Tuesday, April 28, 2026
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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : ऐसो को उदार हिन्दी जग माहीं..

-गौरव अवस्थी

बोलियों में बंटी हिंदी भाषा को परिमार्जित करके भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा प्रारंभ किए आधुनिक खड़ी बोली हिंदी आंदोलन को सफलता के शिखर पर स्थापित करने में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। अपनी अथक मेहनत के बल पर उन्होंने हिंदी खड़ी बोली में कई संपादक लेखक कवि तैयार किए। आचार्य द्विवेदी को भाषा और व्याकरण में किसी भी तरह की भाषाई अशुद्धि और व्याकरण की अराजकता अस्वीकार थी। हिंदी की इस प्रतिष्ठा के लिए ही अपने समय के प्रतिष्ठित साहित्यकारों से आचार्य द्विवेदी का वाद-विवाद और प्रतिवाद होता रहा। कुछ विवाद तो आधुनिक हिंदी साहित्य में आज भी अमिट हैं। बालमुकुंद गुप्त से अस्थिरता और अनस्थिरता शब्द पर वर्षों चला विवाद हो या नागरी प्रचारिणी सभा की खोजपूर्ण रिपोर्ट को लेकर बाबू श्यामसुंदर दास से हुआ मतभेद या सरस्वती में लेख न छपने पर बीएन शर्मा से हुई लट्ठमलट्ठ। आमतौर पर उनकी छवि कलहप्रिय, क्रोधी, घमंडी और तुनक मिजाज के तौर पर स्थापित करने की समय- समय पर कोशिशें की गईं लेकिन इन विवादों के अंत सौहार्दपूर्ण एवं सौजन्यता के साथ ही हुए। बालमुकुंद गुप्त से चले विवाद का अंत आचार्य के चरणों में सिर रखने से हुआ। आचार्य द्विवेदी ने भी उन्हें गले लगा कर सहृदयता दिखाई।

नागरी प्रचारिणी सभा के काम की आलोचना खोजपूर्ण रिपोर्ट छपने पर बाबू श्यामसुंदर दास से पैदा हुए मतभेद के बाद सभा ने सरस्वती से अपने संबंध समाप्त कर लिए। आचार्य द्विवेदी ने ‘अनुमोदन का अंत’ शीर्षक से लेख लिखा तो सभा के कार्य से बाहर गए पं. केदारनाथ पाठक बहुत नाराज हुए और लौटने पर सीधे कानपुर आचार्य द्विवेदी के पास पहुंचकर अपनी नाराजगी प्रकट की। कोमल हृदय आचार्य द्विवेदी ने उन्हें ससम्मान आसन दिया और घर के अंदर से मिठाई-जल लेकर आए और साथ में एक लाठी भी। शिष्टाचार के बाद उन्होंने पं. पाठक को प्रतिवाद पूरा करने के लिए लाठी देते हुए कहा-‘आपकी लाठी और मेरा सर..’। इस पर पं. पाठक बहुत लज्जित हुए और वह हमेशा के लिए आचार्य जी के भक्त हो गए। इस विवाद का अंत भी श्यामसुंदर दास द्वारा ‘भारत मित्र’ में द्विवेदी जी की उदारता पर लिखे गए लेख के साथ हुआ। सौजन्यता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि बाबू श्याम सुंदर दास द्वारा स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा ने आचार्य द्विवेदी के सम्मान में 1933 में ‘अभिनंदन ग्रंथ’ प्रस्तुत किया और आचार्य द्विवेदी ने अपने संपादन से जुड़ी महत्वपूर्ण सामग्री और लाइब्रेरी की हजारों पुस्तकें सभा को ही दान में दीं।

भाषा एवं व्याकरण सुधार के आंदोलन में ऐसे अनेक विवादों के दृष्टांत आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में दर्ज हैं, जिनका पटाक्षेप सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ। यह इसलिए संभव हुआ कि आचार्य द्विवेदी और संबंधित पक्ष के बीच विवाद के कारण हिंदी भाषा की शुद्धता थी न कि व्यक्तिगत। अपना लेख सरस्वती में न छपने पर बीएन शर्मा ने अवश्य आलोचनापूर्ण लेख में आचार्य द्विवेदी पर व्यक्तिगत आक्षेप किए लेकिन क्षमा प्रार्थना के बाद आचार्य द्विवेदी ने इस विवाद का भी अंत सौजन्यता के साथ कर दिया। ऐसा ही एक प्रकरण महामना पं. मदन मोहन मालवीय के अनुज कृष्णकांत मालवीय के साथ भी हिंदी साहित्य में दर्ज है।

रेलवे की 200 रुपये प्रतिमाह की नौकरी छोड़कर 50 रुपये प्रतिमाह में ‘सरस्वती’ का संपादन स्वीकार करने वाले आचार्य द्विवेदी का इंडियन प्रेस के संस्थापक बाबू चिंतामणि घोष से प्रथम परिचय उनके ही प्रेस से प्रकाशित हिंदी रीडर की कड़ी आलोचना के साथ हुआ था लेकिन फिर भी घोष बाबू ने आचार्य द्विवेदी को सरस्वती का संपादक नियुक्त करना तय किया। उनके संपादक नियुक्त होने पर कुछ साहित्यकारों ने घोष बाबू से कहा कि यह मनुष्य बहुत घमंडी है। तुनुक मिजाज है। इसे संपादक बनाकर बड़ी भूल कर रहे हो। उससे एक दिन भी नहीं पटेगी लेकिन उन्होंने किसी भी आलोचना को कान न देकर आचार्य द्विवेदी को संपादन का दायित्व सौंपा। 18 वर्षों तक सरस्वती के संपादन कार्यकाल में आचार्य द्विवेदी और घोष बाबू में घड़ी भर की अनबन नहीं हुई। सरस्वती के प्रकाशक और सेवक संपादक के बीच के सरस संबंध आज भी मुद्रक-प्रकाशक एवं संपादक के बीच सरस संबंधों का आदर्श उदाहरण है।

बात नवंबर 1905 की है। छतरपुर के राजा ने आचार्य द्विवेदी जी से कहा कि आप प्रतिवर्ष एक अच्छे अंग्रेजी ग्रंथ का अनुवाद किया कीजिए। पारिश्रमिक के रूप में मैं आपको 500 रुपये दिया करूंगा। उन्होंने 1907 में हर्बर्ट स्पेंसर की ‘एजुकेशन’ पुस्तक का अनुवाद ‘शिक्षा’ के नाम से किया और राजा को पत्र लिखा। अपनी बात से मुकरते हुए राजा ने पारिश्रमिक के रूप में केवल 25 रुपये ही देने की बात कही। इस पर नाराज हुए आचार्य द्विवेदी ने राजा को कड़ा पत्र लिखकर अपनी आपत्ति प्रकट करने से परहेज नहीं किया।

जन्म ग्राम दौलतपुर (रायबरेली) की पाठशाला के एक शिक्षक एक पद का गलत अर्थ बता रहे थे। बालक द्विवेदी ने शिक्षक को टोका और सही अर्थ बताया लेकिन शिक्षक अपनी गलती स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी के प्रतिवाद करने पर वह पंडितराज संजीवन के अर्थ को प्रमाणिक मानने को तैयार हुए। तब द्विवेदी जी पंडितराज के घर गए और सही अर्थ लिखाकर लाए। उन्होंने भी द्विवेदी जी के ही अर्थ का समर्थन किया। फिर शिक्षक को बालक द्विवेदी के सामने अपनी गलती स्वीकार ही करनी पड़ी।

दरअसल, बचपन से ही स्वाध्यायी आचार्य द्विवेदी का गलत को गलत कहने का स्वभाव था। गलत को गलत कहने में तनिक भी हिचक न होने का यह स्वभाव आचार्य द्विवेदी में अंतिम समय तक विद्यमान रहा। किसी के आगे झुकना उन्होंने स्वीकार नहीं किया। सामने वाला कोई भी हो या कितना भी बड़ा हो। इसी स्वभाव के बल पर वह आधुनिक हिंदी खड़ी बोली को गद्य और पद्य दोनों की भाषा बनाने में सफल हो सके।

(साभार – हिन्दुस्तान समाचार)

 

दक्षिण दिनाजपुर से प्राचीन मूर्ति बरामद, पाल युग की होने की संभावना

दक्षिण दिनाजपुर। जिले के तपन ब्लॉक अंतर्गत घाटुल गांव में एक प्राचीन शैल मूर्ति मिली है। मिट्टी के नीचे से बरामद इस मूर्ति को इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से एक अमूल्य धरोहर माना जा रहा है। रविवार को वन विभाग के बालुरघाट रेंज के रेंजर तापस कुंडू ने मौके का निरीक्षण किया। उन्होंने न केवल उस स्थान का जायजा लिया, जहां से मूर्ति बरामद हुई, बल्कि मूर्ति की वर्तमान सुरक्षा व्यवस्था और वनभूमि संरक्षण को लेकर ग्रामीणों के साथ विस्तृत चर्चा भी की। इतिहासकारों की प्रारंभिक जांच के अनुसार, यह मूर्ति 11वीं शताब्दी के पाल वंश काल की कलाशैली का एक अनूठा उदाहरण है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह हिंदू देवता शिव के अत्यंत उग्र और शक्तिशाली स्वरूप ‘कालभैरव’ अथवा ‘अघोर’ देव की एक दुर्लभ प्रतिमा हो सकती है। सरकारी स्तर पर मूर्ति के संरक्षण की प्रक्रिया को लेकर प्रशासन की गतिविधियां तेज हो गई हैं। मूर्ति के मिलने की खबर फैलते ही स्थानीय लोगों में उत्साह और उमंग का माहौल है। ग्रामीणों की मांग है कि जिस स्थान पर मूर्ति मिली है, वहीं एक मंदिर का निर्माण किया जाए। हालांकि, पुरातत्वविदों और इतिहासकारों का इस मांग को लेकर अलग मत है। प्रख्यात प्रोफेसर एवं शोधकर्ता डॉ. अनिरुद्ध मैत्र ने कहा कि उचित संरक्षण और वैज्ञानिक शोध के हित में इस मूर्ति को तत्काल हेरिटेज सोसाइटी के अंतर्गत लाना आवश्यक है।

श्री शिक्षायतन महाविद्यालय में तृतीय सीताराम जी सेकसरिया स्मृति व्याख्यान

कोलकाता । श्री शिक्षायतन महाविद्यालय द्वारा गत 18 दिसंबर को तृतीय सीताराम जी सेकसरिया स्मृति व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ परंपरानुसार गणेश वंदना से हुआ जिसे कॉलेज की छात्राओं, एमिलिया बरुआ, अन्वेषा घोष, संपूर्णा घोष ,मोहोना मुख़र्जी, रूपकथा बोस तथा श्रीतमा बोस द्वारा प्रस्तुत किया किया गया l इसके पश्चात महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. तानिया चक्रवर्ती ने सचिव पी. के. शर्मा, हिंदी विभाग की प्राध्यापिकाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर एकल व्याख्यान हेतु आमंत्रित विशेषज्ञ वक्ता प्रो. हितेंद्र पटेल (अध्यक्ष, पर्यावरण अध्ययन विभाग, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कोलकाता ) के साथ दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का विधिवत उद्घाटन किया । स्वागत वक्तव्य में प्राचार्या डॉ. तानिया चक्रवर्ती ने सीताराम जी सेकसरिया के योगदान का स्मरण करते हुए स्मृति व्याख्यानमाला के उद्देश्य एवं उसकी शैक्षणिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अगले चरण में डॉ. रचना पाण्डेय ने सीताराम जी सेकसरिया के जीवन, आदर्शों और मूल्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उनके वक्तव्य से उपस्थित श्रोताओं को यह समझने का अवसर मिला कि किस प्रकार सेकसरिया जी की विरासत आज भी इस शिक्षण संस्था की चेतना और कार्य-दिशा का आधार बनी हुई है। इसके पश्चात हिंदी विभाग की अध्यक्ष अल्पना नायक द्वारा मुख्य वक्ता प्रोफेसर हितेंद्र पटेल का औपचारिक परिचय प्रस्तुत किया गया। प्रोफेसर हितेंद्र पटेल ने भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया। व्याख्यान में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर संवाद इस प्रकार होना चाहिए, जिससे प्राचीन और आधुनिक ज्ञान के बीच लोक-प्रयोजन की दृष्टि से उपयोगी तत्त्वों की पहचान की जा सके। वक्ता ने व्याख्यान के उपरान्त  सहमति – असहमति परक टिप्पणियों को बौद्धिक संवाद का स्वाभाविक हिस्सा मानते हुए स्वस्थ विमर्श की आवश्यकता पर बल दिया l कार्यक्रम के अंत में विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका, सिंधु मेहता ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए समारोह के समापन की घोषणा की । कार्यक्रम का संचालन कॉलेज की छात्राओं , जयोस्मिता चक्रवर्ती एवं मानसी छेत्री ने कुशलतापूर्वक किया।

राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ ‘वीबी-जी राम जी’ विधेयक बना कानून

– ग्रामीण परिवारों को अब 125 दिनों का रोजगार

नयी दिल्ली । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी विधेयक, 2025’ (वीबी-जी राम जी) को मंजूरी दे दी। राष्ट्रपति की मंजूरी के साथ यह विधेयक क़ानून बन गया। इससे पहले संसद के दोनों सदन इस विधेयक को पास कर चुके हैं। अब ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव लागू हो गया है। नए कानून के तहत अब ग्रामीण परिवारों को प्रति वित्त वर्ष 125 दिन का वैधानिक मजदूरी रोजगार सुनिश्चित किया जाएगा, जो पहले 100 दिन था। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, यह अधिनियम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 का स्थान लेगा और इसे विकसित भारत 2047 के विजन के अनुरूप तैयार किया गया है। सरकार का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आय सुरक्षा को मजबूत करने के साथ टिकाऊ और उत्पादक परिसंपत्तियों का निर्माण करना है, ताकि समावेशी और संतुलित विकास को बढ़ावा मिल सके। कानून के प्रावधानों के तहत इच्छुक ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम 125 दिन का रोजगार देना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी होगी। मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक या अधिकतम 15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य किया गया है। तय समयसीमा के भीतर भुगतान नहीं होने पर देरी का मुआवजा देने का भी प्रावधान रखा गया है। कृषि कार्यों के दौरान श्रमिकों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए राज्यों को एक वित्त वर्ष में कुल 60 दिन तक का समेकित विराम काल घोषित करने का अधिकार दिया गया है। हालांकि, इससे कुल 125 दिन के रोजगार के अधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा और शेष अवधि में पूरा रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। मंत्रालय ने बताया कि योजना को केंद्र प्रायोजित रखा गया है। सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच लागत हिस्सेदारी 60:40 होगी, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 का प्रावधान किया गया है। विधानसभा रहित केंद्रशासित प्रदेशों में पूरा खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। प्रशासनिक खर्च की सीमा को भी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत कर दिया गया है।

बंगाल में कटे 58 लाख से अधिक नाम

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित कर दिया गया है। राज्य में कुल सात करोड़ 66 लाख 37 हजार 529 पंजीकृत मतदाताओं में से सात करोड़ आठ लाख 16 हजार 630 मतदाताओं ने अपने गणना प्रपत्र जमा किए हैं, जो कुल मतदाताओं का 92.40 प्रतिशत है। मृत्यु, पलायन और गणना प्रपत्र जमा नहीं करने सहित अन्य कारणों से 58 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय की ओर से जारी बयान के अनुसार यह चरण चार नवंबर 2025 से 11 दिसंबर 2025 तक चला। इस दौरान पारदर्शिता और समावेशन को प्राथमिकता देते हुए व्यापक स्तर पर मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई। अधिकारियों के अनुसार यह भागीदारी विशेष गहन पुनरीक्षण के पहले चरण की बड़ी सफलता मानी जा रही है। इस प्रक्रिया में 24 जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों, 294 निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, 3059 सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और 80 हजार 681 मतदान केंद्रों पर तैनात बूथ लेवल अधिकारियों की सक्रिय भूमिका रही। इसके साथ ही राज्य के सभी आठ मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और एक लाख 81 लाख 454 बूथ लेवल एजेंटों ने भी सहयोग किया। बयान में आगे बताया गया कि एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं के फॉर्म नहीं मिले, उनमें वे लोग शामिल हैं जो अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता बन चुके हैं, जिनका अस्तित्व नहीं पाया गया या जो 11 दिसंबर तक फॉर्म जमा नहीं कर सके या जिन्होंने किसी कारण से मतदाता के रूप में पंजीकरण की इच्छा नहीं जताई। इसके बावजूद आयोग ने स्पष्ट किया है कि कोई भी वास्तविक और पात्र मतदाता छूट न जाए, इसके लिए मंगलवार (16 दिसंबर) से 15 जनवरी 2026 तक दावा और आपत्ति की अवधि रखी गई है। आंकड़ों के मुताबिक जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनमें 24.16 लाख मतदाता मृत पाए गए हैं, 32.65 लाख मतदाता स्थानांतरित या अनुपस्थित पाए गए हैं और 1.38 लाख मतदाताओं के नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज पाए गए हैं। नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में मतदाता का नाम केवल एक ही स्थान पर रखा जाएगा। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के बयान में बताया गया है कि 16 दिसंबर से 15 जनवरी 2026 तक दावा और आपत्ति की प्रक्रिया चलेगी, जबकि सुनवाई और सत्यापन का चरण 7 फरवरी 2026 तक जारी रहेगा। अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी 2026 को प्रकाशित की जाएगी। यदि किसी मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत नया आवेदन कर सकता है। निर्वाचन आयोग ने दोहराया है कि ड्राफ्ट मतदाता सूची से किसी भी नाम को बिना नोटिस और लिखित आदेश के हटाया नहीं जाएगा। यदि किसी मतदाता को आपत्ति होती है तो वह नियमानुसार अपील कर सकता है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूरी प्रक्रिया सहभागी, पारदर्शी और निष्पक्ष है, ताकि कोई भी पात्र मतदाता वंचित न हो और कोई भी अपात्र नाम सूची में न बना रहे।

तीन साल में सीएपीएफ में 438 आत्महत्याएं, 7 सहकर्मियों की हत्या

– 2014 से अब तक 23 हजार से अधिक जवानों का इस्तीफा
नयी दिल्ली। पिछले तीन वर्षों में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ), असम राइफल्स (एआर) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में 438 आत्महत्याओं और सात सहकर्मियों की हत्या की घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह जानकारी मंगलवार को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी। केन्द्र सरकार के अनुसार आत्महत्या के मामलों में 2023 में 157, 2024 में 148 और 2025 में 133 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि सहकर्मियों की हत्या के दो मामले 2023 में, एक मामला 2024 में और चार मामले 2025 में सामने आए। बलवार आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों की अवधि में सबसे अधिक 159 आत्महत्याएं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) में दर्ज की गईं। इसके बाद सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में 120 और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) में 60 मामलों की रिपोर्ट हुई। वहीं, असम राइफल्स में 28, सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) में 35, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में 32 और एनएसजी में चार आत्महत्याएं दर्ज की गईं।
सहकर्मियों की हत्या की घटनाओं में असम राइफल्स और सीआरपीएफ में दो-दो, बीएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी में एक-एक मामला दर्ज हुआ, जबकि सीआईएसएफ और एनएसजी में ऐसी कोई घटना नहीं हुई। सरकार ने यह भी बताया कि वर्ष 2014 से अब तक सीएपीएफ, असम राइफल्स और एनएसजी के कुल 23,360 कर्मियों ने सेवा से इस्तीफा दिया है। इनमें सर्वाधिक 7,493 जवान बीएसएफ से, 7,456 सीआरपीएफ से और 4,137 सीआईएसएफ से शामिल हैं। कार्य घंटों और अवकाश से जुड़े सवालों के जवाब में गृह राज्य मंत्री ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में सीएपीएफ में आठ घंटे की शिफ्ट में कार्य होता है, हालांकि परिचालन आवश्यकताओं के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। उन्होंने बताया कि फील्ड में तैनात कर्मियों के लिए सालाना 75 दिन के अवकाश का प्रावधान है, जिसमें 60 दिन का अर्जित अवकाश और 15 दिन का आकस्मिक अवकाश शामिल है। जबकि अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए 30 दिन के अर्जित अवकाश और 8 दिन के आकस्मिक अवकाश का प्रावधान है। मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे पर सरकार ने कहा कि सीएपीएफ कर्मियों को बलों के अस्पतालों, समेकित अस्पतालों और विशेष मनोरोग सेवाओं के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। साथ ही तनाव प्रबंधन, योग और ध्यान जैसे कार्यक्रम भी नियमित रूप से आयोजित किए जा रहे हैं।

मेसी की दीवानगी और भारतीय खेल प्रेमी

महान मेसी का गोट दौरा यानी ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम मेसी का दौरा अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। सवाल हमारी व्यवस्था पर, सवाल हमारे नेताओं पर और सबसे बड़ा सवाल हमारी अपनी हिप्पोक्रेसी पर। कोलकाता में मेसी को न देख पाने पर दर्शकों ने हंगामा किया, कुर्सिया तोड़ीं, गमले उठा ले गये, घास तक ले गये और यह सब इसलिए क्योंकि कुछ नेताओं ने मेसी को जिस तरह घेरकर रखा था, उसके कारण वे फुटबॉल के भगवान को नहीं देख सके। आयोजक गिरफ्तार हो चुका है मगर क्या इतना काफी है। अच्छा एक मिनट रुकिये और बताइए कि आपमें से कितने लोग यह जानते हैं – भारतीय फुटबॉल टीम ने सीएएफए नेशंस कप ने जीत के साथ शुरुआत की है। पहली बार टूर्नामेंट में खेल रहे भारत की टक्कर मेजबान ताजिकिस्तान से थी। इस मुकाबले को भारत ने 2-1 से अपने नाम किया। खालिद जमील के हेड कोच बनने के बाद यह भारत का पहला मुकाबला था। टीम ने इसमें जीत हासिल की। भारत की दो साल में विदेशी धरती पर पहली जीत है। घर से बाहर उनकी आखिरी जीत नवंबर 2023 में विश्व कप क्वालीफायर में कुवैत के खिलाफ हुई थी। भारत की अंडर-17 फुटबॉल टीम ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए कोलंबो में आयोजित 7वाँ सैफ (एसएएफएफ) अंडर-17 चैम्पियनशिप खिताब जीत लिया। 27 सितम्बर 2025 को खेले गए इस रोमांचक फाइनल में भारत ने बांग्लादेश को पेनल्टी शूटआउट में 4-1 से मात दी। निर्धारित समय तक मैच 2-2 की बराबरी पर रहा था। यह मुकाबला रेसकोर्स इंटरनेशनल स्टेडियम में खेला गया। भारतीय सीनियर पुरुष फुटबॉल टीम भले ही संघर्ष कर रही हो, लेकिन जूनियर टीम ने जानदार प्रदर्शन करते हुए एएफसी अंडर-17 एशियन कप के लिए क्‍वालीफाई कर लिया है। भारतीय अंडर-17 टीम ने मजबूत प्रतिद्वंद्वी ईरान को 2-1 से मात दी। यहां क्‍वालीफायर्स के आखिरी दौर में भारत ने ईरान के आक्रामक रवैये को करीब 40 मिनट तक नियंत्रित रखा ताकि मुकाबला अपने नाम कर सके। अर्जेंटीना के स्टार फुटबॉलर लियोनल मेसी 13 दिसंबर को भारत पहुंचे हैं। कोलकाता में उनके 70 फुट के स्टैच्यू का अनावरण किया गया है। शाम को उन्होंने हैदराबाद में प्रदर्शनी मैच में शिरकत की है। 14 दिसंबर को उनके टूर का मुंबई चरण शुरू हो रहा है। 2022 का फीफा वर्ल्ड कप जीतने वाले लियोनल मेसी कोलकाता पहुंच गए हैं। उनका ‘गोट इंडिया टूर’ 13 दिसंबर से शुरू हुआ है, जो तीन दिन चलेगा। इस दौरान मेसी कोलकाता, हैदराबाद के बाद अब मुंबई और दिल्ली भी जाएंगे। 14 दिसंबर यानी रविवार को लियोनल मेसी की मुलाकात क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर से हुई है। सचिन तेंदुलकर ने अपनी साइन की हुई जर्सी मेसी को गिफ्ट में दी है।

आज स्थिति यह है कि जिस शहर में पेले आ चुके हों। जहां पी के बनर्जी जैसे फुटबॉलर हों। जिस देश में बाइचुंग भूटिया जैसे खिलाड़ी हों, उस देश के लोग अपने देश के खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने के लिए 100 रुपये भी खर्च नहीं करते। वहीं जिस मेसी के पैरों का अरबों का बीमा है, जो आपको न तो जानता है, न तो उसे आपसे कोई मतलब है, उसके लिए यह दौरा विशुद्ध व्यवसायिक है। उसे देखने के लिए भारतीय जनता 50 हजार तक के टिकट खरीदती है, एक झलक पाने के लिए पागल होती है और इसमें शामिल हैं, मध्य वर्ग का वह युवा, जो खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहा होता है और कई बार उसके पास रोजगार का साधन तक नहीं होता। घर की जिम्मेदारियों से अलग कुछ क्षणों का शौक पालने के लिए अपनी चादर से आगे जाकर खर्च करते हैं। कोलकाता में जो हुआ, वह काफी शर्मनाक है। सबसे बड़ी बात मेसी को लेकर जो अफरा-तफरी हुई, राजनेताओं ने जिस प्रकार उनको घेरकर रखा और 15 सेकेंड भी मेसी की झलक न देख पाने पर जो गुस्सा फूटा, वह सिर्फ आयोजकों पर ही नहीं, खुद दर्शकों पर भी सवाल खड़ा करता है। खिलाड़ी के रूप मेसी का सम्मान करते हुए भी यह हीनताबोध बहुत पीड़ादायक है। आखिर हमें क्यों किसी विदेशी के पीछे भागने की जरूरत पड़ती है और सबसे पहली बात हम जिन विदेशियों के पीछे भागते हैं, आपके देश की प्रतिभाओं को चमकाने में उनका क्या योगदान है। क्या मेसी फुटबॉल में भारत को आगे ले जाने के लिए कुछ करेंगे, सीधा सा जवाब है नहीं, बिल्कुल नहीं और उनके लिए हम कोलकाता वालों ने क्या किया….खुद को कमतर साबित किया और सारी दुनिया में तमाशा बन गये। अपने ही स्टेडियम को नुकसान पहुंचाया और इसकी भरपाई भी हम अपने ही पैसों से करने जा रहे हैं।
आप खुद से पूछिए कि क्या ये हिप्पोक्रेसी नहीं है कि आप पदक की उम्मीद अपने खिलाड़ियों से करते हैं और पैसे एक विदेशी खिलाड़ी पर लुटाते हैं। कितने लोगों ने उन खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाया और कितनी कंपनियां उन खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने और उनकी मदद करने के लिए उतरीं जो आर्थिक तंगी और संघर्षों के बीच अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं। आज सोशल मीडिया न होता तो हम तो इनके नाम भी नहीं जान पाते। चलिए जरा इतिहास देखते हैं। बात साल 1911 की है. यह साल बंगाल में फुटबॉल के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।ऐसा इसलिए क्योंकि 1889 में शुरू हुए मोहन बागान क्लब ने अंग्रेजों की ईस्ट यॉर्कशायर टीम को 2-1 से हराकर आईएफए शील्ड जीत ली थी। उस जीत ने काफी कुछ बदल दिया था. खास बात यह थी कि उस मुकाबले में मोहन बागान के खिलाड़ी नंगे पैर खेले थे। यह पहली बार था जब किसी भारतीय टीम ने यह प्रतिष्ठित टूर्नामेंट जीता। इस जीत ने साबित कर दिया कि भारतीय किसी से कम नहीं हैं। यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का पल थी, जिसे भारतीय आत्मसम्मान की जीत माना गया। यही वो जीत थी, जिसके बाद फुटबॉल बंगाल की रगों में बस गया और आज वहां हर गली और हर दिल में यह खेल बसता है। बाइचुंग भूटिया का जन्म 15 दिसम्बर, 1976 को गंगटोक, सिक्किम में हुआ था। ये भारत के प्रसिद्ध फ़ुटबॉल खिलाड़ियों में से एक हैं। 1999 में ‘अर्जुन पुरस्कार’ जीतने वाले बाइचुंग भूटिया अपने प्रशंसकों के बीच अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल क्षेत्र में भारतीय फ़ुटबॉल टीम के ‘टार्च बियरर’ अर्थात् मार्गदर्शक के नाम से जाने जाते है। वह भारतीय फ़ुटबॉल के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, उनका खेलने का अलग अंदाज़है, उनमें उत्तम दर्जे की स्ट्राइक करने की क्षमता है। वह वास्तव में अन्तरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं। वह भारत के पहले फ़ुटबॉल खिलाड़ी है, जिन्हें इंग्लिश क्लब के लिए खेलने के लिए आमंत्रित किया गया था। अब बताइए क्या हम भारतीयों को अपने खिलाड़ियों से उम्मीद करने का हक है, जिनकी हम कद्र तक नहीं करते। सुनील छेत्री के संन्यास के बाद फीफा ने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट किया है जिसमें छेत्री की तुलना पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और अर्जेंटीना के लियोनेल मेसी से की है। दरअसल, सुनील छेत्री सक्रिय खिलाड़ियों में फुटबॉल की दुनिया में सबसे ज्यादा गोल करने के मामले में तीसरे नंबर पर है। उनसे आगे रोनाल्डो और मेसी ही हैं। वहीं इंटरनेशनल फुटबॉल में सबसे ज्यादा गोल करने के मामले में वह चौथे नंबर पर हैं। छेत्री के नाम 150 मैचों में 94 गोल हैं। पहले नंबर पर रोनाल्डो हैं और उनके बाद मेसी। फीफा ने इन तीनों की फोटो पोस्ट की है जिसमें पोडियम पर पहले नंबर पर रोनाल्डो, दूसरे पर मेसी और तीसरे पर छेत्री हैं। इसके साथ ही फीफा ने कमेंट लिखा है, “लीजेंड के तौर पर रिटायरमेंट लेते हुए।”छेत्री ने भारतीय फुटबॉल को उस मुकाम तक पहुंचाया जहां तक किसी ने सोचा नहीं था। उनकी कप्तानी में भारतीय टीम फीफा रैंकिंग में पहली बार टॉप-100 में आई। वह भारत की तरफ से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी भी हैं। दुनिया भर के अलग-अलग क्लबों के लिए खेले गए 365 मैचों में छेत्री ने 158 गोल किए। सच तो यह है कि हम भारतीय पैसे विदेशी खिलाड़ियों पर लुटाते हैं और पदक की उम्मीद भारतीय खिलाड़ियों से करते हैं जो कि हमारी नजर में सरासर बेईमानी है। मेसी के खेल का सम्मान हम करते हैं, निश्चित रूप से वह बड़े खिलाड़ी हैं मगर सवाल तो यह है कि भारतीय खेलों को आगे ले जाने में उनकी क्या भूमिका है, कुछ भी नहीं। आज सच कहें तो जिस तरह के तथाकथित खेल प्रेमी इस देश में हैं और खासकर बंगाल में हैं…वह खेल के प्रति नहीं, तमाशा और दिखावे की दीवानगी है। खिलाड़ियों पर सवाल उठाने से पहले हम भारतीय खेल प्रेमियों को अपने भीतर झांकने की जरूरत है। फिलहाल तो बंगाल में जो हुआ, वह बेहद शर्मनाक है।

इंडिगो को मिली 58.75 करोड़ रुपए की टैक्स नोटिस

नयी दिल्ली । बड़ी संख्या में उड़ान रद्द होने के कारण सरकारी जांच का सामना कर रही बजट एयरलाइन इंडिगो को 58.75 करोड़ रुपए की टैक्स नोटिस मिली है। यह जानकारी एयरलाइन की ओर से शुक्रवार को दी गई। एयरलाइन ने एक्सचेंज फाइलिंग में कहा है कि यह नोटिस वित्त वर्ष 2020-21 के लिए दिल्ली दक्षिण के सीजीएसटी के अतिरिक्त आयुक्त की ओर से दिया गया है। फाइलिंग में इंडिगो की प्रवर्तक कंपनी इंटरग्लोब एविएशन लिमिटेड ने कहा कि उसे गुरुवार (11 दिसंबर) को टैक्स पेनल्टी ऑर्डर प्राप्त हुआ, जिसमें जीएसटी की मांग के साथ-साथ जुर्माना भी शामिल है।
एयरलाइन यह टैक्स नोटिस ऐसे समय पर मिला है, जब इंडिगो इस महीने की शुरुआत में बड़ी संख्या में उड़ानों के रद्द होने के कारण मुश्किलों का सामना कर रही है।
इससे पहले नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने इंडिगो पर बड़ा एक्शन लिया है और उन चार फ्लाइट निरीक्षकों को निकाल दिया है, जो कि इंडिगो की सुरक्षा और ऑपरेशनल मानकों के लिए जिम्मेदार थे।
इसके अलावा विमानन नियामक ने इंडिगो के सीईओ पीटर एल्बर्स को समन भेजा है और उन्हें शुक्रवार को अधिकारियों के समक्ष फिर से पेश होने के लिए कहा गया है।
सूत्रों के अनुसार, निरीक्षण और निगरानी ड्यूटी में लापरवाही पाए जाने के बाद डीजीसीए ने निरीक्षकों के खिलाफ कार्रवाई की है।
नियामक ने अब इंडिगो के गुरुग्राम कार्यालय में दो विशेष निगरानी दल तैनात किए हैं ताकि एयरलाइन के संचालन पर कड़ी नजर रखी जा सके।
यह दल प्रतिदिन शाम 6 बजे तक डीजीसीए को रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे। एक दल इंडिगो के बेड़े की क्षमता, पायलटों की उपलब्धता, चालक दल के उपयोग के घंटे, प्रशिक्षण कार्यक्रम, ड्यूटी विभाजन पैटर्न, अनियोजित अवकाश, स्टैंडबाय क्रू और चालक दल की कमी के कारण प्रभावित उड़ानों की संख्या की निगरानी कर रहा है।
दूसरा दल यात्रियों पर संकट के प्रभाव पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इसमें एयरलाइन और ट्रैवल एजेंट दोनों से रिफंड की स्थिति, नागर विमानन आवश्यकताओं (सीएआर) के तहत दी जाने वाली क्षतिपूर्ति, समय पर उड़ान भरना, सामान की वापसी और समग्र रद्दीकरण की स्थिति की जांच करना शामिल है।

राष्ट्रीय जनगणना को केंद्र की मंजूरी, पहली बार होगीजाति आधारित गणना

-11,718.24 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन
नयी दिल्ली। केंद्र सरकार 11,718.24 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ जनगणना 2027 कराएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। इसके मुताबिक पहली बार जनगणना में जातिगत गणना भी शामिल होगी। इसे इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किया जाएगा। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राष्ट्रीय मीडिया केंद्र में पत्रकार वार्ता में इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जनगणना का कार्य दो चरणों में किया जाएगा- पहला चरण अप्रैल से सितंबर 2026 तक चलेगा, जबकि दूसरा चरण फरवरी 2027 में संपन्न होगा। पहली बार जनगणना में जातिगत गणना भी शामिल होगी। इसे इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किया जाएगा। मोबाइल ऐप के माध्यम से डाटा इकट्ठा किया जाएगा और केंद्रीय पोर्टल के माध्यम से पूरी प्रक्रिया पर नजर रखी जाएगी। जनगणना को विभिन्न मंत्रालयों को विविध उद्देश्यों के लिए स्पष्ट, मशीन रीडेबल और एक्शनेबल फॉर्मेट में उपलब्ध भी कराया जाएगा। उन्होंने बताया कि जनगणना 2027 का पहला चरण- हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच चलाया जाएगा। दूसरा चरण, यानी जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में होगा। हालांकि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर के दुर्गम क्षेत्रों और हिमाचल एवं उत्तराखंड के बर्फीले इलाकों में यह चरण सितंबर 2026 में संचालित किया जाएगा। पूरे देश में इस विशाल अभियान को पूरा करने के लिए लगभग 30 लाख फील्ड कर्मियों की नियुक्ति की जाएगी, जिनमें शिक्षक, पर्यवेक्षक और विभिन्न स्तरों के अधिकारी शामिल होंगे। उन्होंने बताया कि यह पहली जनगणना होगी जिसमें मोबाइल ऐप, डिजिटल प्रश्नावली और केंद्रीय मॉनिटरिंग पोर्टल (सीएमएमएस) का उपयोग किया जाएगा। इससे न केवल डाटा संग्रह की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि रीयल-टाइम निगरानी भी आसान होगी। जनता को स्वयं अपनी जानकारी भरने का विकल्प भी मिलेगा। सुरक्षा के लिए विशेष डिजिटल प्रावधान किए गए हैं। जनगणना 2027 के लिए विकसित ‘एचएलबी क्रिएटर’ वेब मैप एप्लिकेशन अधिकारियों को ब्लॉक मैपिंग में मदद करेगा। वैष्णव ने एक सवाल पर बताया कि जनगणना की प्रश्वावली और इसकी प्रक्रिया के बारे में विस्तार से एक अधिसूचना जारी की जाएगी। वहीं मंत्रिमंडल के इस साल 30 अप्रैल को लिए गए निर्णय के तहत इस बार जनगणना में जाति आधारित आंकड़े भी एकत्र किए जाएंगे। सरकार का कहना है कि देश की सामाजिक विविधता को समझने और नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए यह कदम जरूरी है। जनगणना 2027 से जुड़े कामों के लिए लगभग 18,600 तकनीकी कर्मचारियों की अस्थायी नियुक्ति की जाएगी, जिससे करीब 1.02 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार उत्पन्न होगा। डिजिटल डेटा प्रबंधन और विश्लेषण से जुड़े कार्यों में लगी यह टीम भविष्य में भी बेहतर रोजगार अवसरों के लिए सक्षम होगी। यह देश की 16वीं और स्वतंत्रता के बाद 8वीं जनगणना होगी। यह गांव, वार्ड और शहर स्तर तक विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराएगी। इसमें आवास, सुविधाएं, धर्म, भाषा, शिक्षा, आर्थिक गतिविधि, प्रवासन और प्रजनन जैसे कई महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक पहलुओं का विस्तृत डाटा एकत्र किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि जनगणना 2027 के परिणामों को पहले की तुलना में काफी कम समय में जारी किया जाए और इसे “क्लिक पर उपलब्ध सेवा” के रूप में राज्यों और मंत्रालयों तक पहुंचाया जाए। उल्लेखनीय है कि हर दस साल में देश में जनगणना कराई जाती है। इस हिसाब से 2021 में जनगणना की जानी थी लेकिन कोविड के कारण नहीं हो पायी। 16 जून को सरकार ने जनगणना 2027 की अधिसूचना जारी की थी। जनगणना की तारीख एक मार्च 2027 होगी।

कैबिनेट ने दी ‘कोलसेतु’ विंडो को मंजूरी

नयी दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने शुक्रवार को निर्बाध, कुशल और पारदर्शी उपयोग (कोलसेतु) के लिए कोयला लिंकेज की नीलामी की नीति को मंजूरी दे दी है। इसके तहत किसी भी औद्योगिक उपयोग और निर्यात के लिए कोयले का उपयोग करने हेतु ‘कोलसेतु’ नामक एक नई विंडो बनाई गई है, जिसे एनआरएस लिंकेज नीति में शामिल किया गया है। यह नई नीति सरकार द्वारा किए जा रहे कोयला क्षेत्र में किए जा रहे निरंतर सुधारों को दिखाती है। कैबिनेट की ओर से जारी की गई प्रेस रिलीज में कहा गया कि यह नीति 2016 की एनआरएस (नॉन-रेगुलेटेड सेक्टर) लिंकेज नीलामी नीति में ‘कोलसेतु’ नामक एक अलग विंडो जोड़कर, किसी भी औद्योगिक उपयोग और निर्यात के लिए नीलामी के आधार पर दीर्घकालिक कोयला लिंकेज के आवंटन की अनुमति देगी, जिसमें कोयले की आवश्यकता वाला कोई भी घरेलू खरीदार लिंकेज नीलामी में भाग ले सकता है। इस विंडो के तहत कोकिंग कोल ऑफर नहीं किया जाएगा।
एनआरएस जैसे सीमेंट, स्टील (कोकिंग), स्पंज आयरन, एल्युमीनियम, और अन्य (उर्वरक (यूरिया) को छोड़कर) के लिए कोयला लिंकेज की नीलामी की मौजूदा नीति में उनके कैप्टिव पावर प्लांट्स (सीपीपी) के लिए सभी नए कोयला लिंकेज का आवंटन नीलामी के आधार पर दिया जाएगा।
सरकार ने कहा कि वर्तमान और भविष्य के मार्केट के डायनामिक्स को देखते हुए और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के उद्देश्य से और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मौजूदा कोयला भंडारों के तेजी से उपयोग एवं आयातित कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए, एनआरएस को कोयला आपूर्ति की वर्तमान व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने और एनआरएस में लिंकेज को बिना किसी अंतिम उपयोग प्रतिबंध के कोयला उपभोक्ताओं तक विस्तारित करने की आवश्यकता थी।
सरकार के मुताबिक, एनआरएस के लिए कोयला लिंकेज की नीलामी की इस नीति को एक और विंडो/सब-सेक्टर जोड़कर, किसी भी औद्योगिक उपयोग और निर्यात के लिए नीलामी के आधार पर दीर्घकालिक कोयला लिंकेज के आवंटन हेतु संशोधित किया गया है। प्रस्तावित विंडो में ट्रेडर्स को भाग लेने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इस विंडो के तहत प्राप्त कोयला लिंकेज देश में रीसेल को छोड़कर, स्वयं के उपयोग, कोयले के निर्यात या किसी अन्य उद्देश्य (जिसमें कोयला वाशिंग भी शामिल है) के लिए होगा। कोल लिंकेज होल्डर्स अपनी लिंकेज क्वांटिटी का 50 प्रतिशत तक कोयले का निर्यात करने के पात्र होंगे।