लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न’ पुस्तक को पढ़ते हुए

‘लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न ‘ डॉ नमिता जायसवाल की सद्य प्रकाशित पुस्तक का शीर्षक ही वर्तमान युग की कहानी कहता प्रतीत हो रहा है।’अंतर्मन के स्वर में’ लेखिका ने सिमोन द बोउवार की यह प्रसिद्ध पंक्तियाँ ‘स्त्री जन्म से नहीं बनती, उसे बनाया जाता है ‘उद्धृत की हैं संभवतः जहांँ से साहित्य समाज में लिंग भेद की संरचना का उद्भव होता है।स्त्री, पुरुष और ट्रासंजेंडर आदि को किस प्रकार लिंग में विभाजित किया गया है। यह कहानी पुरुष सत्ता की वह मार्मिक और बेदर्द पन्ना है जहांँ अपने ही समाज की स्त्री को समानता का अधिकार नहीं दिया गया, वहाँ कानून व्यवस्था भी फेल हो गई है।इक्कीसवीं सदी में स्त्री की स्थिति बदली है परंतु समानता की मंजिल अभी भी दूर है ।इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर अनुत्तरित हैं।
2025 में 184 पृष्ठों की यह पुस्तक आनंद प्रकाशन कोलकाता से छपी है।
स्त्री अस्मिता को रेखांकित करती इस पुस्तक में लेखिका डॉ नमिता जायसवाल ने हिंदी कथा साहित्य की नामचीन महिला कथाकारों के कथा साहित्य को खंगालते हुए स्त्री अस्मिता, स्त्री सत्ता, स्त्री संघर्ष, स्त्री अधिकार, स्त्री चेतना, स्त्री स्वातंत्र्य आदि के साथ – साथ स्त्री जीवन के विविध संदर्भों और परिप्रेक्ष्य को बहुत ही बारीकी से जांच पड़ताल करते हुए उद्घाटित किया है ।यह एक ऐसा वैचारिक और सामाजिक आंदोलन है, जो पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के अधिकारों, उनकी स्थिति, और पहचान पर चर्चा करता है। यह मुख्य रूप से समाज में लैंगिक असमानता (Gender inequality) को समाप्त कर महिलाओं को सशक्त, स्वतंत्र और समान अधिकार दिलाने की वकालत करता है।
एक ही पुस्तक में आपको स्त्री विषयक साहित्य की वृहद शोध परक दृष्टि मिल जाएगी जिससे पाठक रूबरू हो सकते हैं। लेखिका ने माना है कि आज स्त्रियाँ आधुनिक युग में जी रही हैं। शिक्षा और संवैधानिक समानता भी मिली है लेकिन क्या जमीनी स्तर पर स्त्री समानता और सम्मान प्राप्त कर रही है? संभवतः नहीं। लेखिका स्त्री को समाज में एक स्वतंत्र, सक्षम और समान मानव के रूप में स्वीकृति चाहती है।
इस पुस्तक में लेखिका के 13 लेख हैं जिनमें कृष्णा सोबती, चित्रा मुद्गल, राजी़ सेठ, सूर्य बाला, नासिरा शर्मा, मेत्रैयी पुष्पा, मंजुल भगत आदि स्थापित महिला कथाकारों के उपन्यासों की सृजनधर्मिता से स्त्री अस्मिता के विविध पहलुओं को समझा गया है। वहीं ‘स्त्री सत्ता अस्तित्व और अस्मिता’ लेख समकालीन उपन्यास, शहरी परिवेश में मध्यवर्गीय स्त्री का द्वंद जिसमें नब्बे के दशक के उपन्यास के संदर्भ में है। समकालीन कहानी के संदर्भ में और आकड़ों के आईने में स्त्री इक्कीसवीं सदी में स्त्री की बदलती स्थिति के संदर्भ को रेखांकित किया गया है।
पितृसत्तात्मक सोच ने लिंग भेद द्वारा स्त्री – पुरुष भेद कर किस प्रकार से स्त्री जीवन को हाशिए या दोयम दर्जे की स्थिति में पहुंचा दिया ये सभी लेख इस बात के साक्षी हैं ।सन् 1958 में लिखे उपन्यास ‘डार से बिछुड़ी’ की लेखिका कृष्णा सोबती ने नायिका पाशो के जीवन की कठिन यात्रा का वर्णन किया है जहांँ पितृसत्तात्मक समाज में वह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है। भोगवाद पर टिका पुरुष समाज किस प्रकार एक स्त्री देह (पृष्ठ 15 – 16 लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न का शोषण करता है ) को मनचाहे इस्तेमाल की वस्तु समझता है। डार पितृसत्तात्मक समाज की एक शर्त है जहांँ स्त्री को अपने अस्तित्व पहचान स्वतंत्रता और व्यक्तित्व की कीमत चुकानी पड़ती है। मित्रो मरजानी उपन्यास में भी कृष्णा सोबती ने मित्रो अन्याय का प्रतिवाद करने वाली एक निर्भीक और जुझारू स्त्री है ।उषा यादव लिखती हैं कि नारी के परंपरागत रूप से पृथक कृष्णा सोबती की मित्रो उनकी नितांत अपनी सृष्टि है। (पृष्ठ 26, लिंग भेद) पुरुषत्व का गुण वह स्त्री को दबाए जाने में नहीं बल्कि उसे मानवी के रूप में पुरुष द्वारा देखे जाने को समझती है। (पृष्ठ 26, वही) मित्रो मरजानी नई पीढ़ी के लिए प्रेरक पात्र है जो अपनी इच्छाओं और अधिकारों के लिए समाज के विरोध में खड़ी होती है और यही स्वतंत्रता चाहती है। इक्कीसवीं सदी में भी यह प्रश्न अनुत्तरित ही है, सटीक उत्तर नहीं मिल रहा है। 1944 से ‘लामा’ कहानी से कृष्णा सोबती से अपने लेखन की शुरुआत की थी।
प्लेटॉनिक प्रेम की त्रासदी लेख में मंजुल भगत द्वारा लिखा पहला उपन्यास ‘टूटा हुआ इंद्रधनुष’ में प्लेटॉनिक प्रेम की अस्वाभाविकता का वर्णन है। इसमें स्त्री पुरुष के प्रेम संबधों और पति पत्नी के वैवाहिक रिश्तों को दर्शाया गया है।
ठीकरे की मंगनी में नासिरा शर्मा कथन के माध्यम से कहती हैं कि हालात की मार से पैदा हुई एक लड़की ‘महरूख’ की कहानी है जो जिंदगी को अपने नजरिए से देखकर उसको एक पहचान, एक अर्थ देती हुई जनसमुदाय की आवाज में उदय होती है। (पृष्ठ 47, लिंग भेद) वह भी अपने जीवन के सारे अनुभवों का निचोड़ निकालती है तो उसे लगता है कि संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के बावजूद आज भी स्त्री दासी है और पुरुष स्वामी। वह समझ चुकी है कि यह लड़ाई एक दो दिन की नहीं पूरे एक सदी तक लड़ी जाने वाली है। (पृष्ठ 49, वही) इसके लिए संघर्ष और आत्मविश्वास की आवश्यकता है। नासिरा शर्मा ने मुस्लिम समाज की स्त्रियों के दर्द को लिखा है ।वे मानती हैं कि स्वयं को स्थापित करने के लिए स्त्री को पहले आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना आवश्यक है ।
नासिरा शर्मा एक ऐसी महिला उपन्यासकार हैं जिन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से संस्कार प्रदत्त ढंग से बंधी पढ़ी-लिखी प्रबुद्ध स्त्री चरित्र की मानसिकता, मनोविज्ञान और उसके स्व संघर्ष को परिभाषित किया है। ठीकरे की है मंगनी की नायिका महरूख के माध्यम से उन्होंने मुस्लिम समाज में स्त्री की नियति का चित्रण किया है।अंत में वे कहती हैं कि अपनी लड़ाई स्त्री को अंतत स्वयं ही लड़नी पड़ती है। पृष्ठ 53
सूर्यबाला की यामिनी कथा 1990का उपन्यास है। इसमें स्त्री परिवार में अपने को टुकड़े टुकड़े में बांटकर जीती भारतीय स्त्री के जीवन जीने की त्रासदी भरी बाध्यता की कथा है जहां अस्मिता की तलाश और मोह के बंधन के मकड़जालों यामिनी खुद ही अपने दुखों की वज़ह है।
ग्रामीण परिवेश में स्त्री विमर्श के सुलगते प्रश्न शीर्षक से मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास बेतवा बहता रहे विश्व सदी का अंतिम दशक उपन्यास के क्षेत्र में सक्रियता की दृष्टि से बहुत है महत्वपूर्ण है। मैत्रेयी पुष्पा 90 के दशक की ऊर्जावान बहु चर्चित लेखिका हैं जिन्होंने ग्रामीण परिवेश में रची बसी स्त्री के अंतर्मन की गहराइयों को टटोला, उकेरा और रेखांकित किया है।’बेतवा बहती रही’ सन् 1993 का उपन्यास है जिसमें बुंदेलखंड के ग्रामीण परिवेश की कथा है।राजी सेठ ने सन् 1995 में’ निष्कवच ‘लिखा जिसमें दो अलग-अलग कथाएं होते हुए भी उनमें एक तारतम में है। आज जब चारों ओर पुरुष प्रधान समाज में नारी के प्रति हो रहे अन्याय और अत्याचार को उजागर किया जा रहा है,इस कथा में दो युवतियां दो होनहार युवकों को उनकी धूरी से हटाकर उनका भरपूर शोषण करती हुई उन्हें हतप्रभ कर देती हैं ,पूरी तरह ध्वस्त कर देती हैं और अपनी इस करने पर इतराती हैं ।यह एक नए मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक आयाम के साथ प्रस्तुत किया गया है।
बाजारवाद के चक्रव्यूह में फंसी स्त्री का चित्रण ‘आवां’ उपन्यास के माध्यम से किया गया है जिसकी कथाकार चित्रा मुद्गल है।यह उपन्यास सन् 1999में लिखा गया और 544पृष्ठों का वृहद उपन्यास है। इसमें निम्न मध्यवर्गीय परिवार की जरूरत मंद लड़की नमिता देशपांडे की रोजगार की तलाश में घर से बाहर निकलने, उसके भटकाव, मोहभंग और वापसी की कथा है । आवां में शोषण के माध्यमों, तरीकों एवं मूल्यों का पर्दाफाश किया गया है। आम आदमी को सक्रिय ,समझदार और जुझारू बनाने के लिए आवां को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया है। पृष्ठ 98
इक्कीसवीं सदी में पहुंच कर भी भारत का मध्यवर्गीय और निम्न वर्गीय समाज या इस वर्ग की स्त्रियां जूझ रही हैं।ये प्रश्न अनुत्तरित है।
समय सरगम कृष्णा सूक्ति का उपन्यास सन् 2000 में वृद्धों के जीवन पर लिखा गया इसमें मनुष्य जीवन की सार्थकता निरर्थकता के बीच बहस और उसके सही सार्थक अर्थ को खोजने का प्रयास है। आज भारत में ही नहीं वैश्विक स्तर पर वृद्धों की स्थिति पर चिंतन हो रहा है। वृद्धों की समस्या हमारे समाज में बढ़ते जा रही है। इस उपन्यास में कृष्णा सोबती ने वरिष्ठ नागरिकों को जीवन रसास्वादन करने के लिए प्रेरित किया है। 25 वर्षों पहले प्रकाशित उपन्यास ‘समय सरगम’ में नई राह दिखाई है,हिंदी की यह पहली लेखिका हैं जिन्होंने लिंग, वर्ग, जाति ,संप्रदाय और धर्म को सीधे-सीधे अस्वीकार किया है। पृष्ठ 107
समकालीन उपन्यास के संदर्भ में लेखिका डॉ नमिता जायसवाल ने स्त्री सत्ता, अस्तित्व और अस्मिता में विभिन्न उपन्यासों के माध्यम से वर्तमान समाज में महिला अधिकार की पुरुष के साथ उसकी समानता और समाज के हर क्षेत्र में उसकी भागीदारी, विश्व स्तर पर एक नई चेतना की गुहार लगा रही है। सामाजिक एवं पारिवारिक ढांचे में जो समस्याएं अधिकांशतः जन्म लेती हैं उनका संबंध मुख्यतः स्त्री जाति से ही होता है। आज भी स्त्री मानसिक और शारीरिक रूप से जूझ रही हैं बस मात्र उसके उत्पीड़न के तरीके बदल गए हैं।
‘तिरछी बौछार ‘की विस्मिता, ‘यामिनी कथा’ की यामिनी गीतांजलि श्री की ‘माई’ की माई अपने सामंती पारिवारिक परिवेश में इस संघ के माध्यम से पूरी तरह निचोड़ी गई स्त्री चरित्र हैं। आज आधुनिक युग में भूमंडलीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद और मानवीय मूल्यों के विनाशकारी परिवर्तन मानव अस्तित्व पर सबसे बड़ा खतरा है। पहले तो समाज के भीतर के असुरक्षा थी और अब तो वैश्विक स्तर पर प्रगट असुरक्षा से अस्मिता का अभिप्राय भी इस बदलते परिवेश में बदलेगा ही।
समकालीन दौर में’दलित अस्मिता’ और ‘स्त्री अस्मिता’पर भी लेखिका ने विभिन्न साहित्यिक,सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक स्तर पर स्त्री विमर्श के विषय में लिखा है।
अस्मिता की चाह में समकालीन लेखिकाओं ने अपने उपन्यासों में स्त्री विषयक समस्या और समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। समाज में स्त्री पर होने वाली शारीरिक हिंसा, भावनात्मक हिंसा,यौन हिंसा संबंधी आंकड़े भी दिए हैं और उनकी विशद विवेचना की है।
यह पुस्तक स्त्री विमर्श और उनकी विभिन्न समस्याओं का दस्तावेज है जिसमें प्रश्न बहुत हैं लेकिन उनके उत्तर आज भी अनुत्तरित ही हैं।कुछ उत्तरों का समाधान हुआ है लेकिन जितना मिलना चाहिए वह भी समाज की भेंट चढ़ जाता है। स्त्री पुरुष का लिंग भेद आज भी मानवीयता के स्तर पर शर्मसार करने वाला ही है। स्त्रियों के सबलीकरण के साथ महिलाओं के सामने चुनौतियों की आज भी कमी नहीं है।
आने वाले समय में संभवतः स्त्री अपने प्रश्नों के और पुरुषों के प्रश्नों के भी उत्तर देने में सक्षम होगी। हिंदी में महादेवी वर्मा पहली कवयित्री थीं जो साहित्य की स्त्री क्रांतिकारी दृष्टि , व्यावहारिक और गहरी सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत थी। उन्होंने भारतीय नारी को मात्र ‘देवी’ या ‘पुरुष की छाया’ मानने वाली रूढ़िवादी परंपरा का खंडन किया और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व, आर्थिक आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भी वकालत की।
नमिता जायसवाल की ‘लिंग भेद के अनुत्तरित प्रश्न’ हिंदी साहित्यकारों , शोधार्थी और सामान्य पाठकों के लिए पढ़ने के लिए संग्रहणीय पुस्तक है ।शुभकामनाओं सहित।




