Wednesday, March 4, 2026
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परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं

रंग हमारी जिंदगी को जीवन देते हैं। कहते हैं कि पानी रंगहीन होता है लेकिन पता नहीं क्यों लगता है रंग का नहीं होना भी तो एक रंग है। उदासी भी एक रंग है जीवन का….अगर हम रंगों को समझने लगें तो जीवन कितना सहज हो जाए..रंगों को समझें और वह जो कहना चाहते हैं, वह भी वह भी समझें। हरियाली का हरा, सूर्य की लालिमा, सोने का पीला रंग, आसमान का नीला, गुलाब का गुलाबी, सृष्टि ने कितने रंग दिए हैं हमको पर क्या कोई भी एक रंग, एक या दो रंगों को चुनकर उपवन सजा सकता है ? उपवन बाहर से चाहे जितना भी सुन्दर लगे और हम खुद को चाहे जितना समझा लें मगर रहेगा वह अधूरा है। यही बात हमारी जिन्दगी के साथ है, यही बात हमारी संस्कृति और हमारे देश के साथ है। रंग कोई भी हो, कैसा भी हो, छोटा या बड़ा नहीं होता, उसका होना ही काफी होता है और कई बार वही रंग हमारी जिंदगी को नयी दिशा दे जाता है। चलिए बात करते हैं हमारे परिवारों की। ऐसा लगता है कि उत्तर आधुनिकतावाद के समय में हमारी संस्कृति ऐसे मोड़ पर आ चुकी है जहां लगता है कि अब लौटने की जरूरत है। आज की नयी पीढ़ी भले ही बौद्धिक स्तर पर सूचनाओं का खजाना हो, तकनीक में महारत रखती हो मगर जिन्दगी सूचनाओं से नहीं चलती, वह चलती है संवेदना से…और आज की पीढ़ी का आई क्यू भले ही बेहतर हो मगर ई क्यू की स्थिति शोचनीय है। आज के बच्चों में बहुत गुस्सा है तो दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि इसका कारण कौन है। वह कारण कोई और नहीं, हम और आप हैं। जिन चीजों को एकल परिवार के मोह में आपने आउटडेटेड समझकर छोड़ दिया, वह दरअसल हमारा रक्षा कवच थी। अपने अनुभव से बताती हूँ…संयुक्त परिवार में रहना चुनौती भरा हो सकता है मगर अपने स्वार्थ को पीछे धकेलकर खुद से पूछेंगे तो समझ सकेंगे कि हमारे परिवारों ही काउंसिलर हुआ करते थे…हमें किसी प्रोफेशनल काउंसिलर की जरूरत नहीं पड़ी। अगर हम भटके तो किसी ताऊ, चाचा, मामा, मौसा या भाई -बहन ने हाथ थामे रखा…डिप्रेशन क्या होता था, तब पता ही नहीं चला। आज के माता-पिता अपनी औलादों के आगे बेबस हैं क्योंकि आपने तकनीक दी, पैसे खर्च किये मगर आप संवेदना नहीं दे सके क्योंकि मशीन संवेदनशील नहीं बना सकती । आपने भौतिक सुखों से परवरिश को बेहतर बनाना चाहा, चलिए आपने समय भी दिया मगर माता- पिता की परवरिश तक की दुनिया सीमित नहीं है, बच्चों को दुलार की जरूरत है। उसे भाई- बहनों का साहचर्य चाहिए, उसे चाचा-बुआ…मौसा…मामा…मौसी का दुलार चाहिए। सच तो यह है कि यह मिथक है कि माता- पिता बच्चे की दुनिया बन सकते हैं। माता-पिता भी इंसान हैं और एक समय के बाद वह भी थकते हैं और तब यही परिवार उनका सहारा बनता है। बच्चों के हाथ में पहले किताब थी, आज माता – पिता खुद नहीं पढ़ते तो बच्चे कहां से पढ़ेंगे। यह समय है कि एकल परिवारों के कर्णधारो को हार मान लेनी चाहिए क्योंकि आप हर बात का विकल्प और हर बात का उत्तर नहीं बन सकते। भाई – बहनों के साथ खेलते – खेलते हार – जीत होती थी तो खेल भावना ऐसे ही विकसित हो जाती थी। शिक्षक हों या पड़ोसी हों या कोई और भी हो, वह एक सीमा तक ही आपके साथ हो सकता है। आप अपने परिवार में रहते हुए जितने समझौते करते थे, आज आप उससे कहीं अधिक समझौते कर रहे हैं। परिवारों में अगर उमर लंबी होती तो भी एकाकीपन नहीं था मगर आज बुजुर्ग अकेले भी हैं और असहाय भी। गांव में चौपाल जमती थी तो वह एक आसरा हुआ करता था। आंगन में जब सब बैठते थे तो वह एक पिकनिक थी। ये सब जीवन के वही रंग हैं जिनको हमने हाथ लगाना बंद कर दिया और जिंदगी बदरंग बना ली है। समस्याएं, चुनौतियां, दुःख…हर जगह हैं मगर परिवार हौसला देता है और याद रहे परिवार का मतलब पूरा परिवार..क्योंकि एकल परिवार एक ईकाई हो सकता है मगर अब वह विकल्प काम नहीं कर रहा है। परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
सम्पादक

शुभजिता

शुभजिता की कोशिश समस्याओं के साथ ही उत्कृष्ट सकारात्मक व सृजनात्मक खबरों को साभार संग्रहित कर आगे ले जाना है। अब आप भी शुभजिता में लिख सकते हैं, बस नियमों का ध्यान रखें। चयनित खबरें, आलेख व सृजनात्मक सामग्री इस वेबपत्रिका पर प्रकाशित की जाएगी। अगर आप भी कुछ सकारात्मक कर रहे हैं तो कमेन्ट्स बॉक्स में बताएँ या हमें ई मेल करें। इसके साथ ही प्रकाशित आलेखों के आधार पर किसी भी प्रकार की औषधि, नुस्खे उपयोग में लाने से पूर्व अपने चिकित्सक, सौंदर्य विशेषज्ञ या किसी भी विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें। इसके अतिरिक्त खबरों या ऑफर के आधार पर खरीददारी से पूर्व आप खुद पड़ताल अवश्य करें। इसके साथ ही कमेन्ट्स बॉक्स में टिप्पणी करते समय मर्यादित, संतुलित टिप्पणी ही करें।

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