Friday, March 13, 2026
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राज्य में सिविल सेवा के 140 पदों पर होगी नियुक्ति, अधिसूचना जारी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश सरकार ने डब्ल्यूबीसीएस (पश्चिम बंगाल सिविल सेवा) अधिकारियों को बड़ी सौगात दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अधिकारियों से किया गया अपना वादा निभाते हुए राज्य में कुल 140 अतिरिक्त पदों के सृजन को मंजूरी दी है। इस संबंध में बुधवार को नवान्न से आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। राज्य के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव ने “राज्यपाल के आदेशानुसार” जारी अधिसूचना में बताया कि इस फैसले के तहत विशेष सचिव स्तर के 40 नए पद और संयुक्त सचिव स्तर के 100 नए पद बनाए गए हैं। नवान्न सूत्रों के अनुसार, इस निर्णय से डब्ल्यूबीसीएस (कार्यपालिका) अधिकारियों के एक बड़े वर्ग को पदोन्नति और वरिष्ठ प्रशासनिक जिम्मेदारियां मिलने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से अधिकारी संगठन अतिरिक्त पदों के सृजन की मांग कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि, डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर अपनी मांग रखी थी, जिस पर मुख्यमंत्री ने लिखित रूप से आश्वासन दिया था। विधानसभा चुनाव से पहले इस आश्वासन के अमल में आने को प्रशासनिक हलकों में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि वरिष्ठ पदों की संख्या बढ़ने से राज्य के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती मिलेगी और अनुभवी अधिकारियों की सेवाओं का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।

मकर संक्रान्ति पर आयोजित हुई अंतरंग काव्य गोष्ठी

कोलकाता। साहित्य और संस्कृति की राजधानी कही जाने वाली कोलकाता नगरी में यूं तो संस्थाओं की कमी नहीं है जो नियमित कार्यक्रम करवाती रहती हैं, इसके अलावा कुछ ऐसे साहित्य प्रेमी भी रहे हैं जो अपने आवास पर इस तरह के आयोजन चुनिंदा साहित्यकारों को लेकर किया करते थे। इधर हाल के वर्षों में रचनाकार के संस्थापक सुरेश चौधरी अपने आवास पर ऐसे आयोजन करते रहते हैं। उर्वशी श्रीवास्तव ने सबसे पहले अपने बचपन से लेकर अब तक के साहित्यिक सफर पर चर्चा की और फिर काव्य की रसधार में सभी ने मकर स्नान किया, जिसमें शामिल रहे- सर्वश्री प्रमोद शाह नफ़ीस, सुरेश चौधरी, विमला पोद्दार,रावेल पुष्प, मृदुला कोठारी, वसुंधरा मिश्रा,रचना सरन अन्य। इस तरह के अंतरंग आयोजन ने मकर संक्रान्ति को यादगार बना दिया।

पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी में पुस्तक मित्र कार्यक्रम

कोलकाता । पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी, सूचना एवं संस्कृति विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार के तत्वाधान में शुक्रवार 16 जनवरी 2025 को “पुस्तक मित्र” कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। पुस्तक मित्र श्रृंखला की यह पंचम कड़ी थी जिसकी चयनित पुस्तक थी प्रसिद्ध कवि, लेखक और विचारक सुरेश चौधरी ‘इन्दु’ जी का शोधपरक संकलन “भ्रम और भ्रांतियाँ”।इस पुस्तक में अनेक ऐसी हिंदू परंपराओं, जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अंधविश्वास कहकर नकार देते हैं, उनसे संबंधित वैज्ञानिक तर्कों की व्याख्या और वर्षों से प्रसारित मिथकों की सत्यता भी आँकडों के साथ स्थापित की गई है।
पाठकों में पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा जागृत करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई इस श्रृंखला का संयोजन और संचालन अकादमी की सदस्य रचना सरन और शुभा चूड़ीवाल करती हैं।
रचना सरन ने सभी अतिथियों का स्वागत कर कार्यक्रम प्रारम्भ किया। शुभा चूड़ीवाल ने विशेषज्ञों और लेखक का परिचय देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट की। अकादमी के वरिष्ठ सदस्य रावेल पुष्प जी ने उत्तरीय और माला प्रदान कर अतिथियों का अभिनन्दन किया। कवि आलोक चौधरी ने सुरेश चौधरी जी द्वारा रचित जगदम्बा स्तुति प्रस्तुत की। डॉ. शिप्रा मिश्रा जी ,मीतू कनोडिया जी और प्रणति ठाकुर जी ने पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण अंशों का पाठ किया। विशेषज्ञ के रूप में डॉक्टर वसुंधरा मिश्र जी और डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय जी उपस्थित थीं। डॉ वसुंधरा मिश्रा ने कहा कि यदि हम सहस्त्र वर्षों की परंपराओं को सही तरीके से समझते, तो दृश्य भिन्न होता।संपूर्ण वांग्मय को गलत धारणाओं पर रखा गया है।पुस्तक के सभी अध्यायों पर उन्होंने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की बातें लिखना एक लेखक के लिए यह चुनौती भरा कार्य है । अपनी बात रखते हुए डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि इतिहास में उतना सत्य नहीं होता जितना साहित्य में क्योंकि इतिहास लिखवाया जाता है और साहित्य स्वयं लिखा जाता है। उन्होंने इस पुस्तक को समसामयिक मुद्दों के चिंतन -अचिंतन की गंभीर नोटबुक बताया और कहा कि यह पुस्तक भारतीयता की खोज है। लेखक सुरेश चौधरी ने अकादमी के प्रति आभार प्रकट करते हुए बताया कि इस पुस्तक को लिखने के लिए उन्होंने 7वर्ष तक शोध तथा तथ्यों की पुनः पुष्टि की। उन्होंने पुस्तक में संकलित तथ्यों के संदर्भों के बारे में भी जानकारी दी। दर्शकों ने बहुत रुचि के साथ इस कार्यक्रम को सुना और अपनी जिज्ञासाओं को लेखक के समक्ष रखा। उनके प्रश्नों का सुरेश चौधरी ने विस्तार से जवाब दिया। कार्यक्रम के अंत में रावेल पुष्प सर ने धन्यवाद ज्ञापित करके आने वाले कार्यक्रमों की घोषणा की। हिंदी अकादमी की इस अनोखी साहित्यिक श्रृंखला को सभी ने सराहा।

संवेदना से समाज की यात्रा है कविता कोठारी का काव्य संग्रह ‘प्रयाण’

डॉ वसुंधरा मिश्र, हिंदी प्राध्यापिका, लेखिका, कवयित्री, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता

विद्वानों का मानना है कि मानव हृदय अनंत रूपात्मक जगत के नाना रूपों और व्यापारों में भटकता रहता है लेकिन जब मनुष्य अहं की भावना का परित्याग करता है तो वहाँ विशुद्ध अनुभूति रह जाती है। तब वह मुक्त हृदय रह जाता है ।हृदय की इस मुक्ति साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं। कहा गया है – कवि परिभूः स्वयंभू – कविता में सत्य शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। अनुभूति और अभिव्यक्ति इन दो आधार पर कविता टिकी होती है।

‘प्रयाण ‘केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि एक यात्रा है—संवेदना से समाज तक, शब्दों से मौन तक, और अनुभव से आत्मा तक। यह संग्रह उन भावनाओं को स्वर देता है, जो अक्सर हमारी भाषा में नहीं आ पातीं, लेकिन भीतर कहीं गहराई से हमें छूती हैं।

इस संग्रह की कविताएं निजी भी हैं और सामाजिक भी। कवयित्री इन दोनों के बीच की उस महीन रेखा पर खड़ी हैं, जहाँ एक स्त्री, एक मानव और एक संवेदनशील आत्मा अपने समय, समाज और अपने अंतर्मन से संवाद करती है। कुछ कविताएं सामाजिक विडंबनाओं पर टिप्पणी करती हैं, वहीं कुछ कविताएं पाठक के भीतर गूंज बनकर उतरती हैं—बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाती हैं।
यह संग्रह उन सभी पाठकों के लिए अनमोल है जो कविता को केवल पंक्तियों में नहीं, भावनाओं और परिवर्तन की प्रक्रिया में महसूस करना चाहते हैं। एक ऐसा साहित्यिक प्रयास है जो वर्तमान समय में सामाजिक यथार्थ और स्त्री-मन की जटिलताओं को सशक्त रूप में प्रस्तुत करता है। यह संग्रह आधुनिक हिंदी कविता में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो एक शिक्षिका अपने बच्चों को सीख देते हुए उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाने के सपने देखती है।

विषयवस्तु की दृष्टि से देखा जाए तो वहां विविधता है—ध्यान योग, आत्म विश्वास, संकल्प, आत्मनिर्भरता की आकांक्षा, स्त्री अस्मिता की खोज, और सामाजिक चुप्पियों के विरुद्ध एक सशक्त स्वर। लेखिका की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह प्रत्येक कविता में पाठक को संवेदना से जोड़ने में सफल होती हैं। कहीं शब्दों के माध्यम से तो कहीं मौन के माध्यम से कविताएं में भाषा सौष्ठव, शिल्प कला और संवादात्मक प्रभाव है। यह शैली इस बात का प्रमाण है कि लेखक संवेदना को सहजता से बरतने में विश्वास रखती हैं, दिखावे से नहीं।उनकी कविताओं में दो आसमां(Pg-19) कविता समाज में व्याप्त असमानता को दर्शाती है , मनभावन सावन (पृष्ठ 42) में प्रकृति चित्रण और शिक्षक जीवन (पृष्ठ 52) में एक शिक्षिका होने के कारण शिक्षक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण लक्षित है, रंगमंच (पृष्ठ 89) में आध्यात्मिक स्वर आदि कविताएं पठनीय और प्रेरणादायक हैं ।’मनभावन सावन’ में कवयित्री के भावों को समझा जा सकता है जहांँ शब्दों की झनकार और प्रकृति का उल्लास उमड़ रहा है। वे कहती हैं – –
‘आया मनभावन सावन हर्षित धरती अंबर
तज जीर्ण पुरातन वसन नव नूतन परिधान किया धारण
सुंदर मनमोहक आनन खिला-खिला है नव यौवन
औढ़ धानी चूनर धरा करती श्रृंगार स्निग्ध मनोरम।
हाथों पर हरित हिना पुलकित गात हर्षे हिया
शोभित सकल कानन उपवन चहुदिश फैली हरीतिमा
झूमे श्यामल घनघोर घटा उतरे रिमझिम बैरन बदरा
होगा प्रिय से पुनर्मिलन दर्शन को तरसे अखियां। ‘
हमें ऐसे साहित्य को न केवल पढ़ना चाहिए, बल्कि उसका समर्थन भी करना चाहिए, ताकि संवेदना और सामाजिक चेतना की यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।
कविता कोठारी द्वारा रचित ‘प्रयाण ‘काव्य संग्रह लिंक जॉन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित स्वरचित कविताओं का संग्रह है। 2025 में आए इस कविता संग्रह में कवयित्री कविता कोठारी का शब्दों का वह अंत: सफर है जिसमें उनके अविस्मरणीय अनुभव, एहसास और उनकी व्यक्तिगत सोच है ।उनकी चिंतन धारा में पिरोई शब्दों की मणिमला है जिसकी एक एक कविता रत्न जटित मणियाँ हैं ।
प्रयाण की 80 कविताओं में विविध रंगों के भाव और अनुभव हैं । सभी कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है मानो बहुत दिनों बाद एक परिष्कृत हिंदी भाषा की कविताओं को पढ़ने का शुभ अवसर मिला।
आध्यात्मिक भाव और साथ में समसामयिक विषयों पर अपने शब्दों को भाव देते हुए कवयित्री बहुत ही सजग और चेतनता से परिपूर्ण है।
इन कविताओं की यात्रा का उद्देश्य है ‘व्यष्टि से समष्टि’ की ओर जाने का, सच्चिदानंद को प्राप्त करना। हमारा देश महावीर ,बुद्ध ,विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि महापुरुषों का का देश रहा है जहाँ विभिन्न विचारों और विचारधाराओं का मंथन होता आया है और
सात्विक अतः चेतना ,आध्यात्मिकता और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को महत्व दिया गया है ।इस सात्विक राह में मनुष्य शरीर भी अपनी शक्तियों को केंद्रित कर आत्मोद्धार करने में सक्षम हो सकता है, रचनाओं की ऐसी विशिष्टता दिखाई पड़ती है।
गीता में भी कहा गया है ‘आत्मैव ह्यात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरा- त्मन:’ (गीता अध्याय 6 ,श्लोक 5 ) अर्थात् मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु, जो व्यक्ति अंतरात्मा में ही सुख वाला होगा, आत्मा में ही रमन करने वाला होगा और जो आत्मा में ही ज्ञान वाला होता है, वह सच्चिदानंद परमात्मा के साथ एकाकी भाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त करता है ।(गीता अध्याय 5 , श्लोक 24 )
‘प्रयाण’ की कविताएं एक ऐसी उर्ध्वमुखी जीवन की कला से जुड़ी हुई है जो एक श्रेष्ठ और सुसंस्कृत नागरिक की रचना करने का संदेश देती है। बुद्ध ने कहा था ‘अप्प दीपो भव’ अपने दीपक स्वयं बनो ,अपने प्रकाश स्वयं बनो। व्यक्ति अपने ज्ञान और आंतरिक शक्ति से प्रकाशित हो सकता है ।
दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं ही अपना मार्गदर्शक और प्रकाश स्तंभ बन सकता है। आत्मनिर्भरता और आत्मज्ञान से परिपूर्ण कविताएं हैं जिन्हें पढ़कर पाठक अपने भीतर छिपी हुई क्षमता को उभार सकता है।
‘आओ बात करें’ कविता में कवयित्री कहती है-‘ एकांत और मौन से खोज लाएं ‘ मन की खुशी को ढूंढा जा सकता है।
कविता कोठारी एक मनोचिकित्सक भी हैं जो समाज के लोग जो मानसिक तनाव,चिंता आदि के शिकार हो रहे हैं ऐसे लोगों की कौंसिलिंग भी करती हैं।
वर्तमान में बच्चे, युवा, बूढ़े और महिलाओं की मानसिक स्थितियों में परिवर्तन आया है जिससे एकाकीपन,अवसाद और तनाव भरी जिंदगी से जुड़ी समस्या का हल भी बताती हैं।यह हल व्यक्ति के भीतर ही छिपा है।
बतौर शिक्षिका कविता कोठारी का आदेश इन कविताओं में कहीं न कहीं दिखाई पड़ ही जाता है।
‘मुक्ति का आह्वान'( पृष्ठ 40 )में–
‘स्व के दायरे से निकल
दे आहुति परमार्थ यज्ञ’ (पृष्ठ 40)।
‘सतयुग लौटा लाना है अब'( पृष्ठ 40)
कवयित्री ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, विश्वास घात, षड्यंत्र के बढ़ते प्रकोप से दुखित है। छल- कपट की इस राह पर चलकर मनुष्य अपनी कब्र खुद खोद रहा है और रसातल में जा रहा है( पृष्ठ 39)।
‘प्रयाण ‘का अर्थ ही है यात्रा शुरू करना ,आगे बढ़ना और यह आगे बढ़ाने की गति का प्रतीक है। उत्कृष्ट बुद्धि ,चमक और तरक्की का प्रतीक है ।ऐसा प्रयत्न जो सकारात्मक प्रगति के लिए इस्तेमाल होता है ।हिंदू दर्शन में आत्मा की यात्रा या उसके अंत को भी प्रयाण कहा जाता है लेकिन कवयित्री आशावादी है और सकारात्मक ऊर्जा के लिए प्रयाण का उपयोग किया गया है।
व्यक्तियों के अंतःकरण में जो समाज चेतना है उसी चेतना के धरातल पर ही विभिन्न अनुभूतियांं व्यक्ति के अंतःकरण का धर्म होकर समाज का धर्म बन जाती है।
कवयित्री की कविता का आरंभ ही हुआ है ‘सुसंस्कार’ शीर्षक से जो उनके भावों की यात्रा को सुनिश्चित कर देती है ।उनका कहना है कि –
अनुशासित ,संयमित जीवन,
सफलता का है अचूक मंत्र …
करुणा और विनम्रता से होगा
उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण (पृष्ठ 11 -12)

कवयित्री कविता कोठारी एक सजग और चेतनता से पूर्ण शिक्षिका रही हैं। अपनी प्रकृति के अनुरूप उनकी कविताएं अपना आकार लेती हैं। आपकी कविताओं को नैतिक ,सामाजिक और आध्यात्मिक एवं भाषा शिल्प सौष्ठव की दृष्टि से देखा जा सकता है।
सुंदरता को रेखांकित करते हुए बहुत ही अच्छा संदेश देती हैं– सुंदरता की परिभाषा में—
बाह्य सौंदर्य होता भ्रामक ..
वास्तविक सौंदर्य है प्राण तत्व
सत्य शिव और सुंदर जीवन धारा
उम्र छलावा (पृष्ठ 13 )
‘न खोओ परमार्थ में ‘अहंकार, आलस्य, विषय विलास, परनिंदा आदि कलुषित विचारों से दूर एक आत्मा शुद्ध व्यक्ति की मांग करती हैं।
अंतर चक्षु, अंतर सफर, यादों से मुलाकात, परमार्थ आदि कविताएं ध्यान और अपने व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक कविताएं हैं।
कविता ‘आओ बात करें’ (पृष्ठ60 ) में उनकी यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है — जहां कवियत्री ‘सकारात्मक ऊर्जा ,आत्म शक्ति से भर लें’ कह कर मानो अपनी सभी कविताओं का सार कह देती है। ‘ध्यान योग’ पर जोर देखकर अपने ही अंदर के आनंद को खोजने की बात करती है।
उनकी कविताओं में मुक्ताकाश, गर्भ संस्कार ,मुझसे ही मेरा जन्म हुआ, जीवन का आधार विश्वास ,चलो लौट चलें, विकृत दर्पण और संबंध नहीं ,स्वधर्म है मां आदि कविताएं भावों को व्यक्त करने वाली और पठनीय कविताएँ भी हैं।
भाषा में छायावादी पुट और विशुद्ध हिंदी की रचनात्मक झलकियाँ दिखाई पड़ती हैं । जीवन जीने की कला सिखाती इन कविताओं में जैन धर्म, बौद्ध धर्म और भगवद्गीता की बहुत सी बातें परिलक्षित होती हैं।

क्विक कॉमर्स की दस मिनट वाली डिलिवरी पर लगी सरकारी रोक

– ब्लिंकिट ने हटाई 10 मिनट की डिलीवरी
नयी दिल्ली । सरकार ने क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म की 10 मिनट की डिलीवरी पर रोक लगा दी है। इस जेप्टो, ब्लिंकिट, स्विगी आदि जैसे प्लेटफार्म 10 मिनट में डिलीवरी नहीं दे पाएंगे। श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने इस सर्विस पर रोक लगाई। यह मामला हैदराबाद में सड़क हादसे में जान गंवाने वाले एक शख्स की मौत से जुड़ा है। जेप्टो ने उस शख्स को अपना कर्मचारी नहीं बताया था। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने प्रमुख डिलीवरी एग्रीगेटर्स के साथ इस मामले में बात की। अंत में उन्होंने 10 मिनट की डिलीवरी की समय सीमा को हटाने के लिए राजी कर लिया। डिलीवरी की समय सीमा से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए ब्लिंकिट, जेप्टो, जोमैटो और स्विगी सहित प्रमुख प्लेटफार्मों के साथ एक बैठक आयोजित की गई थी। सूत्रों के अनुसार, ब्लिंकिट ने पहले ही निर्देश पर कार्रवाई की है और अपनी ब्रांडिंग से 10 मिनट की डिलीवरी का वादा हटा दिया है। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में अन्य एग्रीगेटर भी इसी राह पर चलेंगे। इस कदम का उद्देश्य गिग वर्कर्स (अस्थायी या फ्रीलांस काम करने वाले) की सुरक्षा, संरक्षा और काम करने की बेहतर स्थिति सुनिश्चित करना है। हाल के संसद सत्र में आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने भारत के गिग वर्कर्स की परेशानियों के बारे में आवाज उठाई थी। उन्होंने क्विक कॉमर्स और अन्य ऐप-आधारित डिलीवरी और सेवा व्यवसायों के लिए नियमों की मांग की थी। साथ ही गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा लाभों की आवश्यकता पर जोर दिया था। संसद में अपने हस्तक्षेप में राज्यसभा सदस्य ने गिग वर्कर्स के लिए गरिमा, सुरक्षा और उचित वेतन की मांग की।

वयोवृद्धों के लिए बिहार में आसान हुई जमीन व फ्लैट की रजिस्ट्री

पटना। बिहार में 80 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों को बड़ी राहत देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जमीन और फ्लैट की रजिस्ट्री प्रक्रिया को आसान बनाने के निर्देश जारी किए हैं। अब वृद्धजनों को घर बैठे निबंधन की सुविधा मिलेगी, जिससे उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर जानकारी दी कि सात निश्चय-3 के सातवें निश्चय ‘सबका सम्मान–जीवन आसान’ के तहत 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों के लिए जमीन और फ्लैट के निबंधन की प्रक्रिया को सरल किया जा रहा है। इसके तहत अब घर पर ही निबंधन से जुड़ी सभी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि अक्सर यह देखा गया है कि 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृद्धजनों को जमीन या फ्लैट की रजिस्ट्री से जुड़े कार्यों के निष्पादन में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग द्वारा चलंत निबंधन इकाई के माध्यम से निश्चित समय-सीमा के भीतर घर पर ही दस्तावेजों के निबंधन की सुविधा प्रदान की जाएगी। इसके लिए आवेदक ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। मुख्यमंत्री ने बताया कि इन सभी व्यवस्थाओं को 01 अप्रैल 2026 से लागू करने का निर्देश संबंधित विभागों के अधिकारियों को दिया गया है।

कुत्तों से कटवाया तो हरजाना भरेंगी राज्य सरकारें : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि अगर कुत्तों के काटने से किसी बुजुर्ग या बच्चे की मौत होती है तो हम कुछ न करने के लिए राज्य सरकार को जवाबदेह मानते हुए उस पर भारी जुर्माना लगाएंगे। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी। उच्चतम न्यायालय ने आवारा कुत्तों को खुले में खाना खिलाने वालों के रवैये पर सवाल खड़ा करते हुए यह टिप्पणी की। आवारा कुत्तों के मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती लोगों को भी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर लोगों को कुत्तों को खाना खिलाना ही है, तो अपने घर में खिलाइये। उन्हें घर में रखिए। कुत्ते क्यों सड़क पर घूमते रहे, गन्दगी फैलाते रहे या लोगो को काटते रहे। उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि क्या सारे जज़्बात कुत्तों के लिए ही है, इंसानों के लिए नहीं। कोर्ट ने कहा कि अगर 9 साल की बच्ची को आवारा कुत्ते मार डालते हैं, तो इसके लिए किसको जिम्मेदार माना जाए। क्या कुत्तों को खुले में खाना खिलाने के हिमायती संगठन को इसके लिए जिम्मेदार न माना जाए।

49वां कोलकाता पुस्तक मेला 22 जनवरी से

कोलकाता। अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला का 49वां संस्करण आगामी 22 जनवरी से शुरू होने जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोपहर चार बजे मेले का औपचारिक उद्घाटन करेंगी। इस वर्ष मेले का ‘फोकल थीम कंट्री’ दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना होगा। पुस्तक प्रेमियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कोलकाता मेट्रो रेल ने इस बार विशेष प्रबंध किए हैं। हावड़ा से एस्प्लेनेड होते हुए सीधे मेला प्रांगण (करुणामयी/सेंट्रल पार्क) तक पहुंचना अब और भी सुगम होगा। मेट्रो अधिकारियों के अनुसार, मेले के दौरान यात्रियों की संभावित भीड़ को देखते हुए अतिरिक्त ट्रेनें चलाई जाएंगी। पुस्तक मेले की अवधि में रात दस बजे तक मेट्रो सेवा उपलब्ध रहेगी। वहीं, रविवार और अन्य छुट्टियों के दिनों में भी विशेष सेवाएं जारी रहेंगी। इसके अलावा, मेले में मेट्रो का विशेष बूथ लगाया जाएगा, जहां यूपीआई के माध्यम से डिजिटल टिकट खरीदे जा सकेंगे। इस वर्ष के पुस्तक मेले में दुनिया के 20 देशों की सहभागिता होगी और एक हजार से अधिक प्रकाशक एवं प्रतिभागी हिस्सा लेंगे। मेले के कुल नौ प्रवेश द्वारों (तोरण) में से दो तोरण अर्जेंटीना की पारंपरिक वास्तुकला से प्रेरित होकर तैयार किए जा रहे हैं, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होंगे।
मेला आयोजकों ने इस वर्ष बंगाल की साहित्यिक विभूतियों को सम्मानित करने की विशेष पहल की है—
प्रवेश द्वार : हाल ही में दिवंगत साहित्यकार प्रफुल्ल राय और प्रतुल मुखर्जी के नाम पर दो प्रवेश द्वार बनाए जाएंगे।
साहित्यकार शैलजानंद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर एक द्वार उनके नाम समर्पित होगा। लिटिल मैगजीन पवेलियन, कवि राहुल पुरकायस्थ के नाम पर नामकरण।
बाल साहित्य जगत : प्रसिद्ध कलाकार मयूर चौधरी के जन्मशती वर्ष के अवसर पर चिल्ड्रेन पैविलियन (शिशु मंडप) को उनके नाम पर समर्पित किया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय कोलकाता पुस्तक मेला केवल पुस्तकों की खरीद-बिक्री का मंच नहीं, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति का जीवंत उत्सव है।

कलकत्ता हाईकोर्ट के नये चीफ जस्टिस बने सुजय पाल

कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय को नया मुख्य न्यायाधीश मिल गया है। न्यायमूर्ति सुजय पाल को उच्च न्यायालय का प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे लंबे समय से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे। 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक में उनके नाम की सिफारिश को मंजूरी दी गई थी। उल्लेखनीय है कि, कलकत्ता उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी. शिवगणनम सितंबर, 2025 में सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद न्यायमूर्ति सौमेन सेन को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था। बाद में न्यायमूर्ति सेन के नाम की सिफारिश मेघालय उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पद के लिए होने के बाद वे वहां कार्यभार संभालने चले गए। इसके पश्चात न्यायमूर्ति सुजय पाल को कलकत्ता उच्च न्यायालय का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। अब उन्हें पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश के रूप में जिम्मेदारी सौंपी गई है। न्यायमूर्ति सुजय पाल का जन्म और पालन-पोषण मध्य प्रदेश में हुआ। उन्होंने जबलपुर के एक स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबे समय तक अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस की। वर्ष 2011 में उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जहां उन्होंने कई वर्षों तक न्यायिक दायित्वों का निर्वहन किया। जुलाई, 2025 में उनका तबादला कलकत्ता उच्च न्यायालय में किया गया था।

कहानी पूर्वोत्तर की – भाग -6 – उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानी

भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में असम, मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, और सिक्किम जैसे राज्य शामिल हैं जो देश के भौगोलिक और राजनीतिक, प्रशासनिक प्रभाग दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में योगदान की बात करें तो हम हमेशा गांधीजी, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह आदि के केंद्रीय नेतृत्व को याद करते हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता के लिए भारत का संघर्ष एक जन संघर्ष था जिसमे पूर्वोत्तर से किंवदंतियों की भागीदारी भी अहम् थी, लेकिन उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। उत्तर पूर्व भारत के स्वतंत्रता सेनानी-                                     संभुधन फोंगलो – असम के कछार पहाड़ियों में जन्मे वीर संभुधन फोंगलो, भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले प्रमुख दिमासा स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। संभुधन फोंगलो ने उत्तरी कछार पहाड़ियों में व्यापक यात्रा की, जन प्रतिरोध को प्रोत्साहित किया, संपर्क स्थापित किए और अनुयायियों को संगठित किया। वे बड़ी संख्या में युवाओं को भर्ती करने में सफल रहे और उन्होंने एक क्रांतिकारी बल और प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए।                              हाइपौ जादोनांग – मणिपुर के तामेंगलोंग क्षेत्र में जन्मे नागा आध्यात्मिक नेता हाइपो जादोनांग धीरे-धीरे क्रांतिकारी बन गए जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज किस प्रकार नागाओं पर अपना धर्म और जीवनशैली थोप रहे हैं, और उन्होंने महसूस किया कि नागाओं को धर्म परिवर्तन कराने के प्रयास उनकी स्वदेशी आस्था, रीति-रिवाजों और परंपराओं के लिए एक गंभीर खतरा हैं। जादोनांग ने नागा संस्कृति के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए काम किया और अंग्रेजों के साम्राज्यवादी और आध्यात्मिक उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह किया।                                                                            न्गुलखुप हाओकिप – मणिपुर के कुकी मिलिशिया समूह के नेता ने ब्रिटिश सेना के विस्तार के खिलाफ विद्रोह किया और लड़ाई लड़ी। एंग्लो-कुकी युद्ध (1917-19) के बाद अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और इम्फाल और फिर असम ले जाकर कैद कर लिया। न्गुलखुप हाओकिप को कुकी युद्ध नायक कहा जाता है क्योंकि कई बार उन्हें बहला-फुसलाकर आत्मसमर्पण कराने की कोशिशों के बावजूद उन्होंने गिरफ्तारी तक अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया।               वेज़ो स्वुरो –वेज़ो स्वारो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी थे। 16 वर्ष की आयु में उनकी मुलाकात नेताजी से उनके घर के पास हुई। नेताजी का शिविर पास ही था, इसलिए बोस के निमंत्रण पर वे और उनका एक मित्र फावड़े लेकर वहाँ गए। उन्होंने घने बाँस के झुरमुटों में छिपकर शिविर में काम किया और दो बार ब्रिटिश बमबारी से बच निकले। उन्होंने बंकर बनाए और बोस की मदद करने के लिए उत्साहित थे। भाषा की बाधाओं के बावजूद, उन्होंने नेताजी के लिए फल और अन्य सामान इकट्ठा किए। उन्होंने नेताजी को गाँव घुमाया। गाँव ने जापानी और आईएनए सैनिकों को उनके प्रवास के दौरान 300 टन चावल दान में दिए।                                                                                            श्री विसार विश्वंतो अंगामी – श्री विसार विश्वंतो अंगामी, जिन्हें विसार के नाम से भी जाना जाता था, नागालैंड के पहले शिक्षित युवाओं में से एक थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने जापानी सेना और अपने गांव वालों की दुभाषिया और मध्यस्थ के रूप में मदद की। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका के कारण उन्हें अंग्रेजों ने 1944 से 1945 तक कैद में रखा। अप्रैल 1944 में जब जापानी सेना जाखमा गांव पहुंची, तो उन्हें गांव वालों से संवाद करने के लिए एक शिक्षित व्यक्ति की आवश्यकता थी। श्री विसार ने जापानी सेना को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक तस्वीर दिखाई, जिसे देखकर जापानी सेना ने उन्हें ब्रिटिश जासूस समझ लिया। हालांकि, श्री विसार कोहिमा युद्ध के कमान अधिकारी श्री मियासाके से मिलने में सफल रहे। श्री विसार भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) में शामिल हुए और सैनिकों के बीच सम्मान अर्जित किया।मनिराम देवान – वह असम के सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। उन्होंने असम का पहला चाय बगान स्थापित किया था। 1857 के विद्रोह के दौरान उनके खिलाफ साजिश रचने के लिए उन्हें अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।
किआंग नंगबाह – वह मेघालय के एक मात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिनको 30 दिसंबर 1862 को पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में गॉलवे शहर में इवामुसियांग में सार्वजनिक रूप से ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दिया था। 2001 में, भारत सरकार ने पुण्यस्मरण के लिए डाक टिकट जारी किया गया था।
तजी मिडरें – वह भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र के एलोपियन गाँव से थे। उन्होंने ब्रिटिश के अपवित्र विस्तार का विरोध करने के लिए एक मिश्मी नेतृत्व की स्थापना की थी। दिसंबर 1917 में उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ लिया और उसके बाद असम के तेजपुर ले जाया गया, जहां उन्हें फांसी दे दी गई थी।
रानी गाइदिन्ल्यु – वह एक रोंग्मी नागा आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थीं, जिन्होंने ब्रिटिश प्राधिकरण के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध को विद्रोह कर दिया था जिसके कारण उन्हें आजीवन कारावास की सजा हो गयी थी। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें ‘रानी’ की उपाधि दी और उसके बाद वे रानी गाइदिन्ल्यु के नाम से ही मशहूर हो गयी। स्वतंत्रता के बाद, उन्हें रिहा कर दिया गया और बाद में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
कुशल कोंवार – वे असम के निवासी थे और भारत के एक स्वतन्त्रता सेनानी थे जिन्हें भारत छोड़ो आन्दोलन के अन्तिम चरण (1942-43) में अंग्रेजों ने फाँसी दे दी थी।
शूरवीर पसल्था – वह पहले मिज़ो स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1890 में ब्रिटिश प्राधिकरण के अपवित्र विस्तार का विरोध करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया था।
हेम बरुआ (त्यागवीर) – वह असम के सोनितपुर जिले के के एक मात्र स्वतंत्रता सेनानी जिन्हें असम में आधुनिक साहित्यिक आंदोलन के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद, वह समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए और कई बार गुवाहाटी से लोकसभा के लिए चुने गए थे।
यू तिरोत सिंग श्याम – वह 19वीं शताब्दी के खासी लोगों के नेताओं में से एक थे। उन्होंने अपने वंश को सिमीलीह वंश से जोड़ कर खासी लोगों को एक जुट कर दिया था। वह खासी पहाड़ियों का हिस्सा, नोंगखलाव का सिमीम (प्रमुख) थे। उन्होंने खासी पहाड़ियों पर नियंत्रण करने के ब्रिटिश प्रयासों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी पुण्यतिथि (17 जुलाई, 1835) को हर साल मेघालय में राजकीय अवकाश के रूप में मनाया जाता है।
भोगेश्वरी फुकनानी – उनका जन्म असम के नौगांव में हुआ था। भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों से कई महिलाओं को प्रेरित किया और उनमें से एक बड़ा नाम भोगेश्वरी फुकनानी का था. जब क्रांतिकारियों ने बेरहमपुर में अपने कार्यालयों का नियंत्रण वापस ले लिया था, तब उस माहौल में पुलिस ने छापा मार कर आतंक फैला दिया था। उसी समय क्रांतिकारियों की भीड़ ने मार्च करते हुये “वंदे मातरम्” के नारे लगाये। उस भीड़ का नेतृत्व भोगेश्वरी ने किया था। उन्होंने उस वक़्त मौजूद कप्तान को मारा जो क्रांतिकारियों पर हमला करने आए थे। बाद में कप्तान ने उन्हें गोली मार दी और वह जख़्मी हालात में ही चल बसी।
बीर टिकेन्द्र जीत सिंह -वह स्वतन्त्र मणिपुर रियासत के राजकुमार थे। उन्हें वीर टिकेन्द्रजीत और कोइरेंग भी कहते हैं। वे मणिपुरी सेना के कमाण्डर थे। उन्होने ‘महल-क्रान्ति’ की, जिसके फलस्वरूप 1891 में अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध शुरू हुआ। अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर सार्वजनिक रूप से उन्हें फांसी दी थी।
कनकलता बरुआ – उनका जन्म असम में 1924 में हुई थी तथा असम के सबसे महान योद्धाओं में से एक हैं। वह असम से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू की गई स्वतंत्रता पहल के लिए “करो या मरो” अभियान में शामिल हुई थी और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान असम में भारतीय झंडा फेहराने के लिये आगे बढ़ते हुये उनकी मृत्यु हो गई थी।
मातमोर जमोह – वह एक क्रांतिकारी नेता थे जो ब्रिटिश वर्चस्व को पसंद नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने उन ब्रिटिश अधिकारियों को मारना शुरू कर दिया, जो लोगों के जीवन में हस्तक्षेप करते थे।
चेंगजापो कूकी (डोंगल) – उन्हें डूंगेल कबीले के ऐसन के प्रमुख के रूप में जाना जाता है। कई ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वह चेंगजापो कूकी के रूप में लोकप्रिय है। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अधीन भारतीय राष्ट्रीय सेना के सदस्य थे।                                                                                                                                 टोगन नेन्गमिन्ज़ामेघालय के गारो हिल्स क्षेत्र के एक स्वतंत्रता सेनानी, तोगान नेन्गमिन्ज़ा गारो जनजाति से संबंध रखते थे। उन्होंने अपनी मातृभूमि पर कब्जा करने आए ब्रिटिश बलों के सामने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। उनके योद्धाओं के दल ने सोते हुए ब्रिटिश सैनिकों पर हमला किया और शुरुआत में उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया, लेकिन ब्रिटिशों के आधुनिक हथियार गारो योद्धाओं की तलवारों और भालों के सामने टिक नहीं पाए। तोगान नेन्गमिन्ज़ा और उनके दल ने अंतिम व्यक्ति तक लड़ाई लड़ी और ब्रिटिश बलों द्वारा चलाई गई गोलियों की बौछार में शहीद हो गए।                       यू तिरोट सिंग सिएम- मेघालय में खासी पहाड़ियों के नोंघखलाव क्षेत्र के एक सिएम (प्रमुख) यू तिरोट सिंह ने खासी पहाड़ियों पर ब्रिटिश आक्रमण के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। अपनी युद्ध रणनीति, वीरता और ब्रिटिश कब्जे के विरुद्ध खासी क्षेत्र पर अटूट नियंत्रण के लिए उन्हें सम्मानित किया जाता है। यू तिरोट सिंह सिएम 1823 से 1833 तक चले एंग्लो-खासी युद्ध के सबसे साहसी नेताओं में से एक थे। एंग्लो-खासी युद्ध के दौरान, खासी सेना के पास आग्नेयास्त्रों की कमी थी और उनके पास केवल तलवारें, ढालें, धनुष और बाण थे। इसलिए, उन्होंने गुरिल्ला युद्ध का सहारा लिया, जो लगभग चार वर्षों तक चला। तिरोट सिंह को अंततः जनवरी 1833 में अंग्रेजों ने पकड़ लिया और ढाका भेज दिया। उनकी पुण्यतिथि, 17 जुलाई, मेघालय में हर साल राजकीय अवकाश के रूप में मनाई जाती है।                                            शांतिभूषण नाग – शांति भूषण, सूर्य सेन (जिन्हें ‘मास्टर दा’ के नाम से जाना जाता है) नामक विद्रोही समूह से प्रेरित थे, जिन्होंने अंग्रेजों के हथियार भंडार पर छापा मारा था। शांति भूषण उन विद्रोहियों में से एक थे और 1930 के चटगांव शस्त्रागार आंदोलन के प्रमुख योजनाकारों में से एक थे। चटगांव शस्त्रागार पर छापे में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजों के साथ झड़प के दौरान उनके सिर में गोली लगी, लेकिन वे भागने में सफल रहे। सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने के कारण उन्हें 1930 में लंबे समय तक जेल में भी रहना पड़ा। उनके भाई, फणी भूषण, भी स्कूल में पढ़ते समय ही इस आंदोलन में शामिल हो गए थे। उन्हें कोमिला जेल में कैद रखा गया, जहां से उन्हें रिहा कर अगरतला वापस भेज दिया गया।                                                                                                              त्रिपुरा चंद्र सेन – निबारनचंद्र सेन के पुत्र त्रिपुरा चंद्र सेन कद में लंबे, मजबूत और गोरे रंग के थे, जो उन्हें सबसे अलग बनाता था। त्रिपुरा चंद्र ने किशोरावस्था में ही चटग्राम के क्रांतिकारी समूह में शामिल हो गए। उनके आकर्षक व्यक्तित्व और सभी के साथ सहजता से घुलमिल जाने की क्षमता के कारण वे क्रांतिकारी स्वयंसेवी बल के ब्रिगेडियर बन गए। साथी क्रांतिकारियों के साथ, त्रिपुरा चंद्र ने 1930 में शस्त्रागार पर छापे में भाग लिया, जिसके बाद जलालाबाद युद्ध हुआ। यह युद्ध सुरमा घाटी लाइट हॉर्स और पूर्वी सीमांत राइफल्स के खिलाफ था, जिसमें 1500 गोरखा सैनिक शामिल थे। त्रिपुरा चंद्र ने बहादुरी से उनकी स्थिति का बचाव किया, लेकिन दुर्भाग्य से इस दौरान उन्होंने अपनी जान गंवा दी।              त्रिलोचन पोखरेल –पूर्वी सिक्किम क्षेत्र के गांधीवादी त्रिलोचन पोखरेल, जिन्हें ‘वंदे पोखरेल’ के नाम से भी जाना जाता है, महात्मा गांधी और उनके अहिंसा के सिद्धांतों से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने गांधीजी के आंदोलनों जैसे ‘असहयोग आंदोलन’, ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर पोखरेल ने सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर सूती धोती और लकड़ी की खड़ी चप्पलें पहनना शुरू कर दिया। उन्होंने सिक्किम के किसानों के बीच महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन और सविनय अवज्ञा के विचारों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ने वाले पहले सिक्किमी व्यक्ति थे। उन्होंने उत्तरी बंगाल और सिक्किम में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।                                                                            हेलेन लेपचाहेलेन लेपचा, जिन्हें सबित्री देवी के नाम से भी जाना जाता है, गांधीजी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा थीं और स्वदेशी लेपचा समुदाय से थीं। वे 1917 में चरखा और खादी आंदोलन से जुड़ीं। उन्होंने 1920 में बिहार की बाढ़ के दौरान सहायता की और महात्मा गांधी का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने उन्हें साबरमती आश्रम में आमंत्रित किया, जहाँ वे सबित्री देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। पश्चिम बंगाल और बिहार के स्वतंत्रता संग्राम में सबित्री देवी की महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1921 में, उन्होंने कलकत्ता में कोयला खदान श्रमिकों के एक बड़े समूह का नेतृत्व करते हुए एक जुलूस निकाला, जिसमें कई प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भी उपस्थित थे। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को कुर्सियों की नजरबंदी से भागने में मदद की। 1942 में, वे भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय थीं।                                                                        दल बहादुर गिरी –दल बहादुर गिरि, जिन्हें “पहाड़ों का गांधी” भी कहा जाता है, दार्जिलिंग कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने सिक्किम में राजमहल में मुख्य क्लर्क के रूप में काम करते हुए अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 1918 में, उन्होंने कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तीन दिवसीय अधिवेशन में भाग लिया। वहां उनकी मुलाकात महात्मा गांधी और देशबंधु चित्रंजन दास से हुई। अधिवेशन के बाद, वे एक बदले हुए व्यक्तित्व के साथ लौटे। 1921 में, वे स्थानीय रिंक हाउस में उपायुक्त द्वारा आयोजित एक बैठक में गए। उन्होंने उपायुक्त के खिलाफ खड़े होकर हंगामा खड़ा कर दिया और भीड़ ने उनकी बहादुरी की सराहना की। उन्हें 27 जनवरी, 1921 को जेल भेज दिया गया, और वे जेल जाने वाले पहले गोरखा गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी बन गए।

(स्रोत – माउंटेन इको, नवभारत टाइम्स)