10 ग्राम (995 के) से 9.87% बढ़कर 14 अप्रैल 2022 को 52912 रुपये हो गईं, जो प्रभावी रूप से मार्च 2022 में आरबीआई द्वारा 12 अप्रैल 2022 को घोषित 6.95% की खुदरा मुद्रास्फीति का मुकाबला कर रही थीं। लंदन फिक्स से प्राप्त हुआ 4 जनवरी 2022 को 1811.40 अमरीकी डॉलर प्रति ट्रॉय औंस से 14 अप्रैल 2022 को 1963.25 अमरीकी डॉलर तक, इस अवधि के दौरान 8.38% की वृद्धि। इसके अलावा, क्रिप्टो की कीमतों पर अनिश्चितता और समझ की कमी एक आम आदमी के लिए सोने का विकल्प चुनना आसान बना रही है। वयोवृद्ध निवेशकों ने सोने में 10% हिस्सेदारी रखने का उल्लेख किया है क्योंकि मुद्राओं का अवमूल्यन किया जाएगा।
भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज को शैक्षणिक सम्मान
कोलकाता/कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज को शिक्षा के क्षेत्र में में ब्रांड स्टोरी अवार्ड द इंडिया ब्रांड एंड लीडरशिप कॉन्क्लेव में दिया गया। गत 30 अप्रैल 2022 को नयी दिल्ली कॉलेज की ओर से कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह को इस सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध अभिनेता कबीर बेदी और विनीत गोयनका द्वारा यह पुरस्कार प्रदान किया गया। कॉलेज के टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने सभी विभागों के शिक्षकों और विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ दीं। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
भारतीय भाषा परिषद में युवा लेखन कार्यशाला का उद्घाटन
उद्बोधन सत्र में डॉ अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि एक लेखक के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है| पढ़ने से बुद्धि और ज्ञान का विकास होगा जो रचनात्मक लेखन में सहयोगी होगा| मृत्युंजय ने कहा कि एक लेखक को अपनी संगति का ध्यान रखना पड़ेगा कि हम किससे मिलजुल रहे हैं| अच्छी संगति से रचनात्मकता में निखार आती है| प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि लिखते से रहने से अपने भीतर का आदमी बड़ा बनता है| प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि इस दौड़ते समय में स्वयं पर नियंत्रण रखने की जरूरत है| ठहर कर सोचने की जरूरत है| यह भी देखने की जरूरत है कि हमारा समय आखिर कहां जाया हो रहा है| उन्होंने कहा कि बिना पढ़े रह पाना कितना बड़ा विरोधाभास है| साहित्य नहीं पढ़ना मतलब मानवता की सीमा से दूर होना है| युवा कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया| कार्यक्रम का संयोजन और संचालन रेशमी सेनशर्मा, तृषान्विता बनिक और राजेश सिंह ने किया| धन्यवाद ज्ञापन साहित्यकार मृत्युंजय ने दिया|
कल्याणी विश्वविद्यालय में‘एम. ए. हिन्दी पाठ्यक्रम नवीनीकरण’ विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला
इक्कीसवीं शताब्दी के इक्कीस वर्ष : हिंदी साहित्य पर सीयू में गोष्ठी
कोलकाता | ‘कलकत्ता विश्वविद्यालय’ में गत बुधवार को ‘एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘ का आयोजन किया गया | गत 27 अप्रैल को विश्वविद्यालय के आशुतोष कक्ष में आयोजित इस संगोष्ठी में राज्य के अन्य प्रमुख विश्वविद्यालयों से भी प्राध्यापक और प्रध्यापिकाएं वक्ता के रूप में कार्यक्रम में जुड़े |
आतिथियों के स्वागत व् दीप प्रज्वलन के पश्चात् माँ सरस्वती की वंदना की गयी | संगोष्ठी दो सत्रों में विभाजित रही |
सत्र का उद्घाटन वक्तव्य कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. सत्या उपाध्याय ने दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने साहित्य और जीवन के संबंध में बात करते हुए साहित्य को मानव कल्याण की और उन्मुख करने वाली एक प्रेरणा शक्ति माना| उन्होंने आगे कहा कि साहित्य ही वह साधन हैं जो मनुष्य को पशुता से मुक्त कर उसमें मानवीयता का संचार कर सकता हैं |
प्रथम सत्र के आलोचनात्मक सत्र के आरम्भ से पूर्व कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो० राजश्री शुक्ला जी ने विषय प्रवर्तन करते हुए भूमंडलीकरण और बाजारवाद के संबंध पर चर्चा की और साहित्य किस प्रकार इस बाजारवादी सभ्यता के चमत्कार के पीछे के सत्य से हमें अवगत कराता हैं , यह बताया । उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं शताब्दी का साहित्य बाज़ारवाद के प्रतिरोध का साहित्य है । इस काल का साहित्य गुण और परिमाण सभी आयामों में बड़ी रचनात्मक सक्रियता की झलक देता है । लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रभाव इस साहित्य पर दिखाई देता है। आलोचनात्मक सत्र पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. अरुण होता के वक्तव्य से आरम्भ हुआ | 1991 से देश में आरम्भ हुए भूमंडलीकरणके नुकसानदायक परिणाम और साहित्य द्वारा इन नकारात्मक पक्षों का उद्घाटन करना , यह उनकी चर्चा का विषय रहा | विमर्शों पर चर्चा करते हुए उन्होंने स्त्री विमर्श के व्यापक स्वरुप की छवि को प्रस्तुत किया | समाज में व्याप्त वर्त्तमान समस्याएँ जैसे गरीबी और भ्रष्टाचार के मुद्दे भी उनकी चर्चा के विषय रहे |
सत्र का दूसरा वक्तव्य डॉ. देवेश जी द्वारा दिया गया | उन्होंने 2001 से 2021 तक घटित कई राष्टीय – अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं पर चर्चा करते हुए उद्योगीकरण से उत्पन्न संवेदनहीनता पर प्रकाश डाला |
सत्र के तीसरे वक्ता कल्याणी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. हिमांशु कुमार ने साहित्य और सिनेमा पर चर्चा करते हुए वर्तमान सिनेमा को आर्थिक लाभ का घर कहा | सत्य ही सिनेमा साम्पदायिक , धार्मिक कट्टरता जातिवाद को बढ़ाने का साधन बन गया हैं , इस पर भी उन्होंने विचार रखे |
प्रथम सत्र की चतुर्थ वक्ता स्कॉटिश चर्च कॉलेज की प्राध्यापिका गीता दूबे ने इक्कीसवीं शताब्दी को ‘रचनात्मक विस्फोट’ की संज्ञा दी, क्योंकि इस शताब्दी ने विमर्शों को विस्तार दिया हैं | नासिर शर्मा जी की रचना ‘कुइयां जान ‘ पर बात करते हुए उन्होंने पर्यावरण विमर्श पर प्रकाश डाला |’यह सच अभी’ कहानी संग्रह के जरिये पुरुष विमर्श , ‘मछली मरी हुई’ और ‘तिरोहित’ रचना के जरिये समलैंगिक विमर्श और ‘पाँव टेल की धूप’ के जरिय नक्सल विमर्श पर उन्होंने चर्चा की |
प्रथम सत्र का अंत हिंदी विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. दामोदर मिश्र जी के वक्तव्य के साथ हुआ | प्रथम सत्र का सफल संचालन कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. रामप्रवेश रजक जी ने किया |
इसे पश्चात डॉ. शुभ्रा उपाध्याय की अध्यक्षता में शोधपत्र वाचन हुआ , जिसमे कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोधार्थी अनुराधा त्रिपाठी और अमित कौर ने अपने शोधपत्र का वाचन किया |
द्वितीय सत्र
द्वितीय सत्र का आरम्भ विद्यासागर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. संजय जायसवाल के वक्तव्य से हुआ | उन्होंने लंदन – अमेरिका से शुरू हुए खोखले विकासवाद पर चर्चा करते हुए भारत पर पड़े इसके नकारात्मक परिणामों की चर्चा की | बहुराष्ट्रीयवादी कंपनियों की धन उपार्जन की लालसा , लोगों की पहचान मात्र संख्या बन कर रह जाना , अन्नदाताओं की बुरी स्थिति का चित्रण आदि विषयों पर अपने वक्तव्य के माध्यम से प्रकाश डाला| द्वितीय सत्र की दूसरी वक्ता लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज की प्रधायापिका डॉ. संध्या सिंह रही |
वक्ता ने लेखक शिरीष खरे की रचना ‘एक देश बारह दुनिया :हाशिए पर छूते भारत की तस्वीर ‘ को संदर्भित करते हुए कहा कि एक और तो इक्कीसवी शताब्दी को आपर संभावनाओं का घर माना हैं , विज्ञान ने हर चीज को संभव बना दिया हैं और लोगो को नया मंच प्रदान किया है , जिससे हाशिये के लोगों की आवाज भी सुनी जा रही हैं , पर वही दूसरी ओर वह यह भी कहती हैं कि हमने इक्कीसवी शताब्दी को कुछ नहीं दिया हैं | हम आज भी धार्मिक कट्टरता , विकास – लोभ की भूख , बर्बरता में जी रहे हैं और जैविक हथियार बनकर प्रकृति का दोहन कर रहे हैं | आज का साहित्य हमारे इसी दूसरे रूप का चित्र प्रस्तुत करता हैं | उन्होंने इंडिया और भारत के दो भिन्न चेहरों पर भी चर्चा की | जहाँ इंडिया विकसित देश हैं तो वही भारत भूखे सोते किसानों – मजदूरों का देश है |उन्होंने विस्थापन की पीड़ा ,न केवल मनुष्य बल्कि प्रकृति – इस विषय पर भी चर्चा की| उन्होंने कहा कि साहित्य में ही यह क्षमता है जो इन स्थितियों को सुधार सकता हैं |
द्वितीय सत्र की तीसरी वक्ता कचरापारा कॉलेज की प्राध्यापिका डॉ. सुनीता मंडल रही |उन्होंने अपने वक्तव्य में भूमण्डलीकरण , वैश्विक महामारी , आतंकवाद आदि समस्याओं पर चर्चा करते हुए लोगों में बची जिजीविषा पर रेखा खींची | वह जिजीविषा जिसे साहित्य ने जिन्दा रखा है |
द्वितीय सत्र का अंत प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका प्रो. तनुजा मजुमदार जी के अध्यक्षीय भाषण के साथ समाप्त हुआ | इस सत्र का सफल संचलान कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक प्रो. विजय कुमार साव जी ने किया |
इसके पश्चात प्रो. ममता त्रिवेदी जी की अध्यक्ष्यता में शोधवाचन समारोह हुआ , जिसमे कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोधार्थी दीक्षा गुप्ता , प्रीतम रजक और अमर कुमार चौधरी द्वारा अपने शोधपत्र का वाचन किया गया। संगोष्ठी का अंत कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला जी द्वार धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ |
ब्लैक कर्टन थिएटर की एक शाम, रंगमंच और ग़ज़लों के नाम
वरिष्ठ रंगकर्मी अजहर आलम की स्मृति में आयोजित हुआ काव्य कोलाज ‘रेत और इंद्रधनुष’
कोलकाता । वरिष्ठ रंगकर्मी अज़हर आलम की जयंती पर लिटिल थेस्पियन की ओर से काव्य कोलाज कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर कवयित्री शशि सहगल की 20 कविताओं के कोलॉज ‘रेत और इंद्रधनुष’ का अभिनयात्मक आयोजन सुजाता सदन थियेटर हॉल में हुआ। इसका निर्देशन लिटिल थेस्पियन की निदेशक उमा झुनझुनवाला ने किया। एक्सिस बैंक के क्षेत्रीय अध्यक्ष श्रीलाल सिंह, बी.एस. एफ पूर्वी कमांड के विशेषज्ञ विजेंद्र शर्मा, दैनिक छपते- छपते के प्रधान संपादक विश्वम्भर नेवर, अज़हर आलम मेमोरियल ट्रस्ट की अध्यक्ष सुमित्रा झुनझुनवाला और साहित्य टाइम के एम. डी. केयुर मजमुदार उपस्थित थे। केक काटकर सभी दर्शकों का मुंह मीठा कराया गया। अज़हर आलम को याद करते हुए वरिष्ठ पत्रकार विश्वम्भर नेवर ने कहा कि अजहर ने इतने कम समय में इतनी सफलता प्राप्त की। श्रीलाल सिंह ने अजहर आलम को याद करते हुए आयोजन की सराहना की। उन्होंने कहा कि कविता में आदमी होने का एहसास है। प्रकाश योजना भी इंद्रधनुष का पूरी कविता के माध्यम से रखे गए जीवन में विभिन्न अर्थ के साथ व्यजित होती है। उन्होंने संगीत संयोजन पर भी विचार रखे। इस कार्यक्रम में कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्राचार्य डॉ. सत्या उपाध्याय, स्कॉटिश चर्च कॉलेज की प्रोफेसर डॉ गीता दूबे, खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज की प्रोफेसर शुभ्रा उपाध्याय भी उपस्थित थीं।
इस प्रकार रोजमर्रा के जीवन में स्त्री एक ही देह में कई जीवन जीती चली जाती है इसी बीच में उसकी अखंडता कई खंडों में विभाजित हो जाती है पेड़ों को मनुष्य काटते जा रही हैं और मनुष्य मनुष्य को भी काट रहा है प्रकृति गोल है हर कर्म वापस मनुष्य के पास वापस आता है यह दर्शन उभर कर आता है संप्रदायिक जीवन के बीच सच्चे सिर की तलाश में मनुष्य कई सवालों से गुजरता है फिर वह अपने अस्तित्व को चुनौती देते हुए धर्म ग्रंथों से भी प्रश्न करता है उसके उत्तर में हिमालय का बर्फ भी पिघलने लगता है जो पूरी मनुष्य जाति का शर्म से पानी होने के बिंब को दर्शाया गया है हमारा मन हमेशा यही चाहता है कि खिड़की वाली सीट हमारी हो जहां बैठकर पूरी दुनिया को हम करीब से देख सकें इस काव्य मंचन का नित्यात्मक काव्य प्रस्तुति की परिकल्पना उमा झुनझुनवाला ने की। मंच पर कलाकार के रूप में उपस्थित रहे हिना परवेज , मनोहर झा ,पार्वती रघुनंदन, राकेश शर्मा , राहुल शर्मा , नेहा यादव और प्रियंका सिंह |




