Thursday, July 16, 2026
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जब पेट्स ने लिया क्रिसमस पार्टी का मजा

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जब भी जश्न होता है तो इंसानों का ख्याल आता है मगर हमारे पेट्स भी इसका आनंद उठा सकते हैं। इस बार क्रिसमस में कुछ ऐसा ही हुआ और सांता बना कशिकाज पैम्पर्ड पाव्स जिसने पेट्स के लिए क्रिसमस पर पार्टी आयोजित की। इसमें 30 पेट्स को उनके पैरेंट्स के साथ आमंत्रित किया गया था और इस पार्टी में पेट्स के लिए गेम्स और खिलौने भी थे। इतना ही नहीं पार्टी में केक भी काटा गया। सर्वश्रेष्ठ परिधान के लिए, सबसे आज्ञाकारी पेट्स के लिए इनाम दिए गए। कशिकाज पैम्पर्ड पाव्स की प्रमुख कशिका अरोड़ा ने कहा कि इस पार्टी का उद्देश्य बेघर जानवरों और पक्षियों के लिए फंड एकत्रित करना था।

कितनी खतरनाक हैं गर्भ निरोधक गोलियां?

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में 10 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं। हालांकि 1960 के दशक में गर्भनिरोधक गोलियों की शुरुआत के बाद से ही इसके इस्तेमाल से अलग-अलग तरह के साइड इफेक्ट्स देखने को मिले हैं। हाल के एक अध्ययन के मुताबिक गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल से अवसाद का ख़तरा बढ़ता है। ये अध्ययन हुआ है डेनमार्क में।

डेनमार्क के अनुसंधानकर्ताओं ने करीब दस लाख महिलाओं के मेडिकल रिकॉर्ड्स को अध्ययन में शामिल किया। 15 से 34 साल की इन महिलाओं में किसी में पहले से डिप्रेसन के लक्षण मौजूद नहीं थे।अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं, उन्हें बाद में अवसाद की गोलियां लेनी पड़ी या फिर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।

इस अध्ययन को मीडिया में काफी सनसनीखेज बनाकर पेश किया गया। मीडिया में इस ख़बर को लेकर बनी सुर्खियां इस तरह से थीं- ‘आप गर्भनिरोधक गोलियां लेती हैं, तो अवसाद की चपेट में आने के लिए तैयार रहें’ या फिर ‘गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली 70 फ़ीसदी महिलाएं अवसाद की चपेट में’।

एक अखबार की हेडलाइन थी- गर्भनिरोधक गोलियां का अवसाद से नाता, ये स्कैंडल से भी ज़्यादा है। हालांकि यूनिवर्सिटी ऑफ़ एबरडीन में प्राइमरी केयर के प्रोफेसर फ़िल हैनाफ़ोर्ड के मुताबिक, गर्भनिरोधक गोलियों का अवसाद से नाता, उतना गंभीर नहीं है, जितना मीडिया में बताया जा रहा है।

वे कहते हैं, “बहुत कम असर होता है।” वे विस्तार से बताते हैं कि प्रत्येक 100 महिलाएं जो गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल नहीं करती हैं, उनमें हर साल 1.7 महिलाएं अवसाद से पीड़ित हो जाती हैं, वहीं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करने वाली प्रति सौ महिलाओं में 2.2 महिलाएं अवसाद की चपेट में आती हैं।

यह कोई बड़ा अंतर नहीं है, हैनफोर्ड के मुताबिक ये अंतर 0.5 का है, यानी प्रत्येक साल 200 महिलाओं में एक महिला ज़्यादा।

हैनफ़ोर्ड ये भी मानते हैं कि गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं के अवसाद ग्रस्त होने की दूसरी भी वजहें हो सकती हैं। वे कहते हैं, “उदाहरण के लिए ये भी हो सकता है, जो महिला गर्भनिरोधक गोली ले रही हों, उनका अपने पार्टनर से रिश्ता टूट गया हो। इस वजह से भी वो अवसाद से घिर सकती हैं।”

हैनफ़ोर्ड के मुताबिक ऐसे अध्ययन के नतीजों को हल्के या सनसनीखेज ढंग से पेश नहीं किया जाना चाहिए। गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल से केवल अवसाद होने का ख़तरा नहीं होता। इसके इस्तेमाल से ख़ून का थक्का जमने का ख़तरा भी होता है, जो घातक भी हो सकता है।

ये भी सच है कि अगर इन साइड इफेक्ट्स को हल्के में लिया जाए, तो वह ख़तरनाक हो सकता है। बर्लिन के हार्डिंग सेंटर फॉर रिस्क लिटरेसी के निदेशक प्रोफेसर जर्ड गिगेरेंजर बताते हैं, “ब्रिटेन में कई परंपराएं रही हैं और उनमें एक है गर्भनिरोधक गोलियों को लेकर मौजूद डर। 1960 के दशक से ही गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली महिलाएं इसको लेकर चिंतित रही हैं कि इससे ख़ून का थक्का जमना या थ्रोम्बोसिस हो सकता है।”

एक अध्ययन के मुताबिक तीसरी पीढ़ी की गर्भनिरोधक गोलियों के चलते थ्रोम्बोसिस होने का ख़तरा दो गुना बढ़ जाता है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि गर्भनिरोधक गोलियों का खतरा कितना ज़्यादा है और महिलाओं को इसको लेकर कितना आशंकित होना चाहिए? हाल ही में, गार्डियन वेबसाइट की एक शॉर्ट फ़िल्म, उन युवा महिलाओं पर है, जिनकी मौत ख़ून का थक्का जमने से हुई और वे सब के सब हार्मोनल या गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल कर रही थीं।

इस वीडियो में दावा किया गया है कि महिलाएं अगर गर्भनिरोधक गोलियों से होने वाली मौतों की दर को समझ जाएं तो वे इन गोलियों का इस्तेमाल नहीं करेंगी। फैकल्टी ऑफ़ सेक्सुअल एंड रिप्रॉडक्टिव हेल्थकेयर के उप निदेशक डॉ. सारा हार्डमैन कहती हैं, “गर्भनिरोधक गोलियों के इस्तेमाल से प्रति दस हज़ार में कुछ महिलाओं की मौत हो जाती है, ये कहना पूरी तरह से सही नहीं है।”

सारा कहती हैं, “10 हज़ार महिलाओं में पांच से 12 महिलाओं में ख़ून का थक्का जमने की शिकायत होती हैं और सबकी मौत नहीं होती है, वास्तव थक्का जमने वाली महिलाओं में एक फ़ीसदी महिलाओं की मौत होती है।” सारा के मुताबिक प्रति दस लाख महिलाओं में गर्भनिरोधक गोलियों के चलते थक्का जमने से मौत के मामले महज तीन से 10 होती हैं।

वैसे ये जानना दिलचस्प है कि गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल नहीं करने से गर्भवती होने की संभावना बढ़ जाती है और गर्भावस्था में ख़ून का थक्का जमने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।

 

बजाज ऑटो ने डोमिनार रेन्जमें पहली बाइक पेश की

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बजाज ऑटो ने १५ सालों से भारतीय स्पोर्ट्समोटरसाइकिल बाज़ार पर अपना वर्चस्व बनाए रखा है। बजाज ऑटो ने प्रीमियमस्पोर्ट्स बाइकर्स के लिए अपने नए ब्रांड – डोमिनार की घोषणा की। डोमिनार400, में फ्यूलइंजेक्शन और लिक्विड कूलिंग युक्त 373.2cc ट्रिपल स्पार्क चार वॉल्व DTS-I इंजन है, यहतेज़ी से बढ़ती प्रीमियम बाइकिंग वर्ग के लिए बड़ी मांसल बाइक्स की श्रेणी की पहली बाइकहै।

डोमिनार400 रात से अपनी प्रेरणा लेता है। जब दूसरी बाइक्स रातको बाहर निकलने में औररात के डरवाने अँधेरे में जाने से हिचकिचाती हैं, डोमिनार400 आगे आकर इंसान या प्रकृति केद्वारा पेश कि जानेवाली चुनौती का सामना करती है, और उनपे काबू पा सकती है।

डोमिनार400 एक चट्टान सी ठोस सवारी प्रदान करने के लिए सक्षम है। यह एक बड़े पेरिमिटर ढाँचे और रूपरेखा वाले प्रेस स्टील स्विंग आर्म के साथ आती है। 373.2cc काDTS-i इंजन अपने छह स्पीड ट्रांसमिशन और स्लिपर क्लच के माध्यम से बेजोड़ रैखिक प्रदर्शन प्रदान करता है। 35 PS के विशाल पावर और 35 NM के बड़े टॉर्क एवम संचयित शक्ति के साथ डोमिनार400 जोरदार तरीके से अतिरिक्त गति बाइक सवार और पीछे बैठे व्यक्ति को किसी भी स्पीड पर ले जाती है। अत्याधुनिक लिक्विड कूलिंग सिस्टम लंबी दूरी की यात्राओं पर भी इंजन का सुगम प्रदर्शन सुनिश्चित करता है।

इसमें 43mm का फ्रंट टेलीस्कोपिक फोर्क् हैं जिसमें किसी भी तरह की सतह परबेहतरीन नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए अनोखा दोहरे स्प्रिंग वाला मोनो सस्पेंशन है। दोहरेचैनल वाला ABS की शक्ति युक्त 320 mm का अगला डिस्क और 230mm का पिछला डिस्कविश्वास और सम्पूर्ण नियंत्रण को प्रेरित करता है। डोमिनार400 भारत की ऐसी पहलीमोटरसाइकिल है जिसमें काली से काली रातों अँधेरे को चीरने के लिए संतुलित श्वेत रौशनीऔर खड़ी AHO (आटोमेटिक हेडलाइट्स ऑन) सम्पूर्ण LED मोज़ेक हेडलैंप्स हैं।

इस पेशकश पर बोलते हुए, श्री एरिक वास, अध्यक्ष – मोटरसाइकिल बिज़नेस, बजाज ऑटो लिमिटेड ने कहा, “डोमिनार400 अपने वर्ग की सबसे बड़ी मोटरसाइकिल है। यह बड़ी होते हुए भी आरामदायक, तेज़ होते हुए भी दृढ़, बड़े आकार की होते हुए भी नियंत्रण योग्य, शक्तिशाली होते हुए भी आसानी से संभाली जानेवाली, और प्रीमियम होते हुए भी ग्राहकों की पहुँच के अंदर है। डोमिनार400 के साथ, बाइकर्स अंततः शहरों, राजमार्गों और पर्वतों पर भी किसी भी

वक़्त और सवारी करने की किसी भी परिस्थिति में हावी हो सकते हैं। जब आप डोमिनार400 की सवारी करते हैं तो वर्चस्व खुद-ब-खुद आ जाता है।”

 

 

आईडीएफसी बैंक ने ‘आधार’ से जुड़ी नकदी रहित भुगतान सेवा शुरू क

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आईडीएफसी बैंक ने व्यापारियों के लिए आधार से जुड़ी अखिल भारतीय भुगतान सेवा की आज शुरूआत की। इस सेवा के तहत खुदरा विक्रेता के स्मार्टफोन से डिजिटल भुगतान किया जा सकेगा।

बैंक ने यहां एक बयान में कहा कि आईडीएफसी बैंक ने भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण :यूआईडीएआई: और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम :एनपीसीआई:के साथ मिलकर ‘आधार पे’ तैयार किया है।

बैंक ने कहा कि इसके माध्यम से देशभर में लाखों कारोबारी कम लागत पर नकदी रहित खरीद-फरोख्त कर सकते हैं।

बैंक के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव लाल ने कहा कि इससे देश के सुदूरतम इलाके लोग भी डिजिटल भुगतान करने में सक्षम हो सकेंगे। ऐसे लोग भी डिजिटली भुगतान कर सकेंगे जिनके पास अपना खुद का फोन नहीं है।

इस तरीके से भुगतान करने के लिए आपके पास सिर्फ आधार से जुड़ा बैंक खाता होना चाहिए। इस माध्यम से भुगतान करने पर दुकानदार या ग्राहक दोनोंे को किसी तरह का कोई शुल्क नहीं देना होगा।

आईडीएफसी बैंक की एक विज्ञप्ति के अुनसार ‘आईडीएफसी आधार पे’ को पिछले हफ्ते आंध्र प्रदेश में सरकारी राशन की दुकानों पर चालू किया गया। वहां इसका उद्घाटान मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू किया गया। इसे अब दिल्ली और बिहार में दुकानों पर भी उपयोग में लाया जा रहा है।

 

ऑस्कर के दावेदारों की लंबी सूची में ‘एम एस धोनी..’, ‘सरबजीत’ शामिल

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ऑस्कर पाने के योग्य 336 फीचर फिल्मों की लंबी सूची में भारतीय बायोपिक फिल्मों ‘एम एस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ और ‘सरबजीत’ ने जगह बना ली है।
‘एंटरटेनमेंट वीकली’ के अनुसार अकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेस ने बुधवार को सर्वश्रेष्ठ पिक्चर ऑस्कर की दावेदार फिल्मों की सूची जारी की।

2016 अकेडमी पुरस्कारों की सूची में शामिल होने के लिए यह आवश्यक है कि फीचर फिल्म लॉस एंजिलिस काउंटी के वाणिज्यिक थियेटर में एक जनवरी से 31 दिसंबर के बीच लगातार सात दिनों तक दिखाई गई हो।

थियेटर में 35 एमएम या 70 एमएम या किसी अन्य योग्य डिजिटल फार्मेट में दिखाई गई फिल्म की अवधि 40 मिनट से अधिक होनी चाहिए।

सुशांत सिंह राजपूत एवं रणदीप हुड्डा अभिनीत फिल्मों के अलावा भारतीय अमेरिकी फिल्मकार मीरा नायर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘क्वीन ऑफ कात्वे’ भी सूची में शामिल है। ऑस्कर पुरस्कार विजेता लुपिता न्योंग’ओ, डेविड ओयेलोवो और नवोदित मदीना नालवांगास ने इस फिल्म में अभिनय किया है। यह फिल्म ग्रामीण यूगांडा की एक लड़की के प्रेरणादायक जीवन एवं वास्तविक घटनाक्रमों पर आधारित है।

इस सूची में शामिल फिल्मों में ‘ला ला लैंड’, ‘मूनलाइट’, ‘मैनचेस्टर बाय द सी’, ‘सायलेंस’, ‘अराइवल’ और ‘हैकशॉ रिच’ मजबूत दावेदार हैं। सुपरहीरो फिल्में ‘डेडपूल’, ‘सुसाइड स्क्वैड’, ‘कैप्टन अमेरिका:सिविल वार’ एवं ‘एक्स मैन: अपाकलिप्स’ भी सूची में शामिल हैं।

 

इनके हौसलों की उड़ान दिला रही तेजाब पीड़ितों को सही इंसाफ

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कानपुर की पूजा के हौसलों की उड़ान आज देश भर की तेजाब पीड़ितों को सही इंसाफ दिला रही है। ग्वालटोली निवासी तेजाब पीड़िता पूजा गुप्ता समाज के सामने मिसाल बन गई हैं। पूजा की लड़ाई ने राज्य सरकार को एहसास कराया कि तेजाब पीड़ितों के प्रति उनकी भी कोई जिम्मेदारी है। पूजा की याचिका पर ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तेजाब पीड़ितों को मुआवजा और इलाज दोनों ही मुहैय्या कराने के आदेश दिए हैं। पूजा के चेहरे पर हक की लड़ाई जीतने की चमक नजर आई। पूजा के मुताबिक पापा हरीश ने अपनी परचून की दुकान का पूरा सामान बेच दिया। कर्ज भी लिया और किसी तरह उसका इलाज कराया। इसमें करीब 15 लाख का खर्च आया था। इसके बदले में उसे प्रोवेशन अधिकारी से सिर्फ 4 लाख 66 हजार 500 रुपये ही मिले। आज तक पिता और छोटा भाई कर्ज उतार रहे हैं। बकौल पूजा 2010 में उसका घर बसा, दो बच्चे भी हैं। जीवन में मिली इन खुशियों ने उसके तेजाब के दर्द को काफी हद तक कम कर दिया है, लेकिन कोर्ट के फैसले से उसे और उसकी जैसी कई तेजाब पीड़ित युवतियों के लिए उम्मीद जगी है। अब कम से कम पिता का कर्ज और उसके चेहरे से तेजाब का नामोनिशान तो मिट जाएगा। याचिका देने में दिल्ली में ह्यूमन राइट संस्था चलाने वाली शाहीन मलिक ने भी उनकी काफी मदद की है। पूजा के मुताबिक इसी माह की 12 तारीख को उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दी थी।

दीदी का देवर बना दुश्मन
पूजा ने बताया कि 2005 में इंटर पास कर गुमटी स्थित एक फोन कंपनी के आफिस में वह मामूली नौकरी कर रही थी। उसी दरम्यान बड़ी दीदी के देवर कपिल ने उस पर जबरन शादी का दबाव बनाया। दोनों के घरवाले इस रिश्ते के खिलाफ थे। पापा ने जब मेरी शादी हूलागंज में पक्की की तब कपिल ने घर आकर धमकाया कि उसका चेहरा खराब कर देगा। उसकी इस धमकी को नजरअंदाज करना भारी पड़ा। इसके अगले ही दिन 23 सितंबर जब वह आफिस जा रही थी, तभी कपिल स्कूटर से अपने एक साथी के साथ आया और शनिदेव मंदिर के पास उस पर तेजाब फेंककर भाग गया। कानून ने कपिल को सजा दी, लेकिन उससे न तो उसके चेहरे से तेजाब के निशान मिट सके और न ही पिता के सिर से पहाड़ से कर्ज का बोझ हट सका।
टूट चुकी पूजा को मिला संजय का सहारा
पूजा की कहानी भी सत्यम शिवम सुंदरम फिल्म की रूपा से कम नहीं है। बकौल पूजा कपिल की हैवानियत के पांच साल बाद तक दुपट्टे से चेहरा ढककर जीने से ऊब चुकी थी। कोई मेहमान घर आए तो वह उतना वक्त छत पर बेचैनी से चहलकदमी कर काटती थी। कर्ज में डूबे पिता और भाई का चेहरा देख मरने की भी हिम्मत नहीं कर पा रही थी। ऐसे में दिल्ली के संजय उसके जीवन में भगवान बनकर आए। संजय से कई मुलाकातें कीं और जब भरोसा हो गया कि तब शादी की।

 

इस बेटी पर हिमाचल को है गर्व, सेना में बनी नर्सिंग लेफ्टिनेंट

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हिमाचल के सिरमौर जिले के पच्छाद क्षेत्र की गागल शिकोर पंचायत के कमाहां गांव की वंदना शर्मा भारतीय सेना में नर्सिंग लेफ्टिनेंट बनी है। इससे इलाके में खुशी की लहर है। कड़ी मेहनत से वंदना ने महज 24 वर्ष की उम्र में यह मुकाम हासिल किया। वंदना शर्मा की पहली नियुक्ति जालंधर के मिलिट्री अस्पताल में हुई है।

वंदना ने दसवीं तक की शिक्षा सराहां कन्या उच्च पाठशाला में की है। उसके बाद बारहवीं नाहन कन्या उच्च पाठशाला से की। यहां से उसका चयन कॉलेज ऑफ नर्सिंग कमांड अस्पताल कोलकाता के लिए हुआ। वंदना शर्मा के पिता रोशन लाल हिमाचल दुग्ध प्रसंग विभाग में कार्यरत हैं। उनकी माता गीता देवी गृहिणी हैं।

वंदना शर्मा के भाई अजय शर्मा टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। जबकि बड़ी बहन अर्चना शर्मा भी कंप्यूटर इंजीनियर है। कमाहां गांव वासी उमादत्त शर्मा, रूप राम शर्मा, हरी नंद शर्मा, शिव दत्त शर्मा, नागेंद्र शर्मा, कमल शर्मा, श्याम दत्त, सुनील शर्मा, जगदीश शर्मा, हरिशरण शर्मा व अरुण शर्मा ने कहा कि वंदना शर्मा की इस उपलब्धि से पूरे गांव व क्षेत्र में खुशी का माहौल है। वंदना ने कहा कि माता-पिता, बहन और गुरुजनों के आशीर्वाद से वह इस मुकाम तक पहुंची है।

 

कनाडा की बर्फ में भंगड़ा करके पूरी दुनिया में अपना रंग जमा रहे है ये भारतीय युवक!

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भारत और भारत की संस्कृति हमेशा से पूरी दुनिया को अपनी ओर खींचती आई है। हमारी विविधता में ही हमारी ताकत छुपी हुई है। फिर चाहे वो अलग अलग भाषाएँ हो, त्यौहार हो या फिर कला। भारत के हर प्रदेश की अपनी एक अलग संस्कृति है जो यहाँ रहने वालो को ही नहीं बल्कि विदेशियों को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। यूँ तो हर प्रदेश अपने आप में अनूठा है पर जब मौज मस्ती और नाच गाने की बात होती है तो सबसे पहले नाम आता है पंजाब का। पंजाब के भंगड़ा में वो थरकन है कि कोई भी अपने आपको नाचने से रोक नहीं पाता है। और पंजाबी चाहे जहाँ भी रहे अपनी खुशमिजाजी और भंगडे से लोगो का दिल जीत ही लेते है।

ऐसे ही कुछ पंजाबी युवाओं का ग्रुप है’ मैरीटाइम भंगड़ा ग्रुप‘, जो कनाडा में रहने वाले पंजाबी युवाओं ने मिलकर बनाया है। इस ग्रुप के भंगडे को देखकर पूरी दुनिया झूम रही है।

हाल ही में आये उनके एक वीडियो में ये सभी युवा भंगड़ा करते-करते बर्फ से ढकी हुई सड़के साफ़ कर रहे है। इस विडियो को अब तक 10 लाख से भी ज्यादा लोग देख चुके है और इसे फेसबुक पर 25000 से भी ज्यादा लोगो ने साझा किया है।

इस वीडियो में तीन कलाकार पहले तो एक पंजाबी धुन पर भंगड़ा करते है और फिर अचानक अंग्रेजी गाना ‘सिया’स चीप थ्रिल्स’ बजने लगता है। पर इस पर भी ये तीनो उतने ही मस्त होकर भंगड़ा करते है जैसे वे पंजाबी गाने पे करते है।

मनोरंजन करने के साथ-साथ ये ग्रुप लोगो को सामाजिक कार्यो में अपना योगदान करने के लिए भी प्रेरित करता है। विडिओ के साथ साथ किसी अच्छे काम के लिए योगदान देने का भी लिंक जोड़ा जाता है।

ऐसे युवाओं की वजह से ही हम गर्व से कह सकते है कि हमारा भारत और यहाँ की संस्कृति है “सारे जहाँ से अच्छा”।

 

नासिरा शर्मा को मिला 2016 का हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार

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साहित्य अकादमी ने बुधवार को 2016 के लिए अपने वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा कर दी। हिंदी के लिए नासिरा शर्मा, उर्दू के लिए निजाम सिद्दकी, कश्मीरी में अजीज हाजिनी, पंजाबी के लिए स्वराजबीर, अंग्रेजी में जेरी पिंटो, संस्कृत के लिए सीतानाथ आचार्य शास्त्री सहित 24 भाषाओं के रचनाकारों के नामों की साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए घोषणा की गई।

अकादमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवास राव ने इन नामों की घोषणा की। पुरस्कारों की घोषणा के साथ साहित्य अकादमी ने वार्षिक कैलेंडर के साथ महान लेखक अभिनव गुप्त पर एक डायरी भी लांच की। साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव ने बताया कि इस वर्ष आठ कविता-संग्रह, पांच उपन्यास, दो समालोचना, एक निबंध संग्रह और एक नाटक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया जाएगा।

यह पुरस्कार 21 से 26 फरवरी 2017 के बीच आयोजित होने वाली साहित्योत्सव में 22 फरवरी को दिया जाएगा। इसमें चयनित लेखकों के अलावा पूर्व में साहित्य अकादमी अवार्ड पा चुके लोगों को भी बुलाया गया है। उन्होंने बताया कि 24 भाषाओं के अलावा चार गैर मान्यता प्राप्त भाषाओं के लेखकों को भाषा सम्मान भी दिया जाएगा।

राव ने कहा कि पुरस्कारों की अनुशंसा 24 भारतीय भाषाओं की निर्णायक समितियों द्वारा की गई। साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित अकादमी के कार्यकारी मंडल की बैठक में बुधवार को इन्हें अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया। उन्होंने कहा कि इन रचनाकारों को पुरस्कार के रूप में उत्कीर्ण ताम्रफलक, शॉल और एक लाख रुपये दिए जाएंगे।

 

रेप पीड़िता से आरोप साबित करने के सबूत न मांगे जाएं : सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने रेप के एक मामल में सुनवाई करते हुए गुरुवार को कहा कि अगर रेप पीड़िता की गवाही विश्वसनीय हो तो पीड़िता से आरोप को साबित करने के लिए पुष्टिकर सबूत नहीं मांगे जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के सीकरी और ए एम सप्रे की बैंच ने कहा कि यौन अपराधों के मामले में पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण है और आरोपी को सिर्फ पीड़िता के बयान के आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है।

बैंच का जजमेंट लिखने वाले जस्टिस सीकरी ने कहा कि कोई लड़की या महिला अगर रेप और यौन छेड़छाड़ की शिकायत करती है तो उसे शक और अविश्वास की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि अगर कोर्ट को पीड़िता का पक्ष स्वीकार करने में मुश्किल हो तो पुष्टि करने वाले कुछ सबूतों की मांग की जा सकती है।

बैंच ने यह फैसला एक व्यक्ति के अपनी भतीजी के साथ रेप करने के मामले में 12 साल की सजा सुनाते हुए दिया है। इस मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्ची और मां के बयानों में अंतर होने की वजह से आरोपी को बरी कर दिया था।

हाईकोर्ट ने कहा था कि पीड़ित परिवार ने एफआईआर दर्ज कराने में काफी देर की है परिवार ने घटना के तीन साल बाद  एफआईआर दर्ज कराई। सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने कहा कि एफआईआर देर से दर्ज कराने की वजह से बलात्कार की शिकायत को झूठा नहीं करार दिया जा सकता। इस तरह के मामलों में लोग पुलिस के पास समाज में बदनामी की वजह से भी देरी से जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एफआईआर’ दर्ज कराने का निर्णय उस वक्त और ज्यादा मुश्किल होता है जब कोई आरोपी परिवार का ही सदस्य होता है।

बैंच ने कहा,’कई अध्ययनों में सामने आया है कि इस तरह के मामलों में 80 प्रतिशत अपराधी अंजान नहीं बल्कि पीड़ित के परिचित होते हैं। खतरा बाहर से ज्यादा अंदर है। इस तरह के ज्यादातर मामलों में जब बलात्कार का अपराधी परिवार का सदस्य होता है तो लोग कई कारणों से रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाते।