Tuesday, March 24, 2026
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मुम्बई के 300 छात्रों ने 2 साल तक हर रविवार साथ काम कर इस गाँव में बना दिये 107 शौचालय

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हमारे देश में जहां आज भी करोड़ो लोगों की पहुँच में शौचालय नहीं हैं, ऐसे में हमारे देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए हमे ‘एक गाँव, एक घर’ जैसे सूक्ष्म स्तर से कार्य करने की आवश्यकता है।

इसी दिशा में मुंबई के किशिनचंद चेलारम महाविद्यालय के छात्रो ने सभी को प्रभावित करते हुये पलघर जिले के कारवाले गाँव में 107 शौचालय निर्मित किए हैं जिसमें गाँव में रह रहे हर परिवार के लिए एक शौचालय है।

इस कार्य का आरंभ महाविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के द्वारा किया गया। 2005 में महाविद्यालय की एनएसएस यूनिट ने एक विद्यालय के लिए शौचालय निर्माण के लिए प्रथम बार कैंप लगाया, तब उन्होंने पाया कि गाँव में एक भी घर में शौचालय नहीं हैं; तब इस गाँव की जरूरत को समझते हुए विद्यार्थियों ने अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का निश्चय किया।

“हमारे लिये ये कितनी आम बात है, ऐसे में बिना शौचालय गाँव वालों की दुर्दशा हमारी सोच के परे थी। गाँव की महिलाओं व युवतियों को नित्यकर्म करने के लिए या तो सूर्योदय के पहले उठना पड़ता या फिर रात तक इंतज़ार करना पड़ता था। कई किशोरियों ने माहवारी शुरू होने पर विद्यालय छोड़ दिया था क्योंकि शौचालय उपलब्ध नहीं थे,” सिमरन बृजवानी (केसी. कॉलेज की छात्रा व एनएसएस स्वयसेवी) बताती हैं।

लगातार कई बार गाँव में जाते रहने के कारण गाँव वालों का विश्वास हासिल करने के बाद छात्रों ने शौचालय व स्वच्छता की महत्ता व आवश्यकता के बारे में गाँव में बात करना शुरू किया । शुरुआत में गाँव के लोगों ने इतना उत्साह नहीं दिखाया पर धीरे-धीरे छात्र गाँव वालों को हर घर में शौचालय की जरूरत के बारे में समझाने में सफल हो गए।

छात्रों ने गाँव को खुले में शौच से मुक्त करने का संकल्प लिया व साथ ही उन्हें बेहतर सुविधाये उपलब्ध कराने का लक्ष्य निश्चित कर लिया। छात्रों के इस अभियान ने गति पकड़ी और वर्ष 2015 में छात्रों ने गाँव में 49 शौचालय बनाए। 2016 में 300 से अधिक स्वयंसेवी छात्रों ने एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर डॉ सतीश कोल्टे के निर्देशन में 67 शौचालय का निर्माण किया।

अब छात्र प्रत्येक रविवार को बचे निर्माण कार्य को पूरा करने के लिए गाँव आते हैं । इस प्रोजेक्ट के अंतिम 3 महीनों में छात्र सुबह व शाम की पारियों में बारी-बारी से कार्य कर रहे हैं व साथ ही रोजाना महाविद्यालय भी जा रहे हैं।

“हम में से अधिकतर को यह नहीं पता था कि शौचालय का निर्माण कैसे होता है। हमारे सीनियर व प्रोग्राम मैनेजर ने हमें सब कुछ बिलकुल शुरू से सिखाया।  सोक-पिट का गड्ढा खोदने से लेकर शौचालय की दीवार बनाने व उस पर रंग करने तक सभी कुछ हमने किया यह एक शानदार अनुभव था, ” सिमरन कहतीं हैं।

छात्रों ने गाँव में शिक्षा के प्रति भी जागरूकता फैलाने का कार्य गाँव में एक समुदाय भवन का निर्माण कर व वहाँ पठन सामग्री वितरित कर किया। अन्य प्रयासों में साथ ही इन छात्रों ने गाँव के किसानों को एक किसान बाजार स्थापित करने, महिलाओं को कबाड़ से उपयोगी वस्तुए बनाने का प्रशिक्षण व उनके स्वास्थ्य परीक्षण भी किए।

“एनएसएस यूनिट का आदर्श वाक्य है,  ‘मैं नहीं,पहले आप’! खुद की जरूरतों को दरकिनार करके दूसरों की आवश्यकता का ख्याल रखना हमारी संस्कृति का हिस्सा है। हमारा कार्य उसी सीख से प्रेरित है। इस पूरे कार्य में हमें गाँव वालों का जबरदस्त सहयोग मिला वे हमारे लिए खाना बनाते, हमारे पीने के लिए साफ पानी का इंतजाम करते व जहां भी संभव होता हमारी मदद करते। गाँव में करीबन 100 परिवार हैं और हमने सभी के लिए शौचालय का निर्माण किया है यह एक शानदार एहसास है, ” सिमरन प्रफुल्लित होते हुए बताती हैं।

(साभार – द बेटर इंडिया)

अनुशासित हो गया है फिल्म उद्योग – माधुरी दीक्षित

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मुंबई : 80 और 90 के दशकों में रपहले पर्दे पर राज करने वाली अभिनेत्री माधुरी दीक्षित का कहना है कि हिंदी फिल्म उद्योग अब अधिक ‘‘अनुशासित’’ हो गया है।
माधुरी ने कहा, ‘‘आजकल फिल्में निर्धारित समय में पूरी होती हैं और अब इसमें काम करने वाले लोग समय के पाबंद हो गये हैं। यहां अनुशासन है। इसके अलावा, अब भिन्न-भिन्न तरह की फिल्में बन रही हैं और अच्छा कारोबार कर रही हैं। अब केवल गीत और नृत्य की बात नहीं है, बल्कि अब उन्होंने फिल्मों की कहानी पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘आजकल अभिनेत्रियांे को प्रमुख स्थान मिलता है और वह फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी अच्छा काम कर रही हैं। आपको एक बंधी हुई पटकथा मिलती है और आपको अपने किरदार, अपनी लुक के बारे में पता होता है। अभिनेता को केवल अपने किरदार पर ध्यान देना होता है। फिल्म उद्योग ठीक दिशा में आगे बढ़ रहा है।’’ उद्योग मंडल फिक्की की ओर से आयोजित फिक्की फ्रेम्स-2017 के मौके पर माधुरी :49: अपने पति श्रीराम नेने के साथ आयी थीं। उन्होंने इस मौके पर अपनी ऑनलाइन डांस एकेडमी और शादी के बाद के अपने जीवन और मां बनने से जुड़े अनुभवों के बारे में बताया।

माधुरी ने कहा कि अब ज्यादा लेखक महिला केन्द्रित किरदारों वाली कहानियों में रचि ले रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘‘बदलाव एक रात में नहीं होता। मैं देख रही हूं कि अब अभिनेत्रियों को दिमाग में रखकर ज्यादा किरदार लिखे जा रहे हैं। आज की महिलाएं केवल एक मां ही नहीं हंै, बल्कि अब वे घर, बच्चों और सभी चीजों का ध्यान रखती हं और लोग इस बात पर ध्यान दे रहे हैं।’’ उल्लेखनीय है कि माधुरी आखिरी बार फिल्म ‘गुलाब गैंग’ में नजर आयी थीं।

 

पेशे से सीए रह चुकी देविका, पशुओं के संरक्षण के लिए बना रही है चमड़ा-मुक्त जूते!

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“मुझे जानवरों से बहुत प्यार है,” देविका श्रीमल बापना अपने ब्रांड केनाबीस को शुरू करने के बारे में अपने मुख्य उद्देश्य को बयां करते हुए कहती हैं। पशुओं के प्रति उनके  प्रेम व पेटा स्वयंसेवी के रूप में काम करने से इन्हें  और जागरूक और संवेदनशील जीवन जीने की प्रेरणा मिली। उन्होंने अपने जीवन जीने के तौर–तरीकों में बहुत बदलाव किए पर जब बात जूतों पर आई तो उनके पास कोई विकल्प नहीं था।

“मुझे चमड़े के जूतों का विकल्प नहीं मिला,” देविका कहतीं हैं। “मैं लंदन में रहती थी जहां सर्दियों में लेदर ही सर्वोत्तम विकल्प था, जब मैं भारत आई तो देखा कि बाज़ार में कई बड़े ब्रांड थे जो चमड़े  के जूते बनाते थे पर जब चमड़े के अलावा कोई उत्पाद लेने जाओ तो उसकी गुणवत्ता संतोषजनक भी नहीं थी इस तरह से बाज़ार में दोनों उत्पादों के बीच एक बड़ी खाई थी।” उन्होंने सोचा कि ना तो वो चमड़े के जूते पहनेगी और न ही निम्न गुणवत्ता के जूते पहन कर अपने पैरो को तकलीफ देंगी और फिर उन्होने अपने खुद के जूते बनाने की ठानी।

2015 में देविका ने भारत में निर्मित अपना ब्रांड केनाबीस बाज़ार में उतारा जो पेटा द्वारा अनुमोदित था। यह बदलाव देविका, जिन्हें डिजाइनिंग का कोई अनुभव नहीं था, के लिए आसान नहीं था। एक सीए के रूप में प्रशिक्षित, ‘अर्नेस्ट एंड यंग, डेलॉयट’ जैसी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में काम का अनुभव रखने वाली  देविका के लिए पेशे में यह 180 डिग्री का बदलाव आसान नहीं था। “यह मेरे लिए एक बिना तैयारी के छलांग लगाने जैसा था पर केनाबीस जल्द ही अपने 2 साल पूरे कर लेगा और इसे बाज़ार में मिल रही सफलता शानदार है,”

केनाबीस महिलाओं के लिए लेदर के उपलब्ध विकल्पों जैसे जूट व केनवास के जूते बनाने में अपनी खासियत रखते हैं। जो बात इस ब्रांड को बाज़ार में उपलब्ध अन्य निर्माताओं से अलग करती है वह है, गुणवत्ता और डिजाइन पर दिया जाने वाला खास ध्यान जो की इन मटिरीयल का इस्तेमाल करने वाले अधिकतर निर्माताओं द्वारा अनदेखा किया जाता है।

“हमारे सभी उत्पाद फैशनेबल और टिकाऊ हैं, इन्हें बनाने में किसी जानवर के साथ अत्याचार नहीं होता। इन जूतों का हर हिस्सा कई परीक्षणों से गुजरता है। मैं खुद इन जूतों का इस्तेमाल करती हूँ जिससे मुझे इनकी गुणवत्ता का पता चल सके और हमारे ग्राहकों से मिलने वाली हर शिकायत व सुझाव का ध्यान रखा जाता है,” देविका बताती हैं।

“हम बाज़ार में चल रहे ताज़ा ट्रेंड्स का भी ध्यान रखते हैं, और हर 2 महीने में कोई नया डिज़ाइन बाज़ार में उतारते हैं,” वे आगे जोड़ती हैं। खेल के बारे में सोचते ही आपके दिमाग में बस कैनवास के बने सफ़ेद जूतों का ही ध्यान आता होगा पर कैनाबीस के पास इसके भी बेहतरीन विकल्प मौजूद है, कैनाबीस में आपको हील वाली सैंडल, बिना हील के चप्पल और पशुप्रेमी बूट के भी विकल्प मिलेंगे जो आमतौर पर मिलने मुश्किल है।

देविका ने 22 डिजाइन के साथ शुरू किया था और आज देविका के ब्रांड में 60 डिजाइन है जिसमें चमकदार रंग, प्रिंट्स व एम्ब्रोयडरी के डिजाइन शामिल है। “हम एक छोटी टीम है और हमारा दृष्टिकोण व्यवहारिक व क्रियाशील है,” देविका कहती हैं। यह कुछ इस तरह है कि हो सकता है कि अगर आप कस्टमर केयर पर फोन लगाए तो इस ब्रांड के संस्थापक ही आपका फोन उठाए।

बाज़ार की दशा को देखते हुए यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देविका ले लिए शुरुआती दौर में दिल्ली और आस-पास के इलाकों से अपने उत्पाद के लिए कच्चा माल जुटाना, अपनी डिजाइन को मूर्त रूप देना, पैकेजिंग, गुणवत्ता बनाए रखना, विपणन व बिक्री जैसे मुख्य कार्य कितने मुश्किल रहे होंगे।

भारतीय फैशन बाज़ार के विश्लेषण से यह पता चलता है कि भारत में ऐसे उत्पाद जिन्हें बनाने में जानवरो पर अत्याचार नहीं किए गए हों की मांग बढ़ी है, पर उपभोक्ताओं के पास ज्यादा विकल्प नहीं है खासकर के जूतों में। बाज़ार में जो इस तरह के ब्रांड उपलब्ध है वे ब्रांड आम ग्राहक की पहुँच से बहुत दूर है।

देविका किसी भी तरह का लेदर या फ़र अपने डिजाइन में इस्तेमाल नहीं करतीं, और उत्साह से जानवरों के अधिकार के लिए लड़ती हैं। वे कहतीं है, “मेरा बचपन से सपना है कि मेरा 1 पालतू जानवर हो, पर मेरे साथी यह नहीं चाहते, इसीलिए मैं खुले घूमने वाले बेसहारा कुत्तों के साथ खेल कर अपनी यह इच्छा पूरी कर लेती हूँ, मैंने उन्हे नाम दिये है और वे मेरे साथ साथ अब मेरी गाड़ी भी पहचानने लगे हैं।”

जब देविका किसी घायल जानवर को देखतीं है तो वे उसे एक एनजीओ ‘फ्रेंडिकोज’ ले जाती हैं, “हमने जब एक बार हमारे ब्रांड के लिए धन जुटाया था तो उसका एक हिस्सा ईस्ट कैलाश में गायों के शेल्टर बनाने के लिए दिया,” वे बात करते हुए बताती हैं।

डिजाइनों में अपने नए शोध और जानवरो के प्रति सहानुभूति वाले दृष्टिकोण के चलते, आज देविका की पहुँच उन लोगो तक हो गयी है जो कोई भी उत्पाद खरीदते समय यह ध्यान रखते है कि उसे बनाने में पर्यावरण को क्षति न पहुंची हो।

देविका के मन में सतत विकास की अवधारणा सदा बनी रहती है, “हमे अभी भी निर्माण में प्लास्टिक का उपयोग करना पड़ता है, मैं प्लास्टिक के विकल्पो को आज़माना पसंद करूंगी और अपने जूतों को पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल बनाऊँगी” देविका बताती हैं। वे रिसाइकिलिंग की अवधारणा पर भी कार्य कर रही है, “हम पुराने जूतो को नयी डिजाइन में बदलना चाहते है। हम निर्माताओं से बात कर रहे है कि वे अपने खराब जूते हमें उपलब्ध कराये, हम ग्राहकों को भी प्रोत्साहित करते हैं कि वे अपने पुराने जूते यहाँ लाये।”

दो साल के भीतर ही केनाबीस 8 मल्टी ब्रांड स्टोर्स में विस्तृत हो चुका है, और ऑनलाइन भी उपलब्ध है। पूरे भारत में अपने उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए केनाबीस ब्रांड सोशल मीडिया, प्रदर्शनियों, व रिटेल बिक्री माध्यम का सहारा ले रहा है। देविका इस बात को साबित करने के अपने मिशन पर तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं कि लेदर का जूता ही आपका सर्वोत्तम विकल्प नहीं हैं।

(साभार – द बेटर इंडिया)

ट्विंकल खन्ना ने पूछा, ‘पीरियड्स पर शर्म कैसी ?’

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हर मुद्दे पर अपनी बेबाक और बोल्ड राय रखने वाली ट्विंकल खन्ना ने अब महिलाओं और उनके पीरियड्स को लेकर पते की बात कही है।

ट्विंकल खन्ना इसी विषय पर बेस्ड ‘पैडमैन’ नाम से एक फिल्म बना रही हैं जिसमें उनके पति अक्षय कुमार लीड रोल में नजर आएंगे।
पीरियड्स को इंडिया में अभी भी एक ऐसा सब्जैक्ट माना जाता है जिस पर खुलकर कोई भी महिला बात नहीं कर सकती और ट्विंकल का कहना है कि अपनी इस फिल्म के जरिए वो इस सब्जैक्ट को खुलकर सभी के सामने ला पाएंगी। टाइम्स ऑफ इंडिया से हाल ही में बातचीत के दौरान ट्विंकल ने कहा,’ ये एक ऐसा विषय है जिसके बारे में मैंने खूब लिखा है।
पीरियड्स जैसे सब्जैक्ट पर बात करना ना सिर्फ हमारे देश में टैबू माना जाता है बल्कि दुनियाभर में कोई भी इस पर खुलकर बात नहीं करता। मुझे ये समझ नहीं आता कि लोग इस सब्जैक्ट पर खुलकर बात करने से इतना कतराते क्यों हैं?  ये एक बायोलॉजिकल चीज है तो फिर इसे लेकर शर्म कैसी ?
ट्विंकल अपनी इस फिल्म को लेकर काफी एक्साइटेड हैं। इस फिल्म में अक्षय का किरदार रियल लाइफ में मुरुगनाथम से प्रेरित है जिन्होंने सभी विरोधों का सामना करते हुए सबसे सस्ते सैनेटरी पैड्स बनाने का काम किया था।
ट्विंकल उम्मीद करती हैं कि इसके जरिए महिलाएं पीरियड्स जैसे विषय पर शर्म नहीं करेंगी और खुलकर बात करेंगी।

 

अब आधार कार्ड से जुड़ेंगे डिग्री व सर्टिफिकेट, यूजीसी ने जारी किए निर्देश

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अब डिग्री, डिप्लोमा व सर्टिफिकेट में छात्र-छात्रा का फोटो लगेगा और आधार नंबर लिखा होगा। नौकरी या दाखिले के दौरान इसी आधार नंबर व फोटो के माध्यम से सर्टिफिकेट या डिग्री का सत्यापन भी होगा। देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में नया नियम आगामी सत्र से लागू होने जा रहा है। शुरुआत भले ही उच्च शिक्षा से हो रही है लेकिन आगे इसे स्कूल स्तर पर भी लागू किया जाएगा।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय की मंजूरी के बाद यूजीसी के सचिव जसपाल सिंह संधू ने देशभर के विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को इस संबंध में दिशानिर्देश जारी कर दिया है। यूजीसी ने अपने पत्र में लिखा है कि वे डिग्री और सर्टिफिकेट में सुरक्षा विशेषताएं होने के अलावा छात्रों के फोटोग्राफ और आधार नंबर जैसी पहचान प्रणाली जोड़े।

इससे जहां नौकरी या दाखिले में डिग्री या सर्टिफिकेट की जांच के लिए सत्यापन की जरूरत नहीं रहेगी। क्योंकि आधार नंबर से छात्र की डिटेल व फोटो से पहचान हो जाएगी कि उक्त व्यक्ति की ही डिग्री व मार्कशीट है। इसके अलावा इस नई प्रक्रिया से डिग्री या सर्टिफिकेट में नकली होने की दिक्कत भी दूर हो जाएगी, क्योंकि सारा रिकॉर्ड ऑनलाइन उपलब्ध होगा।

मल्टी नेशनल कंपनी या फिर किसी अन्य कंपनी में नौकरी ज्वाइन करने से पहले संबंधित संस्थान डिग्री या मार्कशीट को उक्त विश्वविद्यालय या संस्थान से क्रास चैक करवाते हैं कि कही यह फर्जी तो नहीं हैं। हालांकि नए नियम के बाद डिग्री या सर्टिफिकेट में छात्र की फोटो व आधार नंबर होने से ऑनलाइन जांच हो जाएगी। इसके अलावा फोटो होने से नौकरी के दौरान ही सत्यापित हो जाएगा कि उक्त छात्र ने ही डिग्री की पढ़ाई पूरी की है।

अभी तक डिग्री में छात्र की पढ़ाई का मोड (प्रारूप) पता नहीं चल पाता था। हालांकि नए नियम के तहत डिग्री में रेग्युलर, पार्ट टाइम या डिस्टेंस मोड लिखना अनिवार्य होगा। इससे साफ पता चलेगा कि संबंधित छात्र ने पढ़ाई नियमित रूप से की है या नहीं।

 

4 सर्जरी और 500 स्टिचस के बाद भी, ये प्रेरक नेवी ऑफिसर हैं वापसी को तैयार

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मौत का सामना करा देने वाली दुर्घटनाओं से गुजरना हमेशा ही एक बुरे सपने की तरह होता है। विनय कुमार, एक पूर्व नेवी ऑफिसर ने भी ऐसी ही एक दुर्घटना का सामना किया लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी और अपने इसी शानदार जज्बे के चलते अब वो वापसी को तैयार है।

विनय कुमार मूल रूप से कटक, उड़ीसा के रहने वाले हैं, उन्होंने भारत के विभिन्न राज्यों व पहाड़ी श्रृंखलाओं में अपनी मोटरसाइकिल से भ्रमण किया है। उन्होंने भारतीय नेवी में अपनी सेवाएँ दी है, साथ ही वे एक पेशेवर बाइकर भी है, जिनके पास पूरे भारत में मोटरसाइकिल भ्रमण का परमिट भी है, पर एक दुर्घटना से उनकी जिन्दगी में सब कुछ बदल गया।

विनय कुमार महाराष्ट्र के पहाड़ी इलाके में चार मोटरसाइकिलिस्ट्स के समूह की अगुवाई कर रहे थे। मौसम सुहाना था, बिनय और उनके साथी इस अनुभव का आनंद ले रहे थे। तभी अचानक कुछ अप्रत्याशित हुआ। एक बस तेज़ गति से उनकी तरफ आ रही थी। पहाड़ी इलाकों में सँकरे रास्ते होने की वजह से विनय ज्यादा कुछ नहीं कर सकते थे। शायद बस चालक उन्हे देख नहीं पाया था। बचाने के प्रयास में बिनय व साथी सड़क के कोने की तरफ भी गए लेकिन बस चालक ने तेज़ी से उनकी तरफ बढ़ते हुए, विनय को टक्कर मार दी।

उनके सिर में भारी चोट लगी थी। हालांकि उन्होंने 48 घंटे के अस्पताल के सफर में पूरी तरह से होश नहीं खोया था, उन्हे याद है उनके दोस्त ने एम्ब्युलेन्स बुलाई थी, फिर एक चिकित्सा-कर्मी से मदद लेकर उन्हे अस्पताल में भर्ती कराया था। उनके साथियों ने उनके माता-पिता को सूचना भी दे दी जो बाद में अस्पताल पहुँच गए थे। दुर्घटना के बाद के कुछ महीने बिनय कुमार के जीवन का सबसे मुश्किल समय था, पर इसी दौरान उनके जीवन में कुछ बहुत अर्थपूर्ण घटा।   

सर्जरी और कई बार चिकित्सकों को दिखाने के बाद भी दुर्घटना के दो महीने बाद तक बिनय व्हीलचेयर तक ही सीमित थे। उनकी चार सर्जरी हुई थी जिसमे उनके घुटनो में 7 स्क्रू डाले गए थे और हाथ में तो प्लेट्स लगाई गईं थी। उनके पैर में कई फ्रेक्चर्स हुए थे व कई लिगामेंट्स को क्षति पहुँचने की वजह से इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें तकरीबन 500 टाँके लगे थे। कुछ सप्ताह तक वे खाना भी नहीं निगल सकते थे। दर्द इतना ज्यादा था कि वे सो नहीं पाते थे और जागने पर भी उन्हें असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता था। इसके चलते वे अंदर से टूटने लगे थे। उनके माता-पिता भी इस बात से बहुत परेशान थे कि शायद उनका बच्चा अब कभी अपने पैरों पर हमेशा की तरह चल नहीं पाएगा।

विनय कुमार थे तो मजबूत इरादों वाले, उन्हें यह पता था कि अगर वे कमजोर हुए तो उनके माता-पिता जो पहले ही काफी परेशान थे, अपना हौसला खो देंगे। उन्होंने इस कठिन परिस्थिति में भी अपने आप को मुस्कुराने के लिए मनाया व अपने माता-पिता को हौसला बँधाया कि वे ठीक हैं। उन्होंने अपने माता-पिता को यह अहसास दिलाया कि यह दुर्घटना जीवन का एक समय है जो गुज़र जाएगा।

विनय एक घटना को याद करते हुए बताते हैं, जब उनकी माँ की आँखों में आँसू थे और उन्होने पूछा,  “यह सिर्फ तुम्हारे साथ ही क्यों हुआ, जबकि बाहर संसार में इतने लोग मोटरसाइकिल चला रहे हैं? तुम ही क्यों?”

उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था, पर उन्होंने अपने आप को संभालते हुए जवाब दिया, “क्योंकि शायद सिर्फ मुझ में ही इतनी हिम्मत है कि मैं यह सब झेल सकता हूँ।”

समय के साथ उनके घाव भरने लगे, दर्द भी धीरे-धीरे कम होने लगा। उनके दोस्त व परिवार के सदस्य इस घड़ी में हमेशा उनके साथ खड़े रहे। इतने बड़े हादसे से गुजरने के बाद आज बिनय के पास हम सब के लिए एक संदेश है, “हमारा जीवन क्षणभंगुर है, यहाँ कभी भी ,कुछ भी घटित हो सकता है, मृत्यु कभी भी आ सकती है बिना कोई चेतावनी दिए। हमे हर मिलने वाले क्षण की महत्ता समझनी चाहिए। जो समय आप अपनों के साथ बिता रहे है वो समय मूल्यवान है।”

आज विनय हादसे से काफी हद तक उबर चूकें है और आज विलहेमसन शिप मेनेजमेंट में नेविगेशन ऑफिसर है। वे पूरी तरह से स्वस्थ होने कि लिए रोजाना व्यायाम करते हैं, पूरी तरह से स्वस्थ होने पर वे दुबारा नेवी से जुड़ने करने का इरादा रखते हैं।

विनय सच में एक प्रेरणा है, एक घातक दुर्घटना से वापसी कर और मजबूत बनने का उदाहरण। उनकी इस स्थिति के बाद भी उनके वापस नेवी में अपनी सेवाएँ देनी की इच्छा यह साबित करती है कि हार कर बैठ जाना किसी समस्या का हल नहीं होता।

(साभार – द बेटर इंडिया)

बॉस की गंदी हरकत का यूं दिया मुंहतोड़ जवाब, वायरल हो रहा वीडियो

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 इन दिनों सोशल साइट्स पर एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे एक लड़की ऑफिस में सेक्सुअल हैरेसमेंट का शिकार बनती है और एक दिन तंग आकर अच्छे से अपने बॉस को सबक सिखाती है।

ऑफिस में मौजूद सभी लोग उसकी तारीफ करते हैं। इसके बाद उसका बॉस किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहता। अगर आपके साथ भी ऑफिस में कोई ऐसी हरकत करे तो आपको भी इसी तरह उसे सबक सिखाना चाहिए।
ये वीडियो उन लड़कियों को प्रेरित करता है जो आय दिन सेक्सुअल हैरेसमेंट का शिकार बनती हैं। इस शॉर्ट फिल्म का नाम ‘Let The Voice Be Yours’ है। इसे महिला दिवस के मौके पर रिलीज किया गया था। आप भी देखिए ये वीडियो –

 

सुप्रीम कोर्ट ने  कहा- मिल बैठकर सुलझाओ राम मंदिर विवाद  

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 सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अयोध्या विवादित ढांचा मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि बातचीत से ये विवाद सुलझे तो अच्छा है। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए जज भी आगे आने को तैयार हैं। कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़ी तो जज भी मध्यस्थता करने को तैयार हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी।

11. आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबाले का कहना है कि सभी भारतीयों की भागीदारी से राम मंदिर बनना चाहिए। इन सभी के अलावा साधू संतों का माना है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से राम मंदिर बनाने में तेजी आयेगी।

सुप्रीम कोर्ट का ममता को झटका, नारदा केस की होगी सीबीआई जांच

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ममता बनर्जी की अगुवाई वाली राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट के 17 मार्च के आदेश के खिलाफ दायर एक अलग अपील में बताए गए आधारों को सुप्रीम कोर्ट ने ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ करार देते हुए कहा कि याचिका ‘सिरे से खारिज’ करने लायक है।

चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट के निष्कर्षों में उसे कोई विसंगति नजर नहीं आती। बहरहाल, पीठ ने इस मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए सीबीआई को दिए गए 72 घंटे की मोहलत को बढ़ाकर एक महीना कर दिया।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस संजय किशन कौल की सदस्यता वाली पीठ ने कहा, ‘हमने आदेश का अध्ययन किया, जिसमें यह उभरकर सामने आया कि हाईकोर्ट ने ऐसी सामग्रियों पर विचार किया जिनमें सीबीआई की ओर से प्रारंभिक जांच (पीई) करने की जरूरत थी।’ पीठ ने कहा, ‘हमें हाईकोर्ट के निष्कर्षों में कोई विसंगति नजर नहीं आती, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के अधिकार पूरी तरह संरक्षित हैं।’

पीठ ने कहा कि यदि मामले में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए सीबीआई को और वक्त चाहिए तो वह उचित आवेदन के साथ हाईकोर्ट का रुख कर सकती है। न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को तब ‘वापस’ लेने की इजाजत दी जब उसके वकील ने ऐसे आधार बताने के लिए ‘बिना शर्त माफी’ मांगी, जिनसे हाईकोर्ट पर कथित तौर पर लांछन लगते हों।

राज्यसभा में पास हुआ एचआईवी -एड्स पीड़ित संशोधन बिल

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एचआईवी-एड्स पीड़ितों के साथ भेदभाव करने पर जेल की सजा और जुर्माना भी हो सकता है। साथ ही एचआईवी-एड्स पीड़ितों का मुफ्त इलाज करना अनिवार्य होगा। मंगलवार को राज्यसभा से पास एचआईवी-एड्स संशोधन बिल-2014 के मुताबिक अस्पतालों, कार्यस्थल, शैक्षणिक संस्थानों में मरीजों की सुविधा और उनकी शिकायतों को सुनने के लिए शिकायत अधिकारी  नियुक्त होंगे। सरकार बिल को लोकसभा में मंजूरी के लिए जल्द पेश करेगी।
राज्यसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने एचआईवी-एड्स संशोधन बिल-2014 के बारे में बताया कि ऐसे मरीजों के साथ भेदभाव करने पर तीन माह से दो वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा एक लाख रुपये तक जुर्माने का भी प्रावधान है। राज्यों में कानून का उल्लंघन न हो इसके लिए हर राज्य में एक-एक लोकपाल नियुक्त किए जाएंगे।
इसके अलावा उन सभी संस्थानों में जहां 100 या इससे अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं, वहां ऐसे मरीजों की शिकायत सुनने के लिए एक शिकायत अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि एचआईवी-एड्स मरीजों के साथ नौकरी, शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य क्षेत्र, किराये पर मकान देने, निजी और सरकारी कार्यालय, इंश्योरेंस में यदि भेदभाव किया गया तो सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
ऐसे मरीजों को संपत्ति का अधिकार होगा और 18 वर्ष से कम उम्र के मरीजों को अपने घर में रहने का समान अधिकार होगा। नौकरी पाने और शैक्षणिक संस्थानों में मरीज को अपनी बीमारी के बारे में बताना अनिवार्य नहीं होगा और यदि मरीज जानकारी देता भी है तो उसके नाम को सार्वजनिक करने पर सजा हो सकती है।
सदन में सपा सांसद नरेश अग्रवाल ने कहा कि कानून से ज्यादा लोगों की सोच बदलने के लिए जागरूकता फैलाने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। वहीं बसपा सांसद अशोक सिद्घार्थ ने कहा कि युवाओं में ऐसी बीमारी पैर पसार रही है। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा कि पार्टी इसका समर्थन करती है।