Wednesday, July 8, 2026
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फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥

-मीराबाई

फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
बिन करताल पखावज बाजै अणहदकी झणकार रे।
बिन सुर राग छतीसूं गावै रोम रोम रणकार रे॥
सील संतोखकी केसर घोली प्रेम प्रीत पिचकार रे।
उड़त गुलाल लाल भयो अंबर, बरसत रंग अपार रे॥
घटके सब पट खोल दिये हैं लोकलाज सब डार रे।
मीराके प्रभु गिरधर नागर चरणकंवल बलिहार रे॥

केरल विश्वविद्यालय देगा 6 महीने का मातृत्व अवकाश

केरल यूनिवर्सिटी ने बड़ी घोषणा की है। ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही गर्भवती छात्राओं के लिए 6 महीने का मातृत्व अवकाश यानी मैटरनिटी लीव देने का फैसला किया है । यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही 18 वर्ष से अधिक की छात्राएं छह महीने तक के लिए मातृत्व अवकाश यानी मैटरनिटी लीव ले सकती हैं । इसके लिए केरल विश्वविद्यालय ने 6 मार्च को आदेश जारी किया है । यूनिवर्सिटी के नोटिफिकेशन के मुताबिक, जो भी छात्राएं मैटरनिटी लीव लेंगी वो 6 महीने बाद फिर से एडमिशन कराए बिना क्लास को रिज्यूम कर सकती हैं । मैटरनिटी लीव के बाद छात्रा के कोर्स की ड्यूरेशन को बढ़ा दिया जाएगा, ताकि उनकी पढ़ाई प्रभावित न हो। विश्वविद्यालय की तरफ से कहा गया कि कैंडिडेट के मेडिकल रिकॉर्ड को वेरिफाई करने और यूनिवर्सिटी की मंजूरी के बिना कॉलेज में फिर से क्लास अटैंड करने की अनुमति देने की जिम्मेदारी कॉलेज की प्रिंसिपल की होगी । यूनिवर्सिटी के अनुसार, छात्राएं डिलीवरी से पहले या बाद में ये 6 महीने की मैटरनिटी लीव से लकती हैं।  इसके साथ यह भी कहा गया है कि मैटरनिटी लीव की सुविधा पाठ्यक्रम की अवधि के दौरान सिर्फ एक बार दी जाएगी।
इससे पहले केरल के शिक्षा विभाग ने जनवरी के महीने में सभी उच्च शिक्षा संस्थानों मासिक धर्म की छुट्टी देने का आदेश जारी किया था। साथ ही लड़कियों के पीरियड्स को देखते हुए ये फैसला लिया गया कि अनिवार्य 75 फीसदी अटेंडेंस के मुकाबले छात्राएं अब 73 प्रतिशत उपस्थिति के साथ अपने सेमेस्टर की परीक्षा में बैठ सकती हैं।

हिरण्यकश्यप की राजधानी थी एरच, जहाँ है होलिका कुंड

यहां महिलाएं होलिका को मानती हैं बेटी, दहन में शामिल नहीं होतीं
आज होलिका दहन का पर्व है। आज ही के दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने भतीजे प्रह्लाद को जलाकर मारना चाहा। लेकिन वह खुद ही जल गई और भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद बच गए। ये कहानी सबको मालूम है, लेकिन यह कम ही लोग जानते हैं कि जहां ये घटना घटी, वो जगह भारत में कहां मौजूद है?
यूपी के झांसी जिले से 80 किलोमीटर दूर पड़ता है एरच कस्बा। मान्यता है कि यहीं वो स्थान है, जहां होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती चिता में बैठ गई थी। एरच को प्रह्लाद नगरी के नाम से जाना जाता है। यहां होली पर प्रह्लाद के साथ-साथ मां होलिका की भी जय बोली जाती है। ऐसी मान्यता है कि जो होली पर यहां आकर होलिका कुंड में अपनी नाक रगड़ता है, उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।
हिरण्यकश्यप ने एरच को बनाया राजधानी
होलिका दहन स्थली के मुख्य पुजारी प्रतीप तिवारी ने बताया, “श्रीमद् भागवत पुराण स्कंद में हिरण्यकश्यप की नगरी का जिक्र आया है। सतयुग में इस जगह का नाम एरिकच्छ था। हिरण्यकश्यप ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। इसके प्रमाण आज भी यहां मौजूद हैं।”
प्राचीन काल में ये टीला 400 एकड़ में फैला था, जो अब सिमटकर महज 50 एकड़ का रह गया है। नदी के तलहटी से बाहरी दीवारें नजर आती हैं, जो दिखने में काफी विशाल लगती हैं।
प्रदीप कहते हैं, “हिरण्यकश्यप के इसी टीले पर प्रह्लाद का जन्म हुआ। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उन्हें मारने के कई प्रयास किए। कभी सांपों से भरी कोठरी में बंद करवा दिया। तेल की कढ़ाई में बैठाया तो कभी ढीकांचल पर्वत से नीचे फेंकवा दिया। लेकिन हर-बार प्रह्लाद बच जाते। आखिरकार, हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मारने के लिए बहन होलिका की मदद ली।”

हिरण्यकश्यप का महल

एरच की बेटी थी होलिका, आज भी होती है पूजा
एरच के बुजुर्गों का कहना है कि होलिका को यहां बेटी का दर्जा दिया गया है। इसी वजह से पहले कस्बे में होली जलने से 2 दिन तक मातम मनाया जाता था। लेकिन आज ये परंपरा कुछ घरों तक ही सीमित रह गई है। होलिका का दूसरा नाम सिंहिका है। उसका जन्म एरिकच्छ में ही हुआ था। राहू भी होलिका का ही पुत्र था। इसी वजह से एरच में कभी राहूकाल नहीं लगता। मान्यता है कि होलिका को ब्रम्हा जी ने 3 बड़े वरदान दिए थे।
पहला वरदान: वह संसार के 5 तत्वों ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को अपने वश में कर सकती थी।
दूसरा वरदान: किसी भी जीवित वस्तु को आकर्षित करना।
तीसरा वरदान: उसके पास ऐसी चुनरी थी, जिसे ओढ़ने पर इंसान को आग भी जला नहीं सकती थी।एरच में आज भी वो अग्निकुंड मौजूद है। जहां होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी थी। इस जगह पर अब होलिका का मंदिर बनाया गया है। मंदिर के पुजारी के अनुसार, हर साल होली के समय इस मंदिर में हजारों की संख्या में लोग दर्शन करने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी होलिका दहन के दिन यहां आकर अपनी नाक रगड़ेगा, उसकी सभी मनोकामना पूरी हो जाएंगी।
एरच को अब तक न आग जला पाई, न पानी डूबा पाया
एरच गांव की आबादी 10 हजार है। यहां 60 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। 20% मुस्लिम और बाकी दूसरे समुदाय के लोग हैं। गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर एक प्राथमिक स्कूल, 3 प्राइवेट स्कूल, सामुदायिक शौचालय, एक मस्जिद और कब्रिस्तान है। यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि गांव की हिफाजत मां होलिका खुद करती हैं।
एरच गांव की सुनीता देवी कहती हैं, “एरच में आज तक किसी घर में आग नहीं लगी। नदी के किनारे से सटे होने के बावजूद गांव में कभी भी बाढ़ नहीं आई है। गांव की महिलाएं इसे होलिका माता का ही आशीर्वाद मानती हैं। एरच की एक परंपरा भी है कि गांव की महिलाएं होलिका दहन में नहीं जाती हैं। क्योंकि कोई भी मां अपनी बेटी को पीड़ा में नहीं देख सकती।”एरच की श्रीभक्त प्रह्लाद जन-कल्याण संस्था यहां के ऐतिहासिक चीजों को संरक्षित कर रही है। संस्था के अध्यक्ष अमित चौरसिया कहते हैं, “एरच में 3 बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने खुदाई करवाई है। साल 2008 में बेतवा नदी के करीब हुई खुदाई में होलिका दहन का साक्षात प्रमाण मिला था। ASI की टीम को खुदाई में चूना पत्थर से बनी होलिका की मूर्ति मिली थी। इसमें होलिका प्रह्लाद को गोद में लिए बैठी दिखाई देती है।”
इसकी कार्बन डेटिंग करने के बाद यह पता चला कि ये मूर्ति करीब 5000 साल पुरानी है। इस प्रतिमा को उस जगह पर स्थापित किया गया है, जहां पहली बार होलिका दहन हुआ था। एरच के रहने वाले हर मंगलवार होलिका के मंदिर में आकर विशेष पूजा करते हैं।
उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री और बुंदेलखंड के वरिष्ठ साहित्यकार हरगोविंद कुशवाहा कहते हैं, “साल 1874 में ब्रिटिश सरकार ने झांसी गजेटियर पेश किया। इसके पेज नंबर 339ए, 357 में भी एरच को बुंदेलखंड का सबसे पुराना नगर बताया है। प्रह्लाद नगरी में अब हुई खुदाई में हजारों साल पुरानी ईंटों का निकलना साफ तौर पर इसकी ऐतिहासिकता साबित करता है।”
“धार्मिक नजरिए से देखा जाए, तो श्रीमद भागवत के सप्तम स्कन्ध के 37वें अध्याय में हिरण्यकश्यप के नगर एरिकच्छ का जिक्र मिलता है। हिरण्यकश्यप के बाद प्रह्लाद और फिर प्रह्लाद के बेटे विरोचन ने एरच पर राज किया। यहीं पर बेतवा नदी के किनारे उसके टीले के कुछ अवशेष बचे हुए हैं।”

अग्निकुंड जो होलिका से जुड़ा है

वैज्ञानिकों के लिए आज भी रहस्य बनी हुई है प्रह्लाद द्यौ
एरच गांव से 3 किमी दूर पड़ता है ढीकांचल पर्वत। यही वो पहाड़ी है, जहां से हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बेतवा नदीं में फेंकवा दिया था। मान्यता है कि प्रह्लाद को इससे कुछ भी नहीं हुआ था। पहाड़ से नदी के जिस हिस्से में भक्त प्रह्लाद को धकेला गया, उसे प्रह्लाद द्यौ (द्यौ का अर्थ होता है कुंड ) के नाम से जाना जाता है। गर्मी के महीनों में जब बेतवा नदी का पानी सूख जाता है। तब भी इस कुंड का पानी सूखता नहीं है।साल 2020 में लखनऊ से आई भू-वैज्ञानिकों की टीम ने प्रह्लाद द्यौ में मौजूद पानी पर रिसर्च की। जिला सिंचाई विभाग ने इस कुंड के जरिए गांवों में पाइपलाइन बिछाकर पानी पहुंचाने की प्लानिंग की है। साथ ही यूपी पर्यटन विभाग भी प्रह्लाद कुंड को टूरिस्ट स्पॉट की तरह विकसित कर रहा है। इसमें ढीकांचल पर्वत तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनाई जा रही हैं, जिससे लोगों को बेतवा नदी के चारों ओर फैले हरे-भरे फॉरेस्ट एरिया का दिलकश नजारा मिल सके।
मौर्य वंश और अग्निमित्र के शासन काल का केंद्र रहा एरच
मशहूर लेखक ओपी लाल श्रीवास्तव ने किताब Erach Rediscovered में यहां मिले प्राचीन सिक्कों का जिक्र किया है। किताब में ये लिखा गया है कि – बृहद्रथ मौर्य की मौत के बाद 137 साल तक भारत में राज करने वाला मौर्य वंश समाप्त हो गया। बृहद्रथ को उसके ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने मारा था। इसके बाद पुष्यमित्र शुंग के बेटे अग्निमित्र ने 2700 साल पहले एरच में राज किया था।
ओपी लाल ने लिखा कि एरच में पुरातत्व विभाग की खुदाई में मौर्य वंश के तांबे के सिक्के मिले। साथ ही अग्निमित्र के शासनकाल में चलाए गए 2600 साल पुराने ताम्रपत्र, सिक्के और पत्थरों के बने औजार भी मिले, जो एरच के महान इतिहास की गवाही देते हैं।झांसी के इतिहासविद मुकुंद मेहरोत्रा बताते हैं, “बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी के अर्थ साइंस विभाग ने कुछ साल पहले एरच की चट्‌टानों, यहां की मिट्‌टी और टीले पर जाकर रिसर्च की थी। यहां पर मिली ईंटों की कार्बन डेटिंग से पता चला कि ये 10000 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं।”
(साभार – दैनिक भास्कर)

जानिए ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं का अन्तर

 जन औषधि स्टोर में दवाएं मिलती हैं 90 प्रतिशत तक सस्ती
नयी दिल्ली । सस्ता और महंगा का खेल दवाओं के बाजार  में भी स्पष्ट दिखता है। आमतौर पर ब्रांडेड दवाएं (पेटेंटेड दवाएं) महंगी होती हैं जबकि जेनेरिक दवाएं सस्ती। कई मामलों में तो जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड के मुकाबले 90 फीसदी तक सस्ती होती हैं। प्रधानमंत्री जन औषधि योजना में जेनेरिक दवाएं ही होती हैं। और, इनका दावा है कि जन औषधि स्टोर  में दवाएं 90 फीसदी तक सस्ती हैं। जेनेरिक दवाएं सस्ती होने के कारण लोग उसकी क्वालिटी और उसके पावर पर शक करने लगते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लोगों को महंगी दवाएं लिख दीजिए तो वह खुशी-खुशी इसे ले लेगा। लेकिन यदि सस्ती दवाएं लिखिए तो फिर उन्हें लगता है कि डॉक्टर साहब ने ठीक से देखा नहीं। उनका कहना है कि लोगों को जेनेरिक दवाओं की सच्चाई पता नहीं होती है। हम आपको बता रहे हैं इस बारे में सब कुछ..
क्या होती है जेनेरिक दवा?

फार्मेसी बिजनस में जेनेरिक दवाएं (Generic Medicine) उन दवाओं को कहा जाता है जिनका कोई अपना ब्रांड नाम नहीं होता है। वह अपने सॉल्ट नेम से मार्केट में बेची और पहचानी जाती है। जेनेरिक दवा बनाने वाली कुछ कंपनियों ने अपना ब्रांड नाम भी डेवलप कर लिया हे। तब भी ये दवाएं काफी सस्ते होते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये जेनेरिक दवाओं की श्रेणी में आते हैं। सरकार भी जेनेरिक दवाओं को प्रोमोट कर रही है। प्रधानमंत्री जन औषधी परियोजना इसी की कड़ी है। इस परियोजना के तहत देश भर में जेनेरिक दवाओं के स्टोर खोले जा रहे हैं।
क्या जेनेरिक दवाओं का असर कम होता है?

जेनरिक दवाओं का असर भी ब्रांडेड दवाओं के समान ही होता है। क्योंकि इन दवाओं में भी वही सॉल्ट होता है, जो ब्रांडेड कंपनियों की दवाओं में होता है। दरअसल जब ब्रांडेड दवाओं का सॉल्ट मिश्रण के फार्मूले और उसके प्रोडक्शन के लिए मिले एकाधिकार की अवधि समाप्त हो जाती है तब वह फार्मूला सार्वजनिक हो जाता है। उन्ही फार्मूले और सॉल्ट के उपयोग से जेनरिक दवाईयां बननी शुरू हो जाती है। यदि इसका निर्माण उसी स्टेंडर्ड से हुआ है तो क्वालिटी में यह कहीं भी ब्रांडेड दवाओं से कमतर नहीं होता है।
जेनेरिक दवाएं सस्ती क्यों होती हैं?

जानकारों का कहना है कि जेनेरिक दवाओं के सस्ती होने के कई कारण हैं। एक तो इसके रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए कंपनी ने कोई खर्च नहीं किया है। किसी भी दवा को बनाने में सबसे बड़ा खर्च आरएंडडी का ही होता है। यह काम दवा को खोजने वाली कंपनी कर चुकी है। इसके प्रचार प्रसार के लिए भी कोई खर्च नहीं करना होता है। इन दवाओं की पैकेजिंग पर कोई खास खर्च नहीं किया जाता है। इसका प्रोडक्शन भी भारी पैमाने पर होता है। इसलिए मास प्रोडक्शन का लाभ मिलता है।
जेनेरिक और ब्रांडेड (पेटेंटेड दवाईयों) में क्या अंतर है?

जेनेरिक दवाएं, पेटेंटेड या ब्रांडेड दवाओं की तरह ही होती हैं। कई मामलों में देखा गया है कि ब्रांडेड कंपनियों का भी एपीआई या रॉ मैटेरियल वहीं से आया है जहां से जेनेरिक दवाओं का। जेनेरिक दवाओं को अगर मूल दवाओं की तरह ही एक समान खुराक में, उतनी ही मात्रा और समान तरीके से लिया जाए तो उनका असर भी पेटेंट या ब्रांडेड दवा की तरह ही होगा। जेनरिक दवाओं का जैसे मूल दवाओं की तरह सकारात्मक असर होता है वैसे ही समान रूप से नकारात्मक असर भी समान रूप से हो सकता है। जेनरिक और ब्रांड नेम वाली दवाईयों में मुख्य रूप से ब्रांडिंग, पैकेजिंग, स्वाद और रंगों का अंतर होता है। इनकी मार्केटिंग स्ट्रेटजी में भी अंतर है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दवाईयों की कीमतों में भी बहुत अंतर होता है। आखिर ब्रांड की तो कीमत चुकानी ही होगी।
जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं को कैसे पहचानेंगे?

जेनेरिक दवाओं का अक्सर मूल दवाओं (पेटेंटेड दवाओं) के जैसा या अलग नाम होता है। केमिस्ट जेनेरिक दवाओं में प्रयोग होने वाले सॉल्ट्स की पूरी जानकारी रखते हैं और वे ग्राहकों को इसके बारे में बता भी सकते हैं। दवाई का नाम इनकी पहचान के लिए महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक है। इसी तरह जेनेरिक दवाईयों की पहचान के लिए इंटरनेट पर सॉल्ट नेम के माध्यम से खोज की जा सकती है। इसके साथ ही जेनरिक दवाओं की कीमतें ब्रांडेड नाम वाली दवाओं की तुलना में बेहद कम होती हैं और उनका असर उतना ही होता है।
प्रधानमंत्री जन औषधि योजना की दवाएं सस्ती क्यों होती हैं?
प्रधानमंत्री जन औषधि योजना की दवाएं जेनेरिक ही होती हैं। उसकी पैकिंग साधारण होती है। इसके प्रचार प्रसार पर भी ज्यादा खर्च नहीं होता है। सबसे बड़ी बात कि इस योजना से जुड़े दुकानदारों को दवाओं की बिक्री पर मार्जिन भी कम होता है। इसलिए ग्राहकों के लिए जन औषधि स्टोर की दवाएं सस्ती पड़ती है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

कभी फीस न भर पाने के कारण छूट रही थी पढ़ाई, आज हिजाब पहन उड़ा रही हैं प्‍लेन

नयी दिल्‍ली । नाम है सैयदा सल्‍वा फातिमा। उम्र 34 साल। कभी पढ़ाई जारी रखने के लिए फीस भरने का पैसा नहीं था। स्‍कूल से नाम कटने वाला था। आज वही बेटी हिजाब पहनकर प्‍लेन उड़ा रही है। फातिमा के पापा प्‍यार से उन्‍हें ‘मिरैकल गर्ल’ बुलाते हैं। उनकी जिंदगी में ये म‍िरैकल होते भी रहे हैं। ईश्‍वर का दूत बनकर उनकी मदद के लिए कोई न कोई ‘फर‍िश्‍ता’ हर बार उतर आया। इससे न फातिमा की पढ़ाई छूटी और न ही उनका सपना टूटा। फातिमा की कहानी संघर्षों से भरी हुई है। पुराने हैदराबाद में पली-बढ़ी फातिमा इस शहर की पहली वुमन कमर्शियल पायलट हैं।
फातिमा का बचपन हैदराबाद के मोघलपुरा के उस इलाके में गुजरा जहां आज भी कई लोगों को पीने के पानी तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है। फातिमा देश की उन चंद मुस्लिम महिलाओं में हैं जिनके पास कमर्शियल पायलट लाइसेंस है। उन्‍हें कभी इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि लोग उनके बारे में क्‍या कहते हैं। हिजाब पहनकर कॉकपिट में बैठने के बाद वो सिर्फ मंजिल तक पहुंचने के बारे में सोचती हैं। पिता सैयद अशफाक अहमद उन्‍हें प्‍यार से ‘मिरैकल गर्ल’ बुलाते हैं। इसके पीछे कारण भी हैं।
सेंट ऐन्‍स जूनियर कॉलेज में इंटरमीडिएट करते वक्‍त दोबारा पैसों की किल्‍लत फातिमा के सामने आई। कॉलेज की फीस जमा न होने के कारण फिर उनका नाम कटने को था। फीस न दे पाने वाले बच्‍चों की कतार में वह खड़ी हुई थीं। तभी एक टीचर की उन पर नजर पड़ी। उन्‍होंने फातिमा की फीस भरने का फैसला किया। इस तरह दूसरी बार उनकी जिंदगी में फरिश्‍ते की एंट्री हुई। फातिमा बताती हैं कि वह निजी तौर पर उन टीचर को जानती भी नहीं थीं। न ही कभी उन्‍होंने फातिमा को पढ़ाया था।
फिर शुरू हुआ आसमान छूने का सफर
इसके एक दशक बाद फातिमा ने तेलंगाना एविएशन अकैडमी में पहली बार सेसना स्‍कायहॉक उड़ाया। अभी वह एक टॉप एयरलाइन में फर्स्‍ट ऑफिसर के तौर पर एयरबस320 उड़ाती हैं। जल्‍दी ही वह ए380 विमान उड़ाने वाली हैं। एविएशन इंडस्‍ट्री ग्‍लैमर से भरी हुई है। इसमें ज्‍यादातर पैसेंजर भी खास वर्ग से होते हैं। लेकिन, हिजाब पहनकर प्‍लेन चलाने से वह कभी शर्मिंदा नहीं हुईं। वह कहती हैं, ‘उन्‍हें आसमान की ऊंचाई खींचती थी। वह हमेशा से एक पायलट बनना चाहती थीं। यह और बात है कि वह कभी भी प्‍लेन का टिकट नहीं खरीद सकती थीं। ये देखिए कि मेरी पहली फ्लाइट पैसेंजर सीट पर नहीं, कॉकपिट से हुई।’
दो बेट‍ियों की मां हैं फात‍िमा
फातिमा की शादी हो चुकी है। वह दो बेट‍ियों की मां हैं। छोटी बेटी छह महीने की है। किसी भी फ्लाइट को आसमान में ले जाते वक्‍त वह एक बात नहीं भूलती हैं। वह यह कि कॉकपिट में आते ही उन्‍हें सबकुछ भूल जाना है। पूरा फोकस प्‍लेन पर रखना है। वह कहती हैं कि उनके माता-पिता, पति और सास-ससुर हमेशा बहुत सपोर्टिव रहे हैं। यही कारण है कि वह अपने सपनों को जी सकीं। वह खुशनसीब थीं कि उन्‍हें कभी जेंडर या धार्मिक भेदभाव का भी सामना नहीं करना पड़ा। वह एयरलाइन की ओर से गिफ्ट किया गया हिजाब पहनती हैं। इसमें कोई भेदभाव नहीं होता है।
फातिमा कहती हैं कि बेटियों को पढ़ाना और हैदराबाद में अपना घर बनाना उनकी शीर्ष प्राथमिकता है। वह खूब मेहनत करेंगी ताकि उनकी बेटियों को वो सब न देखना पड़े जो उन्‍होंने देखा है। वह अपने पुराने शहर को भी नहीं छोड़ेंगी। यहीं से उनकी पहचान बनी है। यहीं से उन्होंने सबकुछ पाया है।

बरसाने की लठमार होली जैसी मशहूर है बिहार की छाता होली

समस्तीपुर । आमतौर पर रंगों का त्योहार होली का पर्व पूरे देश में मनाया जाता है। इस वर्ष भी होली को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में है। वैसे, इस पर्व को मनाने को लेकर अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। ऐसे में बिहार के समस्तीपुर के एक गांव में अनोखी होली खेली जाती है, जिसमें आसपास के लोग भी हिस्सा लेने पहुंचते हैं। देश और दुनिया में जैसे मथुरा, ब्रज, वृंदावन की होली मशहूर है, वैसे ही समस्तीपुर के धमौन इलाके की छाता या छतरी होली प्रसिद्ध है। हालांकि इस छाता होली का उल्लास थोड़ा अलग होता है। इसकी तैयारी भी एक पखवाड़े पहले से ही शुरू हो जाती है।
बांस से तैयारी की जाती है छतरी
समस्तीपुर जिले के पटोरी अनुमंडल क्षेत्र के पांच पंचायतों वाले विशाल गांव धमौन में दशकों से पारंपरिक रूप से मनायी जानेवाली छाता होली को लेकर इस बार उत्साह दोगुना है। होली के दिन हुरिहारों की टोली बांस की छतरी तैयार करते हैं। इस बांस की छतरी के साथ फाग गाते निकलती है। पूरा इलाका रंगों से सराबोर हो जाता है। सभी टोलों में बांस के बड़े बडे़ छाते तैयार किए जाते हैं। इन्हें कागजों तथा अन्य सजावटी सामानों से आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। धमौन में होली की तैयारी एक पखवाड़ा पूर्व ही शुरू हो जाती है। प्रत्येक टोले में बांस के विशाल, कलात्मक छाते बनाए जाते हैं।
पूरे गांव में तैयार होती हैं 30 से 35 छतरी
पूरे गांव में करीब 30 से 35 ऐसी ही छतरियों का निर्माण होता है। होली के दिन का प्रारंभ छातों के साथ सभी ग्रामीण अपने कुल देवता स्वामी निरंजन मंदिर परिसर में एकत्र होकर अबीर-गुलाल चढ़ाते हैं। इसके बाद ढोल की थाप और हारमोनियम की लय पर फाग के गीतों के साथ लोग गले मिलते हैं। दिनभर यही कार्यक्रम चलता है। ग्रामीण अपने टोले के छातों के साथ शोभा यात्रा में तब्दील होकर महादेव स्थान के लिए प्रस्थान करते हैं। परिवारों में मिलते-जुलते खाते-पीते यह शोभा यात्रा मध्य रात्रि महादेव स्थान पहुंचती है। जाने के क्रम में ये लोग फाग गाते हैं, लेकिन लौटने के क्रम में ये चैती गाते लौटते हैं। इस समय फाल्गुन मास समाप्त होकर चैत्र माह की शुरुआत हो जाती है।
छाता होली में शामिल होते हैं करीब 70 हजार लोग
ग्रामीण बताते हैं कि इस दौरान गांव के लोग रंग और गुलाल की बरसात करते हैं। कई स्थानों पर शरबत और ठंडाई की व्यवस्था होती है। ग्रामीणों का कहना है कि 5 पंचायत उत्तरी धमौन, दक्षिणी धमौन, इनायतपुर, हरपुर सैदाबाद और चांदपुर की लगभग 70 हजार आबादी इस छाता होली में हिस्सा लेती है। इसके लिए करीब 50 मंडली बनाई जाती है। एक मंडली में 20 से 25 लोग शामिल होते हैं। इस अनोखी होली की शुरूआत कब हुई इसकी प्रमाणिक जानकारी तो कहीं उपलब्ध नहीं है।
1930-35 में शुरू हुई थी छाता होली
गांव के बुजुर्ग हरिवंश राय बताते हैं कि इस होली की शुरुआत 8 दशक पहले करीब 1930-35 में बताई जाती है। अब यह होली इस इलाके की पहचान बन गई है। आसपास के क्षेत्र के सैकड़ों लोग इस आकर्षक और अनूठी परंपरा को देखने के लिए जमा होते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि पहले एक ही छतरी तैयार की जाताी थी, लेकिन धीरे-धीरे इन छतरियों की संख्या बढ़ती चली गई। गांव के बुजर्ग मानते हैं कि आज के युवा भी इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। उनका मानना है कि इससे केल देवता प्रसन्न होते हैं और गांवों में एक साल तक खुशहाली बनी रहती है।

रियल एस्टेट में जमकर निवेश कर रहीं महिलाएं

नयी दिल्ली । महिलाएं अब गोल्ड, स्टॉक मार्केट और म्यूचुअल फंड में नहीं बल्कि रियल एस्टेट (Real Estate) में निवेश करना ज्यादा पसंद कर रही हैं। हाल ही में हुए एक सर्वे में यह बात सामने आई है। रियल एस्टेट कंसल्टेंट एनरॉक के एक सर्वे में पता चला है कि देश में 65 फीसदी महिलाएं अब निवेश के लिए रियल एस्टेट को ज्यादा पसंद कर रही हैं। जबकि 20 प्रतिशत महिलाएं शेयर बाजार और सिर्फ आठ प्रतिशत महिलाएं ही सोने में निवेश करना पसंद करती हैं। इस उपभोक्ता सर्वेक्षण के दौरान करीब 5,500 लोगों से सवाल किए गए, जिनमें से 50 प्रतिशत महिलाएं थीं। इसके आधार पर तैयार रिपोर्ट के अनुसार, कम-से-कम 65 प्रतिशत महिला प्रतिभागियों ने रियल एस्टेट में निवेश करना चाहती हैं जबकि 20 प्रतिशत महिलाओं ने शेयर बाजार में निवेश को तरजीह दी।
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ आठ प्रतिशत महिलाओं ने सोना खरीदने और सात प्रतिशत ने सावधि जमाओं (एफडी) में निवेश को वरीयता दी। एनरॉक ने एक अन्य अध्ययन का जिक्र करते हुए कहा कि 83 प्रतिशत महिलाएं 45 लाख रुपये से अधिक कीमत का मकान तलाश रही हैं। करीब 36 प्रतिशत महिलाओं ने 45-90 लाख रुपये कीमत वाले मकान को वरीयता दी जबकि 27 प्रतिशत ने 90 लाख रुपये से 1.5 करोड़ रुपये के बीच के मकान को तरजीह दी। वहीं 45 लाख रुपये से कम कीमत के मकान खरीदने की इच्छा जताने वाली महिलाओं की संख्या कम थी।
एनारॉक ग्रुप के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के मुताबिक, पिछले एक दशक में, महिलाएं एक प्रमुख आवासीय रियल एस्टेट खरीदार के रूप में उभरी हैं। इसमें भी खासतौर पर शहरी क्षेत्रों की महिलाएं शामिल हैं। महिलाएं बड़े घरों से लेकर, रेडी-टू-मूव संपत्तियों और विशिष्ट बजट तक सभी सेक्टरों में खरीदारी कर रही हैं। सर्वे के मुताबिक, रियल एस्टेट में निवेश करने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। एनारॉक के मुताबिक, भारतीय महिलाएं अपने नाम पर संपत्ति खरीदने और पंजीकृत कराने के कई फायदे उठा सकती हैं।

10 साल की बेटी ने रुकवा दिया पिता का दूसरा ब्याह

पटना । ‘पापा दूसरा ब्याह करने जा रहे… हमारी देखभाल कौन करेगा, परिवार में हमें देखने वाला कोई नहीं है। इसलिए, कृपया इस शादी को रुकवा दीजिए।’ बिहार के शिवहर में 10 साल की एक बच्ची ने पुलिस में ये गुहार लगाई। यही नहीं बच्ची की इस अपील का असर हुआ, पुलिस टीम ने भी तुरंत एक्शन लेते हुए उस शख्स की दूसरी शादी नहीं होने दिया। इसके लिए पुलिस अधिकारी ने बाकायदा बच्ची के पिता से खास तौर पर बात की। उन्हें समझाया और फिर उन्हें दूसरी शादी नहीं करने के लिए राजी कर लिया। बच्ची ने थाने में लगाई गुहार
10 साल की एक बच्ची ने जिस बहादुरी से अपने पिता की दूसरी शादी को रोकने के लिए जरूरी कदम उठाए वो शहर में चर्चा का विषय बन गई। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वह बच्ची इसके लिए पुलिस स्टेशन पहुंची और अपने पिता का दूसरा ब्याह रुकवा कर ही दम लिया। जानकारी के मुताबिक, जो शख्स दूसरी शादी की तैयारी कर रहा था उसके पहले से 5 बच्चे हैं। इनमें चार लड़कियां हैं। इस शख्स का नाम मनोज कुमार राय है, जिसने दो साल पहले अपनी पहली पत्नी को खो दिया था। अब दूसरी शादी करने की तैयारी में था।बताया जा रहा कि जैसे ही 10 साल की बच्ची को पता चला कि उसके पिता मनोज एक मंदिर में किसी महिला संग शादी करने जा रहे तो वो परेशान हो गई। कुछ ग्रामीणों को साथ लेकर वो पिपराही थाने में पहुंची और पुलिस से पिता की दूसरी शादी रोकने की गुहार लगा दी। उसने पुलिस के सामने कहा कि ‘हमें सौतेली मां नहीं चाहिए, अगर पिता ने ये शादी की तो उनके लिए परेशानी का सबब बन सकता है।’
रोते हुए लड़की ने पुलिस को बताया कि कैसे उसके पिता होने वाली पत्नी को अपनी सभी 15 कट्ठा जमीन, जायदाद और दूसरी चीजें देने की तैयारी कर चुके हैं। अगर उन्होंने ऐसा किया तो हम 5 भाई-बहनों का क्या होगा। हमारी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। लड़की ने पुलिस से गुहार लगाई कि अगर मेरे पिता ने अपनी सारी जमीन-जायदाद महिला को गिफ्ट में दे दी तो हम कैसे जीवित रहेंगे? परिवार में हमारा ख्याल रखने वाला कोई नहीं है। इसलिए, प्लीज सर इस शादी को रोक दें। बच्ची के साथ-साथ उसके साथ आए ग्रामीणों ने भी पुलिस से यही अपील की।

80 साल के बुजुर्ग ने यूपी गवर्नर के नाम कर दी करोड़ों की जमीन

मुजफ्फरनगर । नालायक औलाद से आहत 80 साल के एक बुजुर्ग ने अपनी सारी संपत्ति की वसीयत राज्यपाल के नाम कर दी। वसीयत में यह भी घोषणा की कि उसकी मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार में भी उसकी नालायक औलाद शामिल न हो। ये मामला यूपी के मुजफ्फरनगर का है।
मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना तहसील के गांव बिराल निवासी 80 वर्षीय बुजुर्ग तत्थू सिंह का भरा पूरा परिवार है। पत्नी की 20 साल पहले बीमारी के चलते मौत हो चुकी है। नत्थू सिंह अपने हाथों से दो बेटों और चार बेटियों का विवाह कर चुके हैं। एक बेटे की मृत्यु हो चुकी है, जबकि दूसरा बेटा सहारनपुर में सरकारी शिक्षक है। पिछले 5 माह से नत्थू सिंह वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। बताया कि यह हालात तब बने, जब उन्हें रोटी भी नसीब होना मुश्किल हो गई। बेटे और पुत्रवधू के व्यवहार से आहत नत्थू सिंह ने बताया कि वह अपने हाथों से रोटी बनाते हैं और खाते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी करोड़ों रुपये की लगभग 18 बीघा जमीन की वसीयत प्रदेश के राज्यपाल के नाम कर दी है। वह अपने बेटे को अपनी संपत्ति से बेदखल कर चुके हैं।
‘चाहे गोली मार दो एक बिस्सा ज़मीन नहीं दूंगा’
बेटे की नालायकी से आहत बुजुर्ग नत्थू सिंह ने कहा कि वह अदालत में भी जज के सामने कह चुका है कि चाहे उसे गोली मार दी जाए। एक बिस्सा जमीन किसी को नहीं देगा।
समाज के सामने पेश की है नजीर
80 वर्षीय बुजुर्ग नत्थू सिंह ने बताया कि नालायक औलाद को संपत्ति से बेदखल कर सारी जमीन की वसीयत राज्यपाल के नाम कर दी है। कहते हैं कि समाज के सामने उन्होंने यह एक नजीर पेश की है। आगे कहा कि पूरी चौबीसी में देख लिया जाए, क्या किसी की औलाद इतनी नालायक है? उन्होंने संपत्ति से बेटे को बेदखल कर आदर्श प्रस्तुत किया है, ताकि दूसरों की नालायक औलाद इस बात को समझ ले और प्रेरणा ले कि उनके साथ भी ऐसा हो सकता है।
बेटे बहू पर लगाए गंभीर आरोप
नत्थू सिंह ने कहा कि कई बार उनकी हत्या का प्रयास किया गया। आरोप लगाया कि उन्हें कमरे में बंद कर गला दबाने की कोशिश की गई। किसी तरह बच गए। बताया कि वह अपनी पुत्रवधू को बेटी की तरह मानते थे। हमेशा उसे बेटी कहकर पुकारते थे। आरोप लगाया कि उसने भी उनके साथ गलत व्यवहार किया।

 

नालंदा में 3 बहुओं के साथ परीक्षा में शामिल हुई सास

नालंदा । बिहार के नालंदा में बेहद अजब मामला सामने आया, जब 3 बहुओं के साथ सास भी परीक्षा में शामिल हुईं। अक्षर आंचल योजना के तहत चलाए जा रहे बुनियादी साक्षरता केंद्रों की नवसाक्षर महिलाओं की परीक्षा का आयोजन किया गया था। जिसमें चंडी के एक केंद्र का नजारा ही कुछ अलग था। यहां पर तीन बहुओं के साथ सास परीक्षा देते देखी गई। डीपीओ अनिल कुमार ने बताया कि जिले में संकुल स्तर पर 105 परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा ली गई। इनमें 10 हजार 980 नवसाक्षर महिलाओं को शामिल होना था। लेकिन, नौ हजार 698 महिलाओं ने ही परीक्षा दी।
चंडी में 3 बहुओं के साथ सास ने दी परीक्षा
चंडी मध्य विद्यालय केंद्र पर तीन बहुओं के साथ सास ने परीक्षा दी। केआरपी ने बताया कि प्रखंड में 740 नवसाक्षर महिलाओं को परीक्षा में शामिल होना था। लेकिन, 547 ने ही परीक्षा दी। परीक्षा दे रहीं तीन बहुओं की सास स्वारती देवी ने कहा कि अपना हस्ताक्षर करने और हिन्दी पढ़ने-लिखने का ज्ञान हासिल हो चुका है। इस परीक्षा में शामिल होकर काफी खुशी हो रही।