Wednesday, March 18, 2026
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नशे से मुक्ति के लिए जरूरी है ध्यान

हमें इस बात को समझना चाहिए की किसी भी प्रकार के नशे की लत आम तौर पर रातों रात नहीं होती अपितु यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जिसका असर कुछ वर्षों पूर्व दिखाई पडऩे लगती है।

हाल ही में एक ऑस्ट्रेलियाई युवा लडक़े द्वारा आइस ड्रग नामक नशीले द्रव्य के प्रभाव में अपनी ही आंखों को निकालकर खा जाने की भयंकर खबर ने समस्त जगत को हिलाकर रख दिया है और हमें गहराई से यह सोचने पर मजबूर कर दिया की इस तरह के प्रलोभन जो हमारे जीवन के लिए घातक हैं, उनके अंदर इस तरह फंसना, कहां की समझदारी है?

वर्ष 2012 में भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा किये गये सर्वेक्षण के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि 15-19 वर्ष की आयु के 28.6 प्रतिशत लडक़े तंबाकू का सेवन करते हैं और 15प्रतिशत लडक़े शराब के आदी है। इसी प्रकार से 15-19 वर्ष की आयु की 5.5प्रतिशत लड़कियां तबाकू का सेवन करती हैं और 4 प्रतिशत शराब की आदी हैं।

क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात है हमारे समाज द्वारा इन बच्चों की मदद करने के बजाय उनका तिरस्कार कर उन्हें समाज से बाहर निकालना। समाज के एक अंग के रूप में हमें इस बात को समझना चाहिए की किसी भी प्रकार के नशे की लत आम तौर पर रातों रात नहीं होती अपितु यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, जिसका असर कुछ वर्षों पूर्व दिखाई पडऩे लगती है।

ऐसे नशेड़ी शुरू-शुरू में जिज्ञासावश अपने मनोरंजन के लिए नशीली दवाओं का सेवन कर उसका आनंद उठाते हैं, परन्तु थोड़े ही समय में वह एक ऐसी कठिन आदत में तदील हो जाती है जो आगे चल कर उनके विनाश का कारण बनती है। सामाजिक वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसे नशेडिय़ों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हालत तो खराब होती ही हैं, किन्तु उसके साथ-साथ सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता है और उनके परिवार की सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचता है। ऐसे व्यक्ति फिर सभी के लिए बोझ स्वरुप बन जाते हैं और समाज में एवं राष्ट्र के लिए उनकी उपादेयता शून्य हो जाती है।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ज्यादातर नशीली दवाओं के नशेड़ी काफी अपरिपक्व स्वभाव के होते हैं और असुरक्षित व्यक्तित्व से ग्रस्त होते हैं, परिणामस्वरूप उनके आत्मविश्वास का स्तर बिलकुल निम्न होता है। मनोचिकित्सा क्षेत्र में की गई शोध के अनुसार ऐसे लोगों को विभिन्न मनोवैज्ञानिक समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं, विशेषत: अपने करीबी परिवार से इन्हें काफी जूझना पड़ता है।

पिछले कुछ वर्षों में किए गए अनुसंधान में स्पष्ट रूप से यह साबित हुआ है कि मैडिटेशन (ध्यान धारणा) नशामुक्ति के लिए एक प्रभावी साधन है। शोधकर्ताओं ने नशामुक्ति केंद्र में रखे नशेडिय़ों के एक झुंड की जांच के दौरान यह पाया कि उनमें से जिन्हें मेडिटेशन की तालीम दी गई थी, उनके अंदर सकारात्मक परिणाम देखा गया, जबकि जिन्हें पारंपरिक उपचार दिया गया, वे काफी आक्रामक और फिर सुन्न बन गये।

इसलिए यह कहने में कोई मुश्किलात नहीं होनी चाहिए की ड्रग्स की लत के उन्मूलन के लिए मेडिटेशन यथोचित उपाय है। किन्तु कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है की मेडिटेशन ही क्यों? क्योंकि विज्ञान द्वारा यह सिद्ध किया गया है की यह मस्तिष्क की महत्वपूर्ण कोशिकाओं को सजीव कर व्यक्ति के भीतर आत्म जागरूकता बढ़ाने का कार्य करता है और उसे संयमी बनता है और किसी भी तरह के नशे से मुक्ति के लिए संयम आवश्यक है।

नशे से दूर रहना है तो अपने हितों के प्रति जागरूक रहें : संयम कई समस्याओं का समाधान है, लेकिन जहां तक नशामुक्ति का सवाल है संयम से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। वास्तव में यदि हम अपने हितों के प्रति जागरुक रहते हैं तो हम किसी भी नशे की चपेट में आ ही नहीं सकते, पर यदि आ भी जाए तो थोड़ा सा संयम और आत्म प्रेरणा द्वारा हम इस धीमे जहर से सहज ही मुक्त हो सकते हैं। तो आइए आज से यह पाठ पक्का करें कि नशा नाश की जड़ है, अत: इससे बचकर रहने में ही भलाई है। जो समझदार हैं वह नशे को नाश कहकर जीवन का चयन करेगा।

– (साभार)

जो कभी करते थे चोरी, इस लेडी कांस्टेबल ने उन्हें बनाया राष्ट्रीय खिलाड़ी

पटना.जो बच्चे कभी नशे के लिए चोरी करते थे, उन्हें एक महिला कांस्टेबल ने मेडल जीतना सिखा दिया। ये कांस्टेबल हैं- रंजीता कुमारी सिंह जो इंडियन वुमन फुटबॉल टीम की पूर्व खिलाड़ी हैं। रंजीता बिहार के मुंगेर एसएसपी ऑफिस में तैनात हैं। रंजीता बताती हैं- मैं सड़कों पर जब बेघर बच्चों को बोनफिक्स (एक प्रकार की बाम) का नशा करते देखती तो उनके भविष्य के बारे में सोचकर ही कांप जाती थी।

रंजीता ने बताया कि नशा करने वाले कुछ बच्चे तो चोरी तक करने तक लगे थे।  कुछ ऐसे भी थे जो मजदूरी या फेरी लगाने वाले परिवार से थे। इनके जीवन को दिशा देने के लिए रंजीता ने अपना हुनर इन्हें सिखाने की ठानी। वे फुटबॉल खेलती थीं तो बच्चों को ग्राउंड पर बुलाना शुरू कर दिया। यह शुरुआत भी आसान नहीं थी। पहले तो उनके माता-पिता फिर बच्चों की काउंसलिंग करनी पड़ी। बच्चे धीरे-धीरे ग्राउंड पर आने लगे। अब रंजीता इन बच्चों को रोज मुंगेर के पोलो ग्राउंड में सुबह छह से आठ बजे और शाम पांच से अंधेरा होने तक ट्रेनिंग कराती हैं।

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रंजीता का प्रयास अब आकार भी लेने लगा है, उसकी कोचिंग से फुटबॉल सीखे 50 से ज्यादा बच्चे 12 से 16 आयु वर्ग की नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं।इनमें नौ बच्चे तो ऐसे हैं, जो कभी नशे की लत के शिकार थे। रंजीता खुद 20 से ज्यादा बच्चों का स्कूलों में एडमिशन करवा चुकी हैं।

रंजीता से फुटबॉल कोचिंग ले रहा शशि कहता है- मैं नशा करता था। दीदी ने कई बार समझाया। फिर ग्राउंड पर आने लगा। नशा कब छूट गया, पता ही नहीं चला। 11वीं में हूं। छह बार नेशनल खेल चुका हूं। एक अन्य स्टूडेंट सुधीर ने कहा- मेरे पिता सफाई कर्मी हैं। आमदनी ज्यादा नहीं थी इसलिए पढ़ाई रुक गई। दीदी ने स्कूल में दाखिला दिलवाया। फुटबॉल भी सिखाया। नेशनल खेल चुका हूं, इसलिए मुंगेर के सबसे अच्छे जिला स्कूल में स्पोर्ट कोटे से 11वीं में एडमिशन मिल गया। रंजीता से कोचिंग लिए हुए 35 बच्चे नेशनल चैंपियनशिप में खेल चुके हैं। 5 बच्चों का स्पोर्ट्स ऑथारिटी ऑफ इंडिया के लिए चयन हुआ है। दो लड़कों की इंडियन आर्मी में खेल की बदौलत नौकरी हो चुकी है। एक लड़के का रेलवे में चयन हुआ है।

कभी लड़ाई-झगड़े करने वाला कुंदन अब गोलकीपर है। बताता है- बड़े भाई अपराधी थे, उनकी हत्या हो गई। मैं भी उसी राह पर था। एक दिन दीदी आईं। पूछा- गोलकीपर बनोगे? मैंने हां कह दी। आज जिला टीम में हूं। एसएससी पास कर लिया है, नौकरी भी मिल जाएगी।

 

जेल में रहकर पिता ने बेटे को दिखायी आईआईटी की राह

कोटा.राजस्थान के कोटा में हत्या के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे शिक्षक पिता का बेटा पीयूष अब आईआईटीयन बनेगा। पीयूष की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उसने पिता के साथ खुली जेल की 8X8 फीट की छोटी से कोठरी में रहकर ही पढ़ाई की।

बेटे की पढ़ाई में कोई कमी न रह जाए इसलिए पीयूष के पिता फूलचंद मीणा दिनभर मजदूरी करते थे। पीयूष शाम 6 बजे से रात 2 बजे तक कोठरी के बाहर ही बैठा रहता था। रिजल्ट आया उसकी एसटी वर्ग में 453वीं रैंक आई।  बता दें कि पीयूष के पिता फूलचंद मीणा सरकारी टीचर थे। 2001 में हत्या के आरोप में फूलचंद, उनके भाई, तीन भांजे व पिता सजा काट रहे हैं।

फूलचंद सहित 5 लोगों को 2007 में आजीवन कारावास की सजा हो गई। जेल में फूलचंद से जब भी उनकी पत्नी मिलने आती वो उससे बेटे पीयूष मीणा की पढ़ाई पर ध्यान देने को कहते। इस दौरान अच्छे व्यवहार के चलते फूलचंद को कोटा की खुली जेल में रख दिया। इसके बाद उन्होंने पत्नी और बेटे पीयूष को अपने पास ही बुला लिया। पढ़ाई में पैसे की कमी न आए इसलिए फूलचंद ने मजदूरी कर ली। इसके बावजूद कोचिंग में एडमिशन के लिए पैसे कम पड़े तो रिश्तेदारों से उधार लेकर बेटे का एडमिशन करवाया। – पैसों की तंगी के चलते पीयूष को हॉस्टल में नहीं रख सकते थे। पीयूष ने जेल की कोठरी में ही रहकर सालभर पढ़ाई की।

खुली जेल में मीणा की कोठरी इतनी छोटी थी कि उसमें तीन लोग ठीक तरह से रह नहीं सकते थे। इसके चलते उन्होंने बेटे का कोचिंग में एडमिशन करवाने के बाद पत्नी को गांव भेज दिया। पीयूष जेल से ही टेम्पो से कोचिंग पढ़ने जाता था और रोज घर पर 6 से 8 घंटे पढ़ता था।

पीयूष ने बताया कि पिता ने ही मुझे इंजीनियरिंग की तैयारी करने का हौसला दिया। परिवार वालों ने मना किया कि पैसे नहीं है और कोचिंग करना बेकार है। शुरुआत में कोचिंग में रिजल्ट ठीक नहीं रहा तो तनाव में आ गया। सोचा कि अगर सफल नहीं हुआ तो पिता के सम्मान को ठेस पहुंचेगी। पिता ने समझाया कि तनाव नहीं ले और केवल पढ़ाई पर ध्यान दे। पढ़ाई के चलते सालभर किसी रिश्तेदार के यहां नहीं गया, कोई कार्यक्रम अटेंड नहीं किया।

पीयूष ने बताया कि उसका सपना आईएएस बनने कहा है। मेरे रिश्तेदार आरएएस अफसर ने भी शुरुआत में समझाया था कि पहले किसी मुकाम पर पहुंच जाओ। उसके बाद आगे के लिए रास्ते खुले रहेंगे।

 

कभी स्टेशन पर गुजारी थी रातें, अब धूम मचाते हैं इनके गाने

बिहार गया जिले के शशि सुमन की पहचान एक सफल म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में होती है। शुरुआती दिनों में शशि ने मुंबई में स्टेशन पर कई रातें गुजारी थी। अब उनके कम्पोज किए गाने बॉलीवुड में धूम मचाते हैं।

शशि ने हालिया रिलीज ‘सरबजीत’ के नंदिया गाने का म्यूजिक कम्पोज किया है। इससे पहले उन्होंने संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘मैरीकॉम’ में सात गानों का म्यूजिक कम्पोज किया था। गया जिले के बजौरा गांव में रहने वाले शशि सुमन को बचपन से ही संगीत में रुचि थी।

म्यूजिक के शौक के चलते शशि ने ‘इंडियन आइडल’ और ‘सारेगामापा’ में फाइनल तक का सफर तय किया। इसके बाद शशि ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उन्होंने इसके बाद मुंबई में ही रहना पंसद किया। शुरुआती दिनों में जब उनके पास घर नहीं था तो उन्होंने कई रातें स्टेशन पर गुजारी थी।

शुरुआती दिनों में शशि सुमन गाना गाते थे तो गांव वाले कहते थे कि गवैया बन गया है। शशि के पिता राम प्रवेश सिंह आरा में डीईओ हैं और उन्हें तबला बजाने का शौक है। उन्होंने ही शशि को तबला बजाना सिखाया और फिर इसके बाद शशि ने तय कर लिया कि उन्हें म्यूजिक में ही आगे जाना है। शशि जब थोड़ा बहुत-गाने बजाने लगे तो वे पढ़ाई छोड़कर म्यूजिक सीखने लखनऊ चले गए।

शशि ने लखनऊ में किराना घराने में संगीत गुरु गुलशन भारती से संगीत की शिक्षा ली है।  इस दौरान सारेगामा का ऑडिशन हुआ था और उसमें शशि ने भाग लिया और उनका सेलेक्शन हो गया। आदेश श्रीवास्तव ने वहीं उन्हें सुना था और प्रकाशा झा की फिल्म राजनीति के लिए ‘मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं’ गाने का मौका दिया। इसके बाद वे 2010 में इंडियन आइडल में गये थे। इंडियन आइडल-5 के फाइनलिस्ट रहे शशि सुमन ने इस कार्यक्रम के खत्म होने के बाद मुंबई नहीं छोड़ा और वहीं जम गए। इसके बाद उन्होंने अंधेरी में एक फ्लैट लिया और स्टूडियो खोल दिया।

 

बच्चों को न लगे इंटरनेट की नजर

इस दौर के माता-पिता के पास पारंपरिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ अब एक नई जिम्मेदारी भी आन पड़ी है अपने बच्चों को साइबर वर्ल्ड के खतरों से बचाने की। यदि आप अब इस आभासी दुनिया का हिस्सा होने जा रहे हैं तो हम आपको बता सकते हैं कि आप किस तरह अपने बच्चों के साइबर अनुभव को सकारात्मक बना सकते हैं।

पहले आप इस दुनिया का हिस्सा बनें –इस खतरे से लड़ने का सबसे पहला नियम है कि आप सूचनाओं से लैस रहें। इस दुनिया में कूद जाएं और इसके आधारभूत नियमों को समझें। इससे संबंधित लेख पढ़ें, जरूरी हो तो क्लास में जाएं, दूसरे पेरेंटस से चर्चा करें। आपको इसके लिए महारथी होने की जरूरत नहीं है। इसके लिए आप बेसिक्स ही सीख लें। यह ही आपकी मदद करेगा।

बच्चे से संवाद करें –अपने बच्चे से संवाद करें। आप उससे इंटरनेट के खतरे और फायदों की चर्चा करें। अपने बच्चों की इंटरनेट गतिविधियों पर ध्यान दें। जानें कि बच्चे की पसंदीदा वेबसाइट कौन-सी है, वह कौन-से ऑनलाइन गेम्स खेलता है और इंटरनेट पर उसकी रुचियां क्या हैं? और अपने बच्चे से यह पूछने से जरा भी नहीं हिचकें कि वह किससे चैट करता है और वे आपस में किस तरह की बातें करते हैं।

बच्चे को कुछ हिदायतें दें –बच्चे को बताएं कि वह किसी भी हालत में अपनी व्यक्तिगत जानकारी किसी अजनबी को इंटरनेट पर नहीं देगा। साथ ही यह भी कि यदि उसे इंटरनेट पर कुछ भी असुविधाजनक या आपत्तिजनक लगा तो वह तुरंत उसकी जानकारी आपको दे। अगर आप बच्चे को पहले ही हिदायत देंगे तो वह खुद भी सुरक्षात्मक कदम उठा सकेगा।

कम्प्यूटर पर नियंत्रण रखें –ऐसे सॉफ्टवेयर जिनकी मदद से आप अपने कम्प्यूटर पर कुछ साइट्स को ब्लॉक कर सकते हैं, उन्हें खोजकर उनका इस्तेमाल करें। कम्प्यूटर पर बिताने के लिए समय निश्चित कर दें। बच्चे के इंस्टेंट मैसेंजर चैट को भी प्रोटेक्ट करके रखें। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आप उसकी आजादी को कम कर रहे हैं बल्कि यह है कि आप उसकी सुरक्षा कर रहे हैं।

परिवार के साथ इंटरनेट का लाभ लें – आप अपने और अपने बच्चे के साथ-साथ परिवार को भी इंटरनेट से फायदा उठाने के लिए प्रेरित करें। इससे आपके साथ-साथ आपका परिवार भी बच्चे की वर्चुअल दुनिया पर नजर रख सकेगा। अगर परिवार के ज्यादातर सदस्य सोशल मीडिया पर हैं तो बच्चों की थोड़ी-बहुत निगरानी तो आसानी से हो ही सकती है।

 

भारत बना एमटीसीआर का सदस्य

 

भारत अब मिसाइल तकनीक नियंत्रण व्यवस्था (एमटीसीआर) में पूर्ण सदस्य के तौर पर शामिल हो गया है। भारत ने हाल ही में एमटीसीआर से जुड़े दस्तावज़ों पर हस्ताक्षर किए हैं. इस व्यवस्था में पहले से 34 देश सदस्य हैं और भारत इसका 35वां सदस्य बना है। विदेश मंत्रालय से जारी बयान में कहा गया है कि ”भारत एमटीसीआर के सभी 34 देशों का धन्यवाद करता है कि उन्होंने भारत की भागेदारी का समर्थन किया। ”भारत की यह एंट्री ऐसे समय में हुई है जब पिछले दिनों न्यूकलियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत को सदस्य नहीं बनाया गया था। एमटीसीआर में चीन सदस्य देश नहीं है। एमटीसीआर, एनएसजी जैसा ही एक ग्रुप है जिसके तहत ये देश मिलकर सामान्य हथियारों, परमाणु हथियारों, जैविक और रासायनिक हथियारों और तकनीक पर नियंत्रण करते हैं। एमटीसीआर का मुख्य उद्देश्य मिसाइलों, संपूर्ण राकेट प्रणालियों, मानवरहित विमानों और इससे जुड़ी तकनीक के प्रसार को रोकना है. इसके अलावा एमटीसीआर व्यापक जनसंहार के हथियारों के प्रसार को रोकने का भी काम करता है।

 

दुनिया को ये बताना चाहती हैं प्रियंका चोपड़ा

प्रियंका चोपड़ा को स्पेन में चल रहे इंटरनेशनल इंडियन फिल्म एकेडमी को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड मिला है। प्रियंका इनदिनों हॉलीवुड की ‘बेवॉच रिबूट’ में ‘ड्वेन ‘द रॉक’ जॉनसन और ज़ैक एफ़रन के साथ शूटिंग में व्यस्त हैं। बेवॉच में वो निगेटिव किरदार में हैं जो उन्हें पसंद है। उन्होंने कि उन्हें अमरीका में आए साल भर ही हुए हैं और अभी लंबी दूरी तय करनी है। वह कहती हैं कि वो दुनिया को यह बताना चाहती हूं कि बॉलीवुड में सिर्फ गाने पर डांस करने वाले हम जोकर नहीं हैं. ‘मैं दुनिया को बताना चाहती हूं कि भारत के कलाकार ‘जोक’ नहीं हैं। ‘”लोग सोचते हैं कि हम हॉलीवुड की नक़ल कर रहे हैं लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही इंडस्ट्री में से एक हैं। हम हिंदी बोलते हैं जो सिर्फ़ एक ही देश में बोली जाती है लेकिन हमारी इंडस्ट्री का चालीस प्रतिशत व्यवसाय भारत के बाहर से आता है।.”

 

टीम इंडिया के नए कोच बने अनिल कुंबले

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने अनिल कुंबले को भारतीय क्रिकेट टीम का नया हेड कोच नियुक्त किया है। धर्मशाला में हुए एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में बीसीसीआई के प्रमुख अनुराग ठाकुर ने उनके नाम की घोषणा की। इस मौक़े पर बीसीसीआई के सचिव अजय शिर्के भी मौजूद थे। अनुराग ठाकुर ने बताया कि पूरी तरह पारदर्शी प्रक्रिया के बाद नए हेड कोच का चयन किया गया है। ऐसी रिपोर्टें हैं कि पूर्व क्रिकेटर रवि शास्त्री और अनिल कुंबले में ही इस पद के लिए टक्कर थी। सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण और संजय जगदाले की सलाहकार समिति ने मुख्य कोच का चयन किया। बीसीसीआई ने नए कोच की नियुक्ति के लिए एक जून से अर्जियां मंगाई थीं और आवेदन करने की आखिरी तारीख 10 जून तय की थी। बोर्ड को कोच के आवेदन के लिए कुल 57 आवेदन मिले, बोर्ड ने इस सूची में से 21 लोगों को इंटरव्यू के लिए चुना। दरअसल 2001 में पहली बार बीसीसीआई ने विदेशी कोच पर दांव लगाया था. तब न्यूज़ीलैंड के जॉन राइट को कोच की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। आधिकारिक तौर पर अजित वाडेकर भारतीय टीम के पहले कोच थे. इसके बाद बोर्ड ने संदीप पाटिल, अंशुमान गायकवाड़ और कपिल देव को कोच नियुक्त किया। राइट के कार्यकाल के बाद ग्रेग चैपल ने मुख्य कोच की ज़िम्मेदारी संभाली. फिर दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन के कार्यकाल में भारतीय टीम ने कई टूर्नामेंट जीते और अपनी ज़मीन पर विश्व कप भी जीता। कर्स्टन के बाद डंकन फ्लेचर ने कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन उनका कार्यकाल कर्स्टन की तरह सफल नहीं रहा।

 

खुद पर यकीन रखें और आर्थिक तौर पर सजग रहें

बेबाक होना आसान नहीं होता और उससे भी मुश्किल है बेबाकी के साथ लिखना। इस पर भी अगर आप महिला हैं तो मर्यादा, शालीनता न जाने कितने भारी – भरकम शब्दों को जीना पड़ता है। अपने ब्लॉग बकबक पर बकबक करने वाली माधवीश्री यूँ तो पत्रकार ही हैं मगर इन दिनों लेखन में हाथ आजमा रही हैं और तारीफें भी बटोर रही हैं। लाडली मीडिया अवार्ड की विजेता माधवी श्री का पहला उपन्यास वाह! ये औरतें इन दिनों काफी पसंद किया जा रहा है। अपराजिता की माधवीश्री से हुई बातचीत के कुछ अंश –

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मेरा जन्म और परवरिश कोलकाता में ही हुई। मैंने कॉमर्स की पढ़ाई की है और मुझे सीए बनना था, पहला चरण पार भी कर गयी। दूसरे चरण की पढ़ाई के दौरान माँ की मृत्यु हो गयी। तब खबर नहीं थी कि यह घटना मेरे जीवन को कहाँ तक बदलेगी मगर उसके बाद ही जीवन के संघर्षों से सामना हुआ। तब पता चला कि इंसान को खुद अपना सहारा बनना पड़ता है और मैंने भी यही किया। माँ तो अब भी याद आती हैं मगर मेरा झुकाव लेखन की तरफ होने लगा। जनसत्ता में लिखना शुरु किया तो धीरे – धीरे पहचान भी बनने लगी मगर अंदरूनी राजनीति से भी सामना हुआ। तब पत्रकारिता की दुनिया में महिलाएं कम थीं और उस समय न तो मुझे घर से सहयेग मिला और न ही कार्यक्षेत्र से। पत्रकारिता में फायदे की बहुत अधिक कल्पना नहीं की जा सकती थी। सीए बनने का सपना अधूरा रह गया मगर लेखन जारी रहा। तब मैं लेखन के अतिरिक्त सेमिनार वगैरह भी करवाती थी मगर कोलकाता से बाहर जाकर कुछ करने की इच्छा जोर पकड़ने लगी और कुछ समय तक रहने के बाद लगा कि अब यह मेरी पहचान बनाने का समय है और मैं दिल्ली चली आई।

दिल्ली में आकर नौकरी की तलाश और स्वतंत्र पत्रकारिता करना आसान नहीं था मगर ईश्वर की कृपा से मेरी सहेली पत्रिका में मुझे नौकरी मिल गयी। हालात से मैंने हार नहीं मानी। इसके बाद कई संस्थानों में पढ़ाया जिसमें देश का प्रख्यात संस्थान इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मासकॉंम भी शामिल है। मेरे विद्यार्थी चुनाव आयोग से लेकर कई चैनलों में हैं।

घर, बाहर और समाज में महिलाओं के प्रति जो नजरिया मैंने देखा, उसे देखकर जेंडर इक्वेलिटी से संबंधित समस्याओं पर लिखा मगर उसका प्रकाशित होना इतना आसान नहीं था। दिल्ली का माहौल काफी अलग है मगर यहाँ रहकर मैंने काफी कुछ सीखा है।

समस्या यह है कि पिछले 10 सालों में लड़कियाँ जितनी तेजी से आगे बढ़ी हैं, समाज उस गति से आगे नहीं बढ़ा है। मुझे लगता है कि लड़कियों के लिए सिंगल रूम फ्लैट की व्यवस्था की जानी चाहिए जो कि सस्ते ब्याज दरों पर उपलब्ध हो। अपनी पहचान बनाने की कोशिश में जुटी लड़कियों को आर्थिक सहयोग मिले तो और भी लाभ होगा। पत्रकारिता के क्षेत्र में बहुत से पुरस्कार जीते औऱ भारत के एकमात्र महिला पत्रकारिता क्लब की कार्यकारिणी में तीन बार जीतना भी मेरे लिए उपलब्धि है। विद्यार्थियों से मिलने वाला आदर भी मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण है।

अपने सपने को जीएं और उसे अधूरा न छोड़ें। पैसों का पूरा ध्यान रखें क्योंकि इसकी जरूरत कभी भी पड़ सकती है। खुद पर और ईश्वर पर अपना विश्वास और उम्मीद हमेशा जिंदा रखें।

कार्य स्‍थल पर यौन उत्‍पीड़न  – आसान नहीं है समाधान

 सरकार भले ही कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न से संबंधित कानून का पालन नहीं करने वाली कंपनियों पर चाबुक चलाने के प्रयासों में जुटी है, लेकिन बड़ी संख्या में निजी क्षेत्र की कंपनियों को इस कानून के बारे में पता तक नहीं है। कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (प्रीवेन्शन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) कानून 2013 के अनुपालन पर एक कंपनी द्वारा 2015 में किए गए सर्वेक्षण में ये संकेत मिले हैं कि 97 फीसदी कंपनियां कानून और उसे अमल में लाने के बारे में वाकिफ ही नहीं हैं।

Businessman leaning over businesswoman, mid section
इसके अलावा कंपनी द्वारा सूचना के अधिकार कानून के तहत भेजे गए आवेदनों से यह पता चला है कि केवल राजस्थान ने कानून की निगरानी के लिए जिला अधिकारियों के माध्यम से आवश्यक स्थानीय शिकायत समिति और नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की है।
कंपनी के अधिकारियों के अनुसार कानून और इसको लागू करने के बारे में जागरुकता सबसे बड़ी चुनौती है। महिला और बाल विकास मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के 520 से अधिक मामले आए, जिसमें 57 मामले कार्यालय परिसर के अंदर प्रकाश में आए, जबकि 469 मामले काम से संबंधित अन्य स्थानों से जुड़े थे।

sexual harresment 1सार्वजनिक और निजी कार्यस्थलों पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए दिसंबर, 2013 में यह कानून लागू किया गया था। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे मामलों में कमी नहीं आयी है मगर अधिकतर मामलों में या तो महिलाएं खामोश रहती हैं या नौकरी छोड़ देती हैं। अगर कोई मामला सामने आता भी है तो कई कम्पनियाँ उस महिला को बर्खास्त कर देती है और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके या तो मामला दबा देती हैं या फिर महिला का कॅरियर ही नष्ट कर दिया जाता है। जाहिर है कि किसी भी आम महिला के लिए लम्बी कानूनी लड़ना बेहद मुश्किल है और यही वजह है कि अधिकतर मामलों में  वह या तो हार मान लेती है या नौकरी छोड़ देती है। हर क्षेत्र में इस तरह के अपराधों को लेकर हर दूसरी कम्पनी का प्रबंधन इतना सहयोगी हो जाता है कि अपराधी अपनी पहचान का इस्तेमाल कर मीडिया में उस औरत को बदनाम कर छोड़ता है और उसे कहीं नौकरी नहीं मिलती। कम्पनियाँ अपनी छवि को चमकदार बनाए रखने के लिए भी ऐसे मामलों को दबा देती हैं क्योकि उत्पीड़न करने वाला अगर कम्पनी के लिए फायदेमंद है तो इसका असर कम्पनी पर पड़ेगा इसलिए अपराधी खुले घूम रहे हैं और लड़कियाँ विवश हैं। अगर यही स्थिति रही तो हालात कभी नहीं सुधरने जा रहे हैं।

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कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, लैंगिक समानता, जीवन और स्‍वतंत्रता को लेकर महिलाओं के अधिकारों का उल्‍लंघन है। कार्यस्‍थल पर महिलाओं के लिए अनुरूप वातावरण न होने की स्थिति में उनके लिए वहां कार्य करना मुश्किल हो जाता है और अगर ऐसे में यौन उत्‍पीड़न होता है तो महिलाओं की भागीदारी पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है। इस वजह से, देश की महिलाओं आर्थिक सशक्तिकरण और उनके समावेशी विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव होता है। सुहानी ने एक प्रसिद्ध कॉलेज से हाल ही में अपना एमबीए पूरा किया और वह एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में अच्‍छे पद पर काम कर रही थी, लेकिन कुछ दिनों से उसके बॉस का व्‍यवहार उसके प्रति अजीब सा हो गया था, वह उसे शॉर्ट्स पहनने के लिए कहते और हमेशा अपने साथ ही रखने की कोशिश करते, ऐसे माहौल में सुहानी सही से अपना काम नहीं कर पा रही थी और वह हतोत्‍साहित होती जा रही थी, और कुछ ही समय बाद वह डिप्रेशन का शिकार हो गई। ऐसी कहानी कई महिलाओं और लड़कियों की है जो यौन उत्‍पीड़न के कारण अपने आप की काबिलियत को साबित नहीं कर पाती है, समाज के डर की वजह से आवाज नहीं उठाती हैं और कई शारीरिक समस्‍याओं की शिकार हो जाती हैं।HdpaXNhacMNLALQ-1600x900-noPad

यौन उत्‍पीड़न की शिकार महिलाओं को सिरदर्द, उल्‍टी, वजन कम होना, आत्‍मविश्‍वास खो देने और डिप्रेशन व तनाव जैसी कई समस्‍याएं हो जाती हैं। मानसिक और भावनात्‍मक आघात पहुँचने के कारण वो हर किसी पर से अपना विश्‍वास खो देती हैं। क्‍या होता है यौन उत्‍पीड़न: कार्यस्‍थल पर महिलाओं को ज़बरन परेशान करना, उनके साथ अश्‍लील बातें करना और छेड़छाड़ करना, शरीर को छूने का प्रयास करना, गंदे इशारे करना आदि जैसे कृत्‍य यौन उत्‍पीड़न की श्रेणी में आते हैं। महिलाओं की स्थिति हाल ही में हुए कुछ सर्वे से पता चला है कि लंबे समय तक कार्यस्‍थल पर यौन शोषण या उत्‍पीड़न होने पर महिला की मानसिक स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि वह तनाव में रहने लगती है। अपने आप को सामाजिक रूप से अलग कर लेती है और किसी भी समारोह आदि में जाना पसंद नहीं करती है। कई बार, उनके मन में आत्‍महत्‍या करने का ख्‍याल भी आता है। यौन शोषण की शिकार हुई महिलाएं अक्‍सर स्‍लीप डिस्‍ऑर्डर से ग्रसित हो जाती हैं क्‍योंकि वह नींद की दवाईयों आदि का सेवन करना शुरू कर देती हैं। यौन उत्‍पीड़न के लिए कानून कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से महिलाओं का संरक्षण (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 में कार्यस्‍थल पर महिलाओं पर होने वाले यौन शोषण पर प्रकाश डाला गया है और एक शिकायत निवारण तंत्र प्रदान किया गया है। अधिनियम पर पिछले वर्ष सरकार के द्वारा इसके प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए प्रयास किया गया है। यह अधिनियम, महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकारों की पुष्टि करता है जिसमें अंर्तगत उन्‍हें पूरी गरिमा और अधिकार के साथ समाज में रहने, किसी व्‍यवसाय, व्‍यापार या कार्य को करने की स्‍वतंत्रता है जिसमें भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 19(1)(छ) तहत प्रदान किए गए नियम के अनुसार, कार्य स्‍थल का वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और यौन शोषणरहित होना भी शामिल है।

Sensuous secretary seducing boss at desk in office

सरकार क्‍या कर रही है इस मुद्दे को प्रमुखधारा में आगे बढ़ाने के लिए और उनकी प्रतिक्रिया तंत्र का मानकीकरण करने में मदद करने के लिए, महिला और बाल विकास मंत्रालय ने हाल ही में इस अधिनियम पर एक हैंडबुक को प्रकाशित किया है। ऑनलाइन इस हैंडबुक को http://goo.gl/0a3Of9 लिंक से डाउनलोड किया जा सकता है। इस बुकलेट को सभी केन्‍द्रीय सरकारी मंत्रालयों और विभागों, राज्‍य सरकारों और रेडी रेकनर के रूप में उपयोग करने के लिए व्‍यापार मंडलों को भी भेज दिया गया है। भारत सरकार के मंत्रालयों और विभागों को महिला और बाल विकास मंत्रालय के द्वारा सलाह दी गई है कि इस अधिनियम के अनुपालन को सुनिश्चित किया जाए। भारत के वाणिज्य और उद्योग के एसोसिएट चैम्‍बर्स (एसोचैम), वाणिज्‍य और उद्योग के भारतीय चैम्‍बर्स के फेडरेशन (फिक्की), सीसीआई, नैसकॉम से भी इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्‍वयन को सुनिश्चित करने का अनुरोध किया गया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय, कम्‍पनियों की वार्षिक रिपोर्ट में आंतरिक शिकायतों समिति (आईसीसी) के संविधान के प्रकटीकरण को जनादेश करने के लिए प्रयत्‍नशील है। जैसा कि ऊपर पहले ही उल्‍लेख किया जा चुका है कि इस अधिनियम में महिलाओं की आयु, व्‍यवसाय, कार्यस्‍थल वातावरण को लेकर हर बात स्‍पष्‍ट है, हर महिला को लैंगिक समानता का अधिकार है। महिलाएं, चाहें सरकारी क्षेत्र में कार्यरत हों या प्राईवेट क्षेत्र में; यह अधिनियम उनके हित के लिए हर क्षेत्र में सरकार के द्वारा लागू किया जाता है। यहां तककि घरों में काम करने वाली बाईयों या कर्मियों के लिए भी यह नियम है। यह अधिनियम, कार्यस्‍थल पर यौन उत्‍पीड़न को एक व्‍यापक तरीके से परिभाषित करता है और यदि किसी संस्‍थान में 10 से अधिक यौन उत्‍पीड़न की शिकायतें मिलती हैं तो आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) के गठन पर जोर देती है। यौन उत्‍पीड़न की शिकायत को कृत्‍य होने के तीन महीने के भीतर कर देना चाहिए, विभिन्‍न परिस्थितियों में ज्‍यादा भी किया जा सकता है। सभी कम्‍पनियों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी महिला कर्मचारियों को इस बारे में जागरूक करें और इसके लिए समय-समय पर वर्कशॉप और जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करें। इस अधिनियम के अनुसार, राज्‍य सरकारों व विभागों की जिम्‍मेदारी है कि वे ध्‍यान दें कि महिलाओं की सुरक्षा हेतु इस अधिनियम को वे सही से लागू कर रहे हैं या नहीं।

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यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी विभाग, महिलाओं को कार्यस्‍थल पर सुरक्षित वातावरण देने में सक्षम हैं या नहीं। किसी भी प्रकार के मामले को हल्‍के में न लेने के आदेश भी हैं। अधिनियम, यौन उत्‍पीड़न के सम्‍बंध में कार्यस्‍थलों और रिकॉर्ड्स के निरीक्षणों को करने के लिए समुचित सरकार को अधिकृत करता है। अधिनियम की धारा 26(1) में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत नियोक्‍ता, अपने कर्तव्‍यों के उल्‍लंघन में पाये जाने की स्थिति में 50,000/- रूपए का जुर्माना देने के लिए उत्‍तरदायी होगा। साथ ही उसका लाईसेंस भी निरस्‍त भी किया जा सकता है या मामला गंभीर होने पर दोनों ही दंड दिए जा सकते हैं। इसलिए, प्रत्‍येक नियोक्‍ता व मालिक का यह मुख्‍य कर्तव्‍य है कि कार्यस्‍थल पर यौन शोषणरहित माहौल प्रदान करें। साथ ही हर व्‍यक्ति को इस अधिनियम के बारे में जागरूक करें और इसके लिए आवश्‍यक कार्यशालाओं का आयोजन करें। महिलाओं को लैंगिक समानता और भयरहित माहौल प्रदान करें। इसी प्रकार, पूरे भारत को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सकता है। कई बार पुरुषों को भी प्रताड़ना का शिकार होना पडता है, ऐसी स्थिति में वे अक्सर शिकायत भी नहीं कर पाते।जरूरी है कि यौैन उत्पीड़न के मामले में महिला और पुरुष, दोनों को ध्यान में रखकर नीति तैयार की जाए। यह कार्यस्थल के साथ देश के विकास  के लिए भीी जरूरी है।