Tuesday, March 24, 2026
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विदेश की धरती पर भारत का ध्वज फहराने वाली मैडम भीकाजी कामा

“यह भारतीय स्वतंत्रता का ध्वज है। इसका जन्म हो चुका है। हिन्दुस्तान के युवा वीर सपूतों के रक्त से यह पहले ही पवित्र हो चुका है। यहाँ उपस्थित सभी महानुभावों से मेरा निवेदन है कि सब खड़े होकर हिन्दुस्तान की आजादी के इस ध्वज की वंदना करें।” यह भावुक अपील 1907 ई. में स्टुटगार्ड (जर्मनी) में ‘अंतर्राष्ट्रीय समाजवाद सम्मेलन’ में मैडम कामा ने तिरंगा झण्डा फहराते समय की। अपील का असर इतना था कि वहां मौजूद सभी लोग खड़े होकर ताली बजाने लगे थे। भीखाजी जी रूस्तम कामा अथवा मैडम कामा का नाम भारतीय इतिहास में अमर है। जब-जब भारत की आजादी की गाथाएं गाई जाएंगी तब-तब भीखाजी जी कामा का नाम आएगा। वैसे तो भीखाजी जी रूस्तम कामा भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक थीं लेकिन भारत की आजादी में उनका योगदान किसी भारतीय से कम नही था। दुनिया के विभिन्न देशों में जाकर भारत के स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने का कार्य भीखाजी जी रूस्तम कामा ने किया।
मैडम कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में 22 अगस्त 1907 में सातवीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस के दौरान भारतीय तिरंगा फहराया। उन्होंने इस तिरंगे में भारत के विभिन्न समुदायों इत्यादी को दर्शाया था। उनका तिरंगा आज के तिरंगे जैसा नहीं था। भीखाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को बम्बई में एक पारसी परिवार में हुआ था। मैडम कामा के पिता प्रसिद्ध व्यापारी थे। भीखाजी का विवाह 1885 में एक पारसी समाज सुधारक रुस्तम जी कामा से हुआ था।


अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया
देश-दुनिया में भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाने में भीखाजी कामा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उन्होंने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया था। वर्ष 1896 में मुम्बई में प्लेग फैलने के बाद भीकाजी ने इसके मरीजों की सेवा की थी। बाद में वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गई थीं। इलाज के बाद वह ठीक हो गई थीं लेकिन उन्हें आराम और आगे के इलाज के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई। वर्ष 1906 में उन्होंने लन्दन में रहना शुरू किया जहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा, हरदयाल और वीर सावरकर से हुई।
लंदन में रहते हुए वह दादाभाई नौरोजी की निची सचिव भी थीं। दादाभाई नोरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स का चुनाव लड़ने वाले पहले एशियाई थे। जब वो हॉलैंड में थी, उस दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर क्रांतिकारी रचनाएं प्रकाशित करायी थी और उनको लोगों तक पहुंचाया भी। वे जब फ्रांस में थी तब ब्रिटिश सरकार ने उनको वापस बुलाने की मांग की थी पर फ्रांस की सरकार ने उस मांग को खारिज कर दिया था। इसके पश्चात ब्रिटिश सरकार ने उनकी भारतीय संपत्ति जब्त कर ली और भीखाजी कामा के भारत आने पर रोक लगा दी। उनके सहयोगी उन्हें भारतीय क्रांति की माता मानते थे, जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे।

भारत के ध्वज का पहला डिजाइन तैयार किया
भीखाजी ने वर्ष 1905 में अपने सहयोगियों विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा की मदद से भारत के ध्वज का पहला डिजाइन तैयार किया। भीखाजी द्वारा लहराए गए झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। यह अब के तिरेंगे से बिल्कुल अलग था। भीखाजी कामा द्वारा तैयार किए गए झंडे में इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में देवनागरी लिपि में ̔’वंदे मातरम’ लिखा हुआ था।
आजादी की लड़ाई के साथ-साथ भीका जी ने लिंग समानता के लिए भी कार्य किया था। भीखाजी कमा का नाम भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाता है। उनके सम्मान में भारत में कई स्थानों और गलियों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। 26 जनवरी 1962 में भारतीय डाक ने उनके समर्पण और योगदान के लिए उनके नाम का डाक टिकट जारी किया था।
भारतीय तटरक्षक सेना में जहाजों का नाम भी उनके नाम पर रखा गया था। देश की सेवा और स्वतंत्रता के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने वाली इस महान महिला की मृत्यु 1936 में मुम्बई के पारसी जनरल अस्पताल में हुई और उनके शब्द थे, ‘वंदे मातरम ।

पिंगली वेकैया, जिन्होंने डिजाइन किया हमारा तिरंगा

प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है, जो उस देश के संप्रभुता होने का प्रतीक होता है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है, जो तीन रंगों- केसरिया, सफेद और हरे रंग से बना है और इसके केंद्र में नीले रंग से बना अशोक चक्र है। तिरंगे के ऊपर की पट्टी जिसका रंग केसरिया है वह शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच का सफेद रंग शांति और सत्य का प्रतीक है। नीचे की हरी पट्टी भारत के खुशहाली हरियाली का प्रतीक है।
झंडे में मौजूद चक्र का अर्थ जीवन कि निरंतर गतिशीलता का परिचायक है। हमारे तिरंगे में खास बात यह है की इसका हरेक रंग अर्थपूर्ण है और इसके साथ ही अपने आप में आजादी के लड़ाई का इतिहास समेटे हुए है। हर देश के लिए उसका राष्ट्रीय ध्वज सर्वोपरि होता है और हमारा तिरंगा भी लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के लिए आत्मसम्मान का प्रतीक रहा है। यहां तक की हमारे तिरंगे के डिजाइन की कहानी ऐसे ही एक आजादी के मतवाले के आत्मसम्मान से जुड़ी हुई है।
कहानी कुछ इस तरह है कि तिरंगे को बनाने वाले पिंगली वेंकैया ने दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सेना के लिए काम करते हुए एक घटना ने वेंकैया के मन पर छाप छोड़ी। सैनिकों को ब्रिटिश राष्ट्रीय ध्वज यूनियन जैक को सलामी देने के लिए कहा गया। हालांकि पिंगली ने उस समय झंडे को सलामी दी, लेकिन उनकी देशभक्ति की भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुईं और उन्होंने फैसला किया कि कुछ करना होगा। इस घटना और भारत की आजादी के लिए गांधी की लड़ाई ने वेंकैया को एक स्वतंत्रता सेनानी में बदल दिया। वेंकैया ने ही भारत का राष्ट्रीय ध्वज बनाया था। बलिदान, समृद्धि और शांति के प्रतीक इस तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिलाने के लिए वेंकैया ने लंबी लड़ाई लड़ी थी। तो आइए जानते है देश को तिरंगे देने वाले पिंगली वेंकैया के बारे में जिनका जीवन देश को समर्पित था।
पिंगली वेंकैया का जीवन
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के भाटलापेनुमरु गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम हनुमंतरायडु और माता का नाम वेंकटरतनमा था। पिंगली वेंकैया परिवार एक सम्मानित तेलुगु ब्राह्मण परिवार था। उन्होंने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई तत्कालीन मद्रास (अब चेन्नई) से पूरी की और फिर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए। एक छात्र के रूप में उन्हें कई विधाओं का ज्ञान था। पिंगली वेंकैया को भूविज्ञान, शिक्षा, कृषि और भाषाओं में विशेष रुचि थी।
एंग्लो बोअर युद्ध के समय दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास के दौरान, वेंकैया ने ब्रिटिश सेना के सिपाही के रूप में कार्य किया। इसी दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से पहली बार हुई और उनके साथ उनका ऐसा रिश्ता बना जो 50 साल से भी ज्यादा समय तक चला। वेंकैया गांधी के प्रति बहुत वफादार और अत्यधिक प्रतिबद्ध थे और गांधीवादी सिद्धांतों में दृढ़ विश्वास रखते थे।
वेंकैया ने अपने अंतिम दिन घोर गरीबी में बिताए और 4 जुलाई 1963 को उनकी मृत्यु हो गई। पिंगली वेंकैया के वसीयत के मुताबिक, उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनके द्वारा डिजाइन किए गए राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे में उनको लपेटा जाए।
हमारे राष्ट्रीय ध्वज की कहानी
पिंगली वेंकैया के मन पर तब गहरा असर हुआ जब वह दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश सेना में सेवा दे रहे थे। सैनिकों को ब्रिटिश राष्ट्रीय ध्वज यूनियन जैक को सलामी देने के लिए कहा गया था। हालांकि पिंगली ने उस समय झंडे को सलामी दी, लेकिन उनकी देशभक्ति की भावनाएं गंभीर रूप से आहत हुईं और उन्होंने फैसला किया कि कुछ करना होगा। इस घटना और भारत की आजादी के लिए गांधी की लड़ाई ने वेंकैया को एक स्वतंत्रता सेनानी में बदल दिया।
वह झंडों को लेकर उत्साहित थे और भारत लौटने के बाद उन्होंने अपना समय ऐसे झंडे डिजाइन करने में लगाया जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सके और स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया जा सके। यह देश के लिए राष्ट्रीय ध्वज होगा।
पिंगली वेंकैया ने कई सालों तक तिरंगों को डिजाइन करने में समय लगाया। तब जाकर 1916 में उन्होंने झंडों पर एक पुस्तिका प्रकाशित की। पुस्तिका का शीर्षक था ‘भारत के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज’। इसमें झंडों के चौबीस डिज़ाइन थे। बाद में, जब वे विजयवाड़ा में गांधीजी से मिले, तो उन्होंने वह पुस्तिका दिखाई। डिज़ाइन देखकर गांधी प्रसन्न हुए और उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज की आवश्यकता को स्वीकार किया, इसलिए उन्होंने 1921 में आयोजित राष्ट्रीय कांग्रेस बैठक में वेंकैया से एक नया ध्वज डिज़ाइन करने के लिए कहा।
पिंगली वेंकैया द्वारा सबसे पहले डिजाइन किए गए झंडे में केवल केसरिया और हरा रंग था। हालांकि, बाद में, इसे फिर से डिजाइन किया गया और केंद्र में चरखा (धर्म चक्र) के साथ तीसरा रंग, सफेद, जोड़ा गया। आखिरकार 1931 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर इस ध्वज को हमारे राष्ट्र के ध्वज के रूप में अपनाया।
पिंगली वेंकैया ब्रिटिश इंडियन आर्मी के थे सिपाही
पिंगली वेंकैया जापानी भाषा के काफी जानकार व्यक्ति थे। वह इस परिपक्वता से जापानी बोलते थे कि लोग उन्हें जापान वेंकैया के नाम से भी पुकारते थे।
हलांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि पिंगली एक जियोलॉजिस्ट थे और उन्होंने आंध्र प्रदेश नेशनल कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर भी काम किया था।
अपनी युवा आयु में पिंगली ने ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सिपाही के तौर पर दक्षिण अफ्रीका में भी काम किया था। यहीं पिंगली गांधी के विचारों से बेहद प्रभावित हुए।
(साभार – दैनिक जागरण)

भारत माता मंदिर : वाराणसी में अखंड भारत का अनोखा मंदिर

मदिर की बात आती है तो मन में देवी-देवताओं की आकृतियां बनने लगती हैं, उनका स्मरण हो जाता है। वहीं काशी में एक ऐसा अनोखा भारत माता मंदिर है, जहां देवी-देवता की मूर्ति नहीं, बल्कि भारत माता-अखंड भारत के मानचित्र को लोग पूरी श्रद्धा से शीश नवाते हैं। देश-विदेश से हजारों लोग हर वर्ष मंदिर देखने आते हैं।
94 वर्ष पहले रखी गई आधारशिला
मंदिर की आधारशिला दो अप्रैल वर्ष 1926 को भारतरत्न डा. भगवान दास ने रखी थी। इसके बाद मंदिर बनाने के लिए शिल्पियों की तलाश शुरू हुई। अंतत: काशी के दुर्गा प्रसाद मंदिर बनाने को तैयार हुए। आठ वर्षों में अद्भुत अखंड भारत माता मंदिर बना। महात्मा गांधी ने 25 अक्टूबर 1936 (विजयादशमी) को इसका उद्घाटन किया। सफेद संगमरमर से निर्मित मंदिर के गर्भगृह में अखंड भारत का मानचित्र है।
पत्थर के 762 टुकड़ों से बना मानचित्र
मंदिर में लगे 11 गुना 11 इंच के पत्थर के 762 टुकड़ों से बने मानचित्र को सलीके से तराशा गया है। गर्भगृह 31 फीट दो इंच लंबा व 30 फीट दो इंच चौड़ा है।
मानचित्र करता लोगों को अचंभित
हमारी मातृभूमि इस मानचित्र से चार लाख पांच हजार पांच सौ गुना बड़ी है। धरातल भूमि एक इंच में 6.4 मील दर्शायी गई है यानी एक इंच भूमि की लंबाई छह मील सात सौ गज है। वहीं समुद्र तट से 500, एक हजार, दो हजार, तीन हजार, छह हजार, दस हजार, 15 हजार, 20 हजार व 25 हजार फीट की ऊंचाई स्पष्ट रेखाओं से काटकर दर्शायी गई है। पश्चिम तक लंबाई 32 फीट दो इंच व उत्तर से दक्षिण तक 30 फीट दो इंच है, जिसमें चौकोर मकराना के 11 इंच के 762 सफेद पत्थर काटकर लगे हैं। इसमें हिमालय व दूसरे पर्वतों की 450 चोटियां इंच में दो हजार फीट के हिसाब से काट कर दिखाई गई हैं। 800 छोटी व दो बड़ी नदियां जो अपने स्रोत से लेकर जहां गिरी हुई हैं ठीक दो मार्ग में दिखाई गई हैं। यही नहीं मुख्य पर्वतों, पहाडिय़ों, झीलों, नहरों व टापुओं संग वर्तमान काल के सभी नगरों, तीर्थस्थलों व प्रांतों के नाम बखूबी दर्शाये गए हैं। भारतभूमि के उत्तर में पामीर, तिब्बत, तुर्किस्तान, पूर्व में ब्रह्मा देश, मलय प्रायद्वीप, चीन की दीवार का अंश, बंगाल की खाड़ी-द्वीप, पश्चिम में अफगानिस्तान, बलूचिस्तान व अरब सागर भी दिखाया है।
गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस मंदिर की गेंदा के फूलों से सजावट की जाती है। यही नहीं मानचित्र में बने नदियों व झरने में पानी भी भरा जाता है जो देखते में काफी आकर्षक लगता है।

वैदिक गणित की खोज: प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक गणित का अद्भुत मिश्रण

प्राचीन भारतीय सभ्यता विभिन्न क्षेत्रों में अपने गहन योगदान के लिए जानी जाती है, और गणित इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। वैदिक गणित, वेद नामक प्राचीन भारतीय ग्रंथों में निहित गणित की एक प्रणाली, इतिहास में एक विशेष स्थान रखती है। यह लेख वैदिक गणित और आधुनिक गणित के बीच समानता और अंतर को उजागर करता है, समय अवधि और गणित में प्राचीन भारतीय ज्ञान की प्रतिभा पर प्रकाश डालता है।
वैदिक गणित: समय अवधि और उत्पत्ति
वैदिक गणित की जड़ें वेदों, भारत के प्राचीन पवित्र ग्रंथों से जुड़ी हैं, जिनकी रचना 1500 ईसा पूर्व और 500 ईसा पूर्व के बीच हुई थी। गणितीय तकनीकमुख्य रूप से “सुल्बासूत्र” में पाई गई थी – वेदों के परिशिष्ट जो ज्यामिति से संबंधित हैं, जिसमें अंकगणित और बीजगणितीय विधियां शामिल हैं।
वैदिक गणित और आधुनिक गणित के बीच समानताएं
संख्यात्मक प्रणाली: वैदिक गणित और आधुनिक गणित दोनों दशमलव स्थान-मूल्य प्रणाली का उपयोग करते हैं। प्लेसहोल्डर के रूप में शून्य की अवधारणा, जो आधुनिक अंकगणित के लिए महत्वपूर्ण है, को प्राचीन भारत में भी खोजा जा सकता है।
मानसिक गणना: वैदिक गणित मानसिक गणना पर जोर देता है, जिससे चिकित्सकों को जटिल गणनाओं को तेजी से करने में सक्षम बनाता है। इसी तरह, आधुनिक गणित कम्प्यूटेशनल दक्षता बढ़ाने के लिए मानसिक गणित की वकालत करता है।
अंकगणितीय संचालन के लिए एल्गोरिदम: वैदिक गणित जोड़, घटाव, गुणा और विभाजन के लिए अद्वितीय एल्गोरिदम प्रदान करता है, जो सरल और सहज ज्ञान युक्त पैटर्न पर आधारित हैं। ये विधियां, जबकि आधुनिक एल्गोरिदम से अलग हैं, समान परिणाम प्राप्त करती हैं और अक्सर तेजी से गणना करती हैं।
बीजगणितीय तकनीक: दोनों प्रणालियां बीजगणितीय तकनीकों को नियोजित करती हैं, जैसे कि कारकीकरण, सरलीकरण और समीकरणों को हल करना। प्राचीन भारतीय गणितज्ञों ने बीजगणितीय सिद्धांतों की गहरी समझ दिखाई, जिनमें से कई आधुनिक बीजगणित में उपयोग किए जाने वाले सिद्धांतों के साथ संरेखित हैं।
वैदिक गणित और आधुनिक गणित के बीच अंतर
दायरा और जटिलता: आधुनिक गणित में शाखाओं की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है, जिसमें कैलकुलस, संभाव्यता, संख्या सिद्धांत और बहुत कुछ शामिल हैं। इसके विपरीत, वैदिक गणित मुख्य रूप से अंकगणित, बीजगणित और बुनियादी ज्यामिति पर केंद्रित है।
औपचारिकता बनाम अंतर्ज्ञान: आधुनिक गणित कठोर औपचारिकता और प्रमाणों पर स्थापित है, जो तार्किक वैधता सुनिश्चित करता है। दूसरी ओर, वैदिक गणित सहज तकनीकों पर जोर देता है जो औपचारिक प्रमाणों का पालन नहीं करते हैं लेकिन फिर भी अत्यधिक प्रभावी हैं।
प्रतीकात्मक संकेत: आधुनिक गणित प्रतीकात्मक संकेतन और बीजगणितीय अभिव्यक्तियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है। वैदिक गणित अद्वितीय शब्द-आधारित संकेतों और विधियों को नियोजित करता है, जो आधुनिक गणितीय ग्रंथों से भिन्न हो सकते हैं।
गणित के प्राचीन भारतीय ज्ञान की प्रशंसा
गणित में प्राचीन भारतीय ज्ञान की प्रतिभा वैदिक गणित में संरक्षित कालातीत सिद्धांतों और तकनीकों के माध्यम से स्पष्ट है। अभिनव एल्गोरिदम और मानसिक गणना विधियों को तैयार करने की उनकी क्षमता संख्यात्मक अवधारणाओं की उन्नत समझ दिखाती है। इसके अतिरिक्त, ज्यामिति, त्रिकोणमिति और अंकगणित में उनके योगदान ने दुनिया भर में गणित के विकास को काफी प्रभावित किया है।
समाप्ति
वैदिक गणित प्राचीन भारत के गणितीय कौशल के लिए एक उल्लेखनीय प्रमाण के रूप में खड़ा है। जबकि यह दायरे और औपचारिकता में आधुनिक गणित से भिन्न है, इसके व्यावहारिक और सहज ज्ञान युक्त दृष्टिकोण प्रशंसा को प्रेरित करना जारी रखते हैं। वैदिक गणित और आधुनिक गणित के बीच समानताएं गणित के क्षेत्र में प्राचीन भारतीय ज्ञान की स्थायी प्रासंगिकता को उजागर करती हैं। जैसा कि हम इस विरासत का जश्न मनाते हैं, प्राचीन भारतीय गणितज्ञों ने संख्याओं और गणनाओं की हमारी समझ में किए गए अमूल्य योगदान को पहचानना आवश्यक है।

जीवन में एकरसता को तोड़ते हैं उत्सवः प्रतिभा सिंह

वीरांगनाओं ने गीत-संगीत के साथ मनाया सावन उत्सव

सोदपुर । अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन, पश्चिम बंगाल की वीरांगनाओं ने सोदपुर में सावन उत्सव पूरे उल्लास से मनाया। पारम्परिक कजरी, लोकगीतों और भगवान शिव की आराधना के गीत सुनाकर राकेश पाण्डेय, कुमार सुरजित, साईं मोहन और बेबी काजल ने सबका मन मोह लिया।
संगठन की प्रदेश अध्यक्ष और विख्यात गायिका व अभिनेत्री प्रतिभा सिंह ने इस अवसर पर कहा कि उत्सव जीवन में एकरसता और नीरसता को तोड़ते हैं और सामूहिक तौर पर मनाये जाने के कारण जीवन में नया उत्साह भरते हैं। सावन महिलाओं को विशेष प्रिय इसलिए है क्योंकि इस माह में प्रकृति संजती-संवरती है। यह माह भगवान शिव को भी विशेष प्रिय है और यह उनकी आराधना का पवित्र माह है।
समारोह में संगठन महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, संयुक्त महासचिव ममता सिंह, सचिव किरण सिंह, संयुक्त सचिव सुमन सिंह, कोलकाता की अध्यक्ष मीनू सिंह, महासचिव इंदु संजय सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, पदाधिकारी मीरा सिंह, गीता सिंह, सुमन सिंह, विद्या सिंह, पूनम सिंह, मंजू सिंह, सोदपुर इकाई की अध्यक्ष सुनिता सिंह, महासचिव आशा सिंह, पदाधिकारी जयश्री सिंह, मंजू सिंह, सुलेखा सिंह, रीता सिंह, कविता सिंह, पूजा सिंह, बालीगंज की अध्यक्ष रीता सिंह तथा वीरांगना नारी शक्ति की पदाधिकारी शकुंतला साव, रंजना त्रिपाठी, अनिता साव, मीनाक्षी तिवारी, गायत्री राय, बेबीश्री विशेष तौर पर उपस्थित थीं।

ग्यारहवीं राष्ट्रीय चेस बॉक्सिंग में भवानीपुर कॉलेज ने जीते छह स्वर्ण पदक

कोलकाता । भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों की चेसबॉक्सिंग टीम ने 31 जुलाई 2023 से 4 अगस्त 2023 तक दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में आयोजित 11वीं राष्ट्रीय चेसबॉक्सिंग चैंपियनशिप में 6 स्वर्ण और 2 रजत पदक जीते। औलाद उनकी कड़ी मेहनत और समर्पण ने पश्चिम बंगाल को द्वितीय उपविजेता ट्रॉफी भी दिलाई। 11वीं राष्ट्रीय चेसबॉक्सिंग चैम्पियनशिप में 6 राज्यों – पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ ने कुल 80 से अधिक छात्रों के साथ भाग लिया।ख़ुशी लाकड़ा – स्वर्ण पदक, रितिक प्रसाद – स्वर्ण पदक, हेमन्त भुजेल – स्वर्ण पदक, नमस्तु अग्रवाल – स्वर्ण पदक, कृष्णा सिंह – स्वर्ण पदक, फरहत अली – स्वर्ण पदक, इशिका गुप्ता – रजत पदक, श्रेया शेठ – रजत पदक प्राप्त कर उत्कृष्ट जीत हासिल की। बीईएससी का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भवानीपुर कॉलेज के पूर्व छात्र आशुतोष झा ने प्रथम बार कॉलेज में चैस बॉक्सिंग की टीम को तैयार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया और यह गर्व का विषय है कि इस वर्ष विद्यार्थियों ने गोल्ड और 2 सिल्वर मेडल प्राप्त किए। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

 

भवानीपुर कॉलेज में ओरिएंटेशन 2023 संपन्न

कोलकाता । ‘वीज़ा ऑन अराइवल’ की थीम के साथ, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने 2023 के नए विद्यार्थियों के विभिन्न बैच को संबोधित किया। ओरिएंटेशन 1 से 5 अगस्त तक पांच दिनों तक 15 सत्रों में चला, जिसमें बीकॉम (एच) छात्रों के लिए 12 सत्र , बीए छात्रों के लिए 2 सत्र और बी.एससी और बीबीए छात्रों के लिए 1 सत्र शामिल थे । ओरिएंटेशन का कार्यक्रम प्रवाह, प्रत्येक दिन जॉन लेनन के गीत ‘इमेजिन’ के साथ शुरू हुआ, जिसके बाद छात्रों के लिए कॉलेज यात्रा का एक इंटरैक्टिव वीडियो आया। इसके बाद एंकरों द्वारा विद्यार्थियों को गति देने के लिए बीईएससी के वार्षिक जयकार की घोषणा करते हुए सुना गया। छात्र मामलों के डीन, प्रो दिलीप शाह ने उद्घाटन भाषण के साथ छात्रों का स्वागत किया जो प्रोत्साहित करने वाला था। प्रत्येक सत्र में नये प्रवेश दाखिला लेने वाले छात्र छात्राओं को न केवल कॉलेज, बल्कि कॉलेज में होने वाली सभी कोर्स गतिविधियों से परिचित कराया गया, जिसमें उद्योग के लिए तैयार करियर कनेक्ट पाठ्यक्रम और कॉलेज के 17 कलेक्टिव शामिल थे। ओरिएंटेशन ने छात्रों को उन सभी चीज़ों से परिचित कराया जिनका वे सीधे कॉलेज परिसर में लाभ उठा सकते हैं। सब कुछ छात्रों को बीईएससी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर एक ही छत के भीतर प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की ओर उन्मुख करता है! प्रत्येक सत्र में प्रदर्शन के माध्यम से एक सामूहिकता पर प्रकाश डाला गया, जो इस तथ्य का प्रमाण है कि बीईएससी में छात्रों को बहु-विषयक तरीके से निर्देश दिया जाता है। शिक्षा एक समग्र प्रक्रिया के रूप में देखना है।
एक बार जब कलेक्टिव्स की शुरुआत हुई तो बीकॉम (मॉर्निंग) समन्वयक प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी द्वारा छात्र छात्राओं को कॉलेज में खेल और प्लेसमेंट के अवसरों से परिचित कराया गया। अंत में, प्रत्येक सत्र में छात्रों को कॉलेज के पाठ्यक्रमों और समूहों के लिए अपनी प्राथमिकताओं का चयन करने में सक्षम होने के लिए भरे जाने वाले गूगल फॉर्म के बारे में सूचित किया गया। सत्र का समापन डीन कार्यालय की प्रोफेसर दिव्या उदेशी द्वारा छात्रों को गूगल फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया समझाने के साथ हुआ। इस 5 दिवसीय ओरिएंटेशन को पूर्ण रूप से सफल बनाने के लिए प्रत्येक दिन लगभग सत्तर छात्र स्वयंसेवक डीन के कार्यालय की सहायता कर रहे थे।कार्यक्रम की रिपोर्ट अक्षत कोठारी ने दी और फोटोग्राफर में आदित्य सराफ, प्रियांशु चटर्जी, पारस गुप्ता, अंकित माजी, सौरीश कुमार देब, निश्चय आलोकित लाकड़ा, फकीर अहमद, अर्का मुखर्जी, शालिनी सरकार, पापन दास, सौरीश कुमार देब प्रमुख रूप से रहे। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

 

3 दिवसीय इस डांस कार्निवल के ग्रैंड फिनाले के निर्णायक होंगे टेरेंस लुईस 

कोलकाता । देश की सबसे बड़ी डांस चैंपियनशिप – “बॉर्न 2 डांस – डांसर्स पैराडाइज” एक अलग तरह की डांस चैंपियनशिप के ग्रैंड फिनाले के निर्णायक टेरेंस लुईस होंगे और उनके साथ सौरभ और विवेक भी निर्णायक होंगे ।       कोलकाता और हावड़ा सहित इस आयोजन में दुनिया भर से लोग प्रतियोगिता में भाग लेंगे।  “बॉर्न 2 डांस डांसर्स पैराडाइज़” 1 से 3 सितंबर, 2023 तक कोलकाता के धन धान्य ऑडिटोरियम में की जाएगी। इस डांस कार्निवल, कैंप और प्रतियोगिता ‘बॉर्न 2 डांस – डांसर्स पैराडाइज’ के चैंपियन की ग्रैंड ट्रॉफी का अनावरण हाल एक संवाददाता सम्मेलन में किया गया । इस दौरान ट्रिना साहा (अभिनेत्री), नील भट्टाचार्य (अभिनेता), मोम गांगुली (शास्त्रीय नर्तक और कोरियोग्राफर), विवेक चाचेरे, (कोरियोग्राफर), सौरभ बंगानी (डीआईडी फेम), विवेक जयसवाल (डीआईडी फेम), भावना हेमानी (सामाजिक कार्यकर्ता), अनियशा ठक्कर ( खेल प्रस्तुतकर्ता) के अलावा समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां इसमें शामिल थे। इस मौके पर डीआईडी फेम, सौरभ और विवेक ने कहा, “चूंकि हम कई रियलिटी शो का हिस्सा रहे हैं, इसलिए हम इसका हिस्सा बनने की कठिनाई को समझते हैं। इसलिए, हमने बॉर्न 2 डांस लॉन्च करने का फैसला किया, जहां दुनिया भर के लोग एक डांस प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं और रियलिटी शो का हिस्सा बनने में सक्षम होने के लिए हमारे द्वारा तैयार और प्रशिक्षित होने का मौका पा सकते हैं।
हमारे देश में कई बेहद प्रतिभाशाली युवा हैं जो यह दिखाने के लिए एक मौके और मंच की तलाश में हैं, कि वे क्या कर सकते हैं। हमारा दृढ़ विश्वास है कि बॉर्न 2 डांस अगली पीढ़ी की प्रतिभाओं के लिए प्रेरणा बनेगा।

ऑडिशन श्रेणी: – अवधि:
• श्रेणी ए – एकल (3 वर्ष से 8 वर्ष) – 2 मिनट
• श्रेणी बी – एकल (9 वर्ष से 15 वर्ष) – 2 मिनट
• श्रेणी सी – एकल (16 वर्ष से आगे) – 2 मिनट
• श्रेणी डी – युगल (कोई आयु सीमा नहीं) – 2 मिनट
• श्रेणी ई – समूह (न्यूनतम 3) – 3 मिनट
• विशेष बाल श्रेणी (पहले कभी नहीं हुआ) – 2 मिनट
• श्रेणी एफ – माँ और दादी माँ – 2/3 मिनट
• श्रेणी जी – पिता और दादा – 2/3 मिनट
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डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल 2023 लोकसभा में किया गया पारित

नयी दिल्ली ।  डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल को लेकर एक नया घटनाक्रम सामने आया है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2023 सोमवार को लोकसभा में पास हो गया है. इस बिल में प्रावधानों का उल्लंघन करने वालों पर न्यूनतम 50 करोड़ रुपये से लेकर अधिकतम 250 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। खबरों के मुताबिक, यह कानून भारत में लोगों के अधिकारों को बरकरार रखते हुए डिजिटल डेटा को संभालने वाले संस्थानों की जिम्मेदारियां तय करता है।

विधेयक का उद्देश्य
खबरों के मुताबिक इस बिल का मकसद निजी डेटा की सुरक्षा के लिए बड़े स्तर का ढांचा खड़ा करना है. यह संरचना देश भर में एकत्र किए गए व्यक्तिगत डेटा (डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल) तक अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार करती है। दोनों यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन डेटा का डिजिटलीकरण (डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन) किया गया है। बिजनेस टुडे की खबर के मुताबिक, अगर डेटा प्रोसेसिंग भारत के बाहर होती है, लेकिन इसमें देश में लोगों को सामान या सेवाएं प्रदान करना शामिल है, तो बिल के नियम लागू होंगे।

ये हैं बिल की मुख्य बातें
उपयोगकर्ता डेटा से निपटने वाली संस्थाओं को व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, भले ही इसे तीसरे पक्ष डेटा प्रोसेसर के साथ एकत्र किया गया हो। अगर डेटा में कोई सेंध लगती है तो कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे तुरंत डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (DPB) और पीड़ित यूजर्स को इसकी सूचना दें। विधेयक के अनुसार, नाबालिगों और अभिभावकों के साथ आने वाले व्यक्तियों के डेटा का प्रसंस्करण केवल अभिभावकों की सहमति से किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि कंपनियों के लिए डेटा सुरक्षा अधिकारी नियुक्त करना और उपयोगकर्ताओं के साथ उनके संपर्क विवरण साझा करना आवश्यक है। बिल (डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल 2023) केंद्र सरकार को भारत के अलावा अन्य देशों या क्षेत्रों में व्यक्तिगत डेटा के हस्तांतरण को विनियमित करने का अधिकार देता है।

सावन विशेष – ये हैं भगवान शिव के प्रतीक चिह्न

भी देवी-देवतओं के पास कोई न कोई वाद्य यंत्र जरूर रहता है । उसी तरह भगवान शिव के पास डमरू था, जो नाद का प्रतीक है. ऐसी मान्यता है कि संगीत के जनक भगवान शिव ही थे। डमरू की उत्पत्ति से पहले दुनिया में कोई भी नाचना, गाना बिल्कुल भी नहीं जानता था। मान्यता है कि नाद से ही वाणी के चारों रूपों-पर, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी की उत्पत्ति हुई है।

त्रिशूलभगवान शिव के पास हमेशा एक त्रिशूल भी रहता है. त्रिशूल तीन प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक और भौतिक के विनाश का सूचक भी है. इस त्रिशूल में सत, रज व तम आदि तीनों शक्तियां पायी जाती हैं. त्रिशूल के तीन शूल सृष्टि के क्रमश: उदय, संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व भी करते हैं.

रुद्राक्षरुद्राक्ष को देवों के देव महादेव का स्वरूप माना गया है, मान्यताओं के अनुसार, रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसू से हुई थी। रुद्राक्ष दो शब्दों से मिलकर बना है। पहला शब्द है-रुद्र अर्थात भगवान शिव और दूसरा-अक्ष अर्थात नेत्र. शिवजी के नेत्रों से जहां-जहां अश्रु गिरे, वहां रुद्राक्ष के वृक्ष उग आये। रुद्राक्ष की माला से जाप करने से शिवजी की असीम कृपा मिलती है।

चंद्रमाभगवान भोलेनाथ को सोम यानी चंद्रमा के नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव द्वारा चंद्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है। हिमालय पर्वत और समुद्र से चंद्रमा का सीधा संबंध है.। कहा जाता है कि शिवजी के सभी त्योहार और पर्व चांद्रमास पर ही आधारित होते हैं।

गंगा नदीगंगा नदी का स्रोत भगवान शिव हैं। शिव की जटाओं से स्वर्ग से मां गंगा का धरती पर आगमन हुआ था। मान्यता है कि जब पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए गंगा का आह्वान किया गया, तो पृथ्वी की क्षमता इनके आवेग को सहने में असमर्थ थी। ऐसे में शिवजी ने मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। गंगा को जटा में धारण करने के कारण ही शिव को जल चढ़ाए जाने की प्रथा शुरू हुई।

भगवान शिव के गले में नांगभगवान शिव के गले में लिपटे नजर आने वाले सांप का नाम वासुकी है जो भगवान शिव के अति प्रिय भक्त हैं। शिवजी अपने गले में नाग धारण करते हैं इसलिए महादेव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग इसी नाम से प्रसिद्ध है। नाग कुंडलिनी शक्ति का भी प्रतीक है।

महादेव के शरीर पर भस्मदेवों के देव महादेव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं। भस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह, अहंकार आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है। देश के एकमात्र जगह उज्जैन के महाकाल मंदिर में शिव की भस्म आरती होती है, जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है।