Saturday, September 5, 2026
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शिक्षक दिवस विशेष : बिहार के तीन नेता, जो पहले शिक्षक थे

पटना । बिहार की धरती ने देश को एक से बढ़कर एक हस्तियां दी हैं, जिन्होंने न केवल राजनीति के गलियारों में अपनी छाप छोड़ी, बल्कि शिक्षा के दम पर समाज को एक नई दिशा भी दी। शिक्षक दिवस पर हम आपको बिहार के तीन शिक्षकों के बारे में बताएंगे, जो राजनीति में आए तो उन्होंने इतिहास बना दिया। उनका नाम देश के नाम में दर्ज हो गया। ये तीन हस्तियां हैं- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह और डॉ. जगन्नाथ मिश्र। आइए जानते हैं इनके बारे में –
डॉ. राजेंद्र प्रसाद: ज्ञान और सादगी के प्रतीक

देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि शिक्षा कैसे इंसान को महान बनाती है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में ही की थी। उन्होंने मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में कुछ समय के लिए अंग्रेजी के प्रोफेसर और प्रिंसिपल के रूप में सेवा दी। एलएलएम में गोल्ड मेडलिस्ट राजेंद्र प्रसाद को अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फ़ारसी और बंगाली भाषा की भी जानकारी दी। आगे चलकर देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े और वकील की भूमिका निभाने लगे। इस दौरान जब महात्मा गांधी ने विदेशी संस्थाओं के बहिष्कार की अपील की तो राजेंद्र बाबू ने अपने बेटे मृत्युंजय प्रसाद को कोलकाता विश्वविद्यालय से निकालकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवा दिया था। महात्मा गांधी उनकी सादगी से काफी प्रभावित थे।
भारत के आजाद होने के बाद राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। बतौर राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में किसी को दखल देने का मौका नहीं दिया। उन्होंने राष्ट्रपति रहने के दौरान हिन्दू अधिनियम जैसे कई ऐतिहासिक फैसले हुए, जो इतिहास में दर्ज हो गए।

‘बिहार विभूति’ डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह

‘बिहार विभूति’ के नाम से जाने जाने वाले डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने डॉ राजेन्द्र प्रसाद के साथ चंपारण सत्याग्रह में भी भाग लिया था। राजनीति में आने से पहले अनुग्रह बाबू का जीवन भी शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा था। उन्होंने टीएनबी कॉलेज, भागलपुर में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में काम किया था। एक शिक्षक के रूप में अनुग्रह नारायण सिंह का मानना था कि बिना नैतिक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता। जब उनकी सरकार बनी और वे बिहार के पहले उपमुख्यमंत्री व वित्त मंत्री बने तो उन्होंने इसी फॉर्मूले पर सूबे में काम किया। उन्होंने राज्य के श्रम मंत्री रहते हुए पहली बार जापानी ढंग से धान उपजाने की पद्धति का प्रचार कराया। पूसा का कृषि अनुसंधान फार्म अनुग्रह नारायण सिंह की ही देन है।

डॉ. जगन्नाथ मिश्र: प्रोफेसर से मुख्यमंत्री तक का सफर

डॉ. जगन्नाथ मिश्र का नाम बिहार की राजनीति में एक ऐसे राजनेता के रूप में जाना जाता है जो मूलतः एक अर्थशास्त्री और शिक्षक थे। राजनीति में सीएम जैसे पद पर पहुंचने के बावजूद उनकी पहचान एक विद्वान की रही। उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में सालों तक युवाओं को पढ़ाया और कई किताबें लिखीं। मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने राज्य में शिक्षा व्यवस्था के विस्तार के लिए कई बड़े कदम उठाए। वर्ष 1980 में उनके कार्यकाल के दौरान ही उर्दू को बिहार की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया था। उनके कार्यकाल में ही बिहार में हजारों प्राथमिक शिक्षकों की बहाली हुई और बड़ी संख्या में गैर-सरकारी स्कूलों व कॉलेजों का अधिग्रहण कर शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिश की गई।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

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