नयी दिल्ली । 28 मई 2023 को देश के नये संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करने वाले हैं। इस संसद भवन के तैयार होने के साथ ही अब एक शब्द तेजी से सुर्खियों में आ गया है। अब से लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास सेंगोल होगा। यह सेंगोल शब्द तेजी से सुर्खियों में आया है। आज से पहले शायद किसी को नहीं पता था कि यह सेंगोल क्या है और अचानक यह क्यों कई सालों बाद खबरों में आता है। आपको बता दें कि सेंगोल का मतलब है राजदंड। अक्सर आपने देखा होगा कि पुराने जमाने में भारतीय राजाओं के पास राजदंड होता था जिसका आदेश सभी को मानना होता था।
इलाहाबाद संग्रहालय में मिला सेंगोल
सेंगोल के बारे में प्रधानमंत्री कार्यलय को एक खत के द्वारा पता चला। दरअसल 2 साल पहले एक खत में सेंगोल के बारे में बताया गया था। यह खत चर्चित डांसर पद्मा सुब्रमण्यम ने लिका था। द हिंदू में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक पद्मान सुब्रमण्यम ने पीएमओं को लिखी अपनी चिट्ठी में तमिल मैगजीन ‘तुगलक’ एक आर्टिकल का हवाला दिया था। जिसमें भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को सेंगोल सौंपने की बात कगी गई थी।
सेंगोल तक पहुंची मंत्रालय की टीम
पीएमओ को जब भारत की इस धरोहर के बारे में पता चला तो इसकी खोज में संस्कृति मंत्रालय जुट गया। संस्कृति मंत्रालय ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र की मदद ली। कला केंद्र के एक्सपर्ट्स ने अर्काइव्स को छान मारा तो उन्हें पता चला कि यह सेंगोल इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा हुआ है। सेंगोल के अस्तित्व को कंफर्म करने के लिए मंत्रालय की टीम वुम्मिडी बंगारू चेट्ठी परिवार से भी मिली जिन्होंने कंफर्म किया कि सेंगोल तैयार किया गया था।
15000 रुपये में बना था सेंगोल
इस जांच में संस्कृति मंत्रालय को यह भी पता चला कि साल 1947 में भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा नेहरू को सेंगोल सौंपा गया था। इस सेंगोल को मद्रास के प्रसिद्ध ज्वैलर्स वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स द्वारा तैयार किया गया था। बता दें कि साल 1947 में इसे तैयार करने में कुल 15 हजार रुपये खर्च करने पड़े थे।
नयी संसद में स्थापित होगा राजदंड सेंगोल
भारत में कभी चलन में थे 5,000 और 10,000 रुपये के नोट
नयी दिल्ली । कई लोगों के जहन में सवाल उठ रहा होगा कि क्या 2,000 रुपये का नोट भारत के केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रित उच्चतम मूल्य की करंसी है? इसका जवाब है ‘नहीं’. आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में पहले 5,000 और 10,000 रुपये के नोट भी हुआ करते थे । हां, 10,000 रुपये आरबीआई द्वारा मुद्रित अब तक की सबसे अधिक मूल्य वाली करंसी थी ।
आरबीआई ने पहली बार 1938 में 10,000 रुपये का नोट छापा था । जनवरी 1946 में इसे विमुद्रीकृत कर दिया गया था लेकिन 1954 में इसे फिर से शुरू किया गया था । अंततः 1978 में इसे फिर से विमुद्रीकृत कर दिया गया ।
जब रघुराम राजन ने दिया था 10,000 रुपये के नोट का आइडिया
पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के तहत आरबीआई ने 5,000 रुपये और 10,000 रुपये के नोटों को फिर से पेश करने का सुझाव दिया था । आरबीआई द्वारा लोक लेखा समिति को प्रदान की गयी जानकारी के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने अक्टूबर 2014 में सिफारिश की थी ।
इस विचार के पीछे कारण यह बताया गया था कि 1,000 रुपये के नोट का मूल्य मुद्रास्फीति से कम हो रहा था । मई 2016 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तहत सरकार ने आरबीआई को 2,000 रुपये के नोटों की एक नई श्रृंखला पेश करने के अपने “सैद्धांतिक रूप से” निर्णय के बारे में सूचित किया। प्रिंटिंग प्रेसों को अंततः जून 2016 में निर्देश दिए गए।
भारत के तत्कालीन वित्त मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली ने बाद में कहा था कि सरकार ने 5,000 रुपये और 10,000 रुपये के नोटों की सिफारिश को स्वीकार नहीं किया क्योंकि वह तुरंत प्रतिस्थापन मुद्रा उपलब्ध कराना चाहती थी और इसलिए 2,000 रुपये के नोटों को चलन में लाया गया ।
बाद के चरण में रघुराम राजन ने बताया कि जालसाजी के डर से बड़े मूल्यवर्ग के करेंसी नोटों को रखना मुश्किल था । शायद इसी वजह से सरकार ने आरबीआई के विचार को खारिज कर दिया था । बता दें कि देश आमतौर पर अति-उच्च मुद्रास्फीति के कारण उच्च-मूल्य वाले नोटों को प्रिंट करते हैं । ऐसी स्थिति में मुद्रा का मूल्य इतना कम हो जाता है कि छोटी खरीदारी के लिए भी बड़ी संख्या में करेंसी नोटों की आवश्यकता होती है ।
(स्त्रोत – जी न्यूज)
शुभजिता स्वदेशी : कभी मंदिर के बाहर स्टॉल लगाते थे, सेंगोल ने चमका दी थी बंगारू ब्रदर्स की किस्मत
देश के नए संसद भवन में सेंगेाल की स्थापना की जाएगी । इसे शासन की शक्ति का केंद्र माना जाता रहा है । संसद में उद्घाटन समारोह में यह सेंगोल स्पीकर की सीट के पास नजर आएगा । यह वही सेंगोल है जिसका निर्माण चेन्नई की ज्वैलरी कंपनी वुमुदी बंगारू ने किया था, जिसे लॉर्ड माउंबेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को सौंपा था । सेंगोल का निर्माण किया था इस कंपनी के संस्थापक वुमुदी बंगार चेट्टी के दोनों बेटों वुम्मिदी एथिराजुलु और वुम्मिदी सुधाकर ने, जिसने कंपनी की किस्मत ही बदल दी थी. इसे तैयार करने में 15 हजार रुपये का खर्च आया था.
120 साल पुरानी इस कंपनी की नींव वुमुदी बंगार चेट्टी ने रखी थी। बात 1900 की है । वैल्लौर जैसे छोटे से शहर में जन्मे बंगारू ने गहने बेचने की शुरुआत मंदिरों के बाहर स्टॉल्स से की थी । उस समय बंगारू के घर के पास दो मंदिर हुआ करते थे. पल्लिकोंडा पेरूमल और अम्मन। मंदिर के इर्द-गिर्द ऐसी बहुत दुकाने लगती थीं, जहां नाक-कान छेदे जाते थे । बंगारू यहीं ज्वैलरी के स्टॉल लगाते थे । महीने में 10 दिन यहां मेले का माहौल रहता था. बाकी 20 दिन वो गहने बनाने में व्यस्त रहते थे ।
यह वो समय था जब उनके पास कोई दुकान नहीं थी। वो एक बॉक्स में सामान रखकर मंदिर के आसपास बेचते थे. लेकिन गहनों के कारोबार की बहुत जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने मद्रास यानी चेन्नई आने का फैसला लिया । 1900 में उन्होंने जॉर्ज टाउन में पहली बार दुकान खोली । यह दुकान चल निकली । अगले 7 से 8 सालों में उन्होंने अपने नाम से ज्वैलरी बनाना शुरू किया और बेचने लगे । बंगारू यहीं नहीं रुके व्यापार बढ़ाने के लिए वो योजनाएं बनाने लगे ।
मद्रास ने बदल दी तकदीर
मद्रास में उन्होंने नाम कमाया । घर पर ही शोरूम और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट तैयार की । 1940 में उन्होंने एनएससी रोड पर दुकान खोली और 1950 में पहला आधिकारिक ज्वैलरी स्टोर पणगल पार्क में खोला । उन्होंने ज्वैलरी शोरूम के लिए जो जगह तय की थी वो रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के करीब थी, यही वजह थी कि लोगों के लिए शोरूम तक पहुंचना आसान रहा।
यह शोरूम तेजी से प्रख्यात हुआ और एक के बाद एक शोरूम खुलने लगे. धीरे-धीरे कारोबार को व्यवस्थित करना शुरू किया गया. अलग-अलग डिपार्टमेंट तैयार किए जाने लगे । लोग क्या पसंद करते हैं और क्या नहीं, इसे समझना शुरू किया । मैटेरियल मैनेजमेंट, स्टाफ ट्रेनिंग और दूसरी जरूरी बातों को कारोबार को हिस्सा बनाया ।
बदलाव की रणनीति अपनाई
कंपनी ने हमेशा से ही कारोबार में अंतराष्ट्रीय मानकों को लागू किया. ज्वैलरी सर्टिफिकेशन से लेकर डायमंड की गारंटी तक की बात को कारोबार का हिस्सा बनाया । कंपनी ने इंटरनेशनल वर्ल्ड स्किल फोरम में 2019 में ज्वैलरी डिजाइनिंग में ब्रॉन्ज अवॉर्ड जीता ।
कंपनी ने समय-समय दुनिया के कई देशों में फैशन शो और दूसरे इवेंट्स में ब्रैंडिंग की । अपने ज्वैलरी कलेक्शन पेश किए । 2019 में बंगारू ज्वैलर्स ने लैक्मे इंडिया फैशन वीक के दौरान पहला प्लेटिनम कलेक्शन पेश किया, जिसके काफी पसंद किया । अब कंपनी एक बार फिर अपने सेंगोल के कारण चर्चा में है.
(स्त्रोत – टीवी 9 भारतवर्ष)
दुनिया की शीर्ष 20 नवाचार करने वाली कम्पनियों में टाटा का नाम
देश की दिग्गज कंपनी टाटा ने अपने नाम एक और बड़ा खिताब हासिल कर लिया है. दुनिया की मोस्ट इनोवेटिव-50 कंपनियों की सूची में टाटा को 20वां स्थान मिला है । सूची में शामिल होने वाली टाटा एकमात्र भारतीय कंपनी है । बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की मोस्ट इनोवेटिव कम्पनीज 2023 की सूची जारी कर दी गई है ।
कई मापदंडों को देखकर किया जाता है लिस्ट में शामिल
कंपनी की परफॉर्मेंस के साथ ही उनकी विपरीत परिस्थितियों को सहने की क्षमता जैसे कई पैरामीटर को देखकर उनकों इस लिस्ट में शामिल किया जाता है । इसके अलावा टाटा ग्रुप ने साल 2045 तक नेट-जीरो एमिशन का टारगेट सेट किया हुआ है ।
ऐपल को मिला पहला स्थान
आपको बता दें इस लिस्ट में अमेरिका की एप्पल कंपनी को पहला स्थान मिला है । वहीं, एलन मस्क की टेस्ला कंपनी को दूसरा स्थान मिला है । टेस्ला पहले की तुलना में 3 स्थान ऊपर पहुंच गई है । वहीं, अमेजन को लिस्ट में तीसरा स्थान मिला है ।
टॉप-10 में ये कंपनियां हैं शामिल
इसके अलावा गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट को चौथा नंबर मिला है। माइक्रोसॉफ्ट पांचवें नंबर पर है। इसके बाद अमेरिका की फार्मा कंपनी मॉडर्ना दक्षिण कोरिया की सैमसंग चीन की हुआवे और बीवाईडी कंपनी तथा सिमंस का नंबर है ।
मेटा को मिला है 16वां स्थान
आपको बता दें टॉप-10 लिस्ट में अमेरिका की 6 कंपनियां शामिल हैं । इसके अलावा चीन की भी 2 कंपनियों के नाम लिस्ट में शामिल है । फाइजर को 11वां स्थान, स्पेसएक्स को 12वां स्थान और मेटा को 16वां स्थान मिला है।
1869 में हुई थी टाटा की शुरुआत
टाटा ग्रुप की बात करें तो इस कंपनी की शुरुआत साल 1869 में हुई थी । देश में नमक से लेकर टाटा ग्रुप लग्जरी गाड़ियों और अन्य सभी तरह के सेंगमेंट में कारोबार कर रहा है । आईटी सेक्टर की सबसे बड़ी कंपनी टीसीएस , टाटा स्टील, टाटा मोटर्स समेत ज्यादातर देश के सभी सेक्टर में टाटा का नाम शामिल है ।
पटना महावीर मंदिर में एक महीने में 1 लाख किलो नैवेद्यम की रिकार्ड बिक्री
चढ़ावा से 10 लाख रुपये रोज की कमाई
महावीर मंदिर पटना में नैवेद्यम प्रसाद की रिकार्ड बिक्री
पटना । उत्तर भारत के सबसे प्रसिद्ध मंदिर में शामिल पटना जंक्शन स्थित महावीर मंदिर का इतिहास काफी पुराना है । महावीर मंदिर सिर्फ पटना ही नहीं बल्कि देश के प्रमुख मंदिरों में एक है । महावीर मंदिर की आय प्रतिदिन 10 लाख रुपये से अधिक हो गयी है । महावीर मंदिर न्यास महासचिव किशोर कुणाल ने बताया है कि पहले महावीर मंदिर की अधिकतम आय पूरे साल में 11 हजार दिखलाई जाती थी, लेकिन अब ये आय बढ़कर 10 लाख रुपये से अधिक हो गयी है । महावीर मंदिर के आय में अस्पतालों या अन्य संस्थाओं की आय, व्यय राशि का समावेश नहीं है ।
सचिव किशोर कुणाल ने बताया कि राष्ट्रपति रहते रामनाथ गोविंद जब मंदिर दर्शन के लिए आए थे तो उन्होंने महावीर मंदिर को मनोकामना मंदिर बताया था, जिससे बाद श्रद्धालुओं और भक्तों की भीड़ में भी इजाफा हुआ है । इसका नतीजा है कि महावीर मंदिर की आय बढ़ गई है । उन्होंने कहा कि यहां हर महीने सवा लाख किलो नैवेद्यम लड्डू की बिक्री हो रही है । हनुमान जी के प्रति लोगों की श्रद्धा बढ़ी है प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी मंदिर पहुंचते हैं । वहीं उन्होंने बताया कि वर्तमान समय में महावीर मंदिर के पास सवा सौ एकड़ से अधिक की जमीन है । केसरिया के पास विराट रामायण मंदिर निर्माण के लिए 7 लाख रुपये प्रति एकड़ से लेकर 12 लाख रुपय प्रति एकड़ की दर से 100 एकड़ जमीन खरीदी गई है जबकि सरकारी रेट 80 लाख रुपये एकड़ है । महावीर मंदिर के तरफ से अलग-अलग शहरों में मंदिर निर्माण कराया जा रहा है, जिसमें हाजीपुर के प्रसिद्ध पौराणिक गजेंद्र मोक्ष अस्थल पर एक भव्य विशाल नाथ मंदिर, इस्लामपुर में नवीन आकर्षक राम जानकी मंदिर का निर्माण किया है । गया शहर के कचहरी के पास माधवनंद मंदिर, मुजफ्फरपुर शहर में विशाल राम जानकी मंदिर, कोईलवर के नजदीक सकड़डीह हनुमान मंदिर ये पास में एक बीघा जमीन है वहां भव्य शिव मंदिर बन रहा है ।
किशोर कुणाल कहा कि पहले महावीर मंदिर के पास में इतनी जमीन नहीं थी, लेकिन आज महावीर मंदिर के पास इतनी जमीन है जहां पर अन्य मंदिर भी बनाये जा रहे हैं । उन्होंने कहा कि अयोध्या के इतिहास में पहली बार पटना महावीर मंदिर की और से तीर्थयात्रियों को निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की गई है । 2020 विवाह पंचमी से प्रारंभ राम रसोई में मार्च 2023 तक 13,42,797 भक्तों को प्रसाद ग्रंथियां और इसमें उत्तम कोटि के नौ व्यंजन परोसे गए हैं । महावीर मंदिर की तरफ से अयोध्या में हो रहे मंदिर निर्माण में 10 करोड़ रुपये देने की घोषणा की गई है जो अभी तक की सबसे बड़ी रकम है । अब तक किसी एक संस्था की तरफ से इतना बड़ी रकम नहीं दी गयी है ।
(स्त्रोत – ई टीवी भारत)
केरल के जगदीश ने किया रामचरित मानस का पाठ, बनाया 138 घंटे का सबसे लम्बा गीत
वाराणसी । धर्म नगरी काशी में रहने वाले केरल के जगदीश पिल्लई ने 138 घंटे में रामचरितमानस को गाने के रूप में गाकर वर्ल्ड रिकार्ड बना दिया ।15 हजार से ऊपर चौपाइयों को लयबद्ध कर के संगीत के साथ सजाकर दुनिया का सबसे लंबा गीत बना दिया है । डॉ. जगदीश पिल्लई वाराणसी में लेखक और शोधकर्ता हैं । इन्होंने पहले भी अन्य विधाओं में रिकार्ड बनाया है लेकिन इस बार इनके रिकार्ड की चर्चा खूब हो रही है. इस बार 138 घंटे, 41 मिनट और 2 सेकेंड तक लगातार चलने वाला रामचरित मानस का ऑडियो पाठ का गाना बना दिया । यह दुनिया का सबसे लम्बा गीत बन गया है । जिस पर गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड ने मुहर भी लगा दी है । इसके पहले इंग्लैंड की म्यूजिक बैंड के नाम यह रिकॉर्ड 115 घंटे और 45 मिनट का था, जिसे डॉ. पिल्लई ने तोड़ दिया है ।
पिल्लई ने यह गाना कोरोना काल में लयबद्ध करना शुरू किया था
इस रामचरित मानस सॉन्ग को गिनीज बुक ने सर्वाधिक लम्बा आधिकारिक रूप से प्रदर्शित गाना यानी लॉन्गेस्ट रिलीज्ड ऑफिशियल सॉन्ग यानी आधिकारिक तौर पर दुनिया का सबसे लंबा गाना माना है । पिल्लई ने यह गाना कोरोना काल में लयबद्ध करना शुरू किया था, लेकिन फिर यह काम रूक गया । इसके बाद पिल्लई फिर से यह गाना खुद लयबद्ध करना शुरू किया जिसका नतीजा उन्हें 10 दिन पहले मिला, जब सभी फॉर्मेलिटी पूरी करने के बाद गिनीज बुक ने यह रिकॉर्ड सौंपा । उन्होंने भगवान राम को आदर्श बताया और उनसे प्रभावित होने की बात कही जिसके बाद उन्होंने यह रिकॉर्ड बनाया ।
डॉ. पिल्लई ने बताया कि पूरी रामायण को 50 घंटे में इन्होंने गा लिया था, लेकिन उन्हें रिकार्ड बनाना था तो उन्होंने 15 हजार श्लोकों, छंदों, चौपाइयों और भजन कीर्तन गाकर इसे पूरा 138 घण्टे 41 मिनट 2 सेकेंड का तैयार किया. मानस पाठ में जहां-जहां पॉज है, वहां-वहां इन्होंने भजन-कीर्तन जोड़े । इस गाने को दुनिया भर के आधिकारिक म्यूजिक चैनल्स जैसे एप्पल म्यूजिक, स्पॉटीफाई, अमेजन म्यूजिक आदि 100 से ज्यादा प्लेटफार्म पर प्रसारित कर चुके हैं ।
रामचरित गीत को बनारस में लांच किया
डॉ पिल्लई ने यह उपलब्धि हासिल करने के बाद इस रामचरित गीत को बनारस में लांच किया, जिसमें यूपी सरकार के मंत्री दया शंकर मिश्रा शामिल थे। पिल्लई के इस कदम को धर्म और संस्कृति के लिए बड़ा माना है औए उन्हें साधुवाद दिया है । पिल्लई इस गाने को चार साल से संगीत में पिरोने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उन्हें उपलब्धि 2023 में मिली ।
(स्त्रोत – हमारा महानगर)
हादसे में दोनों पैर और एक हाथ गंवाये, यूपीएससी में चमका सूरज
917वीं रैंक हासिल की
मैनपुरी । उत्तर प्रदेश मैनपुरी के सूरज तिवारी ने 2017 में गाजियाबाद के दादरी में एक ट्रेन दुर्घटना में अपने दोनों पैरों के साथ-साथ अपने दाहिने हाथ और बाएं हाथ की दो अंगुलियों को खो दिया था।
हादसे के बाद भी हिम्मत न हारते हुए सूरज ने लाखों युवाओं को रोशनी दिखाते हुए यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास की है। सूरज तिवारी की सफलता पर उनके पिता रमेश कुमार तिवारी कहते हैं कि मैं आज बहुत खुश हूं, मेरे बेटे ने मुझे गौरवान्वित किया है। वह बहुत बहादुर है। उसकी तीन उंगलियां ही काफी हैं। उन्होंने बताया कि घटना के बाद भी उसका मन कभी छोटा नहीं हुआ। वह हमेशा कहता था कि आप लोग घबराए मत। सूरज जैसा बेटा हर घर में पैदा हो।
मां बोलीं- सूरज कहता था, चिंता मत करिए, मैं बहुत पैसा कमाऊंगा
सूरज तिवारी की मां आशा देवी तिवारी कहती हैं कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है। सूरज ने कभी हार नहीं मानी और अपने जीवन में सफल होने के लिए कड़ी मेहनत की। वह हमेशा अपने छोटे भाई-बहनों को कड़ी मेहनत करने के लिए कहता है। सूरज की मां ने कहा कि उसके हौसले बुलंद थे, घटना के बाद भी उसने कभी हिम्मत नहीं हारी बल्कि उसने हमें ही हौसला दिलाया कि आप चिंता मत करिए मैं बहुत पैसा कमाऊंगा।
सूरज तिवारी मैनपुरी के कुरावली नगर के घरनाजपुर मोहल्ला के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी दिव्यांगता की परवाह न करते हुए यूपीएससी परीक्षा में 917वीं रैंक हासिल की। उनकी इस सफलता पर आम से लेकर खास तक ने उन्हें बधाई दी है।
सूरज तिवारी की प्रारंभिक शिक्षा कुरावली नगर के महर्षि परशुराम स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने 2011 में एसबीआरएल इंटर कॉलेज मैनपुरी से हाईस्कूल परीक्षा पास की। इसके बाद 2014 में संपूर्णानंद इंटर कॉलेज अरम सराय बेवर से 12वीं की परीक्षा पास की। 2021 में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से बीए किया। सूरज तिवारी के पिता राजेश तिवारी पेशे से दर्जी हैं।
वहीं, यूपीएससी में सफलता हासिल करने वाले सूरज का कहना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हो, कुछ भी हो, हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। घबराकर कभी अपना मनोबल नहीं तोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूपीएससी की परीक्षा में सफलता के लिए बिना किसी कोचिंग और क्लासेज के मैंने 18 से 20 घंटे तक पढ़ाई की।
सेंधा नमक सच में स्वस्थ के लिए है फायदेमंद
नमक के उपयोग को लेकर डब्ल्यूएचओ ने हाल में रिपोर्ट जारी की । डब्ल्यूएचओ ने नमक के उपयोग को पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बताया । डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में सामने आया था कि पूरी दुनिया में प्रत्येक इंसान हर दिन 10.8 ग्राम नमक का उपयोग कर रहा है जबकि इसे 5 ग्राम तक लाया जाना चाहिए । अभी जो नमक का प्रयोग किया जा रहा है । वह स्वास्थ्य के लिहाज से बिल्कुल ठीक नहीं है । भारत में भी सफेद नमक का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है । आमतौर पर भारत में घरों में सफेद नमक का प्रयोग किया जाता है । उपवास में सेंधा नमक का प्रयोग होता है । आज जानने की कोशिश करते हैं कि उपवास में प्रयोग किया जाने वाला सेंधा नमक क्या वाकई फायदेमंद है ।
एंग्जाइटी में लाभकारी
सेंधा नमक ब्रेन को एक्टिव रखने का काम करता है । इसके उपयोग से सेरोटोनिन और मेलाटोनिन हार्मोन को नियंत्रण करने का काम करता है । इसके सेवन से एंग्जाइटी को काफी राहत मिलती है ।
हाइपरटेंशन कम करे
साधारण नमक ब्लड प्रेशर हाई करने का काम करता है । डॉक्टर सफेद नमक को कम करने की सलाह देते हैं । वहीं सेंधा नमक ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने का काम करता है । इससे बीपी काबू में रहता है । कोलेस्ट्रॉल बेहतर रहता है ।
खत्म करता है गले की खराश
कोविड के बाद से लोगों को गले की खराश की समस्या बनी हुई है । गले में दर्द या सूजन भी हो जाता है । गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर गरारे करने से गले को खासा आराम मिलता है ।
पेट की गड़बड़ी सुधारे
आमतौर पर खराब खानपान के कारण पाचनतंत्र संबंधी दिक्कत हो जाती हैं । ऐसे लोगों के लिए सेंधा नमक खासा लाभकारी हो सकता है । इसमें मौजूद पोषक तत्व आंत और अन्य अंग को फायदा पहुंचाते हैं । वहीं, एसिडिटी, कब्ज जैसी समस्या से भी राहत मिलती है ।
(स्त्रोत – नवयुग सन्देश)
भारत की धरोहर हैं महाराणा प्रताप का स्मृति चिह्न बने ये किले
मेवाड़ के शासक और वीर योद्धा महाराणा प्रताप की जयंती हर साल अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 9 मई को मनायी जाती है। महाराणा प्रताप ने मुगलों से युद्ध करते हुए सभी राजसी वैभव को त्याग कर जंगलों में भटकना मंजूर किया लेकिन मुगल शासकों के सामने कभी घुटने नहीं टेके।
साल में दो बार मनायी जाती है जयंती
महाराणा प्रताप का जन्म अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक 9 मई 1540 को हुआ था। इस साल उनकी 489वीं जयंती मनायी गयी लेकिन हिंदू पंचांग के मुताबिक उनका जन्म जेष्ठ माह की तृतीया को गुरु पुष्य नक्षत्र में हुआ है। विक्रम संवत के अनुसार महाराणा प्रताप का जन्म 22 मई को हुआ था। इसी वजह से साल में दो बार मेवाड़ के महाराणा प्रताप की जयंती मनायी जाती है।
चित्तौड़गढ़ के किले में कभी नहीं रख पाए कदम
चित्तौड़गढ़ के किले को महाराणाओं की शान कहा जाता था। सन् 1303 में चित्तौड़गढ़ के किले पर अलाउद्दीन खिलजी ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। 1540 में जब महाराणा प्रताप को जयवंता बाई ने जन्म दिया उसी समय उनके पिता महाराणा उदय सिंह ने खोए हुए चित्तौड़गढ़ के किले को फिर से जीत लिया और यहां एक विजय स्तंभ स्थापित किया। अपने जीवनकाल में महाराणा प्रताप कभी भी चित्तौड़गढ़ के किले में कदम नहीं रख सके। दरअसल, मुगल बादशाह अकबर ने 1568 को खुद इस किले पर चढ़ाई की और इसे जीत लिया। 27 साल की उम्र में गद्दी संभालने के बाद से लेकर मृत्यु तक महाराणा प्रताप मुगलों से युद्ध लड़ते रहे और बाबर से लेकर अकबर तक जितने किले भी मुगलों ने जीते थे, सबको वापस ले लिया। सिर्फ चित्तौड़गढ़ का किला ही बचा हुआ था। इसके बाद अकबर ने अपनी पूरी ताकत इस किले की सुरक्षा में झोंक दी और हजारों सैनिकों को तैनात कर दिया। सन् 1597 को महाराणा प्रताप ने अपनी मृत्यु तक इस किले को वापस लेने के लिए संघर्ष किया लेकिन वह ना तो इसे जीत सकें और ना ही इस किले में उन्होंने कभी कदम रखा।

गोगुन्दा
उदयपुर, जिसे महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह ने बसाया था, से करीब 35 किमी दूर स्थित गोगुन्दा का किला कई महाराणाओं की आपातकालिन राजधानी भी रही है। इसी किले में महाराणा प्रताप का राजतिलक हुआ था। महाराणा प्रताप ने भी अपने पिता के निधन के बाद गोगुन्दा को अपनी राजधानी बनाया था लेकिन बाद में वह उदयपुर चले गये। जब अकबर ने उदयपुर छीन लिया तो महाराणा प्रताप फिर से गोगुन्दा आ गये।
मायरा की गुफा
गोगुन्दा के पास ही मायरा की गुफा है जिसे महाराणा प्रताप ने अपना शस्त्रागार बनाया था। इसी भूलभुलैया जैसी गुफा में वह अपने प्रिय घोड़े चेतक को भी बांधा करते थे और इसी गुफा में खुफिया मंत्रणा भी करते थे। महाराणा प्रताप ने प्रण लिया था कि जब तक वह मेवाड़ से मुगलों को पूरी तरह से खदेड़ नहीं देते, तब तक महलों को छोड़कर जंगलों में ही रहेंगे। प्रताप के जंगलों में रहने के दौरान यह गुफा काफी महत्वपूर्ण रहा है।
कुंभलगढ़ किला
हल्दीघाटी के युद्ध के बाद काफी समय तक महाराणा प्रपात कुंभलगढ़ किले में रहे थे। इस किले या दुर्ग से प्रताप की कई स्मृतियां जुड़ी हुई है। इस किले में ही पन्नाधाय ने महाराणा उदय सिंह (प्रताप के पिता) का लालन-पालन किया था। यह किला सात पहाड़ियों के बीच बना हुआ है, इसी वजह से नजदीक पहुंचने पर ही यह शत्रु को नजर आता था। यह किला सैनिक और सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण था जिस कारण यह दुर्ग अजेय रहा है।
चावण्ड
उदयपुर से लगभग 60 किमी की दूरी पर चावण्ड गांव की पहाड़ी पर महाराणा प्रताप का महल बना हुआ है। उनसे जुड़ा होने की वजह से इस स्थान का ऐतिहासिक महत्व है। इसी महल में महाराणा प्रताप ने अपनी आखिरी सांसे ली थी। हालांकि अब यह महल टूट कर किसी खंडहर में तब्दील हो चुका है।
(स्त्रोत – नेटिव प्लानेट)
जानिए कैसे पड़ा इन्दौर का नाम..जहाँ हैं 4 हजार साल पुराने इंद्रेश्वर महाराज
मध्य प्रदेश का प्रमुख शहर इंदौर एक व्यवसायिक शहर है। इसी वजह से इसे मिनी मुंबई भी कहा जाता है। इस शहर के नामकरण को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं। कोई कहता है कि भगवान इंद्र के नाम पर इस शहर का नामकरण हुआ तो कोई इंदौर का नाम इंद्रेश्वर महादेव से जोड़ता है। आइए इंदौर के नामकरण और इसके पीछे की कहानियां बताते हैं :
देवराज इंद्र से जुड़ी कहानियां
इंदौर के नामकरण के बारे में कहा जाता है कि यहां कभी भगवान इंद्र का सुन्दर और भव्य मंदिर हुआ करता था। उस मंदिर के आसपास के इलाके को ही इंदौर के नाम से जाना जाने लगा। हालांकि इस बात की कोई ऐतिहासिक प्रमाणिकता नहीं मिली। इसके बावजूद इंदौर में रहने वाले लोगों का विश्वास है कि यह शहर दुनिया में राजा इंद्र का एकलौता नगर है।
इंद्रेश्वर महादेव की स्थापना
ऐतिहासिक प्रमाणों की बात की जाए तो कहा जाता है कि माना जाता है कि 8वीं शताब्दी में राजकोट के राजपूत राजा इंद्र तृतीय ने एक त्रिकोणीय युद्ध में जीत हासिल की थी। इसके बाद ही उन्हों इंद्रेश्वर महादेव के मंदिर की स्थापना की। इस मंदिर के साथ वह अपनी जीत को यादगार बनाना चाहते थे। इस मंदिर की वजह से ही यह पूरा क्षेत्र इंद्रपुरी कहलाने लगा। 18 शताब्दी में जब मराठा शासनकाल स्थापित हुआ तो इंद्रपुरी को मराठी अपभ्रंश इंदूर कहा जाने जो कालांतर में धीरे-धीरे इंदौर में परिवर्तित हो गया। ब्रिटिश काल में इंदौर का अंग्रेज नाम ‘INDORE’ लिखा जाता था, जो इंदूर से इंदौर बनने की प्रमुख वजह भी है।
मंदिर से जुड़ी मान्यताएं
4000 साल से भी पुराने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि वर्षा के देवता इंद्रदेव ने कान्ह नदी से शिवलिंग को निकालकर इस मंदिर में स्थापित किया था। कहा जाता है कि जब सफेद दाग के रोग से भगवान इंद्र पीड़ित हुए थे तो उन्होंने इस मंदिर में तपस्या की थी। इस मंदिर को लेकर यह भी मान्यता है कि भगवान शिव पर चढ़ाए गये पानी को जिस भूमि पर डाला जाता है, वहां खुदाई करने से निश्चित रूप से पानी निकलता है। इसी मान्यता की वजह से तुकोरावजी प्रथम भी इस मंदिर तक खिंचे चले आते थे। जब भी उनके राज्य में बारिश कम होती थी, वह इस मंदिर में आकर पूजा करवाया करते थे। उन्होंने ही इस मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य किया था।
मंदिर का स्थापत्य
इंद्रेश्वर महादेव का जिक्र शिव पुराण में भी किया गया है। इस मंदिर को इंडो-आर्यन और द्रविड़ शैली का मिश्रण कहा जाता है। मंदिर का गर्भगृह दक्कन शैली में बनायी गयी है। मंदिर का गर्भगृह जमीन के नीचे बनाया गया है और गर्भगृह की दीवारों और खंभों पर नक्काशी भी दक्कन शैली की ही है। कहा जाता है कि जब-जब शहर में पानी की किल्लत होती है तब शिवलिंग को जलाभिषेक कर पूरी तरह से जलमग्न कर दिया जाता है। इसके बाद ही शहर से जल संकट दूर हो जाता है।
(स्त्रोत – नेटिव प्लानेट)




