Wednesday, April 1, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 230

वीरांगनाओं ने मनाया सावन मिलन उत्सव

कोलकाता । अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फाउंडेशन पश्चिम बंगाल की प्रदेश इकाई की ओर से काशीपुर में ‘सावन मिलन उत्सव’ मनाया गया। कार्यक्रम का संयोजन संगठन की काशीपुर इकाई ने किया था। समारोह में सावन से जुड़े गीतों की सांगीतिक प्रस्तुति की गयी। जिसमें प्रतिभा सिंह, कुमार सुरजित, बेबी काजल, साईं मोहन ने अपने गीतों पर लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। समारोह को सम्बोधित करते हुए वीरांगना की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने कहा कि सावन का महीना भारतीय सांस्कृतिक जीवन में बहुत महत्व का है। लोगों के जीवन में जिम्मेदारियां और संघर्ष बहुत हैं लेकिन हरियाली कम दिखायी देती है। हरियाली जरूरी है और वह बनी रहे, इसी कामना के साथ वीरांगनाओं ने यह उत्सव उल्लास के साथ मनाया। समारोह में पश्चिम बंगाल प्रदेश महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता राजेश सिंह, संयुक्त सचिव ममता सिंह, संगठन सचिव किरण सिंह, सुमन सिंह, कोलकाता महानगर (काशीपुर) इकाई की संरक्षक गिरिजा दारोगा सिंह, गिरिजा दुर्गादत्त सिंह, अध्यक्ष मीनू सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, महासचिव इंदु सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, संयुक्त सचिव विद्या सिंह, सदस्य सरोज सिंह, मीरा सिंह, पूनम सिंह, जूही सिंह, लाजवंती सिंह, रूपाली सिंह, मीना सिंह, सोदपुर इकाई की अध्य़क्ष सुनीता सिंह, सचिव मंजू सिंह, संयुक्त सचिव जयश्री सिंह तथा बालीगंज इकाई की अध्यक्ष रीता सिंह उपस्थित थीं। नारी शक्ति वीरांगना की सदस्याएं अनीता साव, शकुंतला साव, काजल गुप्ता, मीनू तिवारी, सुनीता शर्मा, स्तुति शर्मा, बेबी श्री आदि उपस्थित थीं।

प्रेमचंद भारतीयता के लेखक हैं-शुभ्रा उपाध्याय

कोलकाता । कोलकाता का प्रतिष्ठित कॉलेज खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज की ओर से प्रेमचंद जयंती के अवसर पर ‘प्रेमचंद स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर कॉलेज के आचार्य डॉ सुबीर कुमार दत्त ने कहा कि यह व्याख्यनमाला विगत बारह वषों से आयोजित हो रहा है। उन्होंने हिंदी विभाग की सक्रियता की प्रशंसा करते हुए आमंत्रित वक्ता एवं श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट किया। विभागाध्यक्ष डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने प्रेमचंद के लेखन और चिंतन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रेमचंद भारतीयता के लेखक हैं। मुख्य वक्ता क्वींस कॉलेज की प्रोफेसर डॉ शुभा श्रीवास्तव ने प्रेमचंद के लेखन में उपस्थित समग्रता पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के पात्र हमारे समाज के पात्र हैं। उनके प्रति प्रेमचंद की प्रतिबद्धता निरंतर बनी रही। उन्होंने विशेष रूप से ‘प्रेमाश्रम’ का समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया।उन्होंने प्रेमाश्रम की समस्याओं के साथ उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो.राहुल गौड़ और धन्यवाद ज्ञापन विभाग की शिक्षिका मधु सिंह ने दिया।

सन्मार्ग फाउंडेशन ने आयोजित किया 17वाँ ‘राम अवतार गुप्त हिंदी प्रोत्साहन 2022’

कोलकाता । सन्मार्ग फाउंडेशन ने राम अवतार गुप्त हिंदी प्रोत्साहन 2022 के अपने 17वें संस्करण आयोजित किया। यह कार्यक्रम कोलकाता के जीडी बिड़ला सभाघर में आयोजित किया गया था। इस वर्ष सिलीगुड़ी और दक्षिण बंगाल संस्करण भी देखा गया। इस कार्यक्रम की मेजबानी प्रसिद्ध टेलीविजन कलाकार ऋत्विक धनजानी ने की। इसके साथ ही शहर भर के छात्रों के लिए रेवोल्यूशन बैंड द्वारा एक विशेष रॉक प्रदर्शन का आयोजन किया गया।
इस पुरस्कार समारोह में विभिन्न बोर्डों (सीआईएससीई, सीबीएसई और डब्ल्यूबी बोर्ड) के कुल 60 विद्यार्थियों  को सम्मानित किया गया। 3 बोर्ड- सीआईएससीई, सीबीएसई और पश्चिम बंगाल बोर्ड के 10 और 12 में से प्रत्येक के 12 टॉपर्स छात्र थे, जिनका चयन किया गया था। इनमें से प्रत्येक बोर्ड के पहले और दूसरे टॉपर्स को सन्मार्ग फाउंडेशन की ओर से छात्रवृत्ति दी गई। इस पुरस्कार समारोह में विभिन्न बोर्डों (सीआईएससीई, सीबीएसई और डब्ल्यूबी बोर्ड) के कुल 60 छात्रों को सम्मानित किया गया। 3 बोर्ड- सीआईएससीई, सीबीएसई और पश्चिम बंगाल बोर्ड के 10 और 12 में से प्रत्येक के 12 टॉपर्स विद्यार्थी थे, जिनका चयन किया गया था। इनमें से प्रत्येक बोर्ड के पहले और दूसरे टॉपर्स को सन्मार्ग फाउंडेशन की ओर से स्कॉलरशिप दी गयी। यह पुरस्कार 4 सर्वश्रेष्ठ टॉप शिक्षण संस्थानों, 6 सर्वश्रेष्ठ शिक्षक – शिक्षिकाएं और 4 कॉलेज टॉपर्स को भी दिया गया। राम अवतार गुप्त हिंदी प्रोत्साहन पूरे बंगाल में 5000 स्कूलों और देश भर में एक हजार से अधिक स्कूलों तक पहुंचता है जहां छात्र हिंदी में अपने स्कूल के प्रदर्शन, उनकी पाठ्येतर गतिविधियों और भाषा के प्रति उनकी व्यक्तिगत पहल के आधार पर आवेदन करते हैं। स्कूलों को उनके प्रदर्शन और इस भाषा में उनके द्वारा की गई पहल के लिए सम्मानित किया गया। इस वर्ष भी हमने मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित किया, जिन्होंने शारीरिक अक्षमताओं, मानसिक चुनौतियों, भावनात्मक बाधाओं या वित्तीय कठिनाइयों का सामना किया है। इसे अजय और अपराजय पुरस्कारों के तहत वर्गीकृत किया गया है।
सन्मार्ग फाउंडेशन की निदेशक रुचिका गुप्ता ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “हिंदी देश की राजभाषा है और हमारे विनम्र प्रयास, ‘राम अवतार गुप्त हिंदी प्रोत्साहन’ के माध्यम से, हमारा लक्ष्य आज के युवाओं में इस महान भाषा के प्रति गर्व की भावना पैदा करना है। ”

प्रेमचंद जयंती पर मुक्तांचल के 34वें अंक का लोकार्पण

कोलकाता । ‘विद्यार्थी मंच’ द्वारा रविवार प्रेमचंद जयंती के अवसर पर ‘मुक्तांचल’ त्रैमासिक पत्रिका के 34वें अंक का लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया इसके साथ ही प्रेमचंद पर एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया।  इस कार्यक्रम की अध्यक्षता खुदीराम बोस सेंट्रल कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष शुभ्रा उपाध्याय ने की। कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई जिसे श्रद्धा गुप्ता ने प्रस्तुत किया। इसके पश्चात मंचासीन सभी विद्वानों ने मुक्तांचल पत्रिका के जुलाई अंक का लोकार्पण किया।

‌मुक्तांचल पत्रिका की संपादक डॉ. मीरा सिन्हा ने पत्रिका के 34वें अंक के बारे में बताते हुए कहा कि यह पत्रिका लोगों से जुड़ने और जोड़ने का कार्य कर रही है।  उन्होंने कहा कि स्वयं को विकसित करने का एक विशेष जरिया साहित्य है क्योंकि साहित्य में सबकुछ समाहित है। इसके साथ ही उन्होंने आपसी संवाद से ‘साहित्यिक माहौल’ बनाने की पहल पर विशेष बल दिया।

प्रेमचंद जयंती कार्यक्रम के प्रथम वक्ता डॉ. विनय मिश्र ने वर्तमान समय में प्रेमचंद की लोकप्रियता पर बात करते हुए कहा कि भारतीय समाज व्यवस्था को समझने में प्रेमचंद का साहित्य सदैव अमर रहेगा। उन्होंने प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से स्त्री, दलित, जातिवाद और संप्रदायवाद की समस्यायों को उठाते हुए उसे वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखने की बात कही।

‌कार्यक्रम में मौजूद दूसरे वक्ता जीवन सिंह ने अपने वक्तव्य की शुरुआत प्रेमचंद की प्रासंगिकता से करते हुए कहा कि आज जो समाज में घट रहा है, उसकी भनक प्रेमचन्द को सौ वर्ष पहले हो चुकी थी। अन्य भाषा की रचनाओं से तुलना करते हुए उन्होंने बताया कि आज प्रेमचंद को पढ़ना क्यों जरूरी है। प्रेमचंद के समग्र साहित्य में वर्तमान भारत की समस्यायों पर गहरी चिंता दिखाई पड़ती है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि आज की पीढ़ी को जरूरत है भारतीय समाज की कुव्यवस्था से लड़ने की।

मुख्य वक्ता मिदनापुर कॉलेज ( ऑटोनामस ) के हिंदी प्राध्यापक डॉ. रणजीत सिन्हा ने प्रेमचंद के महत्त्व को उजागर करते हुए बताया कि प्रेमचंद ने भोगे हुए यथार्थ से अपने साहित्य की भूमि तैयार की। उन्होंने वही लिखा जो समाज ने भोगा था। प्रेमचंद के पात्र आज भी हमारे इर्द-गिर्द जीवित है। वर्तमान समय में चल रहे तमाम विमर्शों के स्त्रोत प्रेमचंद के साहित्य में मिल जाते हैं।

इसी कड़ी में अगले वक्ता विवेक लाल ने प्रेमचंद के साहित्य पर चर्चा करते हुए कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य में चेतना रूपांतरण के सबसे महत्वपूर्ण रचनाकार प्रेमचंद है। प्रेमचंद अपनी दूरदर्शी दृष्टि के कारण सदैव नवीन रहेंगे और आज जरूरत है प्रेमचंद के पाठक को अपने अंदर इंकलाब की चेतना लाने की।

इस अवसर पर उपस्थित श्रीप्रकाश गुप्ता ने कहा कि आज के विद्यार्थी एवं युवा वर्ग को पाठ्यक्रम से इतर भी प्रेमचंद को पढ़ने एवं समझने की जरूरत है क्योंकि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब आज की युवा पीढ़ी प्रेमचंद को नवीन नजरिये से पढ़ेगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही डॉ. शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि प्रेमचंद के यहाँ जैसी आत्मीयता और संवेदना मिलती है वैसा अन्यथा मिलना मुश्किल है। आज भी जब हम विमर्शों की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले प्रेमचंद के पास जाने की जरूरत है।

कार्यक्रम में मौजूद रितेश पांडे और जीवन सिंह जी ने अपनी स्वरचित कविता का पाठ करके कार्यक्रम को आंनदमय कर दिया।  इसके साथ ही अक्षिता साव, अभिषेक पांडे, प्रीति साव एवं श्रद्धा गुप्ता ने भी अपनी स्वरचित कविता तथा ग़ज़लों को प्रस्तुत किया।

अंत में नगीनालाल दास ने धन्यवाद ज्ञापन देकर कार्यक्रम में मौजूद सबके प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन परमजीत कुमार पंडित ने किया।  कार्यक्रम में मौजूद सुशील कुमार पांडे, विनोद यादव, विनीता लाल, सरिता खोवाला, बलराम साव, शनि चौहान एवं रानी तांती समेत अनेक विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी।

रपट – रानी तांती, शोथार्थी, प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय 

द हेरिटेज अकादमी ने मनाया 15वां स्थापना दिवस

कोलकाता । द हेरिटेज अकादमी ने गत 1 अगस्त 2022 को अपना 15 वां स्थापना दिवस मनाया। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में रामकृष्ण मिशन शिल्पमंदिर, बेलूर मठ के प्रतिनिधि स्वामी वेदातितानंदजी महाराज उपस्थित थे। अपने वक्तव्य में स्वामीजी ने इस तथ्य पर जोर दिया कि विद्यार्थियों  को अकादमिक उत्कृष्टता से परिपूर्ण   शैक्षणिक संस्थान के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी है।
कार्यक्रम को कल्याण भारती ट्रस्ट के निदेशक प्रबीर रॉय,हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रिंसिपल प्रो. बासब चौधरी, हेरिटेज बिजनेस स्कूल के निदेशक के.के.चौधरी ने भी संबोधित किया। द हेरिटेज अकादमी के प्रिंसिपल प्रो. गौर बनर्जी और द हेरिटेज अकादमी के मीडिया साइंस विभाग की डीन डॉ. मधुपा बख्शी ने भी विचार रखे।
इस कार्यक्रम में छात्रों और संकाय सदस्यों द्वारा विभिन्न नृत्य और संगीत प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया। इसके अलावा, प्रतिष्ठित संस्थान में 10 साल की सेवा पूरी करने वाले शिक्षकों और कर्मचारियों को भी इस दिन सम्मानित किया जा रहा है। हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस, कोलकाता के सीईओ पी.के.अग्रवाल ने कहा, “मुझे वह क्षण याद है जब संस्थान ने वर्ष 2007 में अपनी यात्रा शुरू की थी। उस समय के दौरान, श्रीमद् आचार्य सौम्येंद्र नाथ ब्रह्मचारी जी ने संस्थान का उद्घाटन किया था और अब संस्थान बीबीए, बीसीए और मीडिया विज्ञान कार्यक्रमों की पेशकश करने वाले शीर्ष संस्थानों में से एक है। आचार्य जी के आशीर्वाद और सभी हितधारकों के समर्थन के कारण, हमने यह मुकाम हासिल किया है। मीडिया विज्ञान विभाग के छात्रों द्वारा बनाई गई एक वीडियो प्रस्तुति भी दर्शकों को संस्थान की 15 साल की यात्रा को दर्शाती हुई दिखाई गई।

जलेबी…मिष्ठान जो श्रीराम को अत्यन्त प्रिय है

जलेबी प्राचीन समय से ही भारतीयों की सबसे पसंदीदा मिठाइयों में से एक रही है। यह भारत की मिठाई है और यहीं से पूरी दुनिया में लोकप्रिय हुई। जलेबी को प्राचीन भारत में कर्णशष्कुलिका या शष्कुली कहा जाता था और कहते हैं कि यह मिष्ठान भगवान श्रीराम को भी बहुत पसंद है। शायद यही कारण है कि हर शुभ अवसर पर यह मिष्ठान बनाया जाता था। फिर वह वह श्रीराम का जन्मोत्सव हो या दशहरे का दिन या फिर दीपावली। जलेबी को कुण्डलिनी भी कहते हैं।
अगर बात भारतीय इतिहास की हो तो मराठा ब्राह्मण पंडित रघुनाथ सूरी ने 17वीं शताब्दी में भोजनकुतूहल नामक पुस्तक लिखी थी, जिसमें भोजन से संबंधित सभी जानकारियां दी गई है और यह किताब पाक कला और आयुर्वेद का एक आदर्श मिश्रण मानी जाती है। इस पुस्तक में भी श्रीरामजन्म के समय प्रजा में जलेबियां बंटवाने का जिक्र किया गया है. कई जगह जलेबी को शष्कुली’ ही लिखा गया है।
भावप्रकाश प्राचीन भारतीय औषधि शास्त्र के अंतिम आचार्य कहे जाने वाले भाव मिश्र द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थ भावप्रकाश के कुछ श्लोकों में जलेबी को बनाने की विधि और उसके फायदों के बारे में बताया गया है। भावप्रकाश के अनुसार, “जलेबी कुण्डलिनी को जगाने वाली, पुष्टि, कांति और बत देने वाली धातुवर्धक, वीर्यवर्धक, रुचिकारक और इंद्रिय सुख और रसेंद्रिय को तृप्त करने वाली होती है।”
कुण्डलिनी
नूतनं घटमानीय तस्यान्तः कुशलो जनः प्रस्थार्थपरिमाणेन दघ्नाऽम्लेन प्रलेपयेत्॥१३०|| दिप्रस्थां समितां तत्र दध्याम्लं प्रस्थसम्मितम् पुतमराव घोलवित्वा घंटे क्षिपेत् ॥ १३८|| आतपे स्यापयेत्तावद् यावद्याति तदम्लताम्
परिभ्राम्य परिभ्राम्य सुसन्तप्ते घृते क्षिपेत्
पुनः पुनस्तदावृत्त्या विदध्यान्मण्डलाकृतिह९४०|| कर्पूरादिसुगन्धे च स्नापयित्वोद्धरेत्ततः॥११|| एषा कुण्डलिनी नाम्ना पुष्टिकान्सिबलप्रदा ततस्तत्प्रक्षिपेत्पात्रे सच्छिदे भाजने तु तत्३९३५|| धातुवृद्धिकरी वृष्या रुच्या चेन्द्रियतर्पणी॥९४२॥
तो सुपक्वां घृतान्त्रीत्वा सितापाके तनुद्रवे
नयापटाकर उसके भीतर ॥ १३२ ॥ आपसेर खट्टा दहीसे लेप करावे उसमें दोसेर मैदा ओर एकसेर सट्टा दही ॥ १२२ ॥ पावभर प्रत इनकों पोलकर हमें इसकों पूपमें रखे तस्तक जबतक सट्टापन इसमें न आये ॥ १२४ ॥ अ नन्तर छेकवाले बरतन में उसको दाल उसको प्रमारकर जलते वे पीयें
लेखक शरदचंद्र पेंढारकर ने भी जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम ‘कुण्डलिका बताया है। संस्कृत में लिखी ‘गुण्यगुणबोधिनी किताब में भी जलेबी बनाने की विधि बताई गई है। जैन धर्म के ग्रन्थ कर्णयकथा’ में जलेबी भगवान महावीर को नेवेद्य लगाने वाली मिठाई बताया गया है।

वहीं, तुर्की के मोहम्मद बिन हसन की तरफ से अरबी भाषा में लिखी गई ‘किताब-अल-तबिक में जलेबी को जलाबिया लिखा गया है। हिंदी में जलेबी को जलवल्लिका’ कहा जाता है।लगभग हर जगह के लोग दूध, दही या रबड़ी के साथ रसभरी, गोल गोल घुमावदार जलेबियां बड़े चाव से खाते हैं।

जलेबी खाने के फायदे
क्या मीठा खाने के भी फायदे हो सकते हैं? हाँ.. हो सकते हैं, लेकिन तभी जब गीठा संयम में और सही तरीके से खाया जाए, और फिर हर तरह की मिठाई तो रोहत के लिए फायदेमंद नहीं होती, लेकिन पुराने समय में जलेबियों को बनाने का जो तरीका बताया गया है, वह सेहत के लिए अच्छा माना गया है. कई प्राचीन किताबों में जलेबी को औषधीय मिठाई का दर्जा दिया गया है। इसे खाने के कई तरह के शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक फायदे बताए गए है । जलेबी खाने के अध्यात्मिक फायदे जलेबी (जल.एबी) शरीर में मौजूद जल के ऐब यानी दोष को दूर करती है। इसकी बनावट शरीर की कुण्डलिनी चक्र के जैसी होती है, अघोरी, संतों के अनुसार, जलेबी खाने से शरीर में अध्यात्मिक शक्ति, सिद्धि और ऊर्जा का विकास होता है, जिससे स्वाधिष्ठान चक्र को जगाने में सहायता मिलती है। आज भी गाँवों में और शहरों में भी गरमागरम दूध-जलेबी का नाश्ता करना पसंद करते हैं। कहा जाता है कि शुद्ध घी में बनीं गरमागरम दूध-जलेबी का सेवन करने से जुकाम में आराम होता है। दूध या दही के साथ गर्म जलेबियां त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ को दूर करने में सहायक है।
जिन लोगों को सिरदर्द की समस्या रहती हो, वे सुबह गर्म जलेबियों का सेवन करें और तुरंत पानी न पीयें तो उनके सभी तरह के मानसिक दोष खत्म हो जाते हैं। सुबह जलेबियों का सेवन करने से पीलिया और पांडुरोगों में भी आराम होता है.गर्म जलेबियों को चर्म रोगों में भी फायदेमंद बताया गया है. पैरों की एड़ियां या बिवाई फटने की परेशानी में लगातार का दिनों तक जलेबियों का सेवन करने से आराम होता है।
हमारा परामर्श तो यह है कि मधुमेह या डायबिटीज के मरीज जलेबियों का सेवन न करें या डॉक्टर या सही जानकार की सलाह से ही करें। कई लोगों को लगता है कि जलेबी और इमरती एक ही मिठाई है, लेकिन ये सच नहीं है क्योंकि दोनों को बनाने की मूल सामग्री अलग है।
जलेबी बनाने में मैदे का प्रयोग होता है औए उसका स्वाद सिर्फ मीठा होता है। इमरती उड़द दाल के आटे से बनती है और ये भले ही मीठी लगती हो लेकिन इमरती का स्वाद जलेबी के स्वाद से कही ज्यादा अलग होता है। जलेबी करारी होती है और इमरती उरद दाल की वजह से उतनी करारी नही बनती है।
(साभार प्रिंसली डॉट कॉम और क्योरा डॉट कॉम)

जब दिव्यांगों ने लिया अंगदान करने का संकल्प

निप एवं अनुभव के नेत्र एवं अंगदान शिविर में 100 लोगों ने की भागीदारी

कोलकाता । स्वयंसेवी संस्था “एनआईपी” और “अनुभव” द्वारा हाल ही में नेत्र व अंगदान को लेकर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में 100 लोगों ने स्वेच्छामूलक नेत्र व अंगदान किया। इनमें कई दिव्यांग लोग भी शामिल हैं। इस मौके पर एनआईपी के सचिव देबज्योति राय ने कहा कि समाज में रहनेवाले दिव्यांग भी इस समाज का अंग हैं।

हमें उनको दूसरों की सहायता करने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है जिससे वे अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें। हरिदेवपुर अनुभव वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष सुशांत भट्टाचार्य ने कहा कि 100 लोगों ने इस आयोजन में नेत्र एवं अंगदान किया। इस कार्यक्रम में लोगों की बड़ी संख्या में मौजूदगी इसकी सफलता को बयां करती है।

वसुंधरा

कविता कोठारी

शत-शत नमन तुमको, हे वसुंधरा।
तुमसे ही हैं ये जीव सारे ओ धरा।
तुमने ही जीवनदान है सबको दिया।
सुख-भाग सबको बाँटती हो ओ धरा।
सुख और दुख समरूप से हो झेेलती।
उर में छिपा लेती हो निज दुख ओ धरा।
सबको तुम्हीं हो बाँटती अमृत-सुधा,
पर मिला तुमको गरल-विष ओ धरा।
उफ़ न करती तुम रही हँसती सदा।
जग ने कहाँ समझा है तुमको ओ धरा।

सीआईएससीई की 12वीं में एक साथ 18 परीक्षार्थी टॉपर

नयी दिल्ली । काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (सीआईएससीई) की 12वीं कक्षा की परीक्षा के नतीजे रविवार को घोषित कर दिये गए। नतीजों के अनुसार, अठारह परीक्षार्थियों ने 99.75 प्रतिशत अंक के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया है।
दूसरी रैंक 58 उम्मीदवारों ने साझा की है, जिन्होंने 99.50 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं, जबकि 78 उम्मीदवारों ने 99.25 प्रतिशत अंक प्राप्त करके तीसरी रैंक साझा की है। अधिकारियों ने कहा कि परीक्षा में उत्तीर्ण प्रतिशत 99.52 फीसदी रहा, जिसमें लड़कियों ने लड़कों को बहुत कम अंतर से मात दी।
पहली बार बोर्ड ने दो टर्म में परीक्षा आयोजित की थी।
बोर्ड के सचिव गैरी अराथून ने परिणाम गणना के फार्मूले के बारे में कहा कि ज्यामितीय, मैकेनिकल ड्राइंग और कला जैसे विषयों को छोड़कर प्रत्येक विषय के पहले सेमेस्टर के अंकों को आधा कर दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘इन अंकों को दूसरे सेमेस्टर और प्रैक्टिकल/ प्रोजेक्ट अंकों में जोड़ा गया है, ताकि प्रत्येक विषय में अंतिम अंक प्राप्त किए जा सकें।’’

बंगाल की रमनिता बनीं शबर जनजाति से स्नातकोत्तर करने वाली बनीं पहली महिला

कोलकाता। बंगाल के पुरुलिया जिले की रहने वाली रमनिता शबर ने पोस्ट ग्रेजुएशन करके इतिहास रच दिया है। वह खेडिय़ा शबर जनजाति से पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाली पहली महिला हैं। पुरुलिया के बड़ाबाजार इलाके की रहने वाली रमनिता ने पुरुलिया के सिधु कान्हू बिरसा विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। उसके पिता महादेव दिहाड़ी मजदूर हैं। चार भाई-बहनों में रमनिता सबसे बड़ी हैं। बचपन में ही पढ़ाई के प्रति उसकी दिलचस्पी देखते हुए एक रिश्तेदार ने आर्थिक मदद का हाथ बढ़ाया था।
रमनिता ने पड़ोसी राज्य झारखंड के एक स्कूल से 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुरुलिया के स्कूल से बारहवीं की पढ़ाई की। इसके बाद झारखंड के एक कालेज से इतिहास में ग्रेजुएशन किया। शबर समुदाय से ग्रेजुएशन करने वाली पहली महिला होने के कारण पुरुलिया जिला प्रशासन की तरफ से उसके सिधु कान्हू बिरसा विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन करने की व्यवस्था की गई। बेटी की इस सफलता से पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। उन्होंने कहा- ‘मेरी बेटी की जिद सफल हो गई। उसने हमारे समुदाय का मान बढ़ाया है।
शिक्षिका बनने का सपना
रमनिता शिक्षिका बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा- ‘मेरी बचपन से ही शिक्षिका बनने की इच्छा है। इसी सपने को पूरा करुंगी। आगे लंबी दूरी तय करनी है। पश्चिम बंगाल खेरिया शबर कल्याण समिति की तरफ से रमनिता की उपलब्धि पर उन्हें सम्मानित किया गया है। रमनिता इस समिति की सदस्या भी हैं। समिति ने कहा हमें रमनिता पर गर्व है।