Tuesday, March 24, 2026
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यूट्यूब पर दिख रहा है हिन्दी कविता का सौंदर्य

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मानव सभ्यता की सांस्कृतिक और बहुभाषी अभिव्यक्ति की सबसे कीमती विधा ‘कविता’ बहुत कम शब्दों में काफी कुछ कह जाती है। दिन के अंत में कविता हमें सुकून देती है, लेकिन ऐसे समय में जब किताबें पढ़ने के सिलसिले कम हो गये हैं, कविता के लिए लोग मुश्किल से समय निकाल पाते हैं।

इसके बावजूद एक व्यक्ति की हिन्दी कविताओं के प्रति ऐसी दीवानगी है कि उन्होने हिन्दी कविता को ही अपना काम बना लिया और लोगों तक यह संदेश पहुचाँने के लिए प्रयासरत है कि हिन्दी कविता कितनी शानदार होती है।

अमरिका के मियामी में बस चुके एक सफल फिल्म निर्माता और व्यवसायी, मनीष गुप्ता ने जब मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, अमृता प्रीतम और कवियों की कविताओं के सम्बन्ध में लोगों की अरुचि देखी तो उन्होनें हिन्दी कविताओं को दोबारा प्रसिद्ध बनाने का,विशेष तौर पर युवाओंकेबीच में,प्रयास आरम्भ कर दिया।

उन्होनें हिन्दी कविताके नाम से यूट्यूब पर एक चैनल की शुरुआत की है, जिसमें हिन्दी कविता प्रेमियों की संख्या हजारों में पहुँच चुकी हैं।

1980 में जब मनीष मात्र ग्यारह वर्ष के थे,तब उन्होनें अपने कोर्स की किताब में पहली बार भवानी प्रसाद मिश्रा की कविता “सतपुड़ा के घने जंगल” पढ़ी थी। यह उनके कविताओं के साथ प्रेम की शुरुआत थी।

मनीष ने युवावस्था में अनगिनत दोपहरें छिंदवाड़ा में अपने दोस्त के साथ पेड़ के नीचे बैठकर मुन्शी प्रेमचन्द की कहानियाँ, रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ और मार्क ट्वेन के हिन्दी रुपान्तर पढ़कर बितायीं। शब्दों के साथ इसी सम्बन्ध को 47 वर्षीय मनीष ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिन्दी कविता’ में पेश किया। अपने युवावस्था और मुम्बई में अपने हिन्दी चैनल शुरु करने के बीच के समय में मनीष अमरिका चले गए। वहाँ एक पेन्टर के रुप में काम किया, मियामी में बीच क्लब चलाया, टीवी शोज़ का निर्माण किया और दो फीचर फिल्मों-इण्डियन फिश (2003) और होली (2006) का निर्देशन किया। वह इण्डियन डेली में एक कॅाल्मिस्ट के रुप में कार्य कर रहे थे और अभी हाल में ही अमरीका से तब लौटे जब हिन्दी कविता चैनल का ख्याल उनके दिमाग में आया।

2013 में अपने दोस्तों के साथ बीते दिनों में प्रेमचन्द, निराला और दिनकर को पढ़ने के बारे में हुई बातचीत में अन्तत: मनीष ने हिन्दी कविता चैनल को शुरु करने का फैसला किया। इस प्रोजेक्ट के रिसर्च के दौरान वे देश के विभिन्न कॅालेज के छात्रों से मिले, पब्लिशर्स और पुस्तक-विक्रेताओं से मिले और उनसे यह जानकारी हासिल की, कि हिन्दी कविता इसलिए प्रसिद्ध नहीं रही क्योकिं इसका “स्टाइल कोटैन्ट” कम हो गया है।

इस विषय में सोचते हुए कि हिन्दी कविता किस तरह से नयी पीढ़ी को प्रभावित कर सकती है, मनीष को एक शक्तिशाली विचार दिमाग में आया। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन कलाकारों के द्वारा जाने-माने समकालीन और पुराने कवियों की कविताएँ प्रस्तुत कराने का निश्चय किया। इस का नतीजा बेहतरीन रहा मनोज वाजपेयी द्वारा पढ़ी गयी दिनकर की ‘रश्मिरथीको 1,90,000 दर्शक मिले और लेखकअभिनेता पीयूष मिश्राकी स्वरचित कविता ‘प्रेमिकाओं के नाम‘ को 86,000 सेज्यादा दर्शक मिले।

तीन साल पहले शुरू किये गये इस यूट्यूब चैनल को बेइंतहा मुहब्बत मिली। इसके चैनल के प्रशंसकों ने इसका नाम ‘कविताओं का कोक स्टूडियो’ रख दिया। मनीष गुप्ता कहते है, जब हमने इसे शुरु किया तो लोगों को हिन्दी कविताएँ पंसद आयीं। आज के समय में कई अंग्रेजी-क्लब भी हिन्दी कविता से जुड़ना चाहते है क्योकिं कविताओं को पेश करने का अंदाज काफी निराला है।

हिन्दी कविता वीडियो के अभिनेता और लेखक अपने पंसदीदा कवियों की कविताएँ पढ़ते हैं-गीतकार -लेखक वरुण ग्रोवर द्वारा उदय प्रकाश की “मैं लौट जाऊंगा” और अभिनेता राजेन्द्र गुप्ता द्वारा हुबनाथ की “मुसलमान”, अभिनेत्री स्वरा भास्कर और रसिका दुग्गल द्वारा उनके पंसदीदा कवि/कवियित्री पाश और अमृता प्रीतम  की रचनाएँ पढ़ी गयी है, जो काफी विस्तृत रूप से देश में प्रसिद्ध हुई।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने एक साक्षात्कार में स्वरा भास्कर कहती हैं:-

हाल ही मेंमेरी दोस्त के घर में एक सब्जीवाले ने मुझसे कहा कि वो पढ़ नही सकता लेकिन उसने मेरे कविता-पाठ का वीडियो देखा है। इस वाकये ने मुझे ये भी एहसास कराया कि देशी लोग सिर्फ मसाला हिन्दी फिल्में ही पंसद नहीं करतेबल्कि वे हिंदी साहित्य का भी आनंद लेते हैं।

जाने-माने अभिनेता सौरभ शुक्ला कहते हैं,”इन खूबसूरत वीडियो ने मुझमें कविताओं के लिए प्यार लौटा दिया,यह एक एहसास है जो हिन्दी कविता के प्रशंसकों को लगातार बढ़ा रहा है।

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गीतकार-लेखक वरुण ग्रोवर कहते हैं:-

हिन्दी कविता का कोई भी व्यवसायिक चैनल कभी नहीं था। लोगों को कविताएँ पसन्द हैं, लेकिन यह हमेशा स्कूली किताबों से ही जुड़ी रही। इस चैनल के माध्यम से हिन्दी कविता में आधुनिकता आ गयी।

इन छोटे, साधारण और आनंददायक वीडियो का निर्माण सामान्यतः मनीष के घर पर ही होता है, जिसमें बैकग्राउण्ड में  वायलिन बजता रहता है और वक्ता  अपनी चुनी हुई कविता के बारे में वर्णन करते हैं।मनीष के पास फिल्म इंडस्ट्री के बेहतरीन तकनीशियनों का सहयोग है, जो उन्हें सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग और ग्राफिक्स में मदद करते हैं।

मनीष बताते हैं कि उन्होंने कुछ काफी पुरानी, भूली हुयी कविताओं को भी ढूँढ निकाला है, जैसे कि नजीर अकबराबादी की और कुछ कम जानी हुयी आवाजें जैसे डोगरी भाषा के कवि पद्मा सचदेव।

ये देखते हुए कि छात्रों का हिन्दी साहित्य से रूझान लगातार घट रहा है,गुप्ता चाहते है कि हिन्दी कविता को सभी कॅालेजों तक ले जाये, जिसमें सभी आईआईएम, सभी आईआईटी, दिल्ली विश्वविद्यालय और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय भी शामिल हैं। उन्होनें सभी  कॅालेजों में वीडियो दिखाने की योजना बनाई है और कोशिश है कि कलाकार स्वयं जाकर वहाँ कविताएँ पढ़े।

मनीष गुप्ता मानते हैं कि अंग्रेजी एक बहुत प्रसिद्ध और बोलचाल की सामान्य भाषा बन चुकी है, लेकिन भारत देश में अपनी भाषा में बात करने में लोगों को ज्यादा आसानी होती है।

वे कहते हैं,”मुझे अंग्रेजी से कोई समस्या नहीं हैयह भी एक बहुत अच्छी भाषा हैकिन्तु यह हमारी नही हैइसलिए हमें इसे बहुत ज्यादा नही अपनाना चाहिए। हम अपनी भाषा को विकसित करें।

मनोविज्ञानियों का भी मानना है कि जब हम अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते है तो शब्दों के साथ ज्यादा गहरा जुड़ाव महसूस करते है और बेहतर तरीके सेअपनी बात कह पाते है।

मनीष के लिए हिन्दी कविता के माध्यम से कवियों और कविताओं की पुनः स्थापना उनकी जिंदगी का सबसे शानदार प्रोजेक्ट है। वह और उनकी टीम हिन्दी, उर्दू और हाल ही में पंजाबी में भी कविताओं को प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे जल्द ही मराठी, गुजराती और बंगाली को भी अपने प्रोजेक्ट में शामिल करने वाले हैं।

 

अमेरिकी गीतकार बॉब डिलेन को नोबेल साहित्य पुरस्कार

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स्टॉकहोम – अमेरिकी गीतकार बॉब डिलेन को इस साल का नोबेल साहित्य पुरस्कार दिया जाएगा। वह प्रतिष्ठित सम्मान हासिल करने वाले पहले गीतकार हैं और इस घोषणा ने पुरस्कार पर नजर जमाए हुए लोगों को हैरान कर दिया है।

स्वीडिश एकेडमी ने कहा कि 75 साल के डिलेन को ‘‘अमेरिकी गीतों की लंबी परंपरा में नयी काव्य शैली विकसित करने के लिए’’ नोबेल पुरस्कार दिया गया है।

पुरस्कार की घोषणा के कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों ने हैरान होने के बाद तालियां बजाकर इसका स्वागत किया।

पूर्व में भी नोबेल के लिए गायक के नाम की अटकलें लगी थी लेकिन उनकी दावेदारी को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया।

एकेडमी की स्थायी सचिव सारा दानियस ने कहा कि डिलेन के गाने ‘‘कानों में कविता जैसे लगते हैं।’’ नोबेल पुरस्कार गायक के लिए सबसे नया सम्मान है। 1941 में मिनेसोटा के डुलुथ में एक साधारण परिवार में जन्मे रॉबर्ट एलेन जिमेरमन उर्फ बॉब डिलेन ने बड़े होने के साथ हार्मोनिका, गिटार और पियानो बजाना सीखा।

डिलेन को पुरस्कार के साथ 80 लाख क्रोनोर :9,06,000 डॉलर: की धनराशि मिलेगी।

साहित्य के नोबेल पुरस्कार की घोषणा के साथ इस साल के नोबेल पुरस्कारों के सभी विजेताओं की सूची पूरी हो गयी। इससे पहले चिकित्सा, भौतिकी, रसायनशास्त्र, अर्थशास्त्र और शांति के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की जा चुकी है।

शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता को छोड़कर बाकी दूसरे विजेताओं को 1़0 दिसंबर को स्टॉकहोम में एक औपचारिक समारोह में पुरस्कार – एक स्वर्ण पदक और एक डिप्लोमा – दिया जाएगा।

शांति का नोबेल पुरस्कार उसी दिन नार्वे की राजधानी ओस्लो में होने वाले एक दूसरे समारोह में दिया जाएगा। यह पुरस्कार नार्वे की नोबेल समिति देती है।

8 सालों से पर्यटन के लिए घूम रही हैं ये बहनें, वेबसाइट ने दिलवाया पुरस्कार

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भोपाल.मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में एमपी ट्रैवल मार्ट के उद्घाटन समारोह में 22 श्रेणियों में 39 विजेताओं को पहले एमपी टूरिज्म अवार्ड्स बांटे। पुरस्कार पाने वालों मे पर्यटन को बढ़ावा देने वाली दिल्ली की दो बहनें भी शामिल हैं। पर्यटन को प्रोत्साहित करने वाली ghoomophiro.com वेबसाइट को दिल्ली की दो बहनें प्राची और हिमाद्री गर्ग चलाती हैं।

दोनों बहने 8 साल से भारत और देश के बाहर घूम रही हैं। 8 सालों में वह करीब-करीब पूरा भारत देख चुकी हैं। -इस यात्रा में वह ज्यादातर पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करती हैं। बाइक से हिमालय और लद्दाख जाना उन्हें विशेष पसंद है।अवार्ड मिलने के बारे में बात करते हुए प्राची ने बताया कि उन्होंने एमपी को अपनी वेबसाइट और सोशल मीडिया के माध्यम से बाहर काफी प्रमोट किया है। सारा देश घूमने के बाद मैं कह सकती हूं कि एमपी बहुत खास है। वहीं, एमपी में सभी मौसम में जाया जा सकता है। नेचर को देखना है तो पंचमढ़ी, रेस्ट करना है तो जंगल कैंप, संगमरमर की चट्टानों के बीच फाल्स देखना है तो भेड़ाघाट, आर्किटेक्चर के बारे में जानना है तो खजुराहो और धार्मिक आस्था है तो उज्जैन। हम दोनों बहने 6-7 बार एमपी आ चुकी हैं। पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए हम हर बुधवार को सोशल मीडिया पर चैट करते हैं और यहां के बारे में विदेशी और देशी पर्यटकों को जानकारी देते हैं। पूरा देश घूमते हैं, अभी तक कोई प्रॉब्लम नहीं
विदेशों में आम धारणा है कि भारत घूमने के लिए सेफ जगह नहीं है, खासतौर से लड़कियों के लिए लेकिन हम पूरा देश घूमते हैं, अभी तक कोई प्रॉब्लम नहीं आई है।
पहली बार हम दोनों बहनें 8 साल पहले 10 मिनट के विचार के बाद ही दिल्ली से हिमाचल निकले थे। तब से ये सफर जारी है।

प्राची और हिमानी, दोनों बहनों ने इंजीनियरिंग और एमबीए पास हैं। प्राची एक किताब ‘सुपर वूमेन’ भी लिख चुकी हैं जो प्रतिष्ठित पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित है।

 

रीना तालुकदार ने अपने हुनर से सजाया मोती का संसार

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यह एक अनोखी दुनिया हैं जहां बैग से लेकर तरह तरह के खिलौने टेबल पर सजाने तथा डायनिंग टेबल पर बिछाने वाला मैट की तरह कई अनोखी चीजें देखने को मिलती है।

घर गृहस्थी के बीच मिले एकान्त में खुद की तलाश करने का मौका मिला…लगा कि खुद की क्षमता को पहचान कर उसे दुनिया के सामने लाना है। मुक्तो निकेतन के जरिए वे अपनी पहचान बना चुकी है और कल्याणी में रहते हुए कार्य कर रही है।

उनकी कारीगरी और सफाई से किया गए कार्य मांग बढ़ी है. कई प्रदर्शनी में भाग ले चुकी है.अब तो उनके बैग की मांग महानगर से अन्य राज्यों में बढ़ी है। रीना का कहना है काम कम करो पर जो काम करो वह शतप्रतिशत खरा हो। उनके इसी नारे ने हजारों की भीड़ में रीना की पहचान बनाई है।

रिटार्यड आईपीएस अधिकारी की पत्नी रीना अपने आप में प्रेरणा हैं। आइए डालते हैं उनके मोती से सजे संसार से निकले खजाने पर एक नजर –

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यह त्योहारों का मौसम है और अगर आप कुछ देसी फंडा आजमाना चाहती हैं तो सफेद मोती का यह पर्स आपकी सिल्क को और खूबसूरत बना सकता है।

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शादी पर जाना है या दिवाली पर मिठाई बाँटने, यह पर्स काफी अच्छा लगेगा। सफेद और हरे रंग का संयोजन इसे शानदार लुक दे रहा है।

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काले रंग का जवाब नहीं होता और उस पर सफेद लंबे मोती का काम इस पर्स को बेहद खूबसूरत बना रहा है। पार्टी में ब्लैक पहनने जा रही हैं। इसे साथ रखिए और देसी स्टाइल दिखाएं शान से।

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उत्सव के इस मौके पर लाल रंग बहुत पसंद किया जाता है और इस पर्स में लाल के साथ काले और सुनहरे रंग का इस्तेमाल बड़ी खूबसूरती से किया गया है।img-20161010-wa0041

सहेलियों के साथ फिल्म देखने जा रही हैं, इसे साथ रखिए और फैशनेबल बनिए। आपकी जींस हो या पलाजो, सबके साथ ये बेहद प्यारा लगेगा।

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रीना तालुकदार के खजाने से एक और रत्न। सजावट के लिए एकदम सही।

 

विजयादशमी से जुड़े हैं ये अनोखे तथ्य

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आखिर रावण किस बात का प्रतीक है? उसने सोने की लंका नहीं बसाई बल्कि अपने भाई कुबेर से उसकी नगरी छीन ली। उसने साधुओं को मारा और स्त्रियों के साथ दुराचार किया। उसने डर के द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित किया। आखिर उसने सीता का अपहरण इसीलिए किया क्योंकि वह अपनी बहन के अपमान का बदला लेना चाहता था।

युद्ध में उसने स्वयं से पहले अपने पुत्रों और भाई को लड़ने के लिए भेजा। वह सीता को जीतना चाहता था और राम को भी। रावण केवल स्वयं के लिए जी रहा था। अपने आनंद को वह सबसे ऊपर रखता था। हालांकि वह योगी शिव का भक्त था। उन शिव का जिन्होंने संसार की भौतिकता और सभी वस्तुओं का त्याग कर रखा है।

रावण शिव की स्तुति करता रहा और उनके सामने नतमस्तक होता रहा लेकिन दस सिर होने के बावजूद उसने कभी भी शिव के ज्ञान की तरफ ध्यान नहीं दिया। संभव है कि उसने शिव के दर्शन को नहीं समझा, उसने शिव के दर्शन को समझा भी हो तो उनके बताए मार्ग पर चलने का सामर्थ्य रावण नहीं जुटा पाया। रावण के चरित्र की ये कमजोरियां सभी लोगों के लिए उदाहरण है कि वे अपनी इन कमजोरियों पर विजय पाने का प्रयास करें।

विजयादशमी पर यात्रा शुभ

विजयादशमी के दिन नवरात्र पर्व का समापन होता है। इस दिन पृथ्वी से मां दुर्गा अपने लोक के लिए प्रस्थान करती हैं। यही वजह है कि विजयादशी को यात्रा तिथि भी कहा गया है। इस दिन किसी भी दिशा में यात्रा करने पर दोष नहीं लगता है।

दशहरे के प्रमुख कृत्य

विजयादशमी यूं तो सर्वसिद्ध मुहूर्त है। इस दिन अपराजिता पूजन, शमी पूजन, सीमोल्लंघन, घर वापसी, नारी पूजन, नए वस्त्र व आभूषण धारण करना, राजाओं द्वारा अपने शस्त्र या संपदा का पूजन। राजाओं, सामंतों और क्षत्रियों के लिए यह विशेष महत्व का दिन है।

नीलकंठ के दर्शन शुभ

‘नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध-भात का भोजन करियो, हमरी बात राम से कहियो।” यह उक्ति गांव-गांव में चर्चित है। इसका अर्थ यही है कि नीलकंठ भगवान का प्रतिनिधि है। दशहरे पर यही कारण है कि इस पक्षी का दर्शन किया जाता है। भगवान शंकर ने विष का पान किया था और वे नीलकंठ कहलाए थे।

यह पक्षी भी नीलकंठ है तो इसलिए इसका दर्शन शुभ माना गया है। नीलकंठ को भारत में किसानों का मित्र भी माना गया है क्योंकि यह अनावश्यक कीड़ों-मकोड़ों को खाकर किसान की मदद करता है।

दशहरे पर बीड़ा क्यों

अक्सर रावण के दहन के पश्चात विजयादशमी पर्व पर पान खाने की परंपरा भी है। इसके पीछे लोगों का विश्वास ही मुख्य है। माना जाता है कि इस दिन लोग असत्य पर सत्य की जीत का उत्सव मनाते हैं और बीड़ा खाकर यह बीड़ा उठाते हैं कि वे हमेशा सत्य के मार्ग पर चलेंगे। इसका एक कारण यह भी है कि नवरात्र में श्रद्धालु नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और दसवें दिन जब वे भोजन शुरू करते हैं उसके ठीक पाचन में बीड़ा मदद करता है।

शमी की पत्तियां लाना इसलिए शुभ

कथा है कि महर्षि वर्तन्तु का शिष्य था कौत्स। उसकी शिक्षा पूरी होने पर वर्तुन्तु ने उससे गुरुदक्षिणा में 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगी। इसका इंतजाम करने के लिए वह महाराज रघु के पास गया। रघु दान हेतु खजाना पहले ही खाली कर चुके थे।

उन्होंने कौत्स से तीन दिन का समय मांगा और इंद्र पर आक्रमण का विचार किया। इंद्र ने घबराकर कोषाध्यक्ष कुबेर को रघु के राज्य में स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा का आदेश दिया।

उसी तिथि को विजयादशमी उत्सव मनाया गया। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शमी वृक्ष का संबंध शनि से भी है। शमी वृक्ष का पूजन शनि के अशुभ प्रभाव से बचाव में सहायक है।

 

मुंशी प्रेमचंद के ऐतिहासिक घर को बचाया इस प्रोफेसर तथा उनके छात्रों ने !

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सन २००५ में डॉ. यादव मुंशी प्रेमचंद जी पर आधारित एक क्लास ले रहे थे। प्रेमचंद जी के घर को संरक्षित करने के लिए विद्यार्थियों का उत्साह देखकर डॉ. यादव बहुत प्रभावित हुए और इस बारे में उन्होंने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री जी से मुलाकात की।

डॉ विनय कुमार यादव १८ सालो से बिशप कॉटन वूमेन्स ख्रिस्तियन कॉलेज, बंगलुरु में हिंदी पढ़ाते है  और स्कूल में हिंदी विभाग के प्रमुख है। स्कूल में उन्हें वो दिन याद है जब वे मुंशी प्रेमचंद के बारे में पढ़ा रहे थे, जिससे सभी छात्रों के दिल और दिमाग पर पर गहरी छाप पड़ी।

डॉ यादव कहते है “कभी कभी क्लास के सभी विद्यार्थी होशियार और उत्साहित होते है। सन २००५-२००६ में मुझे यूनिवर्सिटी के कुछ विद्यार्थियो को पढ़ाने का मौका मिला। एक विषय का असर इस तरह से हुआ कि सभी विद्यार्थियो की सोच बदल गयी और साहित्य जगत में बड़ा बदलाव हुआ।“

डॉ यादव को प्रख्यात हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद की  लिखी हुई  सभी किताबे पसंद है। एक दिन वे ‘लम्ही- मुंशी प्रेमचंद का गाँव’ इस विषय पर पढ़ा रहे थे। उस लेख में लम्ही, उत्तर प्रदेश के एक गाँव, जहा मुंशी प्रेमचंद रहते थे, की तुलना लन्दन स्थित विलियम शेक्सपीअर के घर के साथ की गयी है।

डॉ. यादव कहते कि लेखक के अनुसार शेक्सपीयर का घर ब्रिटनवासियों ने अच्छी तरह से रखा है पर प्रेमचंदजी के घर की स्थिति बड़ी दयनीय है, इस बात से वो परेशान हुए।

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डॉ. यादव छात्रों के इस उत्साह से बहुत खुश हुये। उन्होंने विद्यार्थियो से कहा की वे सब हस्ताक्षर अभियान शुरू करे और सभी छात्रों और  शिक्षको से हस्ताक्षर करने के लिये अनुरोध करे। उसके बाद हम उस पत्र को उत्तर प्रदेश सरकार को भेजेंगे। डॉ. यादव ने उन्हें एक पत्र लिखा जिसके तीन मुख्य विषय थे। प्रेमचंदजी के घर को म्यूजियम बना दिया जाये, वहा एक वाचनालय (लाइब्रेरी) शुरू करे और हिंदी साहित्य पढने वाले विद्यार्थीयो के लिये वहा अनुसन्धान (रिसर्च) संस्था शुरू करे।

डॉ. यादव कहते है “अभियान का इतना असर था कि लोगो ने एक दिन में २००० हस्ताक्षर किये। हमें सकारात्मक विकास दिखाई दिया। मुझे आशा थी कि एक दिन में इतने सारे लोग इससे जुड़े है तो कुछ ही दिनों में हम बहुत आगे बढ़ सकते है। सिर्फ २००० हस्ताक्षर के पत्र पर शायद सरकार गौर ना करे, पर अगर ज्यादा लोग शामिल हो तो सरकार जरुर सहायता करेगी।”

डॉ. यादव ने विद्यार्थियो से कहा कि इस अभियान को दोस्त, परिवार और सभी लोगो के पास पहुचाएं और ज्यादा से ज्यादा लोगो के हस्ताक्षर शामिल करे। इस दौरान डॉ. यादव ने तय किया कि वो लाम्ही में जाकर प्रेमचंदजी के घर की स्थिति का जायजा लेंगे।स्कूल की छुट्ठीयों में वे लाम्ही गये। वहा के ज्यादातर लोगो को प्रेमचंदजी के घर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी ये सुनकर वो हैरान हुये। बहोत कोशिश करने के बाद उन्हें प्रेमचंदजी का घर दिखाई दिया जो बहुत ही ख़राब अवस्था में था।

डॉ. यादव कहते है-“मैं घर की स्थिति देखकर परेशान हो गया। जिस लेखक ने हिंदी साहित्य को एक नयी दिशा दी, जिनके लेख से स्वतंत्रता सेनानी प्रभावित हुये, जिन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है, उनका घर इससे बेहतर स्थिति में होना चाहिये था। ”

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उन्होंने विद्यार्थी को दिखाने के लिए उस घर के कुछ फोटो लिये और बंगलुरु वापस आ गये। इसी बीच आवेदन पत्र पर १ लाख से भी ज्यादा हस्ताक्षर हुए।मुंशी प्रेम्चाद का घर कुछ इस अवस्था में पाया गया था। आवेदन पत्र पर इतने सारे हस्ताक्षर होना एक बहोत बड़ी जीत थी और अब डॉ. यादव इस पत्र को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री को देने के लिए तैयार थे।

मुख्यमंत्री से मिलने  के लिए उन्हें थोड़ी दिक्कत हुयी पर मिलने के बाद उनके हिंदी साहित्य और मुंशी प्रेमचंद के घर के प्रति लगाव को देखकर मुख्यमंत्री काफी प्रभावित हुये। मुख्यमंत्री ये जानकर बहुत खुश हुये कि डॉ. यादव दक्षिण से उत्तर की और आकर एक हिंदी साहित्य के महान लेखक के घर को संरक्षित करना चाहते है। इस कार्य के लिए मुख्यमंत्री ने एक करोड़ और २.५ एकड जमीन दे दी। पर उत्तरप्रदेश की सरकार बदलने के कारण शुरू किया गया मरम्मत का काम रुक गया। डॉ. यादव ने नयी सरकार को बहोत सारे पत्र लिखे पर कोई जवाब नहीं आया।

सन २०१३ में जब अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री बने तब डॉ. यादव को एक आशा की किरण दिखाई दी और उन्होंने अखिलेशजी से बात करके मरम्मत का काम फिरसे शुरू किया।अब तक  ९० प्रतिशत काम पूरा हुआ है और डॉ. यादव सरकार के इस काम पर निजी तौर पर ध्यान दे रहे है।

डॉ. यादव कहते है-“मैंने कई बार लम्ही में जाकर काम का मुआयना किया और वो ठीक तरह से चल रहा है। कुछ ही दिनों में काम पूरा हो जायेंगा”डॉ. यादव ने उत्तर प्रदेश सरकार को सुझाव दिया है कि प्रेमचंदजी का घर पर्यटन स्थल में शामिल करे ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यटक भेट दे सके। वो कहते है,“अगर पर्यटकसे १० रुपये टिकट के तौर पर लिया जाये तो घर की देखभाल के लिये मासिक आमदनी भी इकट्ठा हो सकती है”एक लेखक और उनके विद्यार्थियो को धन्यवाद देना चाहिये जिनके अथक प्रयत्न के बाद एक महान लेखक का घर संरक्षित किया गया जो सभी नये लेखको के लिये प्रेरणा स्थान बन रहा है।

डॉ. यादव कहते है प्रेेमचंदजी सामान्य लेखक नहीं थे। उनकी सारी कथाए सत्य घटनाओ पर आधारित थी, जो अमीरों से गरीब लोगो के उपर किये गये शोषण पर आधारित थी। उनके साहित्य दिल में एक जगह बना लेते है।” हिन्दी का संरक्षण सिर्फ वातानुकूलित घरों में होने वाली संगोष्ठियों से नहीं हो सकता और बल्कि  इसके लिए जनता तक जाने की जरूरत है। अपराजिता प्रो. यादव के इस प्रयास और उनकी जागरूकता को सलाम करती है।

 (साभार – द बेटर इंडिया)

 

धोनी के बाद शमी ने पेश की मिसाल, आईसीयू में बेटी को छोड़ खेला मैच

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भारत और न्यूजीलैंड के बीच कोलकाता में हुआ दूसरा टेस्ट मैच टीम इंडिया ने 178 रनों से जीत लिया। इस मैच में भारत के फास्ट बॉलर मोहम्मद शमी ने एक शानदार मिसाल पेश की। दरअसल शमी जब मैच में मेहमान बैट्समैन के विकेट ले रहे थे, उसी वक्त पर्सनल लाइफ में वे एक बड़ी परेशानी का सामना कर रहे थे।

– भारत और न्यूजीलैंड के बीच दूसरा टेस्ट मैच 30 सितंबर से शुरू हुआ था और इसके एक दिन बाद ही शमी की 14 महीने की बेटी आयरा को हॉस्पिटल में एडमिट करना पड़ा।
– शमी की बेटी को ना केवल तेज बुखार था बल्कि सांस लेने में भी दिक्कत हो रही थी जिसके बाद उसे ICU में रखा गया था।
– बेटी की तबीयत खराब होने की वजह से शमी काफी तनाव में थे, लेकिन इसका जरा भी असर उन्होंने अपनी परफॉर्मेंस पर नहीं पड़ने दिया।
– वे टीम इंडिया के लिए लगातार बॉलिंग करते रहे और एक के बाद एक विकेट लेते रहे। यहां तक कि इस बात को उन्होंने अपने साथियों से भी शेयर नहीं किया।
– हर दिन मैच खत्‍म होते ही शमी अपनी बेटी का हाल जानने पहुंच जाते और फिर रात में वापस आकर टीम के साथ रुक जाते।
– मैच में उनकी परफॉर्मेंस को देखकर लग रहा था कि वे भी चाहते हैं कि मैच जल्द से जल्द खत्म हो, ताकि वे पूरा टाइम अपनी बेटी को दे सकें।

भारत को दिलाई ऐतिहासिक जीत

– इस मैच में मो. शमी ने दोनों इनिंग्स को मिलाकर 6 विकेट चटकाए और मेहमान टीम को संभलने का मौका नहीं दिया।
– भारत के लिए ये टेस्ट इसलिए भी इतना खास था, क्योंकि ईडन गार्डन में भारत का ये 250वां टेस्ट था।
– साथ ही इसे जीतने के साथ ही भारत को सीरीज में 2-0 की अपराजेय बढ़त भी मिल गई।
– इसके अलावा इस टेस्ट को जीतकर भारत एकबार फिर टेस्ट रैंकिंग में नंबर वन टीम बन गई।
– मैच खत्म होते ही शमी की बेटी भी हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो गई।
– इससे पहले टीम इंडिया के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी कुछ ऐसी ही मिसाल पेश कर चुके हैं।
– धोनी जब पिता बने थे, तब वे टीम इंडिया के साथ खेल रहे थे, और इसी बात कहा हवाला देते हुए उन्होंने बेटी को देखने के लिए घर लौटने से इनकार कर दिया था।

 

दशहरे पर 65 Cr का जलेबी-फाफड़ा खा जाते हैं गुजराती, 2000 करोड़ का है गरबे का कारोबार

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अहमदाबाद.‌देश-दुनिया से लोग गरबा देखने गुजरात आते हैं। इसी साल अकेले अहमदाबाद में 700 एनआरआई और 250 विदेशी टूरिस्ट पहुंचे हैं। पूरे राज्य में यह संख्या ढाई हजार से ज्यादा है। नवरात्रि के खर्चों के आंकड़े देखें तो हर प्लॉट के हिसाब से रोज 2 से 5 लाख रुपए का किराया होता है। इसके अलावा लाइट और साउंड पर भी 3 से 5 लाख रुपए खर्च होते हैं। 9 दिन के इस त्यौहार का कुल बिजनेस करीब 2 हजार करोड़ का होता है। यही नहीं एक रिपोर्ट के अनुसार हर साल दशहरे पर गुजरात के लोग 65 से 70 करोड़ का सिर्फ जलेबी-फाफड़ा खा जाते हैं। पढ़िए गुजरात के गरबा बिजनेस पर एक रिपोर्ट…

– गरबा सिर्फ आस्था और उत्साह का ही मामला नहीं है, बल्कि यह बड़ा बिजनेस बन चुका है। हालांकि इस बार बारिश ने इसमें खलल पैदा किया है।

– थीम के मुताबिक मेन्टेनेंस का खर्च, जूते, कपड़े, ज्वेलरी, खाने पीने का कारोबार आदि मिलाया जाए तो 9 दिनों में करीब 2000 करोड़ का बिजनेस होता है।
– परंपरा ऐसी कि सिर्फ दशहरे पर ही लोग 65 से 70 करोड़ की जलेबी और फाफड़ा खा जाते हैं। इस बार बारिश के चलते टिकट की बिक्री 25% तक ही रही है।
– एक टिकट की कीमत 200 से 500 रुपए तक रहती है। एक अनुमान के मुताबिक बारिश से इस बार गरबा कारोबार को करीब 500 करोड़ का नुकसान हुआ।
गरबा ड्रेस 120 करोड़ का चनिया-चोली मार्केट

– अहमदाबाद में रानी का हजीरा, लॉ-गार्डन और नेहरू नगर में चनिया-चोली का बाजार लगता है। इनका सालाना कारोबार 25 से 30 करोड़ है।
– पूरे राज्य का ये आंकड़ा 120 करोड़ को पार कर जाता है। कच्छ की कढ़ाई-बुनाई और सौराष्ट्र के ग्रामीण कपड़े की डिमांड सबसे ज्यादा होती है।
– इसकी कीमत ही 15 हजार से शुरू होती है। सादा चणिया-चोली की कीमत भी 2500 से 3000 हजार के बीच होती है। विदेशी टूरिस्ट अपने और परिचितों के लिए 10 से 15 नग खरीदते हैं।

मेकअप पर 55 लाख रुपए करते हैं खर्च

– कॉस्मेटिक इंडस्ट्रीज की आवक हर साल नवरात्र शुरू होने से पहले और इस दौरान में 50 से 55 लाख होती है। छोटे ब्यूटी पॉर्लर से लेकर बड़े पॉर्लर तक में प्री बुकिंग रहती है।
– ज्यादातर पॉर्लर 10 दिन के पैकेज की एडवांस बुकिंग कर लेते हैं। इसलिए इस बारिश से उन्हें ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है।

आर्टिफिशियल ज्वेलरी की बिक्री 35 करोड़ रु. तक 

– मेकअप के बाद गरबों के लिए सबसे ज्यादा डिमांड आर्टिफिशियल ज्वेलरी की होती है।

– पूरे गुजरात में करीब 35 करोड़ के आसपास इसकी बिक्री होती है। बारिश की वजह से इस बार 20 प्रतिशत तक गिरावट है।

150 करोड़ रुपए का लाइटिंग कारोबार

अहमदाबाद के बाजारों में नवरात्र-दीपावली के दिनों में बिक्री 2 से 3 गुना बढ़ जाती है। यहां पूरे साल बिजनेस रहता है।

– सामान्यत: अहमदाबाद में 200 से 300 करोड़ रुपए का कारोबार होता है। इसी एक महीने में ही पूरे साल की कमाई का 50 प्रतिशत यानी डेढ़ सौ करोड़ से अधिक का कारोबार होता है।
– एडवांस बुकिंग से यहां नुकसान कम दिखा है।

म्यूजिक और सिंगर्स पर 3.5 करोड़ खर्च

– सबसे ज्यादा डिमांड गरबा गायकों, ऑर्केस्ट्रा पार्टी वालों की होती है। इसके अलावा बड़े-बड़े साउंड सिस्टम भी महीनों पहले से बुक हो जाते हैं।
– नवरात्र के दौरान रोज की कमाई 35 से 40 लाख है। यानी 9 दिनों में गीत-संगीत पर साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा खर्च किए जाते हैं।
– हालांकि बारिश की वजह से इस बार म्यूजिक इंडस्ट्री को 10 लाख रुपए रोज का नुकसान उठाना पड़ा है।

डांडिया देखने आए 2500 एनआरआई
– नवरात्र में गुजरात आने वाले एनआरआई एवं विदेशी टूरिस्टों की संख्या डेढ़ गुना बढ़ गई है। इस साल अहमदाबाद में ही 700 से अधिक एनआरआई और 250 विदेशी टूरिस्ट गरबा देखने पहुंचे हैं।
– राज्यभर में ये संख्या 2500 से ज्यादा है। इन 9 दिनों के दौरान अहमदाबाद और राज्य की तमाम बड़ी होटलों की बुकिंग 80 प्रतिशत से ज्यादा रहती है।

400 गुना बढ़ जाता है रेस्रां-होटल्स कारोबार

– होटल एवं रेस्त्रां के साथ-साथ फूड जॉइंट्स, रात्रि के खान-पान बाजारों में देर रात में भीड़ लगती है। गरबा प्रेमी समूहों के साथ चाय-नाश्ता करते हैं।
– इससे रात्रि खान-पान बाजार में बिक्री दो से तीन गुनी बढ़ जाती है। होटल भी पूरी रात खुले रहते हैं। दिन के मुकाबले रात में 300 से 400 गुना ज्यादा कारोबार होता है।
– होटलों में मिडनाइट मील की स्कीमें दी जाती हैं।

नवरात्र में हर व्यक्ति औसतन 1 से 3 हजार रुपए तक खर्च करता है

– नवरात्र में हिस्सा लेने वाला एक व्यक्ति औसतन 1,000 से 3 हजार रुपए खर्च करता है। इसमें गरबा ग्राउंड में एंट्री के लिए टिकट, पेट्रोल और नाश्ते का खर्च शामिल है।

– नवरात्र में ट्रेडिशनल ड्रेस भी किराए पर खूब मिलती है। प्रति ड्रेस के हिसाब से 500 से 3,000 तक चार्ज किया जाता है। आर्टिफिशियल ज्वेलरी भी किराए पर मिलती है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

घर से कार्यस्थल तक, नहीं होगा एचआईवी पीड़ित के साथ भेदभाव, बिल में बदलाव को मंजूरी

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने एचआईवी और एड्स बिल, 2014 में बदलावों को मंजूरी दे दी है। नया ड्राफ्ट एचआईवी/एड्स पीड़ितों के लिए सेफगार्ड्स की तरह काम करेगा। बिल अगर कानून बनता है तो शिकायत मिलने पर उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकेगी जो एड्स पीड़ितों भेदभाव करते हैं। बदलावों में ये बातें शामिल…

– बिल के नए ड्राफ्ट में भेदभाव के कई आधारों को शामिल किया गया है। इसमें एचआईवी पॉजिटिव और उनके साथ रहने वालों के साथ किए जाने वाले बुरे बर्ताव को रोकने की कोशिश की गई है।
– साथ ही उन्हें इम्प्लॉइमेंट, एजुकेशन, हेल्थ केयर सर्विसेस, प्रॉपर्टी, पब्लिक या प्राइवेट ऑफिस और इंश्योरेंस में सामान्य लोगों की तरह फैसिलिटी दिए जाने की बात कही गई।
– कैबिनेट की मीटिंग के बाद जारी बयान में कहा गया है कि नौकरी पाने, इलाज कराने या किसी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में दाखिले के लिए एचआईवी टेस्ट कराना गलत होगा।

नए ड्राफ्ट में ये भी सिफारिशें
– बिल में किए गए अमेंडमेंट्स के मुताबिक, ‘किसी भी शख्स को एचआईवी स्टेटस बताना जरूरी नहीं होगा। अगर ये जरूरी होगा तो ये कोर्ट के ऑर्डर से तय होगा।’
– प्रपोजल के मुताबिक, ‘एचआईवी से पीड़ित या प्रभावित कोई शख्स 18 साल से कम उम्र का है तो उसे किसी के साथ घर और सारी फैसिलिटी शेयर करने का हक होगा।’
– ‘किसी को भी ऐसी कोई जानकारी छापने या उसे सपोर्ट करने का अधिकार नहीं होगा जिससे एचआईवी पीड़ित या उसके साथ रह रहे लोगों की भावनाओं को ठेस लगे।’

नाबालिगों के लिए भी प्रोविजन
– ड्राफ्ट के मुताबिक, 12 से 18 साल के ऐसे बच्चे जो एड्स पीड़ित या उससे प्रभावित परिवार की तकलीफ समझते हैं, उन्हें अन्य नाबालिगों के गार्जियन बनने का हक होगा।
– ये प्रोविजन किसी एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में दाखिले, बैंक अकाउंट्स खुलवाने, प्रॉपर्टी और इलाज के लिए होगा।

 

गर्ल्स कॉलेज के पास ठेला लगाता है ये शख्स, पेटीएम से लड़कियां करती हैं भुगतान  

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पटना.बिहार में पटना के मगध महिला कॉलेज के पास गोलगप्पे का हाथ ठेला पर एक बोर्ड देखकर पलभर के लिए किसी का चौंकना लाजिमी है। दरअसल, हाथ ठेला लगाने वाला एक लड़का बड़े शोरूम मालिकों की तरह कैश के साथ ही पेटीएम के जरिए भी कस्टमर्स से पेमेंट लेता है। इस लड़के का नाम सत्यम है। वह 12वीं पास है और एक साधारण किसान का बेटा है। फिलहाल सत्यम अगले साल ग्रैजुएशन में एडमिशन लेने की तैयारी कर रहा है। सत्यम ऐसा करने वाला इकलौता हाथ ठेला वाला नहीं है। यहां कई और छोटे-मोटे दुकानदार पेटीएम से कैश ले रहे हैं। जानिए क्यों पेटीएम से लेता है पेमेंट…

– स्मार्टफोन पर नई-नई तकनीक आने से छोटे-मोटे कारोबारी भी हाईटेक हो रहे हैं। सत्यम भी उन्हीं में से एक है। सत्यम के ठेले पर गोलगप्पे खाकर “पेटीएम’ के ई-वॉलेट से आप भुगतान कर सकते हैं।

– सत्यम का कहना है कि इससे खुल्ले पैसे के लिए चिकचिक नहीं होती है। साथ ही, सत्यम का कहना है कि इसके लिए कैश रखने की भी मजबूरी नहीं होती है।

– उसने बताया कि कॉलेज की छात्राएं ठेले के पास खड़े होकर गोलगप्पे खाती हैं और उसका पेमेंट ‘पेटीएम’ के माध्यम से करती हैं। वह बताता है कि लड़कियों में पेटीएम का बहुत क्रेज है।

– कम से कम 20 रुपए का पेमेंट छात्राओं को ठेले पर करना पड़ता है। सत्यम के अलावा गांधी मैदान इलाके में कुछ और ठेलेवाले भी पेटीएम से पैसे ले रहे हैं।

क्या कहती हैं कॉलेज की लड़कियां ?

– कॉलेज की एक स्टूडेंट मांडवी कहती है- थोड़ा-थोड़ा करके बहुत पैसे खर्च हो जाते हैं। खाने-पीने की चीजों का पेमेंट करने के लिए पेटीएम का उपयोग करती हूं।

– बीकॉम की एक दूसरी स्टूडेंट पूजा कहती हैं कि कई बार कम पैसे होने की स्थिति में पेटीएम का यूज करती हूं। एक अन्य स्टूडेंट ने कहा, पेटीएम से पेमेंट करते समय खुले पैसे का झंझट नहीं रहता।
क्या है ई-वॉलेट ?

– पेटीएम एक ई-वॉलेट है। यह सीधे आपके बैंक खाते से कनेक्ट होता है। इसके जरिए आप कपड़े से लेकर खाने-पीने और ट्रैवल व हजारों तरह की शॉपिंग कर सकते हैं।

– मोबाइल रिचार्ज, डीटीएच, गैस, बिजली बिल, किराना, कपड़े आदि की दुकानों पर पेटीएम से भुगतान कर सकते हैं। कैब या बस सर्विस लेते वक्त भी इसका यूज किया जा सकता है।

– कई ऑटो चालक भी अपने पैसेंजर्स को इसकी फैसिलिटी दे रहे हैं।

ऐसे काम करता है

– मोबाइल पर पेटीएम ऐप डाउनलोड करने के बाद उस पर अपना अकाउंट बनाया जाता है।

– उसके बाद जिस भी जगह आपको पेटीएम का उपयोग करना है, वहां मौजूद पेटीएम के बार कोड को अपने मोबाइल से स्कैन किया जाता है।

– उसके बाद मोबाइल पर आए ओटीपी को डाल कर पेमेंट किया जा सकता हैं। इसके लिए पहली बार आपको अपने बैंक अकाउंट की जानकारी देनी होती है।

– पेटीएम वॉलेट का उपयोग करने के लिए उसमें अपने बैंक अकाउंट से पहले ही कुछ पैसा जमा कर दिया जाता है।