Saturday, March 21, 2026
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4 प्रतिशत बढ़ गया डीए, त्योहारी सीजन में केन्द्रीय कर्मचारियों को मिला उपहार

नयी दिल्ली । बीते दिनों केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों के महंगाई भत्ता (डीए) में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी। अब राज्यों ने भी अपने कर्मचारियों की डीए में बढ़ोतरी करने की शुरुआत कर दी है। इसी कड़ी में कर्नाटक सरकार ने अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता 3.75 प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की है। सरकार ने एक आदेश में कहा कि वह महंगाई भत्ते को मौजूदा 35 प्रतिशत से संशोधित कर 38.75 प्रतिशत कर रही है। कर्नाटक की सरकार ने यूजीसी/एआईसीटीई/आईसीएआर पैमाने पर व्याख्याताओं और न्यायिक अधिकारियों के डीए में चार प्रतिशत वृद्धि की भी घोषणा की। इस बढ़ोतरी के बाद राज्य सरकार 1,109 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करेगी।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों एवं पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते में चार प्रतिशत बढ़ोतरी की है। इस फैसले से 48.67 लाख कर्मचारियों और 67.95 लाख पेंशनधारकों को लाभ होगा। अब सरकारी कर्मचारियों का डीए और पेंशनधारकों की डीआर बढ़कर 46 प्रतिशत हो जाएगी। बता दें कि बढ़ा हुआ भत्ता एक जुलाई, 2023 से लागू होगा। महंगाई भत्ते में यह वृद्धि उस फॉर्मूले के मुताबिक है जो सातवें वेतन आयोग की अनुशंसाओं पर आधारित है। महंगाई भत्ता और महंगाई राहत दोनों के कारण राजकोष पर संयुक्त प्रभाव प्रति वर्ष 12,857 करोड़ रुपये होगा।

नवरात्रि उत्सव में टूटे रिकॉर्ड, माता वैष्णो देवी मंदिर में चार लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने की पूजा

वैष्णो देवी । नवरात्रि के उत्सव के दौरान जम्मू कश्मीर के रियासी जिले में त्रिकुटा पर्वत पर स्थित माता वैष्णो देवी के मंदिर में चार लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड (एसएमवीडीएसबी) के प्रवक्ता ने कहा, ”नवरात्रि शुरू होने के बाद से रोजाना औसतन 40,000 श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर रहे हैं। अबतक चार लाख से अधिक श्रद्धालु यहां आ चुके हैं। पिछले वर्ष नौ दिवसीय शारदीय नवरात्रि के दौरान करीब 3.18 लाख श्रद्धालु यहां आये थे।” उन्होंने कहा कि विश्व शांति, सद्भाव, समृद्धि और मानव जाति के अच्छे स्वास्थ्य के लिए बोर्ड द्वारा आयोजित नौ दिवसीय ‘शत चंडी महायज्ञ’ का रामनवमी के पावन अवसर पर समापन हो गया।
प्रवक्ता ने बताया कि श्रद्धालुओं के अलावा, कर्मचारियों के साथ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अंशुल गर्ग ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्ण आहुति और अन्य अनुष्ठानों में भाग लिया। उन्होंने बताया कि पद्म श्री प्रो. विश्वमूर्ति शास्त्री की अगुवाई में पंडितों के समूह ने महायज्ञ किया।
उन्होंने बताया कि नवरात्रि उत्सव के दौरान इस बार तीर्थयात्रा में स्काईवाक, पुनर्निमित पार्वती भवन, गुफा से वर्चुअल दर्शन, श्री भैरो जी मंदिर परिसर में मुफ्त लंगर सेवा, श्रद्धालुओं के लिए बोर्ड की वेबसाइट पर सीधा दर्शन सुविधा तथा द्विभाषी ‘शक्ति’ चैटबॉट विशेष रूप से शामिल किये गए हैं।
उन्होंने कहा कि इस पहल का उद्देश्य तीर्थयात्रा को श्रद्धालुओं के लिए और सुविधाजनक और आनंदमय बनाना है। प्रवक्ता ने बताया कि स्काईवाक का 12 अक्टूबर को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उद्घाटन किया था, जिसने (स्काईवाक ने) नवरात्रि के दैरान यात्रा प्रबंधन में अहम भूमिका निभायी।

जहाँ रावण को माना जाता है दामाद, होती है पूजा

आज पूरा भारत दशहरा मना रहा है । दशहरा की शाम हर तरफ आपको रावण जलता हुआ नजर आएगा । दरअसल, पूरा भारत रावण को बुराई का प्रतीक मानकर दशहरा के दिन जलाता है. लेकिन इसी देश में एक ऐसी जगह है जहां रावण की पूजा होती है । यहां तक कि इस जगह के लोग रावण को अपना दामाद मानते हैं । चलिए आपको बताते हैं कि आखिर इस जगह से रावण का इतना गहरा संबंध कैसे है और क्यों लोग रावण को आज भी अपना दामाद मानते हैं । हम जिस जगह की बात कर रहे हैं वो मध्य प्रदेश में है । दरअसल, मध्य प्रदेश के मंदसौर में रावण को लोग अपना दामाद मानते हैं, यही वजह है कि यहां लोग इसकी पूजा करते हैं । कहा जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मंदसौर में घर था, इसीलिए यहां के लोग आज भी रावण को अपना दामाद मानते हैं ।
रावण के पुतले की पूजा होती है – एक तरफ जहां पूरे देश में दशहरा की शाम रावण का का दहन किया जाता है । मंदसौर में इस पुतले की पूजा होती है । वहीं मंदसौर के रूंडी में तो रावण की एक मूर्ति भी बनी हुई है जिसकी पूजा होती है । यहां लोग रावण को फूल माला चढ़ा कर उसकी पूजा करते हैं । मंदसौर के अलावा कई और जगहें भी हैं जहां रावण की पूजा होती है । भारत के अलावा और श्रीलंका में भी कई जगह रावण की पूजा होती है ।
यहां अभी मौजूद है रावण का शव – ऐसा माना जाता है कि श्रीलंका के रगैला के जंगलों में करीब 8 हजार फीट की ऊंचाई पर रावण का शव रखा गया है । लोगों का मानना है कि यहां रावण के शव को ममी के रूप में संरक्षित रखा गया है । श्रीलंका घूमने जाने वाले लोगों के लिए ये जगह और रावण का महल बहुत बड़ा पर्यटन स्थल है । यही वजह है कि हर साल इस जगह से श्रीलंका सरकार को काफी फायदा होता है ।

 

सुन्दरवन की ‘वनदुर्गा’, जो करती हैं ‘दक्षिणराय’ बाघ से लोगों की रक्षा

सुन्दरवन…यह नाम जुबान पर आते ही आपको सबसे पहले क्या ध्यान में आता है? मैनग्रोव जंगल, जंगल के बीच से होकर गुजरती नदी और रॉयल बंगाल टाइगर। सुन्दरवन दुनिया का सबसे बड़ा दलदली इलाका है। पीली-काली धारी वाले बाघ जिन्हें सुन्दरवन क्षेत्र में रहने वाले लोग ‘दक्षिणराय’ के नाम से जानते हैं। बाघ कितने खतरनाक और खुंखार होते हैं, ये बात हर किसी को पता है।
लेकिन क्या आप जानते हैं, कोई हैं सुन्दरवन में भी जिनसे दक्षिणराय भी डरते हैं। जिनपर होती है इन खतरनाक बाघों से वहां के निवासियों की रक्षा करने की जिम्मेदारी। जी हां, इन बाघों से सुन्दरवन के निवासियों की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठाती हैं ‘बोनोबीबी’ या ‘वनदुर्गा’।
सुन्दरवन के आसपास करीब 45 लाख लोगों की आबादी रहती है, जिनका मुख्य पेशा मछलियां व केंकड़े मारना, जंगलों से शहद और लकड़ियां काटना इत्यादि। ये काम करते समय स्थानीय लोग हर बार अपनी जान हथेली पर लेकर जंगलों में जाते हैं, क्योंकि यहां पानी में मगरमच्छ तो जमीन पर बाघों का खतरा मंडराता ही रहता है। हाल के दिनों में बाघों के नदी में तैरकर नाव तक पहुंचने और लोगों को अपना शिकार बनाने की खबरें भी सुर्खियों में छायी रहती हैं। वनदुर्गा को स्थानीय लोग वनदेवी, व्याघ्रदेवी और वनचंडी के नाम से भी पुकारते हैं।
सुन्दरवन जो भारत से लेकर बांग्लादेश तक फैला हुआ है। कहा जाता है कि सुन्दरवन का 60 प्रतिशत हिस्सा बांग्लादेश में और 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में मौजूद है। यहां के निवासी अगर किसी देव-देवी पर सबसे अधिक विश्वास करते हैं तो वह है वनदुर्गा। सुन्दरवन क्षेत्र में रहने वाले मछुआरे, शहद इकट्ठा करने वाले और लकड़हारा समुदाय के सभी लोग, फिर वह चाहे हिंदू हो या मुस्लिम, वनदुर्गा की पूजा पूरे भक्तिभाव से करता है। स्थानीय कथा के अनुसार वनदुर्गा या बोनोबीबी की मां गुलाल बीबी मदीना से और उनके पिता इब्राहिम मक्का से सुन्दरवन में आए थे।
यहीं पर उन्होंने वनदुर्गा को जन्म दिया। वहीं दूसरी तरफ दक्षिणराय जशोर (वर्तमान बांग्लादेश) के एक शहर ब्राह्मननगर के राजा के अधिनस्थ एक सामंत थे। दक्षिणराय काफी अत्याचारी अधिकारी थे। उनके अत्याचारों से स्थानीय लोगों को मुक्त करवाने के लिए वनदुर्गा ने उनसे कई युद्ध किये, जिसमें हर बार दक्षिणराय को हार का सामना करना पड़ा। इस हार को स्थानीय लोग सुन्दरवन का सबसे बड़ा आतंक और बुराई का प्रतीक यानी बाघ पर जीत के रूप में देखते हैं।
कहा जाता है कि वनदुर्गा जंगल (सुन्दरवन) की अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें 18 भाटी की मालकिन माना जाता है। नदी में ज्वार खत्म होकर भाटा आने के तुरंत बाद अगर फिर से ज्वार आए तो उसे 1 भाटी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार अगर 18 भाटी के समय कोई व्यक्ति जंगल में जाकर मछली-केंकड़ा पकड़ता शहद इकट्ठा करना, लकड़ियां काटना आदि काम करता है तो उस समय दक्षिणराय से उसकी रक्षा स्वयं वनदुर्गा करती हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि जब बाघ किसी मछुआरे या लकड़हारे पर हमला करता है, तब हिंदू या मुसलमान का फर्क मिट जाता है। उस समय उस व्यक्ति को बाघ के चुंगल से बचाना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य बन जाता है। इसलिए जब बोनोबीबी या वनदुर्गा की पूजा करने की बारी आती है तब यहां धर्म की दीवार भी मिट जाती है।
पिछले कई सालों से लगातार आए चक्रवाती तूफानों की वजह से सुन्दरवन को भारी नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा पेड़ों की अंधाधुन कटाई की वजह से भी जंगल को काफी नुकसान पहुंच रहा है। इसके प्रति लोगों को जागरुक बनाने के उद्देश्य से ही कोलकाता में दुर्गा पूजा पर ‘सेविंग द सुन्दरवन’ थीम पर दुर्गा पूजा पंडाल तैयार किया गया है। यह दुर्गा पूजा पंडाल सॉल्टलेक इलाके के सी ई ब्लॉक में बनाया गया है। यहां आपको मैनग्रोव जंगल से लेकर वॉच टॉवर से वनबीबी की पूजा को अनुभव कर सकते हैं। यहां जंगल को और भी वास्तविक रूप प्रदान करने के लिए जानवरों की प्रतिकृति से भी पंडाल को सजाया गया है।

 

नवरात्रि में रख रहे व्रत तो स्वस्थ रहने के लिए याद रहें ये बातें

नवरात्रि कई लोगों के लिए उपवास का समय होता है, जिसे अगर सही तरीके से न किया जाए तो हमें कमजोरी महसूस हो सकती है। हर साल नवरात्रि के दौरान भक्त देवी दुर्गा से प्रार्थना करने के लिए इस हिंदू त्योहार के दौरान उपवास करते हैं। उपवास करना न केवल शुभ माना जाता है, बल्कि यह शरीर को डिटॉक्सिफाई करने का एक शानदार तरीका भी है क्योंकि यह हानिकारक विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में सहायता करता है, लेकिन आहार में बदलाव के कारण उपवास करने से शरीर सुस्त या थका हुआ भी हो सकता है।
प्रतिदिन 14 से 16 घंटे का उपवास रखें और शेष घंटों में भोजन करें। इसमें दैनिक 16 घंटे का उपवास और 8 घंटे की खाने की सुविधा है, जिसमें हम 2, 3 या अधिक भोजन कर सकते हैं। हम 6 दिनों के लिए 14 घंटे का उपवास और 3 दिनों के लिए 16 घंटे का उपवास भी कर सकते हैं।
करना सरल, सुरक्षित और टिकाऊ है। एक बार जब हम खाने की खिड़की में प्रवेश करते हैं, तो दो भोजन के बीच 2।5 घंटे से अधिक का अंतर न रखें, चाहे भोजन बड़ा/छोटा हो।
फलों की 2-3 सर्विंग न केवल शरीर को हाइड्रेटेड रखती है बल्कि फाइबर भी देती है जो मल त्याग में मदद करती है। सुनिश्चित करें कि आप अच्छा भोजन करें, उदाहरण के लिए, एक गिलास दूध/छाछ के साथ आलू से बनी साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू आटा पराठा। कोशिश करें कि इस भोजन में चीनी न हो।
उपवास के दौरान खुद को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है क्योंकि इससे भूख की पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। इतना ही नहीं, पानी पीने से उपवास के दौरान थकान और यहां तक ​​कि बेहोशी को भी दूर करने में मदद मिल सकती है। हमेशा पानी की बोतल रखें और समय-समय पर पानी पीते रहें।
नौ दिनों का उपवास निश्चित रूप से शरीर को डिटॉक्सीफाई करने में मदद करेगा लेकिन उपवास के दौरान आहार में बदलाव से कुछ लोगों में एसिडिटी या कब्ज हो सकता है। इससे निपटने के लिए ठंडा दूध पिएं और एसिडिटी को दूर रखें। इससे निपटने के लिए हम अपने आहार में नींबू पानी या दही भी शामिल कर सकते हैं।
दिन के दौरान बादाम, अखरोट और पिस्ता सहित मुट्ठी भर अनसाल्टेड नट्स का सेवन करना सुनिश्चित करें। सुबह नाश्ते से पहले व्रत खोलने के लिए एक या दो चम्मच घी/कोल्ड-प्रेस्ड नारियल तेल मिलाना सबसे अच्छा विचार है। चूँकि यह आहार सब्जियों पर शून्य है, रात भर भिगोए हुए सूखे मेवे पेट के लिए मदद कर सकते हैं।

अंत:शुद्धि और आध्यात्मिक शक्ति का महापर्व है नवरात्रि

नवरात्रि हिन्दू धर्म के लोगो द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है । हिंदी महीनो के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता हैं।
नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती हैं। यह हमें बताती है की इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्ती और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जन-जीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुना तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम मानी गयी है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने कोने में श्रध्दा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्हीं में से एक है नवरात्रि।
नवरात्रि पर्व के नौ दिनों के दौरान आदिशक्ति जगदम्बा के नौ विभिन्न रूपों की आराधना की जाती है। ये नौ दिन वर्ष के सर्वाधिक पवित्र दिवस माने गए हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिध्दिदात्री।
वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।
नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवे दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुंची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं। शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशरू अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।
इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततरू महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

पेड़ों पर आखिर क्यों बनाई जाती हैं सफेद और लाल रंग की पट्टियां

कहीं जाते समय रास्ते में आप देखते होंगे कि सड़क किनारे लगे पेड़ों की जड़ों के ऊपर सफेद और लाल रंग से पेंट किया हुआ रहता है। लेकिन क्या कभी आपने इसके बारे में सोचा है कि ऐसा क्यों किया जाता है। दरअसल इसके पीछे कई सारे वैज्ञानिक कारण है जिसके बारे में शायद लोग नहीं जानते है।
पेड़ों के निचले हिस्से में पेंट करने का तरीका काफी पुराना है। हालांकि इसके पीछे उद्देश्य होता है कि हरे भरे पेड़ों को और ज्यादा मजबूती देता हैं।आपने देखा होगा कि पेड़ों में दरारे आ जाती है और इसकी खाली करने लगती है। जिसकी वजह से पैर कमजोर हो जाते हैं। इसलिए इन्हें पेंट कर दिया जाता है ताकि ने मजबूती मिल सके और पेड़ों की उम्र लंबी हो सकें।
पेड़ों को पेंट करने के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि इसमें दीपक और कीड़े ना लगे। क्योंकि यह कीड़े किसी भी पेट को अंदर से खोखला कर देते हैं। लेकिन पेंट करने की वजह से पेड़ों में किए नहीं लगते जिससे वह सुरक्षित रहते है। पेड़ों को पेंट करने से उनकी सुरक्षा में भी सुधार होता है। यह इस बात का संकेत होता है कि वह पेड़ वन विभाग की नजर में है या उसकी कटाई नहीं की जा रही है। कुछ जगहों पर पेड़ों को रंगने के लिए केवल सफेद पेंट का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन कई जगहों पर इसे लाल और नीले रंग से भी रंग दिया जाता है।

रिजर्व एंटीबायोटिक भी हो रहे बेअसर, 70 प्रतिशत मरीजों की जान खतरे में : एम्स

नयी दिल्ली । एम्स के नए एनालिसिस के मुताबिक देश भर के आईसीयू में भर्ती गंभीर इंफेक्शन के शिकार कई मरीजों पर कोई भी एंटीबायोटिक दवा काम नहीं कर रही है । ऐसे मरीजों के बेमौत मारे जाने का खतरा है । एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होते चले जाने का हाल ये हो गया है कि सबसे नयी दवा जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रिजर्व कैटेगरी में रखा है वो भी अब कई बार काम नहीं कर रही । रिजर्व कैटेगरी की दवा का मतलब होता है कि इसे चुनिंदा मौकों पर ही इस्तेमाल किया जाए ।
देश के तमाम अस्पतालों के साथ मिलकर एम्स ने एक नेटवर्क तैयार किया है । सबसे असरदार एंटीबायोटिक भी केवल 20 फीसदी में ही कारगर पाए जा रहे हैं यानी बाकी बचे 60 से 80 प्रतिशत मरीज खतरे में हैं और उनकी जान जा सकती है । इसकी वजह धड़ल्ले से मरीजों और डॉक्टरों का मनमर्जी से एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करना है । ऐसे में एक ही तरीका है कि अस्पतालों में इंफेक्शन का स्तर नियंत्रित किया जाए ।
दक्षिण के अस्पतालों की हालत बेहतर
दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर की इंफेक्शन कंट्रोल पॉलिसी को पूरे देश में लागू करने के लिए डॉ पूर्वा माथुर की निगरानी में सभी अस्पतालों को जोड़ा जा रहा है । डॉ पूर्वा के मुताबिक दक्षिण के राज्यों में उत्तर भारत के मुकाबले इंफेक्शन कम पाया जा रहा है । इसी तरह मोटे तौर पर प्राइवेट अस्पतालों का इंफेक्शन कंट्रोल सरकारी अस्पतालों से बेहतर है । अस्पतालों के आईसीयू में, मरीज को लगाए जाने वाले कैथेटर, कैन्युला और दूसरे डिवाइस में कई बैक्टीरिया और जीवाणु पनपते रहते हैं । ये इंफेक्शन पहले से बीमार और कमजोर इम्युनिटी वाले मरीजों को और बीमार करने लगते हैं । लंबे समय तक आईसीयू में भर्ती मरीजों को ऐसे इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है ।
अब ये इंफेक्शन खून में पहुंच रहे हैं । खून में पहुंचने का मतलब है कि पूरे शरीर में सेप्सिस होने का खतरा – इस कंडीशन के गंभीर होने पर धीरे धीरे मरीज के अंग काम करना बंद करने लगते हैं जिसे मल्टी ऑर्गन फेल्यर कहा जाता है । एम्स ट्रामा सेंटर के चीफ डॉ कामरान फारुकी के मुताबिक निमोनिया के मरीज जो लंबे समय तक वेंटिलेटर पर रहते हैं, ऐसे मरीज जिन्हें लंबे समय तक कैन्युला, कैथेटर या यूरिन बैग लगे रहते हैं – उनमें ऐसे खतरनाक इंफेक्शनस के पनपने का खतरा बना रहता है ।

पिस्तौल और रिवॉल्वर में क्या अंतर है? जानिए

हम अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी में न जाने कितने शब्द बोलते हैं । हमारे शब्दकोष का बड़ा भाग एक-दूसरे की बातें सुनने से ही बनता है । ऐसे में जब हम किसी से कोई शब्द सुनते हैं तो कई बार नहीं जान पाते कि इसका सही मतलब क्या है लेकिन वो हमारी बातचीत में शुमार होने लगता है । कई बार तो एक जैसे शब्दों के बीच का अंतर बिना जाने ही हम इसे इस्तेमाल करते रहते हैं ।
क्या है रिवॉल्वर और पिस्तौल का अंतर?
रिवॉल्वर एक तरह की बंदूक होती है । इसमें हैंडगन में घूमने वाले सिलेंडर में गोलियां लगाई जाती हैं । रिवॉल्वर में कुल 6 गोलियां डाली जा सकती हैं । इससे फायर करने पर पीछे की तरफ से एक हैमर नुमा चीज से गोली आगे निकलती है । इसमें सिलेंडर अपने आप घूमता है और दूसरी गोली सामने आ जाती है । गोलियां खत्म होने के बाद रिवाल्वर में से सिलेंडर को बाहर निकालते हैं और उसमें गोलियां भरी जाती हैं । वहीं पिस्तौल या पिस्टर में 20 गोलियां भरी जा सकती हैं, जिनकी रेंज भी 50 से 100 मीटर तक होती है । ये ऑटो या सेमी ऑटोमेटिक हो सकती हैं । इमसें मैगजीन लगी होती है और स्प्रिंग के ज़रिये गोली फायर प्वाइंट पर सेट हो जाती है । इसमें गोली लोड करने में बिल्कुल वक्त नहीं लगता है । सैमुअल कॉल्ट ने साल 1836 में वो हैंडगन बनाई थी, जिसे आप अक्सर पुरानी फिल्मों देखते होंगे । इसमें घूमने वाल सिलेंडर का इस्तेमाल किए जाने के कारण इसका नाम रिवॉल्वर पड़ा था । रिवॉल्वर और पिस्टल की रेंज तो बराबर होती है लेकिन ऑटोमेटिक पिस्टल में तो सिर्फ ट्रिगर दबाने से ही काम हो जाता है । हालांकि हादसा होने का ज़ोखिम इसमें कहीं ज्यादा होता है ।

सेंट पॉल्स कैथेड्रल मिशन कॉलेज में ‘कौन बनेगा विजेता’ प्रतियोगिता का आयोजन

कोलकाता । सेंट पॉल्स कैथेड्रल मिशन कॉलेज और बैंक ऑफ़ बड़ौदा के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी ज्ञान पर आधारित ‘कौन बनेगा विजेता’ प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में सेंट पॉल्स कॉलेज के 18 टीम के छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए कॉलेज के उप-प्राचार्य डॉ. सुदीप्त मिड्डे ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से बच्चों के मानसिक, बौद्धिक विकास के साथ-साथ भाषायी कौशल के विकास में मददगार साबित होगा। बैंक के वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी रंजीत रजक ने कार्यक्रम की उपयोगिता पर अपने विचार रखें।
इस प्रतियोगिता में क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान आदित्य पासवान और आयुष साव, के. अंजू राव और शिवानी साहनी, अंकित मंडल और सुमन गोंड को मिला और प्रोत्साहन पुरस्कार लवली राय और प्रीति तिवारी, साहिल साव और साहिल कुमार दास तथा विशिष्ट पुरस्कार अमरनाथ राय को मिला। इस प्रतियोगिता के निर्णायकद्वय राजभाषा अधिकारी अमर साव और सेंट जेवियर्स स्कूल की प्राध्यापिका सुदेवी चटर्जी थे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विकास कुमार साव ने किया और धन्यवाद ज्ञापन परमजीत कुमार पंडित ने किया।