Wednesday, March 18, 2026
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ये हैं देश की तेजतर्रार आईपीएस मॉम

पानीपत./शिमला. हिमाचल के सोलन की एसपी अंजुम आरा की गिनती तेज-तर्रार IPS ऑफिसरों में की जाती है। उनकी छवि एक सख्त लेडी आईपीएस अफसर की है। बता दें कि अंजुम कानून व्यवस्था के साथ-साथ एक मां की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही हैं। वे एक नन्हें बच्चे की मां है। ड्यूटी के साथ 2 साल के अपने बच्चे अरहान का ख्याल रखना चुनौती भरा काम है, लेकिन वो दोनों कामों में सामंजस्य बिठा लेती हैं।

अंजुम कहती हैं, एक एसपी की ड्यूटी के साथ अपने छोटे बच्चे के लिए वक्त निकालना मुश्किल होता है।  कई बार इसका बुरा भी लगता है, लेकिन हमेशा कोशिश रहती है कि ड्यूटी और मां की जिम्मेदारियों में सामंजस्य बनाए रखें।  उनका संदेश है कि लोगों को बेटा-बेटी को समान समझकर उनका भविष्य निर्माण करना चाहिए।  लड़कियों को भी पढ़ लिख कर आगे बढ़ने का मौका दिया जाना चाहिए।  लड़कियां किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़कर अपने माता-पिता का नाम रोशन कर सकती हैं।

इसलिए पुलिस सेवा को बनाया करियर
अंजुम आरा को देश की दूसरी महिला आईपीएस बनने का गौरव प्राप्त है। सोलन जिला की वह पहली महिला एसपी हैं।  वह लोगों के साथ सीधे संपर्क को समाज सेवा का बड़ा साधन मानती हैं। पुरुष प्रधान समाज की मान्यताओं को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने पुलिस सेवा को चुना। अपनी इसी सोच और पुलिस वर्दी के प्रति आकर्षण ने ही उन्हें आईपीएस तक पहुंचाया। वे हिमाचल में सोलन जैसे बॉर्डर से जुड़े अति संवेदनशील जिला की कानून व्यवस्था संभाले हुए हैं।  उत्तर प्रदेश की लखनऊ से संबंध रखने वाली अंजुम 2011 बैच की आईपीएस अधिकारी हैं।priti chandra

डर की दहलीज से आईपीएस की मंजिल तक पहुंचाया : प्रीति चंद्रा

मेरी मां ने तो कभी हाथ में पेंसिल भी नहीं पकड़ी थी। लेकिन जिद की हम दो बहनों और एक भाई को पढ़ाने की। कॉलेज में आई तो रिलेटिव ने शादी का दबाव डालना शुरू किया। लेकिन मां चट्टान बनकर उनको डटकर जवाब देतीं। वो मुझ पर इतना भरोसा करती थीं कि जब घर से तीन किमी दूर खेतों में काम करने जातीं तो अक्सर घर की चाबियां वहीं भूल आती थीं। रास्ते में श्मशान पड़ता था। और बड़े भाई के होते हुए भी रात को 8 बजे मुझसे कहती जाओ, भागकर चाबियां लेकर आओ। बस इसी विश्वास ने मुझे आईपीएस ऑफिसर बनाया। हम दोनों बहनों ने इंटर कास्ट मैरिज की लेकिन वो हमारे सपोर्ट में खड़ी रहीं।

चैलेंजिंग कॅरिअर में सपोर्ट सिस्टम न हो तो चुनौतियां बढ़ जाती हैं। पति विकास पाठक के अलावा मेरे गांव की एक 22 साल की लड़की मेरा सपोर्ट सिस्टम है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से गांव में वो पढ़ नहीं सकती थी। इसलिए मैंने उसकी पढ़ाई से लेकर शादी का जिम्मा उठाया है। वो मेरी बड़ी बेटी की तरह है और जब मुझे कई दिन तक टूर पर जाना पड़ता है तो वो मेरे घर और बेटी का ध्यान रखती है। मैं भी अपनी बेटी को सिर्फ आजादी देना चाहती हूं जिससे वो बिना सरहदों के आसमां में पंख फैला सके।

 

 

मेकअप से छिपाएं चेहरे के तिल

चेहरे पर मौजूद तिल कई लोग पसंद नहीं करते और तिल सही जगह पर न हों तो खूबसूरती बिगाड़ भी देते हैं। लड़कियां और महिलाएं अपनी सुंदरता को लेकर बहुत सजग होती हैं और उन्हें कोई भी ऐसी चीज पसंद नहीं होती जो उनके लुक को थोड़ा सा भी खराब करे।

ऐसा ही हाल होता है शरीर में मौजूद तिल का कुछ लोग तो इन्हें ब्यूटी मार्क मानते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ को तो ये बिल्कुल पसंद नहीं होते। ऐसे में आसान से मेकअप ट्रिक्स की मदद से इन्हें छुपाया जा सकता है…

– मेकअप करने से पहले चेहरे को अच्छी तरह धो लें और रूई में थोड़ा टोनर लेकर चेहरे और गरदन पर लगाएं. टोनिंग से आपका मेकअप अधिक देर तक टिकेगा क्योंकि यह आपकी त्वचा को शुष्क रखता है।
– तिलों को छिपाने के लिए ऑयल फ्री फाउंडेशन लें और अपनी प्राकृतिक त्वचा के रंग से हल्के रंग चुनें। यह तिल को छिपाने में बहुत मददगार साबित होता है। अपनी त्वचा पर समान रूप से फाउंडेशन लगाएं और इस बात का ध्यान रखें कि तिल छिप जाए।
– कंसीलर तिल छिपाने के सबसे पुराने और सरल मेकअप टिप्स में से एक है। कंसीलर का उपयोग करके आप अपने चेहरे के लगभग सभी काले धब्बे, तिल या निशान छिपा सकते हैं. लेकिन, इस बात का ध्यान रखें कि फाउंडेशन और कंसीलर का रंग एक जैसा होना चाहिए।
– अगर आप बहुत अच्छा परिणाम चाहती हैं तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि कंसीलर और फाउंडेशन अच्छी तरह से मिलाए जाएं। अगर आप कंसीलर की दो परतें लगा रही हैं तो दूसरी परत लगाने से पहले थोड़ा पाउडर लगाएं। 
– पहले कंसीलर केवल दो रंगों में उपलब्ध होते थे लेकिन, अब हरे, लैवेंडर और यहां तक कि पीले कंसीलर भी उपलब्ध हैं जो प्रभावशाली तरीके से आपके तिलों को छिपाने में मदद करते हैं।
– क्रीम कंसीलर की एक बूंद के साथ, आप अपने चेहरे पर जादू कर सकते हैं। यह तिल को प्रभावी ढंग से छिपाएगा, चाहे वह कितना ही काला क्यों न हो।

 

अगर ब्वॉयफ्रेंड को पापा से मिलवाने जा रही हैं

अगर आज से 4 या 5 साल पहले अगर यह बात की जाती तो शायद यह सरासर बदतमीजी कही जाती। माना कि आप किसी को पसंद करती हैं और शादी का इरादा भी रखती हैं मगर इतनी हिम्मत तो लड़कियों में ही नहीं अक्सर लड़कों में भी नहीं होती (सच मानिए, आज भी नहीं होती) कि मम्मी और खासकर पापा को जाकर यह कहें कि लो जी, यह रहा जिसे मैने चुन लिया (यह सब फिल्मों में ही होता है। गाने भले ही हीरो हीरोइन को शॉर्ट स्कर्ट में पहननाकर गाए मगर मम्मी से मिलने जाना है तो साड़ी और वह फिर सिर पर पल्ला रखकर पहननी होगी)। यह यही है कि समय के साथ आपके माता-पिता भी बदले हैं। उनकी सोच में भी बदलाव आया है और अब वो अपने बच्चों की सोच और उनकी पसंद को भी अपनाने लगे हैं मगर अब यह मोर्चा सम्भालना इतना आसान नहीं है। जबकि कुछ सालों पहले तक उन्हें ये सुनना भी अच्छा नहीं लगता था कि उनकी बेटी या बेटे ने किसी को अपने लिए चुना है।

अगर आपके पैरेंट्स आपके लिए इतना बदल सकते हैं तो ये आपका फर्ज बनता है कि आप उन्हें अपने हर फैसले में शामिल करें। आप उन्हें अपनी बात समझाने की कोशिश करें कि क्यों वो लड़का या वो लड़की आपके लिए सही है और यकीन मानिए वो आपकी बात जरूर समझेगें। यूं तो मम्मी-पापा को ब्वॉयफ्रेंड के बारे में बताना थोड़ा मुश्क‍िल है लेकिन कुछ छिपाने से बेहतर है कि आप सच बोलें।

अब अगर आपने घर में ब्वॉयफ्रेंड के बारे में बता ही दिया है और उसे अपने पापा से मिलवाने ले जा रही हैं तो कुछ बातों के लिए पहले से ही तैयार हो जाइए. हो सकता है आपको भी उस दौरान उन परिस्थितियों का सामना करना पड़े जिससे ज्यादातर लड़कियां गुजरती हैं:

  1. आपके पापा और ब्वॉयफ्रेंड आमने-सामने बैठे हैं लेकिन दोनों में से कोई कुछ बोल ही नहीं रहा. दोनों बस मुस्कुराए जा रहे हैं।
  1. पापा का इतना सपाट चेहरा आपने पहले कभी नहीं देखा होगा।
  2. दोनों के बीच बातचीत शुरू हो इसलिए आपको ही पहल करनी होगी लेकिन संतुलन बनाकर। हो सकता है दोनों में से किसी एक को ये लग जाए कि आप उस पर ध्यान नहीं दे रहीं।
  3. आपके पापा का पहला सवाल कल के बारे में क्या सोचा है? जबकि आपने अभी तो सिर्फ शादी करने का ही सोच रखा है।
  4. हो सकता है आपके पापा को आपकी पसंद अच्छी लग जाए और वो पूछ बैठें किशादी कब करना चाहते हो?
  5. तुम दोनों कब मिले? कैसे मिले? आपके पापा ये जरूर जानना चाहेंगे।
  6. ज्यादातर घरों ये सवाल मांएं करती हैं वो एकदम से पूछ बैठती हैं कि बेटा! तुम कमाते कितना हो?
  7. जो भी बोलें और और जो भी करें, उनको विश्वास में लेकर ही करें और तभी आपके प्यार की सच्ची जीत है।

नेत्रहीन बेटे को मां ने टेपरिकार्डर से पढ़ाया,  आईआईएम में पढ़ा बनाया अफसर

बिलासपुर.अपने बेटे करन की आंखों की रोशनी चले जाने पर भी छत्तीसगढ़ के कोरबा की अंजू सिंघानिया ने हौंसला नहीं खोया। करन को पढ़ाने पहले खुद सबक पढ़े, फिर टेपरिकॉर्डर पर रिकॉर्ड कर उसे पढ़ाए। एक मां की मेहनत का नतीजा है कि करन सिंघानिया ने डिसीबिएलिटी के बावजूद आईआईएम अहमदाबाद से 2015 में डिग्री ली और अब नामी कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर बना।

मां ने ठाना, बेटे ने कर दिखाया
अंजु के मुताबिक करन की बीमारी मेरे जीवन में सबसे बड़ा झटका थी। मैंने ठाना कि करन को मैं पढ़ाकर ही रहूंगी। खुद पढ़ाई की और उसे भी पढ़ाया। करन की लगन और पति के सहयोग से कोई भी कमी किसी लक्ष्य को हासिल करने में बाधा नहीं बन सकती। करन का स्कूल में टॉप आना फिर श्रीराम कॉलेज में सिलेक्नशन, आईआईएम से पासआऊट होना और एयरटेल जैसा इंडियन मल्टीनेशनल में मैनेजर बनना जैसी कामयाबी एक मां की मेहनत का ही नतीजा है। गुरुवार को कंपनी ने उसे दो महीने की ट्रेनिंग पर साउथ अफ्रीका भेजा है।karan-singhaniya3_1462649aanju

स्कूल ने दाखिला देने से कर दिया था मना

अंजू के पति राजेन्द्र सिंघानिया गेवरा में किराना दुकान चलाते हैं। दो बेटों में करन बड़ा है। पढ़ने में शुरुआत से ही तेज करन दसवीं में मेरिट में आया था। रेटीना पिग्मेंटोसा नाम की बीमारी के कारण आंखों की रोशनी कम होते चली गई। डीएवी स्कूल गेवरा ने उसे अगली क्लास में एडमिशन नहीं दिया। तब अंजु ने ठान लिया कि वह अपने बेटे को घर पर ही पढ़ाएगी। करन ने भी मेहनत की। एनटीपीसी में इंजीनियर मुकेश जैन जो दृष्टिहीन हैं, उन्होंने इनका समय-समय पर मार्गदर्शन किया। अच्छा रिजल्ट आने पर डीएवी ने भूल सुधार कर करन को एडमिशन दिया। 12वीं में टाॅप करने पर उसका सिलेक्नशन श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स में हुआ। यहां से पढ़कर वह आईआईएम में भी सिलेक्ट हुआ। करन की पढ़ाई के लिए अंजु अपने छोटे बेटे अनमोल को लेकर 6 साल पहले दिल्ली गईं, फिर अहमदाबाद और अब गुड़गांव में वह करन के साथ-साथ हैं।karan-singhaniya4_14

आईआईएम में पहली बार मिला दृष्टिहीन को प्रवेश

करन का सिलेक्शन आईआईएम अहमदाबाद में हुआ और उसने 2015 में पढ़ाई पूरी की।100 साल के इतिहास में पहली बार किसी दृष्टिहीन को आईआईएम में एडमिशन का यह पहला मामला था। आईआईएम में चयन से पहले करन ने दिल्ली श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स में पढ़ाई की। करन का कहना है कि मम्मी का जज्बा और संघर्ष ही है कि वह तक पहुंचा है।

 

काबुलीवाला

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  • रवीन्द्रनाथ टैगोर

मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, “बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।” मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। “देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?” और फिर वह खेल में लग गई।

मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, “काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!”

कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।

काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, “बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?”

मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, “इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।” फिर मैं बाहर चला गया।

कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।

काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, “काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?”

रहमत हँसता हुआ कहता, “हाथी।” फिर वह मिनी से कहता, “तुम ससुराल कब जाओगी?”

इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, “तुम ससुराल कब जाओगे?”

रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, “हम ससुर को मारेगा।” इस पर मिनी खूब हँसती।

हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।

कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।

इतने में “काबुलीवाले, काबुलीवाले”, कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, ”तुम ससुराल जाओगे?” रहमत ने हँसकर कहा, “हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।”

रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, “ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।”

छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।

काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।

कई साल बीत गए।

आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।

पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।

मैंने पूछा, “क्यों रहमत कब आए?”

“कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ,” उसने बताया।

मैंने उससे कहा, “आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।”

वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, “ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?”

शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह “काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले” चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, “आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।”

वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।

मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “‘यह थोड़ा सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।”

मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, ‘आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।’ फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी हैं। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।”

उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।

देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहनें पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”

मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।

मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया।

मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।”

 

काम और घर के बीच रखें सही तालमेल

आज के वक्‍त में काम और घर संभालने का जिम्‍मा आपके कंधों पर आता है. इस काम को परफेक्‍शन के साथ करने के लिए जानें  आसान तरीके.

  1. खुद के साथ बैठे:काम और घर की जिम्‍मेदारियों के बीच जीवन कश्‍ती की कश्‍ती गोते न खाने लगे, इसके लिए जरूरी है अपने लिए समय निकालें. खुद को वक्‍त दें। पूरे दिन में 30 मिनट ही सही, मगर अपने साथ बैठें और खुद के बारे में सोचें।
  2. खुद को मत मानें गुनहगार:कभी काम के बीच संतुलन नहीं बन पाए तो इसके लिए खुद को जिम्‍मेदार नहीं माने। कई बार होता है कि काम के चक्कर में महिलाएं बच्चों को पूरा वक्त नहीं दे पाती हैं और इसके लिए खुद को अपराधी मानती हैं। इस सोच से बचें और हम चीज के लिए ईमानदार कोशिश करें।
  3. परवरिश के नए तरीके अपनाएं:परिवार के प्रति जिम्‍मेदारी को निभाने के लिए यह एक अच्‍छा तरीका है कि अपने बच्‍चों के लिए अनुभवी आया रखें। बच्‍चा बड़ा है तो उसे बेस्‍ट डे केयर में भेंजे. बस इस बात का ध्‍यान रखें कि आपके बच्‍चे के लिए क्‍या सही है. इसका चुनाव आपको समझदारी से करना है। कई बार ऐसा होता है कि हम काम को कम करने के लिए सहायक रखते हैं और उसे काम सही से नहीं आने के चलते काम पहले से ज्‍यादा बढ़ जाता है.
  4. सुबह को बनाएं आसान:सुबह कितनी भी जल्‍दी करो, लेकिन सुपरवुमेन बनना ही पड़ जाता है. बेशक सुपरवुमेन बनने में कोई बुराई नहीं लेकिन जरूरी है सारे काम भी सही तरीके से हों इसलिए रात में ही सुबह के कई कामों को पूरा कर लें. मसलन ड्रेस तैयार करना, सब्जी काटकर रखना, मोबाइल चार्ज करना. ऐसा करने से आपकी सुबह की टेंशन कम हो जाएगी।
  1. ऑफिस में बनाएं अच्‍छे रिश्ते ऑफिस के लोगों के साथ अपने रिश्ते अच्‍छे रखें। इससे आप ऑफिस के माहौल में बेहतर महसूस करती हैं। कई बार आपके साथ काम करने वाले ही आपके सबसे बड़े सपार्ट सिस्‍टम बनते हैं।
  2. ऑफिस के टाइम रहें घर से कनेक्‍ट:ऑफिस टाइम में घर के लोगों से फोन पर कनेक्‍ट रहिए. लेकिन इस बात का ध्‍यान रहे कि पूरा ऑफिस घर मत लेते आइए।
  3. कुछ खास करें: कामकाजी होने के बाद घर में आप बहुत समय नहीं दे पाती हैं। ऐसे में छुट्टी के दिन परिवार के साथ आउटिंग जाने का प्‍लान बनाएं. इस तरह आप अपने समय का सही इस्तेमाल कर सकेंगी।
  4. पार्टनर के साथ बिताएं समय:घर और काम इन दोनों चीजों में तालमेल तभी बनता है जब आपकी और आपके पार्टनर के बीच अच्‍छी ट्यूनिंग हो। ऐसे में आपस में वक्‍त बिताना कभी नहीं भूलें।

आने वाले कल के लिए तैैयार रहें आपके बच्चे

अक्सर हम बच्चों के बड़े होने के दौरान ही उन्हें निर्णय लेने की क्रिया से वंचित करते चलते हैं और फिर जब वे बड़े हो जाते हैं तब एकाएक उन्हें कहने लगते हैं कि अब बड़े हो गए हो, अपने निर्णय खुद ही करो। उस पर जब उनका निर्णय गलत सिद्ध होता है तब हम उन्हें ही दोष देने लगते हैं कि इतने बड़े हो गए, लेकिन अब तक यह समझ नहीं आया कि अपने लिए क्या सही है और क्या गलत है?

बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा होने देना सिर्फ एक कहावत नहीं है, बल्कि उन्हें हर तरह से आने वाले जीवन और हकीकतों के सामने खड़े होने और लड़ने की ताकत देना है। इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जब बच्चे घर से बाहर पढ़ने के लिए जाते हैं तब लड़कियां लड़कों की तुलना में जल्दी सामंजस्य बैठा लेती है। हो सकता है इसके सामाजिक कारण भी हो, लेकिन एक बात यह भी है कि बहुत सारे मामलों में लड़कियां ज्यादा लचीली होती है और दूसरे घर के छोटे-मोटे कामों में मां का हाथ बंटाते-बंटाते वह कब आत्मविश्वास पा लेती है, इसका उन्हें खुद भी ज्ञान नहीं होता है।

अपने बच्चों को बाहरी दुनिया में रहने के लिए प्रशिक्षण दें। कभी अपने घर के आंगन में अपने बच्चों को उड़ना सिखाती चिड़िया को देखें तो आपको एहसास होगा कि उड़ने की कला उन्हें प्रकृति से मिली जरूर है, लेकिन कौशल उन्हें खुद ही हासिल करना होता है। देखें आप अपने बच्चे को कैसे आत्मविश्वासी और आत्म-निर्भर बना सकते हैं।

उन्हें एक कोना दें

चाहे जो परिस्थिति हो, आप अपने बच्चे को एक ऐसा कोना जरूर उपलब्ध कराएं, जिसे वह स्वयं व्यवस्थित करें। याद करें स्कूलों में बच्चों को दिया जाना वाला लॉकर। इसी तरह एक ड्रॉवर या एक लॉकर उसे जरूर दें, जहां वह अपनी चीजें व्यवस्थित कर रख सकें। इससे उसमें जिम्मेदारी का भाव भी आएगा और निर्णय करने की क्षमता का विकास भी होगा। जब वह उसे अपनी तरह से व्यवस्थित कर पाएगा तो उसमें आत्मविश्वास भी आएगा।

छोटे-छोटे निर्णय करने दें

अपने बच्चे को छोटे-छोटे निर्णय स्वयं करने दें। जैसे अपने दोस्त की बर्थडे पार्टी में वह क्या पहन कर जाना चाहता है? या फिर डिनर के लिए जाते हुए वह किस तरह के कपड़े पहनना चाहता है? या रेस्टोरेंट में उसे स्वयं अपना ऑर्डर देने के लिए कहें। आइसक्रीम का कौन-सा फ्लैवर या किस तरह का पित्जा वह खाना चाहता है, इसका निर्णय उसे स्वयं करने दें।

अपने रिश्ते उसे ही निभाने दें

यदि उसके दोस्त का जन्मदिन है या वह अपने दोस्त को किसी खास मौके पर पार्टी देना चाहता है या गिफ्ट देना चाहता है तो उसे खुद ही निर्णय करने दें। यदि वह आपसे राय मांगे तो उसे सुझाव दें। उसके समक्ष विकल्प रखें, उसे निर्णय न सुनाएं। उससे पूछे कि उसके दोस्त की रूचि क्या करने में है? उसी हिसाब से वह उसे गिफ्ट दें, लेकिन यह न बताएं कि उसे क्या गिफ्ट दे!

घर के छोटे-छोटे काम करने के लिए कहें

भारतीय घरों में अक्सर घर के कामों को लड़कियों के हिस्से में माना जाता है। ऐसे में अक्सर हम लड़कों को इससे अलग रखते हैं। लेकिन अब चूंकि लड़कों को भी अलग-अलग वजहों से घर से बाहर जाना पड़ता है, इसलिए उन्हें भी घर के काम करना आना चाहिए। इससे घर से बाहर एडजस्ट करने में उन्हें असुविधा नहीं होगी। खासतौर पर चाय बनाना, नाश्ता बना पाना और हां अपने कपड़ों को खुद ही धोना अपने बच्चे को जरूर सिखाएं।

अपनी समस्याओं को उन्हें ही हल करने दें

भाई-बहनों के बीच के झगड़े हो या फिर दोस्तों के बीच हुए विवाद…बच्चे को अपनी समस्याओं से खुद ही लड़ने को कहें। स्कूल के कार्यक्रम में भाग के लिए डांस की तैयारी करनी हो या फिर कॉस्ट्यूम अरेंज करना हो, बच्चों को मार्गदर्शन तो दें, लेकिन उसका काम आप न करें। इस तरह की छोटी-छोटी चीजें करके आप बच्चे को भविष्य के लिए तैयार कर सकती हैं। आखिर उसे आपके घर की छत से बाहर जाकर अपने लिए जमीन तलाशनी है और दुनिया बनानी है। अपनी छाया से अलग करके ही आप उसे विकसित होने का अवसर देंगी, ये न सिर्फ आपके लिए बल्कि स्वयं बच्चे के लिए भी अच्छा होगा।

 

केदारनाथ अग्रवाल की कविताएं

Kedarnath_Agarwal

मजदूर का जन्म

एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
हाथी सा बलवान,
जहाजी हाथों वाला और हुआ !
सूरज-सा इन्सान,
तरेरी आँखोंवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ!
माता रही विचार,
अँधेरा हरनेवाला और हुआ !
दादा रहे निहार,
सबेरा करनेवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !
जनता रही पुकार,
सलामत लानेवाला और हुआ !
सुन ले री सरकार!
कयामत ढानेवाला और हुआ !!
एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ !

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जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है

जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है
तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है
जिसने सोने को खोदा लोहा मोड़ा है
जो रवि के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

जो जीवन की आग जला कर आग बना है
फौलादी पंजे फैलाए नाग बना है
जिसने शोषण को तोड़ा शासन मोड़ा है
जो युग के रथ का घोड़ा है
वह जन मारे नहीं मरेगा
नहीं मरेगा

बच्चों को न लगे गर्मी की नजर

बच्चे खेलने के दौरान सबकुछ भूल जाते हैं। खेलने के दौरान न तो उन्हें गर्मी लगती है और न ही थकान होती है लेकिन सूरज की गर्मी और ताप उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। गर्मी लगने से एक ओर जहां कमजोरी हो जाती है वहीं दूसरी ओर कई बीमारियों के होने का खतरा भी बढ़ जाता है। अब बच्‍चे हैं तो हम उन्हें खेलने-कूदने से रोक नहीं सकते पर आप चाहें तो इन उपायों को अपनाकर आप अपने बच्चों को सुरक्षि‍त रख सकती हैं.
 गर्मी के मौसम में बच्चों की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है. इस दौरान बच्चों को डायरिया, लू लगने, पेट में जलन होने, उल्टी होने, पीलिया होने, टाइफाइड होने की आशंका बढ़ जाती है. इसलिए बच्चों के खानपान का पूरा ध्‍यान रखें और उन्‍हें हल्का, पौष्टिक आहार दें. करें.
 खेलने के दौरान बच्चे सबकुछ भूल जाते हैं और मौसम का ध्‍यान दिए बिना ही खेलते रहते हैं. ऐसे में ध्यान रखें कि बच्चा तेज धूप या लू के समय न खेले. शाम होने पर ही बच्चे को बाहर जाने दें. दिन में उसे इन्डोर गेम खेलने के लिए कहें।
– गर्मियों में शाम के वक्त मच्छर और कीड़े काफी सक्रिय हो जाते हैं. ऐसे में जब बच्चा खेलने जा रहा हो तो उसे कीड़ों और मच्छरों से सुरक्षा प्रदान करने वाली क्रीम लगाकर ही बाहर भेजें।
 कोशि‍श करें कि बच्चा बाहर की कोई चीज न खाए. डी-हाइड्रेशन से बचाने के लिए बच्चों को ज्यादा से ज्यादा लिक्वि‍ड दें. उन्हें घर में ही बना जूस, नीबू पानी या फिर नारियल पानी पीने को दें. बच्चे को छाछ, ताजे फलों का रस, मिल्क शेक भी दे सकते हैं। इसके अलावा खीरा, ककड़ी और तरबूज भी खाने को दे सकते हैं. इनके सेवन से बच्चे के शरीर में पानी की कमी नहीं होगी।
– गर्मियों के दिनों में बच्चों को दिन में दो बार नहाने की आदत डलवाएं. बच्चे को सूती कपड़े ही पहनाएं और कपड़ों को रोजाना बदलें. कहीं भी बाहर से आने पर उसके हाथ पैर अच्छी तरह से साबुन से साफ करवाएं. ऐसा करने से संक्रमण का खतरा कम हो जाएगा।
 मौसम का ध्‍यान रखते हुए सर्द-गर्म का ख्‍याल रखें जैसे, अगर बच्‍चे धूप में खेलकर वापस आएं तो कूलर के सामने न बैठने दें और तुरंत ही ठंडा पानी भी न दें।
– गर्मी के मौसम में कंजक्टिवाइटिस होने का खतरा भी बढ़ जाता है. इसलिए थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद बच्चों की आंखें ठंडे पानी से धुलवाते रहें. इससे बच्चों की आंखों में ड्राइनेस भी नहीं होगी। 
– बच्चों को गर्मियों में अक्सर घमौरियों और सनबर्न की समस्या हो जाती है. इनसे बचाने के लिए बच्चों को ग्लिसरीन युक्त साबुन से दिन में दो बार ठंडे पानी से नहलाएं और घमौरी नाशक पाउडर का इस्तेमाल करें.

 

शादी से पहले लड़की ने रखी ऐसी शर्त कि सन्न रह गए ससुरालवाले

मध्य प्रदेश की प्रियंका भदोरिया ने शादी से पहले ससुराल वालों के सामने एक ऐसी माँग रख दी जिसे सुनकर सबके कान खड़े हो गए।

प्रियंका ने अपने ससुराल वालों से साफ कह दिया कि जब तक वे 10 हजार पौधे नहीं लगाएंगे, वो शादी नहीं करेंगी। ससुराल वालों को ये सुनना थोड़ा अजीब जरूर लगा लेकिन उन्होंने प्रियंका की मांग मान ली और बीते शुक्रवार घूमधाम से उन्होंने प्रियंका के साथ अपने बेटे की शादी करवा दी।

प्रियंका भिंड के किशीपुरा गांव की रहने वाली हैं जहां शादी से पहले दुल्हन से पूछा जाता है कि उसे क्या चाहिए। आमतौर पर लड़कियां गहने, कपड़े मांगती हैं वहीं प्रियंका ने ये सबकुछ नहीं मांगकर, पेड़ लगाने की शर्त रखी। प्रियंका 10 साल की उम्र से पौधे लगा रही है और इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि उनकी शादी भी इंटरनेशनल अर्थ डे के दिन ही हुई।

प्रियंका के पति रवि चौहान भी अपनी पत्नी की सूझबूझ से काफी खुश हैं। उन्हें खुशी है कि उनकी पत्नी पर्यावरण के प्रति इतनी सजग हैं। प्रियंका चाहती हैं कि 10 हजार पौधे की शर्त में से पांच हजार पौधे उनके मायके में लगाए जाएं और पांच हजार उनके ससुराल में। आज जहां देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे से प्रभावित है ऐसे में प्रियंका की ये पहल वाकई एक जरूरी और बेहतरीन प्रयास है।