कोलकाता । बैंक ऑफ़ बड़ौदा ग्रेटर कोलकाता एवं हिंदी विभाग कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा ‘भारतीय भाषाओं में सामासिकता’ विषयक संगोष्ठी एवं बडौदा मेधावी सम्मान योजना 2024- 25 का आयोजन गत 21 नवम्बर को कादम्बिनी सभागार में किया गया। संविधान के अनुच्छेद 351 में लिखा गया है कि सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति हिंदी में होगी। भारत में ध्वनि के स्तर पर प्रथमत: सामासिकता देखी जाती है। संस्कृत जननी भाषा है। ऋग्वेद के अनुसार, वाक् दैवी है। दंडी कहते हैं, शब्द शक्ति से ही संसार प्रकाशित है। भाषा के विकास और उन्नति में संस्कृत व्याकरण के आचार्यों की महती भूमिका है। भाषा सांस्कृतिक अंतर्क्रिया का आदान – प्रदान भाषा के माध्यम से होता है। – ये उद्गार हैं टी बोर्ड के सचिव डॉ. ऋषिकेश राय के जो कलकत्ता विश्वविद्यालय और बैंक ऑफ बड़ौदा, वृहत्तर कोलकाता के संयुक्त आयोजन में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। विशिष्ट वक्ता डॉ. अमित राय, प्रोफेसर, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने भारतीय भाषाओं के आपसी टकराव के सम्बन्ध में कई तथ्यों को सामने रखा। हिंदी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली 6 वीं भाषा है। 21 वीं सदी में सामासिक भाषा हिंदी का परिदृश्य बदल रहा है अब वह प्रशासनिक, विधायिका आदि की भाषा बन रही है। हिंदी और हिंदीतर क्षेत्रों में अनुवाद कार्य के माध्यम से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। हमारे देश में अंग्रेजी एक्सीडेंट की भाषा है।
प्रो. विजय साव, कलकत्ता विश्वविद्यालय ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए शिक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदी विविध भाषाओं से शब्दों को ग्रहण एवं आत्मसात करके अपनी अंतरराष्ट्रीय अवस्थिति को मजबूत कर सकेगी। पुरस्कार प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ शोधार्थी प्रियंका कुमारी सिंह के प्रार्थना गीत से हुआ। स्वागत वक्तव्य दिया बैंक ऑफ बड़ौदा, वृहत्तर कोलकाता क्षेत्र के सहायक महाप्रबंधक कुमार नरेंद्र ने। हिंदी विभाग की प्रोफेसर राजश्री शुक्ला ने बीज व्याख्यान दिया। इसके पश्चात बैंक ऑफ़ बड़ौदा, वृहत्तर कोलकाता क्षेत्र की ओर से ‘बड़ौदा मेधावी विद्यार्थी सम्मान योजना’, वर्ष 2024-25 के तहत कलकत्ता विश्वविद्यालय में शिक्षण सत्र 2023-25 के परिणाम में प्रथम सुताबी कोईरी (11000/-) और द्वितीय राहुल साव (7500/-) को नगद राशि देकर मंगल भविष्य की कामना करते हुए उत्साहवर्धन किया।
बैंक द्वारा अगस्त माह में आयोजित हिंदी – अंग्रेजी अनुवाद के लिए भी विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र के साथ पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का संचालन किया डॉ. राम प्रवेश रजक ने। धन्यवाद ज्ञापन किया बैंक ऑफ़ बड़ौदा, वृहत्तर कोलकाता के मुख्य प्रबंधक वंदना जैन ने। अंत में बैंक की ओर से सभी विद्यार्थियों को एक पुस्तक उपहार स्वरूप वितरित किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में अमर कुमार साव, प्रो. चित्रा माली, डॉ. अभिजीत सिंह इत्यादि प्राध्यापकों के अतिरिक्त शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों आदि की सक्रिय भूमिका रही।
भारतीय भाषाओं में सामासिकता’ पर संगोष्ठी एवं बडौदा मेधावी सम्मान योजना
राम मंदिर आंदोलन से लेकर धर्म ध्वजा की स्थापना का ध्वजवाहक गोरक्षपीठ
श्रीराम की जन्मभूमि पर उनके मंदिर के लिए पांच सौ वर्षों की प्रतीक्षा के बाद वैश्विक विरासत पर गर्व कर रहे अयोध्याधाम में पांच वर्ष की अवधि में तीसरा कार्यक्रम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित होने जा रहा है। सुदीर्घ आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद 5 अगस्त 2020 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का भूमि पूजन हुआ। 22 जनवरी 2024 को मंदिर में प्रभु रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। अब 25 नवंबर को राम मंदिर के शिखर पर धर्मध्वजा हाे रही है। इस कार्यक्रम से गोरक्षनगरी गोरखपुर का स्वतः स्फूर्त जुड़ाव हो जाता है। कारण, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए आंदोलन से लेकर धर्मध्वजा स्थापना तक गोरक्षपीठ की भूमिका ध्वजवाहक सरीखी है। 25 नवंबर को अयोध्या में होने वाला ध्वजारोहण समारोह राम मंदिर के लिए गोरक्षपीठ की पांच पीढ़ियों के अनिर्वचनीय योगदान का भी साक्षी बनेगा।
अयोध्याधाम में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की पावन जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन तो ब्रिटिश शासनकाल मे ही शुरू हो गया था और इसमें गोरक्षपीठ की भूमिका महत्वपूर्ण रही। अपने कालखंड (1855 से 1885) में गोरखनाथ मंदिर के महंत रहे योगी गोपालनाथ ने और उनके बाद 1919 में ब्रह्मलीन हुए सिद्धयोगी बाबा गंभीरनाथ ने राम मंदिर आंदोलन का मार्गदर्शन किया। और, देश की आजादी के बाद इसे पहली बार बाकायदा रणनीति बनाकर संगठित स्वरूप दिया था ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ ने।
इतिहास के अध्येता और महाराणा प्रताप महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. प्रदीप कुमार राव के अनुसार श्रीराम जन्मभूमि को लेकर ठोस आंदोलन की नींव पड़ी देश के आजाद होने के बाद 1949 में। इसके रणनीतिकार थे वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के दादागुरु और मंदिर आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने वाले ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ के गुरुदेव, तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ।
1935 में गोरखनाथ मंदिर का महंत बनने के बाद से ही दिग्विजयनाथ जी ने इस विरासत को गुलामी की त्रासदी से मुक्त बनाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्होंने अयोध्याधाम के अलग-अलग मठों के साधु, संतों को एकजुट करने के साथ ही जातीय विभेद से परे हिंदुओं को समान भाव व सम्मान के साथ जोड़ा। 22/23 दिसंबर 1949 को प्रभु श्रीरामलला के विग्रह के प्रकटीकरण के नौ दिन पूर्व ही महंत दिग्विजयनाथ के नेतृत्व में अखंड रामायण के पाठ का आयोजन शुरू हो चुका था। श्रीरामलला के प्राकट्य पर महंत जी खुद वहां मौजूद थे। प्रभु श्रीराम के विग्रह के प्रकटीकरण के बाद मामला अदालत पहुंचा। इसके चलते विवादित स्थल पर ताला भले जड़ दिया गया पर पहली बार वहां पुजारियों को दैनिक पूजा की अनुमति भी मिली। दूसरे पक्ष ने भरसक यह प्रयास किया कि श्रीरामलला के विग्रह को बाहर कर दिया जाए लेकिन महंत दिग्विजयनाथ द्वारा बनाई गई रणनीति से यह प्रयास सफल नहीं हो सका। श्रीरामलला के प्रकटीकरण के बाद मंदिर आंदोलन को एक नई दिशा देने वाले महंत दिग्विजयनाथ 1969 में महासमाधि लेने तक श्रीराम जन्मभूमि के उद्धार के लिए अनवरत प्रयास करते रहे।
महंत दिग्विजयनाथ के महासमाधिस्थ होने के बाद उनके शिष्य एवं उत्तराधिकारी महंत अवेद्यनाथ ने अपना नेतृत्व प्रदान कर आंदोलन को विश्वव्यापी बनाया। अस्सी का दशक शुरू होने के साथ श्रीराम जन्मभूमि को लेकर आंदोलन के नए अंकुर फूटने लगे थे। इस आंदोलन को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए पांथिक विविधता और मतभिन्नता से युक्त हिंदू समाज के धर्माचार्यों में जिस एक नाम पर सहमति थी, वह तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ का ही नाम था। 21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में जब श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ तो महंत अवेद्यनाथ समवेत स्वर से इसके अध्यक्ष चुने गए और उनके नेतृत्व में देश में ऐसे जनांदोलन का उदय हुआ जिसने सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का सूत्रपात किया। उनकी अगुवाई में अक्टूबर 1984 की धर्मयात्रा, 1989 में दिल्ली में हुए विराट हिंदू सम्मेलन, श्रीराम शिला पूजन के अभियानों ने आंदोलन को नई ऊंचाई दी और महंत अवेद्यनाथ की अगुवाई में हिंदू समाज तन, मन, धन से मंदिर निर्माण हेतु कारसेवा के लिए समर्पित होने लगा। 30 अक्टूबर 1990 और 2 नवंबर 1990 को कारसेवा के दौरान तत्कालीन सरकार के आदेश पर पुलिस फायरिंग में कई रामभक्त बलिदान ही गए। पर, दमनात्मक कार्रवाई के बावजूद महंत अवेद्यनाथ के नेतृत्व में आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया। इस संकल्प का ही प्रतिफल रहा कि 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया। मंदिर निर्माण महंत जी का आजीवन लक्ष्य रहा।
गोरक्षपीठ के ब्रह्मलीन पीठाधीश्वरद्वय महंत दिग्विजयनाथ और महंत अवेद्यनाथ का श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति और मंदिर निर्माण के लिए किया गया परिणामजन्य संघर्ष वर्तमान पीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देखरेख में मूर्तमान हुआ। यह दैवीय योग है कि श्रीराम मंदिर को लेकर शीर्ष न्यायालय का निर्णय (9 नवंबर 2019) आने के वक्त वर्तमान गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और इसके बाद मंदिर के शिलान्यास (5 अगस्त 2020) से लेकर श्रीरामलला के प्राण प्रतिष्ठा समारोह (5 जनवरी 2024) की मेजबानी उन्होंने ही की। और, अब ऐतिहासिक ध्वजारोहण कार्यक्रम को भी उन्हीं की देखरेख में परिणाम तक पहुंचाया जा रहा है। अपने गुरुदेव महंत अवेद्यनाथ के सानिध्य में आने के बाद से ही श्रीराम मंदिर के लिए मुखर रहे योगी मुख्यमंत्री बनने के बाद अयोध्या को श्रीरामयुगीन वैभव देने के लिए प्राणपण से कार्य कर रहे हैं।
6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद मामला अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में भले ही था लेकिन योगी इस बात को मुखरता से रखते रहे कि राम मंदिर का निर्माण उनके लिए राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि जीवन का मिशन है। श्रीराम मंदिर के चलते ही अयोध्याधाम उनके लिए अपने ही दूसरे घर जैसा है। अब तक के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने गोरखपुर के बाद सर्वाधिक दौरे अयोध्या के ही किए हैं। अयोध्या के लिए हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों की सौगात देने के साथ उन्होंने जिले, कमिश्नरी का नामकरण फैजाबाद की जगह अयोध्या किया। इसके पहले श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या का नाम एक कस्बे के भूगोल में सिमट कर रह गया था। योगी के मुख्यमंत्रित्व काल में अयोध्या दुनिया की सबसे खूबसूरत धार्मिक-पर्यटन नगरी बन रही है।
शाम ढलते ही स्याह हो जाती है जिनकी जिंदगी
-हाथ-पैरों में हैं 13-13 अंगुलियां
-धारी गांव के तीन सगे भाई दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से पीड़ित
नैनीताल। नैनीताल जनपद के बेतालघाट विकासखंड के धारी गांव से एक अत्यंत विचित्र व दुरूह चिकित्सा प्रकरण सामने आया है, जहां एक ही परिवार के तीन सगे भाई जन्म से ही ऐसी अनूठी बीमारी से ग्रस्त हैं, जिसके कारण सूरज ढलते ही इनकी आँखें काम करना बंद कर देती हैं और अंधेरे में चलना-फिरना लगभग असंभव हो जाता है। रोग के कारण इनके हाथ-पैरों में अतिरिक्त अंगुलियां विकसित हो गई हैं तथा इन्हें असामान्य रूप से तेज भूख लगती है। चिकित्सा जगत की भाषा में इन्हें जन्मजात ‘लॉरेंस मून बेडिल सिंड्रोम’ नामक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी बतायी गयी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 34 वर्षीय बालम जंतवाल और उनके दो भाई-29 वर्षीय गौरव तथा 25 वर्षीय कपिल की स्थिति एक सी है। दिन ढलते ही तीनों भाइयों की दृष्टि कम हो जाती है। बालम के दोनों हाथों में 13-13 एवं पैरों में 12-12, गौरव के हाथ-पैरों में 13-13 तथा कपिल के हाथ-पैरों में 12-12 अंगुलियाँ हैं। अतिरिक्त अंगुलियाँ होने से भी इन्हें सामान्य कार्य करने में भी परेशानी आती है। तीनों भाइयों को अत्यधिक भूख लगने की समस्या भी है, और प्रत्येक भाई एक बार में लगभग 15 रोटियाँ खा लेता है, जिससे दिहाड़ी मजदूरी पर आधारित परिवार पर भारी आर्थिक दबाव पड़ रहा है। मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी के प्राचार्य डॉ. जीएस तितियाल के अनुसार इस ‘लॉरेंस मून बेडिल सिंड्रोम’ नामक दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी बीमारी में आँखों की रॉड कोशिकाएँ काम करना बंद कर देती हैं, जिससे सांध्यकालीन दृष्टि नष्ट हो जाती है। यह पूर्णतः आनुवंशिक रोग है और इसका कोई स्थायी उपचार उपलब्ध नहीं है। वहीं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गरमपानी के डॉ. गौरव कैड़ा के अनुसार इस बीमारी में अतिरिक्त अंगुलियाँ, हार्मोनल गड़बड़ी, मोटापा और त्वचा समस्याएँ भी सामान्यतः देखी जाती हैं। तीनों भाइयों की मां सावित्री के अनुसार तीनों बच्चों का बचपन से ही उपचार चलता रहा। बालम के हृदय में 8 मिमी का छेद पाया गया था, जिसका उपचार कराने में परिवार की सारी जमा-पूंजी समाप्त हो गई। अन्य दोनों बेटों में भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ सामने आती रहीं। लगातार मानसिक व आर्थिक दबाव ने इनके पिता को तोड़ दिया और दो वर्ष पूर्व उनका निधन हो गया। परिवार को मिलने वाली 1500 रुपये की दिव्यांग पेंशन अत्यंत अल्प है और आवश्यकताओं के सामने नगण्य साबित हो रही है। वर्तमान में बालम बकरियां चराता है, गौरव एक निजी स्टोन क्रशर में दिहाड़ी मजदूर है और कपिल एक छोटे होटल में कार्य करता है, परंतु सूर्यास्त के बाद ये तीनों अकेले कोई कार्य नहीं कर पाते। बीमारी, भुखमरी जैसी तेज भूख और आर्थिक कठिनाइयों का त्रिस्तरीय बोझ इन भाइयों व उनकी मां को निरंतर संघर्ष की स्थिति में बनाए हुए है। धारी क्षेत्र में रहने वाला यह परिवार प्रशासन व समाज दोनों से सहायता की अपेक्षा रखता है, ताकि तीनों भाइयों को चिकित्सा, पोषण एवं जीवन-निर्वाह संबंधी न्यूनतम सुविधा उपलब्ध हो सके।
20 साल में दसवीं बार बिहार के सीएम बने नीतीश कुमार
पटना । नीतीश कुमार ने गुरुवार को 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। 26 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली है। अगर नीतीश कुमार के नए मंत्रिमंडल पर गौर करें तो उन्होंने इस मंत्रिमंडल के जरिए सामाजिक समीकरण को दुरुस्त करने की पूरी कोशिश की है। नीतीश कुमार के नए मंत्रिमंडल में जहां जदयू कोटे से आठ लोगों को मंत्री बनाया गया है, वहीं भाजपा कोटे से 14 लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। इसके अलावा लोजपा (रामविलास) के दो और राष्ट्रीय लोक मोर्चा तथा हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा से एक-एक को मंत्री बनाया गया है। इस मंत्रिमंडल में राजपूत जाति से आने वाले संजय टाइगर, श्रेयसी सिंह, लेसी सिंह और संजय कुमार सिंह को मंत्री बनाया गया है, जबकि भूमिहार चेहरे के तौर पर विजय कुमार सिन्हा और विजय कुमार चौधरी को स्थान दिया गया है। सामाजिक संतुलन कायम रखने के लिए ब्राह्मण समाज के चेहरे के तौर पर मंगल पांडेय को फिर से मंत्रिमंडल में स्थान दिया गया है। कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन फिर से मंत्री बनाए गए हैं, जबकि यादव समुदाय से रामकृपाल यादव और बिजेंद्र प्रसाद मंत्री बनाए गए हैं। कुशवाहा समाज को भी साधने के लिए इस समुदाय के तीन लोगों को मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व दिया गया है। मुस्लिम वर्ग से मोहम्मद जमा खान को फिर से मंत्री बनाया गया है। नीतीश मंत्रिमंडल में निषाद समाज से आने वाले रमा निषाद और मदन सहनी को स्थान दिया गया है।
मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित 13 मंत्री ओबीसी, ईबीसी और वैश्य समुदाय के लोग शामिल हैं। कुर्मी समाज से आने वाले श्रवण कुमार को एक बार फिर से नीतीश मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। दलित चेहरे के रूप में लखेंद्र पासवान, सुनील कुमार, अशोक चौधरी, संजय कुमार पासवान और संतोष कुमार सुमन को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।
भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज द्वारा बाल दिवस आशा की किरण का आयोजन
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने 15 नवंबर 2025 को “आशा की किरण” शीर्षक से एक विशेष बाल दिवस समारोह का आयोजन किया जिसमें अंकुर शिक्षा सदन और पंच दर्शनीय विद्यालय के कुल 100 बच्चों को आमंत्रित किया गया था, साथ ही भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के 44 छात्र स्वयंसेवकों को भी आमंत्रित किया गया था।यह कार्यक्रम सुबह 10 बजे से आरंभ किया गया। बच्चों का गर्मजोशी से स्वागत किया गया और उन्हें भवानीपुर मुद्राएँ प्रदान की गईं, जिसका उपयोग उन्होंने वास्तविक जीवन में निर्णय लेने और आनंदमय भागीदारी का अनुभव करने के लिए पूरे कार्यक्रम में किया। विभिन्न स्टॉल और गतिविधि काउंटर स्थापित किए गए थे, जो दी गई मुद्राओं के बदले कपड़े, स्टेशनरी, खिलौने, खेल और खाद्य पदार्थ पेश करते थे। कार्यक्रम में रंग और इंटरैक्टिव सत्र, मजेदार खेल, बच्चों और कॉलेज के छात्रों दोनों द्वारा प्रदर्शन भी शामिल थे, जिससे एक जीवंत और आकर्षक माहौल तैयार हुआ। पूरे कार्यक्रम को युवा प्रतिभागियों को सीखने, मनोरंजन, भावनात्मक समर्थन और यादगार अनुभव प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। डाॅ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि एनएसएस की प्रमुख प्रो गार्गी ने बच्चों को आशा और उम्मीद की किरणें दिखाने का प्रयास किया।
एसएससी के सभी ‘दागी’ उम्मीदवारों को सूची से हटाया जाए : हाईकोर्ट
-पार्ट टाइम शिक्षकों के अनुभव अंक पर विवाद
कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने बुधवार को स्कूल सेवा आयोग को सख्त निर्देश दिया कि कक्षा 11–12 शिक्षकों की चल रही भर्ती प्रक्रिया में कोई भी दागी या अयोग्य घोषित उम्मीदवार शामिल न होने पाए। अदालत ने कहा कि शीर्ष कोर्ट के आदेशानुसार एसएससी को ऐसे सभी उम्मीदवारों की विस्तृत सूची प्रकाशित करनी होगी और यदि इंटरव्यू सूची में किसी दागी का नाम है तो उसे तुरंत हटाया जाए। न्यायमूर्ति अमृता सिन्हा ने सुनवाई के दौरान कहा कि मौजूदा सूची में केवल नाम और रोल नंबर दिए गए हैं, जबकि पहचान स्पष्ट करने के लिए पिता का नाम, पता और अन्य विवरण अनिवार्य हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कई मामलों में एक ही अभ्यर्थी के 2016 और 2025 में अलग-अलग रोल नंबर पाए गए हैं, ऐसे में विस्तृत सूची का प्रकाशन और भी आवश्यक हो जाता है। मामले की अगली सुनवाई तीन दिसम्बर को होगी। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद एसएससी ने दागी उम्मीदवारों को इंटरव्यू सूची में शामिल किया है। चार ऐसे अभ्यर्थियों के नाम अदालत में रखे गए, जिनमें दो दिव्यांग भी हैं। इस पर न्यायमूर्ति सिन्हा ने स्पष्ट किया कि दिव्यांग अभ्यर्थियों को मिली रियायत केवल आयु सीमा से संबंधित है, न कि अयोग्यता से। उन्होंने कहा कि दागी उम्मीदवार किसी भी विशेष राहत के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकते और आयोग को इस पर तत्काल निर्णय लेना होगा। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब एसएससी की नवीनतम इंटरव्यू सूची में लगभग 20 हजार नाम शामिल किए गए हैं, जबकि रिक्तियां 12 हजार 445 हैं। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कई नए अभ्यर्थी, जिन्होंने लिखित परीक्षा में पूर्णांक प्राप्त किए, उन्हें इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया गया, जबकि कुछ उम्मीदवारों ने प्राथमिक स्कूलों में अनुभव का दावा कर अनुचित रूप से अतिरिक्त 10 अंक हासिल कर लिए। एसएससी के परिणाम प्रकाशित होने के बाद एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। कई तरह की अनियमितताओं के आरोप में कलकता उच्च न्यायालय में मामले दर्ज हैं। इन्हीं में से एक है पार्ट टाइम शिक्षकों को अनुभव के आधार पर अंक देने का मुद्दा। बुधवार को सुनवाई के दौरान एसएससी ने अदालत को बताया कि यदि कोई आंशिक समय का शिक्षक जानकारी छिपाकर अनुभव के आधार पर अंक प्राप्त करता पाया गया तो उसका प्रार्थीपद रद्द कर दिया जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने इस वर्ष अप्रैल में 2016 के एसएससी के पूरे पैनल को नियुक्ति प्रक्रिया को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। इससे 25,752 शिक्षक और शिक्षाकर्मी अपनी नौकरी से वंचित हो गए थे। योग्य शिक्षकों के लिए नए सिरे से परीक्षा आयोजित करने तथा उनमें से नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश उच्चतम न्यायालय ने दिया था। उसके अनुरूप परीक्षा हुई और परिणाम भी घोषित कर दिए गए। नए परिणामों में पूर्व सेवा अनुभव के आधार पर 10 अंक जोड़े जाने की बात सामने आई है। आरोप है कि आंशिक समय के दो शिक्षक भी अनुभव अंक प्राप्त कर चुके हैं। इसी आधार पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई और सवाल उठाया गया कि यदि दो अभ्यर्थियों को अनुभव अंक मिल सकते हैं, तो दूसरों को क्यों नहीं दिए जाएंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट
नयी दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 की धारा 3, 5 एवं 7 को असंवैधानिक करार देते इसे निरस्त कर दिया है। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने स्पष्ट किया कि संसद केवल उन प्रावधानों को दोबारा लागू नहीं कर सकती जिन्हें कोर्ट पहले ही निरस्त कर चुका है, जब तक उनके मूल संवैधानिक दोषों को दूर न कर दिया जाए।
कोर्ट ने कहा कि 50 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा, चार साल का कार्यकाल और सर्च सह चयन समिति की प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं। जस्टिस के विनोद चंद्रन ने टिप्पणी की कि ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट रद्द किए गए अध्यादेश की ही एक प्रति है। कोर्ट ने कहा कि यह नई बोतल में पुरानी शराब है। यह मामला ट्रिब्यूनलों की स्वतंत्रता को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई का हिस्सा है। उच्चतम न्यायालय ने अपने पहले के फैसलों में ट्रिब्यूनल के सदस्यों के कार्यकाल और आयु सीमा से जुड़े नियमों को निरस्त किया था। इसके बावजूद, संसद ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट, 2021 पारित किया, जिसमें पुराने प्रावधानों को फिर से शामिल किया गया जैसे कि नियुक्ति के लिए न्यूनतम 50 वर्ष की आयु और केवल चार साल का कार्यकाल जिन्हें कोर्ट पहले ही असंवैधानिक घोषित कर चुका था। मद्रास बार एसोसिएशन ने इस कानून को चुनौती दी थी।
अंगदान और प्रत्यारोपण के लिए एक समान नियम बनाने का दिया निर्देश
नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अंग दान और प्रत्यारोपण पर एक बड़ा फैसला दिया है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को कई दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि पूरे देश में एक जैसी नीति और एक जैसे नियम बनाए जाएं ताकि अंग दान की प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और तेज हो सके। चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये आदेश इंडियन सोसायटी ऑफ ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वो इस मामले में एक राष्ट्रीय नीति तैयार करे, जिसमें अंग दान के लिए एक समान नियम हो जिसमें लिंग और जाति आधारित भेदभाव को खत्म करने के उपाय और पूरे देश के लिए एक समान डोनर मानदंड शामिल हो। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों के अलग मानदंड मरीजों और दाताओं, दोनों के लिए असमानता पैदा करते हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वो आंध्र प्रदेश को 2011 के मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम में हुए संशोधनों को अपनाने के लिए राजी करे। इसके साथ ही कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वो कर्नाटक, तमिलनाडु और मणिपुर जैसे राज्यों को तुरंत मानव अंगों और ऊतकों के प्रत्यारोपण के नियम, 2014 लागू करने को कहा जाए, क्योंकि अभी वे अपने अलग-अलग नियमों पर चल रहे हैं।
बंगाल की सरकारी बसों में अग्निशमन उपकरण अनिवार्य
कोलकाता । पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्यभर में स्लीपर बसों में बढ़ती आग की घटनाओं को देखते हुए महत्वपूर्ण सुरक्षा कदम उठाने का निर्णय लिया है। परिवहन विभाग अब राज्य संचालित बसों में ऐसे आधुनिक उपकरण लगाने की तैयारी कर रहा है, जो बस के चलते समय भी आग या चिंगारी का पता लगते ही तुरंत सक्रिय हो सकें। परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य परिवहन प्राधिकरण को इस संबंध में सूचित कर दिया गया है और विभिन्न परिवहन उपक्रमों ने शहर और लंबी दूरी की बसों में इन उपकरणों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है।अधिकारी के अनुसार, सभी वाहनों का नियमित सुरक्षा ऑडिट किया जा रहा है और सरकारी बसों की नियमित सर्विसिंग के लिए नया मानक संचालन प्रोटोकॉल (एसओपी) भी तैयार किया जा रहा है। बस कर्मचारियों को आग की रोकथाम संबंधी विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा और प्रत्येक यात्रा से पहले डीपो स्तर पर बसों की सुरक्षा जांच अनिवार्य की गई है। उन्होंने बताया कि अगले वर्ष तक निजी बसों को भी चरणबद्ध और किफायती तरीके से इसी सुरक्षा ढांचे में शामिल किया जाएगा। वर्तमान में राज्य परिवहन निगमों के पास लगभग दो हजार 600 से अधिक बसों का बेड़ा संचालित हो रहा है। नई पहल से उम्मीद है कि बस यात्रियों की सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार होगा और आगजनी की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकेगा।
आईसीटी ने शेख हसीना को सुनाई फांसी की सजा
नयी दिल्ली । बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री और अवामी लीग की अध्यक्ष शेख हसीना को मानवता के विरुद्ध अपराध का दोषी बताते हुए आईसीटी ने सजा ए मौत का ऐलान किया। 17 नवंबर को ही वर्षों पहले शेख हसीना का निकाह हुआ था। जीवन के खास दिन पर ही उन्हें सबसे बुरी खबर मिली। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) की तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार दोपहर को ये फैसला सुनाया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, शेख हसीना ने 1967 में शेख मुजीब के जेल में रहने के दौरान अपनी मां फजीलतुन नेसा की देखरेख में प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक एम.ए. वाजेद मिया से शादी की थी। बांग्लादेश टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, फजीलतुन नेसा ने जल्दबाजी में इस जोड़े के निकाह की व्यवस्था की थी।
शेख हसीना और एम.ए. वाजेद मिया के दो बच्चे हैं, सजीब वाजेद जॉय और साइमा वाजेद पुतुल। सजीब वाजेद जॉय का जन्म 27 जुलाई, 1971 को और साइमा वाजेद पुतुल का जन्म 9 दिसंबर, 1972 को हुआ था।
शेख हसीना अब तक पांच बार प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। उन्होंने पहली बार 1996 से 2001 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। इसके बाद 2009 से 2014 तक दूसरी बार, 2014 से 2019 तक तीसरी बार, 2019 से 2024 तक चौथी बार और 2024 में पांचवीं बार प्रधानमंत्री के रूप में चुनी गईं। हालांकि, छात्र विरोध प्रदर्शनों के कारण शेख हसीना को 5 अगस्त 2024 को सत्ता छोड़नी पड़ी।
2024 में हुआ छात्र आरक्षण सुधार आंदोलन एक जन विद्रोह में बदल गया। उसी वर्ष जुलाई-अगस्त में, छात्र आंदोलन पर पुलिस ने हमला किया और उन पर गोलियां चलाईं, साथ ही अवामी लीग के विभिन्न स्तरों के नेताओं और कार्यकर्ताओं और पार्टी के सहयोगी संगठनों, छात्र लीग और जुबली लीग के कार्यकर्ताओं पर भी हमला किया। परिणामस्वरूप, आरक्षण सुधार आंदोलन सरकार के पतन का कारण बन गया।
हसीना के अलावा इस मामले में पूर्व गृहमंत्री असदुज्जमां खान कमाल और पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) चौधरी अब्दुल्ला अल-ममून भी आरोपी थे। हसीना और खान देश में नहीं हैं, तो पूर्व आईजीपी पुलिस के गवाह बन गए। उन्होंने माफी मांगी, जिस पर गौर करते हुए कोर्ट ने उन्हें 5 साल की सजा सुना दी।
अपने बयान में ममून ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने छात्र आंदोलन को दबाने के लिए सीधे तौर पर ‘घातक हथियारों’ के इस्तेमाल का आदेश दिया था। उन्हें यह निर्देश पिछले साल 18 जुलाई को तत्कालीन गृह मंत्री असदुज्जमा खान के माध्यम से शेख हसीना से प्राप्त हुआ था।
23 अक्टूबर को सुनवाई पूरी होने के बाद, पहले फैसला और सजा सुनाने की तारीख 14 नवंबर तय की गई थी। बाद में, 13 नवंबर को, आईसीटी ने घोषणा की कि वह हसीना और उनके दो शीर्ष सहयोगियों के खिलाफ मामले में 17 नवंबर को फैसला सुनाएगा, और आखिरकार हुआ भी यही।
अवामी लीग को खत्म करना चाहती है यूनुस सरकार : हसीना
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (आईटीसी) के फैसले पर पहली प्रतिक्रिया सामने आई है। शेख हसीना ने सोमवार को कहा कि उनके खिलाफ सुनाया गया फैसला एक ‘धांधली ट्रिब्यूनल’ से आया है, जिसका गठन और अध्यक्षता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अनिर्वाचित अंतरिम सरकार ने किया। इसके पास लोकतांत्रिक जनादेश का अभाव है। बांग्लादेश की पूर्व पीएम ने कोर्ट के फैसले को ‘पक्षपाती’ और ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। आईसीटी ने पूर्व प्रधानमंत्री को पिछले साल जुलाई में प्रदर्शनकारियों की हत्या का आदेश देने और उनकी सुरक्षा न करने का दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। पूर्व पीएम शेख हसीना ने बांग्लादेश आईटीसी के फैसले की आलोचना करते हुए कहा, “मृत्युदंड की अपनी घृणित मांग अंतरिम सरकार के भीतर चरमपंथी लोगों के गलत और खतरनाक इरादे को दर्शाती है। अंतरिम सरकार बांग्लादेश के अंतिम निर्वाचित प्रधानमंत्री को हटाना और अवामी लीग को एक राजनीतिक ताकत के रूप में निष्प्रभावी करना चाहती है।”
शेख हसीना ने कहा कि डॉ. मोहम्मद यूनुस के अराजक और हिंसक शासन के अधीन काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने के इस प्रयास से मूर्ख नहीं बनेंगे।
उन्होंने अंतरिम सरकार की आलोचना करते हुए कहा, “वे देख सकते हैं कि तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (आईसीटी) द्वारा चलाए गए मुकदमों का उद्देश्य कभी न्याय प्राप्त करना या पिछले साल जुलाई-अगस्त की घटनाओं की कोई वास्तविक जानकारी प्रदान करना नहीं था। उनका उद्देश्य अवामी लीग को बलि का बकरा बनाना और डॉ. यूनुस और उनके मंत्रियों की विफलताओं से दुनिया का ध्यान भटकाना था।”
देश में 7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा प्रत्यक्ष कर संग्रह
– चालू वित्त वर्ष में 25 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंचने का अनुमान
नयी दिल्ली । देश का प्रत्यक्ष कर संग्रह चालू वित्त वर्ष (वित्त वर्ष 26) में सात प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और इसके 25 लाख करोड़ रुपए से अधिक पहुंचने का अनुमान है। यह जानकारी एक वरिष्ठ अधिकारी की ओर से सोमवार को दी गई। इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर के साइडलाइन में बातचीत करते हुए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के चेयरमैन रवि अग्रवाल ने कहा कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक आयकर संग्रह सरकार की ओर से निर्धारित किए गए लक्ष्य 25.20 लाख करोड़ रुपए पर पहुंचने की उम्मीद है। उन्होंने आगे कहा कि देश का प्रत्यक्ष कर संग्रह पिछले साल के मुकाबले 6.99 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है और यह काफी उत्साहजनक है। देश का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह एक अप्रैल से लेकर 10 नवंबर की अवधि में पिछले साल के मुकाबले सालाना आधार पर 6.99 प्रतिशत बढ़कर 12.92 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया है। इसकी वजह धीमा रिफंड और कॉरपोरेट टैक्स में जबरदस्त बढ़ोतरी है।
10 नवंबर तक रिफंड सालाना आधार पर 18 प्रतिशत कम होकर 2.42 लाख करोड़ रुपए हो गया है। अग्रवाल ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2024-2025 के लिए ऑडिट रिटर्न जमा करने की समय सीमा बढ़ा दी गई है और चालू वित्त वर्ष के लिए अभी भी दो अग्रिम कर किश्तें बकाया हैं।
इससे पहले के सीबीडीटी के आंकड़ों के अनुसार, भारत का शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह इस वित्त वर्ष 17 सितंबर तक पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 9.18 प्रतिशत बढ़कर 10.82 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया, जबकि रिफंड में 23.87 प्रतिशत की तेज गिरावट देखी गई थी।
इस दौरान गैर-कॉर्पोरेट कर राजस्व 13.67 प्रतिशत बढ़कर 5.83 लाख करोड़ रुपए हो गया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शुद्ध कॉर्पोरेट कर संग्रह 4.93 प्रतिशत बढ़कर 4.72 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) 0.57 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के साथ 26,305.72 करोड़ रुपए हो गया। सकल प्रत्यक्ष कर संग्रह 3.39 प्रतिशत बढ़कर 12.43 लाख करोड़ रुपए हो गया, जबकि रिफंड 23.87 प्रतिशत घटकर 1.60 लाख करोड़ रुपए रह गया।




