Thursday, July 9, 2026
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ऑनलाइन पेमेंट करते वक्त दिमाग में रखें ये 4 बातें, ठग पास फटकेंगे भी नहीं

डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में भारत ने रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बनाए हैं। डिजिटल पेमेंट पर हमारी निर्भरता बढ़ी है, एक तरह से यह हमारे ट्रांजैक्शनल हैबिट्स का एक हिस्सा बन चुका है लेकिन डिजिटल पेमेंट के साथ अगर सावधानी न बरती जाए तो ठगी की गुंजाइश बहुत दूर की बात नहीं. ऑनलाइन पेमेंट करते हुए फ्रॉड होने का डर बना रहता है। खासकर फ्रॉडस्टर्स ऐसे यूजर्स की तलाश में रहते हैं, जिसको बेवकूफ बनाकर वो पैसे ऐंठ सकें। डिजिटल पेमेंट के वक्त अगर आप ये चार बातें याद रखते हैं तो आपको अपने डेटा सुरक्षा की फिक्र नहीं करनी पड़ेगी।
1. अपना यूपीआई पिन किसी के साथ शेयर न करें
सबसे पहली बात अपना यूपीआई पिन किसी के भी साथ शेयर न करें। आपका यूपीआई पिन भी आपके एटीएम पिन जैसा ही होता है। यूपीआई बेस्ड पेमेंट ऐप्स पर पिन डालकर ही आप किसी ट्रांजैक्शन को ऑथराइज़ करते हैं। पिन को सेफ रखना आपकी पहली जिम्मेदारी है।
2. किसी भी संदिग्ध लिंक पर क्लिक न करें
फ्रॉडस्टर्स अकसर लिंक भेजकर आपको क्लिक करने का झांसा देते हैं और फिर आपके डिवाइस में एंट्री पा जाते हैं। इससे उनके पास आपकी सारी डिटेल्स आ जाती हैं। ऐसे में कभी भी किसी भी लिंक पर अच्छी तरह से देखने-समझने के बाद ही क्लिक करें। किसी भी नंबर या ईमेल एड्रेस से आए लिंक पर क्लिक करने से बचें। वॉट्सऐप के जरिए भी यह खेल होता है, ऐसे मामलों में हमेशा सतर्क रहें।
3. किसे पैसे भेज रहे हैं, वो ब्योरा जाँच लें
यूपीआई पेमेंट की शुरुआत में ऐसा कई बार देखा गया था कि यूपीआई ऐप में रिसीवर की आईडी गलत है, या आपको बेवकूफ बनाकर आपको पैसे भेजने के बजाय आपसे पैसे सेंड करवा लिए गए। इसलिए जब भी आप कोई पेमेंट करने जाएं तो जहां अमाउंट डालने का बॉक्स आता है। उसके ऊपर ही दायीं ओर दिखता है कि ये पैसा किसे भेजा जा रहा है. इस एड्रेस को हमेशा चेक कर लें.
4. अपने डिवाइस की सिक्योरिटी अपडेटेड रखें
अपने डिवाइस की सिक्योरिटी को हमेशा अपडेट करके रखें। इसके साथ ही अपने डिवाइस को लॉक करके भी रखें। ऐसा पहले होता था कि हमारे फोन में हमारी ऐसी कोई सेंसिटिव डिटेल नहीं हुआ करती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब बैंकिंग, हेल्थ, फाइनेंस, से लेकर जरूरी डॉक्यूमेंट्स तक हम इस डिवाइस में रख सकते हैं. ऐसे में इसका प्रोटेक्शन भी इसी हिसाब से होना चाहिए।
आप एक काम यह भी कर सकते हैं कि आप अपने हर ऐप को लॉक करके रखें। इससे अगर आपका फोन अनलॉक रह भी जाता है तो भी हर ऐप को लॉक रखना समझदारी भरा कदम साबित होगा।

 

गोरखपुर में 1071 करोड़ का निवेश करेगी पेप्सिको

बाटलिंग प्लांट के लिए एक सप्ताह में आवंटित होगी जमीन- 15 सौ को मिलेगा रोजगार
गोरखपुर । गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) में एक साथ अबतक का सबसे बड़ा निवेश होने जा रहा है। पेप्सिको की बाटलिंग कंपनी वरुण बेवरेजेस लिमिटेड की ओर से एक हजार 71 करोड़ 28 लाख रुपये के निवेश का प्रस्ताव दिया गया है। कंपनी ने 60 एकड़ जमीन की मांग की थी लेकिन अभी 45 एकड़ जमीन उपलब्ध है। इस बाटलिंग प्लांट के लगने से पूर्वांचल के औद्योगिक विकास की सूरत बदल जाएगी।
गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे के किनारे औद्योगिक गलियारे में (नरकटहा गांव) में यह जमीन दी जा रही है और गीडा ने जमीन का पैसा जमा करने के लिए कंपनी को पत्र भी लिख दिया है। एक सप्ताह के भीतर जमीन आवंटित कर दी जाएगी। उम्मीद जताई जा रही है कि एक महीने के भीतर ही कंपनी बाटलिंग प्लांट स्थापित कराने के लिए भूमि पूजन भी करेगी।
तीसरे ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में वरुण बेवरेज की ओर से उत्तर प्रदेश में दो हजार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की गई थी। इसमें से 1071.28 करोड़ रुपये गीडा में ही निवेश किए जा रहे हैं। इस निवेश से 1500 लोगों को रोजगार मिल सकेगा। वरुण बेवरेजेस लिमिटेड संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) के बाहर पेप्सिको की दूसरी सबसे बड़ी बाटलिंग कंपनी है।
कंपनी की ओर से गीडा के साथ ही कंपनी को 15 एकड़ जमीन और दी जाएगी। जमीन मिलने के साथ ही निवेश और बढ़ सकता है। कुल निवेश करीब 1500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। कंपनी ने गीडा के साथ ही इंवेस्ट यूपी में भी आवेदन किया था। इंवेस्ट यूपी की ओर से फास्ट ट्रैक माध्यम से जमीन आवंटित करने को कहा गया। इस माध्यम से जमीन देते समय विज्ञापन निकालकर आवेदन लेने की जरूरत नहीं होती। जमीन सीधे कंपनी को आवंटित कर दी जाती है। ‘सुपर मेगा इंवेस्टमेंट’ श्रेणी में होने के कारण इस निवेश के लिए फास्ट ट्रैक माध्यम से जमीन दी जा रही है।
पेप्सिको के सभी बेवरेज उत्पाद इस कंपनी में तैयार होंगे। कार्बोनेटेड साफ्ट ड्रिंक जैसे पेप्सी, सेवेन अप, माउंटेन ड्यू, मिरिंडा, ट्रापिकाना फ्रूट जूस, एक्वाफिना पानी आदि का उत्पादन होगा। इसके साथ ही मिल्क बेस्ड ड्रिंक, वैल्यु एडेड डेयरी प्रोडक्ट, एवं ड्रिंक के लिए बोतल का उत्पादन किया जाएगा। भविष्य में यहां चिप्स आदि का भी उत्पादन हो सकता है।
एक हजार 71 करोड़ रुपये के निवेश के साथ ही औद्योगिक गलियारे में बड़े निवेश की शुरूआत भी हो गई है। गलियारे में अभी कई और बड़ी कंपनियों की ओर से निवेश किया जाएगा।

बजरंग पूनिया विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में चार पदक जीतने वाले पहले भारतीय

बेलग्रेड । बेलग्रेड में जारी विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में भारतीय पहलवान बजरंग पूनिया ने कांस्य मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। बजरंग भारत के इकलौते पहलवान हैं जिन्होंने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में चार मेडल जीतने का कारनामा किया है। इससे पहले बजरंग ने 2013 में ब्रॉन्ज, 2018 में सिल्वर और 2019 में फिर से कांस्य जीता था। विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के इस सत्र में बजरंग ने 65 किलोग्राम भारवर्ग में पुएर्टो रिको के सेबस्टियन रिवेरा को 11-9 से हराया।
बजरंग पूनिया पिछले कुछ सालों में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने इससे पहले तोक्यो ओलिंपिक कांस्य और 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स स्वर्ण जीता था। वहीं वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप उन्होंने भारत को दूसरा पदक दिलाया है। बजरंग के अलावा महिला पहलवान विनेश फोगाट ने चैंपियनशिप में कांस्य पदक अपने नाम किया है।
वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप के शुरुआती मुकाबले में बजरंग पिछड़ गए थे लेकिन उन्हें रेपचेज में कांस्य पदक जीतने का एक मौका मिला। उन्होंने रेपचेज के पहले मैच आर्मेनिया के पहलवान वेजगेन तेवान्यान को कड़े मुकाबले में हराया। इससे पहले बजरंग अपने शुरुआती मैच में ही चोटिल हो गए थे। उन्हें सर में चोट लगी थी लेकिन बावजूद इसके वह प्रतियोगिता में बने रहने का फैसला किया था।
चोट के कारण उनके प्रदर्शन पर भी असर देखने को मिला। विश्व कुश्ती चैंपियनशिप के ब्रॉन्ज मेडल के प्लेऑफ मैच में 6-0 से पीछे चल रहे थे लेकिन इसके बाद उन्होंने वापसी करते हुए 11-9 से जीत हासिल की।
बजरंग के अलावा विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में भारत के कई अन्य महिला और पुरुष पहलवान भाग ले रहे हैं। भारत ने इस चैंपियनशिप के लिए ग्रीको-रोमन, फ्रीस्टाइल और महिला कुश्ती की तीस कैटेगरी में कुल 30 पहलवान भेजे थे जिसमें से अब तक सिर्फ दो ही पदक जीत पाएं हैं।
बजरंग और विनेश फोगाट के अलावा सागर जगलान (74 किग्रा), नवीन मलिक (70 किग्रा) और निशा दहिया (68 किग्रा) कांस्य पदक के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके अलावा ओलंपिक सिल्वर मेडलिस्ट और कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट रवि दहिया को टूर्नामेंट की शुरुआत में झटका लगा था। वह प्री-क्वार्टर फाइनल राउंड में हार गए थे।

 

हाईवे के बीच आ रहा 134 साल पुराना मंदिर, नींव समेत किया जाएगा स्थानांतरित

नयी दिल्ली । लखनऊ-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग को फोरलेन बनाने का काम चल रहा है। इस हाईवे पर कछियानी खेड़ा के एक 134 साल हनुमान मंदिर बीच में आ रहा है। अब इस मंदिर को अत्याधुनिक तकनीक से हाईवे पर पीछे की ओर खिसकाया जाएगा। इसके लिए एनएचएआई ने एक कंपनी से अनुबंध किया है। इंजीनियर मशीनों और जैक के जरिए पूरे मंदिर परिसर को इस तरह हटाएंगे कि मंदिर और वहां लगे विशाल पेड़ का मूलस्वरूप यथावत बना रहे। ऐसा करने में करीब 2 महीने का समय लगेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये काम किस तरह किया जाता है। मंदिर ही नहीं मकानों को भी एक जगह से दूसरी जगह पर उठाकर रखवाया जा सकता है। आखिर इस काम को कौन से लोग करते हैं और इसमें कितना खर्च आता है। चलिए आपको बताते हैं।
इस तरह एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित की जाती हैं इमारत
इस तरह के काम अभी देश में कुछ प्राइवेट कंपनियां कर रही हैं। इसमें आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है। इस काम में सावधानी बेहद जरूरी है। ये काफी धैर्य का काम है। इसमें जैक के जरिए पहले बिल्डिंग को ऊपर उठाया जाता है। इसमें 20 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग जाता है। इसके बाद जाकर बिल्डिंग तीन से चार फीट ऊपर उठ पाती है। बिल्डिंग को नींव सहित उठाया जाता है। एक्सपर्ट बताते हैं कि इससे बिल्डिंग की मजबूती पर कोई असर नहीं पड़ता है। बिल्डिंग को ऊपर उठाने के बाद उसे मशीनों की मदद से धीरे-धीरे खिसकाया जाता है।
कितना आता है खर्च
इस काम को करने में खर्च काफी कम आता है। अगर आप मकान या बिल्डिंग को गिराकर दूसरी जगह बनवाएंगे तो खर्चा काफी आता है। इस तरह से अगर आप मकान को शिफ्ट कराते हैं तो खर्चा काफी कम आता है। मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, जो प्राइवेट कंपनियां इस काम का ठेका लेती हैं वो मकान को कितनी दूर शिफ्ट करना है उस हिसाब से रुपये चार्ज करती हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि कंपनियां पुराने मकान को एक से तीन फीट तक लिफ्ट करने के लिए करीब 200 से 250 रुपये प्रति वर्गफीट के हिसाब से ठेका लेती हैं। इससे ऊपर मकान लिफ्ट कराने पर प्रति वर्गफीट 50 रुपए फीट के हिसाब से अतिरिक्त चार्ज देना होता है।
चार-पांच मंजिला मकान भी हो सकता है लिफ्ट
एक्सपर्टस के मुताबिक, अगर मकान का नीचे का लैंटर मजबूत हो और दीवारें दो ईंट की चौड़ाई की हों तो चार-पांच मंजिला मकान भी अधिकतम पांच-छह फीट तक शिफ्ट व लिफ्ट किया जा सकता है। खुले में बने मकान को लिफ्ट करने में आसानी होती है। इसमें खर्च भी कम आता है। अगर मकान को अपने स्थान से खिसकाकर अन्य जगह शिफ्ट किया जाएगा तो खर्च बहुत आता है। शिफ्टिंग में तकनीक ज्यादा इस्तेमाल होती है, खर्च बढ़ता है जो कि कभी-कभी मकान की लागत से ज्यादा हो सकता है। इसलिए उसे ज्यादा दूर तक शिफ्ट नहीं कराया जाता।
ऐसे लिफ्ट किया जाता है मकान
इसमें सबसे पहले मकान को खाली कराकर अंदर के फर्श को खोदा जाता है और नींवों को साइड से उखाड़कर दासे की पटिया के नीचे लोहे के एंगल फंसाए जाते हैं। इसके बाद समूचे एंगलों को वेल्डिंग करके एक समान बेस तैयार किया जाता है और उसके नीचे जैक लगाए जाते है। मकान के साइज के हिसाब से जैक लगाए जाते हैं। सामान्य साइज के मकान में 200 से 300 जैक लगाए जाते हैं। इसके बाद इन्हें एक साथ आधा-आधा इंच उठाना शुरू किया जाता है। जैक के लीवर को उठाने के लिए मजदूर भी लगाए जाते हैं। इन मजदूरों को हेड मिस्त्री कमांड देता है। ये मजदूर कमांड मिलने के बाद एक साथ सभी जेक को आधा-आधा इंच ऊपर उठाते हैं। जब सभी जैक आधा इंच ऊपर आ जाते हैं तब दोबारा से फिर एक-एक करके सभी जैक लीवर के सहारे आधा इंच उठाए जाते हैं। यह प्रक्रिया दिन भर चलती है।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

धोबिया नाच… पीढ़ियों की विरासत जिंदा रखे हुए है गाजीपुर का यह कलाकार

गाजीपुर । देश में बहुत सी ऐसी विधाएं हैं, जो कि समय के साथ विलुप्त होती जा रही है। ऐसी ही एक मंचीय कला धोबिया नाच  है, जिसके कलाकार इस विधा को बचाने के लिए चिंतित है। गाजीपुर के सलटू राम विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुके, मंचीय कला धोबिया नाच को संरक्षित करने की जद्दोजहद में लगे हैं। एक वक्त था कि लगभग सभी मांगलिक कार्यों पर धोबिया नाच का आयोजन सामान्य रवायत का हिस्सा था। लेकिन, कालांतर में ब्रास बैंड और उसके बाद डीजे ने धोबिया नाच के कलाकारों को हाशिए पर ठेल दिया।
सलटू ने एनबीटीऑनलाइन को बताया कि यह विधा पिछले तीन पीढ़ियों से उनके परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रही है। अब वह अपने बेटे को धोबिया नाच का हुनर सीखा रहे हैं। सलटू के दादा मुसन राम त्रिनिदाद टोबैगो के साथ अफ्रीकी देशों में अपने परफॉर्मेंस दे चुके हैं। सलटू अपने दादा की विदेशी यात्राओं के हवाई जहाज के टिकट और तस्वीरों को संरक्षित करके रखे हुए हैं।
बचपन की यादों में खो गए सलटू राम
सलटू अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि, एक दौर था जब लगभग हर मांगलिक अवसरों पर धोबिया नाच का परफॉर्मेंस होता था। धीरे-धीरे ब्रास बैंड और उसके बाद डीजे ने धोबिया नाच की विधा को हाशिए पर धकेल दिया। सलटू आगे बताते हैं कि उनके बाबा मुसन राम जब मंच पर चढ़कर वीर रस में आजादी की लड़ाई से जुड़ी घटनाओं का वर्णन अपनी मंचीय कला धोबिया नाच के माध्यम से वर्णित करते थे, तो मानो पूरा माहौल जीवंत हो जाता था। सलटू बताते हैं कि अब इस विधा के कुछ गिने-चुने कद्रदान ही रह गए हैं।
मॉरीशस के पीएम के स्‍वागत में धोबिया नाच
गाजीपुर के मरदह ब्लाक के पांडेपुर राधे गांव के रहने वाले सलटू बताते हैं कि कभी-कदार उनसे लोग संपर्क करते हैं और उनसे परफॉर्म करने के लिए कहते हैं। कभी कुछ संस्थाओं के तरफ से भी कार्यक्रम करने का निमंत्रण मिलता है। सलटू ने पिछले दिनों मॉरीशस के प्रधानमंत्री के वाराणसी आगमन पर उनके स्वागत में धोबिया नाच का परफॉर्मेंस दिया था। वाराणसी में भी सलटू को परफॉर्म करने का मौका मिला था।
कैसे यह कला आगे बढ़े, यह सबसे बड़ी चिंता
सलटू की चिंता यह है कि जिस विधा को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे जाना चाहिए, वह विलुप्त होने की कगार में है।अब धोबिया नाच के गिने-चुने कलाकार ही रह गए हैं। सलटू बताते हैं कि जहां लोग डीजे ऑर्केस्ट्रा को महंगे दरों पर बुक करते हैं, वही धोबिया नाच के कलाकारों को कुछ पैसों की ही आमदनी इस परफार्मिंग आर्ट से हो पाती है। सलटू की मंडली में कुल 15 कलाकार हैं। प्रतिदिन 1200 से 2000 रुपए की आमदनी हर कलाकार को हो पाती है। धोबिया नाच का कार्यक्रम 1 दिन से लेकर 4 दिन तक के होते हैं। यह आयोजक के ऊपर निर्भर है कि वह कितने दिनों का कार्यक्रम रखते है।
जल्‍द सिंगापुर में करेंगे धोबिया नाच
सलटू अब तक दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, पूना, पटना, हैदराबाद के साथ ही दक्षिण कोरिया में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। सलटू ने यह भी बताया इसी साल जून के महीने में इंडियन काउंसिल आफ कल्चरल रिलेशन के जरिए उन्हें सिंगापुर में भी धोबिया नाच के परफॉर्मेंस करने का मौका मिल सकता है।
सलटू की इच्‍छा, आगे चलती रहे यह मंचीय कला
सलटू चाहते है कि उनको विरासत में मिली यह मंचीय कला आगे भी चलती रहे। अपने गांव और आसपास के गांव के युवाओं को इस मंचीय कला की बारीकियों को सीखा रहे हैं। उनसे फिलहाल मुन्नी लाल, लवकेश, लबटु, अमलेश आदि युवा धोबिया नाच सिख रहें है। सलटू के शागिर्द मुन्नी लाल ने बताया कि वह इस कला को सिर्फ आजिविका के साधन के तौर पर नहीं देख रहे हैं। उन्हें इस मंचीय कला से भावनात्मक जुड़ाव है। किसी दौर में यह कला बड़े फक्र के साथ मंचित की जाती है। उनके बाप,दादा बड़े ही चाव से इसको देखते थे। इसमें सामाजिक सरोकारों के मुद्दों की बात होती थी। ऐसे में इस कला से साथ आमजन मानस का जुड़ाव बन जाना स्वाभाविक ही था। वह चाहते है कि यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहे।
रिपोर्ट – अमितेश कुमार सिंह
(साभार – नवभारत टाइम्स)

 लावारिसों को अपनों सा सम्‍मान दे रहीं मुजफ्फरनगर की शालू

मुजफ्फरनगर । कोविड महामारी महामारी अपने चरम पर थी। मुजफ्फरनगर में एक कोविड मरीज का शव लावारिस पड़ा था। लावारिस… शायद इसलिए कि उस बुजुर्ग शख्‍स के परिवार के पास अंतिम संस्‍कार के लायक पैसा नहीं था या फिर शायद इतना साहस नहीं बचा था कि कोविड संक्रमण का खतरा मोल ले सकें। दिन भर शालू सैनी (Shalu Saini) ने उस शव को खुले में पड़े देखा, फिर उनसे रहा नहीं गया। शालू घर से बाहर निकलीं और खुद उसका अंतिम संस्‍कार किया। उसके बाद से पूरी महामारी में शालू सैनी (37) अपने दम पर 200 से ज्‍यादा कोविड से जान गवां चुके मरीजों का अंतिम संस्‍कार किया। आज तक वह करीब 500 से ज्‍यादा शवों का अंतिम संस्‍कार करा चुकी हैं। ये शव या तो लावारिस होते हैं या फिर इनके परिजनों के पास इतना पैसा नहीं होता कि अंतिम संस्‍कार का खर्च उठा सकें।
‘कम से कम अंतिम संस्‍कार तो इज्‍जत से हो’
दो बच्‍चों की सिंगल मदर लेकिन शालू कहती हैं, ‘इंसान पैदा होने से लेकर अपनी आख‍िरी सांस तक संघर्ष करता है। कम से उसका इतना तो हक बनता है कि उसका क्रियाकर्म सम्‍मान के साथ हो। यह हमारा फर्ज है।’ लेकिन एक अकेली मां के लिए यह सब इतना आसान भी नहीं था। शालू बताती हैं कि कोविड साल 2020 में जब अपने चरम पर था उस समय एक अंतिम संस्‍कार करने पर पांच हजार रुपयों तक का खर्च आता था। परिवार असहाय हो चुके थे, उनका रोजगार बंद हो गया था, लकड़ी की भी कमी थी।’
अब लोग भी मदद करने लगे
धीरे-धीरे कोविड की आपदा कम हुई लेकिन जब भी कहीं किसी को कोई लावारिस शव दिखाई देता वह शालू को इसकी जानकारी देता। इस समय भी अंतिम संस्‍कार पर चार हजार से कम नहीं खर्च होता, और यह भी काफी बड़ी रकम है। लेकिन शालू मुस्‍करा कर कहती हैं, ‘धीरे-धीरे लोगों को मेरे बारे में पता चला तो अनजान लोग भी पैसों की मदद करने लगे।’
लावारिस लाशों के लिए आते हैं कॉल
अब शालू गरीबों और लावारिस शवों के लिए ‘भगवान’ सरीखी हैं। वह बताती हैं, ‘मेरे पास मुर्दाघर, पुलिस, एनजीओ, झुग्गियों, श्‍मशान घरों से कॉल आने लगे हैं। लेकिन मेरे लिए यह आध्‍यात्मिक मसला है, मैं यह सब करके खुद को ईश्‍वर के और निकट पाती हूं।’
बच्‍चों की प्रेरणा है
शालू की एक छोटी सी गारमेंट्स की शॉप है। अपने परिवार के बारे में बताती हैं, ‘मैं साल 2013 से अकेली रह रही हूं। मैंने अपने जीवन में बहुत झेला है।’ उनके दो बच्‍चे हैं, साक्षी (15) और सुमित (17) और दोनों के दिल में उनकी मां के इस अनोखे काम की बहुत इज्‍जत है।
प्रशासन ने भी की तारीफ
मुजफ्फरनगर के एडीएम नरेंद्र बहादुर सिंह ने भी शालू की तारीफ की। वह कहते हैं, ‘शालू हमारी कई तरह से मदद करती हैं। अकसर वह सामाजिक मुद्दों पर जनता के बीच जागरुकता फैलाती हैं।’ मुजफ्फरनगर के एक श्‍मशानघाट के इंचार्ज कल्‍लू यादव बताते हैं, ‘शालू कोरोना के समय से ही यहां आ रही हैं। जैसे ही उन्‍हें किसी लावारिस लाश के बारे में पता चलता है वह यहां आने वाली पहली शख्‍स होती हैं। इसके बाद वह अंतिम संस्‍कार की पूरी तैयारी करती हैं और खुद अंतिम संस्‍कार भी करती हैं।’ शालू आजकल शवों की अस्थियों का विसर्जन भी करती हैं।
इनके लिए शालू बनीं देवदूत
हरियाणा, रोहतक के निवासी निखिल जांगरा के लिए वह किसी देवदूत से कम नहीं हैं। निखिल के पिता का शालू ने उस समय अंतिम संस्‍कार किया जब वह इस साल कांवड़ यात्रा में वापस लौट रहे थे। उस घटना के बारे में निखिल बताते हैं, ‘मेरे पिता (55) घर लौटते समय मुजफ्फरनगर में एक सड़क हादसे का शिकार हो गए। उनकी उस समय शिनाख्‍त नहीं हो सकी थी। ऐसे में शालू ने ही उनका अंतिम संस्‍कार किया।’
आसान नहीं था संघर्ष
पर शालू के लिए यह सब बहुत आसान नहीं है। वह बताती हैं, एक अकेली औरत के लिए यह सब बहुत आसान नहीं था। ऐसे भी दिन थे जब मेरे रिश्‍तेदार मुझे अंतिम संस्‍कार करने से यह कहकर रोकते थे कि मैं महिला हूं और मुझे यह सब नहीं करना चाहिए। महिलाओं को तो श्‍मशानघाट के पास भी नहीं जाने दिया जाता।’
(साभार – नवभारत टाइम्स)

भवानीपुर कॉलेज में अंग्रेजी लघु कहानी प्रतियोगिता 

कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज की लाइब्रेरी में स्क्रिबल 22 लघु कहानी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें अड़तीस विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। लघु कहानी की विशेषता बताते हुए निर्णायक समीक्षा खंडूरी ने कहा कि लघु कहानी के लिए विषय वस्तु, चरित्र चित्रण, शैली, घटना और उसकी चरम स्थिति एवं मूल्यांकन पर ध्यान आवश्यक होता है। इन आधारों पर एक कहानी का ढांचा तैयार किया जा सकता है। फिर कल्पना और भाषाई अलंकरण द्वारा सृजनात्मक शक्ति द्वारा व्यक्त किया जा सकता है।
इस लघु कहानी प्रतियोगिता में छात्रा कनक बांग की कहानी को प्रथम स्थान दिया गया। अंग्रेजी भाषा में हुई इस प्रतियोगिता का संयोजन गौरव चौधरी और तूलिका दे ने किया। इस कार्यक्रम में पचास विद्यार्थियों ने पंजीकृत करवाया था। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने निर्णायक समीक्षा खंडूरी को कॉलेज का स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया। प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी ने प्रथम स्थान पर विजेता को उपहार प्रदान किया। मुख्य रूप से बीबीए बीकॉम और बीए के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। यह आयोजन फिनमिनन कलेक्टिव द्वारा किया गया।

कब्र में सोया वो आदमी

डॉ. वसुंधरा मिश्र

रात की कालिमा में मैंने खिड़की के बाहर पलंग पर सोये सोये कुछ देखने की कोशिश की। गूलर के पेड़ से सटा हुआ था वह कब्रिस्तान। वहां कल ही एक कब्र दफनाई गई थी। सन्नाटे की चादर ओढ़े पूरा अंधेरा किसी चमगादड़ों की छाया से कम नहीं लग रहा था। मैं उस अंधेरे को पढने की कोशिश कर रही थी। वहाँ कोई सुराग नहीं मिल रहा था जिससे मैं कब्र में सोये व्यक्ति को देख सकूं। डर भी लग रहा था कि वह कहीं उठ के वहाँ घूमने न लग जाए।
क्या ऐसा होता है कि मरा हुआ आदमी मरने के बाद भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराता हो।
मैं जानती हूं कि वह कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रहा था। क्या घर वालों के साथ वह भी अपने आप से ऊब चुका था? क्या वह वाकई में जीवन नहीं जीना चाहता था?
घर वालों के लिए भी उसकी अहमियत ख़त्म हो गई थी । अपनी जवानी में उसने मल्टीनेशनल कंपनियों में काम किया। अपने जीवन के स्वर्णिम दौर में ढेर सारा रुपया कमाया। अपनी पत्नी और बच्चों को सुरक्षा दी। सुख सुविधाएं दीं।
रोग लगने के साथ ही घर वालों के साथ बाहर वाले भी धीरे-धीरे उससे अलग होते चले गए। वह दुनिया में दस सालों से अलग-थलग रह रहा था। जीवन की सभी रंगीनियाँ उसकी नहीं रही। पत्नी भी साथ रहकर भी साथ नहीं रहती। वह चाह कर भी कुछ कह नहीं पाता। उसे इस बात का अहसास था कि वह अब उसका प्रेम भी टुकडों में बांट दिया गया है।
पत्नी का चेहरा भी उदासी को झेलते- झेलते यंत्रवत हो चला था। वह दूसरी लगने लगी थी। वह प्यार से नहीं, बोझिल नजरों से देखती। रूपयों की कमी न भी रही हो तो भी जीवन में जीवन नहीं बचा था। कहते हैं न जीते जी मरी हुई लाश की तरह जिंदगी घसीट रही थी।
आनंद फिल्म में राजेश खन्ना के अभिनय ने कैंसर रोगी के भीतर भी जान डाल दी थी। वह कितना खुश रहता था। अकेलेपन को भी जीता था। कैंसर कितना जानलेवा है न जीने देता है और न मरने देता है।
कभी-कभी लगता है कि आत्महत्या करना अच्छा है जिसमें एक बार ही पूरी दुनिया से छुटकारा।
खैर, मैं सोच रही थी कि कैसे एक व्यक्ति जीवन से मृत्यु और मृत्यु के बीच भी अपने आप को संतुलित करने का नाटक करता है। मरने के बाद किसने देखा।
उस कब्र में वही हँसता मुस्कुराता और सुंदर हैंडसम कबीर था जिसे मैं अक्सर खिड़की से देखा करती थी। वह रात कालिमा से भरी थी। धीरे-धीरे मेरी आंखें नींद से कब बोझिल हो गईं पता ही नहीं चला। खिड़की से आती धूप की पहली किरण ने मेरी खिड़की पर दस्तक दी। फिर उस दुनिया की हलचलें सुनाई पड़ने लगीं।

हिन्दी दिवस पर आभासी माध्यम पर परिचर्चा आयोजित

कोलकाता । गूगल मीट पर हिंदी दिवस पर एक परिचर्चा आयोजित की गयी। इस कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में शुभ सृजन नेटवर्क की प्रमुख सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया और शिक्षिका सीमा साव उपस्थित थीं।।कार्यक्रम में कई लोगों ने स्वरचित कविता पाठ, काव्य संगीत, काव्य आवृति और वक्तव्य के माध्यम से हिंदी की सक्रियता पर अपने विचार रखें।।। प्रगति पांडे ने स्वरचित कविता हिंदी हमें रचती है,अनामिका सिंह ने मां, निखिता पांडे ने जवान, अर्चना सिंह ने हिंदी की दशा, विद्योतमा प्रसाद ने मोबाइल, सूफिया ने हिंद देश के वासी, मेघना साव ने बच्चे, आयना ने पानी से घिरे हुए लोग और अदिति ने रश्मिरथी तृतीय सर्ग की प्रस्तुति की। इसके अलावा अंकित सिंह, अमन कुमार, राम नारायण, पूजा महतो ने कबीर के दोहों पर गीत गाकर कार्यक्रम को सफल बनाया। संचालन आनन्द श्रीवास्तव ने किया और इस संकल्प के साथ कि हिंदी दिवस पर ही हिंदी की चर्चा हम नहीं करेंगे बल्कि हर दिन हर पल अपनी पढ़ने- लिखने की कला के माध्यम से इसका विस्तार करेंगे। सुषमा त्रिपाठी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए हिंदी के साथ आने वाली और चल रही चुनौतियों पर विशेष टिप्पणी की साथ ही सुंदर भविष्य गढ़ने की प्रेरणा दी।

गारूलिया मिल हाई स्कूल ( एच. एस.) में हिन्दी दिवस समारोह

कोलकाता । गारूलिया मिल हाई स्कूल ( एच. एस.) के प्रांगण में डॉ सदानंद साह की अध्यक्षता में हिंदी दिवस समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय “तकनीकी विकास के दौर में हिंदी की चुनौतियां” रखा गया था। इस संगोष्ठी की प्रमुख वक्ता ऋषि बंकिम चंद्र सांध्य महाविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ कलावती कुमारी और ऋषि बंकिम चंद्र महिला महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. एन चंद्रा राव थे । डॉ कलावती कुमारी ने स्पष्ट किया कि चुनौतियां है तो ही जीवन की सार्थकता है साथ ही हिंदी के साथ तकनीकी असुविधाएं वेब साइट से लेकर ईमेल तक और टंकन से लेकर मुद्रण तक की समस्याओं पर सारगर्भित व्याख्यान दिया । प्रो. एन चंद्रा राव ने हिंदी की तकनीकी चुनौतियों के साथ ही आने वाले भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक संस्कृत के आचार्य दामोदर पाठक, उर्दू के मुमताज़ अहमद, हिंदी के श्री कन्हैया भगत, भूलोक के श्री प्रभास कोले, इतिहास के धीतीश हाल्दार,और अंग्रेजी की रेखा साव ने अपने- अपने विचार रख कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई। बच्चों ने भी पूरी प्रतिबद्धता से प्रस्तुति दी जिसमें प्रमुख रूप से पीयूष, प्रियांशु, सुमित,सुशील, अभय, शशि, नीलू ,राहुल आदि ने महत्त्वपूर्ण प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के शिक्षक डॉक्टर आनंद श्रीवास्तव ने किया और धन्यवाद ज्ञापन विभाग के शिक्षक विकास कुमार साव ने किया।।।पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ राकेश यादव और कुलदीप कुमार की सराहनीय भूमिका रही।।।कुल मिलाकर स्पष्ट लगा कि हिंदी प्रेम की भाषा है और जहां प्रेम है वहां सब कुछ संभव है।