Thursday, July 16, 2026
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किसान पिता की 3 बेटियां बनीं लेफ्टिनेंट

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एक किसान की तीन बेटियों ने एक साथ ज्वॉइन की आर्मी। इन तीनों बहनों की सक्सेस स्टोरी इतनी दिलचस्प है कि आप गर्व महसूस करेंगे। रोहतक के किसान प्रताप सिंह देशवाल दो बेटियां प्रीति (23) और दीप्ति (22) और भतीजी ममता (24) ने यह उपलब्धि हासिल की है। तीनों में देशसेवा की इतना जज्बा था कि बचपन में ही सेना में जाने की ठान ली थी। तमाम चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए दो सगी बहनों व एक कजन सिस्टर ने अब सेना की मेडिकल कौर में लेफ्टिनेंट के पद पर ज्वाइनिंग हासिल की है। बेटियों की इस उपलब्धि पर पिता काफी गर्व महसूस कर रहे हैं। ल रूप से झज्जर के रहने वाले प्रताप सिंह देशवाल ने बताया कि हमारे घर में कोई फौज में नहीं है। पहली बार बेटियों ने जब अपनी सोच बताई तो अजीब लगा। फिर जानकार लोगों से सलाह लेकर बेटियों को पढ़ाने का फैसला लिया। हालांकि पढ़ाई महंगी थी और खेतीबाड़ी के सहारे सब मुमकिन नहीं था, लेकिन बेटियों को बेटों की तरह पाला और दिन-रात मेहनत कर बेटियों को लेफ्टिनेंट बनाकर ही दम लिया। देशवाल कहते हैं कि बेटियों को पढ़ाने से दो घर सुधरेंगे। फिर समाज को एक अच्छा संदेश देना भी था। वहीं, ममता की मां सुमित्रा ने बताया कि प्रताप सिंह ने ही उनकी बेटी को भी पढ़ाया और अब वे सेना में जाकर देश व परिवार का नाम रोशन करेगी। आर्मी मेडिकल कोर में भर्ती होने के बाद अब अलग-अलग राज्य में ज्वानिंग मिली है।

 

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इस बार 14 जनवरी को ही होगी मकर संक्रांति

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मकरसंक्रांति ही एक ऐसा पर्व है जिसका निर्धारण सूर्य की गति के अनुसार होता है। पौष मास में जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस काल विशेष को ही संक्रांति कहते हैं। यूं तो प्रति मास ही सूर्य बारह राशियों में एक से दूसरी में प्रवेश करता रहता है। पर वर्ष की बारह संक्रांतियों में यह सब से महत्वपूर्ण है। इस बार मगर संक्रांति का 14 जनवरी को ही होगी। ज्योतिषाचार्य पंडित कुंजबिहारी शास्त्री ने बताया कि वैसे तो यह प्रतिवर्ष 14 जनवरी को मनाया जाता है। लेकिन किसी वर्ष यह त्यौहार बारह, तेरह या पंद्रह को भी हो सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सूर्य कब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। इस दिन से सूर्य की उत्तरायण गति आरंभ होती है और इसी कारण इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। इसी वजह से वर्ष 2016 में मकर संक्रांति 14 के बजाय 15 जनवरी की थी। ज्योतिष के अनुसार मकर राशि में प्रवेश करने के कारण यह पर्व मकर संक्रांति देवदान पर्व के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति मनाए जाने का यह क्रम हर दो साल के अंतराल में बदलता रहता है। लीप ईयर वर्ष आने के कारण मकर संक्रांति 2017 2018, 2021 में वापस 14 जनवरी को साल 2019 2020 में 15 जनवरी को मनाई जाएगी। यह क्रम 2030 तक चलेगा। इसके बाद तीन साल 15 जनवरी को एक साल 14 जनवरी को संक्रांति मनाई जाएगी। ऐसा होने का कारण है, पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए प्रतिवर्ष 55 विकला या 72 से 90 सालों में एक अंश पीछे रह जाती है। इससे सूर्य मकर राशि में एक दिन देरी से प्रवेश करता हैं। करीब 1700 साल पहले 22 दिसम्बर को मकर संक्रांति मानी जाती थी। इसके बाद पृथ्वी के घूमने की गति के चलते यह धीरे-धीरे दिसम्बर के बजाय जनवरी में गई है। मकर संक्रांति का समय हर 80 से 100 साल में एक आगे बढ़ जाता है। 19 वी शताब्दी में कई बार मकर संक्रांति 13 और 14 जनवरी को मनाई जाती थी। पिछले तीन साल से लगातार संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को मनाया जा रहा है। 2017 और 2018 में संक्रांति 14 जनवरी को शाम को अर्की होगी। कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि में प्रवेश करेंगे तथा दो माह तक रहते हैं। शनि देव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति को तमिलनाडु में पोंगल के नाम से जाना जाता है। इसी दिन मलमास भी समाप्त होने तथा शुभ माह प्रारंभ होने के कारण लोग दान पुण्य से अच्छी शुरुआत करते हैं।

मकर संक्रांति का महत्व 
शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महा स्नान की संज्ञा दी गई है।मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलाद्र्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अंधकार कम होगा। अत मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी।

 

अब बॉलीवुड के ‘पैडमैन’ बनेंगे अक्षय कुमार

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बॉलीवुड हीरो अक्षय कुमार पिछले कुछ सालों में अपने आप को स्टंट एक्टर से कॉमेडी किंग में तब्दील कर चुके हैं। आजकल वो अधिकतर कॉमेडी फिल्मों में नजर आते हैं। हालांकि उनका अभिनय भी काबिले तारीफ है। लेकिन अब अक्षय कुमार बड़े पर्दे पर एक अलग रूप में नजर आने वाले हैं। वो अब बॉलीवुड के ‘पैडमैन’ बनेंगे।अक्षय कुमार फिल्म ‘पैडमैन’ में लीड हीरो के रूप में नजर आएंगे।

436537-twinkle-akshayल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है। आपको बता दें कि फिल्म की थीम सेनिटरी नैपकीन है। फिल्म में अक्षय कुमार सैनिटरी पैड्स बनाते नजर आएंगे। यह किरदार अक्षय कुमार की पत्नी और बॉलीवुड हीरोइन ट्विंकल खन्ना की किताब ‘द लीजेंड ऑफ लक्ष्मीप्रसाद’ से लिया गया है। यह किरदार रियल लाइफ में मुरुगनाथम से प्रेरित है जिन्होंने सभी विरोधों का सामना करते हुए सबसे सस्ती सैनेटरी पैड्स बनाने का काम किया था। ट्विंकल खन्ना ने भी ट्वीट कर बताया है कि ये फिल्म उनकी किताब पर आधारित है। हालांकि फिल्म की कहानी आर बाल्की ने लिखी है और वो ही इसके निर्देशक भी हैं।

 

 

28 फरवरी तक जमा नहीं किया पैन तो सीज हो जाएगा आपका बैंक/डाकघर खाता

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यदि आपका खाता बैंक या डाकघर में है और उसमें पैन (परमानेंट एकाउंट नंबर) नहीं लगा है तो 28 फरवरी से पहले जमा कर दें। ऐसा नहीं करने की स्थिति में खाता सीज हो सकता है। यदि पैन नहीं बना है तो उसके लिए आवेदन कर दें।

फिलहाल आवेदन की स्लिप ही खाते में लगाई जा सकती है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स विभाग ने शनिवार को इस आशय का सर्कुलर जारी किया है।

आयकर विभाग के अधिकारी बताते हैं कि अब भी बड़ी संख्या में बैंकों में खाताधारकों का पैन नहीं जमा है। सभी खातों में पैन की अनिवार्यता के पीछे खाताधारकों की ऑनलाइन मॉनीटरिंग करना मकसद है।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स डिपार्टमेंट ने सभी बैकों को निर्देशित किया है कि नौ नवंबर से 30 दिसंबर तक जमा हुई रकम की डीटेल 15 जनवरी तक आयकर विभाग को भेज दें। इसी तरह एक अप्रैल से आठ नवंबर तक खातों में जमा रकम की रिपोर्ट 31 जनवरी तक भेजनी है।

इस रिपोर्ट में सामान्य खातों में ढाई लाख व करेंट एकाउंट में 12.50 लाख तक जमा होने की सूचना दी जानी है। आयकर विभाग ने एक अप्रैल से 8 नवंबर और 9 नवंबर से 30 दिसंबर तक जमा होने वाली रकम की जानकारी मांगी है।

इसका मतलब है कि आयकर विभाग खाताधारक का इतिहास भी खंगालेगा। पता करेगा कि नोटबंदी के दौरान किस खाते में कितना जमा हुआ और उससे पहले के आठ माह में कितना रुपया जमा हुआ। रुपये जमा करने की हैसियत है भी या उसके खाते का दुरुपयोग हुआ है।

 

पक्षी और दीमक 

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 गजानन माधव मुक्तिबोध

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बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखने वालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।

किंतु इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि उस लता ने अपनी घुमावदार चाल से न केवल बेंत की डालों को, उनके काँटों से बचते हुए, जकड़ रखा है, वरन उसके कंटक-रोमोंवाले पत्‍तों के एक-एक हरे फीते को समेट कर, कस कर, उनकी एक रस्‍सी-सी बना डाली है; और उस पूरी झाड़ी पर अपने फूल बिखराते-छिटकाते हुए, उन सौंदर्य-प्रतीकों को सूरज और चाँद के सामने कर दिया है।

लेकिन, इस खिड़की को मुझे अकसर बंद रखना पड़ता है। छत्‍तीसगढ़ के इस इलाके में, मौसम-बेमौसम आँधीनुमा हवाएँ चलती हैं। उन्होंने मेरी खिड़की के बंद पल्लों को ढीला कर डाला है। खिड़की बंद रखने का एक कारण यह भी है कि बाहर दीवार से लग कर खड़ी हुई हरी-घनी झाड़ियों के भीतर जो छिपे हुए, गहरे, हरे-साँवले अंतराल हैं, उनमें पक्षी रहते हैं और अंडे देते हैं। वहाँ से कभी-कभी उनकी आवाजें, रात-बिरात, एकाएक सुनाई देती हैं। वे तीव्र भय की रोमांचक चीत्‍कारें हैं क्योंकि वहाँ अपने शिकार की खोज में एक भुजंग आता रहता है। वह, शायद उन तरफ की तमाम झाड़ियों के भीतर रेंगता फिरता है।

एक रात, इसी खिड़की में से एक भुजंग मेरे कमरे में भी आया। वह लगभग तीन-फीट लंबा अजगर था। खूब खा-पी कर के,  सुस्‍त हो कर, वह खिड़की के पास, मेरी साइकिल पर लेटा हुआ था। उसका मुँह ‘कैरियर’ पर, जिस्म की लपेट में, छिपा हुआ था और पूँछ चमकदार ‘हैंडिल’ से लिपटी हुई थी। ‘कैरियर’ से ले कर ‘हैंडिल’ तक की सारी लंबाई को उसने अपने देह-वलयों से कस लिया था। उसकी वह काली-लंबी-चिकनी देह आतंक उत्पन्न करती थी।

हमने बड़ी मुश्किल से उसके मुँह को शिनाख्‍त किया। और फिर एकाएक ‘फिनाइल’ से उस पर हमला करके उसे बेहोश कर डाला। रोमांचपूर्ण थे हमारे वे व्‍याकुल आक्रमण! ग‍हरे भय की सनसनी में अपनी कायरता का बोध करते हुए, हम लोग, निर्दयतापूर्वक, उसकी छटपटाती दे‍ह को लाठियों से मारे जा रहे थे।

उसे मरा हुआ जान, हम उसका अग्नि-संस्‍कार करने गए। मिट्टी के तेल की पीली-गेरूई ऊँची लपक उठाते हुए, कंडों की आग में पड़ा हुआ वह ढीला नाग-शरीर, अपनी बची-खुची चेतना समेट कर, इतनी जोर-से ऊपर उछला कि घेरा डाल कर खड़े हुए हम लोग हैरत में आ कर, एक कदम पीछे हट गए। उसके बाद रात-भर, साँप की ही चर्चा होती रही।

इसी खिड़की से लगभग छह गज दूर, बेंत की झाड़ियों के उस पार, एक तालाब है… बड़ा भारी तालाब, आसमान का लंबा-चौड़ा आईना, जो थरथराते हुए मुस्‍कराता है। और उसकी थरथराहट पर किरनें नाचती रहती हैं।

मेरे कमरे में जो प्रकाश आता है, वह इन लहरों पर नाचती हुई किरनों का उछल कर आया हुआ प्रकाश है। खिड़की की लंबी दरारों में से गुजर कर वह प्रकाश, सामने की दीवार पर चौड़ी मुँडेर के नीचे सुंदर झलमलाती हुई आकृतियाँ बनाता है।

मेरी दृष्टि उस प्रकाश-कंप की ओर लगी हुई है। एक क्षण में उसकी अनगिनत लहरें नाचे जा रही हैं, नाचे जा रही हैं। कितना उद्दाम, कितना तीव्र वेग है उन झिलमिलाती लहरों में। मैं मुग्‍ध हूँ कि बाहर के लहराते तालाब ने किरनों की सहायता से अपने कंपों की प्रतिच्‍छवि मेरी दीवार पर आँक दी है।

काश, ऐसी भी कोई मशीन होती जो दूसरों के हृदयकंपनों को, उनकी मानसिक हलचलों को, मेरे मन के परदे पर चित्र रूप में उपस्थित कर सकती।

उदाहरणत: मेरे सामने इसी पलंग पर, वह जो नारी-मूर्ति बैठी है, उसके व्‍यक्तित्‍व के रहस्‍य को मैं जानना चाहता हूँ, वैसे, उसके बारे में जितनी गहरी जानकारी मुझे है, शायद और किसी को नहीं।

इस धुँधले अँधेरे कमरे में वह मुझे सुंदर दिखाई दे रही है। दीवार पर गिरे हुए प्रत्‍यावर्तित प्रकाश का पुन: प्रत्‍यावर्तित प्रकाश, नीली चूडियोंवाले हाथों में थमे हुए उपन्‍यास के पन्‍नों पर, ध्‍यानमग्‍न कपोलों पर और आसमानी आँचल पर फैला हुआ है। यद्यपि इस समय हम दोनों अलग-अलग दुनिया में (वह उपन्‍यास के जगत में और मैं अपने खयालों के रास्‍तों पर) घूम रहे हैं, फिर भी इस अकेले धुँधुले कमरे में गहन साहचर्य के संबंध-सूत्र तड़प रहे हैं और महसूस किए जा रहे हैं।

बावजूद इसके, यह कहना ही होगा कि मुझे इसमें ‘रोमांस’ नहीं दीखता। मेरे सिर का दाहिना हिस्‍सा सफेद हो चुका है। अब तो मैं केवल आश्रय का अभिलाषी हूँ, ऊष्‍मापूर्ण आश्रय का…

फिर भी मुझे शंका है। यौवन के मोह-स्‍वप्‍न उद्दाम आत्‍मविश्‍वास अब मुझमें नहीं हो सकता। एक वयस्‍क पुरुष का अविवाहिता वयस्‍का स्‍त्री से प्रेम भी अजीब होता है। उसमें उद्बुद्ध इच्‍छा के आग्रह के सा्थ-साथ जो अनुभवपूर्ण ज्ञान का प्रकाश होता है, वह पल-पल पर शंका और संदेह को उत्‍पन्‍न करता है।

श्‍यामला के बारे में मुझे शंका रहती है। वह ठोस बातों की बारीकियों का बड़ा आदर करती है। वह व्‍यवहार की कसौटी पर मनुष्‍य को परखती है। वह मुझे अखरता है। उसमें मुझे एक ठंडा पथरीलापन मालूम होता है। गीले-सपनीले रंगों का श्‍यामला में सचमुच अभाव है।

ठंडा पथरीलापन उचित है, या अनुचित, यह‍ मैं नहीं जानता। किंतु जब औचित्‍य के सारे प्रमाण, उनका सारा वस्‍तु-सत्‍य पॉलिशदार टीन-सा चमचमा उठता है, तो मुझे लगता है – बुरे फँसे इन फालतू की अच्‍छाइयों में, दूसरी तरफ मुझे अपने भीतर ही कोई गहरी कमी महसूस होती है और खटकने लगती है।

ऐसी स्थिति में मैं ‘हाँ’ और ‘ना’ के बीच में रह कर, खामोश, ‘जी हाँ’ की सूरत पैदा कर देता हूँ। डरता सिर्फ इस बात से हूँ कि कहीं यह ‘जी हाँ’ ‘जी हुजूर’ न बन जाए। मैं अतिशय शांति-प्रिय व्‍यक्ति हूँ। अपनी शांति भंग न हो, इसका बहुत खयाल रखता हूँ। न झगड़ा करना चाहता हूँ, न मैं किसी झगड़े में फँसना चाहता…

उपन्‍यास फेंक कर श्‍यामला ने दोनों हाथ ऊँचे करके जरा-सी अँगड़ाई ली। मैं उसकी रूप-मुद्रा पर फिर से मुग्‍ध होना ही चाहता था कि उसने एक बेतुका प्रस्‍ताव सामने रख दिया। कहने लगी, ‘चलो, बाहर घूमने चलें।’

मेरी आँखों के सामने बाहर की चिलचिलाती सफेदी और भयानक गरमी चमक उठी। खस के परदों के पीछे, छत के पंखों के नीचे, अलसाते लोग याद आए। भद्रता की कल्‍पना और सुविधा के भाव मुझे मना करने लगे। श्‍यामला के झक्‍कीपन का एक प्रमाण और मिला।

उसने मुझे एक क्षण आँखों से तौला और फैसले के ढंग से कहा, ‘खैर, मैं तो जाती हूँ। देख कर चली जाऊँगी… बता दूँगी।’

लेकिन चंद मिनटों बाद, मैंने अपने को चुपचाप उसके पीछे चलते हुए पाया। तब दिल में एक अजीब झोल महसूस हो रहा था। दिमाग के भीतर सिकुड़न-सी पड़ गई थी। पतलून भी ढीला-ढाला लग रहा था, कमीज के ‘कॉलर’ भी उल्‍टे-सीधे रहें होंगे। बाल अन-सँवरे थे ही। पैरों को किसी-न-किसी तरह आगे ढकेले जा रहा था।

लेकिन यह सिर्फ दुपहर के गरम तीरों के कारण था, या श्‍यामला के कारण, यह कहना मुश्किल है।

उसने पीछे मुड़ कर मेरी तरफ देखा और दिलासा देती हुई आवाज में कहा, ‘स्‍कूल का मैदान ज्‍यादा दूर नहीं है।’

वह मेरे आगे-आगे चल रही थी, लेकिन मेरा ध्‍यान उसके पैरों और तलुओं के पिछले हिस्‍से की तरफ ही था। उसकी टाँग, जो बिवाइयों-भरी और धूल-भरी थी, आगे बढ़ने में, उचकती हुई चप्‍पल पर चटचटाती थी। जाहिर था कि ये पैर धूल-भरी सड़कों पर घूमने के आदी हैं।

यह खयाल आते ही, उसी खयाल से लगे हुए न मालूम किन धागों से हो कर, मैं श्‍यामला से खुद को कुछ कम, कुछ हीन पाने लगा; और इसकी ग्‍लानि से उबरने के लिए, मैं उस चलती हुई आकृति के साथ, उसके बराबर हो लिया। वह कहने लगी, ‘याद है शाम को बैठक है। अभी चल कर न देखते तो कब देखते। और सबके सामने साबित हो जाता कि तुम खुद कुछ करते नहीं। सिर्फ जबान की कैंची चलती है।’

अब श्‍यामला को कौन बताए कि न मैं इस भरी दोपहर में स्‍कूल का मैदान देखने जाता और न शाम को बैठक में ही। संभव था कि ‘कोरम’ पूरा न होने के कारण बैठक ही स्‍थगित हो जाती। लेकिन श्‍यामला को यह कौन बताए कि हमारे आलस्‍य में भी एक छिपी हुई, जानी-अनजानी योजना रहती है। वर्तमान सुचालन का दायित्‍व जिन पर है, वे खुद संचालन-मंडल की बैठक नहीं होने देना चाहते। अगर श्‍यामला से कहूँ तो पूछेगी, ‘क्‍यों!’

फिर मैं जवाब दूँगा। मैं उसकी आँखों से गिरना नहीं चाहता, उसकी नजर में और-और चढ़ना चाहता हूँ। प्रेमी जो हूँ; अपने व्‍यक्तित्‍व का सुंदरतम चित्र उपस्थित करने की लालसा भी तो रहती है।

वैसे भी, धूप इतनी तेज थी कि बात करने या बात बढ़ाने की तबीयत नहीं हो रही थी।

मेरी आँखें सामने के पीपल के पेड़ की तरफ गईं, जिसकी एक डाल तालाब के ऊपर, बहुत ऊँचाई पर, दूर तक चली गई थी। उसके सिरे पर एक बड़ा-सा भूरा पक्षी बैठा हुआ था। उसे मैंने चील समझा। लगता था कि वह मछलियों के शिकार की ताक लगाए बैठा है।

लेकिन उसी शाखा की बिलकुल विरुद्ध दिशा में, जो दूसरी डालें ऊँची हो कर तिरछी और बाँकी-टेढ़ी हो गई हैं, उन पर झुंड के झुंड कौवे काँव-काँव कर रहे हैं, मानो वे चील की शिकायत कर रहे हों और उच‍क-उचक कर, फुदक-फुदक कर, मछली की ताक में बैठे उस पक्षी के विरुद्ध प्रचार किए जा रहे हों कि इतने में मुझे उस मैदानी-आसमानी चमकीले खुले-खुलेपन में एकाएक, सामने दिखाई देता है – साँवले नाटे कद पर भगवे रंग की खद्दर का बंडीनुमा कुरता, लगभग चौरस मोटा चेह‍रा, जिसके दाहिने गाल पर एक बड़ा-सा मसा है, और उस मसे में बारीक बाल निकले हुए।

जी धँस जाता है उस सूरत को देख कर। वह मेरा नेता है, संस्‍था का सर्वेसर्वा है। उसकी खयाली तस्‍वीर देखते ही मुझे अचानक दूसरे नेताओं की और सचिवालय के उस अँधेरे गलियारे की याद आती है, जहाँ मैंने इस नाटे-मोटे भगवे खद्दर-कुरतेवाले को पहले-पहले देखा था।

उन अँधेरे गलियारों में से मैं कई-कई बार गुजरा हुँ और वहाँ किसी मोड़ पर किसी कोने में इकट्ठा हुए, ऐसी ही संस्‍थाओं के संचालकों के उतरे हुए चेहरों को देखा है। बावजूद श्रेष्‍ठ पोशाक और ‘अपटूडेट’ भेस के सँवलाया हुआ गर्व, बेबस गंभीरता, अधीर उदासी और थकान उनके व्‍यक्तित्‍व पर राख-सी मलती है। क्‍यों?

इसलिए कि माली साल की आखिरी तारीख को अब सिर्फ दो या तीन दिन बचे हैं। सरकारी ‘ग्रांट’ अभी मंजूर नहीं हो पा रही है, कागजात अभी वित्‍त-विभाग में ही अटके पड़े हैं। आफिसों के बाहर, गलियारे के दूर किसी कोने में, पेशाबघर के पास, या होटलों के कोनों में क्‍लर्कों की मुट्ठियाँ गरम की जा रहीं हैं, ताकि ‘ग्रांट’ मंजूर हो और जल्‍दी मिल जाए।

ऐसी ही किसी जगह पर मैंने इस भगवे-खद्दर कुरतेवाले को जोर-जोर से अंगरेजी बोलते हुए देखा था। और, तभी मैंने उसके तेज मिजाज और फितरती दिमाग का अंदाजा लगाया था।

इधर, भरी दोपहर में श्‍यामला का पार्श्‍व-संगीत चल ही रहा है, मैं उसका कोई मतलब नहीं निकाल पाता। लेकिन न मालूम कैसे, मेरा मन उसकी बातों से कुछ संकेत ग्रहण कर, अपने ही रास्‍ते पर चलता रहता है। इसी बीच उसके एक वाक्‍य से मैं चौंक पड़ा, ‘इससे अच्‍छा है कि तुम इस्‍तीफा दे दो। अगर काम नहीं कर सकते तो गद्दी क्‍यों अड़ा रखी है।’

इसी बात को कई बार मैंने अपने से भी पूछा था। लेकिन आज उसके मुँह से ठीक उसी बात को सुन कर मुझे धक्‍का-सा लगा। और मेरा मन कहाँ का कहाँ चला गया।

एक दिन की बात! मेरा सजा हुआ कमरा! चाय की चुस्कियाँ! कहकहे! एक पीले रंग के तिकोने चेहरेवाला मसखरा, ऊलजलूल शख्‍स! बगैर यह सोचे कि जिसकी वह निंदा कर रहा है, वह मेरा कृपालु मित्र और सहायक है, वह शख्‍स बात बढ़ाता जा रहा है।

मैं स्‍तब्‍ध! किंतु, कान सुन रहे हैं। हारे हुए आदमी-जैसी मेरी सूरत, और मैं!

वह कहता जा रहा है, ‘सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र? सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र कहाँ हैं?’

‘हैं तो। ये हैं। देखिए।’ क्‍लर्क कह‍ता है। रजिस्‍टर बताता है। सब कहते हैं-हैं, हैं। ये हैं। लेकिन, कहाँ हैं? यह तो सब लिखित रूप में हैं, वस्‍तु-रूप में कहाँ हैं।

वे ख‍रीदे ही नहीं गए! झूठी रसीद लिखने का कमीशन विक्रेता को, शेष रकम जेब में। सरकार से पूरी रकम वसूल!

किसी खास जाँच के एन मौके पर‍ किसी दूसरे श‍हर की…संस्‍था से उधार ले कर, सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र हाजिर! सब चीजें मौजूद हैं। आइए, देख जाइए। जी हाँ, ये तो हैं सामने। लेकिन जांच खत्‍म होने पर सब गायब, सब अंतर्धान। कैसा जादू है। खर्चे का आँकडा खूब फुला कर रखिए। सरकार के पास कागजात भेज दीजिए। खास मौकों पर ऑफिसों के धुँधले गलियारों और होटलों के कोनों में मुट्ठियाँ गरम कीजिए। सरकारी ‘ग्रांट’ मंजूर! और उसका न जाने कितना हिस्‍सा, बड़े ही तरीके से, संचालकों की जेब में! जी!’

भरी दोपह‍र में मैं आगे बढ़ा जा रहा हूँ। कानों में ये आवाजों गूँजती जा रही हैं। मैं व्‍याकुल हो उठता हूँ। श्‍यामला का पार्श्‍व-संगीत चल रहा है। मुझे जबरदस्‍त प्‍यास लगती है! पानी, पानी!

-कि इतने में एकाकए विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय की ऊँचे रोमन स्तंभोंवाली इमारत सामने आ जाती है। तीसरा पहर! हलकी धूप! इमारत की पत्‍थर-सीढ़ियाँ, लंबी, मोतिया!

सीढ़ियों से लग कर, अभरक-मिली लाल मिट्टी के चमचमाते रास्‍ते पर सुंदर काली ‘शेवरलेट’।

भगवे खद्दर-कुरते वाले की ‘शेवरलेट’, जिसके जरा पीछे मैं खड़ा हूँ, और देख रहा हूँ – यों ही, कार का नंबर – कि इतने में उसके चिकने काले हिस्‍से में, जो आईने-सा चमकदार है, सूरत दिखाई देती है।

भयानक है वह सूरत! सारे अनुपात बिगड़ गए हैं। नाक डेढ़ गज लंबी और कितनी मोटी हो गई है। चेहरा बेहद लंबा और सिकुड़ गया है। आँखें खड्डेदार। कान नदारद। भूत-जैसा अप्राकृतिक रूप। मैं अपने चेहरे की उस विद्रूपता को, मुग्‍धभाव से, कुतूहल से और आश्‍चर्य से देख रहा हूँ, एकटक।

कि इतने में मैं दो कदम एक ओर हट जाता हूँ; और पाता हूँ कि मोटर के उस काले चमकदार आईने में मेरे गाल, ठुड्डी, नाम, कान सब चौड़े हो गए हैं, एकदम चौड़े। लंबाई लगभग नदारद। मैं देखता ही रहता हूँ, देखता ही रहता हूँ कि इतने में दिल के किसी कोने में कई अँधियारी गटर एकदम फूट निकलती है। वह गटर है आत्‍मालोचन, दु:ख और ग्‍लानि की।

और, सहसा मुँह से हाय निकल पड़ती है। उस भगवे खद्दर-कुरते वाले से मेरा छुटकारा कब होगा, कब होगा।

और, तब लगता है कि इस सारे जाल में, बुराई की इस अनेक चक्रोंवाली दैत्‍याकार मशीन में, न जाने कब से मैं फँसा पड़ा हूँ। पैर भिंच गए हैं, पसलियाँ चूर हो गई हैं, चीख निकल नहीं पाती, आवाज हलक में फँस कर रह गई है।

कि इसी बीच अचानक एक नजारा दिखाई देता है। रोमन स्तंभोंवाली विश्‍वविद्यालय के पुस्‍तकालय की ऊँची, लंबी, मोतिया सीढ़ियों पर से उतर रही है एक आत्‍म-विश्‍वासपूर्ण गौरवमय नारीमूर्ति।

वह किरणीली मुस्‍कान मेरी ओर फेंकती-सी दिखाई देती है। मैं इस स्थिति में नहीं हूँ कि उसका स्‍वागत कर सकूँ। मैं बदहवास हो उठता हूँ।

वह धीमे-धीमे मेरे पास आती है। अभ्‍यर्थनापूर्ण मुस्‍काराहट के साथ कहती है, ‘पढ़ी है आपने यह पुस्‍तक।’

काली जिल्‍द पर सुनहले रोमन अक्षरों में लिखा है, ‘आई विल नाट रेस्‍ट।’

मैं साफ झूठ बोल जाता हूँ, ‘हाँ पढ़ी है, बहुत पहले।’

लेकिन मुझे महसूस होता है कि मेरे चेहरे पर से तेलिया पसीना निकल रहा है। मैं बार-बार अपना मुँह पोंछता हूँ रूमाल से। बालों के नीचे ललाट-हाँ, ललाट, (यह शब्‍द मुझे अच्‍छा लगता है) को रगड़ कर साफ करता हूँ।

और, फिर दूर एक पेड़ के नीचे, इधर आते हुए, भगवे खद्दर-कुरतेवाले की आकृति को देख कर श्‍यामला से कहता हूँ, ‘अच्‍छा, मै जरा उधर जा रहा हूँ। फिर भेंट होगी।’ और सभ्‍यता के तकाजे से मैं उसके लिए नमस्‍कार के रूप में मुस्‍कराने की चेष्‍टा करता हूँ।

पेड़।

अजीब पेड़ है, (यहाँ रूका जा सकता है), बहुत पुराना पेड़ है, जिसकी जड़ें उखड़ कर बीच में से टूट गई हैं और साबित है, उनके आस-पास की मिट्टी खिसक गई है। इसलिए वे उभर कर ऐंठी हुई-सी लगती हैं। पेड़ क्‍या है, लगभग ठूँठ है। उसकी शाखाएँ काट डाली गई हैं।

लेकिन, कटी हुई बाँहोंवाले उस पेड़ में से नई डालें निकल कर हवा में खेल रही हैं! उन डालों में कोमल-कोमल हरी-हरी पत्तियाँ झालर-सी दिखाई देती हैं। पेड़ के मोटे तने में से जगह-जगह ताजा गोंद निकल रहा है। गोंद की साँवली कत्‍थई गठानें मजे में देखी जा सकती हैं।

अजीब पेड़ है, अजीब! (शायद, यह अच्‍छाई का पेड़ है) इसलिए कि एक दिन शाम की मोतिया-गुलाबी आभा में मैंने एक युवक‍-युवती को इस पेड़ के तले ऊँची उठी हुई, उभरी हुई, जड़ पर आराम से बैठे हुए पाया था। संभवत: वे अपने अत्यंत आत्‍मीय क्षणों में डूबे हुए थे।

मुझे देख कर युवक ने आदरपूर्वक नमस्‍कार किया। लड़की ने भी मुझे देखा और झेंप गई। हलके झटके से उसने अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। लेकिन उसकी झेंपती हुई ललाई मेरी नजरों से न बच सकी।

इस प्रेम-मुग्‍ध को देख कर मैं भी एक विचित्र आनंद में डूब गया। उन्‍‍हें निरापद करने के लिए जल्‍दी-जल्‍दी पैर बढाता हुआ मैं वहाँ से नौ-दो ग्‍यारह हो गया।

यह पिछली गर्मियों की मनोहर साँझ की बात है। लेकिन आज इस भरी दोपहरी में श्‍यामला के साथ पल-भर उस पेड़ के तले बैठने को मेरी भी तबीयत हुई। बहुत ही छोटी और भोली इच्‍छा है यह।

लेकिन मुझे लगा कि शायद श्‍यामला मेरे सुझाव को नहीं मानेगी। स्‍कूल-मैदान पहुँचने की उसे जल्‍दी जो है। कहने की मेरी हिम्‍मत ही नहीं हुई।

लेकिन दूसरे क्षण, आप-ही-आप, मेरे पैर उस ओर बढ़ने लगे। और ठीक उसी जगह मैं भी जा कर बैठ गया, जहाँ एक साल पहले वह युग्‍म बैठा था। देखता क्‍या हूँ कि श्‍यामला भी आ कर बैठ गई है।

तब वह कह रही थी, ‘सचमुच बड़ी गरम दोपहर है।’

सामने मैदान-ही-मैदान हैं, भूरे मटमैले! उन पर सिरस और सीसम के छायादार विराम-चिह्र खड़े हैं। मैं लुब्‍ध और मुग्‍ध हो कर उनकी घनी-गहरी छायाएँ देखता रहता हूँ…

क्‍योंकि… क्‍योंकि मेरा यह पेड़, य‍ह अच्‍छाई का पेड़ छाया प्रदान नहीं कर सकता, आश्रय प्रदान नहीं कर सकता, (क्‍योंकि वह जगह-जगह काटा गया है) वह तो कटी शाखाओं की दूरियों और अंतरालों में से केवल तीव्र और कष्‍टप्रद प्रकाश को ही मार्ग दे सकता है।

लेकिन मैदानों के इस चिलचिलाते अपार विस्‍तार में एक पेड़ के नीचे, अकेलेपन में, श्‍यामला के साथ रहने की यह जो मेरी स्थिति है, उसका अचानक मुझे गहरा बोध हुआ। लगा कि श्‍यामला मेरी है, और वह भी इसी भाँति चिलमिलाते गरम तत्‍वों से बनी हुई नारी-मूर्ति है। गरम बफती हुई मिट्टी-सा चिलमिलाता हुआ उसमें अपनापन है।

तो क्‍या आज ही, अगली अनगिनत गरम दोपहरियों के पहले आज ही, अगले कदम उठाए जाने के पहले, इसी समय, हाँ, इसी समय, उसके सामने अपने दिन की गहरी छिपी हुई तहें और सतहें खोल कर रख दूँ… कि जिससे आगे चल कर उसे गलतफहमी में रखने, उसे धोखे में रखने का अपराधी न बनूँ।

कि इतने में मेरी आँखों के सामने, फिर उसी भगवे खद्दर-कुरतेवाले की तस्‍वीर चमक उठी। मैं व्‍याकुल हो गया और उससे छुटकारा चाहने लगा।

तो फिर आत्‍म-स्‍वीकार कैसे करूँ, कहाँ से शुरू करूँ!

लेकिन क्‍या वह मेरी बातें समझ सकेगी? किसी तनी हुई रस्‍सी पर वजन साधते हुए चलने का, ‘हाँ’, और ‘ना’ के बीच में रह कर जिंदगी की उलझनों में फँसने का तजुर्बा उसे कहाँ है!

हटाओ, कौन कहे।

लेकिन यह स्‍त्री शिक्षिता तो है! बहस भी तो करती है! बहस कर बातों का संबंध न उसके स्‍वार्थ से होता है, न मेरे। उस समय हम लड़ भी तो सकते हैं। और ऐसी लड़ाइयों में कोई स्‍वार्थ भी तो नहीं होता। सामने अपने दिल की सतहें खोल देने में न मुझे शर्म रही, न मेरे सामने उसे। लेकिन वैसा करने में तकलीफ तो होती ही है, अजीब और पेचीदा, घूमती-घुमाती तकलीफ!

और उस तकलीफ को टालने के लिए हम झूठ भी तो बोल देते हैं, सरासर झूठ, सफेद झूठ! लेकिन झूठ से सचाई और गहरी हो जाती है, अधिक महत्‍वपूर्ण और अधिक प्राणवान, मानो वह हमारे लिए और सारी मनुष्‍यता के लिए विशेष सार रखती हो। ऐसी सतह पर हम भावुक हो जाते हैं। और, यह सतह अपने सारे निजीपन में बिलकुल बेनिजी है। साथ ही, मीठी भी! हाँ, उस स्‍तर की अपनी विचित्र पीड़ाएँ हैं, भयानक संताप है, और इस अत्यंत आत्‍मीय किंतु निर्वैयक्तिक स्‍तर पर हम एक हो जाते हैं, और कभी-कभी ठीक उसी स्‍तर पर बुरी तरह लड़ भी पड़ते हैं।

श्‍यामला ने कहा, ‘उस मैदान को समतल करने में कितना खर्च आएगा?’

‘बारह हजार।’

‘उनका अंदाज क्‍या है?’

‘बीस हजार ।’

‘तो बैठक में जा कर समझा दोगे और यह बता दोगे कि कुल मिला कर बारह हजार से ज्‍यादा नामुमकिन है?’

‘हाँ, उतना मैं कर दूँगा।’

‘उतना का क्‍या मतलब?’

अब मैं उसे ‘उतना’ का क्‍या मतलब बताऊँ! साफ है कि उस भगवे खद्दर- कुरतेवाले से मैं दुश्‍मनी मोल नहीं लेना चाहता। मैं उसके प्रति वफादार रहूँगा क्‍योंकि मैं उसका आदमी हूँ। भले ही वह बुरा हो, भ्रष्‍टाचारी हो, किंतु उसी के कारण ही मैं विश्‍वास-योग्‍य माना गया हूँ। इसीलिए, मैं कई महत्‍वपूर्ण कमेटियों का सदस्‍य हूँ।

मैंने विरोध-भाव से श्‍यामला की तरफ देखा। वह मेरा रुख देख कर समझ गई। वह कुछ नहीं बोली। लेकिन मानो मैंने उसकी आवाज सुन ली हो।

श्‍यामला का चेहरा ‘चार जनियों-जैसा’ है। उस पर साँवली मोहक दीप्ति का आकर्षण है। किंतु उसकी आवाज… हाँ… आवाज… वह इतनी सुरीली और मीठी है कि उसे अनसुना करना निहायत मुश्किल है। उस स्‍वर को सुन कर दुनिया की अच्‍छी बातें ही याद आ स‍‍कती हैं।

पता नहीं किस तरह की परेशान पेचीदगी मेरे चेहरे पर झलक उठी कि जिसे देख कर उसने कहा, ‘‍कहो, क्‍या कहना चाहते हो।’

यह वाक्‍य मेरे लिए निर्णाय‍क बन गया। फिर भी अवरोध शेष था। अपने जीवन का सार-सत्‍य अपना गुप्‍त-धन है। उसके गुप्‍त संधर्ष हैं, उसका अपना एक गुप्‍त नाटक है। वह प्रकट करते नहीं बनता। फिर भी, शायद है कि उसे प्रकट कर देने ये उसका मूल्‍य बढ़ जाए, उसका कोई विशेष उपयोग हो सके।

एक था पक्षी। वह नीले आसमान में खूब ऊँचाई पर उड़ता जा रहा था। उसके साथ उसके पिता और मित्र भी थे।

(श्‍यामला मेरे चेहरे की तरफ आश्‍चर्य से देखते लगी)

सब बहुत ऊँचाई पर उड़नेवाले पक्षी थे। उनकी निगाहें भी बड़ी तेज थीं। उन्‍हें दूर दूर की भनक और दूर-दूर की महक भी मिल जाती।

एक दिन वह नौजवान पक्षी जमीन पर चलती हुई एक बैलगाड़ी को देख लेता है। उसमें बड़े-बड़े बोरे भरे हुए हैं। गाड़ीवाला चिल्‍ला-चिल्‍ला कर कहता है, ‘दो दीमकें लो, एक पंख दो।’

उस नौजवान पक्षी को दीमकों का शौक था। वैसे तो ऊँचे उड़नेवाले पक्षियों को हवा में ही बहुत-से कीड़े तैरते हुए मिल जाते, जिन्‍हें खा कर वे अपनी भूख थोड़ी-बहुत शांत कर लेते।

लेकिन दीमकें सिर्फ जमीन पर मिलती थीं। कभी-कभी पेड़ों पर-जमीन से तने पर चढ़ कर, ऊँची डाल तक, वे अपना मटियाला लंबा घर बना लेतीं। लेकिन वैसे कुछ ही पेड़ होते, और वे सब एक जगह न मिलते।

नौजवान पक्षी को लगा – यह बहुत बड़ी सुविधा है कि एक आदमी दीमकों को बोरों में भर कर बेच रहा है।

वह अपनी ऊँचाइयाँ छोड़ कर मँडराता हुआ नीचे उतरता है और पेड़ की एक डाल पर बैठ जाता है।

दोनों का सौदा तय हो जाता है। अपनी चोंच से एक पर को खींच कर तोड़ने में उसे तकलीफ भी होती है; लेकिन उसे वह बरदाश्‍त कर लेता है। मुँह में बड़े स्‍वाद के साथ दो दीमकें दबा कर वह पक्षी फुर्र से उड़ जाता है।

(कहते-कहते मैं थक गया शायद साँस लेने के लिए। श्‍यामला ने पलकें झपकाईं और कहा, ‘हूँ’)

अब उस पक्षी को गाड़ीवाले से दीमकें खरीदने और एक पर देने में बड़ी आसानी मालूम हुई। वह रोज तीसरे पहर नीचे उतरता और गा‍ड़ीवाले को एक पंख दे कर दो दीमकें खरीद लेता।

कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। ए‍क दिन उसके पिता ने देख लिया। उसने समझाने को कोशिश की कि बेटे, दीमकें हमारा स्‍वाभाविक आहार नहीं हैं, और उसके लिए अपने पंख तो हरगिज नहीं दिए जा सकते।

लेकिन, उस नौजवान पक्षी ने बड़े ही गर्व से अपना मुँह दूसरी ओर कर लिया। उसे जमीन पर उतर कर दीमकें खाने की चट लग गई थी। अब उसे न तो दूसरे कीड़े अच्‍छे लगते, न फल, न अनाज के दाने। दीमकों का शौक अब उस पर हावी हो गया था।

(श्‍यामला अपनी फैली हुई आँखों से मुझे देख रही थी, उसकी ऊपर उठी हुई पलकें और भौंएँ बड़ी ही सुंदर दिखाई दे रही थीं।)

लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता। उसके पंखों की संख्‍या लगातार घटती चली गई। अब वह, ऊँचाइयों पर, अपना संतुलन साध नहीं सकता था, न बहुत समय तक पंख उसे सहारा दे सकते थे। आकाश-यात्रा के दौरान उसे जल्‍दी-जल्‍दी पहाड़ी चट्टानों गुंबदों और बुर्जो पर हाँफते हुए बैठ जाना पड़ता। उसके परिवार वाले तथा मित्र ऊँचाइयों पर तैरते हुए आगे बढ़ जाते। वह बहुत पिछड़ जाता। फिर भी दीमक खाने का उसका शौक कम नहीं हुआ। दीमकों के लिए गा‍ड़ीवाले को वह अपने पंख तोड़-तोड़ कर देता रहा।

(श्‍यामला गंभीर हो कर सुन रही थी। अबकी बार उसने ‘हूँ’ भी नहीं कहा।)

फिर उसने सोचा कि आसमान में उड़ना ही फिजूल है। वह मूर्खों का काम है। उसकी हालत यह थी कि अब वह आसमान में उड़ ही नहीं सकता था, वह सिर्फ एक पेड़ से उड़ कर दूसरे पेड़ तक पहुँच पाता। धीरे-धीरे उसकी यह शक्ति भी कम होती गई। और एक समय वह आया जब वह बड़ी मुश्किल से, पेड़ की एक डाल से लगी हुई दूसरी डाल पर, चल कर, फुदक कर पहुँचता। लेकिन दीमक खाने का शौक नहीं छूटा।

बीच-बीच में गाड़ीवाला बुत्‍ता दे जाता। वह कहीं नजर में न आता। पक्षी उसके इंतजार में घुलता रहता।

लेकिन दीमकों का शौक जो उसे था। उसने सोचा, ‘मैं खुद दीमकें ढूँढ़ँगा।’ इसलिए वह पेड़ पर से उतर कर जमीन पर आ गया; और घास के एक लहराते गुच्‍छे में सिमट कर बैठ गया।

(श्‍यामला मेरी ओर देखे जा रही थी। उसने अपेक्षापूर्वक कहा ‘हूँ।’)

फिर एक दिन उस पक्षी के जी में न मालूम क्‍या आया। वह खूब मेहनत से जमीन में से दीमकें चुन-चुन कर, खाने के बजाय उन्‍हें इकट्टा करने लगा। अब उसके पास दीमकों के ढेर के ढेर हो गए।

फिर एक दिन एकाएक वह गाड़ीवाला दिखाई दिया। पक्षी को बड़ी खुशी हुई। उसने पुकार कर कहा, ‘गाड़ीवाले, ओ गाड़ीवाले! मैं कब से तुम्‍हारा इंतजार कर रहा था।’

पहचानी आवाज सुन कर गाड़ीवाला रुक गया। तब पक्षी ने कहा, ‘देखो, मैंने कितनी सारी दीमकें जमा कर ली है।’

गाड़ीवाले को पक्षी की बात समझ में नहीं आई। उसने सिर्फ इतना कहा, ‘तो मैं क्‍या करूँ।’

‘ये मेरी दीमकें ले लो, और मेरे पंख मुझे वापस कर दो।’ पक्षी ने जवाब दिया।

गाड़ीवाला ठठा कर हँस पड़ा। उसने कहा, ‘बेवकूफ, मैं दीमक के बदले पंख लेता हूँ, पंख के बदले दीमक नहीं।

गाड़ीवाले ने ‘पंख’ शब्‍द पर जोर दिया था।

(श्‍यामला ध्‍यान से सुन रही थी। उसने कहा, ‘फिर’)

गाड़ीवाला चला गया। पक्षी छटपटा कर रह गया। एक दिन एक काली बिल्‍ली आई और अपने मुँह में उसे दबा कर चली गई। तब उस पक्षी का खून टपक-टपक कर जमीन पर बूँदों की लकीर बना रहा था।

(श्‍यामला ध्‍यान से मुझे देखे जा रही थी; और उसकी एकटक निगाहों से बचने के लिए मेरी आँखें तालाब की सिहरती-काँपती, चिलकती-चमचमाती लहरों पर टिकी हुई थीं)

कहानी कह चुकने के बाद, मुझे एक जबरदस्‍त झट‍का लगा। एक भयानक प्रतिक्रिया – कोलतार-जैसी काली, गंधक-जैसी पीली-नारंगी!

‘नहीं, मुझमें अभी बहुत कुछ शेष है, बहुत कुछ। मैं उस पक्षी-जैसा नहीं मरूँगा। मैं अभी भी उबर सकता हूँ। रोग अभी असाध्‍य नहीं हुआ है। ठाठ से रहने के चक्‍कर से बँधे हुए बुराई के चक्‍कर तोड़े जा सकते हैं। प्राण‍शक्ति शेष है, शेष ।’

तुरंत ही लगा कि श्‍यामला के सामने फिजूल अपना रहस्‍य खोल दिया, व्‍यर्थ ही आत्‍म-स्‍वीकार कर डाला। कोई भी व्‍यक्ति इतना परम प्रिय नहीं हो सकता कि भीतर का नंगा। बालदार, रीछ उसे बताया जाए। मैं असीम दु:ख के खारे मृत सागर में डूब गया।

श्‍यामला अपनी जगह से धीरे से उठी, साड़ी का पल्‍ला ठीक किया, उसकी सलवटें बरा‍बर जमाईं, बालों पर से हाथ फेरा। और फिर (अंगरेजी में) कहा, ‘सुंदर कथा है, बहुत सुंदर!’

फिर वह क्षण-भर खोई-सी खड़ी रही, और फिर बोली, ‘तुमने कहाँ पढ़ी?’

मैं अपने ही शून्‍य में खोया हुआ था। उसी शून्‍य के बीच में से मैंने कहा, ‘पता नहीं… किसी ने सुनाई या मैंने कहीं पढ़ी।’

और वह श्‍यामला अचानक मेरे सामने आ गई, कुछ कहना चाहने लगी, मानो उस कहानी में उसकी किसी बात की ताईद होती हो।

उसके चेहरे पर धूप पड़ी हुई थी। मुखमंडल सुंदर और प्रदीप्‍त दिखाई दे रहा था।

कि इसी बीच हमारी आँखें सामने के रास्‍ते पर जम गईं।

घुटनों तक मैली धोती और काली, सफेद या लाल बंडी पहने कुछ देहाती भाई, समूह में चले आ रहे थे। एक के हाथ में एक बड़ा-सा डंडा था, जिसे वह अपने आगे, सामने किए हुए था। उस डंडे पर एक लंबा मरा हुआ साँप झूल रहा था। कला भुजंग, जिसके पेट की हलकी सफेदी भी झलक रही थी।

श्‍यामला ने देखते ही पूछा, ‘कौन-सा साँप है यह?’ वह ग्रामीण मुख छत्‍तीसगढ़ी लहजे में चिल्‍लाया, ‘करेट है बाई, करेट ।’

श्‍यामला के मुँह से निकल पडा, ‘ओफ्फो! करेट तो बड़ा जहरीला साँप होता है।’

फिर मेरी ओर देख कर कहा, ‘नाग की तो दवा भी निकली है, करेट की तो कोई दवा नहीं है। अच्‍छा किया, मार डाला। जहाँ साँप देखो, मार डालो, फिर वह पनियल साँप ही क्‍यों न हो ।’

और फिर न जाने क्‍यों, मेरे मन में उसका यह वाक्‍य गूँज उठा, ‘जहाँ साँप देखो, मार डालो।’

और ये शब्‍द मेरे मन में गूँजते ही चले गए।

कि इसी बीच… रजिस्‍टर में चढ़े हुए आँकड़ों की एक लंबी मीजान मेरे सामने झूल उठी और गलियारे के अँधेरे कोनों में गरम होनेवाली मुट्ठियों का चोर हाथ ।

श्‍यामला ने पलट कर कहा, ‘तुम्‍हारे कमरे में भी तो साँप घुस आया था, कहाँ से आया था वह?’

फिर उसने खुद ही जबाब दे लिया, ‘हाँ, वह पास की खिड़की में से आया होगा।’

खिड़की की बात सुनते ही मेरे सामने, बाहर की काँटेदार झाड़ियाँ, बेंत की झाड़ियाँ आ गईं, जिसे जंगली बेल ने लपेट रखा था । मेरे खुद के तीखे काँटों के बावजूद, क्‍या श्‍यामला मुझे इसी तरह लपेट सकेगी। बड़ा ही ‘रोमांटिक’ खयाल है, लेकिन कितना भयानक।

… क्‍योंकि श्‍यामला के साथ अगर मुझे जिंदगी बसर करनी है तो न मालूम कितने ही भगवे खद्दर कुरतेवालों से मुझे लड़ना पड़ेगा, जी कड़ा करके लड़ाइयाँ मोल लेनी पड़ेगी और अपनी आमदनी के जरिए खत्‍म कर देने होंगे। श्‍यामला का क्‍या है! वह तो एक गाँधीवादी कार्यकर्ता की लड़की है, आदिवासियों की उस कुल्‍हाड़ी-जैसी है जो जंगल में अपने बेईमान और बेवफा साथी का सिर धड़ से अलग कर देती है। बारीक बेईमानियों का सूफियाना अंदाज उसमें कहाँ!

किंतु फिर भी आदिवासियों जैसे उस अमिश्रित आदर्शवाद में मुझे आत्‍मा का गौरव दिखाई देता है, मनुष्‍य की महिमा दिखाई देती है, पैने तर्क की अपनी अंतिम प्रभावोत्‍पादक परिणति का उल्‍लास दिखाई देता है – और ये सब बाते मेरे हृदय का स्‍पर्श कर जाती हैं। तो, अब मैं इसके लिए क्‍या करूँ, क्‍या करूँ!

और अब मुझे सज्‍जायुक्‍त भद्रता के मनोहर वातावरण वाला अपना कमरा याद आता है… अपना अकेला धुँधला-धुँधला कमरा। उसके एकांत में प्रत्‍यावर्तित और पुन: प्रत्‍यावर्तित प्रकाश कोमल वातावरण में मूल-रश्मियाँ और उनके उद्गम स्‍त्रोतों पर सोचते रहना, खयालों की लहरों में बहते रहना कितना सरल, सुंदर और भद्रतापूर्ण है। उससे न कभी गरमी लगती है, न पसीना आता है, न कभी कपड़े मैले होते हैं। किंतु प्रकाश के उद्गम के सामने रहना, उसका सामना करना, उसकी चिलचिला‍ती दोपहर में रास्‍ता नापते रहना और धूल फाँकते रहना कितना त्रास-दायक है। पसीने से तरबतर कपड़े इस तरह चिपचिपाते हैं और इस कदर गंदे मालूम होते हैं कि लगता है… कि अगर कोई इस हालत में हमें देख ले तो वह बेशक हमें निचले दर्जे का आदमी समझेगा। सजे हुए टेबल पर रखे कीमत फाउंटेनपेन-जैसे नीरव-शब्‍दांकन-वादी हमारे व्‍यक्तित्‍व जो बहुत बड़े ही खुशनुमा मालूम होते हैं – किन्‍हीं महत्‍वपूर्ण परिवर्तनों के कारण – जब वे आँगन में और घर-बाहर चलती हुई झाड़ू जैसे काम करनेवाले दिखाई दें, तो इस हालत में यदि सड़क-छाप समझे जाएँ तो इसमें आश्‍चर्य की ही क्‍या बात है!

लेकिन मैं अब ऐसे कामों की शर्म नहीं करूँगा, क्‍योंकि जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

[साभार – मुक्तिबोध रचनावली]

 

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की दो कविताएं

1

sarveshwardayalsaxena

नए साल की शुभकामनाएं !

नये साल की शुभकामनाएँ!
खेतों की भेड़ों पर धूल-भरे पाँव को,
कुहरे में लिपटे उस छोटे-से गाँव को,
नए साल की शुभकामनाएँ!

जाते के गीतों को, बैलों की चाल को,
करघे को, कोल्हू को, मछुओं के जाल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को, बच्चों के शोर को,
चौंके की गुनगुन को, चूल्हे की भोर को,
नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को, तारों को, रात को,
ठण्डी दो बन्दूकों में घर की बात को,
नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को,
सिगरेट की लाशों पर फूलों-से ख्याल को,
नए साल की शुभकामनाएँ!

कोट के गुलाब और जूड़े के फूल को,
हर नन्ही याद को, हर छोटी भूल को,
नये साल की शुभकामनाएँ!

उनको जिनने चुन-चुनकर ग्रीटिंग कार्ड लिखे,
उनको जो अपने गमले में चुपचाप दिखे,
नये साल की शुभकामनाएँ!

 

देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता

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यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो?
यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?
यदि हाँ
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है।

देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां, पर्वत, शहर, गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है।

इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।

जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है।

याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन।

ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो-
तुम्हें यहां सांस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।

आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार।

 

 

 

सेरेना बनेगी दुल्हन, रेडिट के सह संस्थापक से की सगाई

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वाशिंगटन : दुनिया की चोटी की टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स जल्द ही दुल्हन बन सकती है। उन्होंने रेडिट के सह संस्थापक अलेक्सिस ओहानियन के साथ सगाई कर ली है। रेडिट के अपने सत्यापित अकाउंट में सेरेना ने कविता के जरिये अपनी सगाई की खबर दी है। पैंतीस वर्षीय सेरेना और 33 वर्षीय ओहानियन ने हालांकि शादी की तिथि घोषित नहीं की है। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टेनिस खिलाड़ियों में से एक सेरेना ने अपनी कवितामयी रोमांटिक पोस्ट में बताया है कि किस तरह से ओहानियन ने घुटने के बल बैठकर उनके सामने शादी की पेशकश की। ओहोनियन ने भी अपने अकाउंट से उसका जवाब दिया, ‘‘ और तुमने मुझे इस धरती का सबसे खुश पुरूष बना दिया।’’ इसके बाद सेरेना को बधाई भी मिलने लगी और इसमें डब्ल्यूटीए टूर सबसे आगे रहा। डब्ल्यूटीए टूर ने ट्विटर पर सेरेना और ओहानियन की फोटो डालकर बधाई दी है। सेरेना अब भी टेनिस में सक्रिय हैं। उन्होंने अपने करियर में अभी तक 71 एकल खिताब जीते हैं। उन्होंने इस साल विंबलडन जीतकर स्टेफी ग्राफ के ओपन युग के 22 ग्रैंडस्लैम एकल खिताब की बराबरी की थी।

 

साहित्य अकादमी के पास पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है :राव

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नयी दिल्ली : देश में कथित असहिष्णुता को लेकर साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने वालों के पुरस्कार और उनके चेक अकादमी के पास जस के तस ही पड़े हैं क्योंकि उनके पास पुरस्कार वापस लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवास राव ने ‘भाषा’ से कहा कि 2015 में जो कुछ हुआ वह अकादमी के 60 साल के इतिहास में पहली बार हुआ था।
उन्होंने कहा कि कई साहित्यकारों ने अपना पुरस्कार वापस किया लेकिन सबके चेक या पुरस्कार हमारे पास नहीं आए। कई लोगों ने सिर्फ मीडिया में ऐलान कर दिया।
उन्होंने कहा ‘‘जिन्होंने अपने चेक और पुरस्कार हमें वापस किए हैं उन्हें भी हमने स्वीकार नहीं किया क्योंकि हमारे पास ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पुरस्कार वापस लिया जाए। उनके चेक हमारे पास पड़े हैं और हमने उन्हें बैंक में नहीं डाला है।
जब उनसे पूछा गया कि किसी साहित्यकार ने अपना पुरस्कार लौटाने के बाद उसे वापस भी लिया है तो राव ने कहा, ‘‘राजस्थानी साहित्यकार नंद भारद्वाज ने अकादमी को पत्र लिखकर अपनी भावनाएं बयान की और पुरस्कार वापस ले लिया।’’ गौरतलब है कि पिछले साल एक संवाददाता सम्मेलन में राव ने कहा था कि 39 साहित्यकारों ने हमें पुरस्कार वापस करने के बारे में लिखित में दिया है, जिनमें से 35 ने पुरस्कार के साथ दी जाने वाली राशि का चेक भी भेजा है।

 

कहीं ये प्यार के नाम पर कुछ और तो नहीं…

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कहते हैं कि प्यार का रिश्ता दिल से होता है। आमतौर पर लड़कियाँ दिल से ही सोचती हैं, जिसे अपना मान लिया, बस मान लिया। इस मान लेने के एहसास में अक्सर वे इतना डूब जाती हैं कि उनको ख्याल ही नहीं आता कि जिसे वह अपना सबकुछ मानकर अपनी जिंदगी लुटा देने के सपने देख रही हैं, वह उनसे वाकई प्यार करता है या उसे उनके शरीर में ज्यादा दिलचस्पी है या यूँ कहें कि वह आपको गुड़िया समझकर इस्तेमाल करने के बाद फेंकने वाला इंसान तो नहीं। हमें पता है कि यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है क्योंकि कई बार प्यार में हम इतने डूब जाते हैं कि सच को जानने या समझने की कोशिश ही नहीं करते। इश्क का मिजाज और उम्र चीज ही ऐसी है मगर इश्क से बड़ी चीज जिंदगी है और अपना ख्याल रखना और अपने सम्मान की हिफाजत करना आपकी जिम्मेदारी है, खुद के प्रति। सच तो ये है कि जिंदगी में तमाम रिश्ते हों मगर अपने जज्बात की कद्र करना हमारी जिम्मेदारी है इसलिए यह जानना जरूरी है कि जिसे आप जिंदगी समझ रही हैं, वह कहीं आपको खिलौना तो नहीं समझ रहा। अगर ये फैसला नहीं कर पा रहीं तो ये इशारे पढ़िए, शायद फैसला करके अपनी जिंदगी पर अपना हक बरकरार रखना आपके लिए आसान हो जाए –

वो आपको अपनी निजी जिंदगी के बारे में कुछ नहीं बताता वह आपको कभी अपने परिवार, माता – पिता, दोस्त या फिर किसी भी निजी चीज के बारे में नहीं बताएगा। यहां तक कि आपको उसकी सोशल मीडिया प्रोफाइल देख कर भी कुछ अंदाजा नहीं लग पाएगा।

वो आपको केवल रातों में याद करता है हमें आपको यह बताने की जरुरत नहीं कि 11 बजते ही लड़कों के दिमाग में क्‍या फितूर चलने लगता है। अगर आपका बॉयफ्रेंड रात को आपके रूप पर आने की बात करे तो, मतलब समझ जाइयेगा।

वो दूसरों से अपने रिश्ते को छुपाता है। हो सकता है वह आपसे बोले कि वह अपने प्‍यार को जग जाहिर नहीं करना चाहता, लेकिन क्‍या वह आपको अपने दोस्‍तों या परिवार से भी नहीं मिलवा सकता? उसके मन में जरुर कोई प्‍लान चल रहा है इसलिये आप जब भी उसके घर जाती हैं, तब वह आपको आपका सारा सामान साथ में ले जाने को बोलता है जिससे किसी को आपके बारे में भनक ना लग सके।

उसने आपका सूरत या सीरत नहीं बल्‍कि जिस्म पसंद है उसे हमेशा से आप नहीं बल्‍कि आपकी देह ने सबसे ज्‍यादा प्रभावित किया है। वह आपके शरीर से उसकी नजर हटती नहीं है और कई बार आप असहज हो जाती हैं।

आप दोनो के लिये परफेक्‍ट डेट की परिभाषा अलग है उसे आपके साथ मूवी, ऑउटिंग और लंच नहीं करना है बल्‍कि वह आपके साथ 4 घंटे अकेले बिताने हैं, जहां पर वह आपके साथ संबन्‍ध बना सके। उसके लिये जज्बात नहीं बल्‍कि जिस्मानी संबंध ज्‍यादा महत्‍व रखता है।

जब आपको उसकी जरुरत पड़ी तब वह नहीं था। जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं जब आप तनाव या बुरा महसूस कर रही होती हैं और उस समय आपको किसी अपने कि खास जरुरत महसूस होती है। लेकिन उस दौरान वह इंसान हमेशा किसी ना किसी काम में बिजी रहता है और आपको उल्‍टा ड्रामेबाज बोलता है।

वो आपकी बात काट कर सीधे सेक्‍स की बातें करने लगता है जब भी आप कोई गंभीर बातें करने लगती हैं या अपना हाल-चाल सुनाने लगती है तब आपका बॉयफ्रेंड आपकी बातें ना सुन कर आपसे सेक्‍स की बातें करना शुरु कर देता है।

एसबीआई और पीएनबी ने घटाई ब्याज दर, होमलोन और ऑटो लोन

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को बैंकों से गरीबों तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोन को प्राथमिकता देने को कहा था। इसके बाद देश के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने रविवार को अपनी ब्याज दर में कटौती की है। एसबीआई ने ब्याज दरों में 0.9 प्रतिशत कटौती की घोषणा की। नई दरें आज से प्रभावी होंगी। पीएनबी ने ब्याज दरों में 0.7 फीसदी की कटौती की है।

एसबीआई ने एक साल की अवधि की कोष की सीमान्त लागत आधारित ब्याज दर (एमसीएलआर) को 8.90 से घटाकर 8 प्रतिशत कर दिया है। प्रधानमंत्री ने शनिवार को बैंकों से गरीबों तथा मध्यम वर्ग पर विशेष ध्यान देने को कहा था। उन्होंने कहा था, बैंकों की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए मैं उनसे कहूंगा कि वे अपनी परंपरागत प्राथमिकताओं से आगे बढ़ते हुए गरीबों, निम्न मध्यम वर्ग तथा मध्यम वर्ग पर ध्यान दें।

उन्होंने कहा, भारत पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती को गरीब कल्याण वर्ष के रूप में मना रहा है। बैंकों को इस अवसर को अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। उन्होंने जनहित में तत्काल उचित फैसले करने चाहिए। इसी तरह एक दिन के कर्ज के लिए ब्याज दर को 8.65 से घटाकर 7.75 प्रतिशत किया है। तीन साल की अवधि के लोन के लिए इसे 9.05 प्रतिशत से घटाकर 8.15 प्रतिशत किया गया है। बैंक ने एक महीने, तीन महीने, छह महीने तथा दो साल के कर्ज पर भी ब्याज दर में इसी अनुपात में कटौती की है। इस तरह जनवरी, 2015 से बैंक अपनी बेंचमार्क रिण दर में दो प्रतिशत की कटौती कर चुका है।

पिछले सप्ताह एसबीआई के सहायक बैंक स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर ने ब्याज दरों में 0.3 प्रतिशत की कटौती की थी। वहीं आईडीबीआई बैंक ने इसमें 0.6 प्रतिशत की कटौती की थी।