Saturday, March 21, 2026
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परिणय सूत्र में बंधे युवराज सिंह और हेजल कीच

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क्रिकेटर युवराज सिंह और मॉडल से अभिनेत्री बनी हेजल कीच आज यहां सरहिंद – चंडीगढ़ मार्ग स्थित दुफेरा गांव में बाबा राम सिंह गंदुआं वाले के डेरे पर परिणय सूत्र में बंध गये। आनंद कारज समारोह के बाद इस जोड़ी ने डेरा प्रमुख बाबा राम सिंह से आशीर्वाद लिया। युवराज और हेजल उस स्थल पर परिणय सूत्र में बंधे जिसका चयन इस क्रिकेटर की मां शबनम सिंह ने किया था। शादी में किसी तरह की तड़क भड़क नहीं थी और दोनों के करीबी मित्रों और परिजनों ने इसमें हिस्सा लिया। आयोजन के दौरान डेरे के करीब सुरक्षा के कड़े इंतजाम किये गये थे। हेजल आज दूसरी बार डेरा पहुंची। इससे पहले वह सगाई के बाद युवराज के साथ यहां आयी थी। नवविवाहित जोड़े ने सुनहरी मैरून रंग की पोशाक पहन रखी थी। दुल्हन ने मैरून रंग का लहंगा पहना था जिस पर सुनहरी कढ़ाई थी। युवराज मखमल की शेरवानी में खूब जंच रहे थे। उन्होंने मैरून रंग की पगड़ी और मोजड़ी पहनी थी। डेरे में शादी सिख धर्म के रीति रिवाजों से संपन्न हुई। युवराज के पिता और पूर्व क्रिकेटर योगराज सिंह डेरे में अपने बेटे के विवाह समारोह में शामिल नहीं हुए। योगराज ने पहले ही कह दिया था कि वह शादी में शरीक नहीं होंगे क्योंकि वह डेरा प्रमुख द्वारा शादी करवाये जाने के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा था वह ईश्वर में विश्वास करते हैं, धार्मिक गुरू में नहीं

 

पुश्तैनी गहने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा

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सरकार ने यह साफ़ किया है कि पुश्तैनी गहनों या फिर सोने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

आयकर क़ानून में संशोधन बिल पेश होने के बाद इस तरह की अफ़वाहें थीं कि पुश्तैनी सोने पर टैक्स लगाया जा सकता है।

आज वित्त मंत्रालय ने बयान जारी कर साफ़ किया है कि पुश्तैनी गहनों या घोषित आय से ख़रीदे गए सोने और गहने पर कोई टैक्स नहीं लगेगा।

वित्त मंत्रालय ने ये भी कहा है कि हर विवाहित महिला को 500 ग्राम, अविवाहित महिला को 250 ग्राम और पुरुषों को 100 ग्राम सोना रखने की छूट है।

इस मात्रा में सोना या फिर गहना मिलने पर उसे ज़ब्त नहीं किया जाएगा।

वित्त मंत्रालय की तरफ से गुरुवार को कहा गया कि आयकर कानून संशोधन बिल 2016 को लेकर कई तरह के अफ़वाह फैलाए जा रहे हैं जो बिल्कुल आधारहीन हैं।

सरकार का कहना है कि सिर्फ उन निवेशों पर टैक्स लगाने के लिए प्रावधान है, जिनका ब्यौरा नहीं दिया गया है. ऐसी संपत्तियों पर टैक्स लगाने का प्रावधान 1960 से ही लागू है।

इस तरह के निवेशों पर मौजूदा टैक्स की दर 30 फ़ीसदी से बढ़ा कर 60 फ़ीसदी कर दी गई है साथ ही इस पर 25 फ़ीसदी सरचार्ज और सेस भी लगेगा।

वित्त मंत्री ने लोकसभा में आयकर संशोधन बिल पेश किया जहां से इसे पारित कर राज्यसभा में भेजा गया है।

 

एक ऐसा बाज़ार जो आधार कार्ड से चलता है

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कहते है यदि आप सूझ बुझ से काम ले, तो ऐसी कोई परेशानी नहीं है जिसका हल न निकाला जा सके और ऐसी कोई मुसीबत नहीं जिससे आप बाहर न आ सके। 500 और 1000 के नोट बंद होने के दस दिनों बाद भी लोगो की परेशानी दूर होती नज़र नहीं आ रही है। लोगों को रोज़मर्रा के ज़रूरत का सामान खरीदने में भी दिक्कत हो रही है। पर वहीँ हैदराबाद के कूकटपल्ली रायतू बाजार में माहौल कुछ और ही है। यहाँ ने ग्राहकों शुक्रवार को करीब 15000 की सब्जियां खरीदी है।

पर इस बाज़ार में खरीदारी के लिए लोगों को न पुराने नोट बदलने की चिंता करनी पड़ी और न ही नए नोट न होने की वजह से परेशान होना पडा क्यूंकि यहाँ सब्जियां नोटों से नहीं आधार कार्ड से खरीदी गयी।

तेलंगाना स्टेट मार्केटिंग डिपार्टमेंट की पहल के तहत शुक्रवार को इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट फाइनैंशल कॉरपोरेशन के काउंटर बनाए गए, जहां करंसी की जगह लोगों को टोकन मुहैया करवाए गए। जिन ग्राहको का बैंक खाता उनके आधार कार्ड नंबर से जुड़ा हुआ है, उन्हें  5, 10 और 20 रुपए के टोकन दिए गए। ग्राहकों ने जितने भी रुपयों की सब्जी ली उतने पैसे बाद में सीधे उन लोगों के बैंक अकाउंट से काट लिया गया। और जिन टोकनों का इस्तेमाल नहीं हो सका, उन्हें कैश के रूप में लोगों को दे दिया गया।

इस बेहतरीन सुविधा का फायदा सिर्फ ग्राहकों को ही नहीं बल्कि किसानो और विक्रेताओं को भी हुआ।

जिन किसानों या सब्जी विक्रेताओं ने टोकन के जरिए पेमेंट लिया, उनके खाते में रकम भी भेज दी गई। यदि किसी के पास बैंक अकाउंट नहीं था, तो इन आईडीएफसी काउंटरों ने अकाउंट खुलवाने का भी काम किया।

तेलंगाना के सिंचाई मंत्री टी. हरीश राव ने बताया, “इस सुविधा का इस्तेमाल शुक्रवार को सुबह 9 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक 95 लोगों ने किया। यदि सबकुछ ठीक रहा तो शनिवार को भी यह व्यवस्था जारी रहेगी। पहले चरण में इसे शहर सभी रायतु बाजारों में लागू करेंगे और दूसरे चरण में इसे अन्य जगहों पर भी लागू किया जाएगा।”

तेलुगु भाषा में रायतु का मतलब होता है किसान। तेलंगाना में काफी समय पहले रायतु बाज़ार की शुरुआत की गयी जहाँ किसान अपना माल सीधा ग्राहकों को बेचते है। किसी भी दुसरे सब्जी बाज़ार के मुकाबले मध्यस्तो के न होने की वजह से इस बाज़ार में सब्जियां काफी कम कीमत पर मिलती है और किसानो को भी बहुत फायदा होता है। नोटबंदी के चलते जिस तरह इस बाज़ार को तुरंत डिजिटल बना दिया गया, उससे ग्राहक और किसान दोनों को और भी लाभ होंगे।

 

जाड़े के मौसम की दो कविताएं

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जाड़े की बहारें

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 नज़ीर अकबराबादी

 

जब माह अगहन का ढलता हो, तब देख बहारे जाड़े की।
और हँस हँस पूस संभलता हो, तब देख बहारे जाड़े की।
दिन जल्दी जल्दी चलता हो, तब देख बहारे जाड़े की।
पाला भी बर्फ़ पिघलता हो, तब देख बहारे जाड़े की।
चिल्ला ख़म ठोंक उछलता हो, तब देख बहारें जाड़े की॥1॥

तन ठोकर मार पछाड़ा हो, दिल से होती हो कुश्ती सी।
थर-थर का ज़ोर अखाड़ा हो, बजती हो सबकी बत्तीसी।
हो शोर पफू हू-हू-हू का, और धूम हो सी-सी-सी-सी की।
कल्ले पे कल्ला[1] लग लग कर, चलती हो मुंह में चक्की सी।
हर दांत चने से दलता हो, तब देख बहारें जाड़े की॥2॥

हर एक मकां में सर्दी ने, आ बांध दिया हो यह चक्कर।
जो हर दम कप-कप होती हो, हर आन कड़ाकड़ और थर-थर।
पैठी हो सर्दी रग रग में, और बर्फ़ पिघलता हो पत्थर।
झड़ बांध महावट पड़ती हो, और तिस पर लहरें ले लेकर।
सन्नाटा वायु का चलता हो, तब देख बहारें जाड़े की॥3॥

तरकीब बनी हो मजलिस की, और काफ़िर नाचने वाले हों।
मुंह उनके चांद के टुकड़े हों, तन उनके रुई के गाले हों।
पोशाकें नाजुक रंगों की और ओढ़े शाल दुशाले हों।
कुछ नाच और रंग की धूमें हो, कुछ ऐश में हम मतवाले हों।
प्याले पर प्याला चलता हो, तब देख बहारें जाड़े की॥4॥

हर चार तरफ़ से सर्दी हो और सहन खुला हो कोठे का।
और तन में नीमा शबनम का हो जिसमें ख़स का इत्र लगा।
छिड़काव हुआ हो पानी का और खू़ब पलंग भी हो भीगा।
हाथों में प्याला शर्बत का हो आगे एक फ़र्राश खड़ा।
फ़र्राश भी पंखा झलता हो तब देख बहारें जाड़े की॥5॥

जब ऐसी सर्दी हो ऐ दिल! तब ज़ोर मजे़ की घातें हों।
कुछ नर्म बिछौने मख़मल के कुछ ऐश की लम्बी रातें हों।
महबूब गले से लिपटा हो, और कोहनी, चुटकी लाते हों।
कुछ बोसे मिलते जाते हों कुछ मीठी-मीठी बातें हों।
दिल ऐशो तरब में पलता हो तब देख बहारें जाड़े की॥6॥

हो फ़र्श बिछा गालीचों का और पर्दे छूटे हों आकर।
एक गर्म अंगीठी जलती हो और शमा हो रौशन तिस पर।
वह दिलबर शोख़ परी चंचल, है धूम मची जिसकी घर-घर।
रेशम की नर्म निहाली पर सौ नाज़ो अदा से हंस-हंस कर।
पहलू के बीच मचलता हो तब देख बहारें जाड़े की॥7॥

हर एक मकां हो खि़ल्वत का और ऐश की सब तैयारी हो।
वह जान कि जिस पर जी गश हो सौ नाज़ से आ झनकारी हो।
दिल देख ”नज़ीर“ उसकी छवि को, हर आन सदा पर बारी हो।
सब ऐश मुहैया हों आकर जिस जिस अरमान की बारी हो।
जब सब अरमान निकलता हो, तब देख बहारें जाड़े की॥8॥

Indians warm themselves around a bonfire in Ahmadabad, India, Tuesday, Dec. 15, 2015. Cold wave swept in several parts of north India as temperatures dipped along with another spell of snowfall at higher regions. (AP Photo/Ajit Solanki)

जाड़े की साँझ

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माखनलाल चतुर्वेदी

 

किरनों की शाला बन्द हो गई चुप-चपु
अपने घर को चल पड़ी सहस्त्रों हँस-हँस
उ ण्ड खेलतीं घुल-मिल होड़ा-होड़ी
रोके रंगों वाली छबियाँ? किसका बस!

ये नटखट फिर से सुबह-सुबह आवेंगी
पंखनियाँ स्वागत-गीत कि जब गावेंगी।
दूबों के आँसू टपक उठेंगे ऐसे
हों हर्ष वायु से बेक़ाबू- से जैसे।

कलियाँ हँस देंगी
फूलों के स्वर होगा
आगन्तुक-दल की आँखों का घर होगा,
ऊँचे उठना कलिकाओं का वर होगा
नीचे गिरना फूलों का ईश्वर होगा।
शाला चमकेगी फिर ब्रह्माण्ड-भवन की
खेलेंगी आँख-मिचौनी नटखट मन की।

इनके रूपों में नया रंग-सा होगा
सोई दुनिया का स्वपन दंग-सा होगा
यह सन्ध्या है, पक्षी चुप्पी साधेंगे
किरणों की शाला बन्द हो गई- चुप-चुप।

डिजिटल भुगतान प्रणालियों को बढावा देने वाली समिति के अध्यक्ष बने चंद्रबाबू नाय़डू

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केंद्र सरकार ने देश में डिजिटल भुगतान प्रणालियों को बढावा देने के लिए मुख्यमंत्रियों की एक समिति गठित की है। इस समिति में 13 सदस्य हैं और इसके अध्यक्ष आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू होंगे। यह समिति पारदर्शिता बढ़ाने के लिए डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने, वित्तीय समावेशन और इस संबंध में एक रोडमैप तैयार करने का काम करेगी। इस समिति में नायडू के अलावा ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग, पुद्दुचेरी के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शामिल हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत भी इस समिति के सदस्य हैं।

विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के पूर्व चेयरमैन नंदन नीलेकणि, बोस्टन कंसल्टिंग समूह के चेयरमैन जनमेजय सिन्हा, नेटकोर के प्रबंध निदेशक राजेश जैन, आईस्पिरिट के सह-संस्थापक शरद शर्मा और भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद में वित्त के प्रोफेसर जयंत वर्मा इस समिति में विशेष आमंत्री होंगे।

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा कि 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोट बंद किए जाने से हो रहीं समस्याएं अस्थाई हैं, लेकिन इसके दूरगामी लाभ होंगे। उन्होंने यह बात इस स्थिति में लोगों की मदद करने के लिए अपनी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी प्रदान करते समय कही। उन्होंने कहा कि आंध्र सरकार ने लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए कई नए तरीके अपनाए हैं और यह नकदी रहित लेनदेन के मामले में देश में एक आदर्श राज्य बन गया है। नायडू ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों में नकदी रहित लेनदेन को देखने के लिए चार समितियों का गठन, 19,000 ई-पीओएस (प्वाइंट्स ऑफ सेल्स) मशीनों की व्यवस्था (जिसमें छात्र और स्व सहायता महिला समूह शामिल हैं) तथा ‘एपी पर्स’ नाम के मोबाइल ऐप्लीकेशन की शुरुआत जैसे कदम शामिल हैं।

नोटबंदी से उत्पन्न समस्याएं अस्थाई हैं लेकिन लाभ दूरगामी होंगे। 

मुख्यमंत्री ने लोगों से मुद्रा संकट को कुछ समय तक सहन करने को कहा. उन्होंने कहा कि लोगों को इसका सामना चुनौती की भावना के साथ करना चाहिए.

उधर दूसरी तरफ डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के सरकार के अभियान को तेजी से अपनाने के उद्देश्य से व्यापारियों के शीर्ष संगठन कंफेडेरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने आगामी 2-3 दिसम्बर को नई दिल्ली में लेस-कैश-इंडिया महासम्मेलन आयोजित किया है जिसमें देश के सभी राज्यों के व्यापारी नेता और उनके संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे । कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. सी. भरतिया एवं राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने बताया, कि सम्मेलन में नीति आयोग नोट बंदी से बने हालात पर इलेक्ट्रानिक भुगतान के विभिन्न विकल्पों को अपनाने के बारे में एक विस्तृत प्रस्तुति देगा और बताएगा कि किस प्रकार से डिजिटल भुगतान से व्यापार को बढ़ाया जा सकता है इस पर भी बातचीत होगी । सम्मेलन में इस जीएसटी और डिजिटल भुगतान के लिंक पर भी चर्चा होगी।

दोनों व्यापारी नेताओं ने कहा, कि हालांकि नोटबंदी से देश भर में व्यापार विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है लेकिन डिजिटल भुगतान से व्यापार चल सकेगा और भविष्य में देश में आर्थिक बदलाव का एक मजबूत आधार बनेगा । बयान में कहा गया है, कि डिजिटल भुगतान प्रणाली से देशभर में फैले छह करोड़ छोटे व्यवसायी को नया बाजार मिलेगा और प्रतिस्पर्धा के समान अवसर मिलेंगे।

 

बजाज वी द्वारा ‘इन्विन्सिबल इन्डियन्स’ की शुरुआत

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: इन्विन्सिबल युद्धपोत आईएनएस विक्रांत की धातुओं से निर्मित बाइक, बजाज वी, ने आज ‘इन्विन्सिबल इंन्डियन्स नामक एक नई पहल की शुरूआत की: ऐसी कहानियाँ, जो हमें हर दिन गौरवान्वित महसूस कराती हैं।’ यह आम भारतीय की गौरवगाथा को उजागर करने के लिए शुरु की गई एक पहल है, जो अपने मजबूत इरादे और दृढ़ संकल्प के सहारे अपने असाधारण कार्यों से समाज की सेवा में जुटे हैं। ऐसा काम करने वाले लोग हमारे चारों तरफ मौजूद हैं, परंतु इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। उनके कार्य अत्यंत प्रभावशाली और स्वार्थरहित हैं, जिसे जानकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। इस पहल को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि जनता ऐसे इन्विन्सिबल भारतीयों की पहचान करे और उनकी जानकारी को हमतक पहुँचाए।

पाँच ऐसे इन्विन्सिबल इंन्डियन्स को भारत माता के उस सपूत द्वारा सम्मानित किया गया, जिन्होंने स्वयं राष्ट्र को गौरवान्वित किया है – अभिनव बिंद्रा, व्यक्तिगत श्रेणी में भारत के पहले ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता। इस अवसर पर बजाज ऑटो के प्रबंध निदेशक  राजीव बजाजभी उपस्थित थे। बजाज वी ने इन इन्विन्सिबल लोगों की प्रेरणादायक कहानियों पर आधारित पाँच वीडियो भी जारी किये। इस पहल के बारे में बात करते हुए श्री अभिनव बिंद्रा ने कहा, “मुझे बेहद प्रसन्नता है कि बजाज वी ने ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित करने की दिशा में एक प्रशंसनीय कदम उठाया है, जिन्होंने अपना जीवन असाधारण सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है। अक्सर ऐसे वीरों की कहानी अनकही रह जाती है और इन नायकों की गाथा इतिहास के पन्नों में विलुप्त हो जाती है। बजाज वी के इस प्रयास से जुड़कर मैं वास्तव में गर्व महसूस कर रहा हूँ, साथ ही मैं इसके समर्थन में हर भारतीय से आगे आने का आग्रह करता हूँ।

इस अवसर पर श्री एरिक वास, अध्यक्षमोटरसाइकिल व्यापार, बजाज ऑटो, ने कहा, ” ‘वी’ एक अनूठा ब्रांड है जिसने देश के गौरव आईएनएस विक्रांत को पिघलाकर नई शक्ल दी है। भारतीयों को हर दिन गर्व महसूस करना ही हमारा प्रयास रहा है। ‘इन्विन्सिबल इंन्डियन्स’ गर्व की कुछ ऐसी ही कहानियों को सामने लाने का हमारा प्रयास है। आज पाँच ऐसे इन्विन्सिबल इंन्डियन्स को सम्मानित करने पर हमें भी गर्व का अहसास हो रहा है, साथ ही हम यह भी जानते हैं कि इस प्रकार का कार्य करने वाले ऐसे कई लोग हमारे बीच मौजूद हैं, जिनका सम्मान किया जाना चाहिए और समाज के प्रति निःस्वार्थ कार्यों के लिए उनकी सराहना की जानी चाहिए।”

इन्विन्सिबल इंन्डियन्स की सूची में शामिल नाम इस प्रकार हैं:

चेवांग नोर्फेल: लद्दाख में बारहमासी जल संकट को दूर करने के लिए 15 कृत्रिम ग्लेशियरों का निर्माण किया। वर्ष 2015 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

बिपिन गनात्रा: इन्होंने कोलकाता में 100 से अधिक अग्निकांड में लोगों को आग से बचाया है। कोलकाता अगिनशमन विभाग ने इन्हें एक स्वयंसेवक फायर फाइटर की मान्यता दी है।

ओमकार नाथ शर्मा: एनसीआर क्षेत्र में घूम-घूम कर लोगों से ऐसी दवाएं इकट्ठा करते हैं, जिनकी उन्हें अब जरुरत नहीं है, और फिर उन दवाओं को गरीबों की सेवा में संलग्न क्लीनिकों एवं अस्पतालों को वितरित कर देते हैं।

विजयलक्ष्मी शर्मा: राजस्थान के गांवों में बाल विवाह के उन्मूलन के लिए एक आंदोलन का नेतृत्व कर रही हैं।

करीमुल हक: उन्होंने अपनी बाइक को एम्बुलेंस में बदल दिया। वह 24X7 निःशुल्क एम्बुलेंस सेवा प्रदान करते हैं।

31 दिसंबर से देश का पहला कैशलेस राज्य बन जाएगा गोवा !

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नोटबंदी लागू होने के बाद से पूरे देश में नकद-रहित अर्थव्यवस्था को लेकर चर्चा चल रही है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों से मोबाइल को ही अपना बैंक बना लेने की अपील कर चुके हैं। इस कड़ी में गोवा सरकार पूरी कोशिश में है कि 31 दिसंबर के बाद गोवा में सभी लेनदेन नकद-रहित (कैशलेस) हो।

गोवा में 26,000 पंजीकृत व्यापारियों के साथ ही 10,000 पंजीकृत शराब विक्रेताओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है। इसके अलावा संभावना है कि 31 दिसंबर के बाद गोवा के लोग मछली, सब्जियां और दूसरी रोजमर्रा की जरूरत की चीजें अपने मोबाइल का एक बटन दबा कर खरीद पाएंगे।

नकद-रहित राज्य बनने की योजना पर फिलहाल काम चल रहा है, इसलिए अभी नकद से खरीदारी को पुरी तरह बंद नहीं किया जाएगा।

मुख्य सचिव आर के श्रीवास्तव ने कहा, ‘खरीदारी करने पर पैसा सीधे ग्राहक के बैंक अकाउंट से कट जाएगा।’ उन्होंने बताया कि वेंडर्स, छोटे दुकानदारों और ग्राहकों को इसके लिए जागरूक और शिक्षित करने की मुहिम सोमवार से शुरू कर दी जाएगी। श्रीवास्तव ने बताया कि बैंक में रजिस्ट्रेशन कराने वाले हर वेंडर को एक एमआई कोड दिया जाएगा।

 

धूप का एक टुकड़ा

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निर्मल वर्मा

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क्या मैं इस बेंच पर बैठ सकती हूँ? नहीं, आप उठिए नहीं – मेरे लिए यह कोना ही काफी है। आप शायद हैरान होंगे कि मैं दूसरी बेंच पर क्यों नहीं जाती? इतना बड़ा पार्क – चारों तरफ खाली बेंचें – मैं आपके पास ही क्यों धँसना चाहती हूँ? आप बुरा न मानें, तो एक बात कहूँ – जिस बेंच पर आप बैठे हैं, वह मेरी है। जी हाँ, मैं यहाँ रोज बैठती हूँ। नहीं, आप गलत न समझें। इस बेंच पर मेरा कोई नाम नहीं लिखा है। भला म्यूनिसिपैलिटी की बेंचों पर नाम कैसा? लोग आते हैं, घड़ी-दो घड़ी बैठते हैं, और फिर चले जाते हैं। किसी को याद भी नहीं रहता कि फलाँ दिन फलाँ आदमी यहाँ बैठा था। उसके जाने के बाद बेंच पहले की तरह ही खाली हो जाती है। जब कुछ देर बाद कोई नया आगंतुक आ कर उस पर बैठता है, तो उसे पता भी नहीं चलता कि उससे पहले वहाँ कोई स्कूल की बच्ची या अकेली बुढ़िया या नशे में धुत्त जिप्सी बैठा होगा। नहीं जी, नाम वहीं लिखे जाते हैं, जहाँ आदमी टिक कर रहे – तभी घरों के नाम होते हैं, या फिर क़ब्रों के – हालाँकि कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि क़ब्रों पर नाम भी न रहें, तो भी खास अंतर नहीं पड़ता। कोई जीता-जागता आदमी जान-बूझ कर दूसरे की क़ब्र में घुसना पसंद नहीं करेगा!

आप उधर देख रहे हैं – घोड़ा-गाड़ी की तरफ? नहीं, इसमें हैरानी की कोई बात नहीं। शादी-ब्याह के मौकों पर लोग अब भी घोड़ा-गाड़ी इस्तेमाल करते हैं… मैं तो हर रोज देखती हूँ। इसीलिए मैंने यह बेंच अपने लिए चुनी है। यहाँ बैठ कर आँखें सीधी गिरजे पर जाती हैं – आपको अपनी गर्दन टेढ़ी नहीं करनी पड़ती। बहुत पुराना गिरजा है। इस गिरजे में शादी करवाना बहुत बड़ा गौरव माना जाता है। लोग आठ-दस महीने पहले से अपना नाम दर्ज करवा लेते हैं। वैसे सगाई और शादी के बीच इतना लंबा अंतराल ठीक नहीं। कभी-कभी बीच में मन-मुटाव हो जाता है, और ऐन विवाह के मुहूर्त पर वर-वधू में से कोई भी दिखाई नहीं देता। उन दिनों यह जगह सुनसान पड़ी रहती है। न कोई भीड़ न कोई घोड़ा-गाड़ी। भिखारी भी खाली हाथ लौट जाते हैं। ऐसे ही एक दिन मैंने सामनेवाली बेंच पर एक लड़की को देखा था। अकेली बैठी थी और सूनी आँखों से गिरजे को देख रही थी।

पार्क में यही एक मुश्किल है। इतने खुले में सब अपने-अपने में बंद बैठे रहते हैं। आप किसी के पास जा कर सांत्वना के दो शब्द भी नहीं कह सकते। आप दूसरों को देखते हैं, दूसरे आपको। शायद इससे भी कोई तसल्ली मिलती होगी। यही कारण है, अकेले कमरे में जब तकलीफ दुश्वार हो जाती है, तो अक्सर लोग बाहर चले आते हैं।  सड़कों पर। पब्लिक पार्क में। किसी पब में। वहाँ आपको कोई तसल्ली न भी दे, तो भी आपका दुख एक जगह से मुड़ कर दूसरी तरफ करवट ले लेता है। इससे तकलीफ का बोझ कम नहीं होता; लेकिन आप उसे कुली के सामान की तरह एक कंधे से उठा कर दूसरे कंधे पर रख देते हैं। यह क्या कम राहत है? मैं तो ऐसा ही करती हूँ – सुबह से ही अपने कमरे से बाहर निकल आती हूँ। नहीं, नहीं – आप गलत न समझें – मुझे कोई तकलीफ नहीं। मैं धूप की ख़ातिर यहाँ आती हूँ – आपने देखा होगा, सारे पार्क में सिर्फ यही एक बेंच है, जो पेड़ के नीचे नहीं है। इस बेंच पर एक पत्ता भी नहीं झरता – फिर इसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि यहाँ से मैं सीधे गिरजे की तरफ देख सकती हूँ -लेकिन यह शायद मैं आपसे पहले ही कह चुकी हूँ।

आप सचमुच सौभाग्यशाली हैं। पहले दिन यहाँ आए – और सामने घोड़ा-गाड़ी! आप देखते रहिए – कुछ ही देर में गिरजे के सामने छोटी-सी भीड़ जमा हो जाएगी। उनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं, जो न वर को जानते हैं, न वधू को। लेकिन एक झलक पाने के लिए घंटों बाहर खड़े रहते हैं। आपके बारे में मुझे मालूम नहीं, लेकिन कुछ चीजों को देखने की उत्सुकता जीवन-भर खत्म नहीं होती। अब देखिए, आप इस पेरेंबुलेटर के आगे बैठे थे। पहली इच्छा यह हुई, झाँक कर भीतर देखूँ, जैसे आपका बच्चा औरों से अलग होगा। अलग होता नहीं। इस उम्र में सारे बच्चे एक जैसे ही होते हैं – मुँह में चूसनी दबाए लेटे रहते हैं। फिर भी जब मैं किसी पेरेंबुलेटर के सामने से गुज़रती हूँ, तो एक बार भीतर झाँकने की जबर्दस्त इच्छा होती है। मुझे यह सोच कर काफी हैरानी होती है कि जो चीजें हमेशा एक जैसी रहती हैं, उनसे ऊबने के बजाय आदमी सबसे ज्यादा उन्हीं को देखना चाहता है, जैसे प्रैम में लेटे बच्चे या नव-विवाहित जोड़े की घोड़ा-गाड़ी या मुर्दों की अर्थी। आपने देखा होगा, ऐसी चीजों के इर्द-गिर्द हमेशा भीड़ जमा हो जाती है। अपना बस हो या न हो, पाँव खुद-ब-खुद उनके पास खिंचे चले आते हैं। मुझे कभी-कभी यह सोच कर बड़ा अचरज होता है कि जो चीजें हमें अपनी ज़िंदगी को पकड़ने में मदद देती हैं, वे चीजें हमारी पकड़ के बाहर हैं। हम न उनके बारे में कुछ सोच सकते हैं, न किसी दूसरे को बता सकते हैं। मैं आपसे पूछती हूँ – क्या आप अपनी जन्म की घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकते हैं, या अपनी मौत के बारे में किसी को कुछ बता सकते हैं, या अपने विवाह के अनुभव को हू-ब-हू अपने भीतर दुहरा सकते हैं? आप हँस रहे हैं… नहीं, मेरा मतलब कुछ और था। कौन ऐसा आदमी है, जो अपने विवाह के अनुभव को याद नहीं कर सकता! मैंने सुना है, कुछ ऐसे देश हैं, जहाँ जब तक लोग नशे में धुत्त नहीं हो जाते, तब तक विवाह करने का फैसला नहीं लेते… और बाद में उन्हें उसके बारे में कुछ याद नहीं रहता। नहीं जी, मेरा मतलब ऐसे अनुभव से नहीं था। मेरा मतलब था, क्या आप उस क्षण को याद कर सकते हैं, जब आप एकाएक यह फैसला कर लेते हैं कि आप अलग न रह कर किसी दूसरे के साथ रहेंगे… ज़िंदगी-भर? मेरा मतलब है, क्या आप सही-सही उस बिंदु पर अँगुली रख सकते हैं, जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा-सा सरका कर किसी दूसरे को वहाँ आने देते हैं?… जी हाँ… उसी तरह जैसे कुछ देर पहले आपने थोड़ा-सा सरक कर मुझे बेंच पर आने दिया था और अब मैं आपसे ऐसे बातें कर रही हूँ, मानो आपको बरसों से जानती हूँ।

लीजिए, अब दो-चार सिपाही भी गिरजे के सामने खड़े हो गए। अगर इसी तरह भीड़ जमा होती गई, तो आने-जाने का रास्ता भी रुक जाएगा। आज तो खैर धूप निकली है, लेकिन सर्दी के दिनों में भी लोग ठिठुरते हुए खड़े रहते हैं। मैं तो बरसों से यह देखती आ रही हूँ… कभी-कभी तो यह भ्रम होता है कि पंद्रह साल पहले मेरे विवाह के मौके पर जो लोग जमा हुए थे, वही लोग आज भी हैं, वही घोड़ा-गाड़ी, वही इधर-उधर घूमते हुए सिपाही… जैसे इस दौरान कुछ भी नहीं बदला है! जी हाँ – मेरा विवाह भी इसी गिरजे में हुआ था। लेकिन यह मुद्दत पहले की बात है। तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के दरवाजे पर आ कर ठहर सके। हमें उसे गली के पिछवाड़े रोक देना पड़ा था… और मैं अपने पिता के साथ पैदल चल कर यहाँ तक आई थी। सड़क के दोनों तरफ लोग खड़े थे और मेरा दिल धुक-धुक कर रहा था कि कहीं सबके सामने मेरा पाँव न फिसल पड़े। पता नहीं, वे लोग अब कहाँ होंगे, जो उस रोज भीड़ में खड़े मुझे देख रहे थे! आप क्या सोचते हैं… अगर उनमें से कोई आज मुझे देखे, तो क्या पहचान सकेगा कि बेंच पर बैठी यह अकेली औरत वही लड़की है, जो सफेद पोशाक में पंद्रह साल पहले गिरजे की तरफ जा रही थी? सच बताइए, क्या पहचान सकेगा? आदमियों की तो बात मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि वह घोड़ा मुझे जरूर पहचान लेगा, जो उस दिन हमें खींच कर लाया था… जी हाँ, घोड़ों को देख कर मैं हमेशा हैरान रह जाती हूँ। कभी आपने उनकी आँखों में झाँक कर देखा है? लगता है, जैसे वे किसी बहुत ही आत्मीय चीज से अलग हो गए हैं, लेकिन अभी तक अपने अलगाव के आदी नहीं हो सके हैं। इसीलिए वे आदमियों की दुनिया में सबसे अधिक उदास रहते हैं। किसी चीज का आदी न हो पाना, इससे बड़ा और कोई दुर्भाग्य नहीं। वे लोग जो आखिर तक आदी नहीं हो पाते या तो घोड़ों की तरह उदासीन हो जाते हैं, या मेरी तरह धूप के एक टुकड़े की खोज में एक बेंच से दूसरी बेंच का चक्कर लगाते रहते हैं।

क्या कहा आपने? नहीं, आपने शायद मुझे गलत समझ लिया। मेरे कोई बच्चा नहीं -यह मेरा सौभाग्य है। बच्चा होता, तो शायद मैं कभी अलग नहीं हो पाती। आपने देखा होगा, आदमी और औरत में प्यार न भी रहे, तो भी बच्चे की ख़ातिर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। मेरे साथ कभी ऐसी रुकावट नहीं रही। इस लिहाज से मैं बहुत सुखी हूँ -अगर सुख का मतलब है कि हम अपने अकेलेपन को खुद चुन सकें। लेकिन चुनना एक बात है, आदी हो सकना बिल्कुल दूसरी बात। जब शाम को धूप मिटने लगती है, तो मैं अपने कमरे में चली जाती हूँ। लेकिन जाने से पहले मैं कुछ देर उस पब में जरूर बैठती हूँ, जहाँ वह मेरी प्रतीक्षा करता था। जानते हैं, उस पब का नाम? बोनापार्ट – जी हाँ, कहते हैं, जब नेपोलियन पहली बार इस शहर में आया, तो उस पब में बैठा था – लेकिन उन दिनों मुझे इसका कुछ पता नहीं था। जब पहली बार उसने मुझसे कहा कि हम बोनापार्ट के सामने मिलेंगे, तो मैं सारी शाम शहर के दूसरे सिरे पर खड़ी रही, जहाँ नेपोलियन घोड़े पर बैठा है। आपने कभी अपनी पहली डेट इस तरह गुजारी है कि आप सारी शाम पब के सामने खड़े रहें और आपकी मंगेतर पब्लिक-स्टेचू के नीचे! बाद में जो उसका शौक था, वह मेरी आदत बन गई। हम दोनों हर शाम कभी उस जगह जाते, जहाँ मुझे मिलने से पहले वह बैठता था, या उस शहर के उन इलाकों में घूमने निकल जाते, जहाँ मैंने बचपन गुजारा था। यह आपको कुछ अजीब नहीं लगता कि जब हम किसी व्यक्ति को बहुत चाहने लगते हैं, तो न केवल वर्तमान में उसके साथ रहना चाहते हैं, बल्कि उसके अतीत को भी निगलना चाहते हैं, जब वह हमारे साथ नहीं था! हम इतने लालची और ईर्ष्यालु हो जाते हैं कि हमें यह सोचना भी असहनीय लगता है कि कभी ऐसा समय रहा होगा, जब वह हमारे बगैर जीता था, प्यार करता था, सोता-जागता था। फिर अगर कुछ साल उसी एक आदमी के साथ गुजार दें, तो यह कहना भी असंभव हो जाता है कि कौन-सी आदत आपकी अपनी है, कौन-सी आपने दूसरे से चुराई है… जी हाँ, ताश के पत्तों की तरह वे इस तरह आपमें घुल-मिल जाती हैं कि आप किसी एक पत्तों को उठा कर नहीं कह सकते कि यह पत्ता मेरा है, और वह पत्ता उसका।

देखिए, कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि मरने से पहले हममें से हर एक को यह छूट मिलनी चाहिए कि हम अपनी चीर-फाड़ खुद कर सकें। अपने अतीत की तहों को प्याज के छिलकों की तरह एक-एक करके उतारते जाएँ… आपको हैरानी होगी कि सब लोग अपना-अपना हिस्सा लेने आ पहुँचेंगे, माँ-बाप, दोस्त, पति… सारे छिलके दूसरों के, आखिर की सूखी डंठल आपके हाथ में रह जाएगी, जो किसी काम की नहीं, जिसे मृत्यु के बाद जला दिया जाता है, या मिट्टी के नीचे दबा दिया जाता है। देखिए, अक्सर कहा जाता है कि हर आदमी अकेला मरता है। मैं यह नहीं मानती। वह उन सब लोगों के साथ मरता है, जो उसके भीतर थे, जिनसे वह लड़ता था या प्रेम करता था। वह अपने भीतर पूरी एक दुनिया ले कर जाता है। इसीलिए हमें दूसरों के मरने पर जो दुख होता है, वह थोड़ा-बहुत स्वार्थी क़िस्म का दुख है, क्योंकि हमें लगता है कि इसके साथ हमारा एक हिस्सा भी हमेशा के लिए खत्म हो गया है।

अरे देखिए – वह जाग गया। जरा पेरेंबुलेटर हिलाइए, धीरे-धीरे हिलाते जाइए। अपने आप चुप हो जाएगा… मुँह में चूसनी इस तरह दबा कर लेटा है, जैसे छोटा-मोटा सिगार हो! देखिए-कैसे ऊपर बादलों की तरफ टुकुर-टुकुर ताक रहा है! मैं जब छोटी थी, तब लकड़ी ले कर बादलों की तरफ इस तरह घुमाती थी, जैसे वे मेरे इशारों पर ही आकाश में चल रहे हों… आप क्या सोचते हैं? बच्चे इस उम्र में जो कुछ देखते हैं या सुनते हैं, वह क्या बाद में उन्हें याद रहता है? रहता जरूर होगा… कोई आवाज, कोई झलक, या कोई आहट, जिसे बड़े हो कर हम उम्र के जाले में खो देते हैं। लेकिन किसी अनजाने मौके पर, जरा-सा इशारा पाते ही हमें लगता है कि इस आवाज को कहीं हमने सुना है, यह घटना या ऐसी ही कोई घटना पहले कभी हुई है… और फिर उसके साथ-साथ बहुत-सी चीजें अपने आप खुलने लगती हैं, जो हमारे भीतर अरसे से जमा थीं, लेकिन रोजमर्रा की दौड़-धूप में जिनकी तरफ हमारा ध्यान जाता नहीं, लेकिन वे वहाँ हैं, घात लगाए कोने में खड़ी रहती हैं – मौके की तलाश में – और फिर किसी घड़ी सड़क पर चलते हुए या ट्राम की प्रतीक्षा करते हुए या रात को सोने और जागने के बीच वे अचानक आपको पकड़ लेती हैं और तब आप कितना ही हाथ-पाँव क्यों न मारें, कितना ही क्यों न छटपटाएँ, वे आपको छोड़ती नहीं। मेरे साथ एक रात ऐसे ही हुआ था…

हम दोनों सो रहे थे और तब मुझे एक अजीब-सा खटका सुनाई दिया – बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन में मैं अपने अकेले कमरे में हड़बड़ा कर जाग उठती थी और सहसा यह भ्रम होता था कि दूसरे कमरे में माँ और बाबू नहीं हैं – और मुझे लगता था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं देख सकूँगी और तब मैं चीखने लगती थी। लेकिन उस रात मैं चीखी-चिल्लाई नहीं। मैं बिस्तर से उठ कर देहरी तक आई, दरवाजा खोल कर बाहर झाँका, बाहर कोई न था। वापस लौट कर उसकी तरफ देखा। वह दीवार की तरफ मुँह मोड़ कर सो रहा था, जैसे वह हर रात सोता था। उसे कुछ भी सुनाई नहीं दिया था। तब मुझे पता चला कि वह खटका कहीं बाहर नहीं, मेरे भीतर हुआ था। नहीं, मेरे भीतर भी नहीं, अँधेरे में एक चमगादड़ की तरह वह मुझे छूता हुआ निकल गया था – न बाहर, न भीतर, फिर भी चारों तरफ फड़फड़ाता हुआ। मैं पलँग पर आ कर बैठ गई, जहाँ वह लेटा था और धीरे-धीरे उसकी देह को छूने लगी। उसकी देह के उन सब कोनों को छूने लगी, जो एक जमाने में मुझे तसल्ली देते थे। मुझे यह अजीब-सा लगा कि मैं उसे छू रही हूँ और मेरे हाथ खाली-के-खाली वापस लौट आते हैं। बरसों पहले की गूँज, जो उसके अंगों से निकल कर मेरी आत्मा में बस जाती थी, अब कहीं न थी। मैं उसी तरह उसकी देह को टोह रही थी, जैसे कुछ लोग पुराने खंडहरों पर अपने नाम खोजते हैं, जो मुद्दत पहले उन्होंने दीवारों पर लिखे थे। लेकिन मेरा नाम वहाँ कहीं न था। कुछ और निशान थे, जिन्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा था; जिनका मुझसे दूर का भी वास्ता न था। मैं रात-भर उसके सिरहाने बैठी रही और मेरे हाथ मुर्दा हो कर उसकी देह पर पड़े रहे… मुझे यह भयानक-सा लगा कि हम दोनों के बीच जो खालीपन आ गया था, वह मैं किसी से नहीं कह सकती। जी हाँ-अपने वकील से भी नहीं, जिन्हें मैं अरसे से जानती थी।

वे समझे, मैं सठिया गई हूँ। कैसा खटका! क्या मेरा पति किसी दूसरी औरत के साथ जाता था? क्या वह मेरे प्रति क्रूर था? जी हाँ… उसने प्रश्नों की झड़ी लगा दी और मैं थी कि एक ईडियट की तरह उनका मुँह ताकती रही। और तब मुझे पहली बार पता चला कि अलग होने के लिए कोर्ट, कचहरी जाना जरूरी नहीं है। अक्सर लोग कहते हैं कि अपना दुख दूसरों के साथ बाँट कर हम हल्के हो जाते हैं। मैं कभी हल्की नहीं होती। नहीं जी, लोग दुख नहीं बाँटते, सिर्फ फ़ैसला करते हैं – कौन दोषी है और कौन निर्दोष… मुश्किल यह है, जो एक व्यक्ति आपकी दुखती रग को सही-सही पहचान सकता है, उसी से हम अलग हो जाते हैं… इसीलिए मैं अपने मुहल्ले को छोड़ कर शहर के इस इलाके में आ गई, यहाँ मुझे कोई नहीं जानता। यहाँ मुझे देख कर कोई यह नहीं कहता कि देखो, यह औरत अपने पति के साथ आठ वर्ष रही और फिर अलग हो गई। पहले जब कोई इस तरह की बात कहता था, तो मैं बीच सड़क पर खड़ी हो जाती थी। इच्छा होती थी, लोगों को पकड़ कर शुरू से आखिर तक सब कुछ बताऊँ… कैसे हम पहली शाम अलग-अलग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते रहे थे – वह पब के सामने, मैं मूर्ति के नीचे। कैसे उसने पहली बार मुझे पेड़ के तने से सटा कर चूमा था, कैसे मैंने पहली बार डरते-डरते उसके बालों को छुआ था। जी हाँ, मुझे यह लगता था कि जब तक मैं उन्हें यह सच नहीं बता दूँगी, तब तक उस रात के बारे में कुछ नहीं कह सकूँगी, जब पहली बार मेरे भीतर खटका हुआ था और बरसों बाद यह इच्छा हुई थी कि मैं दूसरे कमरे में भाग जाऊँ, जहाँ मेरे माँ-बाप सोते थे… लेकिन वह कमरा खाली था। जी, मैंने कहीं पढ़ा था कि बड़े होने का मतलब है कि अगर आप आधी रात को जाग जाएँ और कितना ही क्यों न चीखें-चिल्लाएँ, दूसरे कमरे से कोई नहीं आएगा। वह हमेशा खाली रहेगा। देखिए, उस रात के बाद मैं कितनी बड़ी हो गई हूँ!

लेकिन एक बात मुझे अभी तक समझ में नहीं आती। भूचाल या बमबारी की खबरें अखबारों में छपती हैं। दूसरे दिन सबको पता चल जाता है कि जहाँ बच्चों का स्कूल था, वहाँ खंडहर हैं; जहाँ खंडहर थे, वहाँ उड़ती धूल। लेकिन जब लोगों के साथ ऐसा होता है, तो किसी को कोई खबर नहीं होती… उस रात के बाद दूसरे दिन मैं सारे शहर में अकेली घूमती रही और किसी ने मेरी तरफ देखा भी नहीं… जब मैं पहली बार इस पार्क में आई थी, इसी बेंच पर बैठी थी, जिस पर आप बैठे हैं। और जी हाँ, उस दिन मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं उसी गिरजे के सामने बैठी हूँ, जहाँ मेरा विवाह हुआ था… तब सड़क इतनी चौड़ी नहीं थी कि हमारी घोड़ा-गाड़ी सीधे गिरजे के सामने आ सके। हम दोनों पैदल चल कर यहाँ आए थे…

आप सुन रहे हैं, ओर्गन पर संगीत? देखिए, उन्होंने दरवाजे खोल दिए हैं। संगीत की आवाज यहाँ तक आती है। इसे सुनते ही मुझे पता चल जाता है कि उन्होंने एक-दूसरे को चूमा है, अँगूठियों की अदला-बदली की है। बस, अब थोड़ी-सी देर और है – वे अब बाहर आनेवाले हैं। लोगों में अब इतना चैन कहाँ कि शांति से खड़े रहें, अगर आप जा कर देखना चाहें, तो निश्चिंत हो कर चले जाएँ। मैं तो यहाँ बैठी ही हूँ। आपके बच्चे को देखती रहूँगी। क्या कहा आपने? जी हाँ, शाम होने तक यहीं रहती हूँ। फिर यहाँ सर्दी हो जाती है। दिन-भर मैं यह देखती रहती हूँ कि धूप का टुकड़ा किस बेंच पर है – उसी बेंच पर जा कर बैठ जाती हूँ। पार्क का कोई ऐसा कोना नहीं, जहाँ मैं घड़ी-आधा घड़ी नहीं बैठती। लेकिन यह बेंच मुझे सबसे अच्छी लगती है। एक तो इस पर पत्ते नहीं झरते और दूसरे… अरे, आप जा रहे हैं?

 

गर्मागर्म सूप के साथ करेें सर्दियों का स्वागत

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ब्रोकली का सूप

Broccoli cream soup on a tablecloth

विधि – ब्रोकली के टुकड़े करके अच्छी तरह पानी से धो लीजिये। किसी बर्तन में इतना पानी भर कर गरम करने रखिये कि उसमें ब्रोकली के टुकड़े डूब जाए। पानी में उबाल आने के बाद ब्रोकली के उसमें डालें। ब्रोकली के टुकड़ों को 5 मिनिट के लिये ढके रहने दीजिये। टमाटर धोकर, बड़े टुकड़ों में काट लीजिये.  आलू छील कर पतले टुकड़े कर लीजिये। ब्रोकली के डंठल छील कर टुकड़े कर लीजिये। अदरक छील कर छोटे टुकड़े कर लीजिये। दूसरे बर्तन में एक टेबल स्पून मक्खन डाल कर गरम कीजिये। काली मिर्च, लोंग और दाल चीनी मक्खन में डाल कर हल्का सा भूनिये। टमाटर, आलू और ब्रोकली के डंठल के टुकड़े डालकर मिलाइये और थोड़ा पानी डालकर, ढककर, पकने रख दीजिये।  6-7 मिनिट के बाद ढक्कन खोल कर देखिये आलू, नरम हो गये हैं, अगर नहीं तो 2-3 मिनिट के लिये ढककर और पका लीजिये. आग बन्द कर दीजिये।  ठंडा होने पर ये नरम आलू टमाटर मसाला और आधे ब्लांच किये गये ब्रोकली के टुकड़े मिक्सी से बारीक पीस लीजिये।

पिसा हुआ मसाला ब्रोकली बर्तन में डालिये, चार कप पानी और स्वादानुसार नमक मिलाइये. सूप में उबाल आने के बाद 3-4 मिनिट तक उबालिये. आग बन्द कर दीजिये। ब्रोकली सूप तैयार है. सूप में कटा हुआ धनियां डाल कर मिलाइये.  गरमा गरम ब्रोकली सूप को सूप प्याले में डालिये और थोड़ा मक्खन डाल कर परोसिये और पीजिये।

 

पालक का सूप

palak-soup

विधि – 2 कप कटी हुई पालक, ½ कप बारीक़ कटी प्याज, 2 बारीक़ कटी लहसुन की कलियाँ, 2 बड़े चम्मच ताजा मलाई, 2 बड़े चम्मच मक्खन, 2 बड़े चम्मच मकई का आटा ½ कप पानी में घुलाया हुआ, स्वाद अनुसार नमक, 1 बड़ा चम्मच मक्खन सजाने के लिए।

सामग्री – सबसे पहले एक नॉन स्टिक पैन में माखन गर्म करें फिर उसमे प्याज और लहसुन डालकर कुछ देर पकाएं। अब उसमे पालक डालकर मध्यम आंच पर करीब 2 मिनट तक पकने दें और चलाते रहें, अब उसमे 2 कप पानी डालकर अच्छी तरह से मिलाएं और मध्यम आंच पर 7-8 मिनट तक पकाएं बिच-बिच में चलाते रहें.
अब उसे ठंडा होने के लिए एक तरफ रख दें। जब वह पूरी तरह से ठंडा हो जाए तब उसे मिक्सर ब्लेंडर में डालकर मुलायम प्यूरी बना लें, अब उसे छलनी से छानकर एक पैन में डाल दें। अब मकई के आटे और पानी का मिश्रण और मलाई को एक कटोरे में डालकर अच्छी तरह से मिलाएं (ध्यान रखें की आटे के गट्ठे न रह जाए) फिर उसे पालक की प्यूरी में डालकर अच्छी तरह से मिलाएं। अब उसे मध्यम आंच पर 1 मिनट तक पकाएं और लगातार चलाते रहें फिर उसे एक कटोरे में निकालकर मक्खन से सजाएं और गरमा गरम सूप का आनंद लें.

 

गाँव की एक बेटी की शादी के लिए पूरा गाँव ही बैंक की कतार में खड़ा हो गया!

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कोल्हापुर के याल्गुड गाँव के रहने वाले संभाजी बगल के परिवार में ख़ुशी का माहौल था। हर कोई अपने-अपने कामो में व्यस्त था। आखिर घर की बेटी, सयाली की शादी में दिन ही कितने बचे थे। पर अचानक 8 नवम्बर की रात को मानो ये सारा ख़ुशी का माहौल मातम में बदल गया हो।

8 नवम्बर की रात को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के बयान के बाद इस परिवार को समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वे शादी की इतनी सारी तैयारियां बिना नगद के कैसे करेंगे।

पिता संभाजी ने सयाली की शादी के लिए जितने भी पैसे बचाए थे, वो सारे बैंक में जमा थे, लेकिन नोटबंदी के बाद रुपयों की सीमित निकासी के फैसले से वे चिंतित हो उठे।

उन्होंने टाइम्स आॅफ इंडिया को बताया कि, ‘उनकी बेटी की शादी कराड के एक दुकान मालिक से तीन महीने पहले तय हुई थी। नोटबंदी के बाद करेंसी एक्सचेंज और नए नोटों को निकालने के लिए बैंक और एटीएम के बाहर जिस तरह की मारामरी मची थी, उसको देखकर वह सादे ढंग से शादी की रस्में पूरी करने के लिए मजबूर हो गए थे। लेकिन उन्हें इसमें भी संशय था कि सादे ढंग से शादी करने के लिए भी जरूरी रकम जुट पाएगी या नहीं।’

संभाजी को जिस बात का डर था वही हुआ, हल्दी की रस्म से पहले तक भी वे पर्याप्त रकम बैंक से नहीं निकाल पाए थे। ऐसे में पूरा गाँव उनके साथ आकर खड़ा हो गया। दोस्त, रिश्तेदार और यहाँ तक कि सभी गांववाले सयाली की शादी के लिए थोड़ी थोड़ी रकम निकालने के लिए बैंक की कतारों में खड़े हो गए। और ये सभी पैसे उन्होंने संभाजी को लाकर दे दिए।

22 नवम्बर को सयाली की शादी की रस्मे हल्दी की रस्म से शुरू हुई। और सजावट, कपडे, मिठाईयां और बाकी सभी तैयारियों को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि इस शादी में पैसे की कोई भी कमी थी।

“यह शादी मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगी। इसने हमारे दोस्तों और रिश्तेदारों को और भी करीब ला दिया है। इन लोगों की दुआएं मेरे काम आईं,” उत्साहित होकर सयाली ने कहा!

(साभार – द बेटर इंडिया)