नयी दिल्ली । केंद्र सरकार ने बुधवार को भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् के गायन के लिए आधिकारिक प्रोटोकॉल को लेकर व्यापक दिशानिर्देश जारी किया। इसमें बताया गया है कि सरकारी समारोहों में इसे कैसे और कब प्रस्तुत किया जाना चाहिए। राष्ट्रगीत के समय दर्शकों का आचरण कैसा होना चाहिए इसके बारे में भी बताया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से जारी नए निर्देशों का उद्देश्य देश भर में सार्वजनिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान की स्थिति और औपचारिक भूमिका को स्थापित करना है, जिसमें राजकीय समारोहों और संस्थागत सभाओं के दौरान इसके पालन पर अधिक जोर दिया गया है। दिशानिर्देशों के अनुसार, वंदे मातरम् का संपूर्ण आधिकारिक संस्करण, जिसमें छह श्लोक हैं और जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट और 10 सेकंड है, प्रमुख राजकीय समारोहों के दौरान प्रस्तुत या बजाया जाना चाहिए। इनमें राष्ट्रीय ध्वज फहराना, राष्ट्रपति और राज्यपालों के आधिकारिक कार्यक्रमों में औपचारिक आगमन और प्रस्थान समारोह और ऐसे समारोहों में उनके निर्धारित भाषणों से पहले और बाद के कार्यक्रम शामिल हैं। अगर किसी कार्यक्रम में ‘वंदे मातरम’ व ‘राष्ट्रगान’ दोनों होने हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और उसके बाद ‘राष्ट्रगान’। दर्शकों से अपेक्षा की जाती है कि वे सम्मान के प्रतीक के रूप में दोनों प्रदर्शनों के दौरान सावधान मुद्रा में खड़े रहेंगे। गृह मंत्रालय ने शिक्षण संस्थानों से दैनिक विद्यालय सभाओं और महत्वपूर्ण संस्थागत कार्यक्रमों के दौरान वंदे मातरम गाने को बढ़ावा देने का भी आग्रह किया है। इस कदम का उद्देश्य छात्रों और आम जनता के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति जागरूकता और सम्मान को प्रोत्साहित करना है। औपचारिक स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए, दिशानिर्देशों में यह अनुशंसा की गई है कि जब वंदे मातरम् का प्रदर्शन किसी बैंड द्वारा किया जाता है, तो उससे पहले ढोल की थाप या बिगुल की ध्वनि से औपचारिक रूप से गायन की शुरुआत का संकेत दिया जाना चाहिए। मंत्रालय ने सिनेमा हॉल और फिल्म स्क्रीनिंग के लिए विशिष्ट छूट प्रदान की है – फिल्म के साउंडट्रैक के हिस्से के रूप में वंदे मातरम बजाए जाने पर दर्शकों को खड़े होने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि मनोरंजन स्थलों में दर्शकों को खड़े होने के लिए मजबूर करने से देखने का अनुभव बाधित हो सकता है और संभावित रूप से दर्शकों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है। इस कदम का उद्देश्य राष्ट्रगान से संबंधित औपचारिक प्रोटोकॉल में लंबे समय से चली आ रही कमी को दूर करना है।
कोलकाता की सड़कों पर उतरेंगी 25 सीएनजी बसें
कोलकाता । प्रदूषण कम करने और यात्रियों की सुविधा बढ़ाने के उद्देश्य से परिवहन विभाग ने कोलकाता की सड़कों पर 25 वातानुकूलित(एसी) सीएनजी बस चलाने का निर्णय लिया है। इन बसों को राज्य परिवहन निगम चलाएगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार ये बसें बेलियाघाटा–न्यू टाउन के इको स्पेस, पार्क सर्कस–डानकुनी, कुंदघाट–बारासात, जोका–बारासात, टॉलीगंज–हावड़ा, कोलकाता हवाई अड्डा–बारासात, सेक्टर फाइव–यादवपुर, सियालदह–हावड़ा, हावड़ा–बैरकपुर, हावड़ा–बारुईपुर, सॉल्टलेक–बारुईपुर और हावड़ा–डायमंड हार्बर मार्ग पर चलेंगी।
लगभग एक साल पहले ही इन बसों को खरीदने के आदेश दिए गये थे। उसी के प्रथम चरण के रूप में पिछले दिसम्बर में कस्बा डिपो में 25 नई सीएनजी बसें पहुंची थीं। इन बसों को किन किन रूट्स पर चलाया जाएगा, इसे लेकर परिवहन विभाग ने कोलकाता नगर निगम और परिवहन निगम से रिपोर्ट मांगी थी। वर्तमान में शहर और शहर के आसपास किन रूट्स पर बसों की संख्या आवश्यकतानुसार कम है, किन रूट्स पर यात्रियों को लंबा समय बस के इंतजार में लग जाता है—इस विषय में विस्तृत रिपोर्ट दर्ज होने के बाद ही सीएनजी बसों के रूट तय किए गए। इस बारे में सरकारी अधिसूचना भी जारी की गई है।
परिवहन विभाग के अधिकारी बता रहे हैं कि वर्तमान में जहां बसों की कमी है या यात्रियों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है, उन क्षेत्रों में ही नई सीएनजी बसें उतार दी गई हैं। सीएनजी बसों की संख्या बढ़ने से ईंधन की लागत कम तो होगी ही साथ ही प्रदूषण भी काफी हद तक कम होगा।
यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी को जारी की नोटिस
नयी दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ को चुनौती देने वाली दो नई याचिकाओं पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इन याचिकाओं को पहले से लंबित पुरानी याचिकाओं के साथ जोड़कर एक साथ सुनने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। खासकर नियमों में ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों तक सीमित रखी गई है। इससे सामान्य वर्ग के लोगों को भेदभाव की शिकायत करने का कोई कानूनी संरक्षण नहीं मिलता, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता के अधिकार के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह नियम एकतरफा है और उच्च शिक्षा में सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ सकता है। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में नए नियमों के अमल पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि नियमों के प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका है। अदालत ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था और नियमों पर नए सिरे से विचार करने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित करने का सुझाव दिया था। फिलहाल, 2012 के पुराने नियम लागू रहेंगे, ताकि जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों पर कोई रोक न लगे।
यूजीसी ने 13 जनवरी को ये नए नियम जारी किए थे, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, दिव्यांगता आदि पर आधारित भेदभाव रोकना और समानता को बढ़ावा देना था, लेकिन सामान्य वर्ग से जुड़े कई छात्रों और संगठनों ने इसका विरोध किया और इसे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ बताया।
विरोध के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अब सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होगी।
एसआईआर के बाद मिलेंगे स्मार्ट वोटर कार्ड
नयी दिल्ली । मतदाताओं के घर डाक से 8,300 नए एपिक कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) पहुंचेंगे। आयोग से प्रिंट होकर ये कार्ड प्रशासन को प्राप्त हो गए हैं। इन कार्डों के लिए मतदाताओं को तहसील या सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, बल्कि प्रशासन इन्हें सीधे मतदाताओं के घर तक डाक के माध्यम से पहुंचाने की तैयारी कर रहा है। कार्ड उच्च गुणवत्ता वाले पीवीसी प्लास्टिक से बना है, जो जल्दी खराब नहीं होता और लंबे समय तक सुरक्षित रहता है।
पुराने ब्लैक एंड व्हाइट कार्ड की तुलना में यह पूरी तरह रंगीन और देखने में स्मार्ट कार्ड जैसा है। कार्ड में एक सुरक्षित बारकोड दिया गया है, जिससे मतदाता की जानकारी को डिजिटल रूप से तुरंत सत्यापित किया जा सकेगा। इसमें होलोग्राम और माइक्रो-टेक्स्ट जैसे आधुनिक सुरक्षा मानक शामिल हैं, जिससे फर्जीवाड़े की गुंजाइश खत्म हो जाती है। इस स्मार्ट एपिक कार्ड को मतदाता ऑनलाइन भी अपना कार्ड प्राप्त कर सकते हैं। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पोर्टल पर जाएं। अपना मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी दर्ज कर रजिस्टर करें। लॉगिन करने के बाद डाउनलोड ई एपिक विकल्प पर क्लिक करें। अपना एपिक नंबर डालें और मोबाइल पर आए ओटीपी को दर्ज करें। इसके बाद आपका डिजिटल वोटर आईडी पीडीएफ फॉर्मेट में डाउनलोड हो जाएगा, जो पूरी तरह मान्य है।
तीन साल से कार्यरत अफसरों का होगा तबादला
-जारी हुआ चुनाव आयोग का फरमान
कोलकाता । बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग ने तीन वर्ष से अधिक समय से एक ही पद या जिले में तैनात प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के तबादले का निर्देश दिया है। बुधवार को आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। निर्देश के अनुसार यह आदेश जिलाधिकारी, अतिरिक्त जिलाधिकारी, प्रखंड विकास अधिकारी, उप-मंडलाधिकारी और अन्य जिला स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों पर लागू होगा। इसके साथ ही पुलिस महानिरीक्षक (आईजी), उप-महानिरीक्षक (डीआईजी), पुलिस अधीक्षक (एसपी) और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक को भी स्थानांतरित किया जाएगा। निर्वाचन आयोग के अधिकारी ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है। जिन अधिकारियों ने किसी विशेष जिले या पद पर तीन वर्ष से अधिक समय पूरा कर लिया है, उन्हें स्थानांतरित करना अनिवार्य होगा। हालांकि, राज्य मुख्यालय में तैनात अधिकारियों को इस आदेश से छूट दी गई है। आयोग ने मुख्य सचिव को तत्काल अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश भेज दिए हैं। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पिछले विधानसभा चुनाव में जो अधिकारी किसी जिले में जिलाधिकारी, रिटर्निंग अधिकारी या निरीक्षक के रूप में कार्यरत थे उन्हें आगामी चुनाव में उसी जिले में दोबारा तैनात नहीं किया जाएगा। निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के अनुसार, चुनाव के दौरान प्रशासनिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह एक मानक प्रक्रिया है। इस तरह की स्थानांतरण नीति बड़े चुनावों से पहले विभिन्न राज्यों में नियमित रूप से अपनाई जाती रही है।
आयोग का कहना है कि इन उपायों का उद्देश्य समान अवसर का वातावरण तैयार करना और पारदर्शी तथा निष्पक्ष तरीके से चुनाव संपन्न कराने के लिए संस्थागत ढांचे को मजबूत करना है।
‘पैडवुमन’ प्रीति मिंज को बंगाल सरकार ने किया सम्मानित
कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार ने डूआर्स क्षेत्र के सुदूर चाय बागान इलाकों में किशोरियों और युवतियों के बीच मासिक धर्म स्वास्थ्य जागरूकता फैलाने के लिए पिछले दस वर्षों से कार्य कर रहीं ‘पैडवुमन’ प्रीति मिंज को सम्मानित किया है। एक आधिकारिक सूत्र ने बुधवार को यह जानकारी दी।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पिछड़ा वर्ग कल्याण एवं आदिवासी विकास मंत्री बुलू चिक बराइक ने जलपाईगुड़ी जिले के ओदलाबाड़ी स्थित उनके आवास पर पहुंचकर उन्हें प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया। प्रीति मिंज आदिवासी समुदाय से आती हैं और लंबे समय से जमीनी स्तर पर कार्य कर रही हैं।
पिछले एक दशक से मिंज चाय बागान श्रमिक बस्तियों में घर-घर जाकर किशोरियों और महिलाओं को मासिक धर्म से जुड़ी भ्रांतियों, अज्ञानता और सामाजिक वर्जनाओं के खिलाफ जागरूक कर रही हैं। वह स्वच्छता के सुरक्षित तरीकों पर परामर्श देती हैं और सैनिटरी नैपकिन के उपयोग के लिए प्रेरित करती हैं।
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद प्रीति मिंज अपने मिशन पर अडिग रहीं। उनके प्रयासों से हजारों किशोरियों और युवतियों में मासिक धर्म स्वच्छता को लेकर जागरूकता बढ़ी है और स्वच्छ व्यवहार अपनाने की प्रवृत्ति मजबूत हुई है।
वर्षों की सतत मेहनत के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में किशोरियों और महिलाओं ने सैनिटरी नैपकिन का उपयोग शुरू किया है, जिससे उनके स्वास्थ्य में सुधार के साथ-साथ आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में भी वृद्धि हुई है। क्षेत्र में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘पैडवुमन’ के नाम से जानते हैं।
मंत्री बुलू चिक बराइक ने कहा कि प्रीति मिंज जैसी महिलाएं समाज की वास्तविक शक्ति हैं। दूरदराज के चाय बागान क्षेत्रों में मासिक धर्म स्वास्थ्य को लेकर उन्होंने जो जनजागरण आंदोलन खड़ा किया है, वह पूरे राज्य के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है।
सम्मान प्राप्त करने के बाद भावुक प्रीति मिंज ने मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने कभी पुरस्कार या पहचान की उम्मीद से यह कार्य शुरू नहीं किया था। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि उनकी बहनें बिना किसी शर्म या डर के अपने स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनकी जिम्मेदारी को और बढ़ाता है।
सूत्रों के अनुसार, उनके नि:स्वार्थ कार्य की जानकारी राज्य सचिवालय ‘नवान्न’ तक पहुंचने के बाद विशेष रूप से यह सम्मान प्रदान किया गया। इससे पहले भी विभिन्न स्वैच्छिक संगठनों और सामाजिक समूहों द्वारा उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
महाशिवरात्रि विशेष : यहां मौजूद हैं शक्तिशाली कृतिवासेश्वर महादेव
सृष्टि की उत्पत्ति और संहार के अधिपति भगवान शिव को माना जाता है। स्वभाव से भोलेनाथ भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं, तो क्रोध आने पर संहारक रूप धारण करते हैं। आस्था के प्रमुख केंद्र वाराणसी में महादेव के असंख्य स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन इसी पवित्र नगरी में एक ऐसा स्थल भी है, जहां आज तक शिव को उनका पारंपरिक स्थान पूरी तरह वापस नहीं मिल सका है। हम बात कर रहे हैं काशी के प्राचीन और शक्तिशाली मंदिरों में गिने जाने वाले कृतिवासेश्वर महादेव की। वर्तमान में यह स्थल ऐसी स्थिति में है कि बाबा खुले आसमान के नीचे विराजमान रहने को विवश बताए जाते हैं। यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और विवादित पृष्ठभूमि के कारण भी लंबे समय से चर्चा में रहा है। कृतिवासेश्वर महादेव को काशी के अत्यंत प्राचीन शिवालयों में माना जाता है। मान्यता है कि यह वही स्थान है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है। पुराणों के अनुसार, यहीं भगवान शिव ने एक राक्षस का वध कर उसकी चर्म को अपना वस्त्र धारण किया था। इसी कारण उन्हें कृतिवासेश्वर नाम से जाना गया।
वर्तमान में कृतिवासेश्वर महादेव का स्वरूप वाराणसी स्थित आलमगीर मस्जिद के पीछे वाले हिस्से में स्थित है। विवादित स्थिति के कारण यहां दर्शन-पूजन की व्यवस्था सामान्य मंदिरों की तरह सुगम नहीं है। परिणामस्वरूप बहुत कम श्रद्धालुओं को यहां नियमित रूप से दर्शन का अवसर मिल पाता है।
स्कंद पुराण में मौजूद पौराणिक कथा की मानें तो गजासुर नाम का एक असुर था, जिसने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या करके अपार शक्ति प्राप्त कर ली और काशी के देवताओं और भक्तों सहित तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया। गजासुर के अत्याचारों का अंत करने के लिए भगवान शिव स्वयं पृथ्वी पर आए और भीषण युद्ध के बाद त्रिशूल पर लटकाकर उस राक्षस का वध कर दिया। लेकिन भगवान शिव ने गजासुर की विनम्र प्रार्थना को स्वीकार कर लिया और उसकी चर्म को उसके चारों ओर लपेटकर शिवलिंग का रूप धारण कर लिया, जिसकी आज कृतिवासेश्वर महादेव के रूप में पूजा की जाती है।
इतना ही नहीं, कृतिवासेश्वर महादेव की गिनती काशी के 14 शक्तिशाली मंदिरों में होती है। स्कंद पुराण में मंदिर का जिक्र करते हुए बताया गया है कि ये शिवलिंग भगवान शिव का मस्तक है। भगवान शिव का मस्तक होने की वजह से एक समय मंदिर की ख्याति बहुत थी, लेकिन आक्रमणकारियों के आने के बाद मंदिर को खंडित करने का काम किया और प्राचीन शिवलिंग को तोड़ा गया। मंदिर की आस्था और भगवान शिव के आशीर्वाद को बरकरार रखने के लिए हिंदू समुदाय के लोगों ने एक नए शिवलिंग की स्थापना की, जिसकी पूजा आज तक होती आ रही है।
सावन और महाशिवरात्रि के मौके पर कृतिवासेश्वर महादेव का अद्भुत शृंगार होता है, लेकिन वहां तक पहुंचने वाले भक्तों की संख्या बहुत कम है। मंदिर के स्थान को वापस पाने के लिए कोर्ट में मामला लंबित है, और यही वजह है कि बहुत कम ही भक्त मंदिर तक पहुंच पाते हैं।
महाशिवारात्रि विशेष : पाताल लोक से जुड़े हैं बाबा दुग्धेश्वर महादेव
–स्पर्श मात्र से मिलती है कष्टों से मुक्ति
15 फरवरी को देशभर के शिव मंदिरों में महाशिवरात्रि का त्योहार पूरे उत्साह से मनाया जाने वाला है और उसके लिए तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसी कड़ी में हम आपके लिए ऐसे शिव मंदिर की जानकारी लेकर आए हैं जिसकी उत्पत्ति गाय के दूध से हुई है और इस अद्भुत शिवलिंग की जड़ें पाताल लोक से जुड़ी हैं। खास बात ये है कि मंदिर सिर्फ अध्यात्म का केंद्र नहीं बल्कि राजनीति से भी जुड़ा है। हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं, उसका नाम है दुग्धेश्वर महादेव मंदिर, जो कि उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर कस्बे में बना है। मंदिर हजारों साल पुराना बताया जाता है और मंदिर को लेकर भक्तों की मान्यता भी उतनी ही मजबूत है। माना जाता है कि दुग्धेश्वर महादेव के स्पर्श दर्शन और दूध अर्पित करने से जीवन के सारे कष्ट मिल जाते हैं और शारीरिक रोगों से भी मुक्ति मिलती है, लेकिन खास बात ये है कि मंदिर के गर्भगृह में मौजूद ये शिवलिंग अनोखा है क्योंकि उसका आकार बाकी शिवलिंग से बिल्कुल अलग है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग दिखने में खंडित चट्टान की तरह दिखते हैं और इस रूप को चंडलिंग अवतार माना जाता है। इसका कनेक्शन उज्जैन के महाकाल से है। माना जाता है कि दुग्धेश्वर महादेव बाबा महाकाल के उप-रूप हैं, जिनके दर्शन करने से ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने जितना ही पुण्य मिलता है। इसलिए जो भक्त बाबा के दर्शन के लिए उज्जैन नहीं जा पाते हैं, वे देवरिया के दुग्धेश्वर महादेव के दर्शन जरूर करते हैं।
18 एकड़ में बने दुग्धेश्वर महादेव के दर्शन करना भी आसान नहीं है क्योंकि महादेव जमीन से नीचे की तरफ 15 फीट पर स्थिति हैं और उनके दर्शन के लिए सीढ़ियों से नीचे उतकर जाना होता है। जमीन से नीचे की तरफ स्थापित होने की वजह से दुग्धेश्वर महादेव को पाताल का राजा कहा जाता है। माना जाता है कि शिवलिंग की जड़ें पाताल लोक से जुड़ी हैं।
मंदिर की पौराणिक कथा भी बहुत अद्भुत है। कहा जाता है कि सालों पहले एक गोपालक की गाय इसी स्थान पर आकर रोजाना दूध देती थी। जब गोपालक ने गाय का पीछा किया तो पता चला कि इस जगह पर वो दूध देती है, वहां दिव्य शक्ति स्थापित है। बाद में उसी स्थान पर स्वयंभू दुग्धेश्वर महादेव प्रकट हुए। उसी दिन से बाबा पर दूध चढ़ाने की परंपरा चली आई है।
शिवरात्रि, महाशिवरात्रि और सावन के महीने में मंदिर में मेले का आयोजन होता है और बड़ी संख्या में भक्त बाबा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर बाबा का विशेष शृंगार होता है और भक्त मनोकामना पूर्ति के लिए बाबा पर गाय का शुद्ध दूध अर्पित करते हैं।
चंद्रयान 4 के लिए इसरो ने चांद पर खोजी सुरक्षित लैंडिंग की जगह
नयी दिल्ली । भारत के चंद्रयान-4 मिशन के लिए इसरो ने चंद्रमा की सतह पर उस जगह की पहचान कर ली है, जहां विक्रम लैंडर सुरक्षित उतर सकता है। यह इलाका चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में है। चंद्रयान-4 मिशन में अभी करीब दो साल की देर है, लेकिन यह भारत का अबतक का सबसे जटिल चंद्रमा मिशन है, क्योंकि इसकी डिजाइनिंग ऐसे की जा रही है, ताकि यह चंद्रमा की सतह से सैंपल लेकर सुरक्षित धरती पर वापस लौट सके। इसरो चेयरमैन वी नारायणन ने पहले कहा था, ‘चंद्रयान-4 के लिए हम 2028 का लक्ष्य रख रहे हैं।’ एक रिपोर्ट के अनुसार इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के शोधकर्ताओं ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर पर लगे कैमरों से ली गई हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरों के विस्तृत विश्लेषण के बाद इस जगह की पहचान की है। यह क्षेत्र चंद्रमा के मोंस माउटन पर्वत के पास है और अभी इसे इस मिशन के लिए सबसे सुरक्षित स्थान माना जा रहा है। चंद्रयान-4 मिशन के लिए चांद पर जिस जगह की पहचान की गई है, वह लगभग 1 वर्ग किलोमीटर में फैला हुई है और लैंडिंग के लिए इसे अभी तक सबसे सुरक्षित जगह माना जा रहा है। यह अपेक्षाकृत समतल जगह है, जिससे लैंडर के लिए यहां लैंडिंग आसान हो सकती है। लैंडिंग साइट की पहचान इस तरह के मिशन के लिए सबसे कठिन और चुनौतिपूर्ण टास्क होता है। इसरो के वैज्ञानिकों ने इसके लिए बहुत ही कड़े मानदंड बना रखे हैं। मसलन, सतह की ढलान 10 डिग्री से कम होनी चाहिए, वहां बड़े चट्टान न के बराबर हों, 11-12 दिनों तक सूरज की रोशनी लगातार मिलती रहे,क्रेटर भी कम से कम हों और पृथ्वी से सीधा रेडियो संवाद सुनिश्चित करना भी आसान हो।
चंद्रयान-4 मिशन भारत का सबसे कठिन चंद्रमा मिशन माना जा रहा है। इसमें प्रोपल्शन मॉड्यूल, डिसेंडर, एसेंडर, ट्रांसफर मॉड्यूल और री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे। योजना के अनुसार चंद्रमा की सतह पर विक्रम लैंडर उतरेगा और प्रज्ञान रोवर की तरह ही रोबोटिक सिस्टम से सैंपल जुटाए जाएंगे। फिर इस सैंपल को एसेंडर मॉड्यूल के माध्यम से चंद्रमा की कक्षा में लाया जाएगा और फिर उसे री-एंट्री मॉड्यूल से वापस पृथ्वी तक लाया जाएगा।
अब गेंद लैंडिंग सेलेक्शन कमेटी के पाले में है, जिसकी मंजूरी के बाद चंद्रमा का यह क्षेत्र भारत के पहले लूनर सैंपल रिटर्न मिशन का तय ठिकाना बन जाएगा। चंद्रयान-4 मिशन की सफलता भारत को दुनिया के उन चुनिंदा ताकतों में शामिल कर सकता है, जो चांद से सैंपल लेकर पृथ्वी पर लौटने में कामयाब रहे हैं। इनमें अमेरिका, रूस (यूएसएसआर) और चीन शामिल हैं।
आरबीआई लघु व सूक्ष्म उद्यमों को देगा 20 लाख तक का कोलैटरल फ्री लोन
मुंबई । देश में अब सूक्ष्म और लघु उद्यम (एमएसई) को 20 लाख रुपए तक का कोलैटरल फ्री लोन (बिना कुछ गिरवी रखकर लोन लेना) मिलेगा। यह जानकारी आरबीआई की ओर से सोमवार को जारी सर्कुलर में दी गई। आरबीआई द्वारा जारी सर्कुलर में कहा गया कि भारतीय रिजर्व बैंक ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को लोन देने संबंधी (संशोधन) निर्देश, 2026 जारी किए हैं। ये संशोधन निर्देश सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र को लोन देने संबंधी मुख्य दिशा-निर्देश (दिनांक 23 जुलाई, 2025 तक अपडेटेड) के कुछ प्रावधानों में बदलाव करते हैं। सर्कुलर में आगे कहा गया कि इस संशोधन के बाद सूक्ष्म और लघु उद्यम (एमएसई) बिना कुछ गिरवी रखकर 20 लाख रुपए तक का लोन ले सकते हैं। इसके अलावा कुछ नियामक बदलावों के अनुरूप कुछ संशोधनों को अलग से अधिसूचित किया जाएगा। केंद्रीय बैंक ने बताया कि यह संशोधित निर्देश एक अप्रैल 2026 से लागू होंगे।
आरबीआई ने आगे बताया कि इन निर्देशों का उद्देश्य सीमित परिसंपत्तियों वाले सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए अंतिम छोर तक लोन वितरण को मजबूत करना है, जिससे वह आसानी से लोन ले पाएं। सरकार लगातार एमएसएमई उद्योगों को मदद करने के लिए कदम उठा रही है। बीते महीने सरकार ने डाक चैनल के माध्यम से होने वाले निर्यात को निर्यात लाभों से जोड़ दिया है। इससे उन छोटे उद्योगों को फायदा होगा, जो कि निर्यात करने के लिए डाक चैनलों का इस्तेमाल करते हैं। संचार मंत्रालय ने बयान में कहा, “डाक विभाग (डीओपी) ने केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) द्वारा जारी अधिसूचनाओं का पालन करते हुए डाक चैनल के माध्यम से किए गए निर्यातों के लिए शुल्क वापसी, निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों में छूट (आरओडीटीईपी) तथा राज्य और केंद्रीय करों एवं शुल्कों पर छूट (आरओएससीटीएल) जैसे निर्यात लाभों को 15 जनवरी, 2025 से लागू कर दिया है।”




