लिटिल थेस्पियन ने इस्माइल चूनारा के अंग्रेज़ी नाटक दा स्टोन, का उमा झुनझुनवाला द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद पत्थर का मंचन गत 12 जून को अनुचिंतन आर्ट सेंटर में किया गया | नाटक ‘पत्थर’ जीवन को दो लोगों तक सीमित कर देता है: पति और पत्नी। उनकी साधारण गृहस्थी उस “अदृश्य पत्थर” से चकनाचूर हो जाती है जो अचानक उनके दरवाज़े पर आ जाता है। जो शुरू में एक भौतिक रुकावट है, वह मनोवैज्ञानिक आतंक में बदल जाती है। पत्थर का अर्थ बढ़ता जाता है – डर, जड़ता, सामाजिक दबाव, अवसाद – यहाँ तक कि घर से बाहर निकलना भी असंभव लगने लगता है।निर्देशक डॉ. गौरव दास व्याख्या करने की जल्दी नहीं करते। वे रूपक को साँस लेने देते हैं। परिणाम, एक ऐसा नाटक है जो एक साथ बेतुका भी लगता है और दर्दनाक हद तक वास्तविक भी। मंच एक जाल बन जाता है और आप उनके सिकुड़ते संसार को महसूस करते हैं।गुंजन अज़हर और मो. आसिफ़ अंसारी पूरे नाटक का भार अद्भुत संयम से उठाते हैं। कोई अतिनाटकीयता नहीं। “पत्नी” खीज से घबराहट और फिर सुन्नता तक बहुत छोटे-छोटे बदलावों में जाती है। “पति” झूठे आत्मविश्वास और लाचारी के बीच झूलता है। उनकी खामोशियाँ भी शब्दों जितनी मुखर हैं। साथ मिलकर वे रिश्ते को जीता-जागता बना देते हैं। राहुल सरदार की प्रकाश परिकल्पना और बिप्लब नस्कर का संगीत नाटक का मूड गढ़ते हैं। समर मृधा और नयन सदक की कोरियोग्राफी भी उतनी ही असरदार। नाटक ‘पत्थर’ इस बात पर मार्मिक टिप्पणी है कि डर को एक बार अंदर पनपने दो तो वह घर बना लेता है । यह सवाल करता है: क्या हम वास्तविक रुकावटों के कारण फँसे हैं, या इसलिए कि हमने मान लिया है कि निकलना व्यर्थ है? महामारी के बाद की दुनिया में जहाँ कई लोग नौकरी, घर या चिंता में “कैद” महसूस करते हैं, ऐसे में यह नाटक बेचैन करने वाला लगता है। दूसरा नाटक संतोषपुर अनुचिंतन की प्रस्तुति ‘वे आँखें’ – सुमित्रानंदन पंत की कविता पर आधारित नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया । अगर ‘पत्थर’ अंदर मुड़ता है, तो गौरव द्वारा नाट्य रूपांतरित और निर्देशित ‘वे आँखें’ हमें बाहर देखने पर मजबूर करती है। यह रूपांतरण पंत की कविता से एक किसान का चित्र बनाता है – उसका अंतहीन श्रम, ज़मीन से जुड़ाव, और शोषण व अनिश्चितता जो उसके जीवन को गढ़ते हैं, भले ही वह “समाज की रीढ़” कहा जाए। डॉ. गौरव दास की अपनी भावपूर्ण आवाज़, पृष्ठभूमि में करुणा नहीं गरिमा देती।समर मृधा, नयन सदक, मेहली दास, अनिकेत मजूमदार, अकुलीना मित्रा, तृषा दास, पार्थो पाइक और रंजीता रॉय ने अपने पात्रों को बखूबी निभाया । प्रकाश और मंच सज्जा बिप्लब नस्कर का था ।‘पत्थर’ और ‘वे आँखें’ को साथ मंचित करना एक सधी हुई सोच थी। एक नाटक कहता है: “हम खुद को कैद करते हैं।” दूसरा कहता है: “समाज दूसरों को कैद करता है।” इस अंतर ने दोनों को और मज़बूत किया।




