महज मनोरंजन नहीं दहला देने वाला सच दिखाती है सरबजीत

 

rekha-रेखा श्रीवास्तव

फिल्म देखने जाने का मतलब होता है, इंटरनेटमेंट। मनोरंजन। पर सरबजीत फिल्म वैसी फिल्म नहीं है। बिल्कुल अलग। मनोरंजन का तो नामो निशान नहीं, पर कई दृश्य में रोंगटे खड़े जरूर हुए, कई दृश्यों पर आँखों से अपने आप आँसू बहने लगे, कई दृश्यों पर समाज, कानून व्यवस्था पर थू-थू करने का मन किया। चाहे भारत हो या पाकिस्तान या कोई भी देश, अगर किसी को इस तरह से सजा देता है, तो सही में कानून व्यवस्था अंधी है। गलती किसी ने की हो, और उसकी सजा किसी और को मिली। ऐसा ही कुछ होता है सरबजीत के साथ। वास्तव में वह शराब के नशे में धूत होने के कारण पाकिस्तान की सीमा को लांघ गया, और उसकी यह एक गलती उसे जिंदा मरने के लिए छोड़ दिया। फिल्म में जिस तरह से दिखाया गया है कि कैदियों को किस तरह काल कोठरी में रखा जाता है। उसे यातनाएँ दी जाती है, दिल को हिला दिया। गुनाह करने वाला किस तरह आजाद घूमता है, और जबरन पकड़ कर किसी बेगुनाह को आरोपी कैसे बना दिया जाता है। यह दिखाया गया है इस फिल्म में। और आखिर में जब सरबजीत की बहन दलबीर आरोपी मंजीत सिंह को खोजने में कामयाब होती है और उसे कोर्ट तक खींच ले आती है तो वह खुलेआम कहता है कि मैं तो अपनी मर्जी से आया हूँ और मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। और ठीक वैसा ही हुआ। उसका कुछ नहीं बिगड़ा, उल्टे वर्षों से काल कोठरी में पड़े कैदी सरबजीत पर हमला करवा कर उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है। जिस काल कोठरी में उसके परिवार वालों को जाने के लिए पूरी तरह से जाँच-पड़ताल से गुजरना पड़ा वहाँ हथियार सहित बदमाश आकर उस पर हमला बोलकर चले गये और कोई कुछ नहीं कर पाया। यह वास्तव में फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि सच्ची घटना पर बनाई गई है। लाहौर में हुए बम विस्फोट के मामले में लिप्त आरोपी मंजीत की तलाश थी, और उसी समय सरबजीत पाकिस्तान की सीमा में घुस गया, तो बस पाकिस्तान वाले  ने उसको आरोपी मानकर पकड़ लिया और उस पर हमला, सजा  और कष्ट देना शुरू कर दिया। जबरन उसे सरबजीत से मंजीत सिंह बना दिया गया। इस फिल्म से बस केवल एक उम्मीद की जा सकती है कि अब ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए, और किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलना चाहिए। यहाँ सरबजीत के साथ –साथ उसके परिवार वाले भी सजा काटे। 23 सालों तक इंतजार करने के बाद सरबजीत तो भारत पहुँचा नहीं, बल्कि उसका शव लाया गया।

2 मई 2013 को  पाकिस्तान के जेल में सजा काट रहे कैदी सरबजीत की मौत होती है और ठीक तीन साल बाद मई 2016 में ही सरबजीत को लेकर एक फिल्म रिलीज हुई।  सरबजीत का किरदार रणदीप हुड्डा ने बखूबी निभाया है और उसकी बहन का किरदार ऐश्वर्या राय बच्चन ने। दोनों ने ही काम बेहतर किया है। ऐश्वर्य राय बच्चन ने तो सफेद बाल और आँखों पर चश्मा लगाकर भी अपनी सुंदरता और अभिनय में चांद लगाया। वहीं  सरबजीत की पत्नी का किरदार निभा रही  रिचा चड्ढा ने भी अमिट छाप छोड़ी है। उसकी आँखें, उसका डॉयलॉग डिलीवरी का तरीका काफी अच्छा लगा। वकील का किरदार दर्शन कुमार ने बखूबी निभाया। उमंग कुमार की निर्देशित फिल्म मनोरंजन की दृष्टि से नहीं, पर वास्तवकिता की दृष्टि से सफल जरूर है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार तथा समीक्षक हैे)

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